मंगलवार, जून 09, 2009

कमबख्त, पसीने की बू नहीं जाती!!!

कमरे में वापस आ गया हूँ. दिन थकान भरा रहा हमेशा की तरह.

गगनचुंबी इमारत की गगन के पास वाली फ्लोर.

यह है टोरंटो की 'क्वीन्स के' नामक सड़क पर..ओन्टारियो लेक से सटी हुई अभिजात्य रहवासी कॉलोनी.


टोरंटो



कल रात यहीं तो इसी कमरे में मैं और लिंडा बैठे थे वाईन सुड़कते हुए, एक दूसरे से सटे हुए भारत की हालत पर बात कर रहे थे. एक निहायत थकी हुई बात. यहाँ के हिसाब से बेबात की बात.

हाँ, पिछले साल ही तो मैं और लिंडा भारत गये थे. लिंडा पहली बार भारत गई थी कितनी ही किताबें पढ़कर, मुझसे सुन कर और तस्वीरें देखकर ख्वाब सजाये. उन्हें सच होता देखने.

यहाँ से दिल्ली तक का थकाऊ २२ घंटे का हवाई सफर-बैठे बैठे. बीच में पेरिस के ४ घंटे का अल्प विराम कैसे गुजरा टर्मिनल बदलते कि पता ही नहीं चला कि कहीं रुके भी.

एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्म हवा का भभका और साथ घुली पसीने की खुशबू-(लिंडा उसे बदबू की संज्ञा दे गई-बेवकूफ!!)

फिर रेल में जबलपुर और आगे सिवनी के पास गांव तक की रोडवेज की यात्रा. लगा कि कहाँ आ गये. सब तरफ उड़ती धूल..उधड़ी सड़कों पर चलते..हवा में गोबर की महक. लिंडा की गोरी चमड़ी देख ग्रमिणों की अचरज भरी आंखें और अपनी ओर ध्यानाकर्षण करवाने विचित्र भाव भंगिमा बनाते लोग.

मैं भी बिना ज्यादा चले थका हुआ साथ चलता रहा एक खीज, एक घृणा का दायरा अपने आसपास साधते..कैसे लोग हैं बिल्कुल अनपढ़...एकदम लिंडा जैसी सोच हो गई मेरी भी. २१ दिन की यात्रा..तालाब के किनारे मंदिर. बरगद के नीचे सिंदूरी पत्थर याने हनुमान जी-बुझी हुई अगरबत्तियो की जलती खुशबू. कोई सार्थकता नहीं बस एक निष्ठ भाव. भूली हुई पुरानी यादों का साक्षी, जो मुझे न जाने क्या क्या याद दिला जाता है और लिंडा नाक पर रुमाल रखे पास से आती पैशाब और पैखाने की बदबू से एक हारी लड़ाई लड़ती हुई और मैं उस हवा की महक में अपना बचपन अहसासता.

बस, एक दिन में ही २१ दिन की यात्रा १५ दिन में बदल गई.

मै भी भारत की स्थितियों की बुराई करते हुए उसी के साथ वापस आ गया. उसी शाश्वत झिड़कन के साथ कि यह हालात कभी नहीं सुधरेंगे जबकि भीतर से मैं ही जानता था कि कितना कुछ बदल चुका है.

मगर लिंडा तो अपने जेहन में बसे किताब वाला भारत, दूध दही की नदियों वाला भारत, सोने की चिड़िया वाला भारत, दुनिया के माथे की बिंदिया वाला भारत, जान से प्यारा मेहमान को मानने वाला भारत और न जाने कौन कौन सा भारत खोज रही थी. वो नाक पर रुमाल रखे तलाशती थी उस भारत को जिसके दामन से आने वाली हवाओं को सलाम करने का जी चाहता है वो उसे कहाँ दिखाता? उसे कैसे बताता कि यही वो दामन से उठने वाली हवा है, यही वो माहौल है जो मुझे वापस बुलाता है..मुझे मेरा अतीत याद दिलाता है. मुझे मेरा अपना लगता है. मेरा दिल इन्हें ही सलाम करने को मचलता है. वो नहीं समझेगी.

आज खिड़की के नजदीक जाता हूँ..इतने उपर..सामने आकाश..सामने तैरता ओन्टारियो लेक..मानो जैसे लेक नहीं महासागर हो. खिडकी से सट कर सड़क देखता हूँ तो लगता है कि सड़कों पर कारें नहीं हजारों चिटिंया कतार बनाये घूम रही हैं.

बचपन में गांव के खेत में लाल चीटीं की बांबि पर पैर रख दिया था अनजाने में. सब पैर पर चढ़ गईं थी और जी भर के काटा. मैं रोने लगा था तब माँ ने पुचकारते हुए उस पर घी और नमक मिला कर लगाया था तब जाकर जलन कम हुई थी... मन में सिरसिरी सी चढ़ जाती हैं. अचकचा कर खिड़की से दूरी बना लेता हूँ. गोड़ झटक लेता हूँ, तब थोड़ा ठीक लगता है. आँख पोंछ कर देखता हूँ, न जाने कहाँ से आज फिर एक नमी सी है बस पुचकारने वाला कोई नहीं. घी नमक लगाने वाला कोई नहीं. मैं और बस मैं-निपट अकेला.

सब मन की उड़ान है.

आज से मुझे, न जाने क्यूँ, लिंडा अच्छी नहीं लगती. अब नहीं मिलूँगा उसे.

लगता है कि अभी मर जाऊँ इतने उपर की मंजिल में..तो जितना समय इस फ्लोर से जमीन तक जाने में लगेगा..उतने ही समय में ही उपर पहूँच जाऊँगा.. आधा रास्ता तय कर लिया है अपनी जड़ों को छोड़ कर.

मन नहीं मानता..दराज खोल लेता हूँ..१३ साल पहले भारत छोड़ते समय टीका लगाते हुए माँ ने लिफाफा दिया था....उसे आज खोलता हूँ...१०१ रुपये हैं - १०० का नोट और १ का सिक्का. यह कह कर कि रास्ते के लिए रख ले. क्या पता कब काम आ जाये. सच, अभी रास्ते में ही हूँ..देखो, आज आ ही गया. माँ की फिर से याद हो आई. लिफाफे ने उनके होने का अहसास दिया. पैर में जलन कुछ राहत पा गई.

