शनिवार, मई 09, 2020

मुस्कान संक्रामक होती है, मुस्कराते रहिये




मुस्कान संक्रामक होती है, मुस्कराते रहिये -ये अब कल की बात हो गई है.  
अब तो मुस्कराओ या कि मनहूस की तरह मूँह बनाये बैठे रहो, कोई देखने वाला नहीं. सब मास्क के पीछे छिपा रहेगा.कोई फरक नहीं. सब धान बाईस पसेरी वाला मुहावरा इससे बेहतर कहाँ सटीक बैठेगा?
अब शायरों को भी अपनी शायरी में लबों पर मुस्कान का जुमला भुलाना होगा. शायरी तो महबूबा के लिए होती है और आजकल कौन सी महबूबा बिना मास्क के मिलने का जोखिम उठायेगी. कम से कम वो वाली तो नहीं जो अभी शेर शायरी को प्रेरित कर रही हो. जब तक मास्क उतारकर मिलने लायक पहचान होगी, तब भला कैसा शेर और कैसी शायरी. बीबी के लिए भला कौन लबों पर मुस्कान वाली शायरी लिखता है?
नया शायर लिखेगा:
उसकी इसी अदा पर, तबीयत मचल जाती है,
वो जब भी मिलती है, आँखों से मुस्कराती है.
हो सकता है ये शेर बहर में न हो, व्याकरण में सुधार मांगता हो. सो तो ये जिन्दगी भी ऐसी डगर पर है कि हर एक कदम पर जीने के तरीके में सुधार मांग रही है. अब तो फुसफुसा का इश्क का इज़हार करना भी कहाँ संभव है. माना कि फोन पर फुसफुसा कर कहा जा सकता है लेकिन फोन नम्बर लेने के लिए इस सोशल डिस्टेन्सिंग के चलते ६ फुट दूर से चिल्ला कर फोन नम्बर माँगना पड़ेगा. मानो कि आप सफल भी हो गये तो वो भी तो चिल्ला कर ही अपना नम्बर दे पायेगी. और जब तक आप नम्बर पा जाने की खुशी से उबर कर उसे फोन लगायेंगे. तब तक उसी वक्त आसपास से गुजरते चार लड़के उसका फोन नम्बर नोट करके उसको फोन मिला चुके होंगे. संभव है उनमें से किसी के साथ बात इतनी कुछ बढ़ भी गई हो कि आपको रॉन्ग नम्बर कह कर टाल दिया जाये. 
फास्ट ट्रेक का जमाना है. सब इतने लम्बे लॉक डाउन की चोट और महामारी की मार देखकर कोई एक भी पल गँवाने को तैयार नहीं. क्या पता कब वायरस धर ले और आप की आत्मा वायर लैस होकर उड़ान भर ले.
यूँ भी आने वाले समय में मुझे लगता है कि अरेन्जड मैरिज का जमाना फिर से जगमगा उठेगा. लोग रिश्ता लायेंगे कि हमारी रिश्तेदार की बच्ची है. बिना मास्क के बहुत सुन्दर दिखती है. दाँत भी एकदम ऐसे जैसे मोती पिरो दिये हों. बिना किसी के रेफरेन्स के क्या पता कि फेसबुक प्रोफाइल पर किसकी तस्वीर चिपका रखी हो. वहाँ तो खैर लड़के भी लड़कियों की प्रोफाइल बनाये बैठे हुए हैं. उनके चक्कर में पड़ जाओगे तो मिलना तो खैर कभी होगा नहीं, बस उनके मोबाईल रीचार्ज कराने से लेकर पिज़्ज़ा भिजवाते ही नजर आओगे. 
लड़का चुनना भी बिना रिफरेन्स के कैसे होगा? तमाम गुटका खा खा कर लाल दांत किये भी मास्क की आड़ में खप जायेंगे. कोई भरोसा नहीं कि एक पीर गुटकेबाज मास्क पहन कर दंतमंजन का विज्ञापन कर रहा हो, कौन जान पायेगा. 
समय ऐसा बदला है कि खुद को कितना बदलें वो भी समझ आना बंद हो गया है. भारत से कनाडा शिफ्ट हुए तो नमस्ते करना छोड़ कर हाथ मिलाने लगे सबसे. अब सब हाथ मिलाना छोड़ कर यहाँ नमस्ते कर रहे हैं और हम बचपन से नमस्ते के अभ्यासीपुनः नमस्ते करने के अभ्यास में जुटे हैं.  
क्या क्या बदलेगा कौन जाने. लिप्स्टिक लगे मास्क आयेंगे या गुटका थूकने के लिए खिड़की लगे वाले .बस जो नहीं बदलेगा वो ये है कि हमारे नेताओं के चरित्र में कोई अंतर नहीं आयेगा. पहले भी वो अदृश्य मास्क पहने ही रहते थे. जो थे वो वैसे कभी कहाँ नजर आये? अब बस वो अदृश्य मास्क दिखने लगेगा. मगर वो दिखने वाला मास्क तो सबके चेहरे पर होगा. भीड़ में मास्क पहने कौव्वे और हंस सब एक ही नजर आयेंगे. चाहे कौव्वा लंगड़ाये या हंस सीधा चले, कौन समझ पायेगा. 
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई ०, २०२० के अंक में:
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शनिवार, मई 02, 2020

