सोमवार, नवंबर 16, 2009

काश!! आशा पर आकाश के बदले देश टिका होता!!

काश!! आशा पर आकाश के बदले देश टिका होता!! वैसे सही मायने में, टिका तो आशा पर ही है.

जिन्दगी की दृष्टावलि उतनी हसीन नहीं होती जितनी फिल्मों में दिखती है. इसमें बैकग्राऊंड म्यूजिक म्यूट होता है, वरना तो जाने कब के गाँव जाकर बस गये होते. मुल्ला मचान पर बैठे, खेतों में नाचते गाते-मेरे देश की धरती, सोना उगले से..जिन्दगी नहीं कटा करती. काम करना पड़ता है और फिर किस्मत. वो तो दो कौड़ी की भी हिस्से में नहीं आई. बिना मशक्कत वो भी नहीं आती निठ्ठलों के हाथ.

शहर में नल में पानी नहीं आता और न अधिकतर समय बिजली-खेत में खों खों करते क्या खाक सिंचाई करोगे?

बारिश है कि ससुरी, बरसती ही नहीं. गरमी हालत खराब किये रहती है.

किस लिये ऐसा हो रहा है, सोचा कभी-पेड़ काटने के पहले और पेड़ न लगाने के बाद?

आशा लगाये बैठे हो चातक की तरह मूँह बाये कि हे बादल!! आ जाओ. बादल तो आते हैं मगर वो नहीं जिन्हें बुलाया. उनके न आने से संकट के बादल छाने लगते हैं. लो आ गये, बुलाये थे न!! काहे नहीं साफ साफ कहे, कि हे पानी वाले बादल, आ जाओ. मारे अनुष्ठान और यज्ञ सब कर डाले मगर डिमांड, एकदम अगड़मबगड़म!! तो लो, बादल मांगे थे, बादल आ गये-संकट के बादल छा गये.

flood

और फिर तुम रोने लगते हो. अपनी गलती मानने तैयार ही नहीं. तुमको जार जार रोता देख, संयम खोता देख, भगवान भी रहम खा जाता है और हड़बड़ी में इतने सारे बादल भेज देता है कि बाढ़ आने लगती है.

बादल आये मगर इतने आये कि साथ फिर संकट के बादल ले आये.

इस बार भी तुमने साफ साफ नहीं बताया कि बस, काम भर के पानी वाले बादल भेजना. बस, रोने लग गये कि वो रोता देख समझ ही जायेगा.

वैसी ही आशा सरकार से करते हो. ७०% को तो पता ही नहीं कि चाहिये क्या सरकार से. बस, जिस मूँह सुनो तित-सरकार कुछ करती ही नहीं और लगे रोने.

कितनी गलत बात करते हो कि सरकार कुछ करती ही नहीं. इतना सारा तो कर रही है, देखो, सरकार तुमको लूट रही है. सरकार मँहगाई बढ़ा रही है. सरकार भ्रष्टाचार मचा रही है. सरकार विद्वेष फैला रही है. सरकार पाकिस्तान से साठ साल से शांति वार्ता चला रही है. सरकार गद्दी बचा रही है. सरकार गठबंधन कर रही है. सरकार अपने देश पर ही हमला करने वालों को माफ करने में लगी है, सरकार देश के भीतर भाषा के आधार पर विघटन का सपना संजोए लोगों को मौन रह समर्थन दे रही है, सरकार ये कर रही है, सरकार वो कर रही है..अब क्या जान लोगे सरकार की. इत्ते के बाद भी कोई समय बच रहेगा क्या कि वो खोजे तुम क्या चाहते हो उससे करवाना?

कितने आराम से निश्चिंत होकर पान दबाये घर लौट आते हो ठेले पर बतिया कर. काम नहीं मिला, सरकार कुछ नहीं कर रही. खाना नहीं बना, सरकार जिम्मेदार. बच्चे को नौकरी नहीं मिल रही, सरकार जिम्मेदार. इलाज के आभाव में पिता जी गुजर गये, सरकार जिम्मेदार. बच्चा नहीं हुआ, सरकार जिम्मेदार, कुत्ते ने काट लिया, सरकार जिम्मेदार...और तुम, तुम्हारी जिम्मेदारी?

काहे चुने थे भाई ऐसी सरकार? साँप काटे था क्या?

बस, शाम शराब पिला दी या धमका दिया या कुछ रकम टिका दी और तुम समझे कि सब काम बन गया और लगा आये अपना सिक्का!! तो अब भुनाओ.

भईया मिले और कहने लगे कि हमें तो कोई पसंद ही नहीं इसलिये हम तो सिक्का लगाये ही नहीं और ऐन चुनाव के दिन, शहर से दूर, परिवार के साथ पिकनिक मना आये.

तो अब तुम्हारे हिस्से में पिकनिक ही बची है. खूब मनाईये और कोसिये सुबह शाम, कि सरकार कुछ नहीं कर रही.

किसी और ने नहीं चुनी है. तुमने नहीं चुनी, इससे क्या अंतर पड़ता है. भुगतना तो पड़ेगा तुम्हें ही उस पिकनिक के जश्न का मोल!!!

हर बात जीवन में अपना हिसाब माँगती है, एक तुम्हें छोड़कर.

जब भी मांगा हमने तुमसे, हक बतलाना भूल गये
तुम तो थे नादान मुसाफिर, आना जाना भूल गये
जैसा भी तुम कहते आये, हमने जीना सीख लिया
पर तुमसे आशा पानी की, क्यूँ बरसाना भूल गये.

-समीर लाल ’समीर’

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72 टिप्‍पणियां:

रविकांत पाण्डेय ने कहा…

सत्य है गुरूदेव, सतही विचारधारा से कुछ भी भला न होनेवाला है-न अपना न देश का। हम खयाली पुलाव बनाने और खाने में माहिर लोग हैं इसलिये हकीकत के धरातल पर धराशायी होते देर न लगती है।

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

सही कहा आपने गलती तो सरकार चुनने वालों की ही है | और सबसे बड़ी गलती यह कि यहाँ हर व्यक्ति सरकार के भरोसे ही बैठा रहता है खुद कुछ नहीं करना चाहता | बस अंगुली कटवाकर ही शहीद का दर्जा पाना चाहता है |

श्यामल सुमन ने कहा…

लगा निशाना ठीक ही जितने छोड़े तीर।
करती सब सरकार है कहते लाल समीर।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

M VERMA ने कहा…

'जैसा भी तुम कहते आये, हमने जीना सीख लिया
पर तुमसे आशा पानी की, क्यूँ बरसाना भूल गये.'
विसंगतियो के इस तंज को तो सहना ही होगा.
'हर बात जीवन में अपना हिसाब माँगती है'

जीवन मे यदि हम अपनी जिम्मेदारियो से मुकरते रहेंगे तो -------------

MANOJ KUMAR ने कहा…

इसमें आपने अपनी पैनी निगाह ख़ूब दौड़ायी है। साधुवाद।
है पता हमको वहां पर कुछ नया होगा नहीं
हाथ में हर चीज़ होगी आइना होगा नहीं।

वाणी गीत ने कहा…

हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझ लेता तो परेशानी ही क्या थी ..? संविधान प्रदत्त अधिकार तो सभी को चाहिए कर्तव्यों से बचते हुए ...वैसे ही जैसे अधिकतर बच्चे अपने माता पिता से अपेक्षा रखते हैं ...!!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

धार गजब है - नजर यहाँ-वहाँ-हर जगह है ।
कहने का ढंग है जो अतिरिक्त प्रभाव भरता है ।
इनका प्रभाव तो अदभुत है -
"जैसा भी तुम कहते आये, हमने जीना सीख लिया
पर तुमसे आशा पानी की, क्यूँ बरसाना भूल गये."

