रविवार, अक्तूबर 31, 2010

पीपल का पेड़

pipal

 

उम्र के दीप में
कम हुआ तेल
और मैं
अपने ही घर में बना दिया गया
मंदिर की मूरत

उनका स्वार्थ
मेरा खुश रहना
भोग लगाया जाता रहा
मेरा
भक्तों की इच्छानुसार
नियमित
स्नान,ध्यान,वन्दना
और
फूलों का श्रंगार
प्रतिमा
देखती है
बिना पलक झपके
मुस्कुराते हुए
सौम्य शान्त मुद्रा
अवाक
मैं
घर का
पूज्य
पीपल का पेड़....

-समीर लाल ’समीर’


आज आखर कलश पर भी मेरी दो रचनाएँ प्रकाशित हैं और एक गज़ल मेरे मन की पर अर्चना चावजी द्वारा गाई.
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84 टिप्‍पणियां:

हास्यफुहार ने कहा…

उनका स्वार्थ
मेरा खुश रहना
भोग लगाया जाता रहा
बहुत कोमल भाव है। सुंदर।

Bhushan ने कहा…

अवाक
मैं
घर का
पूज्य
पीपल का पेड़....

बहुत सुंदर रचना.

मनोज कुमार ने कहा…

आपकी इस रचना पर जो मुझे कहना है वह रघुवीर सहाय की इन पंक्तियों द्वारा कहूंगा
भक्ति है यह
ईश-गुण-गायन नहीं है
यह व्यथा है
यह नहीं दुख की कथा है
यह हमारा कर्म है, कृति है
यही निष्कृति नहीं है
यह हमारा गर्व है
यह साधना है--साध्य विनती है।

मो सम कौन ? ने कहा…

बहुत सोचने को मजबूर करती हैं आपकी पोस्ट्स -
एक टूर लगाकर आते हैं सरजी, आखर कलश पर भी।

खुशदीप सहगल ने कहा…

सूरज से जलते हुए तन को मिल जाए,
जैसे तरुवर की छाया,
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है,
जब से शरण तेरी आया,
मेरे राम, मेरे राम...

जय हिंद...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना....भावपूर्ण पंक्तियाँ

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH ने कहा…

बाऊ जी,
नमस्ते!
काश हमारे बुज़ुर्गों को भी ये सम्मान मिल पाता!
अभिभूत हुआ!
आशीष
--
पहला ख़ुमार और फिर उतरा बुखार!!!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut hi utkrisht bhaw hain

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

पीपल का पेड़,मात्र पेड़ नहीं प्रतीक हुआ करता था एक सभ्यता का... और आपने इसे एक नया मुकाम दिया है!!

honesty project democracy ने कहा…

वाह-वाह क्या बात है....शानदार अभिव्यक्ति...

Arvind Mishra ने कहा…

यह तो गौरव की बात है -कितने आश्रय खोजियों के आश्रयदाता युवा पीपल का पेड़ !

Sunil Kumar ने कहा…

घर के बड़े लोग इस सम्मान के हक़दार भी है

seema gupta ने कहा…

उम्र के दीप में
कम हुआ तेल
और मैं
अपने ही घर में बना दिया गया
मंदिर की मूरत

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

regards

राजेश उत्‍साही ने कहा…

समीर भाई( न जाने क्‍यों इस अभिव्‍यक्ति पर तो आपको समीर जी से समीर भाई कहने का मन हो आया।) हो सकता है आपने कविता उसी मंतव्‍य से लिखी हो,जो टिप्‍पणीकार समझ रहे हैं। पर मेरा मन और कवि मन कहता है कि यह कविता उम्र के एक खास पड़ाव पर पहुंचने पर महसूस करने वाले भाव की कविता है। जहां यह सम्‍मान सम्‍मान नहीं बल्कि तिरस्‍कार ज्‍यादा होता है। जहां आपको सबकुछ बुर्जुगियत के नाम पर चुपचाप सहते रहना होता है। आपकी कविता में भी -अवाक- शब्‍द इस बात का परिचायक है।
यह मेरा नजरिया है हो सकता है गलत हो। बधाई और शुभकामनाएं।

abhi ने कहा…

कैसे लिख लेते हैं आप इतनी अच्छी और बेहतरीन कवितायेँ? :)

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

यही नियति है पीपल के पेड़ की..