झूठ की शेल्फ लाईफ बहुत लम्बी नहीं होती



अक्सर सुनते थे कि फलाना आदतन अपराधी है. बार बार जेल जाता है. छूटता है फिर अपराध करता है, फिर जेल चला जाता है. कोई आदतन शराबी होता है. कितना ही उधार में डूब जाये, स्वास्थय गिर जाये, बीबी छूट जाये मगर आदत ऐसी कि शराब नहीं छूटती. अभी लॉकडाउन में तो ५ गुना रकम देकर भी ये खरीदे जा रहे हैं, अदत जो है. बेचने वाले भी मौके का फायदा उठाने की आदत से ग्रस्त हैं, अत: वो भी आदतन खतरा उठा कर बेचे चले जा रहे है. वैसे खतरा उतना ज्यादा भी नहीं है. रास्ते में पकडे भी गये तो एक दो बोतल उन पकड़ने वालों को देकर छूट ही जायेंगे. वो भी तो आदतन ले देकर छोड़ देने के आदी हैं.
झूठ की शेल्फ लाईफ बहुत लम्बी नहीं होती, वहीं सच की कोई एक्पायरी डेट नहीं होती. कुछ लोग आदतन झूठ बोलने के आदी होते हैं. फैंकना शुरु करते हैं, तो भूल ही जाते हैं कि कल को झूठ खुल ही जाना है. मगर उससे क्या, जब तक पता चलेगा तब तक तो ५ साल के फिर चुन ही लिये जायेंगे. जायेंगे क्या, चुन ही लिए गये हैं फिर से.
विकट समस्या आदतन आंदोलनकारियों और अनशनकारियों पर आ गिरी है. लॉकडाऊन खुल नहीं रहा. मुद्दे पर मुद्दे जमा होते जा रहे हैं. जन्तर मन्तर खाली पड़ा इनकी बांट जोह रहा है, और मजबूरी ऐसी कि घर से निकल नहीं सकते. धरना प्रदर्शन करते हुए लाख चीख चीख कर, नाच नाच कर नारे लगा लें, मगर घर में तो बीबी के सामने चूँ भी नहीं कर सकते. दिमाग में मुद्दे कब्बडी खेल रहे हैं और बीबी के सामने नारे लगाना तो दूर, आवाज तक नहीं निकल रही. बस, मजबूरी ऐसी कि पेट में मरोड़ पड़ने लगी है. बस, मन ही मन प्लानिंग चल रही है कि लॉक डाऊन हटते ही किन किन मुद्दों को लेकर अनशन पर बैठना है. 
पहला मुद्दा तो यही दिमाग में आया कि जंतर मंतर पर बैठ जायेंगे सरकार की करोना से लड़ने में नाकामी का मुद्दा उठाकर. फिर ख्याल आया कि अगर सरकार नाकाम ही रहेगी तो लॉकडाऊन कैसे खुलेगा? अतः इस मुद्दे को तुरंत फ्लश कर दिया.
