शनिवार, मई 27, 2017

मानहानि कि अपमान में इजाफा


हम गवां उसी चीज को सकते हैं जो हमारे पास होती है. जैसे अगर रुपया है ही नहीं, तो उसे आप गवां कैसे सकते हैं? बाल अगर हैं ही नहीं सर पर, तो उसकी हानि कैसे होगी.
मात्र मान (इज्जत) ऐसी चीज है जिसकी हानि उसके बिना हुए भी होती रहती है. यह हानि भी संसद की केन्टीन में सस्ते खाने से लेकर हवाई जहाज के बिजनेस क्लास में फ्री चलने की तरह ही सिर्फ नेताओं के लिए आरक्षित है.
जैसे व्यापार में हुये लॉस को निगेटिव प्राफिट भी कहते हैं, वैसे ही मानहानि को आपमान में वॄद्धि भी कह सकते हैं. लेकिन नेताओं को पब्लिक में यह कहना अच्छा नहीं लगता, इस हेतु मानहानि को जुमले के तौर पर इस्तेमाल किये जाने का फैशन है.
जैसे ही कोई विरोधी नेता किसी नेता के अपमान में वृद्धि करता है, नेता तुरंत कोर्ट में मानहानि का दावा ठोंक देता है मय हर्जाने में १० करोड़ के.
अब हैरान कोर्ट होती है और पौ बारह मीडिया की. अव्वल तो यह आँकना कि जो इनके पास था ही नहीं, उसकी हानि कैसे हो गई और शोध का विषय यह कि इस हानि का मूल्य १० करोड़ कैसे आँका गया?
खैर मानहानि तो जाँच के बात पता चली कि इनके अपमान की वॄद्धि को नाम दिया गया था. उसने इन्हें काला चोर कह दिया था. जबकि पूर्व में वे मात्र चोर जाने जाते थे. यहाँ तक तो बात समझ में आई. चोर ही कहते रहते तो न इनके अपमान मे वृद्धि होती और न ही मानहानि का मुकदमा झेलना पड़ता. अब शोध विषय बच रहा कि दस करोड़ की कीमत मात्र चोर से काला चोर प्रमोट हो जाने पर? वो कैसे?
नाम न बताये जाने की शर्त पर उनके खासमखास ने खुलासा किया कि कोई नेता जी पर भूले से भरोसा करने वाला व्यापारी उनके के पास १० करोड़ की निगेटिव सफेद रकम सुरक्षा की दृष्टि से कुछ समय के लिए इनके पास रखवा कर जाने वाला था ताकि आयकर के छापे का मौसम गुजरते ही वापस ले जायेगा. इससे सुरक्षित स्थान और भला क्या हो सकता था. उसने जब सुना कि नेता जी काले चोर हैं तो उसने मन बदल दिया और वो रकम कहीं और ठिकाने लगा दी.
नेता जी पास रख कर जाता तो ऐन केन प्रकारेण उसे नेता जी दबा ही लेते. अतः मानहानि के हर्जाने के रुप में उनको यह दिलाये जाये. बात तो पते की है.
तुलसी दास कह गये हैं:
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ..
बिधि मतलब विधाता और हमारे यह नेता खुद को किसी विधाता से कम तो कभी आँकते नहीं इसलिए जसु अपजसु याने मान अपमान, हानि लाभु मतलब हानि लाभ...सब विधाता का खेल है..
आप आम जन बस तमाशा देखें,ध्यान रहे कि यह खेल आपके लिए नहीं है.

-समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे अखबार में मई २८, २०१७ को प्रकाशित:
http://epaper.subahsavere.news/c/19363813

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1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-05-2017) को
"मानहानि कि अपमान में इजाफा" (चर्चा अंक-2636)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक