बुधवार, जनवरी 13, 2010

दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे..

कल तक जो मेरे अपने थे, साथ साथ थे, कब किनारा कर बैठे, पता ही नहीं लगा. नये नये साथी जुड़ते गये और भीड़ में खोया मैं उन पुराने साथियों के लिए बस एक भ्रम पाले जीता रहा कि वो अब भी मेरे अपने हैं, मेरे साथ में हैं..

क्यूँ मैं भीड़ में रुक कर नहीं देखता कि जिनके साथ मैने सफर शुरु किया था, जो मेरे साथ मेरी जिन्दगी के कारवां से जुड़े थे, वो कहाँ हैं, किस हाल में हैं, क्या सोचते हैं. मेरे लिए, मेरे साथ भीड़ कितनी है जितना ही महत्वपूर्ण भीड़ किनकी है, जानना भी होना चाहिये.

मैं साथ निभाता रहा मगर जाने क्यूँ, बात जब एक तरफा हो जाती है, तो कुछ समय में समझ आ ही जाती है. एक तरफा झुकाव झुका हुआ दिखने ही लगता है स्वतः.. कब तक कोई नजर अंदाज कर सकता है आखिर इस यथार्थ को.

वैसे तो कौन जाने कि जिसे मैं कहता हूँ कि मैं साथ निभाता रहा, वो मात्र मेरा भ्रम हो और मैं मात्र इतना करता रहा कि मैं उन्हें सप्रयास नजर अंदाज नहीं कर रहा था मगर उनकी अनुपस्थिति संज्ञान में न लेना भी तो गलत ही है.

मैं रुकता हूँ. भीड़ के बीच अकेला महसूस करने लगता हूँ. समझने की कोशिश करता हूँ. कहीं मेरा ही कोई कदम गलत हुआ होगा. कहीं मुझसे ही कोई भूल हुई होगी. वो कुछ भूल करता तो मुझे दिखता. मुझे तो कुछ दिखा ही नहीं. मैं तो पूर्ववत साथ निभाता रहा. मैं तो पूर्ववत उसे साथ समझता रहा.

बात साफ है, उसका तो कोई दोष न होगा. दोष तो दिख ही जाते हैं. न भी दिखें तो महसूस हो जाते हैं. लाख दुर्गुणों के बावजूद दोष में यही सदगुण है कि वो अपने होने का अहसास किसी न किसी तरह करा ही देते हैं.

मैं यह तो जानता हूँ कि कहीं न कहीं, किसी न किसी जगह मेरे ही कदम गलत रहे होंगे. कहीं न कहीं मेरी ही कुछ बातें नाकाबिले बर्दाश्त गुजरी होंगी. पर नहीं जानता कौन सी. जानता होता तो ऐसा करता ही क्यूँ? शायद कर भी गुजरता किसी उन्माद में, तो उसे सुधारता और अपने किये की क्षमा मांगता, प्रयाश्चित करता.

वो मेरा अपना था जो आज किनारे हो दूर बैठा है. वो रुठा है. वो मुझसे नाराज है. मैं भी उसके लगातार बहुत बार मुझे अनदेखा कर देने के बाद यह बात जान पाया. मैं अनदेखा नहीं कर रहा था उसे और न ही उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे, इसलिए जानने में भी वक्त लगा.

इतने समय का साथ था. उम्मीद बस यह थी कि जैसे अच्छे कार्यों में सराहना करता था खुले दिल से, वैसे ही गलत कदम पर भी टोकेगा, बतायेगा, साथ निभायेगा. मेरे तर्क सुनेगा. मुझे समझाने की कोशिश के साथ खुद भी मुझे समझने की कोशिश करेगा.

मैने यदि कोई कदम उठाया है तो मेरी नजरों में सही ही होगा, तभी तो उठाया है. उसे गलत लगा तो बताना उसका फर्ज था. फिर मैं अपने तर्क रखता. मानना और मानना उसका अधिकार क्षेत्र था. साथ बनाये रखना तो कतई बाध्यता न था किन्तु इस तरह बिना बताये दूरी बना लेना भी तो उचित नहीं.

ss

नाराज हो मुझसे?

लड़ो

मुझे कोसो

डाँटो

झगड़ो मुझसे

मगर

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!

तुम तो मेरे अपने थे..

इतना उपकार करो मुझ पर!!!

-समीर लाल ’समीर’

(नोट-इस आलेख को पढ़कर कहीं भी आपको यह अहसास तो नहीं हुआ कि इस आलेख में मैं ब्लॉगजगत से संबंधित मित्रों की बात कर रहा हूँ? यदि नहीं, तो लेखन सफल रहा. मेरा पूरा श्रम इसी मुद्दे पर था कि सीधे सीधे कुछ न कहूँ.. :) वैसे तो किस्सा वही है-कभी उस जगत में..कभी ब्लॉगजगत में. क्या अंतर है?)

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153 टिप्‍पणियां:

बवाल ने कहा…

देखो रुला दिया ना।
आ जाओ महाराज वापस तुसी। वड्डी याद आंदी है आज त्वाडी। आँसुओं के मारे अब तो टाइप ही नहीं करते बन रहा। ऐसे ही समझ जाओ ना।

हास्यफुहार ने कहा…

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!
किस जगत की बात कर रहे हैं पता नहीं। पर इस जगत की ज़रूर। आपनों .. की
अपनों सी
अपनी ... बात।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

लड़ो
मुझे कोसो
डाँटो
झगड़ो मुझसे
मगर यूँ चुप रहकर...
मुझे मौत से बदत्तर जिन्दगी न दो!!

"बहुत ही मार्मिक!"

मनके सभी पिरोये, टूठे सुजन मिलाये.
वीरान वाटिका में, रूठे सुमन खिलाये,
माला के तार में हम, उपहार पो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।

यादें कभी रुलाती, यादें कभी हँसाती,
रह-रह के याद उनकी, हमको बहुत सताती,
हम आज भी पुराना,वो प्यार ढो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।

Arvind Mishra ने कहा…

अरे आज ई का होई गवा ? और करिए अपनों से दिल्लगी ? हा हा हा

Sadhana Vaid ने कहा…

आत्म मंथन करती हृदयस्पर्शी रचना । मेरी बधाई और अभिनन्दन स्वीकार करें ।

खुशदीप सहगल ने कहा…

कोई होता अपना,
जिसको अपना कह लेते यारों,
पास नहीं तो दूर ही होता,
कोई मेरा अपना...