फिर सोचा कि जैसे विकसित देशों में सरकारें अपने बन्दों को तरह तरह की रियायतें, कोविड से हुए नुकसान की भरपाई, अनुदान, ब्याजमुक्त कर्ज, नौकरी चले जाने पर नागरिकों के घर खर्च आदि दे रही है, उसी तर्ज पर अनशन करके सरकार से मांगे उठायेंगे. मांग पूरी न होने पर भारत बंद का आह्वान करेंगे. मगर बंद करने के लिए पहले भारत खुलना भी तो जरुरी है. वो तो वैसे ही बंद है. अतः इस मुद्दे को भी फल्श करके चद्दर तान कर सो गये.  
कुछ सोचते हुए सो जाओ, तो सपने में वही आता है. सपने में भी मुद्दे बुन रहे हैं. सोच रहे हैं कि बहुत ज्यादा तो नहीं मगर कम से कम कुछ की मांग तो उठाई ही जा सकती है, मिलना जाना तो वैसे भी कुछ नहीं है. 
जो दो एक मुद्दे लॉकडाऊन को लेकर दिमाग में सपने में उपजे, वो सुबह उठते ही नोट कर लिए.
पहला मुद्दा, दिन भर घर में पड़े पड़े इतनी बोरीयत होती है कि शराब ज्यादा हो जा रही है. शराब की दुकानें भी सामने से बंद हैं अतः ब्लैक में पीछे के दरवाजे से खरीद कर पी रहे हैं. ब्लैक का दाम और असली दाम का अंतर सरकार भरे एवं जो एक्स्ट्रा पी रहे हैं उसका पूरा दाम भरे.
दूसरा मुद्दा कि हल्दी का खर्च बढ़ गया है. एक तो एक आयुर्वेदिक एप से ज्ञानार्जन कर रोज दूध में एक चम्मच मिला कर पीने लगे हैं ताकि इम्यून सिस्टम ठीक रहे और कोरोना न पकड़े और दूसरा, जितनी बार ब्लैक में शराब खरीदने निकलते हैं, उतनी बार लट्ठ खाकर लौटते हैं तो हल्दी लगवा कर ही सूजन जा पाती है. सरकार हल्दी पर ५०% सब्सीडी दे और उसे जीएसटी से मुक्त करे.
फिर अगले मुद्दे कि दिन भर डाटा इस्तेमाल कर करके नेट का बिल, बिजली का बिल, खाने का बिल सभी बहुत बढ़ गये हैं, उनका भुगतान सरकार करे.
अभी लिख ही रहे थे कि ख्याल आया कि अनशन तो लॉकडाऊन के बाद करना है, तब तक यह सब खर्चा तो हो ही गया होगा.
सरकार पूछेगी कि इतना खर्च कैश में क्यूँ किया और इसके लिए कैश आया कहाँ से, तो क्या जबाब देंगे?
अतः मुद्दे लिखना स्थगित करके पुनः कल रात की बची बोतल खोल ली और सुबह से ही पीने लग गये.
अनशन न कर पाने की टेंशन में इतना पी रहे हैं आजकल कि लोकडाऊन खुलने के पहले शायद कोरोना से तो बच जायेंगे मगर लीवर की किसी बीमारी से न चल बसें.
फिर तो ऊपर जाकर ही अनशन कर पायेंगे. आदत है तो वहाँ भी मुद्दे मिल ही जायेंगे धरने पर बैठने के लिए.
-समीर लाल ’समीर’   