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

आईना-भाव....!!!

Dipak 'Mashal' ने कहा…

Meri to samajh me nahin aata ki aap itni aasani se kaise itne shandar vyangya, kataksh likh jate hain... bina kisi mashaqqat ke aadmi ke samajh me to aaye hi balki bheja bhi hil jaye.. :)
mere liye saubhagya ki baat hai ki apse mulakat ka mauka milega... vaise main 10 January ko hi wapas UK aa paunga aap mera no. likh liziye 0044-7515474909.. lekin plz Sameer ji apna no. bhi ho sake to de diziye(Canada ke liye landline call free hai yahan se :)...
Jai Hind...

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

हम पानी की माँग तो कर बैठे बादलों से,
पर कभी सोचा की हमने उनको क्या दिया है,
पेड़-पौधों की कटाई में जुटे है सब जी जान से,
कभी २ पौधे को दरवाजे पर स्थान दिया है??,

उम्मीद तो धरी थी,पर कुछ फ़ायदा नही है,
सरकार सब करेगी,पर वोट के लिए,
मंहगाई और भ्रष्टाचार तो बढ़ रही है,
और क्या चाहिए सरकार को नोट के लिए..

बढ़िया प्रसंग..पर सब कुछ भारत की जनता के हाथ में है...जय भारत, भारत की जनता!!!

Udan Tashtari ने कहा…

2009/11/16 Mansoorali Hashmi -mansoor1948@gmail.com-

एक नीर भरी दुःख की बदली,
तश्तरी पे चढ़ कर क्यों बरसी?
आकाश पे आशा के चढ़ कर,
पानी के लिए भी क्यों तरसी?

खुशदीप सहगल ने कहा…

गुरुदेव,
आप नाहक बेचारी सरकार और नेताओं को गरिया रहे हैं...ये नेता तो इतने मासूम होते हैं कि चुनाव से पहले ही गला फाड़-फाड़ कर आगाह करते रहते हैं....मतदान करना...मतदान करना....इनका असल मतलब होता है...वोट मत...दान करना...मत...दान करना...अब हम मतदाताओं की मत ही मारी होती है कि हम अगले पांच साल के लिए अपनी नैया की पतवार फिर उन्हीं नेताओं के हाथ सौंप देते हैं....

जय हिंद...

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut karara kataksh.....
aur ye pankriyan to........

जब भी मांगा हमने तुमसे, हक बतलाना भूल गये
तुम तो थे नादान मुसाफिर, आना जाना भूल गये
जैसा भी तुम कहते आये, हमने जीना सीख लिया
पर तुमसे आशा पानी की, क्यूँ बरसाना भूल गये.

bahut khoob, samir ji .

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

किसी और ने नहीं चुनी है. तुमने नहीं चुनी, इससे क्या अंतर पड़ता है. भुगतना तो पड़ेगा तुम्हें ही उस पिकनिक के जश्न का मोल!!!

सही कहा आपने. अपने पापों का फ़ल तो खुद ही भुगतना पडता है. चाहे सरकार के मामलें में कहले या प्रकृति के संदर्भ में.

रामराम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वाह...
झखजोर कर रख दिया आज तो...!

आपकी पोस्ट पढ़कर तो
मन उद्वेलित हो गया मित्रवर!

भूल गये हों भले हमें वो,
पर हम भूल नही पाये।
पत्थर-दिल अपनों से मिलकर,
हम कितना हैं पछताये!

सुख-बसन्त को धक्का देकर,
हम मरुथल को ले आये!
चोर लुटेरों से मिलकर,
व्याकुल होकर अकुलाए!

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

हमारे हाथ में है ही क्या ? छ्ले जाते रहे छ्ले जाते रहेंगे यही नियति है हमारी .

