गुरुवार, सितंबर 20, 2007

मुझे मुक्ति चाहिये!!!!

याद है मुझे, तब सरकारी मकान में रहते थे. छत पर ईंट और मिट्टी से घेर कर पानी भर दिया जाता था और घर की सारी खिड़कियों के काँच पर गाढ़ा रंग. गर्मी की तपती दुपहरी में खिड़कियाँ बंद होने पर कमरे में घुप्प अंधेरा हो जाता था और छत पर पानी भरा होने से पंखे से एकदम ठंडी हवा आती थी. बड़ी राहत से सोते थे उसमें.

रात में आंगन में पहले पानी से सिंचाई होती थी और अंधेरा होते ही बिस्तर बिछा दिये जाते थे. जब सोने जाते तो ठंडे ठंडे बिस्तर मिलते और सबेरा होने तक मोटी खेस की चादर ओढ़ने की नौबत आ जाती.

mukti1

समय के साथ साथ देखते देखते बाहर सोने का प्रचलन बंद सा होता गया और तब तक कुलर भी आ गये थे. तब गर्मी में बिना कुलर चलाये नींद ही नहीं आती थी. उस पर से रात बिरात अगर बिजली चली जाये तो जैसे पूरा बदन चुनमुना उठता था मानों सैकड़ों चिटियों ने एक साथ काटना शुरु कर दिया हो. फिर जब बिजली आ जाये, तभी नींद आती थी.

कुछ समय और बीता. कुलर की जगह एसी ने ले ली. अब कुलर में उमस लगती थी. बिना एसी जैसे सोने की कल्पना भी मुश्किल हो जाती. कार में एसी, घर में एसी, बिजली जाये तो जनरेटर/इन्वर्टर ऑन. शरीर जैसे एकदम से सुविधाओं का लती हो गया.

इस बात की कल्पना भी मुश्किल हो गई कि बिना इन सब तामझामों के गर्मी में कैसे सो पायेंगे.
फिर कनाडा आ गये. बिजली जाती भी है जैसे भूल ही गये. गर्मी में हर वक्त एसी मे रहना. चाहे घर में, कार में, बजार में या दफ्तर में. सर्दी हो जाये तब यही सब पलट कर हिटिंग में बदल जाता है.
आने के बाद पहली ही भारत यात्रा के बाद अब तो गर्मियों में भारत जाने में भी घबराहट होने लगी है कि कैसे बरदाश्त करेंगे. बार बार तो बिजली चली जाती है और फिर गर्मी भी इतनी ज्यादा.

है तो वो ही भारत, जहाँ से मैं आया था. तब भी तो बिजली जाती थी. फिर क्या हुआ??

शायद सुविधायें बहुत जल्दी हमें अपना गुलाम बना लेती हैं. जकड़ लेती हैं अपने भुजपाश में. अब आप भी तो पेड़ की छाया में नहीं सो सकते?

और गुलाम आदमी तो बदल ही जाता है, वो वो ही कहाँ रह जाता है.

इस गुलामी से कैसे मुक्त हुआ जा सकता है?

नहीं सुझता है कोई मार्ग.

मगर मुझे मुक्ति चाहिये!!!!

मुझे मेरे भारत आने के लिये मौसम नहीं देखना है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

36 टिप्‍पणियां:

अनिल रघुराज ने कहा…

यही तो बात है। समय और सुविधाएं दोनों शरीर पर शर्तें लगा देती हैं। मगर मन बड़ा फ्लेक्सिबल होता है। बना मौसम की सोचे भारत पहुंच जाइए। दो-चार दिन में फिर पहले जैसा हो जाएगा।

yunus ने कहा…

चलो कम से कम आपको ये अहसास तो है । इधर मुंबई में तो कई ऐसे लोग हैं जिनकी बिना एसी के ऐसी तैसी हो जाती है । घर दफ्तर कार सबमें एसी । और फिर भी गर्मी के बारे उनका चेहरा उबलता रहता है ।

धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो ।
जिंदगी क्‍या है ऐ दोस्‍त किताबें हटाकर देखो ।

mamta ने कहा…

आप भारत आकर तो देखिए सब कुछ पहले जैसा ही लगेगा।हाँ थोड़ी बहुत परेशानी तो हो सकती है। क्यूंकि एक बार सुविधाओं की आदत पड़ जाये तो मुश्किल तो होती ही है।
और हाँ गोवा आना मत भूलियेगा। यहां का मौसम काफी खुशगवार है।

सजीव सारथी ने कहा…

समीर जी आप चाहे जिन सुविधाओं के गुलाम कहें अपने आप को पर हम जानते हैं की आप, जमीन से जुड़े हुए इंसान हैं, आपकी मुक्ति के लिए ये प्यास ही बताती है, की आप को अपने स्वदेश से अपनी मिटटी से कितना लगाव है, जल्दी भारत आयिये, यहाँ आप जैसे देश प्रेमियों की, भाषा प्रेमियों की बहुत जरुरत है

संजय बेंगाणी ने कहा…

आ जाईये, आ जाईये. दो चार दिनो में आदत बदल जाएगी.

वैसे बात सही कही. सुविधाओं के आदी तो हो ही गए हैं हम.

kakesh ने कहा…

मुक्त हो जाइये इन बंधनो से और आ जाइये भारत बिना मौसम देखे.आपकी प्रतीक्षा है.

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

सही कहा सर! किसी भी चीज़ पर निर्भर होना, दुःख का ही कारण बनता है,,,लेकिन जैसे सुविधकओं के अभ्यस्त हो गए, उसी तरह एक बार उसके बिना रहना शुरू कर दो तो उसकी ी आदत हो जाती है, स शुरुआत में थोड़ी समस्या आती है।

Neeraj Goswami ने कहा…

यह सुविधाओं की बात अंशत: सही है. पर वातावरण उत्तरोत्तर उष्ण होता गया है. गर्मी और उमस के मारे यह हाल है कि नींद पूरी नहीं हो पाती और स्वास्थ्य में विकृतियां उत्पन्न होती हैं. मुझे लगता है कि भविष्य में ठाठ नहीं वरन उपयुक्त स्वास्थ्य के लिये (कंजूसी से ही सही), एयरकण्डीशनिंग का प्रावधान ले कर चलना होगा.

ALOK PURANIK ने कहा…

मुक्त होकर कहां जाईयेगा। जहां भी जाईयेगा, भांति-भांति के बवाल ही पाईयेगा। जहां हैं, वहीं मुक्त नहीं हुए, तो समझिये कि कहीं भी मुक्त ना हो सकते।
कुछ प्रवचन टाइप हो गया क्या।
पर सच यही है।

PD ने कहा…

सुख सुविधा भोगिये, पर उनका गुलाम मत बनिये..
वैसे एक आइडिया देता हूं, जब भी भारत आना हो तो 3-4 दिन पहले से ही प्रक्टिस शुरू कर दिजीये, गर्मी में हीटर चला कर बैठा किजीये.. शायद भारत फ़िर पहले जैसा मालूम हो..
:D

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

समीर भाई,
हम सुविधाओं के गुलाम होते जा रहे हैं. लेकिन गुलामी से बाहर निकलने का रास्ता मन से शुरू होता है, ये बात आपकी पोस्ट पढ़कर पता चलता है.बहुत ही बढ़िया पोस्ट.बहुत ख़ूब.

धन्यवाद ऎसी प्रस्तुति के लिए.

prabhakar ने कहा…

हाँ सर, बात तो सही है
यही तो माया है(हल्के में लीजियेगा)
जब कृष्ण ने मुक्ति सुझाई तो है-
रथ के घोडे़ इन्द्रियाँ हैं जो हर तरह से विषयासक्त होना चाहती हैं।
लगाम मन है जो इन्हें बाँधे रखता है।
सारथी आपकी बुद्धि है-इससे रथ को सँभालिए।
हाँ वेग में है तो turn होने में समय लगेगा।
और हमारी आत्मा-रत्य्ह मे पड़ी हुई चली जा रही है।

इस बड़्बोलेपन के लिये माफ़ी चाहूँगा।

Isht Deo Sankrityaayan ने कहा…

का महराज! कहें मुक्ति-उक्ति के फेर में पड़ गए. कौनो बाबा का प्रवचन नईं न सुन लिए हैं? अब यहाँ भी ऐसा नहीं होता. नेताओं के बातों का कांटा उप्पर से चुभता है.

