शनिवार, सितंबर 16, 2017

बुलेट ट्रेन और ‘है की नहीं’ पर हां में हां

दैनिक निपटान के लिए पटरी के किनारे बैठे घंसु और बिस्सु नित क्रिया कर्म के साथ नित देश की बनती बिगड़ती स्थितियों पर विमर्श भी कर लिया करते हैं. बैठे हैं तो बातचीत भी की जाये की तर्ज पर. यूँ भी देश में अधिकतर निर्णय इसी तर्ज पर लिए जा रहे हैं.
आज घंसु ज्यादा चिन्तित दिखा. पढ़ाई लिखाई का यह फायदा तो होता ही है कि और कहीं कुछ हासिल हो या न हो, चिन्तन में तो आप अपनी धाक जमा ही सकते हैं. घंसु दसवीं पास था और बिस्सु आठवीं फेल.
चिन्तित होने का कारण नई रेल गाड़ी बताई गई. घंसु ने बिस्सु को बताया कि एक ठो नई रेल गाड़ी आने वाली है २०२२ में जो गोली की स्पीड़ से भागेगी..मने की इत्ता तेज कि अगर तुम यहाँ पटरी के किनारे १० फुट के भीतर बैठ कर निपटान कर रहे होगे..तो साथ ही में खींच कर ले जायेगी..निपटान शुरु करोगे अहमदाबाद में..और धुलोगे मुंबई जाकर टाईप.
बिना पढ़े लिखे होने के अलग फायदे हैं. बिस्सु प्रसन्न हो लिये..भईया, इसी बहाने मुंबई घूम लेंगे!! कटरीना को देख आवेंगे..
घंसु बोले..अबे, बचोगे, तब न देखोगे!! खैर पढ़ा लिखा बंदा कम पढ़े लिखे से गंभीर विमर्श इसीलिए करता है कि कम पढ़ा लिखा उसे सही मान कर हामी भरता चलता है..उसकी हर है कि नहीं में हाँ करता है..यही सोच कर शायद मंत्री भी बनाये जाते होंगे कि हर है कि नहीं में हाँ करेंगे..करेंगे क्या..कर ही रहे हैं..वरना १२ वीं पास को शिक्षा मंत्री बनाने की और क्या वजह बताई जा सकती है?
गंभीर विमर्श के नाम पर एक तरफा चिन्तन जारी रहा और हर है कि नहींको हाँ मिलती रही...उसी विमर्श के कुछ बुलेट पाईंट:
-अगर अहमदाबाद से मुंबई दो घंटे में पहुँचने की इत्ती जल्दी है आपको तो हवाई जहाज से काहे नहीं चले जाते, वो तो और जल्दी सस्ते में छोड़ आयेगा..है कि नहीं?
-जित्ते पैसे में नया ट्रैक और रेलगाड़ी बना रहे हो..उत्ते में तो कित्ते सारे हवाई जहाज आ जायेंगे और आकाश में तो वैसे ही कोई ट्रेफिक जाम नहीं लगता है..कम से कम अब तक..बेहतर हो कि उस पैसे से बिना बुलेट वाली जो ट्रेने नित आत्म हत्या करने पर उतारु हैं, उनको मनाया जाये कि देवी, आपके मार्ग को हम प्रशस्त करेंगे.. आपका ट्रैक सुधारेंगे..आप की राह में रेड कार्पेट हम बिछावेंगे ताकि आप की जान को जोखिम न हो और आप पर सवार हमारे देशवासी निश्चिंत होकर भले ही खरामा खरामा मगर अपने निर्धारित गंतव्य तक पहुँच जायें बजाय इसके कि अंतिम गंतव्य तक बिना समय आये ही...है कि नहीं?
-बुलेट ट्रेन तो खैर २०२२ में आयेगी मगर अनाऊन्समेंट तो कान में आज से सुनाई दे रही है गाँधीनगर स्टेशन से..यात्रीगण कृप्या ध्यान दें -अहमदाबाद से मुंबई की ओर जाने वाली बुलेट ट्रेन अपने निर्धारित समय से अनिश्चितकालीन देर से चल रही है..यात्रियों को हुई असुविधा के लिए हमें खेद है..इसका क्या बंदोबस्त किया गया है? इस पर भी विमर्श होना चाहिये..है कि नहीं?
-क्या इस बुलेट रेल के आने के बाद से रेल्वे में आऊटर खत्म हो जायेंगे? अक्सर रेल पहुँच तो समय पर जाती हैं मगर आऊटर में खड़ी इन्तजार करती नजर आती हैं..मानो सरकारी अनुदान की फाईलें बंट जाने को तैयार साहेब की टेबल पर पड़ी उनकी नजरें ईनायत का इन्तजार कर रही हों..ऐसे में क्या बुलेट ट्रेन आऊटर में खड़े रहने से एक्जेम्पट रहेगी..यह बताया जाना चाहिये..है कि नहीं?
-बताया गया कि बुलेट ट्रेन एक मिनट से ज्यादा लेट न होने, जीरो एक्सीडेंट और पर्यावरण संतुलन का जापान में अपना प्रमाण दे चुकी है..क्या इतने बस से हम भारतीयों को आशवस्त हो जाना चाहिये क्यूँकि जापान में तो बिजली न जाने का प्रमाण बिजली कम्पनियाँ और सरकारी वादे पूरा होने का प्रमाण भी सरकारें दे चुकी हैं...है कि नहीं?
-आज जब इस बुलेट ट्रेन की घोषणा की गई तो साहेब ने कहा कि वो एवं जापान के प्रधान मंत्री सन २०२२ में इस रेल का उदघाटन इसमें एक साथ सफर करके करेंगे..इससे विपक्षियों का ईवीएम में सेटिंग होने के आरोप कुछ सही सा ही लगता है वरना २०१९ के चुनाव परिणाम में यही जीतेंगे..वो अभी से कैसे पता? याद है जब युधिष्टर ने भिक्षुक से कहा था कि कल आकर भिक्षा ले जाना. तब भीम नगाड़ा बजाते हुए सबको बताने निकल पड़े थे कि भ्राता श्री ने काल को जीत लिया है..उन्हें मालूम है कि कल वह जिन्दा रहेंगे!! जिन्दा रहना तो दूर..खुद को चुनाव जितवा देने के लिए पूरी तरह आश्वस्त..शिंजो आबे तक की, जिनके यहाँ चुनाव दिसम्बर २०१८ में होना है, सेटिंग करवा दी न जाने कैसे कि २०२२ में भी वही जापान का प्रधान मंत्री होंगे..है कि नहीं?
-इस बीच सुना है कि शिंजो ने साहेब से नार्थ कोरिया जैसे उधमी पड़ोसी पर समाधान मांगा..साहेब ने बताया कि कड़ी निंदा करो..घबरा जायेगा...हमने अपने पड़ोसी को ऐसे ही काबू में रखा है...हर बार नियम से कड़ी निंदा कर देते हैं...और वो घबरा जाता है..है कि नहीं?
अभी तो २०२२ आने में समय है.. बहुत कुछ देखना सुनना बाकी है, विमर्श जारी रहेगा..तब तक शेर शायरी से मन बहलाया जाये:
बुलेट ट्रेन चलाने की बात, कुछ इस तरह से तूने छोड़ी है..
मेरी ये इक उम्र भी तुझको समझ पाने के लिए थोड़ी है...