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई ०३, २०२० के अंक में:

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रविवार, अप्रैल 26, 2020

आपदा की मार से आई ज्ञान की बाढ़


आपदा लाख कहर बरपाये लेकिन साथ में अथाह ज्ञान का सागर भी लाती है. चाहे पढ़े लिखे हों या अनपढ़, सब आपदा की मार से ज्ञानी हो जाते हैं. शायद हमारे समय स्कूल में इसीलिए पीटा जाता होगा कि बिना मार खाये ज्ञानी न हो पाओगे.
दिन में दो बार हाथ धोने वालों को इस आपदा की मार ने सिखाया कि दो बार नहीं, हर घंटे में बार बार धोना है और जिस तरीके से तुम जीवन भर हाथ धोते आये हो, उससे हाथ साफ ही नहीं होते. व्याहटसएप से लेकर हर सेलीब्रेटी यह बता रहा है कि हाथ में कैसे साबुन लगाओ, कैसे ऊँगलियों के बीच में भी मलो और कैसे धोओ और कैसे पोछों? जो सर्दियों में २० सेकेन्ड में संपूर्ण स्नान करके भाग आते थे, वो आज हर घंटे में २० सेकेन्ड तक हाथ धोने का ज्ञान बांट रहे हैं. बच्चे इस उम्र में हमें हिकारत भरी नजरों से देख रहे हैं कि कितना गलत हाथ धोना सिखाये हो बचपन से.
घंसु जो आज तक बीबी का मकबरा और ताजमहल में अंतर नहीं कर पाता था वो भी तस्वीर देख कर बता रहा है कि अरे!! यह तो चीन का व्हुआन शहर है, जहाँ से कोरोना छोड़ा गया.
पान के ठेले पर बैठे हुए पीपीई पर ज्ञान देता हुआ ये वो ही घंसु है जिसके चाचा को एक बार तपेदिक के लिए जब अस्पताल में आईसोलेशन वार्ड में भरती किया गया तो डॉक्टरों के देखकर पूछ रहा था कि क्या बारिश होने वाली है. सब रेनकोट क्यूँ पहनें हैं?
जिन्हें आज तक मास्क का एक मात्र उपयोग डकैती डालते वक्त अपनी शिनाख्त छिपाना पता था वो ही आज एन ९५, सर्जिकल मास्क और सिंगल लेयर मास्क का अंतर समझा रहे हैं. हमें घर पर बनी मास्क पहने देखकर घंसु मुस्करा कर कह रहे हैं कि इसे पहन कर अगर आप यह सोच रहे हो कि कोरोना से बच जाओगे, तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं और फिर पान की दुकान से लाईटर जला कर हमसे कहने लगे कि इसे फूँको. फूँकते ही लाईटर बुझ गया और घंसु चहक उठे कि देखा!! जिस रास्ते से फूँक बाहर आ रही है, उसी रास्ते वायरस भी अंदर जा सकता है.
यह सुन कर बाजू में बैठे तिवारी जी परेशान हो लिए. कहने लगे कि अगर फूँक बाहर नहीं आयेगी तो सांस अंदर कैसे जायेगी? ऐसे में भले कोरोना से बच जायें मगर दम घुटने से यूं ही मर जायेंगे? 
लॉकडाऊन और सोशल डिस्टेंसिंग का फायदा बताने लोग घर से निकल कर पड़ोसी के बरामदे में आपस में सटे बैठे चाय का आनद उठा रहे हैं.
घंसु ने एक और ज्ञान की बात बताते हुए कहा कि चाहे कोई बीमारी हो जाये, बस ये कोरोना न होये. इज्जत मटिया मेट हो जाती है. लगता है मरीज न होकर चोर हों. सारे शहर में खबर फैलती है कि एक और व्यक्ति पोजिटिव पकडाया और उसे अब मेडीकल कालेज ले जाया जा रहा है.
कोई तो इतना ज्ञानी हो लिया कि करोना के दौरान व्हिसकी कैसे मूँह में घुमा घुमा कर पियें ताकि दाँत और मसूडों में छिपे कोरोना को मारते हुए व्हिसकी गले में बैठे कोरोना को नेस्तनाबूत करते हुए पेट में चली जाये और कैसे पीने के पहले उसे जोर से महक लें ताकि नाक में बैठा कोरोना भी वीर गति को प्राप्त हो.
तिवारी जी बताने लगे कि वो तो अभी हल्दी खरीद कर ही आये थे. फिर उन्होंने हल्दी का काढ़ा कैसे बनायें और अपनी इम्यूनिटी बढ़ा कर कोरोना को ठेंगा कैसे दिखाये, विषय पर प्रवचन दिया. तब तक पुलिस की वैन आ गई. सब भाग लिए. तिवारी जी धोती पहने थे तो भाग न पाये. खूब लट्ठ पड़े और करहाते हुए घर लौटे. घंसु ने तुरंत फोन करके उनको ज्ञान दिया कि जो हल्दी काढ़ा बनाकर पीने के लिए ले गये हो, उसी को लेप बना कर लगाने के काम में कैसे लाईये ताकि सूजन और दर्द जाता रहे.
आपदा के चलते ज्ञान बाँटने की हालत ये हो गई हैं कि विश्व के सबसे ताकतवर देश का राष्ट्राध्यक्ष बिना डॉक्टरों की सलाह के कोरोना की दवा बताये दे रहा है और वैज्ञानिकों से डेटोल और सेनेटाईज़र से लंग्स की सफाई करने के तरीके इजाद करने को कह रहा है. घबराहट में डेटोल कम्पनी को सामने आकर बताना पड़ रहा है ये सिर्फ बाह्य उपयोग के लिए है.   
अब तो बस इन्तजार है कि लॉकडाऊन हटे और उन विश्व ज्ञानियों से भी मुलाकात हो जो अभी व्हाटसएप यूनिवर्सिटी में ज्ञान की वर्षा कर रहे हैं. डर ये है कि यदि ऐसे ही लॉकडाऊन चलता रहा और ज्ञान की वर्षा होती रही, तो ज्ञान की बाढ़ की ऐसी आपदा न आ जाये, जिसके सामने कोरोना की आपदा भी बौनी लगने लगे.  
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल २६, २०२० के अंक में:
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शनिवार, अप्रैल 18, 2020