आँख भर आई है. उठ कर बाथरुम में आ गया हूँ..आईना देखता हूँ ..मैं दिखता हूँ उसमें. आँख मे नमी लिए. मगर खुद से आँख मिलाने की हिम्मत कहाँ....सर झटक देता हूँ...यथार्थ में लौटने के लिए.

कमरे में वापस आ जाता हूँ.

मैं तो अब भारतीय ही नहीं रहा...मगर यहाँ का भी तो नहीं हो पाया. ब्राउन स्किन्ड, हाऊ कैन यू बिकम व्हाईट स्किन्ड गाय!!!

ए सी कमरे में मैं घबरा कर अदबदाया सा पसीने में भीग जाता हूँ.. पसीने की बू..काँख से उठती हुई.. वही..गांव वाली....

कमबख्त..पसीने की बू नहीं बदलती...क्या करुँ? क्यूँ नहीं जाती यह..कोलोन और महक वाले साबुन..सब इस्तेमल कर लिए...!! और फिर मैं तो भारत में रहता भी नहीं. इतने साल हो गये यहाँ रहते..शायद ये मेरे खून में रची बसी है. मेरे साथ ही जायेगी.

नाईट सूट गड़ने लगता है. न जाने क्यूँ..आज लूँगी न होने की कमी खली.

वरना घुटने तक उसे खींचें अधलेटा सा मसनद टिकाये पड़ा रहता, पिता जी की तरह जब वो टूर से थक कर लौटते थे. मैं भी तो बहुत थक गया हूँ. कितना दूर चला आया हूँ.

वाईन का गिलास!! इसे बदल देता हूँ स्कॉच से. वो ज्यादा स्ट्रांग होती है. शायद कुछ बेहतर अहसास दे. एक भ्रम ही सही मगर और रास्ता भी क्या है?

मैं फिर स्कॉच का गिलास लिये खिड़की पर खड़े उस आईलेन्ड को निहारने लगता हूँ जिसे लोग सेन्ट्रल आईलेण्ड कहते हैं.

टोरंटो का मुख्य आकर्षण केन्द्र. दिन भर सेलानियों का फेरी से आने जाने का तांता लगा रहता है.

चारों तरफ सिर्फ पानी मगर फिर भी अपना जमीनी अस्तित्व बरकरार रखे हुये लोगों को आकर्षित करता!!

लेकिन मेरा अस्तित्व, उसे मैं बरकरार नहीं रख पाया और न ही मुझमें अब कोई आकर्षण शेष रहा!!!

यही हाल होता है अपनी जड़ों से दूर-उपर से महकती क्लोन की खुशबू और भीतर से उठती पसीने की वही गांव वाली बू!!

दोनों की मिली जुली गंध- तेजाब से तीखी गंध का भीतरी अहसास-जो सिर्फ मैं महसूस कर सकता हूँ. उस गंध की जलन से मेरी आँखें जलने लगती हैं और बह निकलती है एक अविरल अश्रुधारा.

ऐसे आँसू, जो किसी को नहीं दिखते. दिखती है तो सिर्फ मेरी वो मुस्कराहट और आती है सिर्फ मेरे उस कोलोन की खुशबू, जिसमें दफन किये फिरता हूँ अपने इन आँसूओं को और उस गांव वाली पसीने की बू को. Indli - Hindi News, Blogs, Links

101 टिप्‍पणियां:

woyaadein ने कहा…

भावपूर्ण आलेख.....अपना देश चाहे जैसा भी हो, प्राणों से प्रिय है होता है ठीक वैसे ही जैसे अपने घर में नमक-रोटी खाने का आनंद बाहर के छपन-भोग-पकवान खाने से कहीं अधिक होता है......ऐसा अपना मानना और सोचना है.....

साभार
हमसफ़र यादों का.......

M Verma ने कहा…

दफन किये फिरता हूँ अपने इन आँसूओं को और उस गांव वाली पसीने की बू को.---------
सलाम उस ज़ज़्बे को जब पसीने की बू की भी कमी खलने लगे.

गिरिजेश राव ने कहा…

इतनी अलग सी दुनिया के निवासी होते हुए भी आप यह सब कैसे लिख लेते हैं?
यहाँ तो गोमतीनगर में रहने वाले पूरबिए खुद को मंगल ग्रह का वासी समझते हैं।

"गोड़ झटक लेता हूँ, तब थोड़ा ठीक लगता है. आँख पोंछ कर देखता हूँ, न जाने कहाँ से आज फिर एक नमी सी है बस पुचकारने वाला कोई नहीं. घी नमक लगाने वाला कोई नहीं. मैं और बस मैं-निपट अकेला."

आँखें भर आईं।

एक शब्द 'गोड़' के प्रयोग ने ही बता दिया कि उड़न तश्तरी की ज़मीनी हक़ीकत क्या है। वैसे भोजपुरी का यह देसज शब्द मध्यप्रदेश वाले की शब्दावली में कैसे समाया?
एक बात कहूँ, इस पोस्ट को किसी हिन्दी अखबार में भेजिए।

श्यामल सुमन ने कहा…

माँ की यादें, जड़ से कटने की बेबसी और बहुत सारी बातें - मन को संवेदित करतीं हैं। स्टाईल समीर" अच्छा लगा।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहुत सुंदर, एक परदेसी भए देसी आदमी के मानसिक द्वंद की कहानी। ऐसी कहानी बहुत दिनों बाद पढ़ने को मिली।

tanu sharma.joshi ने कहा…

kuchh aur nahi balki hamara zameer aur kanhi gehre paith banaye wo jaden hoti hain jo hame hamari mitti se jod kar rakhti hain...aur ta-umr ye desi ehsaas jeewant banaye rakhta hai....!!!