जी.के. अवधिया ने कहा…

"काहे चुने थे भाई ऐसी सरकार? साँप काटे था क्या?"

दारू मिली थी वोट देने के लिये!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

आसान तरीका है न यह कुछ से खुद हो न हो कोई तो है जिस पर गलती डाली जा सकती है ...बहुत बढ़िया तरीके से लिखा है आपने इस पर समीर जी ..

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

लालच की खातिर देश वासी, इस तरह न बिका होता
काश ! आशा पर आकाश के बदले देश टिका होता !!

ललित शर्मा ने कहा…

कैटल क्लास के लोगों को कैटल क्लास सरकार की ही दरकार है-थरुर कहिन

संजय बेंगाणी ने कहा…

पिकनिक मनाने वाली जनता अपने किये को भुगतती है. हाँ अपना दोष भी सरकार पर डाल पान चबाती है. जै हो...

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

गर सबकुछ ठीक-ठाक रहा तो बंधु यह भी जल्द ही संभव हो जाएगा।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बहुत सही लिखा है

रचना त्रिपाठी ने कहा…

बहुत सच्ची बात कही है.जनता तो बस एक दिन में ही खुश हो जाती है नेताजी लोंगो के हाथ से हलवा-पूरी खाकर. बाकी दिनों के बारे में तो सोचती ही नही है, तो जाये खाये और अघाये!

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खूब कहा आपने , सहज लहजे में सच्चाई वो भी खरी-खरी ।

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खूब कहा आपने , सहज लहजे में सच्चाई वो भी खरी-खरी ।

mehek ने कहा…

जैसा भी तुम कहते आये, हमने जीना सीख लिया
पर तुमसे आशा पानी की, क्यूँ बरसाना भूल गये.
kitani sahi aat kahi,aur satya bhi.ab sarkar hum log hi chunkar dete hai,aasha unse hi rakhenge,par wo log khudki aashayein sampurn karte aur janta ko bhul jaate hai.

शरद कोकास ने कहा…

"काहे चुने थे भाई ऐसी सरकार? साँप काटे था क्या?"
समीर भाई यही सवाल मैं भी अक्सर बीच बहस में कर देता हूँ । लोग आँय-बाँय देखने लगते है और कुछ भी नही कहते । लेकिन अब तो स्थितियाँ बदलती जा रही हैं ..जैसे साँपनाथ वैसे नागनाथ .. क्या किया जा सकता है .सुदूर जंगलों में जाकर देखिये वहाँ रहने वाले मनुष्य से ज़्यादा सुखी जानवर हैं । यह कर्तव्य और अधिकार का द्वन्द्व तो चलता रहेगा इसे हर कोई अपने पक्ष मे इस्तेमाल करता है ..जनता भी और सरकार भी । बर्तोल ब्रेख्त की पंक्तियाँ हैं .." मेरा सुझाव है कि सरकार इस जनता को भंग कर दे / और / अपने लिये दूसरी जनता चुन ले " - शरद कोकास

Nirmla Kapila ने कहा…

कहते हैं न पंजाबी मे धीये गल सुण बहुये कन कर सो आपने भी सरकार को कोस कर जनता को उसका भी कर्तव्य समझा दिया यानि एक तीर से दो शिकार वैसे सोचने की बात है सरकार को कोई तभी तक कोसता है जब तक वो खुद सरकार मे शामिल नहीं । हम लोगों से ही सरकार बनती है हम भी अगर कुर्सी पर बैठेंगे वैसे ही हो जायेंगे इस लिये खोट कहीं हमारे सब के आचरण मे है । बहुत सुन्दर पोस्ट है बधाई

शिवम् मिश्रा ने कहा…

एकदम सटीक मुद्दा उठाया है आपने ........... हम सब सरकार को कोसने में लगे है पर अपनी गलती मानने को तैयार नहीं ! अगर जनता खुद जिम्मेदार नहीं है तो सरकार जिम्मेदार कहाँ से होगी ??