वैसे गुरुदेव एक बार दिल की जानिब निगाह कर देखिए, हम जैसे अपने कम नहीं दिखाई देंगे...

जय हिंद...

मनोज कुमार ने कहा…

आलेख और कविता .. बहुत मार्मिक।
इस कविता में बहुत बेहतर, बहुत गहरे स्तर पर एक बहुत ही छुपी हुई करुणा और गम्भीरता है।

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

अपने ही तो दूर होते है तो दिल दुख्ता है . सच लिखा है आपने . मेरे पिता जी जब नाराज़ होते है तो कुछ नही कहते है उन्का चुप रहना सबसे बडी सज़ा लगती है मुझे . अगर डाट डपट दे तो बुरा नही लगता है

संगीता पुरी ने कहा…

अपनों के मध्‍य चुप्‍पी बहुत घातक होती है .. लडना झगडना बेहतर होता है .. इस बहाने सबकी कमी बेशियां बाहर तो आती है .. सुधारने की जगह भी बनती हैं .. पर मैं खुद चुप रह जाती हूं .. अच्‍छा आलेख लिखा आपने!!

Murari Pareek ने कहा…

बात किसी भी जगत हो लेकिन मुझे तो ऐसा लगा की जो आपसे रूठा है आप उसे मिस भी करते हैं और वजह भी जानना चाहते की आखिर क्यों रूठा और गलती भी खोज रहे हैं आखिर किसकी थी! ना तो उसने कुछ बताया ना आपको महसूस हुआ !! मन के अंतर्द्वंद का स्पष्ट पता चलता है !!! बढ़िया !!

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!! ..
इस शब्द जाल का निहितार्थ भी उतना ही गूढ़ है , बढ़िया पोस्ट.

indu puri ने कहा…

साथ चलते हैं अपने,
या गैर भी
चलते चलते अपने -से हो जाते हैं
भीड़ में इतना ख़याल तो रखना पड़ता है कि वो साथ हैं या...
कहीं पीछे छूट गये हैं ,काश इतना सा समय दिया होता कि एक बार पीछे मुड कर देख लेते
उसी समय रुक कर पूछ लेते -''पीछे क्यों रह गये भाई मैं ही तेज चल रहा हूँ या तुमने चाल धीमी कर दी ? क्यों?
पर....इतना सोचना ,मन में मलाल होना आपकी सम्वेदनशीलता को बताता है .
एक अच्छा इंसान ही इतना सोचता है कि भीड़ में मेरा अपना कैसे छूट गया? कहाँ किससे कोई चूक हुई?
मुझी से तो नही ?
मेरा हाथ थाम कर चल
भीड़ में कहीं खो ना जाएँ हम
जिंदगी भर ढूंढे और फिर ना मिले
देख ऐसे कहीं खो ना जाये हम
आपकी इसी सम्वेदनशीलता ,खूबसूरत मन ,सोच के कारण आपको दिल से सम्मान देती हूँ मैं.
कविता लिखना शब्दों से खेलना तो यहाँ कई लोग जानते हैं .
पर यही बात है जो आपको दूसरों से अलग़ करती है
एक सभ्य,शिष्ट ,अच्छे इन्सान हैं आप ,आपकी ये रचना इस का परिचायक है .

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

काल का पहिया घूमे भैया...
मकर संक्रांति की शुभकामनाएं!

ali ने कहा…

अहसास तो हुआ है जी !

मानसी ने कहा…

कितनी बार तो आपको बताया था, आपकी सारी गलतियाँ, एक दोस्त का फ़र्ज़ समझ कर...सोचा कि आप माफ़ी मांग लेंगे, पर नहीं....तो हम भी क्या करते...दूसरे दोस्त बना लिये...:-)

स्वप्नदर्शी ने कहा…

होता है कभी कभी... किसी किसी उन्माद में,
कभी किसी को थोड़ा पर्सनल स्पेस भी चाहिए होता है
अधिक प्रेम में भी तो दम घुटता है.
होगा कुछ सार दोस्ती में तो पलटकर वापसी होगी.
नहीं रहा होगा, तो सब्र करें की टाईम खोटा होने से बच गया

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

लिखा तो साफ़ साफ़ है. कोई समझने या ना समझने की बात ही नही है. आपने दिल चीरकर रख दिया है. बिल्कुल हनुमान जी तरह.

पर ऐसी स्थितियां दो ही कारणों से पैदा होती हैं. स्वार्थ और दूसरे अहम.

अब ये दो स्वयम ही तय करना पडता है कि मामला कैसे निपटेगा? निपटाना है भी या नही?

पत हमारी समझ से सब कुछ स्कूल के मामलों जैसा होना चाहिये, जब हम लड झगड कर दो घंटे बाद ही वापस ऐसे हो जाते थे जैसे कुछ हुआ ही ना हो.

पर यहां शायद उम्र के साथ साथ अब अहम पैदा होगया है.

ज्यादा क्या लिखूं? हम तो ऐसे मामले अपने लट्ठ को सौंप निष्फ़िक्र हो जाते हैं.:)

रामराम.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

निंदक नियरे राखिए।
मित्र तो वही होता है जो गलती पर आप को अहसास कराता है। नहीं कराता है तो फिर वह मित्र नहीं ही है।
बहुत सुंदर बात कही है। कविता भी बहुत गंभीर है, भावनात्मक भी।

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

विगत कई पोस्टों से देख रहा हूँ, उड़नतश्तरी थोड़ी 'विचार-मुद्रा'मे है..!

नया साल तो अभी शुरू ही हुआ है..इसे स्वाभाविक मानूँ 'अपने रिश्तों' की पड़ताल करने लग जाना...!

सभी मानते हैं...श्री समीरलाल जी बेहद ही धैर्यवान व्यक्ति हैं....वो ठीक है...!

पर मै आपकी इस रचना के बाद कह सकता हूँ, चीजें दिल पे लगती तो है ही, भले ही कोई बोले ना....!!!

कविता सुंदर....!