Dr.Bhawna ने कहा…

आपने बिल्कुल सही कहा हम सुविधाओं के गुलाम होते जा रहे हैं, गर्मी में जाते हुये सोचने से ही गर्मी लगने लगती है...अब तो एक ही रास्ता है वापस भारत जाकर ही बसा जाये तो फिर वही आज़ादी मिल जायेगी वरना यहाँ तो हम पेड़ के नीचे नहीं सो सकते पुलिस ले जायेगी उठाकर बहुत बहुत बधाई...बहुत अच्छा लिखा है आपने ...

Sanjeet Tripathi ने कहा…

यहां मौसम की गर्मी से ज्यादा आपको रिश्तों की गर्मी मिलेगी हमेशा की तरह! इस से आप मौसम की गर्मी तो यूं ही भूल जाएंगे!

आप पहुंचिए तो सही!!

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

आप बिल्कुल सही कह रहे हैं.. बढती सहुलियतें ही आदमी के नाकारा होने का कारण हैं.. हमने अपने शरीर को तपा कर कुन्दन बनाने की बजाये.. उस सजा कर भुरभुरा कर दिया है.....जाने कब गर्मी से पिघल जाये या सर्दी से जम जाये...

विकास कुमार ने कहा…

त मुक्ति से कहिए. ई एतना बड़ा लेख लिखे से का होगा? :D

बोधिसत्व ने कहा…

हम मुक्त कर देते हैं आप को। समीर लाल मुक्त भव्......।

Shrish ने कहा…

अब आप भी तो पेड़ की छाया में नहीं सो सकते?

अजी अपने राम को तो घर में भी बिना बिजली रहना पड़ता है और कार्यालय में भी। बस आदत सी हो गई है। आप टेंशन न लें, कुछ दिन में आदत पड़ जाती है। :)

Shrish ने कहा…

अजी अपने राम को तो घर में भी बिना बिजली रहना पड़ता है और कार्यालय में भी। बस आदत सी हो गई है। आप टेंशन न लें, कुछ दिन में आदत पड़ जाती है। :)

महेंद्र मिश्रा ने कहा…

अभी तो आप भौतिक सूखो का भरपूर आनंद ले रहे पर यह सोच कर
परेशान है क़ि ये सुविधाए न मिली तो क्या होगा .आपको अध्यात्मिक
शांति क़ि ज़रूरत है जो आपको भारत आकर जल्दी प्राप्त हो सकेगी |

hemanshow ने कहा…

अरे भई यहाँ न्यू जर्सी में कितनी भी गर्मी हो, किसी पार्क में पेड़ के नीचे सोने में जो मज़ा है वो ’ए सी वे सी’ में कहाँ।

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

समीर भाई,
आपके प्रयास सराहनीय है , बहुत ख़ूब.
धन्यवाद ऎसी प्रस्तुति के लिए. में अपने ब्लॉग पर आपका ब्लॉग लिंक कर दिया है।
रवीन्द्र प्रभात

rajivtaneja ने कहा…

सही कहा समीर जी आपने...इनसान सुविधायों के अनुसार अपने आप को बदलता जाता है...या यूँ कहो कि सुविधाएँ उसे बदल देती हैँ....
इनका क्या है...ये तो आनी-जानी चीज़ हैँ
आप निश्चिंत हो के आ जाएँ ... वतन पुकार रहा है...उसी की सुनें...बाकि सब नगण्य है
सब अपने आप सैट हो जाएगा

Basant Arya ने कहा…

आप एक दिन लौट कर आयेगे इसका भरोसा है मुझे

राजीव ने कहा…

शायद सुविधायें बहुत जल्दी हमें अपना गुलाम बना लेती हैं

ठीक इसी के विपरीत इस ग़ुलामी से मुक्ति का प्रारम्भ भी सुविधा-विहीनता/न्यूनता से प्रारम्भ हो सकता हो, साथ इस्के यदि इच्छा और मनोबल हो तो बेहतर।

मुझे मेरे भारत आने के लिये मौसम नहीं देखना है.