कमेन्ट मोडरेशन पर आपकी राय का बहुत बहुत धन्यवाद !

अजय कुमार ने कहा…

समीर जी पानी के बादल भगवान भेजता है
और संकट के बादल इन्सान खुद बुलाता है

अजित वडनेरकर ने कहा…

तुम तो थे नादान मुसाफिर, आना जाना भूल गये
खूब खरी खोटी सुनाई आपने तो।
अपने दिल की बात...

cmpershad ने कहा…

" बादल तो आते हैं मगर वो नहीं जिन्हें बुलाया. उनके न आने से संकट के बादल छाने लगते हैं. लो आ गये, बुलाये थे न!! काहे नहीं साफ साफ कहे, कि हे पानी वाले बादल, आ जाओ"

तभी तो बरमन दा पुकारते चले गए-
अल्ला मेघा दे रे पानी दे .... :)

नीरज गोस्वामी ने कहा…

लाख टके की बात कह दी है आपने...सीधी सी बात भी हम नहीं समझते...किसी दूसरे पर दोषारोपण करना सबसे आसान तरीका है अपने निकम्मे पन को छिपाने का...इस बार सच में बहुत झकास लिखे हो आप भिडू...जय हो...
नीरज

Science Bloggers Association ने कहा…

सही कहा, इस एक पिकनिक की कीमत हम पूरे पांच साल भुगतते हैं, पर अफसोस कि फिरभी हमें अक्ल नहीं आती।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जब भी मांगा हमने तुमसे, हक बतलाना भूल गये
तुम तो थे नादान मुसाफिर, आना जाना भूल गये..

सत्य वचन .... ७० नही मुझे तो लगता है १००% लोग नही जानते सरकार से क्या चाहिए ...... हां व्यक्तिगत स्तर पर सब जानते हैं उन्हे क्या चाहिए .......

Murari Pareek ने कहा…

फिल्मो की तरह होता तो अच्छा होता एक गाना गाया उसमे भारी मेहनत करते देखा !! गाने गाने में फसल खड़ी हुई, खेत लहलहाए, धान बेचा पैसा कमा और फुर्र्र्रर्र्र्रर से उड़ गए ! एक गाने में सिर्फ ५ मिनट में !
रही बात सरकार की, तो चुनावों के समय सारे काम याद आ जाते हैं, लेकिन चुनाव जितने के साथ ही अन्य काम जो अजेंडा में शामिल नहीं होते जैसा की आपने बताया महंगाई, रिश्वत खोरी , और भी बहुत जो हमें नहीं पता करते ही हैं ! सरकार से और क्या चाहते हैं ?

सागर ने कहा…

इशारों-इशारों में दिल लेने वाले बता यह हुनर तुमने सीखा कहाँ से...

मंथन...

सुलभ सतरंगी ने कहा…

जोगी जी कह गए आस पर संसार है
भला बुरा यहाँ सब कुछ सरकार है !!

रंजना ने कहा…

Sabhi padhne walon ko is post me likhi ek ek baat ek ek shabd apni lagegi...aapne to sabke man kee baat wo bhi itnee khoobsoori se likh di ki ab ispar iske aage kya kaha jaay....

रचना दीक्षित ने कहा…

अजी यू पी,बिहार में भुखमरी ऐसे ही नहीं हैश्रेय बहुत से लोगों को जाता है उसमें हम आप भी हो ही सकते हैं

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

अच्छा लगा...
बाकी तो आपने खूब कह ही दिया है...

Harsh ने कहा…

bahut sundar sameer ji aabhaar............

अल्पना वर्मा ने कहा…

Gambhir vishy hai is par aap ka
lekhan prabhavshali hai.

har kisi ko gambhirta se is disha mein sochna hoga aur kary bhi karne honge..

ajay saxena ने कहा…

शानदार पोस्ट ...