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

wah sameer ji wah....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी यह रचना अलग अलग अर्थ देती है ...जहाँ एक ओर महसूस होता है कि लोगों के मन में सम्मान कि भावना है वहीं यह भी एहसास होता है कि सम्माननीय बना कर एकांतवास की सजा दे दी है ...जब तक पेड़ छाया देगा तब तक पूजनीय और जब वह खुद ठूंठ रह जायेगा तब ? ?

पता नहीं कहाँ तक आपके भावों को समझ पायी ...पर इसमें वेदना झलकी ...

Majaal ने कहा…

पीपल को जाना ही है एक दिन,
यही है नियति,
जिंदगी के अंतिम पड़ाव में,
नसीब तो है सुख,
स्वार्थ से ही सही,
वो कहा नहीं ?

कई पीपल के पेड़,
जिन्हें कोई,
पूछता तक नहीं,
कई बूढ़े है,
वृध्राश्रम में.

दुविधा है,
स्वीकार करने में,
अंतिम सत्य ?
या है कोई शिकायत ?
दिल मेरा,
जाने अब और,
चाहता है क्या ?

आप को अगर,
जान ही लेनी है,
कविताई से,
तो क्यों न,
प्यार से मारे,
आप,
और पा लें सुकू ,
वो जो कहते है,
मिलता है,
मरने के बाद ही ...

इसे कविताई न समझे,
बस एक विचार ,
मात्र ...

लिखते रहिये ....

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

पुरानी जमाने के :-

नदी किनारे गावँ रे
पीपल झूमें मोरे आंगनाँ
ठंडी ठंडी छावं रे

से नये जमाने की सम्वेदनाऑं को दर्शाती आपकी कविता एक पूरे समाज के "सभ्य" हो जाने की कहानी को बेबाक कहती ह। साधुवाद!

राम त्यागी ने कहा…

पीपल का पेड़ छाया दे घनी घनी ....

विष्णु बैरागी ने कहा…

हर घर में है,
एक पेड
पीपल का।

आज,
कह नहीं रहा,
बॉंच रहा,
अपनी दशा,
यहॉं,
आपकी कलम से।

विष्णु बैरागी ने कहा…

हर घर में है,
एक पेड
पीपल का।

आज,
कह नहीं रहा,
बॉंच रहा,
अपनी दशा,
यहॉं,
आपकी कलम से।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जो पेड़ हमें छाया देता है, स्थिर सा खड़ा रहता है जीवन भर। सुन्दर झिझोंड़ती पंक्तियाँ।

mridula pradhan ने कहा…

bahut achcha likhe hain.

mridula pradhan ने कहा…

bahut achcha likhe hain.

क्षितिजा .... ने कहा…

घर के एक बड़े बुज़ुर्ग की तरह ... बहुत सुंदर रचना समीर जी ...

Anand Rathore ने कहा…

jis bageeche ko maali ki tarah sinch kar hara bhara kiya ho..kabhi kabhi uss ghar ki hariyali banaye rakhne ke liye maali ko peepal ka ped ban ka jeena padta hai...lekin ye zaruri bhi nahi... bahut achchi kavita ..meri pasand...

sangeeta ने कहा…

We all derive our own meanings from poetry.... i liked it as it gives a hint of loneliness ..

संजय भास्कर ने कहा…

अहसासों का बहुत अच्छा संयोजन है ॰॰॰॰॰॰ दिल को छूती हैं पंक्तियां ॰॰॰॰ आपकी रचना की तारीफ को शब्दों के धागों में पिरोना मेरे लिये संभव नहीं

Dr.Bhawna ने कहा…

bahut gahari rachana ...bahut-bahut badhai..

kshama ने कहा…

Aap hameshahee ni:shabd kar dete hain!

sada ने कहा…

अवाक
मैं
घर का
पूज्य
पीपल का पेड़....।

भावमय करती पंक्तियां ।

संगीता पुरी ने कहा…

वाह ..

बहुत अच्‍छी प्रस्‍तुति !!

POOJA... ने कहा…

कभी नीम का पेंड देखा था, आज पीपल का पेंड पढ़ा... बहुत ही अच्छा लगा...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 02-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Ishaon isharon men bahut kuchh kah gaye aap. Badhayi.

---------
मन की गति से चलें...
बूझो मेरे भाई, वृक्ष पहेली आई।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Ishaon isharon men bahut kuchh kah gaye aap. Badhayi.

