सोमवार, जून 11, 2007

वैसे तो मुझको पसंद नहीं

मित्रों, यह कोई कविता नहीं और न ही स्पष्टीकरण है.बस एक मजबूर का मजबूरियों का बखान है.
मजबूरी में आदमी कितना विवश हो जाता है. जो कार्य उसे नहीं पसंद, वो तक करना पड़ता है.जिस मूड़ में लिखी गई है, उसी मूड में पढ़िये और आनन्द उठाईये. इस मजबूरी में अन्तिम छंद चिट्ठाकारी को समर्पित है.





जब चाँद गगन में होता है
या तारे नभ में छाते हैं
जब मौसम की घुमड़ाई से
बादल भी पसरे जाते हैं
जब मौसम ठंडा होता है
या मुझको गर्मी लगती है
जब बारिश की ठंडी बूंदें
कुछ गीली गीली लगती हैं
तब ऐसे में बेबस होकर
मैं किसी तरह जी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब मिलन कोई अनोखा हो
या प्यार में मुझको धोखा हो
जब सन्नाटे का राज यहाँ
और कुत्ता कोई भौंका हो
जब साथ सखा कुछ मिल जायें
या एकाकी मन घबराये
जब उत्सव कोई मनता हो
या मातम कहीं भी छा जाये
तब ऐसे में मैं द्रवित हुआ
रो रो कर सिसिकी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब शोर गुल से सर फटता
या काटे समय नहीं कटता
जब मेरी कविता को सुनकर
खूब दाद उठाता हो श्रोता
जब भाव निकल कर आते हैं
और गीतों में ढल जाते हैं
जब उनकी धुन में बजने से
ये साज सभी घबराते हैं
तब ऐसे में मैं शरमा कर
बस होठों को सी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब पंछी सारे सोते हैं
या उल्लू बाग में रोते हैं
जब फूलों की खूशबू वाले
ये हवा के झोंके होते हैं
जब बिजली गुल हो जाती है
और नींद नहीं आ पाती है
जब दूर देश की कुछ यादें
इस दिल में घर कर जाती हैं
तब ऐसे में मैं क्या करता
रख लम्बी चुप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.



चिट्ठाकारी विशेष:

जब ढेरों टिप्पणी मिलती हैं
या मुश्किल उनकी गिनती है
जब कोई कहे अब मत लिखना
बस आपसे इतनी विनती है
जब माहौल कहीं गरमाता हो
या कोई मिलने आता हो
जब ब्लॉगर मीट में कोई हमें
ईमेल भेज बुलवाता हो.
तब ऐसे में मैं खुश होकर
बस प्यार की झप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.


--समीर लाल 'समीर'

चित्र साभार: गुगल महाराज Indli - Hindi News, Blogs, Links

42 टिप्‍पणियां:

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

जब चिट्ठा चर्चा करनी हो
अपनी खोपड़िया धुननी हो
जब नहीं समझ कुछ भी आये
जब नारद पर सर चकराये
छह छह जब पोस्ट कोई करता
सन्देस न उनमें कुछ धरता
लिखने की खातिर कोई लिखे
दिखने की खातिर कोई दिखे
तब ऐसे में तन्हा होकर
चुपचाप खड़ा जी लेता हूँ
प्याला तो एक बहाना है
मैं बोतल से पी लेता हूँ

अनूप शुक्ल ने कहा…

वैसे तो मुझको पसंद नहीं लेकिन जब टिप्पणी एक ही हुयी हो तो दूसरी कर देता हूं।

काकेश ने कहा…

वाह उस्ताद वाह ..मजेदार कविता..और भी मजेदार राकेश भाई की टिप्पणी..