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

जनता अपनी खोपड़ी खुद चुनावी उखल में डालती है और सरकार चुनती है फिर पछताती है और पछताना नियति बन गया है .......आभार

रंजन ने कहा…

मुश्किल है सभी कालों में कम कालों का चुनाव करना..

अर्कजेश ने कहा…

ये पंक्तियां पसंद आयीं "जिन्दगी की दृष्टावलि उतनी हसीन नहीं होती जितनी फिल्मों में दिखती है. इसमें बैकग्राऊंड म्यूजिक म्यूट होता है"

चुनाव नागनाथ और सॉंपनाथ में करना होतो है इसलिए नतीजा वही का वही ।

प्रवीण शाह ने कहा…

.
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आदरणीय समीर जी,

एकदम सही लिखा आपने।
बहुत पहले एक जगह पढ़ा था " लोकतंत्र की एक खूबी यह है कि लोकतंत्र के जरिये आपको वैसी ही सरकार मिलती है जैसी सरकार आप वाकई डिजर्व करते हैं... न कि जैसी होनी चाहिये।"

मेरा यकीन मानिये धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा और वर्ग के नाम पर बंटे हुऐ भारत देश में हमें हर बार वही मिलता है जैसा हम डिजर्व करते हैं।

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत लिखा है। चार लाइन सुनाने के लिये चालीस लाइन की भूमिका। पता नहीं ब्लागिंग में कन्ज्यूमर फ़ोरम की तर्ज वाला फोरम कब बनेगा?

बहुत और लिखा के बीच (सही) पढ़ने की प्रयास न किया जाये। हम पूरे होशोहवास में बहुत लिखा है लिखे हैं। धांसू टिप्पणी है न! :)

अभिषेक ओझा ने कहा…

क्या-क्या सोचे बैठा था, अनूप जी की टिपण्णी देख मुस्कुरा कर भूल गया. मेरी गलती नहीं :)

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

सटीक लेखन। उत्कृष्ट अभिव्यक्ति।
अच्छा लिखा है आपने। कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर रचना प्रभावित करती है।

राज भाटिय़ा ने कहा…

लिजिये हम ने अपनी टिपण्णी कटवा दी, अब सरकार को दोष मत देवे, क्योकि वोट ओर टिपण्णी पर तो मेरा हक है किसे दुं, अगर गलत आदमी को वोट देगे तो इस मै बेचारी सरकार क्या करेगी:)

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

आपका बिंदास अंदाज़ --सही कहा आज !!
well said Sameer bhai .........

regds,
- L

महफूज़ अली ने कहा…

aadarniya sammer ji....

namaskar......


bahut hi achcha laga yeh ....

sachchchi va khari baat......

rashmi ravija ने कहा…

विसंगतियां तो है हीं,..कभी पानी को तरसे और कभी बाढ़ से जूझे...और सरकार हम ही चुनते हैं पर हमारे पास options कहाँ हैं?...उन्ही लोगों में से तो चुनना है...और राजनीति की काजल की कोठरी में सब काले हैं...जबतक पढ़े लिखे समझदार लोग राजनीति में नहीं आयेंगे...देश की नैया यूँ ही डगमग कर चलती रहेगी..

डा. अमर कुमार ने कहा…


यह तो चलता ही है के लिये
अब ई तो चलबे करेगा द्वारा
सकुशल पूरे सत्र चला ले जायें वाली सरकार है यह !
तो इसमें फ़र्स्ट पार्टी हमहीं हैं न, समीर सरकार ?

अम्बरीश अम्बुज ने कहा…

आशा लगाये बैठे हो चातक की तरह मूँह बाये कि हे बादल!! आ जाओ. बादल तो आते हैं मगर वो नहीं जिन्हें बुलाया. उनके न आने से संकट के बादल छाने लगते हैं. लो आ गये, बुलाये थे न!! काहे नहीं साफ साफ कहे, कि हे पानी वाले बादल, आ जाओ.
shandaar vyangya likh diya aapne...