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

ok, thanks

Vivek Rastogi ने कहा…

संवाद कायम रहना चाहिये चुप रहना वाकई घातक है। और यह ब्लॉग जगत कोई अलग है क्या इस वास्तविक जगत से नहीं।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

समीर लाल जी
हल्की फुल्की शुरूआत और इतना गंभीर चिन्तन..!!
सचमुच खामोशी नहीं, संवाद तो जारी रखना चाहिये
वो कहा है न-
रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिये आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिये आ
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

उन्मुक्त ने कहा…

अरे, इस बात को मेरे जैसे लोग लिखें, जिन्हें टिप्पणी नहीं मिलती तो कुछ ठीक लगता है। लेकिन समीर जी जैसे लोग, जिन्हें टिप्पणी ही टिप्पणी मिलती हैं, वह लिखें - तो फिर कुछ अजीब लगता है।

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

"लाख दुर्गुणों के बावजूद दोष में यही सदगुण है कि वो अपने होने का अहसास किसी न किसी तरह करा ही देते हैं."
बड़ी ही दार्शनिक बात कह दी समीर जी अपने ! एक और उम्दा लेख कह लो अथवा कहानी !

नारदमुनि ने कहा…

moun bhee ek bhasa hai.aapka kahna apni jagah sahi hai.narayan narayan

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

भीड़ में भी इंसान अकेला ही होता है

अजय कुमार ने कहा…

एक शेर याद आ रहा है, किसका है नही मालुम- ’तुम ने चुप रहके सितम और भी ढ़ाया मुझ पर
तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पे हंसनेवाले ’

तनु श्री ने कहा…

चिंतनीय , सुखद ,हृदयस्पर्शी.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

बहुत सुन्दर - आत्ममन्थन भी चलना चाहिये और संवाद भी। आपकी यह पोस्ट दोनो की जरूरत रेखांकित करती है।
बाकी, जिसे सम्बोधित कर रहे हैं - वह उत्तर देगा, यह आशा है।

Anil Pusadkar ने कहा…

समीर भाई आपने तो सोचने पर मज़बूर कर दिया।मेरी आदत है जिससे नही बनी उससे बात करना तो दूर उसकी सूरत तक़ नही देखता और इसलिये जैसे ही मैं किसी से नाराज़ होता था/हूं सब तरफ़ से कोशिश शूरू हो जाती है कि मामला सुधर जाये,मुझे आज लग रहा है कि ऐसा सब क्यों करते हैं।

आपको संक्रांति की बहुत बहुत बधाई।तिळ-गुळ घ्या आणी गोड़ गोड़ बोला।(तिल-गुड़ खाईये और मीठा-मीठा बोलिये)

अजित वडनेरकर ने कहा…

यही सच है
मुझसे ही कोई भूल हुई होगी..

रंजन ने कहा…

नाराज हो मुझसे?
लड़ो
मुझे कोसो
डाँटो
झगड़ो मुझसे
मगर
यूँ चुप रहकर...
मुझे
मौत से बदत्तर
जिन्दगी न दो!!
तुम तो मेरे अपने थे..
इतना उपकार करो मुझ पर!!!


बहुत खूब समीर भाई..

नीरज गोस्वामी ने कहा…

किन्तु इस तरह बिना बताये दूरी बना लेना भी तो उचित नहीं

बहुत सही कहा आपने और ये जुमला हर रिश्ते पर लागू होता है...संवाद हर स्तिथि में बने रहना चाहिए...प्यार में भी और झगडे में भी...
आपकी पोस्ट आज कुछ सीरियस टाईप की है...सच्चाई के बहुत करीब...इसलिए क्या कहूँ सोच कर चुप हूँ...
नीरज

Razi Shahab ने कहा…

waaw.. it's realy interesting to read.... so nice post...what a brilliant writing style....thanx for dis post

Mrs.Bhawna K Pandey ने कहा…

bataoon kyun....kyunki aksar main bhi aisa hi karti hoon ....agar koi apna manta hai to aapki bhavnaon ko bina aapki or dekhe hi mahsoos kar sakta hai usi tarah uski narajgi aor tok bhi aap bin shabdon ke sun sakte ho .........vaise apna apna najariya hai apnepan ko paribhashit karne ka ....aapne bahut saral shabdon me bahut badhiya likh diya hai vaise aapko kya kahna aap to likhte hi behtareen hain .:)

अजेय ने कहा…

kuchh antaraalo se se bhee samvaad ho jaataa hai sameer bhai, koshish kijiye... aap ko niraasha n hogi.

संजय बेंगाणी ने कहा…

बात किसी जगत की हो, समझने वाले समझ ही लेंगे.
मौत से बदत्तर
जिन्दगी न दो!!

भई हमने तो टिप्पणी कर दी है, दोष मुक्त हुए. बाकि अपना जाने :)

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!
क्या बात है!! पूरा आलेख भी गमगीन करने वाला.

मथुरा कलौनी ने कहा…

अपने तो अपने ही रहते हैं चाहे संवाद हो या न हो।
कभी कभी रूठा-रूठी में अपनों को दूर होने का दुख बहुत सालता है।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत संवेदनशील लिखा है समीर भाई ......... लगता है दर्द का कोई टांका उघड़ गया ......... पर अपनो से ही मनुवार, गुहार, वार्तालाप किया जा सकता है ....... सार्थक और गंभीर बात ........ मकर संक्रांति की बधाई .........

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बहुत सही कहा है

shashibhushantamare-jyotishbole ने कहा…

प्रिय समीर जी ,
जीतनी जहमत आपके लेखो को समझने के लिए की जानी होती है उतनी तो रचना के प्रसव के वक्त शायद आपको भी नहीं होती होगी, रचनाओ की आत्मा [ भावार्थ ] समझ आने के बाद बिलकुल वो ही आनंद प्राप्त होता है जैसे कुशल प्रसव के बाद दात्री को होती होगी / जिंदगानी का फिलसफा ही यही है नए जुड़ते है और पुराने प्रस्थान करते जाते है /
शायद यही विचार डा. हरी वंशराय बच्चन के मन में रहा होगा अपनी प्रसिद्द कविता लिखते हुए की -'' बीत गयी सो बात गयी, माना बेहद प्यारा था ''
थैंक्स /

shashibhushantamare-jyotishbole ने कहा…

प्रिय समीर जी ,
जीतनी जहमत आपके लेखो को समझने के लिए की जानी होती है उतनी तो रचना के प्रसव के वक्त शायद आपको भी नहीं होती होगी, रचनाओ की आत्मा [ भावार्थ ] समझ आने के बाद बिलकुल वो ही आनंद प्राप्त होता है जैसे कुशल प्रसव के बाद दात्री को होती होगी / जिंदगानी का फिलसफा ही यही है नए जुड़ते है और पुराने प्रस्थान करते जाते है /
शायद यही विचार डा. हरी वंशराय बच्चन के मन में रहा होगा अपनी प्रसिद्द कविता लिखते हुए की -'' बीत गयी सो बात गयी, माना बेहद प्यारा था ''
थैंक्स /

संजय भास्कर ने कहा…

कविता सुंदर....!