Reetesh Gupta ने कहा…

वाह लालाजी,

क्या खूब लिखे हो ....मजा आ गया....बधाई

और साथ में राकेश जी टिप्पणी भी खूब रही.

yunus ने कहा…

हंगामा है क्‍यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है ।।

अफ़लातून ने कहा…

जब दूर देश की कुछ यादें
इस दिल में घर कर जाती हैं
- पीड़ा भी दिखी ।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

ये फोटो पोलिटिकल है. राजनेता की लगती है. माननीय अर्जुन सिंह की. गुज्जर आन्दोलन के बाद जो आरक्षण की रेवड़िया बांटने वाले की दशा हुई है, वह बताती लगती है.
आपने कहां से कबाड़ी? आप तो कंट्रोवर्सी में पड़ने वाले मनई नहीं हैं न! :)

आलोक पुराणिक ने कहा…

अब पीने पर आप इतना लिख रहे हैं, तो रुकिये टिप्पणी से काम ना चलेगा। जल्दी ही हम फुल पोस्ट ठेलेंगे। आपके पऊए हमने बहुत झेले, अब जल्दी आप हमारी पटियाला छाप बोतल झेलेंगे।
आलोक पुराणिक

अरुण ने कहा…

"वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ."
वाह भाइ वाह कितना दर्द झलक रहा है आपकी कविता से,मेरे तो आसू निकल रहे है
कितनी मजबूरी मे जी रहे है आप
ना पसंद है फ़िर भी पी रहे है आप
मेरी दुआ कबूल करना,ऐ मालिके जहा
जहा,टुन्न हो समीर भाइ,नाला ना हो वहा
:)

अरुण ने कहा…

वैसे हमारी राय है कि कम करदे,तरीका साधारण सा है..
केवल या तो उस दिन पिये जिस दिन बारिश ना हो रही हो.
या उस दिन जिस दिन बरिश हो रही हो
बस करना ये है कि ये नियम टूट्ना नही चाहिये

:)

Sanjeet Tripathi ने कहा…

मस्त!
जब जब गुरुवर एक धांसू रचना डालते है,
खुशी और गम दोनो मे डूबकर पी लेता हूं

संजय बेंगाणी ने कहा…

बस यूँ ही थोड़ी सी पी ली है ... हीक्क...
उतरेगी तो टिप्पियाएंगे.

सूरा सी तरल कविता.

Raviratlami ने कहा…

आपने तो अपनी बढ़िया पोस्ट की ऐसी की तैसी कर दी.

कैसे?

कार्टून देख कर हँसता रहा और हँसते हँसते देखता रहा. आगे आपका लिखा पोस्ट पढ़ ही नहीं पाया :)

Rajesh Roshan ने कहा…

जब सभी ने लिया मजा, बाकी हम क्यों रहेंगे
देख बोतल कि मदहोसी हम भी थोड़ी पी लेंगे

यार ये बोतल चीज ही ऐसी है, कुछ भी लिखवा सकती है ।

अतुल शर्मा ने कहा…

भैया हमने तो वो सुना है क्या कहते हैं...
पीने वालों को पीने का बहाना चाहहिए :)

Manish ने कहा…

मजेदार कविता रही और साथ ही राकेश भाई की टिप्पणी भी :)

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

पियो मगर रखो हिसाव, कि थोडी थोडी पिया करो

DR PRABHAT TANDON ने कहा…

अब समझ मे आया आप की सेहत का राज :)

RC Mishra ने कहा…

वाह उस्ताद वाह, मज़ा आ गया!

Gaurav Pratap ने कहा…

ये मसाईले तसव्वुफ़ ये तेर बयाँ गालिब,तुझे हम वली समझते
जो ये बादाख्वार ना होता

Shrish ने कहा…

मस्त है। :)

आशीष ने कहा…

कार्टून बढीया है कविता ?

दोनो ही टून्न है !

notepad ने कहा…

BADHAEE !! :) TIPPANEO KE LIE AUR KAVITAA KE LIE BHEE :)

बेनामी ने कहा…

डा. रमा द्विवेदी said....

मान गए आप सच में गुरुओं के गुरू हैं......पीने का कोई बहाना आपने छोड़ा ही नहीं....कहीं यह कविता पीकर तो नहीं लिखी ना?? हास्य से भरपूर....आपके स्वाभाव के अनुरूप....कभी हम चित्र को देखते हैं कभी कविता को:)

राजेश पुरक़ैफ ने कहा…

बस ऐसे में पी लेता हूँ.
दो चार घड़ी जी लेता हूं.....सच में मजा आ गया गुरु जी

राजेश पुरक़ैफ ने कहा…

बस ऐसे में पी लेता हूँ.
दो चार घड़ी जी लेता हूं.....सच में गुरु जी मजा आ गया.