लता 'हया' ने कहा…

शुक्रिया मतला पसंद आया ;;;;;;'काश देश ........टिका होता ' आपका ये लेख और उससे भी ज्यादा उसका समापन प्रभावित करता है .

राजेश स्वार्थी ने कहा…

बात करने का यह तरीका बहुत अच्छा लगा.

साधवी ने कहा…

आप एकदम सही कह रहे हैं।

abhivyakti ने कहा…

bahut sahi sabkuchh aasha par hi tika hai.....

करण समस्तीपुरी ने कहा…

aapka andesha waajib hai sreeman !

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया और सठिक लिखा है आपने! हर इंसान को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास होना चाहिए ! सरकार से तो कोई उम्मीद न ही की जाए तो बेहतर है ! अब देखा जाए तो सारे नेता झूठे वादे करते हैं और सिर्फ़ अपना फायदा देखते हैं! समीर जी आपकी लेखनी को सलाम!

Dr. Mahesh Sinha ने कहा…

जहाँ फैसला बहुमत से होगा ऐसा ही होगा , अल्पमत बात करते रहते हैं

अर्शिया ने कहा…

अगर सोचने से ऐसा हो जाता, तो आज हम हर क्षेत्र में टॉप पर होते।
------------------
11वाँ राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मेलन।
गूगल की बेवफाई की कोई तो वजह होगी?

गौतम राजरिशी ने कहा…

अब सरकार की जान लोगे क्या...हा हा, सच कहा सरकार!

और चार लाइना खूब बनी हैं।

Rajey Sha ने कहा…

जब भी मांगा हमने तुमसे, हक बतलाना भूल गये

बहुत ही अच्‍छी कही है जी।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

भाई, सरकार के बारे में तो कुछ नही कहेंगे। पर एक फ़िल्म का गाना याद आता है --गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा।
बहुत ढूँढा पर ऐसा गाँव कही नही मिला। हाँ, कनाडा में जाकर देखा तो यही कहा --गोरे तेरा गाँव बड़ा प्यारा।
शायद दूर के ढोल सुहाने लगते हैं।

S B Tamare ने कहा…

''हर बात जीवन में अपना हिसाब माँगती है, एक तुम्हें छोड़कर.''

एक एक शब्दों से रोते ''भारत'' की तस्वीर खिंची है आपने / खता कहा हुई यह सोचने का मुद्दा है , दोष उसका भी नहीं दिखता की हमने अपनी उम्मीदे उनकी पल्लू से बाँधी क्योकि किसी का खाविंद बेवफा बेमुरौवत निकल आये तो सुहागन बेवा नहीं होजाती और हमारी उन आशाओ को ओलमा [शिकायत ] देना भी गलत है क्यों की भरतार भी तो हमने ही मुकरर किया हुआ था / खता उस कांजी की भी मालूम नहीं होती जिसने ये नाकाबिले बर्दास्त शादी पढवाई थी / दोष तो नसीब को भी माथे नहीं मढ़ा जाना चाहिए क्योकि वो भी पराये हांथो की खरीद नहीं है / मेरी जुबान यदि लम्बी ना बुझे तो गुनाहगार तो खुद हम ही है जो इश्वर की दी बुद्धि को जंग लगाये जा रहे है / थैंक्स/

साथ ही शुक्रिया आपको जख्म कुरेदने का /

Kamlesh Kumar Diwan ने कहा…

sameer bhai
aapne such likha hai ,bharat mai doir arajkata se bhara huaa hai .

aavaj ने कहा…

बहुत समय देते है आप अपने ब्लॉग पर बहुत अच्छा लगा . मै अभी शुरू ही किया हू लिखना काफी त्रुटियाँ हो जाती है मूलतः मै पेंटर हूँ , एक कालेज में एसोसी. प्रोफ . भी |