मास्क पहन कर बोलना मना है



कोरोना ने सबको चपेट में लिया है. जनता से सरकार तक सभी अपने अपने हिसाब से जुटे हैं इसका सामना करने में. सरकार सुनिश्चित करने में लगी है कि लोगों को बहुत परेशानी न हो और जहाँ तक हो सके, जनता को नुकसान न हो. न जाने कितनों की नौकरियाँ चली गई, कितनों के धंधे बंद हो गये. उसकी भरपाई करने सरकार तरह तरह की सहायता की नित घोषणा कर रही है.
निश्चित ही जिन्हें जरुरत है, जिनकी नौकरी, धंधे और आय के अन्य साधन चले गये हैं, उनको यह सब सुविधायें मिलना ही चाहिये मगर ऐसे वक्त में मौकापरस्तों की एक बड़ी तादाद दिखाई देने लगी है. जिनकी नौकरी जैसी थी वैसे ही चल रही है. आमदनी में कोई फरक नहीं पड़ा है वो भी हर योजना का फायदा लेने निकल पड़े हैं.
बड़ी पुरानी कहावत है - बैठा बनिया क्या करे, इस कोठी का धान उस कोठी करे. खाली बैठा दिमाग क्या क्या तरीके खोज रहा है?
घर में दो गाड़ियाँ हैं. अब दफ्तर तो जाना नहीं है, सभी घर से काम कर रहे हैं. सिर्फ एक गाड़ी वो भी हफ्ते में एक बार ग्रोसरी लाने तक के सीमित उपयोग में आनी है. अतः एक गाड़ी का इन्श्योरेन्स तो तुरंत सिर्फ चोरी और आग को कवर करने वाला करवा कर लगभग नहीं के बराबर प्रिमियम पर करा लेना तो फिर भी समझ में आता है. लेकिन अब दूसरी वाली गाड़ी पर भी इन्श्योरेन्स कम्पनी डिसकाऊन्ट दे, क्यूँकि इतना कम इस्तेमाल हो रहा है तो दुर्घटना की संभावना न के बराबर है. ये भी तो विचार कर लो कि अब गाड़ी न चलने के कारण तुम्हारे भी तो पैट्रोल ऑयल के, टायर का घिसना, टूट फूट आदि की बचत हो रही है. इस बचत के बारे में पूछो तो मौन धर लेते हैं और कहते हैं कि मास्क पहन कर बोलना मना है.
जिनके धंधे इस महामारी के चलते बंद हो गये हैं, उनको मदद करने के लिए सरकार ने एक सस्ता लोन, जिसका २५% अनुदान है एवं लौटाना भी नहीं है, लोग उसे लेने के तरीके निकाल रहे हैं. .क्या करना है उससे? कुछ नहीं, जो हिस्सा नहीं लौटना है, उसे छोड़ कर बाकी किश्तों में वापस कर देंगे.
घर से काम कर रहे हैं अतः घर का एक हिस्सा, जो यूँ भी खाली पड़ा होता था और जहाँ भूत लोट रहे होते थे, इन्कम टैक्स में होम ऑफिस के तौर पर क्लेम करने के तरीके खोज रहे हैं. कहीं जाना नहीं है तो बिजली, टीवी, इन्टरनेट आदि का खर्च बढ़ गया है, सरकार बिजली के दाम कम करे, सो कर भी दिये. अब उनको इन्टरनेट बिल पर डिस्काऊन्ट चाहिये. मगर दफ्तर न जाने के कारण चाय, कॉफी, नाश्ता जो खरीद कर खाते थे, आने जाने में ट्रेन आदि पर बेहिसाब खर्च करते थे, न कपड़े रोज के नये, न मेकअप, न जूता, न परफ्यूम के कोई खर्चे. इस पर बात करो तो कहते हैं कि यह तो हमारी बचत है इससे सरकार को क्या?
६५ साल के ऊपर वालों को सरकार की तरफ से ग्रोसेरी, अन्य सामग्री, डेलीज और दवाई आदि दुकान से लेकर घर पहुँचाई जा रही है ताकि बुजुर्गों को घर से न निकलना पड़े. तो बुढ़ी अम्मा के नाम से ही सब शॉपिंग हो रही है ताकि होम डिलवरी हो जाये और निकलना न पड़े. आज पहली बार फायदा दिखा अम्मा को ओल्ड एज होम न भेजने का, तो वो तो ले ही लो. शॉपिंग में मुन्ने की चाकलेट, अपनी वाईन और बीबी के मेकअप का सामान भी धरवा ही लेना, वरना अगर उसे लेने निकलना ही पड़ा तो क्या फायदा हुआ अम्मा को घर पर रखने का?
आने वाले समय में, जब लोग निकलना शुरु करेंगे तब शायद कुछ पीर यह न मांग उठा दें कि घर में रह रह कर मेरा वजन बढ़ गया है, अतः सरकार जब तक मैं पुनः पूर्वास्था में न आ जाऊँ , मेरे जिम और हैल्दी डाईट का खर्च ऊठावे.
कभी वर्क लाईफ के बैलेन्स एवं क्वालिटी फैमिली टाईम न बिता पाने के लिए सदा नौकरी को कोसने वाले, आज जब दफ्तर से आवाजाही से बचा समय हाथ में लिए २४ घंटे घर पर हैं, तो बोरियत का नारा लगा रहे हैं और उम्मीद है कि सरकार नेटफ्लिक्स फ्री में दिलवा दे.
लगता है कि तुमने कहीं सुन लिया होगा कि नींबू का पानी कोरोना में फायदा करता है और तुम सरकार को भी नींबू की तरह निचोड़ कोरोना में फायदा उठाने की फिराक में लगे हो.
अरे तुम्हारा ही पैसा है जो तुमने टैक्स के माध्यम से सरकार को दिया है. खजाना खाली करा लोगे तब भी तुमको ही बाद में उस खजाने को भरना है देश को चलते रहने के लिए किन्तु आज तुम्हारी यह बेजा मांग कहीं जरुरतमंदो को उचित मांग से भी न वंचित कर दे.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल १९, २०२० के अंक में:
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शनिवार, अप्रैल 11, 2020

एक नेता की डायरी का पन्ना!!