संजय भास्कर ने कहा…

वैसे गुरुदेव एक बार दिल की जानिब निगाह कर देखिए, हम जैसे अपने कम नहीं दिखाई देंगे...

कौशलेंद्र मिश्र ने कहा…

कहा माया मोह में फसे है, देखिये पूरी कायनात आपकी तरफ नजरे बिछाए खड़ी है.

sangeeta swarup ने कहा…

बहुत खूबसूरती से मन के भावों को बांधा है.....भीड़ में ही अक्सर अकेलापन लगता है...और अपनों का चुप भी खलता है

panchayatnama ने कहा…

मेरे को ये तो नहीं पता की आपको इस तरह के विचार कैसे आते हैं, क्योंकि अगर कोई भी आपको ब्लाग जगत के माध्यम से जिस तरह से जानता है, वो कह ही नहीं सकता की आप इस तरह का अकेलापन भी महसूस करते होंगे. बिना महसूस किये इस तरह सशक्त लेख लिखाण संभव नहीं है. या तो आपके दूसरों के दर्द को महसूस करने की कला को दाद देनी होगी.

अकेलापन कही से भी अच्छा नहीं होता है.. मैं तो कहता हूँ की आपके पास हमेशा अच्छे दोस्त होने चाहिए ऐसे वक़्त के लिए.. और किसी को इस तरह से रूठना नहीं चाहिए.. एक गाना याद आता है, शायद 'आनंद' सिनेमा का है.. जिसमे गाने के बोल कुछ इस प्रकार हैं...
दौलत और जवानी , एक दिन खो जाती हैं , सच कहता हूँ , साड़ी दुनिया , दुश्मन हो जाती है ,
उम्र भर दोस्त लेकिन साथ चलते हैं - दिए जलते हैं , फूल खिलते हैं , बड़ी मुश्किल से , मगर , दुनिया में दोस्त मिलते हैं

दोस्तों और दोस्ती के कुछ उसूल होते हैं. जैसे दिल की बात को किसी ना किसी तरह से बता देना चाहिए. दोस्त अगर तुमने चुन के बनाये हैं, तो वो तुम्हारा भला ही सोचेंगे - फिर चाहे परिस्थितियाँ जैसी भी हों. बस तुमको भरोसा करना आना चाहिए. अजी दोस्त पे नहीं, अपने ऊपर - क्योंकि दोस्त तो आपने ही बनाये हैं ना.

shikha varshney ने कहा…

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति है ...वैसे ऐसा ब्लॉग जगत में तो क्या हर जगत में होता है ....दुनिया है ..दुनिया अब क्या करें

deep ने कहा…

बहुत खूब लिखा आपने. वाकई, खामोशी से बड़ी कोई सज़ा नहीं.

रंजना ने कहा…

Kahte hain,peeda ko shabdon me lapet kar kagal par faila do to man kuchh halka jaroor ho jata hai...

Sahi kiya aapne....

राज भाटिय़ा ने कहा…

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!! ..
लेकिन कभी कभी गुस्ताखियां इस कदर बढ जाती है कि....
वेसे भी जिन्दगी तो एक सफ़र है कितने लोग मिलते है, कितने बिछडते है... कुछ दो कदम चलते है तो कुछ सॊ कदम, पुरा साथ कोन निभाता है यहां...

rashmi ravija ने कहा…

समीर जी,ऐसे हालातों से सबको, कभी ना कभी दो चार होना पड़ता है....और मन तो दुखता है...और मुह फेर लेने के कई कारण हो सकते हैं...कई बार हमारी कोई गलती नहीं होती..पर पुराने मित्र पजेसिव हो जाते हैं...नए से दोस्ती बर्दाश्त नहीं कर पाते और दूर हो जाते हैं...पर ज़िन्दगी चलती रहती है...लोग जुड़ते रहते हैं..ये उदासी वाला मूड त्याग दें

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

उफ, क्‍या सभी के एक जैसे विचार होते हैं? बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने। कुछ लोग मौन रहकर ही सजा दे देते हैं। काश हम उनका मौन तोड़ पाते।

ललित शर्मा ने कहा…

लाख दुर्गुणों के बावजूद दोष में यही सदगुण है कि वो अपने होने का अहसास किसी न किसी तरह करा ही देते,

ध्रुव सत्य।

डॉ. राजेश नीरव ने कहा…

दिल में दर्द हो तो दवा कीजे, दिल ही दर्द हो तो क्या कीजे

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

लाख दुर्गुणों के बावजूद दोष में यही सदगुण है कि वो अपने होने का अहसास किसी न किसी तरह करा ही देते हैं.
पूरे लेख का सार है. फोटो में अच्छी कारीगरी दिखाई है.

Devendra ने कहा…

अच्छी लगी कविता. उससे भी अच्छी लगी कविता की प्रस्तुति का अंदाज.

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

लड़ो
मुझे कोसो
डाँटो
झगड़ो मुझसे
मगर यूँ चुप रहकर...
मुझे मौत से बदत्तर जिन्दगी न दो!!

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति .....मकर संक्रांति की शुभकामनाये

हृदय पुष्प ने कहा…

यूँ चुप रहकर...
मुझे
मौत से बदत्तर
जिन्दगी न दो!!
"देखत में छोटे लगें घाव करें गंभीर" या कहूँ "गागर में सागर" कम शब्दों में बहुत बड़ी बात. पहली बार आया हूँ और केवल कविता पढ़ी - बहुत अच्छा और सार्थक.

Neeraj Singh ने कहा…

कुछ चुनिन्दा कमेन्ट जो मेरे मन को छू गए - मैं उन्हें एकत्र कर के पुनः पेश कर रहा हूँ. - आप सभी का आभार


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तुम ने चुप रहके सितम और भी ढ़ाया मुझ पर

तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पे हंसनेवाले

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रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिये आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिये आ

-शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
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निंदक नियरे राखिए।

मित्र तो वही होता है जो गलती पर आप को अहसास कराता है। नहीं कराता है

तो फिर वह मित्र नहीं ही है।
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मनके सभी पिरोये, टूठे सुजन मिलाये.