राजेश पुरक़ैफ ने कहा…

बस ऐसे में पी लेता हूँ.
दो चार घड़ी जी लेता हूं.....सच में गुरु जी मजा आ गया.

Divine India ने कहा…

वाह समीर भाई यह भी खुब कही…।
लेकिन पहली वाली कविता का तो क्या कहना पढ़कर
मजा आ गया…

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

क्या खूब लिखा है आपनें। बधाई।
*** राजीव रंजन प्रसाद

विकास कुमार ने कहा…

gurudev...!
naman sweeekaren.

aap jo nit naye aadarsh sthapit kiye ja rahe hain....aane waali peedhiyaan use hameshaa yaad rakhengi. :)


(p.s: maaf kijiyegaa roman me likh raha hoon.)

Sagar Chand Nahar ने कहा…

भाई, हमें तो कोई बोटल में पानी भर के दे तो भी पी लते हैं। हमें तो वैसे ही नशा चढ जाता है। उसके लिये बहाना नहीं ढूंढते।

मजेदा कविता, नशा सा छाने लगा है।

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi ने कहा…

बहुत खूब!!!!
पीने वालों को पीने का बहाना चाहिये..
परंतु, कार्टून मेँ इन माननीय मंत्री महोदय को लाने का प्रयोजन ?

कविता फिर भी अच्छी बन पड़ी है.

अरविन्द चतुर्वेदी
भारतीयम्

vinaya ojha 'Snehil' ने कहा…

achhaa hai peene se jyadaa likhte rahie. vinay ojha snehil

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत बढ़िया। पता नहीं किसी ब्रांड की पीते हैं लेकिन छंद तो बहुत ही नशीला बन पड़ा है। मूड में आए तो--- वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ--छंद पर कुछ और बंध लिखिए। शायद दूसरी मधुशाला तैयार हो जाय। नाम बाद में सोच लिया जाएगा।

Seema Kumar ने कहा…

padh lee :)

Dr.Bhawna ने कहा…

Bahut khub. sadhuvad.

sunita (shanoo) ने कहा…

समीर भाई आप तो बहुत ही बढे पियकड़ निकले हमे तो मालूम ही नही था,खुशी में भी पीते हो और दुख में भी पीते हो...ये क्या बात हुई...राकेश जी ने और भी सुंदर लिखा की वो तो बोतल से ही पी लेते है...सच ही कहा है पीने वालों को पीने का बहाना चाहिये..आपकी नजर एक शेर अर्ज करती हूँ...

सुना है साकी तेरी महफ़िल में,
फ़रिश्ते बुलाये जाते है,
बरसों से प्यासे लोगो को...
भर-भर के जाम पिलाये जाते हैं,
ठेके पर पीने वालो को...
सरकार कुछ नही कहती,
आँखों से पीने वालों पर...
इल्जा़म लगाये जाते है। :)

सुनीता(शानू)

रंजू ने कहा…

और नींद नहीं आ पाती है
जब दूर देश की कुछ यादें
इस दिल में घर कर जाती हैं
तब ऐसे में मैं क्या करता
रख लम्बी चुप्पी लेता हूँ


[:)] bahut khoob ...

somen ने कहा…

Is tashtari ko aur udne diziye. bahut upar tak jayega. kya baat hai. padhte padhte nasha mujh par bhi cha gaya. aur aapke comment ke liye shukria samirsaab.

somen ने कहा…

aur aapke comment ke liye bahut shukriya.

Nayi Subah ने कहा…

kuch halka padhna ka man tha...title padh kar ..socha yahi theek rahegi...aapke blog per mere dwara padhi gayi yeh aapki pehli rachna hai...
Bahut hi badhiya likha hai aapne!

Shabdo ke maya jaal me jab
khud ko mai doshi paati hu..
Bas likhne ki hi khatir jab..
antarman me fas jati hu...

sahi -galat ki raah me jab
khud ko anbhigya akela pati hu..
sir par chadar daal jab
aankhen band ker so jati hu..

Andhkaar ki chaah nahi..
par do pal to ji leti hu..
vaise to mujhko pasand nahi!!
band ankho se har pal pi leti hu!

mamta ने कहा…

वाह वाह !अति सुंदर कविता।