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

बहुत ज्यादा भावुक कर देते हैं आप। खुद तो इमोशनल होते ही हैं हमें भी कर देते हैं। इतना इमोशनल मत हुआ करें। दिमाग पर जोर डालेंगे तो दिल पर भी पड़ेगा। आपका एक-एक शब्द बयां कर रहा है कि आप भले ही अपनी जमीं से दूर बैठे हैं लेकिन जड़ों बहुत मजबूती से जुड़े हैं। इतनी भावुक कर देने वाली पोस्ट है कि शुरू किया तो बस पढ़ता ही गया। लिंडा से क्यों खफा होते हैं। वो क्या जाने कि गांव की मिट्टी की खुशबू कैसी होती है? शुक्र है आप कुछ नहीं भूले। एक बार फिर यही कहूंगा बहुत भावुक कर देने वाली पोस्ट है। बधाई और शुक्रिया इस बात का कि आप हकीकत को भूले नहीं हैं और उसे भुलाने या झुठलाने का नाटक भी नहीं करते।

अनूप शुक्ल ने कहा…

लेकिन मेरा अस्तित्व, उसे मैं बरकरार नहीं रख पाया और न ही मुझमें अब कोई आकर्षण शेष रहा!!!
इत्ते लोग तो क्यूट कहते हैं। क्या वो सब झूठे हैं! अरविन्दमिश्रजी ने तो लिखा भी है कितने "क्यूट ' हैं न समीर जी , अभी उसी दिन तो एक महिला ब्लागर मित्र ने मुझसे कहा !

Mansoor Ali ने कहा…

kitna dard saheje hue hai aap, ab to aap rone-rulaane lag gaye hai. Bhai watan mein kyon nahi aa baste....ilaaje darde dawaa yahin hai.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

माँ और मातृभूमि -
दोनोँ को शिद्दत से याद किया आपने इस आलेख मेँ समीर भाई ..
बिलकुल सच लिखा आपने ..
- लावण्या

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बहुत प्रभावी रचना. क्या गज़ब लिखा है भाई! (ऐसे लेखों के साथ रुमाल मुफ्त मिलना चाहिए.)

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

आपकी पोस्ट पढ़ कर ही समझ गया की देश से दूर होकर.. भी आप कितने करीब है....!अन्दर ही अन्दर आप आज भी उसी गाँव को जी रहे है....अपनी माटी की सौंधी गंध हमेशा अपनी और खींचती है..जबकि हमें किन्ही कारणों से दूर जाना पड़ता है...!सच में अपनों के बीच जो मज़ा है वो सपनो में कहाँ....

राजेश स्वार्थी ने कहा…

आज आपने उन सब को झूठा साबित कर दिया है जो कहते हैं कि ब्लॉगजगत में साहित्य नहीं रचा जाता.

है कोई माई का लाल साहित्यकार, जो समीर जी की इस रचना को गैर साहित्यिक कहे या इससे टक्कर ले.

आपकी आज तक पढ़ी सभी बेहतरीन गद्य रचनाओं में सर्वोपरि. इसका कोई सानी नहीं.

पद्य: मेरी माँ लुटेरी थी
गद्य: कमबख्त, पसीने की बू नहीं जाती!!!

दोनों आपको दोनों विधाओं में सर्वश्रेष्ट बनाती हैं आज के युग में.

अनन्त शुभकामनाऐं एवं बधाई.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

समीर जी।
यह यात्रा संस्मरण आपने अन्तरतम् इतना डूब कर लिखा है कि मैंने इसे कई बार पढ़ा।
देश से दूर होने का दर्द, माँ का प्यार और पसीने की गन्ध तो जीवन भर पीछा नही छोड़ती।
आपकी लेखनी को प्रणाम।

Tarun ने कहा…

sameerji, ab to bahut bariya likha hai kehna bhi ek routine sa lagne laga hai....kuch waise hi jaise khusboo ke liye colon chirka jata hai.....

one of the best by you.....BTW roj mail check kar reha hoon....kabhi to gaaon....daakiya daak laya daak laya

डा प्रवीण चोपड़ा ने कहा…

आप के भाव पढ़े। यही सोच रहा हूं कि वैसे तो हर व्यक्ति की अपनी परिस्थितियां होती हैं लेकिन फिर भी जब आप जैसे संवेदनशील लोगों में अपनी जड़ों से अलग होने की इतना तड़फ है तो आप क्यों नहीं वापिस अपने वतन का रूख कर लेते------शायद मेरे लिये लिखना जितना आसान है, लेकिन इसे कर पाना निहायत ही मुश्किल काम है।
अच्छा, समीर भाई, अपना ध्यान रखिये और खुश रहिये। लेकिन एक बात तो है कि आप की कही बात पढ़ ली, लेकिन आप जैसे महान लोग ही हैं जो कि विदेश में बसने के बाद भी अपने ही देशवासियों को अपनी मातृभाषा से जुड़ने के लिये हमेशा प्रेरित करते रहते हैं।
बहुत बहुत शुभकामनायें।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

भावावेग बहुत महत्त्वपूर्ण होता है. यह जहाँ मन को उद्वेलित करता है वहीँ उसे शांत भी करता है. भाई, ध्यानयोग प्रारंभ करने के बारे में सोचें...वाइन, विस्की सकोच आदि आदि.. बहुत हुआ ये सब.

अजय कुमार झा ने कहा…

अरे धत तेरे की...का गुरुदेव आदमी से एलियन बन गए..मुदा ई पसीनवा पीछा नहीं न छोडा...अरे ता अब का कीजियेगा ऊ से पीछा छुडा के..और हाँ एक ठो लूंगी...एक ठो गमछा ..आ एक ठो धारीदार कच्छा भिजवा देते हैं..साईज ऊज का कौनो झंझट नहीं होगा..जे छोटा हुआ ता लंगोट बना लीजियेगा...घामे पसीने नहाइए...

संजय बेंगाणी ने कहा…

सुबह सुबह भावुक कर रहें है आप.....

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

वह गंध कभी न जाये तो ही अच्छा .इस गंध में अपने देश ,माटी और अतीत की पहचान है .इस गंध का आपको एहसास होना बताता है कि आप अभी भी खांटी यहीं के हैं .आपमें अपना वजूद है और गुरुर भी .आप में अभी भी संवेदनाएं हिलोरे ले रहीं हैं ,इस मशीन युग में भी आप की संवेदनाएं मरी नहीं हैं .आप पर हम सभी को गर्व है .मानसिक द्वंद को दर्शाती इस बेहतरीन पोस्ट को लिखनें के लिए आपको बधाई .