वीरान वाटिका में, रूठे सुमन खिलाये,

माला के तार में हम, उपहार पो रहे हैं।

हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।


यादें कभी रुलाती, यादें कभी हँसाती,

रह-रह के याद उनकी, हमको बहुत सताती,

हम आज भी पुराना,वो प्यार ढो रहे हैं।

हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।


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साथ चलते हैं अपने, या गैर भी चलते चलते अपने -से हो जाते हैं

भीड़ में इतना ख़याल तो रखना पड़ता है कि वो साथ हैं या...कहीं पीछे छूट

गये हैं ,काश इतना सा समय दिया होता कि एक बार पीछे मुड कर देख लेते

उसी समय रुक कर पूछ लेते -''पीछे क्यों रह गये भाई मैं ही तेज चल रहा हूँ

या तुमने चाल धीमी कर दी ? क्यों?

'अदा' ने कहा…

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति है ...

HARI SHARMA ने कहा…

वाप रे इतना गम्भीर लेख
आगे से ठीक से आलती पालती मारके बैठ्ना पडेगा और ध्यान से पढना पडेगा.

ई-गुरु राजीव ने कहा…

अरे नाराज़ नहीं हैं भाई, सो रहे थे......
आप भी न बस .... बात का बतंगड़ बना देते हैं.
लो आ गए न !!

हाँ ठीक है, कुम्भकर्ण 6 महीने सोता था और हम कुम्भ पर जागे हैं.
:)

Babli ने कहा…

मकर संक्रांति की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ!
बहुत ही मार्मिक रचना !

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

यादें बस याद आती हैं
बातें सब भूल जाती हैं
यादें

सतीश पंचम ने कहा…

आप इस तरह से ढके छुपे तौर पर बता रहे हैं कि समझ ही नहीं आ रहा किसे कह रहे हैं और किसलिये।
आजकल के सिरियलों में देखता हूँ कि घर में ही जब कोई कैरेक्टर नाराज होता है तो कहता है - दादी सा, उनसे कहो कि मुझसे न बोला करें।
और दूसरी ओर बंदा कहता है - दादी सा, उनसे कहो कि मैं भी उत्सुक नहीं हूँ....

इस बीच बेचारी दादी तो चुप रहती है लेकिन दोनों एक दूसरे से न बोलने के नाम पर इनसे कहो, उनसे कहो की रट लगाये रहते हैं।

आप की इस पोस्ट में भी मुझे वही लुक दिख रहा है (मैं गलत भी हो सकता हूँ)

बाकी तो भावों को अच्छे से व्यक्त किया गया है। हम सभी इस दौर से कभी न कभी गुजर चुके होते हैं और शायद अभी और गुजरें....यह जीवन ही इस तरह के उतार चढाव और मिलन बिछडाव का मिक्श्चर है।

ज्ञान ने कहा…

क्या कोई ज्ञानी बता सकता है कि चिट्ठाचर्चा पर की इस टिप्पणी में ऐसा क्या था जो इसे रोक रखा गया है?
http://murakhkagyan.blogspot.com/2010/01/blog-post.html

अर्कजेश ने कहा…

हॉं यह स्थ‍िति काफी बेचैन करने वाली होती है, जब कोई अपना बिना हमारा गुनाह बताए किनारा कर लेता है । इस काबिल भी नहीं समझता कि गिले शिकवे करे ।
कविता में इस बात को आपने बखूबी व्‍यक्‍त किया है ।

उम्‍मीद करते हैं कि आपका अपना जल्‍द ही आपसे दिल की बात कहेगा ।

अजय कुमार झा ने कहा…

देखिए ,बार बार कह रहे हैं कि एतना सेंटी कीजीयगा न तो नहीं टीपेंगे हां पढ के चले जाएंगे ,चुपचाप । आप यदि अकेले हैं तन्हा हैं , तो हम लोग तो.......???।अरे वेलेन्टाईन डे आ रहा है , तनिक बचवा सब का ख्याल रखा जाए, भौजी का मुखडा देख के लिखा कीजीये,ई दुखडा भूल जाएंगे । और हमरे जैसे जो अपने हैं,ऊ तो सपने में भी आ जाएंगे
अजय कुमार झा

अमित ने कहा…

समीर जी छोटी लेकिन बहुत चुटीली कविता है।
आपके अहसासात का सहयात्री!
सादर

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

अपने दूर होते है तो दिल दुख्ता है

PRAN SHARMA ने कहा…

SAMEER BHAI,AAPKE ANTAKARAN SE
NIKLEE KAVITA MUN KO DRAVIT KAR
GAYEE HAI.AAPKEE BHEEGEE-BHEEGEE
PANKTIYON NE SAHIR LUDHIANVI KEE
YE PANKTIYAN YAAD KARAA DEE HAIN--
JEEWAN KE SAFAR MEIN RAHI
MILTE HAIN BICHHAD JAANE KO
AUR DE JAATE HAIN YAADEN
TANHAAEE MEIN TADPAANE KO

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

यही जिंदगी है...जिसकी रेस में सब दौड़ रहे है भले कभी कभी कोई हमारे रास्ते में आ जाता है कुछ पल साथ भी रहते है मगर रास्ता तो रास्ता है यादें सहेज कर हमें फिर अपनी अपनी मंज़िल की ओर जाना ही पड़ता है..और बस जैसे आपने कहा एक भ्रम पाले रहते है की सब हमारे साथ है..मगर दूरियाँ बढ़ती जाती है और हमें पता भी नही चलता है..

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

कितने बढ़िया लिखते है कोई भी मनोस्थित पैदा महारत है आपकी हँसाने का भी और रुलाने के भी..बेहतरीन लेखनी को सलाम है.. और साथ ही साथ आपको .मकर संक्रांति की हार्दिक बधाई..

कमलेश वर्मा ने कहा…

aise hi log thode hi deewane hain is lekhni ke jadoogar ke ..man gaye bhai sahab ..wah..!!

अबयज़ ख़ान ने कहा…

समीर जी आजकल मैं भी कुछ ऐसे ही दौर से गुज़र रहा हूं... आंसू आ गये पढ़कर...

अल्पना वर्मा ने कहा…

'यूँ चुप रहकर...
मुझे
मौत से बदत्तर
जिन्दगी न दो!!'

-बेहद मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ!
बेहद प्रभावी!

योगेश स्वप्न ने कहा…

sahi hai , sachche mitra ka to yahi kartavya hai, achchai burai sab kuchh share kare lade aur pyaar kare. sunder prastuti.