देखिये एक बात तो हो गयी पूरी - इच्छा और मनोबल तो दिख रहा है - रही सुविधा-विहीनता/न्यूनता की बात, तो सुविधा-दासता से आपकी मुक्ति के लिये जो भी आवश्यक हो, वह मिले। इस हेतु हमारी भरपूर शुभ-कामनाएं आपके साथ हैं।

एवमस्तु! ;)

फिर क्यों अंधेरे रास्तो पर दीये रखना हम भूल जाते है ने कहा…

बहुत दुखी रहते है वह बच्चे
जिन्हे अपने घर से ज्यादा
दूसरो के घर भाते है
जाते तो बहुत ख़ुशी से हें
पर फिर लौट नहीं पाते है
और किलस कर रह जाते है
जब
कभी व्यंग से
कभी आदर से
घरवाले उन्हे "एंन आर आई "बुलाते है
"एंन आर आई " बना कर
पराया उन्हे हम करते जाते है
और फिर उनसे ही उम्मीद
क्यों हम लगाते है
की हमारी योजनाओं मै
पैसा वह लगाएगे
मातृ भूमि का कर्ज़
वह चुकायेगे
अपनी गलतीयों को
कब तक अपने बच्चो पर हम डालेगे
आज़ाद हुए तो सालो हों गये
बच्चो को आजादी
कब हम दिलवा पाएगे
पराये देश से
कब उन्हे वापस घर ला पाएगे
क्यों नही अपने घरो मे
कुछ काम और हम बढाते है
उन्हे वापस बुलाने के लिये
हम सढ़क क्यों नयी नही बनाते है
बच्चे तो हमेशा ही
रास्ता भटक जाते है
फिर क्यों अंधेरे रास्तो पर
दीये रखना हम भूल जाते है

आभा ने कहा…

मुझे मेरे भारत आने के लिये मौसम नहीं देखना है.
तो फिर आइए अपने वतन।

Dard Hindustani ने कहा…

चिंता छोडे। आपको कुछ जडी-बूटियाँ दिलवा देंगे। एकदम ठंडे हो जायेंगे। अररर-- हमेशा के लिये नही भाई। :)

बेनामी ने कहा…

बहुत जबरदस्त, समीर भाई.

-खालिद

Manish ने कहा…

भाई मेरे घर में ना तो कूलर है ना ए सी और ना ही कोई रूम हीटर फिर भी जिंदगी बसर हो ही रही है मज़े में।

दीपक भारतदीप ने कहा…

गुलाम आदमी तो बदल ही जाता है, वो वो ही कहाँ रह जाता है.
--------------------------
कभी-कभी ख्याल आते हैं पर ध्यान से उस पर काबू पाया जा सकता है।
दीपक भारतदीप

विकास परिहार ने कहा…

जी आपकी टिप्पणी से मुझे लिखने क और अधिक जहौसला मिला। इसके लिये आपका आभारी हु। उम्मीद करता हुँ कि आप इसी तरह मेरा और सभी नवचिट्ठाकारो को प्रोत्साहित करते रहेँगे धन्यवाद

david santos ने कहा…

Very good posting, udan!
Thank you

मीनाक्षी ने कहा…

समीर जी
आज इत्मीनान से आपके ब्लॉग को पढ़ने का अवसर मिला तो लगा जैसे सागर में छलाँग लगा दी।
आपने भारत की याद दिला दी। १९८६ से अब तक दो बार कोशिश की कि बच्चों के साथ भारत लौट
जाऊँ लेकिन शायद अभी और इन्तज़ार करना होगा। सीधी सहज भाषा में आप बहुत कुछ कह गए।

अभिनव ने कहा…

अंजना जी की पंक्तियाँ, अमेरिका सुविधाएँ देकर हड्डियों में जम जाता है एक बार पुनः आँखों के आगे घूम गई। यथार्थ का एक बड़ा सत्य लिखा है आपने।