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

.१३ साल पहले भारत छोड़ते समय टीका लगाते हुए माँ ने लिफाफा दिया था....उसे आज खोलता हूँ...१०१ रुपये हैं - १०० का नोट और १ का सिक्का. यह कह कर कि रास्ते के लिए रख ले. क्या पता कब काम आ जाये. सच, अभी रास्ते में ही हूँ..देखो, आज आ ही गया. माँ की फिर से याद हो आई. लिफाफे ने उनके होने का अहसास दिया. पैर में जलन कुछ राहत पा गई.

चाहे १३ सौ सा होजायें, यह मां और मातृभूमी का एहसास बना रहेगा और ये जो भारत का पसीना है इसकी मादक गंध किसी कोलोन से नही जाने वाली.

निहायत ही खूबसूरत लिखा है. बहुत धन्यवाद.

रामराम.

Priyanka Singh Mann ने कहा…

बहुत ही अच्छा लिखा अपने वैसा यह कहना छोटा मुह बड़ी बात जैसा है। देश से दूर रह कर आप देश के इतने करीब है यह प्रमाण है कि आप अपना अस्तित्व बखूबी बरक़रार रख पायें हैं वरना जैसे कि गिरिजेश राव जी ने कहा है कि यहाँ तो गोमतीनगर में रहने वाले पूरबिए खुद को मंगल ग्रह का वासी समझते हैं। आप के हर शब्द मैं देश की मिटटी की सुगंध है..आप जैसे गुणीजनने मेरा लिखा पढ़ा उस पर टिपण्णी दी यह मेरे लिए बहुत बड़ा प्रोत्साहन है । शुभकामनाओं सहित !!

Mansoor Ali ने कहा…

ps:

please correct the last sentence as........ilaaje darde niha yahi hai, isi dawaa mein asar hai pyaare [a misra from pandit Labbhu Ram urf josh malsiyani's ghazl] m.h

पंकज बेंगाणी ने कहा…

यह देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ के निवासी गंदगी को अपनी सहेली मानते आए हैं. मैने कई मंदिर देखे हैं जो सबसे स्वच्छ होने चाहिए लेकिन वहाँ भगवान भी गंदगी में विराजमान थे [स्वामीनारायण सम्प्रदाय के मंदिर सुखद अपवाद है - उन्हें कोटी कोटी धन्यवाद].

हम भारतीय गंदगी के प्रति कभी भी सचेत नहीं रहे और अब इस हमारी संस्कृति से भी जोड देते हैं. गोबर की दुर्गंध खुशबु लग सकती है और गाँव की याद भी दिला देती है परंतु क्यों ना ऐसा हो कि गाँव की याद फूलों की खुश्बु और मिट्टी की महक से आए!

क्या यह हो नहीं सकता. हो सकता है यदि लोग चाहें तो. पर हम ऐसा चाहते ही नहीं. हम सदियों से गंदगी में ही पले बडे हुए हैं और ऐसे ही रहना चाहते हैं.

यदि ऐसे में लिंडा फिर कभी भारत ना आना चाहे तो मैं लिंडा का समर्थन करता हूँ. क्यों आएगी लिंडा? क्या देखने आएगी? क्या छवि है भारत की?


मैं तो कभी गोबर और पैखाने की गंध से गाँव को याद नहीं करना चाहुंगा.

निरन्तर- महेन्द्र मिश्र ने कहा…

मातृभूमि से लगाव सब कुछ सह सकता है . बहुत ही बारीकी से आपने भावपूर्ण विचार अभिव्यक्त किये है . बहुत बहुत आभार.

ओम आर्य ने कहा…

maan ke diye 101 rupaye wali baat se dil bhar aaya. sonchne laga ki aadmi kahin bhi chala jaye, kuch bhi ho jaye par sanskar aur pyar ka paseena jaroor bahta hai badan se. natmastak.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आप एकाकी पन और अपनी जमीन से कटने के दुःख को जो शब्द देते हैं वो अद्भुत हैं...मन की व्यथा का इतना भावपूर्ण वर्णन करना आपकी लेखनी के बस की ही बात है...क्या कहूँ...इतना अच्छी अभिव्यक्ति है की प्रशंशा कें लिए उपयुक्त शब्द नहीं मिल रहे...

नीरज

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

दुनिया मेँ शायद हम भारतीय ही हैं जो कहीं भी रहते हुए अपनी मातृभूमि से इतनी शिद्दत से जुड़े रहते हैं।

नितिन व्यास ने कहा…

स्मार्ट इंडियन से सहमत "ऐसे लेखों के साथ रुमाल मुफ्त मिलना चाहिए"!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत ही भावुक कर देने वाला लिखा है .अपने देश मिटटी से आप बहुत गहरे जुड़े हैं यह बात बिखरे मोती पढ़ते हुए भी कई बार महसूस हुई ...अपना देश और उसकी खुशबु कहाँ कोई भूल पाता है ..फिर आप जैसा दिल रखने वाला तो कभी नहीं .

Science Bloggers Association ने कहा…

डिओडरेन्‍ट तो है न।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

वाह....बहुत गहरा, बहुत भावुक आलेख.

अभिषेक ओझा ने कहा…

इस पोस्ट में तो डूब गया ! यूँ तो आपकी हर पोस्ट याद रह जाती है पर एक सर उठा के हवाई जहाज देखने वाली पोस्ट थी और ये जो कभी नहीं भूलेगी.
{कमाल की पोस्ट}^n where n-> infinity.

बीच में कुछ कुछ हल्का-फुल्का भी लिखिए... आप हैं कि सेंटी किये जा रहे हैं ! :)

पंगेबाज ने कहा…

अब क्या टिपियाये पसीने और खुशबू या बदबू पर ? हम तो खुद पसीने पसीने हो रहे है :)

रंजना ने कहा…

धूल भरी पगडंडियों से स्काच तक पहुँचने की जद्दोजहद......थकान भरा सफ़र ......पर मंजिल तक पहुंचकर स्काच कितना बेस्वाद लगने लगता है.......सबकुछ कितना खोखला...खाली.....

बहुत ही प्रभावी ढंग से आपने इसे अभिव्यक्ति दी है.....बहुत बहुत सुन्दर !!