कल एक जरुरी काम से नेता जी के घर जाना हुआ. वहीं से उनकी डायरी का पन्ना हाथ लग गया, साहित्यकार बनने की फिराक में लगा शिष्टाचारी लेखक हूँ सो इस मैदान के सामान्य शिष्टाचारवश चुरा लाया. बहुत ही सज्जन पुरुष हैं. सच बोलना चाहते हैं मगर बोल नहीं पाते. देखिये, उनका आत्म मंथन-उन्हीं की लेखनी से (अभी साहित्यकार बनने की फिराक में लगा हूँ अतः ऐसा कहा अन्यथा लिखता मेरी लेखनी से):
झूठ बोलते बोलते तंग आ गया हूँ. कब मुझे इससे छुटकारा मिलेगा. क्या करुँ, प्रोफेशन की मजबूरियाँ हैं.
रोज सोचता हू कि झूठ को तिलांजलि दे दूँ. सच का दामन थाम लूँ. मगर कब कर पाया है मानव अपने मन की.
कुछ महिने में चुनाव आने वाले हैं और ऐसे वक्त इस तरह के भाव-क्या हो गया है मुझे? लुटिया ही डूब जायेगी चुनाव में अगर एक भी शब्द सच निकल गया तो.
क्या सच कह दूँ जनता से??
-यह कि तुम जैसे गरीब हो वैसे ही रह जाओगे, हमारे बस में नहीं कि तुम्हें अमीर बनवा दें?
-यह कि मँहगाई बढती ही जायेगी. क्या आज तक कुछ भी सस्ता हुआ है जो अब होगा.
-यह कि मैं तुम्हारे बीच ही रहूँगा? ( तो दिल्ली कौन जायेगा, विदेशों में कौन घूमेगा?)
-यह कि तुम्हारी समस्यायों से मुझे कुछ लेना देना नहीं. तुम जानो, तुम्हारा काम जाने.
-यह कि मैं बिना घूस खाये अगर सब काम करता रहा तो चुनाव का खर्चा और विदेशों में पढ़ रहे मेरे बच्चों का खर्चा क्या तुम्हारा बाप उठायेगा.
-यह कि मैँ हिन्दु मुसलमानों के बीच दरार डालूंगा ताकि मैं लगातार चुनाव जीतता रहूँ.
- यह कि मुझे जब कुछ समझ न आयेगा तो तुमको झुनझुना बजाने की सलाह दे कर उलझाये रखूंगा. तुम झुनझुना बजाते रहाने और मेरे गुन गाते रहना.
-यह कि मेरे हर फैसले को, चाहे वो सही हो या गलत, अपने चेलों के माध्यम से सही सिद्ध करवा ही लूंगा.
- यही कि तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम मुझे खुदा मानो
..यह कि..यह कि....
क्या क्या बताऊँ, लोग तो सभी ज्ञानी हैं, सब समझते हैं. मेरी मजबूरी भी समझ ही गये होंगे.
फिर मैं ही क्यूँ अपराध बोध पालूँ?
आज इतना ही, एक विडियो कांफ्रेन्स में जाना है. देश हित में एक सौदे की बात है. (लम्बी डील है, मोटा आसामी है.)
संपादकीय टिप्पणी: ध्यान दिया जाये कि नेता भाषण कितना भी लम्बा दे ले, लिखता जरा सा ही है.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल १२, २०२० के अंक में:

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शनिवार, अप्रैल 04, 2020

हम मि.कायल, अब आदतन भी कायल हो जाते हैं!!