-समीर लाल समीर
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के सितम्बर १७,२०१७ में प्रकाशित
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7 टिप्‍पणियां:

संध्या शर्मा ने कहा…

अरे इत्ती ही समझ होती तो जे काय करते, जो गिर पड़ के लोगन की जान ले रईं हैं, उनई को न सुधार लेते। "है कि नही?"
व्यंग्य के माध्यम से सच्चाई बयां कर दी आपने। वो भी खरी खरी...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (18-09-2015) को "देवपूजन के लिए सजने लगी हैं थालियाँ" (चर्चा अंक 2731) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Dr.Bhawna ने कहा…

Bahut khub likha badhai...

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस : अनंत पई और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

विकास नैनवाल ने कहा…

बढ़ा खूब लिखा है। इसे पढ़कर कई जगह मिर्ची लगने का खतरा है, बोलो है कि नहीं ....?
बुलेट ट्रेन से जुड़े कई मुख्य बिन्दुओंख पर आपने बात की है। हम पहले अपनी चलती ट्रेन प्रणाली को ठीक करे, ऐसे वक्त में जब ट्रेन पटरी से ज्यादा पटरी से बाहर चल रही है उसमे ऐसी तेज गति की ट्रेन के विषय में सोचने कितना सही है मुझे पता नहीं। कायदे से तो मौजूदा प्रणाली को ठीक करने पर हमारा ध्यान केन्द्रित होना चाहिए।
खैर, अच्छा व्यंगात्मक लेखा। बधाई।
(http://duibaat.blogspot.com)

Pushpendra Dwivedi ने कहा…

बहुत बढ़िया लेख रोचक तथ्य पर गहन मंथन

ARUN SATHI ने कहा…

साधू साधू , करारा तंज बिग बॉस ....भैया