सोमवार, अगस्त 28, 2006

हमऊ छुट्टी मनायें...

कुछ समय से लोगों की "छुट्टी का दिन कैसे बीता" पर काफ़ी बेहतरीन गाथाऎं पढ़ रहा था. आज जब नींद खुली तो सोचा, हमऊ हफ़्ते भर का लटका काम निपटाते हुये छुट्टी का सदुपयोग कर डालें.
पहला विचार आया कि कार धोने से शुरुवात की जाये. बस गैराज से गाड़ी निकालने बाहर आ गये. निकलते ही शर्मा जी मिल गये, घूम कर लौट रहे थे. फिर क्या था, चर्चा का दौर चल निकला. फिर सामने ही उनके बरामदे मे बैठ कर चाय पी गई. तब तक मुझे याद आया कि शर्मा जी की एक किताब जो पिछले हफ़्ते लाया था, वो लौटानी है. मै घर के भीतर लौट आया कि उनको किताब ले जा कर वापस कर देता हूँ. घर मे घुस ही रहा था कि बैठक की टेबल पर रखी हफ़्ते भर की डाक का हुजूम दिखाई दे गया. अरे, ना जाने कौन कौन सी जरुरी चिठ्ठियां आकर पडी होंगी. चलो, इनकी छ्टाई कर ली जाये. आजकल डाक मे फालतू विज्ञापन वाली डाक कितनी आने लग गई हैं. सोचा, कचरे का डब्बा यहीं लाकर रख लेता हूँ, उसी मे बेकार डाक फेंकता जाऊँगा, नही तो फिर कचरा बीनने का एक काम और बढ़ जायेगा. कचरे का डिब्बा उठाने पीछे वाले कमरे मे गया, तो डब्बा पूरा भरा मिला. ये लो, अब इसे बाहर कचरे मे डाल कर आयें, तब काम आगे बढ़े. अब कचरा फेंकने जा ही रहा हूँ, तो वहीं सामने तो डाक का डिब्बा है, उसमे बिलों के भुगतान के चेक भी डालता आऊँ, कहाँ फिर चक्कर लगाऊँगा. तो फिर पहले चेक बना लेता हूँ. चेक बुक खोली तो उसमे बस एक ही चेक बचा है. नई चेक बुक निकालनी पडेगी. कहां है...कहां है, अरे हां, याद आया, वो मेरी पढ़ने वाली टेबल की दराज मे रखी है. चेक बुक लेने पहुँचा तो देखो तो जरा, ना जाने कल रात शरबत पीने के बाद बोतल यहीं टेबल पर छोड दी.अभी ठोकर लग कर गिर जाये तो सब जरुरी कागज पत्तर खराब हो जायें. इसे फ्रिज मे रख देता हूँ, नही तो खराब और हो जायेगा.
शरबत की बोतल लेकर रसोई मे आया तो वहां किनारे पर रखा गमले का पौधा काउंटर पर बैठा जैसे मेरी ही राह तक रहा था. बेचारा दम तोड़ने की कागार पर है, कब से पानी नही मिला. वहीं काउंटर पर बोतल रख कर पानी लेने जा ही रहा था कि काउंटर पर किनारे ही मेरा चश्मा दिख गया. ये यहां कैसे आया, कल रात से परेशान हूँ. इसे पढ़ने वाली टेबल पर रख आता हूँ, नही तो वक्त पर मिलता नही है. अरे नही, मगर पहले पौधे मे पानी तो डाल दूँ. वही बेसिन के पास चश्मा रख कर पानी भरने के लिये नल खोला ही था कि बेसिन के बाजू मे रखा टी.वी. का रिमोट दिख गया. पता नही कैसे पहुँचा यहां तक. अपने आप तो चल कर आया नही होगा, शायद कल टी.वी. देखते देखते खाना खा रहा था, उसके बाद हाथ धोते समय यहीं छोड दिया होगा. अरे, जरा भी पानी के छीटें पड़ जाये तो ये मियां तो गये और फिर जब तक नया ना लाओ, टी.वी. देखना बंद. नही, नही, इसे यहां से हटा देता हूँ फिर ही कुछ करुँगा. लेकिन अब तो डिब्बे मे पानी भर ही गया है, पहले पानी ही दे देता हूँ. अब पानी भर कर हमने पौधे का रुख किया तो ना जाने कैसे, छलक कर काफ़ी पानी जमीन पर गिर गया. लो, एक काम और बढ़ गया, इसे पोंछो. पोंछने का कपड़ा ना जाने कहां है, बडी मुश्किल है. वो देखो, सामने ही आंगन मे सुख रहा है.अभी लाकर पोंछ देता हूँ, नही तो पानी सामानों के नीचे घुस जायेगा. तुरंत कपड़ा उठाने बाहर निकल ही रहा था कि दरवाजे से शर्मा जी की आवाज आई कि भाई, वो किताब नही लौटाई, शाम हो गई है आखिर मै कब पढूँगा. मैने शर्मा जी से क्षमा मांगी कि आज तो बिल्कुल समय नही मिल पाया.रात मे खोज कर कल आप तक पहुँचा दूँगा.
शर्मा जी चले गये, मै ढलती शाम का सूरज देख रहा हूँ. काफी थक गया हूँ, छुट्टी का दिन खत्म होने के मुहाने पर है. मै दिन भर व्यस्त रहा मगर: ना तो कार धुली, न शर्मा जी की किताब वापस गई, न चिठ्ठियां छांटी गई, न कचरा फेंका, न बिलों का भुगतान. पौधा अब भी पानी की राह तक रहा है, चश्मा काउंटर से उठकर बेसिन के बाजू मे, और शरबत पढाई की टेबल से उठकर काउंटर पर, चेक बुक दराज से निकलने का इंतजार कर रही है. टी.वी. का रिमोट बेसिन के बाजू मे रखा है. पानी का डिब्बा आधा भरा जमीन पर रखा है और जमीन पर गिरा पानी अपने आप सूख गया है. पोंछे का कपडा वहीं अरगनी पर अपना परचम लहरा रहा है और मै थका हारा आकर सोफे पर बैठ जाता हूँ. अभी ईमेल चेक करना है, ब्लाग पढ़ने है, अपना ब्लाग लिखना है.सोचता हूँ खाना बाहर से ही मंगा लेता हूँ, अकेला रहता हूँ ना, कितना कुछ करुँ, अकेले अब होता नही है.

