सोमवार, नवंबर 24, 2008

तुम तो बस नारे लगाओ!!

वाशिंग्टन से वापस टोरंटो आना था. सुबह नाश्ता किया, जरा हेवी सा हो गया तो लंच गायब कर दिया. सोचा, एयरपोर्ट पर कुछ बर्गर वगैरह खा लूँगा फिर रात घर पहूँच कर तो खाना ही है.

४ बजे जहाज..घर से १५ मिनट की दूरी पर एयरपोर्ट. एक घंटे पहले चेक इन. अतः घर से २.३० बजे घर से निकल लिए. रास्ते में ट्रेफिक. एयरपोर्ट पहूँचते ३.२० हो गया. भागते भागते बोर्डिंग गेट पर पहूँचे. बोर्डिंग एनाउन्समेन्ट चल रह था. जल्दी से चेक ईन किया और घुस लिए जहाज में. वाशिंग्टन से ऑटवा. १ घंटे ४५ मिनट की फ्लाईट. फिर वहाँ २ घंटे रुक कर १ घंटे की टोरंटो की.

हवाई जहाज ऐसा कि मानो दवा वाली केपसूल. बीच में गली और दोनों तरफ दो दो सीटें. कुल मिला कर ३६-४० सीटें और बैठने वाले २५-२६ लोग. हमें लास्ट के कोने में सीट मिली बाथरुम के सामने. छोटा हवाई जहाज तो छोटी छोटी सीटें. हम बैठ गये तो जिसे हमारे बाजू में सीट मिली थी, वो आया और हमें देख और बची जगह का अनुमान लगा लगभग घूरता सा दूसरी खाली सीट पर जा बैठा. हम भी पूरा पसर लिये और खींच तान कर सीट पेटी बाँध ली. फैजाबाद से गौंडा तो जा नहीं रहे कोई जीप में बैठकर कि आधा बाहर टंग कर बैठ लें.


Picture Air Canada Jazz



बहुत ही खराब मूँह बनाया था उसने दो छोटी छोटी सीटों में हमें एडजस्ट होता देख कर, मानो उसका दिया खा रहे हों. मन तो किया कि उठ के दो चमाट रसीद कर दें कि एक तो तेरे पास खाने को कुछ है नहीं. मरसिड्डा सा धरा है और हमारी सेहत पर नजर लगाता है. अरे खुद कमाते हैं और खाते हैं, तुझे क्या.

बचपन से हमारी अम्मा से सब हमारी तारीफ करते थे कि कितना तंदरुस्त बच्चा है. अम्मा फूली न समाती और तू नजर लगाता है. अम्मा हमें ठिठोना लगा देती थी काजल का कि किसी की नजर न लग जाये.

बस, अम्मा कि याद हो आई. न जाने कहाँ होगी, कौन दुनिया में. याद भी करती होगी कि नहीं. क्या पता? बस, उसी याद में मन किया और जेब से काली स्याही वाला डॉट पेन निकाल कर कान के पास एक ठो ठिठोना बैठा लिए खुद ही से. बुरी नजर से बचे रहें.

अब भगवान का दिया ऐसा रंग कि कोई जान ही न पाये कि ठिठोना लगाये बैठे हैं और काम भी बन गया कि बुरी नजर से बचे. ईश्वर का बड़ा धन्यवाद किए. ऐसे भाग सबके कहाँ?

ठिठोने ने रक्षा की, तबीयत खराब होने से बच गये. उस मूरख का वो खुद जाने हमें क्या. हम तो हवाई जहाज उड़ने के इन्तजार में लग गये.

हवाई जहाज रन वे पर आकर लाईन में लग लिया. देखते देखते घंटा गुजर गया मगर हवाई जहाज लाईन में ही लगा रहा. बहुत मुश्किल से जहाज उड़ा और चल पड़ा ऑटवा की तरफ मूँह उठाये, अमरीका की राजधानी से कनाडा की राजधानी के लिए.