---------
मन की गति से चलें...
बूझो मेरे भाई, वृक्ष पहेली आई।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

मैं
घर का
पूज्य
पीपल का पेड़....
--
इसमें क्या शक है!
आप तो ब्लॉगिंग के पुरोधा हैं!
--
सुन्दर अभिव्यक्ति!

रानीविशाल ने कहा…

उम्र के दीप में
कम हुआ तेल
और मैं
अपने ही घर में बना दिया गया
मंदिर की मूरत

उनका स्वार्थ
मेरा खुश रहना
बहुत गहरी बात कह गए आप इस कविता में आज .....आर पार निकल जाने वाली कविता कही आज आपने !

shaffkat ने कहा…

जनाब समीर लाल साब ....उनका स्वार्थ
मेरा खुश रहना ...रिश्ते कितने अपरिचित और स्वार्थमय होगये है पर सीधी सीधी चोट की है भारी हतोड़े का वार है जो कोई समझे .पूरी कविता कम से कम हर ५० की वय पार को अपनी ही कहानी लगेगी और कोई नोजवान भी सीख ले तो सोने में सुहागा .

RAJESH BISSA ने कहा…

bhut shandar lekhan hai aapka ... mere blog par apka margdarshan mera saubhagya hai ... shubhkamanayen... apka hare bhare ped lagao ka logo maine bhi laga liya hai .... shubhkamanayen

निवेदिता ने कहा…

bahut bariya hai

कुमार पलाश ने कहा…

अवाक
मैं
घर का
पूज्य
पीपल का पेड़....
bahut sundar kavita.. hatprabh kar diya is vimb ne..

Parul ने कहा…

aapki kavita se mujhe kuch panktiyaan yaad aa gayi..aur yaad aa gaya 'neem ka ped' ..
munh ki baat sune har koi
dil ka dard na jane koy
aawajon ke baajaron mein
khamoshi ko na pehchane koy!

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

उम्र के दीप में
कम हुआ तेल
और मैं
अपने ही घर में बना दिया गया
मंदिर की मूरत

बहुत सुंदर रचना...

mahendra verma ने कहा…

पीपल का पेड़ हो जाना भी गर्व की बात है।...भावमयी रचना।

Dorothy ने कहा…

बेहद सुंदर और संवेदनशील अभिव्यक्ति. आभार.
सादर
डोरोथी.

cmpershad ने कहा…

तू शीतल छाय़ा
तू घर की माया
तू ही छल बल
तू ही पीपल :)

Tarkeshwar Giri ने कहा…

मैं
घर का
पूज्य
पीपल का पेड़....


Sunder hi nahi Ati Sundar

shikha varshney ने कहा…

अवाक
मैं
घर का
पूज्य
पीपल का पेड़.
वाह बहुत भावपूर्ण.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बिल्कुल नवीन कल्पना, बेहद सुंदर और खूबसूरत पीडा उकेरती रचना.

रामराम.

रंजना ने कहा…

ओह....

यह प्रखर पैनापन ...

आप जैसे सिद्ध के हाथों ही संभव है...

P.N. Subramanian ने कहा…

सुन्दर. बहुत ही सुन्दर.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर

M VERMA ने कहा…

अपने ही घर में बना दिया गया
मंदिर की मूरत उनका स्वार्थ
मेरा खुश रहना
बहुत सुन्दर

rashmi ravija ने कहा…

उम्र के दीप में
कम हुआ तेल
और मैं
अपने ही घर में बना दिया गया
मंदिर की मूरत
मन की बेबसी..और दर्द को अर्थपूर्ण शब्दों में बांधा है...

kavita malaiya ने कहा…

कल ही किसी से में कह रही थी की उम्र के इस पड़ाव पर एक अजीब सी उदासीनता अपने प्रति महसूस करती हूँ , और लगता है की इसे स्वीकार करने की आदत डाल लेना चाहिए....बिना पलक झपके
मुस्कुराते हुए
सौम्य शान्त मुद्रा
अवाक
मैं .....

एस.एम.मासूम ने कहा…

मैं
घर का
पूज्य
पीपल का पेड़...
समीर जी इन शब्दों मैं शायद एक इंसान की पूरी ज़िंदगी समाई हुई है.

सुमन'मीत' ने कहा…

बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति .........

उस्ताद जी ने कहा…

6.5/10

उम्र के एक ख़ास पड़ाव पर ऐसे ही मनोभाव से हर एक को रूबरू होना पड़ता है. छोटी सी रचना गहरी अभिव्यक्ति समेटे हुए है.