राजेश स्वार्थी ने कहा…

कैसी लेखनी है आपकी साहब-जिस दिशा में निकले, उसी में झंडा गाड़ देती है. हम तो आपके मुरीद हो गये पूरे से.

साधवी ने कहा…

कौन भला आपसे नाराज होगा, पागल होगा कोई.

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

जिंदगी के सफ़र में अक्सर ऐसा ही होता है..'हमने पुकारा नहीं और उसने मुड के देखा भी नहीं"!हमारे अभिमान और अकड़ की वजह से कितने ही लोग बिछड़ जाते है!उसे समय रहते मना लिया जाये तो वो हमें छोड़ कर नही जा सकता ,पर ऐसा नहीं हो पाता और एक रहस्यमयी चुप्पी हमारे बीच में पसर जाती है..

वाणी गीत ने कहा…

कुछ पंक्तियाँ ही कई बार पूरी कहानी बता जाती हैं
अपनों की ख़ामोशी ही जी जलाती है ...उनका लड़ना झगड़ना नहीं ...

कौन पत्थरदिल हुआ है आपसे यूँ खफा ...??

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

अरे आप से कौन रूठ गया ..मौन का दर्द वैसे बहुत चुभता है ....बहुत भावुक हो कर लिखी है आपने यह पोस्ट ...सच है एक एक शब्द ..

रचना ने कहा…

as always good creative writing the disclaimer spoiled the whole post

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

मन को दू गये आपके भाव।

--------
थोड़ी अक्ल लगाएं, खूब करें एन्ज्वाय...
विष का प्याला पी कर शिवजी नीलकंठ कहलाए।

Raj ने कहा…

So Nice.........

सर्वत एम० ने कहा…

यही ज़िन्दगी है. यही होता है. यही होता रहेगा. ज़फर गोरखपुरी ने फ़रमाया--
वक्त से पहले लाजिमी थी मौत
देखने, सोचने की आदत थी!!
सो, बड़े/छोटे भाई, जो चला गया उसे भूल जा. उसे तो लौट के आना ही है. जाएगा भी तो कहाँ. हर आदमी में न तो समीर लाल होता है न उड़न तश्तरी. ज़ाहिर है, ऐसे में उसे लौट के वहीं आना है.
आप शायद स्व. माधव मधुकर से वाकिफ होंगे. उन्होंने फरमाया--
जरा सी बात पे कोई खफा नहीं होता
समझ से काम लो, आपस में क्या नहीं होता.
बंदे को सुनाएं, आयोडेक्स मलें, काम पर चलें. मुझे आपके दुःख पर एक लतीफा याद आता है लेकिन सुनाऊंगा तब, जब आप फरमाइश करोगे.

प्रकाश पाखी ने कहा…

बरसों पहले जब हमारी शतप्रतिशत रचनाए प्सम्पद्क के खेद पत्र के साथ वापस आ जाती तो मुझे ऐसा ही महसूस होता था...आज ब्लॉग ने हमारी कुंठाएं खत्म कर दी है.और अब आपका दर्दे दिल मुझे भावुक कर रहा है.सेंटी हो रहा हूँ...

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत नाराज़ तुम भी हो जरा नाराज़ हम भी हैं
चलो छोडो गिले शिकवे मगर पहले मनाये कौन
बाकी जो ताऊ जी ने कहा है उस पर गौर करें । इसी बहाने अच्छी कविता रच दी। शुभकामनायें

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

'क़तअ कीजे न तअल्लुक हमसे
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही'

Prem ने कहा…

ek udasi bhara aalekh.i pray you get out of it soon .haapy and very happy new year. aap hanste mazak karte achche lagte hain .

Yashwant Mehta ने कहा…

The best part of this
लाख दुर्गुणों के बावजूद दोष में यही सदगुण है कि वो अपने होने का अहसास किसी न किसी तरह करा ही देते हैं

bahut hi sahi baat kahi hein. agar dosh apna hone ka ahsas nahi kara pate to shayad insaniyat bhi nahi hoti

kshama ने कहा…

नाराज हो मुझसे?

लड़ो

मुझे कोसो

डाँटो

झगड़ो मुझसे

मगर

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!

तुम तो मेरे अपने थे..

इतना उपकार करो मुझ पर!
Ye ham sabhee pe beetee hogi..lekin mujhe to apne bhawon pe itne sundar alfaaz ka jama pahnana nahi aaya!

Rambabu Singh ने कहा…

श्री मान जी ,मुझे आपकी अन्तिम लाइन ने तो भाबुक बना दिया | बहुत ही मार्मिक और अंतःकरण को स्पर्श करती है आपकी ये लेख | मैं बिलकुल निशब्द हूँ, सिर्फ ये चार लाइन के माध्यम से मैं अपनी बात कह सकताहूँ
"माना ये वक़्त हमें याद करने वाला नहीं ,
पर बेवक्त ही हमें याद करलिया करो
माना आपके आसपास सारी दुनिया है ,
कभी हमारी कमी का भी एहसास करलिया करो" |

चक्रेश सूर्या "सूफी" ने कहा…

नाराज हो मुझसे?

लड़ो

मुझे कोसो

डाँटो

झगड़ो मुझसे

मगर

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!

तुम तो मेरे अपने थे..

इतना उपकार करो मुझ पर!


सच कहूँ तो एक आदमी पूरी दुनिया को खुश नहीं रख सकता...कहीं न कहीं उससे चूक ज़रूर हो जाती है. भागते-दौड़ते दूसरों के आंसू पोछते-पोछते, कभी-कभी कुछ लोगों के आंसू बहते रह जाते हैं. जो दिखाई नहीं दे पाते.

G M Rajesh ने कहा…

jad se jude rahne ka mahatv samjhe ye badi baat hai janaab

गौतम राजरिशी ने कहा…

इशारा तो एकदम स्पष्ट है सरकार....सबको सेंटी कर दिया आपने इसी बहाने

singhsdm ने कहा…

समीर जी

जानकर अच्छा लगा आप गोरखपुर से ताल्लुक रखते हैं.......गोरखपुर में कहाँ से.....?

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!

बहुत अच्छे.......

