शनिवार, फ़रवरी 24, 2018

नेता समाज सेवा करे- ऐसा शोभा देता है क्या?


होली आ गई. हमारे समय में होली की तैयारी बड़े जोर शोर से की जाती थी. गाढ़े रंग, गुलाल, अबीर आदि लाये जाते थे. टेसू के फूलों को उबाल कर उसका रंगीन पानी बगीचे के पानी के टैंक में भरा जाता था और लोगों को पकड़ पकड़ कर उसमें डुबोया जाता था. गुब्बारों में पानी भर कर मारना, वार्निश और स्टैंप पैड की स्याही से चेहरा रंग देना और जाने क्या क्या. रसोई से आलू चुरा कर उसे काटकर चोर का ठप्पा बना कर लोगों के कपड़ों पर लगा देते थे. तब मालूम भी नहीं था यही असली नेता होने की निशानी है कि चोरी करो खुद और ठहरा दो चोर दूसरे को. ढोलक, नगाड़े के साथ नाचते गाते मनाई गई होली अगले कई दिनों तक लोगों के चेहरे पर नजर आती. रंग, वार्निश, स्याही भी उतरने में कुछ दिनों का समय लगाते.
कई इलाकों में तो बहुत ही बीहड़ तरीके से इसे खेला जाता था. नाली के कीचड़ से लेकर खुजली वाले किमाच तक लोग लगा देते थे. शराब पी पी कर धुत हो जाते. ये उन दिनों की बात है मगर कहीं कहीं तो आज भी, जैसे बरसाना में लट्ठमार होली आदि पुरानी यादें जिन्दा रखे है.
आजकल होली के दिन घर बंद करके सोने का रिवाज है या फिर पिकनिक पर निकल जाने का. अब लोग आपस में होली नहीं मिला करते. वे व्हाटसएप और फेसबुक पर होली की पिचकारी चलाते हैं. वर्च्युल रंग लगाते हैं. जितनी बधाई और गले मिलना बाहर सड़क पर खेल कर हम नहीं आदान प्रदान कर पाते थे, उससे कहीं ज्यादा ये कमरे में बैठे बैठे बिना रंगे पुते दे चुके होते हैं. अगर फेसबुक और व्हाटसएप पर खेली होली असल में खेली गई होती तो शायद सारी दुनिया मिल कर भी उतने रंग, अबीर, गुलाल और मिठाई की स्पलाई न कर पाती.
डिजिटल हो जाने का ये फायदा तो हैं कि आप के पास हो या न हो, उड़ाये चलो. कौन सा असली माल है? जिस दुनिया में अक्सर खुद की तस्वीर भी ऐसी हो कि जिसे देखकर आप खुद को भी न पहचान पायें, उस दुनिया से भला सच्चाई की कितनी उम्मीद पाल सकते हैं? इस आभासी दुनिया में तो प्यार के इजहार को भी ठोक बजा कर जब तक इस निष्कर्ष पर पहुँचों कि हाँ, यह कोई फंसाने और बदनाम करने का षणयंत्र नहीं, वाकई में इजहार किया है ..तब तक इजाहर करने वाली कहीं और कमिट हो चुकी होती है.
कवियों की भी पौ बारह हो लेती है और वो होली पर अपनी कविताओं का बाजार सजाते हैं. फेसबुक और व्हाटसएप पर ऐसे कविताओं का एकाएक बाजार गरम हो जाता है जिसमें अगर शीर्षक में कविता और बॉडी में होली शब्द न आये, तो न तो आप यह जान पायेंगे कि यह कविता है और न ही यह जान पायेंगे कि होली के त्यौहार विशेष के मद्देनजर लिखी गई है. चूँकि होली आ रही है अतः मित्रों को आगाह करना जनहित में जरुरी समझता हूँ कि कृप्या शीर्षक ही ऐसा रखें जैसे होली की कविताताकि पूरा पढ़ने का टार्चर न झेलना पड़े. खूब सारी पोस्टों को पढ़ना और उनसे गुजरना होता है. अगर सभी कविमना इसका पालन करेंगे तो जहाँ सभी का भला होगा वहीं उनका भी होगा..आप भी तो बचोगे दूसरों को पढ़ने से. कहते हैं जो दूसरों को मुसीबत में डालकर हँसता है, उस पर उससे सौ गुना मुसीबत आती है रुलाने के लिए. आने वाले चुनाव में इसी मुहावरे के सच होने का इन्तजार बहुतों को है.
वर्च्युल दुनिया में भी होली पर टाईटल आदि देने का प्रचलन है कुछ ग्रुपों में, मगर बड़ा सीमित सा और टाईटिल भी मानों ऐसे कि जिस चेहरे को पहले वार्निश से मल कर स्टैम्प पैड की कालिख लगाई जाती थी, उस पर हल्दी कुमकुम का टीका लगा दिया गया हो. इतने शालीन टाईटल ही देना थे तो होली की क्या जरुरत? टाईटल दे रहे हो कि सम्मानित कर रहे हो? हमारे समय के टाईटल तो अक्सर ऐसे पोल खोलू होते थे कि चार दिन तक आप मोहल्ले भर से चेहरा छुपाते घूमें. वाकई इस वर्च्यूल टाईटल वाले खेल को मैं मान्यता नहीं देता. किसी को चुनाव में जिता कर नेता बनाओ और वो समाज सेवा करने पर उतारु हो जाये, ऐसा भला शोभा देता है क्या?
ओह!! नेता से याद आया कि आपकी, हमारी होली तो चाहे सड़कों पर मनें या आभासी दुनिया में. एक दो दिन में खुमार उतर ही जाता है मगर इनकी खुमारी तो हरदम तारी रहती है. इनका होली खेलने का तरीका आज भी वही कीचड़ उछालने वाला ही है एक दूसरे के ऊपर. पद और पावर के नशे में डूबे ये मदमस्त होलिये तो मानो कभी थकते ही नहीं एक दूसरे पर कीचड़ उछालते उछालते. सब कीचड़ में सने हैं और शौक ऐसा कि पहनेंगे भी सफेद झक कपड़ा कि एक कीचड़ का छोटा सा छींटा भी दिख जाये मगर इनको शरम कहाँ? दिख जाये तो दिख जाये. मगर जो नहीं दिखाना चाहते वे आजकल रंगीन कुर्ता पजामा पहनने लगे हैं और दिन भर में चार बार कपड़े बदलते हैं. ऐसा नहीं कि उन पर कीचड़ के धब्बे नहीं..फरक बस इतना है कि वो दिखने नहीं दे रहे हैं. वरना तो हमाम में ये सभी नंगे हैं.
हम आमजन तो बस उम्मीद ही कर सकते हैं कि एक दिन इनकी होली भी पूरी हो लेगी. हर होली की शाम की तरह वो शाम भी शायद सूनी सूनी सी हो मगर अगला सबेरा जरुर चमचाता हुआ होगा.
-समीर लाल समीर
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार फरवरी २५, २०१८ में प्रकाशित:
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2 टिप्‍पणियां:

Rajiv Taneja ने कहा…

होली के बहाने बहुतों को लपेट दिया...बढ़िया व्यंग्य

Laxmi Gupta ने कहा…

अच्छा शब्दचित्र खींचा है आज की और कल की होली का।