कायल एक ऐसी विकट और विराट चीज है जो कोई भी हो सकता है, कभी भी हो सकता है, किसी भी बात से हो सकता है और किसी पर भी हो सकता है.
मैने देखा है कि कोई किसी की आवाज का कायल हो जाता है, कोई किसी की सुन्दरता का, कोई किसी के लेखन का, कोई किसी के स्वभाव का, कोई किसी के नेतृत्व का और यहाँ तक कि कोई किसी की मौलिकता पर ही कायल हो जाता है.
अब मौलिकता पर भी कायल सिर्फ शुद्ध मौलिकता की वजह से नहीं बल्कि इसलिये कि वैसी मौलिकता और कहीं कम से कम उन्होंने नहीं देखी. कायल होने की और करने की स्वतंत्रता सभी को हासिल है. जहाँ आप अपनी सूक्ष्म दृष्टि या बुद्धि की कुशाग्रता की वजह से कुछ आंक कर कायल हो सकते हैं, वहीं आप अपने दृष्टि दोष के कारण या मूढ़ता की वजह से भी कायल हो सकते है.
’कायलता’ की इसी स्वतंत्रता का तो मैं कायल हूँ.
भाई साहब, आपने लालू का नाम तो सुना होगा?
अरे, हम तो उनकी स्टाईल के कायल हैं.
याने कि इससे अर्थ निकलता है कि कायल होने के लिए यह जरुरी नहीं कि आप किसी की बुद्धि के कायल हों,  तो वो उसकी कुशाग्रता के ही हों.. तब तो वह कुशाग्रता की कायलियत कहलाई. बुद्धि का कायल होना बेवकूफी पर कायल होना भी अपने आप में समाहित करता है.
’कायल’ शब्द की यह व्यापकता भी कायल कर जाती है.
जब आप अपनी ओजपूर्ण रचना सुना कर फारिग हों तो सुना होगा, भाई साहब, क्या आत्मविश्वास है आप में. हम तो कायल हो गये.
आप खुश हो गये?
अगर आप की रचना वाकई अच्छी होती तो वो रचना का कायल होता या फिर आपकी ओजपूर्ण शैली अगर वाकई ओजस्वी होती, तो वो आपकी शैली का कायल होता. इन दोनों बातों को छोड़ वो आपके आत्मविश्वास का कायल हुआ-सोचिये.
याने अगर इसका गुढ़ अर्थ निकालने के लिए अगर गहराई में उतरा जाये तो आप जान पायेंगे कि न तो आपकी रचना इतनी प्रभावशाली है और न ही ओजपूर्ण शैली इतनी ओजस्वी है कि उसका कायल हुआ जाये, उसके बावजूद भी आप पूरी ताकत से खड़े अपनी रचना पूरी होने तक मंच और माईक संभाले रहे और मुस्कराते हुए मंच से उतर रहे हैं तो इसे आपका आत्मविश्वास नहीं तो और क्या कहेंगे. वाकई, आपका आत्मविश्वास कायल होने योग्य है. बस, इतना ही तो वो आपको बताना चाह रहा था.
’कायल’ शब्द के इसी सामर्थ्य पर तो मैं कायल हुआ जाता हूँ.
मैने कई शरीफों को गुण्डों के आतंक से और पिटने से बचने के चक्कर में यह कहते सुना है कि भाई, हम तो आपके नाम के ही कायल हैं, क्या सिक्का जमाया है आपने एरिया में. ये लो, नाम के ही कायल हो गये और वो भी इसलिये कि क्या सिक्का जमाया है.
ऐसी कायलता चमचागीरी में भी देखने में आती है अपना काम साधने के लिए.
कोई अपने गुरु के ज्ञान का, कोई चेले के चेलत्व का, कोई इसका और कोई उसका कायल होते दिख ही जाता है. यहाँ तक की गुरु अपने गुरुत्व को बचाने और चेले को सहजने के लिए भी चेलत्व का कायल हो लेता है. वो भी जानता है कि अगर चेला ही नहीं रहा तो गुरु कैसा? एक दूसरे की पूरकता बनाये रखने के लिए भी इस कायलता रुपी सेतु को टिकाये रखना अपरिहार्य हो जाता है.
कायल होना और कायल करना अक्सर एकाकीपन भी दूर करता है. कायल किये और कायल हुए लोग एक दूसरे के करीब से आ जाते हैं, इस तरह से एक गैंग जैसा संगठन बन जाता है और फिर सामूहिकता की ताकत को कौन नकार सकता है. अगर कोई सामूहिकता की ताकत को नकार सके तो बताये, मैं उनकी अल्पबुद्धि का आजीवन कायल रहूँगा.
मैं यह कतई सिद्ध करने की कोशिश में नहीं हूँ कि कायलता का कोई महत्व नहीं है. बहुत महत्वपूर्ण है किसी बात का कायल हो जाना या किसी को कायल कर देना किन्तु मेरा उद्देश्य मात्र यह है कि कायल होने या करने की महत्ता आंकते समय ये जरुर देख और परख लें कि कौन, किस बात पर, किससे और किसलिये कायल हुआ.
यूँ ही व्यर्थ खुश न हों मात्र किसी के कायल हो जाने पर या किसी को कायल करके. वरना कोई आपकी खुशी का ही कायल न हो जाये.
हम तो खैर अब आदतन भी कायल हो जाते हैं चाहे कोई ताली बजाने बोले या थाली बजाने या फिर बत्ती बुझाकर दिया जलाने! हम मि.कायल, इन सब से कायल हुए आदेशों को पूरे धूमधाम से तामील करते हैं. \
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल ५, २०२० के अंक में:

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रविवार, मार्च 29, 2020

अगर मैसेज न आये तो फिर आयेगा क्या?