लाजवाब रचना...आभार स्वीकारें...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

पसीने की बू और टोरंटो की बीच उम्र के फांसले से गुज़रती और जीवन की कशमकश को बाखूबी उतारा है इस पोस्ट में.......... हम जैसे लोग तो अपने सेष से बाहर आ गए हैं........... वो बाख्होबी समझते हैं इस बात को..........उन सब के दिलके करीब है आपकी पोस्ट.........

गजेन्द्र सिंह भाटी (बीकानेर) ने कहा…

Aha..
Udan Tashtari...

Aap ne to mera kaleja thanda kar diya. Dil par se Itna bhari bojh hat gaya.

Iishwar aap ko swastha aur khush rakhe.

Gajendra singh Bhati

Arvind Mishra ने कहा…

गृह विरहियो के साथ ऐसा ही होता है जब आत्म प्रवंचना का भी पुट उसमें आ मिलता है -फिलहाल तो लिंडा पर ही कन्स्न्त्रेट करना ठीक हैं -होम फ्रंट पर अब कुछ नहीं बचा !

bhawna ने कहा…

बेहद प्रभावी लेख लिखा है आपने । सच मैं यहाँ इसी देश के एक छोटे से सहर में रहते हुए भी अपना गाँव , माँ , मिटटी सब आंसू भरे दिल से याद करती रहती हु । फ़िर आपकी पीडा से क्या तुलना करून। लेकिन हाँ दिल में जन पहचाना दर्द भर आया जो छलकने वाला है बस ..इन शहरी आंखों से ।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

याद आ रही है यहां के चिरकुट देश की?
यहां तो नालियां बजबजा रही हैं और पड़ोसन ने अपने मुन्ने को घूरे पर बिठा दिया है निपटान को!

Mired Mirage ने कहा…

माटी की गन्ध तो ठीक है, परन्तु पसीने की ? वैसे सुना है अलग अलग नस्ल की अलग अलग गन्ध होती है।
आप तो कैनेडा रहकर भी अपनी माटी कि गन्ध लेने भारत व अपने गाँव पहुँच जाते हैं, मैं तो भारत में रहते हुए भी उस गन्ध को केवल मन में बसाए हुए हूँ वहाँ जाकर सूँघ नहीं पाती। आपने मुझे भी उसकी याद दिला दी।
घुघूती बासूती

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

आपको समझने की गलत फ़हमी पाले रहते है । इस लिये टिप्पणी करते है । कई बार तो एसा लगता है कि हम तो टिप्पणी के लायक भी नही है । आपकी इस भाव पूर्ण लेखनी को मेरा प्रणाम ।

Shastri ने कहा…

"ऐसे आँसू, जो किसी को नहीं दिखते"

जीवन में ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनको शब्दों में उतारना मुश्किल है. इसके बावजूद आपके इस आलेख ने आपकी भावनाओं को सफलता के साथ व्यक्त किया है.

हम सब के साथ इस तरह की कुछ न कुछ बातें हैं.

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

निवेदिता ने कहा…

ha yaha raho to waha ki yaad to aati hai.
bariya likha hai bahut hi

निवेदिता ने कहा…

yaha raho to waha ki yaad aati hi hai.
bahut bariya likha hai

मीत ने कहा…

बाहर निकलते ही गर्म हवा का भभका और साथ घुली पसीने की खुशबू-(लिंडा उसे बदबू की संज्ञा दे गई-बेवकूफ!!)
तब तो सचमुच में लिंडा जी पसीने का स्वाद भी नहीं जानती होंगी...
बहुत ही भावनात्मक लेख
मीत

Shefali Pande ने कहा…

hazaron ....lakhon buraiyaan ho....maan fir bhi maan hai .... very touching post..

Harkirat Haqeer ने कहा…

समीर जी एक बात कहूँ ...? आपकी इतनी अच्छी पोस्ट मैंने पहले नहीं पढ़ी.....हो सकता है मैं आपके ब्लॉग पे देर से आई होऊं .....पर लाजवाब शब्द व्यंजना .....और बेहतरीन अभिव्यक्ति.....

ऐसे आँसू, जो किसी को नहीं दिखते. दिखती है तो सिर्फ मेरी वो मुस्कराहट और आती है सिर्फ मेरे उस कोलोन की खुशबू, जिसमें दफन किये फिरता हूँ अपने इन आँसूओं को और उस गांव वाली पसीने की बू को. ...

दर्द में भी खूबसूरती होती है.....वह सहानुभूति बटोरने के लिए नहीं लिखा जाता ......!!

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

अद्भुत!
इतनी बड़ी इमारत...और ऐसा लेख..!!
क्या कहूँ? केवल एक ही शब्द है..शानदार

परमजीत बाली ने कहा…

अपने भीतर के एहसास को शब्दों से बाँधनें में आप का जवाब नही समीर जी।माँ तो मरते दम तक भीतर जिन्दा रहती है।उस का द्लार-लाड कब भूल पाता है आदमी।बहुत बढिया भावपूर्ण आलेख लिखा है।भाव विभोर कर गया....

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

"कमबख्त, पसीने की बू नहीं जाती!!!"
पढ़ी, अनुभव की, चिंतन किया और पाया कि आप जैसा संवेदन शील व्यक्ति विश्व नहीं ब्रह्माण्ड के किसी भी छोर में रहने चला जाए, लेकिन उसकी "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसे" वाली भावना कभी नहीं बदलेगी, ये मैं आपके पुराने आलेखों में व्यक्त की गई भावनाओं के आधार पर भी कह सकता हूँ. धन्य हैं आप, आपके माता-पिता और आपकी जन्मभूमि जिसने आप से कहला दिया :-

" वो नाक पर रुमाल रखे तलाशती थी उस भारत को जिसके दामन से आने वाली हवाओं को सलाम करने का जी चाहता है वो उसे कहाँ दिखाता ? उसे कैसे बताता कि यही वो दामन से उठने वाली हवा है, यही वो माहौल है जो मुझे वापस बुलाता है..मुझे मेरा अतीत याद दिलाता है. मुझे मेरा अपना लगता है. मेरा दिल इन्हें ही सलाम करने को मचलता है. वो नहीं समझेगी."
मैं तो आपकी भावनाओं को नमन करता हूँ और ऐसा ही सारे अनिवासी भारतीयों से भी अपेक्षा करूँगा कि वो भी हमारे समीर भाई जैसी सोच को अहमियत दें.
लिखना तो बहुत चाहता हूँ मगर समीर जी के लिए जितना लिखूँगा उतना कम है.
- विजय