ललित शर्मा ने कहा…

बूढा पीपल घाट का बति्याए दिन रात
जो गुजरे पास से सिर पे धर दे हाथ।

राज भाटिय़ा ने कहा…

अति सुंदर रचना, धन्यवाद

उपेन्द्र ने कहा…

peepal ke ped ki mahatta vaha bhi haijankar bahoot achchha laga.....

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

वाह समीर जी
क्या बात है
_________________________________
एक नज़र : ताज़ा-पोस्ट पर
पंकज जी को सुरीली शुभ कामनाएं : अर्चना जी के सहयोग से
पा.ना. सुब्रमणियन के मल्हार पर प्रकृति प्रेम की झलक
______________________________

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

अनायास ही रहीम का एक दोहा याद आ गया -
'रहिमन निज मन की विथा मन ही राखो गोय ,
सुनि अठिलैहें लोग सब बाँटि न लैहे कोय .'
-
* दीपावली मंगलमय हो !

ALOK KHARE ने कहा…

sundar abhivyakti he

badhai kabule

वन्दना ने कहा…

बहुत गहरी बात कह दी………………निशब्द कर दिया।

सुशीला पुरी ने कहा…

आपकी सवेदना मे शामिल.........

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अवाक
मैं
घर का
पूज्य
पीपल का पेड़..

उम्र के साथ साथ इंसान क़ि नियति ऐसी ही होती जाती है ... कोने में पड़े मेज़ क़ि तरह या मूक खड़े पीपल क़ि तरह .... बहुत संवेदनशील ....

नीरज गोस्वामी ने कहा…

छोटे छोटे शब्द गहरी गहरी बातें...तभी आप ब्लॉग जगत के अनूठे रचनाकार हैं...बधाई.

नीरज

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

जैसे उम्र के दीपक में तेल कम होने का भाव इस पीपल में दर्शाया है वैसे ही अगर मानव के जीवन रूपी दीप में तेल कम होने के साथ ही उनके सम्मान और उनके प्रति भावों में भी ऐसी ही श्रद्धा का प्रादुर्भाव हो तो शायद ये जीवन कभी दुखी न देखे किसी को और न करे किसी को

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बेहतरीन रचना !
पेड़ के वजाय यदि हम अपने बड़े बूढों को सम्मान दें तो कितना अच्छा हो ...

रवि धवन ने कहा…

उम्र के दीप में
कम हुआ तेल
और मैं
अपने ही घर में बना दिया गया
मंदिर की मूरत
बढिय़ा पोस्ट। बार-बार पढऩे को जी चाह रहा है।

डॉ. नूतन - नीति ने कहा…

bahut hee bhavuk umdaa rachnaaa hai..badi baareeki se likha gay bhaav..peepal ke ped se samaanta ..vaah...

Anjana (Gudia) ने कहा…

उम्र के दीप में
कम हुआ तेल
और मैं
अपने ही घर में बना दिया गया
मंदिर की मूरत

kitni sachchi rachna... sachmuch bahut sunder!

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

उनका स्वार्थ
मेरा खुश रहना
भोग लगाया जाता रहा

बहुत सोचने को मजबूर करती हैं आपकी पोस्ट्स -

Puneet Sahalot ने कहा…

bahut hi gehre bhaav hai...
"उनका स्वार्थ
मेरा खुश रहना
भोग लगाया जाता रहा"
"अवाक
मैं
घर का
पूज्य
पीपल का पेड़...."

विजय तिवारी " किसलय " ने कहा…

बड़े-बूढों की अधिकतर यही स्थति होती है. अवाक और बच्चों को देख ही प्रसन्न होना या प्रसन्न होने का अभिनय करना.

- विजय

'उदय' ने कहा…

... shubh diwaali !!!

Vijai Mathur ने कहा…

आप सब को सपरिवार दीपावली मंगलमय एवं शुभ हो!
हम आप सब के मानसिक -शारीरिक स्वास्थ्य की खुशहाली की कामना करते हैं.

nilesh mathur ने कहा…

बहुत सुन्दर!
आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामना!

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

पीपल का प्रत्‍येक पल ऑक्‍सीजन की हलचल है।

गगनांचल में देखिए बलॉग की दुनिया का नक्‍शा : नक्‍शे में आपके नैननक्‍श

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

.... ये धमाका तो जोरदार रहा .... सटीक अभिव्यक्ति....आभार ....