Manoj Bharti ने कहा…

जीवन के विभिन्न आयाम हैं
हम जितना समझते हैं उससे अधिक रह जाता है
बिना समझे...अनजाना ...जिसका अनंत विस्तार है

किसी के चुप रहने में भी संदेश है
किसी के बहुत कुछ कह देने पर भी कुछ नहीं मिलता ।

अंतर्द्वन्द्व की मार्मिक अभिव्यक्ति

Manoj Bharti ने कहा…

जीवन के विभिन्न आयाम हैं
हम जितना समझते हैं उससे अधिक रह जाता है
बिना समझे...अनजाना ...जिसका अनंत विस्तार है

किसी के चुप रहने में भी संदेश है
किसी के बहुत कुछ कह देने पर भी कुछ नहीं मिलता ।

अंतर्द्वन्द्व की मार्मिक अभिव्यक्ति

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

क्या कहूँ ? कुछ नहीं न !
चुप ही रहूँ ?

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

कोई शिकवा अगर हो और शिकायत अगर हो
हमसे गिला करो,
पर तुम मिला करो...

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

भाई इतना सोचना भी ठीक नहीं ...

Bhagyoday ने कहा…

rat ke bad din aata hai ,din ke bad rat ,kyno chintit ho aapake sge bhai bahan ekasaubis karod hai aur baki chachere bhi bahan to pure duniya me hai
bhagyoorganicblogspot.com

Hari Shanker Rarhi ने कहा…

Feeling of loneliness in mob is a unique sentitivity which is the soul of creativity. The line picked me up to feel something and to be here, with you.

sanjeev ने कहा…

janaab sabse pahale to is baat ke liye behad shukriya ki aapne mere blog par na sirf apne comment diye balki mera utsaah bhi badhaya.

apne wo hote hain jinke samne ham bilkul vaisa dikhte hain jaisa ham hote hain, baki duniya ke samne to ham aksar dikhawa hi karte hain.apno ka saath hona hamari rooh ko jinda rakhne ke liye jaruri hai.isiliye jab apne door hote hain to rooh yani antaraatma tak ko dukh hota hai.
apki ye kosis sabit karti hai ki aap ke liye un apno ki kya kimat hai.agar iske baad bhi aap ka koi apna aap se door hai to yakin maniye wo bhi apki hi tarah kisi bahane ka intajaar kar tha. ummed hai aapne is bahane use apne aur bhi kareeb kar liya hoga.

aapka ek aur apna yahi duaa karta hai.

बवाल ने कहा…

देख लो लालाजी,
आपके सब दोस्त आपको किस रूप में सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं ? अब तो मानते हो ना हमारी बात। सच इन दो तीन दिनों हमारे ब्लॉगजगत का वास्तविक संजीदा चहरा सामने आया और तीनों दिन अपनों को याद कर रोए। जी हल्का हो गया। अबकी द्फ़ा आओगे ना, जाने ही न देंगे, देख लेना। पासपोर्ट ही मार देंगे, फिर देखते हैं कैसे जाते हो टोरंटो हाँ नहीं तो।
यू सबको रुलाने वाले !

praneykelekh ने कहा…

sir ji ,too good

नाराज हो मुझसे?
लड़ो
मुझे कोसो
डाँटो
झगड़ो मुझसे
मगर
यूँ चुप रहकर...
मुझे
मौत से बदत्तर
जिन्दगी न दो!!
तुम तो मेरे अपने थे..
इतना उपकार करो मुझ पर!!!

aasan shabdo mein bahut zyada kuch kaha ...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

समीर भाई

क्या गज़ब के शेर लिखे हैं आपने ..
वाह वाह .........
बस यूं ही लिखा करीए
न जाने क्यूं,
आपका दिल से निकला पढ़ते ही ,
कोइ न कोइ फ़िल्मी गीत
याद आ जाता है ,
अब ये सुनिए,
" आप से हम को बिछुड़े हुए ,
एक ज़माना बीत गया
अपना मुकद्दर बिगड़े हुए,
एक ज़माना बीत गया "...
आपके रूठे दोस्त भी मान जायेंगें
[ये दुआ हैं]
स स्नेह,

- लावण्या

abhivyakti ने कहा…

sidhi saral hridayasparshi kavita.
badhai

सुशीला पुरी ने कहा…

आपने तो रुला ही दिया .........इतनी मार्मिक कविता आपने कितने सरल शब्दों में लिख दी .....हार्दिक बधाई .

Meenu Khare ने कहा…

झगड़ो मुझसे

मगर

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!


बहुत मार्मिक!धाई और अभिनन्दन स्वीकार करें ।

sandhyagupta ने कहा…

Kahte hain ki jo baat khamoshi bayan kar sakti hai shabd kah pane me asamarth hote hain.Par patne ka jo kaam shabd kar sakte hain wo khamoshi kabhi nahi.

शहरोज़ ने कहा…

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!

मार्मिक!

अभिषेक प्रसाद 'अवि' ने कहा…

bhaavpurna abhivyakti..

Priya ने कहा…

aapke blog par aakar itne saare...comment dekh kar hi ghabra jaate hai....fir socha feeback dene walon ki sankhya bahut zyada hai.....fir socha aaye hai to entry darz hi kara den......sensitive post

श्रद्धा जैन ने कहा…

एक एक शब्द मन बेधता चला गया
मगर ये जानने के बाद भी कोई अपना जा रहा है या आसपास नहीं है क्या किया जा सकता है अगर कोई बिना बताये बिना कोई शिकायत के चले जाए
शायद उसके लिए ये रिश्ता अहम् नहीं होगा अब हमारी ज़रूरत नहीं होगी या व्यस्त हो गए होंगे कभी लौट आयेंगे
बस आपकी ही तरह हम सब भी यही कह सकते हैं कि कोई दोस्त है तो चुपचाप दूर न हो वो शिकायत करे गलती पर झगड़ ले
आप जाने कैसे मेरे मन की सारी बातें कह देते हैं

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

जिस किसी के लिये भी लिखा है सुंदर है, भावपूर्ण है दिल से निकला है, आशा है वह जल्द ही चुप्पी तोडेगा ।

बेनामी ने कहा…

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!

आप बहुत ही अच्छा लिखते हैं.

पूर्णिमा

Prem Farrukhabadi ने कहा…

Sameer Bhai,
Apka atmchintan aur atm vishleshan pathkon ko yahi kaam karne ko majboor karta hai jo aapne kiya.Is tarh ke lekhon se lekhak ka vyaktitv nikhre bina nahin rah sakta.apka lekh aina dikhata hai aur sachmuch sarahneey hai.Dil se Badhai!!

sada ने कहा…

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!