अक्षय-मन ने कहा…

aapke ehesaason aur aaapki bhavnaaon ko mera naman......
adbhut lekh.....
अक्षय-मन

राम त्यागी ने कहा…

समीर जी वास्तविकता से परिचय करा दिया, में भी बाहर रहता हु पर हर पल इंडिया जाने की सोचता रहता हूँ, शायद आपने मन की अन्त्रस्थिति का सही चित्रांकन किया है. आपकी आवाज हम जैसे और कई लोगो की आवाज है , आपके अन्दर और भी दर्द है, बाट लेते है उसको, और चलो चलते है अपने उसी महान देश को वापस, जन्मभूमि को कुछ देते है, सुधर एसा करें की लिंडा भागी भागी आये हमारे पास ...

कौतुक रमण ने कहा…

समीर जी,

यह बू तो अब साथ ही जायेगी. बहुत सारी बातें आपने कही, एक एक पंक्ति बहुत कुछ कह रही थी.

आपके लिखने के अंदाज का तो पहले से ही कायल हूँ. एक और बधाई.

सादर
कौतुक रमण

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

मन नही मानता यह एक कहानी है

प्रवीण जाखड़ ने कहा…

अपना गांव, अपना देस, अपना ही होता है। आपका शब्द चित्रण हर बार चित्र उकेर देता है। भाव दृश्य खींच देते हैं। जितना मैं महसूस कर पाया हंू आप जितना दिल में उतर कर लिखते हैं, आपके शब्द उतने ही चित्रों में बदलने लगते हैं। आप अपनी माटी से हमेशा ऐसे ही सौंधी महक लेते रहें। शुक्रिया।

राज भाटिय़ा ने कहा…

समीर जी बहुत सुंदर लिखा, सच कहूं तो एयर पोर्ट से बाहर निकलते ही सब अपने से लगते है, चाहे शोर शराबा हो, लेकिन कानो को अच्छा लगता है....हम यही तो इसी जमीन पर खेल कर तो पले है, जेसे मां की गोद हॊ, मुझे बहुत अच्छा लगता है.
धन्यवाद

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ ने कहा…

माँ और धरती का दोनों के अवदान से कभी कोई उरिण हुआ है? । उधौ मोहें ब्रज बिसरत नाहीं जैसी अवस्था का कभी न कभी निर्णय तो करना ही होगा।

●๋• सैयद | Syed ●๋• ने कहा…

आपके लिखे हुए किसी भी पोस्ट पर कोई टिप्पणी कर सकूँ, ऐसा सामर्थ्य मुझमे नहीं है... बस इतना ही कहूँगा.... बेहद भावुक पोस्ट.....

Mahesh Sinha ने कहा…

जाती नहीं यादों से वो गाँव की खुशबु

PN Subramanian ने कहा…

इस मद्रासी के पास शब्द नहीं हैं आपके लेखनी की तारीफ के लिए. हाँ हमने येम्पेथाइस कर कुछ अश्रु बहा लिए. हम भी तो परदेश में ही हैं अपनी माँ से दूर.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

अद्‍भुत अभिव्यक्ति प्रवासी संवेदनाओं की। साधुवाद।

venus kesari ने कहा…

बहुत मार्मिक चित्रण किया आपने
वीनस केसरी

शोभना चौरे ने कहा…

aap apni har post me apni mitti se jude hote hai bhutkask hai bhart se dur jane ki ye kask hi apno se jodne ki kdi hoti hai .parntu kya yha ka rhne valo ke man mebhi itni kask hoti hai videsh me basne valo ke liye ?
ha bhut achhi post pdhne ko mili .
abhar

विनीता यशस्वी ने कहा…

Bahut hi dil ko chhu jane wali post...

amit ने कहा…

घर/वतन से दूर जाने पर ही जीवन में उसकी असली अहमियत का एहसास होता है, यह आज आपने भी व्यक्त कर डाला! :)

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi ने कहा…

बहुत भावुक क्षण।


भारत से लौटने के बाद आपको अधिक खालीपन महसूस हो रहा लगता है।


काम कम है क्‍या इन दिनों :)

Nitish Raj ने कहा…

समीर जी,
सबसे पहले तो ये कि आपकी शैली मुझे पसंद है(डॉ अनुराग की भी पढ़ना पसंद करता हूं, कई और भी हैं) एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्म हवा का भभका और साथ घुली पसीने की खुशबू-(लिंडा उसे बदबू की संज्ञा दे गई-बेवकूफ!!)
पढ़ते हुए अंत तक आते-आते ये सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि कैसे और कब तक हम दोहरी जिंदगी को सलाम करते रहेंगे। पर शायद कई बार ये ही हिस्सा हो जाती हैं अपना।
दिल किया तो बोल दिया क्योंकि आज शीशे में जाकर देखा तो अपना अक्श नहीं दिखा शायद आंखें बह रहीं थी, एक नांव में ही तो सवार हैं.......

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

समीर जी,
बहुत बढ़िया लेख....
समकालीन ग़ज़ल पत्रिका का प्रकाशन हो गया है...आप के सुझावों की बहुत आवश्यकता है।स्तम्भ कैसे हैं ?जरूर बतायें....

Prem Farrukhabadi ने कहा…

समीर भाई,
मैं भी और ब्लोगरों की तरह तारीफ़ किये बिना
नहीं रह सकता हूँ,क्योंकि आपका वर्णन एक चित्रण है इसमें कोई भी पाठक रमण किये बिना नहीं रह सकता.लेख की जितनी तारीफ की जाय कम है. दिल से बधाई.

रंजन ने कहा…

बहुत खुब लिखा समीर जी..

हम जैसों के तो पसीने पढ़ते पढ़ते छूट गये..:)

डॉ .अनुराग ने कहा…

अक्सर आपके श्रेष्ट लेखो में देरी से पहुचता हूँ .फिर पता हूँ इस पचास पार के व्यक्ति में अब भी किसी रात वो बच्चा जगता है .ओर अपनी जड़ो को खोजता है ...उसे आराम की तलब भी है ओर उस जड़ से लगाव भी....तो असल समीर कभी कभी जगता है...देर रात ......
गांधी के बाद आपका दूसरा लेख जिसे संजोना चाहूँगा ....... - निदा फाज़ली साहब का एक शेर आपके लिए छोडे जा रहा हूँ

"बस्तियों में कहाँ गुन्जाइशे जंगल जैसी
ये इलाका था पहले बसेरा सबका '

संजय सिंह ने कहा…

किसी वस्तु -विशेष की कमी या न होना ही उसके सही महत्व का अंकन करता है.
और पने तो देश और देश की मिट्टी की बात की है .................
बहुत अच्छा लिखा हैआ आपने

Durwasa ने कहा…

एक शब्द 'गोड़' के प्रयोग ने ही बता दिया कि उड़न तश्तरी की ज़मीनी हक़ीकत क्या है। वैसे भोजपुरी का यह देसज शब्द मध्यप्रदेश वाले की शब्दावली में कैसे समाया?
yeh gode shabd MP aur Chhatisgarh me bhi prachalit hai, jaise 'gode lagu' aur 'gode pirat hai' matlab paye lagoo aur pair me dard hai ...

sameer bhai aap ka lekh bahut hi jabardast hai, app Canada me baith kar hame Bharat darshan karwa dete ho, bahut khoob! lage raho Pintu Bhai...

Atmaram Sharma ने कहा…

मार्मिक पोस्ट. साधुवाद.

अल्पना वर्मा ने कहा…

कितना भी दूर रहें ---दिल से अब भी अपनी ज़मीन से जुडे हैं हम Non[Not]-resident[required]Indians!
भावभरी पोस्ट.

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

बहुत ही मर्मस्पर्शी आलेख। पर बचपन की यादों के नाम पर गन्दगी और बदबू को 'ग्लोरिफ़ाइ' करना कुछ जमा नहीं। जो लोग उन गन्दी बदबूदार बस्तियों में रहने को मजबूर हैं वे भी पहला मौका मिलते ही साफ़-सुन्दर बस्तियों में बसना चाहेंगे।

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

आपकी संवेदना प्रणम्य है महाराज....

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... कहानी तक तो ठीक है लेकिन कहानी में भी इस तरह की नकारात्मक अभिव्यक्ति बेहद निन्दनीय है, एक विकसित शहर के हालात की तुलना एक पिछडे गाँव के हालात से करना बुद्धिमानी नही है। ... तपतपाती गर्मी और एयरकंडीशन की आपस मे तुलना करना ...??? .... लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूँ पर ..... !!!!

Udan Tashtari ने कहा…

@ Shayam Koriji

Aap apni puri baat to kahiye..aap to bich me hi ruk gaye..is par kya jawab den?

Jo kuch kahna chahte hain, kah hi daliye..humne bhi to kah hi diya. Phir aage baat karte hain. :)

Intezaar me

Sadar

Sameer Lal

PRAN SHARMA ने कहा…

SAMEER JEE ,
AAPKEE LEKHAN-PRATIBHA
ADVITIY HAI.PATHAK AAPKE DEEWAANE
KYON NAHIN HON?PADYA AUR GADYA
DONO MEIN CHUMBKIY SHAKTI HAI
AAPKE.

neera ने कहा…

beautiful! touching!

नदीम अख़्तर ने कहा…

कृपया इसे कमेंट में प्रकाशित न करें। यह स‌िर्फ व्यक्तिगत बात है, जो मैं आपसे बांटना चाहता हूं और किसी स‌े नहीं।
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जब मैं आपका आलेख पढ़ रहा था, तो अपने दफ्तर में बैठा था। रांची में। यह एक छोटा स‌ा शहर है झारखंड का। शुरुआत में तो मैं विदेश स‌े होता हुआ भारत पहुंचा, फिर आपका गांव का वर्णन मुझे स‌ुदूर गांव ले गया, लेकिन जब विदेश गया और मांग के दिये हुए रुपये का जिक्र आया, तो यकीन जानिये कि मुझे बाथरूम में जाकर शीशे में देखना पड़ा कि क्या मेरी आंखें भी गीली हुई हैं। पता चला कि आंख के नीचे एक काली धारा बनी हुई है, जो पता नहीं कब आंसू के रूप में आयी और स‌ूख भी गयी। कहने का अर्थ ये है कि मैं आपकी दो तीन रचनाओं में अपनी भावनाओं को चाह कर भी नहीं रोक पाया। कोशिश करता हूं कि आपके ब्लॉग में न आऊं, नहीं तो मेरे पास खुद को पूरी तरह स‌ंतुलित रख पाने का कोई तरीका नहीं बच जाता। बहुत कम ही लोग ऎसे होते हैं, जिनकी रचनाएं पढ़ने के बाद आदमी भावुक होता है। मुझे याद है कि मैंने बचपन में स्कूली किताब में प्रेमचंद की लघु कथा ईदगाह पढ़ी थी। उसमें हामिद का बूढ़ी मां के लिए गांव में लगे ईद के मेले स‌े चिमटा खरीदकर ले जाने वाला प्रसंग मुझे बहुत दिनों तक रुलाता रहा था। आपकी कुछ रचनाएं उसी की तुलना में हैं। आप इसे भले ही अतिश्योक्ति स‌मझें, लेकिन यह मेरी अपनी राय है, जिसे आपके स‌ाथ स‌िर्फ इसलिए बांट रहा हूं, क्योंकि इसे मन में रखकर जाना भी नहीं हो पायेगा। खैर, आपसे तो बहुत दूर हूं....क्या लिखूं...।।।

Dr.T.S. Daral ने कहा…

कहीं न कहीं बहुत दर्द छुपा हुआ दिखाई दे रहा है समीर जी. क्या अच्छा है , क्या बुरा है,क्या खोया क्या पाया, शायद इसी असमंजस में हर अप्रवासी भारतीय फंसा रहता है. लेकिन कहीं भी रहें हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए. कितना अच्छा हो यदि हम दोनों सभ्यताओं को मिला कर रह सकें. आज के नौजवानों के लिए कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं :

ये कैसी भेड़ चाल है, ये कैसा भ्रम जाल
क्यों अपनी चाल को भूलकर,हंस चला कौव्वे की चाल

अपना देश, धर्म और संस्कृति को क्यों छोडे जाते हो
अरे वलेंटाइन तो याद है, पर खून के रिश्तों को तोडे जाते हो

बहुत मार्मिक लेख है.