पहले तो रहीम का दोहा ख्याल आया:

"रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय,
सुनि अठिलैहें लोग सब, बांटि न लैहें कोय."


सोचा आप लोगों को बताऊँ या न बताऊँ. फिर ख्याल आया कि बांटने से दर्द मे कुछ सुकुन मिलेगा, सो लिख दिया.

(आधार: एक ईमेल कचरापेटी मे मिला अंग्रेजी पत्र)

-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

15 टिप्‍पणियां:

Pratyaksha ने कहा…

हा हा बढिया है !

Sindhu ने कहा…

ह ह ह!! बहोत हँसाए हो जी।
बहुत बढिया...

Jagdish Bhatia ने कहा…

बहुत ही अच्छा लिखा है समीर भाई, हंस हंस के.... कमाल हो गया।

संजय बेंगाणी ने कहा…

इतनी व्यस्तता में काम के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं? :)
बहुत मजा आया पढ़ कर.

MAN KI BAAT ने कहा…

चार्ली चैपलिन!!!

Vinod Purohit ने कहा…

good effort made by you. You can create a great fun story also!

Manish ने कहा…

बढिया है हुजूर!

Nidhi ने कहा…

वाह समीर जी! आज आपने लिखा तो कुछ-कुछ समझ आ रहा है। वरना हम यही सोचते रहते थे कि दिन भर फिरकनी की तरह नाचने के बावजूद काम का ढेर जस का तस क्यूँ रहता है।

Jitendra Chaudhary ने कहा…

बहुत सही लिखा है। घटनाओं का तार तम्य बहुत सही बन पड़ा है। अच्छा लगा पढकर।

मै किसी भी कचरामेल का यथास्थिति या अनुवाद करके ब्लॉग-प्रयोग करना नही पसन्द करता, आपकी पोस्ट देखी, अव्वल दर्जे का प्रयोग किया है आपने, काफ़ी इनोवेटिव तरीके से। इसके लिए साधुवाद स्वीकार करें।

Laxmi N. Gupta ने कहा…

वाह, क्या बढ़िया लिखा है। आपको तो कचरे में हीरा मिल गया!

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

होता है अनुवाद कठिन , पर मित्र आपने न्याय किया है
वही कहानी, किन्तु इसे इक नया रूप अंजाम दिया है
सरस लेखनी से ऐसे ही, ठलुआई रस बरसे जायें
जिनके पाठन ने छुट्टी के दिन भी हमको काम दिया है

rachana ने कहा…

बढिया विवरण है!

ई-छाया ने कहा…

सुंदर बन पडा है।

Pramod Singh ने कहा…

ओह, आप तो पहले के ही एक्‍सपीरियेंस्‍ड निकले?..

Gyandutt Pandey ने कहा…

सही है - इतना काम है, इतना काम है कि कोई काम नहीं हो पा रहा हैं! :)