बहुत ही गहरे शब्‍दों के साथ अनुपम प्रस्‍तुति, आभार

बेनामी ने कहा…

ओ मेरे घर नहीं आता मैं उसके घर नहीं जाता
मगर इन अहतियातों से ताल्लुक मर नहीं जाता
मोहब्बत के ये आंसू हैं इन्हें आँखों में रहने दो
शरीफों के घरों का मसला यूं बाहर नहीं जाता

रचना दीक्षित ने कहा…

कौन जाने कौन किसके लिए लिख रहा है.आप हमारे लिए या यही हम आपके लिए.हम सब से इतनी शिकायत.और जब हमारी बारी आये तो लेप टॉप बिगड़ जाता है
हूँ .................

baddimag ने कहा…

bahut achche sameer bhai...bas aise hi likhte raho....hamari sari shubhkamnayen aapke sath hain...han aapke is aalekh ko apne weekly samachar patr me aapse bina puche chaap raha hun....maf karen..han apptti na ho to apani sahmati mere blog par hi de den

स्पाईसीकार्टून ने कहा…

कभी रियल कभी वर्चुअल, क्या फर्क है. बिलकुल जनाब

ajay saxena ने कहा…

"बहुत ही मार्मिक!"
मेरी बधाई और अभिनन्दन स्वीकार करें

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

रचना हृदयस्पर्शी हैं,बढ़िया पोस्ट।

रविकांत पाण्डेय ने कहा…

धन्य हो महाराज! रूला देनेवाली पोस्ट है बिल्कुल।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

दो करीबी इंसानों का रिश्ता ठीक वैसा होता है, जैसा साइकियाट्रिस्ट और उसके मरीज़ में होता है।

यानि जब एक बोले तो दूसरा सुनता रहे।

यदि दोनों बोले, तो मुसीबत ।
और यदि दोनों चुप तो भी मुसीबत।

अब वे दो इंसान कोई भी हो सकते हैं।
पति -पत्नी, बाप -बेटा , मित्र या या कोई भी रिश्ता।

Dipak 'Mashal' ने कहा…

main wapas aa gaya hoon sir... kuchh pata nahin aap vyast hain ya naraaz..
jahan bhi hon khush rahiye aur hum bachchon par aasheesh rakhiye...
aapka hi- dipak
Jai Hind...

RAJ SINH ने कहा…

भाई उड़नछू लाल ,
अभी तक तो हम माजरा ही न समझ पाए .किस से कह रहे हैं , क्या कह रहे हैं , क्यूं कह रहे हैं ?
अब ' बवाल ' को रुलाओगे तो मुश्किल होगी ! ये कैसी जुगलबंदी . एक रोता एक गंभीर .

हम तो ' क्षमा ' सहित कहेंगे की हमपे भी बीतती है पर भावों को शब्दों का जामा नहीं पहना पाते .

विवेक सिंह ने कहा…

आपका लेख आप ही के बनाए मापदण्ड पर धाराशायी हो गया है । क्योंकि पूरा लेख पढ़ते समय ब्लॉग जगत के परिप्रेक्ष्य में ही दिखा । और तो और, हम तो उन तथाकथित मित्रों के नाम भी बताना चाहते थे फिर सोचा, क्या जरूरी है ?

यह तो आपका स्थायी रस हईये है !

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

चाचा आपके साथ कौन भला नाराज हो सकता है. बहुत अभागा होगा.

rakhshanda ने कहा…

you have given tears in my eyes sameer ji,aapki post itni achhi kabhi nahi lagi..wt can i say...

Dr.Bhawna ने कहा…

aaj itni udasi si kayon ha aapke lekh men? par jo bhi ha dil ko chune khai...badhai

Abhasjoshi ने कहा…

सादर अभिवादन
आप मेरे एलबम लांचिंग में थे
यहाँ देखकर ख़ुशी हुई

अरूण साथी ने कहा…

बास,
बरबस ही यह शब्द निकल गया बुरा मत मनिएगा, पर आपका जबाब नहीं, लाजबाब कर दिया। दर्द को पिरोया है मोतियों की तरह। लाजबाब।..........................................................

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

नाराज हो मुझसे?

लड़ो

मुझे कोसो

डाँटो

झगड़ो मुझसे

मगर

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!

बहुत लाजवाब पोस्ट.

makrand ने कहा…

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!

बहुत बढिया पोस्ट.

Kulwant Happy ने कहा…

बात ब्लॉग जगत की हो या बाहर की, लेकिन बिल्कुल है तो सत्य।

महफूज़ अली ने कहा…

आदरणीय समीरजी....

नमस्कार ...

देरी से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ....गोरखपुर से वापिस आ गया हूँ.... इस पोस्ट ने रुला दिया... बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट...

Murari Pareek ने कहा…

basant panchmi ki hardik shubhkaamnaae!!!

ढपो्रशंख ने कहा…

बहुत गंभीर पोस्ट है, और बात समझने जैसी है कि संवाद कायम रहना चाहिये.

ढपो्रशंख ने कहा…

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!


वाह क्या अल्फ़ाज लिखें हैं. धन्यवाद.

बाबा निठ्ठल्लानंद जी ने कहा…

आलेख और कविता .. बहुत मार्मिक।

आशीष खंडेलवाल ने कहा…

बहुत मार्मिक और गंभीर पोस्ट है.

हैप्पी ब्लागिंग.

Mishra Pankaj ने कहा…

समीर जी आप का लिखा हर एक शब्द मन को द्रवित कर रहा है ! और अपने को अपने की याद दिला रहा है !
सादर
पंकज

udbhavna.blogspot.com ने कहा…

बहुत खूब है सर। आपकी प्रशांसा मिली धन्य हो गया। बसंत की बधाई

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बसंत पंचमी की घणी रामराम.

Hiral ने कहा…

bahut sundar aur upagogi post hai. bahut kuchh sikha jaa sakata hai is post se.

Babli ने कहा…

आपको और आपके परिवार को वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभकामनायें!

महफूज़ अली ने कहा…

बिलकुल सही कहा आपने..... प्रशासन का हाथ जिस पर हो और जो प्रशासन से सांठ गांठ करने की कला जानता हो, वो ऐसे ही तरक्की करता है..... प्रशासन जो ना करा दे....बहुत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट.... नेट खराब होने कि वजह से .... लेट हो गया..... माफ़ी चाहता हूँ....

सादर

महफूज़....