Nirmla Kapila ने कहा…

ितनी भाव मय रचना तो वही रच सकता है जिसने इस पसीने की बू को जी कर देखा है लिन्डा जेसै पत्थर के टुकडे क्या जाने गीली मिट्टी अपने अन्दर क्या संजोये रहती है बहुत ही लाजवाब रचना है जिसे कोई संवेदनशील मन ही लिख सकता है आभार्

SHUAIB ने कहा…

बहुत ही पाकवसाफ़ लेख है।

मुसाफिर जाट ने कहा…

समीर जी, रामराम
देखो हम आपको और जला रहे हैं. वहां आपको कोई रामराम जी कहने वाला तो होगा नहीं.

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बहुत अच्छा समीर जी,अत्यंत भावपूर्ण प्रस्तुति,धन्यवाद

भाव छिपा है देश प्रेम का,
आपके इस आलेख मे,
भुला नही पाएँगे हम
अपने प्यारे देश मे,
निज लोगो की बातों को,
गाँव की उन सौगातों को,
जिसमे केवल प्यार से भरा है,
मन का आँगन हरा भरा है,
लगे किसी को चीज़ बुरी तो
उसकी बात नही करते,
हम को अपनी चीज़ सुहाती,
पसीने मे भी खुश्बू आती.

SWAPN ने कहा…

sameer ji , der se aaya hun , aapka lekh poora padha jaise ek kavita padhta chala gaya, aapke lekhan style ka jawaab nahin.

राकेश जैन ने कहा…

really..very touching>>>

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

जब रुलाने लगते हो तो बहुत ज्यादा रुलाते हो.

AlbelaKhatri.com ने कहा…

sameerji,
mujh jaise patthardil aadmi ki aankhen aur aankhen hi kya samoochi chetna ko nam kar dena koi hansi khel nahin hai, bade bade maarmik aalekh ye kaam nahin kar paaye, lekin aapne toh rula diya yaar ! rula diya us aadmi ko ...jo jaanta hi nahin ki roya kaise jata hai...

bhai mere.......bhai isliye kah raha hoon ki is se zyada samman janak sambodhan mere pas hai hi nahin . jab main aadarneey ityaadi likhta hoon toh vah duniyadari ke lihaz se kihta hoon lekin jab main kisi purush ko bhai aur mahila ko didi kah deta hoon ....toh samjho baat khatma ho gayi...vo mere liye sarvaadhik mahatvapoorna hote hain./
so bhai mere.....aapki sakriyata aur vidvata ko toh main pahle bhi maanta tha....lekin aap kitne samvedansheel maanav aur raashtrapremi bharteey hone ke saath kitne samarth lekhak hain ,iska anubhav mujhe aaj hua hai...
MAIN AUR MERI SAMOOCHEE PRATIBHA AAPKO HRIDAY SE PRANAAM KARTE HAIN AUR AAPKE HIT ME HAARDIK MMANGAL KAMNA PRESHIT KARTE HAIN
waah
waah
waah
waah

दिलीप कवठेकर ने कहा…

मैं आपके मन में उमड रहे ज़ज़बातों और उसके पीछे छीपी वेदना की अभिव्यक्ति का कायल हो गया हूं

हमारी संवेदनायें, हमारी मूल्यों को सहेजने की झटपट और खटपट , और साथ ही हमारे मौजूदा परिवेष का अजनबी एहसास.क्या खूब एक ही पोस्ट में कह डाला है.....

Ganesh Prasad ने कहा…

अगर मैं ये करू की आज से मैं आपका पंखा हो गया तो हसियेगा नहीं...

पूरी पोस्ट पढ़ी और सरे कमेंट्स, इतना काफी है एक फेन बनाने के लिए... हम भारत में रहकर भी "क्लोन लगाते" है.
और आप ....

स्वप्न मंजूषा शैल ने कहा…

बहुत ही भाव-भीनी रचना, मन को छू-छू गयी, बिलकुल हमारे मन की बात कह दी आपने, इस अहसास को लिए हम भी आपके साथ ही सफ़र (suffer) कर रहे हैं,

हम सिर्फ इतना ही कहेंगे :

वो दिन भी क्या दिन थे जब पसीना गुलाब था
अब तो गुलाब से भी पसीने की बू आती है

neera ने कहा…

पिछले सप्ताह पढा था ..मुझे बहूत अच्छा और दिल के करीब लगा ...आज आपको बताने का मौका मिला है ..

arun c roy ने कहा…

sameer ji... aapki kafi cheeje padhin hain lekin... dil ko jiti iss aalekh ne chua hai... kissi aur ne nahi... hum bihar se dilli me aakar bhi aisa hi mehsus karte hain... apna wajood, apni pehchhan ...ab apne desh me bhi reh kar bachana mushkil ho raha hai... adbhud.. aapki aisi sensitivity sabko mile ...

राजेश उत्‍साही ने कहा…

समीर जी आज परिकल्‍पना उत्‍सव में आपकी यह पोस्‍ट पढ़ने का मौका मिला। सचमुच हमारे पसीने की यह बू ही हमारी थाती है,हमारी पहचान है। हम बेवजह इसे तमाम तरह की बनावटी खुशबूओं से छिपाते रहते हैं। इस बहाने आपने हमारी जड़ों की कितनी सारी बातें कह दीं। जिनके बारे में हम जरा सा जमीन से ऊपर उठते ही भूल जाते हैं। बधाई।

sangeeta swarup ने कहा…

बहुत बढ़िया पोस्ट....अच्छा हुआ जो यहाँ पोस्ट की गयी...वरना पढने से रह जाती....मन की संवेदनाओं को खूब उकेरा है....मन को छू गयी आपकी ये पोस्ट....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Sameer Bhai ... Dubara PARIKALPNA mein padh kar mazaa aa gaya ... Chaa gaye guru aap to ...

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

परिकल्पना उत्सव का अंग हो गई इस पोस्ट को पढ़ने दुबारा आया ! श्रेष्ठतम ! आभार ।