पूरा भारत घर में बंद है सिर्फ उनको छोड़कर जिनको बाहर होना चाहिये जैसे डॉक्टर, पुलिस आदि. साथ ही कुछ ऐसे भी बाहर हैं जो पुलिस से प्रसाद लिए बिना अंदर नहीं जाना चाहते. मगर घर में बंद लोग पूरी ताकत से व्हाटसएप पर चालू हैं. अगर व्हाटसएप का मैसेज मैसेज न हो कर एक पैसे वाली करेंसी भी होता, तो आज हर घर करोड़ पति बस रहे होते. लखपति तो खैर वो जब घर में नहीं बंद थे, तब भी होते.
एकदम से बाढ़ आ गई है मैसेज और फॉरवर्ड की. बाढ़ कहना भी शराफत ही कहलायेगी दरअसल आई तो सुनामी है. सोना जागना खाना पीना मुश्किल हो गया है. अच्छा खासा मोबाईल है महंगा वाला फुल्टूस मेमोरी के साथ. मगर घड़ी घड़ी मेमोरी फुल दिखा रहा है. साफ करो, फिर भर जाये. स्वच्छता अभियान से भी बुरा हाल हो गया है इसका. वहाँ भी कम से कम मंत्री जी की सेल्फी हो जाने के बाद कुछ घंटे तो लगते ही हैं पुनः कूड़े को सेल्फी की जद वाले स्थल पर पुनर्स्थापित होने में. मगर यहाँ तो वो मौका भी नहीं.
जितने ग्रुप हैं. सब के सब वही के वही फॉरवर्ड भेज रहे हैं. लगने लगता है कि सिर्फ ग्रुप के नाम अलग अलग हैं, सदस्य वही के वही हैं. फिर जाकर उनके सदस्यों के नाम पढ़ो कि अगर ऐसा है तो सारे ग्रुप डिलीट करके एक ही रखें, तो सदस्य भी अलग अलग निकलते हैं.
जितनी परेशानी हो रही है, उत्सुक्ता भी उतनी ही बनी है तो कोई ग्रुप छोड़ा भी नहीं जा रहा है. भले ही बाहर आकर बस गये हैं मगर डीएनए तो वही भारतीय है न!! बस जैसे ही नया मैसेज पकड़ आया, धड़ाक से अपने भी सभी ग्रुपों में भेजे चले जा रहे हैं कि कोई कम न आंक बैठे.
अब जब फॉरवर्ड करना है तो मोबाईल में मेमोरी भी चाहिये तो पुराने मैसेज साफ करो. फिर वही दुविधा कि कौन से वाले? क्या पता कोई फॉरवर्ड होने से रह गया हो वो भी डीलीट न हो जाये.
कुछ मैसेज जरुरी जानकारी से भरे हैं. कुछ तब तक जरुरी जानकारी से भरे हैं जब तक उनके फेक होने का दूसरा किसी और का मैसेज नहीं आ जाता. कुछ हँसी मजाक वाले. ऐसे विषम समय में उनकी भी जरुरत है. कुछ करोना से डराने वाले, तो कुछ करोना से बचने के उपाय बताने वाले. कोई कह रहा है बीस सेकेंड हाथ धोते रहो तो कोई गरारे करा रहा है तो कोई पूरा ही नहलवा दे रहा है. कोई कपूर, लौंग, इलाईची का जंतर बनाकर गले में बांध कर घूमने की सलाह दे रहा है. तो कोई हल्दी पिलवा दे रहा है. कोई करोना के आंकड़े बता रहा है. कोई ज्योतिष के हिसाब से कब तक करोना का कहर समाप्त हो जायेगा, उसकी घोषणा कर रहा है. कुछ लोग अपने गाने की कला पर हाथ साफ करके झिलवा रहे हैं तो कुछ की छिपी प्रतिभा सामने आ रही है. 
मने कि जितने हाथ, उतने मोबाईल और उतने गुणित १२ घंटे के हिसाब से ७२० मैसेज. सोचो भला. अभी भारत में करोना बंदियों का चौथा ही दिन है. १७ और गुजरने हैं. कैसे संभालेगे इतनी आमद रफ्त इतने सारे मैसेजों की.
एक सोच यह भी आती है कि अगर मैसेज न आये तो फिर आयेगा क्या? विकल्प क्या है? लोगों का आना जाना तो बंद ही है. अतः आने देते हैं मैसेज ही. कम से कम कुछ तो आ रहा है. हम तो वो लोग हैं जो विकल्प के आभाव में सरकार तक उनकी बनवा देते हैं जिनके हटने की दिन रात प्रार्थना करते हैं. फिर यह तो मैसेज मात्र है. कम से कम इसको डिलीट कर हटाने की सुविधा तो है.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मार्च २९, २०२० के अंक में:
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