हम भूखाये परिचारिका के खाना लाने का इन्तजार करने लगे हालांकि खरीद कर खाना था मगर भूख से अंतडियां टेढ़ी हुई जा रही थी. हम आखिरी सीट पर. जब तक हम तक वो पहूँची उसके पास सिर्फ ३ बीफ सेंडविच बचे. हालांकि चढ़े ५ वेजेटेरियन, दो चिकिन और बाकी बीफ के थे. मगर कुछ ईश्वर कृपा से और कुछ इन भड़काऊ लोगों के बयानों से जो दिन रात चिल्लाते रहते है कि शाकाहारी खाओ, स्वर्ग पाओ. शाकाहार से वास्ता...स्वर्ग का रास्ता.७ शाकाहारी और चिकिन खाने वाले मिल गये न हमारे पहले ही २६ लोगों की मात्र जनसंख्या में. अब हम क्या खायें??

हम ठहरे शुद्ध हिन्दु-भूखे मर जायें मगर बीफ, जानते बूझते तो न ही खा पायेंगे, भले चिकन खा लें..खा क्या लें, खा ही लेते हैं मगर बीफ..न जी न!! ऐसा नहीं कि स्वाद बुरा होता है. एक बार चिकिन के झटके में खा लिया था. लगा तो बड़ा टेस्टी था, दूसरा लेने गये तब पता चला कि बीफ है. तो अब गंगाजल तो यहाँ मिलने से रहा. बीयर से मुखशुद्धि की और सकॉच से अँतड़ियाँ. तब जाकर बैचेन दिल को करार आया और फिर चिकन खाया तो पेट को कुछ बेहतर लगा था..

भूख ऐसी लगी थी मगर मना कर दिये कि मोहतमा, बीफ तो न खा पायेंगे. एक गिलास पानी ही दे दो, कुछ तो जाये पेट में.

इतना गुस्सा आ रहा था इन शाकाहारी जलूसियों के उपर..और नारे लगा लो. बनवा दिये न ५ ठो यहाँ पर भी. अब हम क्या खायें..बोलो. ला कर दो खाना हवा में. हल्ला बस मचवा लो तुमसे, इन्तजाम करने बोल दो तो कहाँ से आओगे हवा में..बताओ.

ये हाल तो हुआ तब, जब मात्र २६ लोग थे. अगर पूरी दुनिया तुम्हारे बहकावे में आ गई तो एक दिन सब मरेंगे ऐसे ही हमारी तरह भूखे. अरे भाई, ईकोलॉजिकल बैलेंस ठीक रखने के लिए जहाँ कुछ शाकाहारी आवश्यक है, वहीं मांसाहारी भी. ऐसे ही चलती है दुनिया, काहे हल्ला मचाते हो बिना सोचे समझे. वो तो हमारे जैसा ही शरीर है जो झेल गये वरना तो तुम्हारे चक्कर में वाकई स्वर्ग की प्राप्ति हो लेती आज तो.

उस पर से छोटा सा हवाई जहाज. हिचकोले लेते ऐसे चल रहा है जैसे बिना मध्य प्रदेश की रोड याद दिलाये आज मानेगा नहीं. एकाएक एनाउन्समेन्ट हुआ कि सब पेटी बाँध लें, सामने तूफान आ रहा है. ये लो, हम तो समझ रहे थे कि हिचकोले तूफान के कारण है मगर वो तो अभी आ रहा है, अब तो भगवान ही मालिक है.

आँख बंद करके लगे पूजा करने कि प्रभु, बचवा लियो आज. कहीं जहाज गिर विर पड़ा तो ये हवाई जहाज वाले तो कम से कम हमारे केस में मेडीकल रिपोर्ट से सिद्ध कर ही लेंगे कि भूख से मरा है, हावई जहाज गिरने से नहीं. अतः घर वालों को नो मुआवजा.

मुआवजे की तो छोड़ो, वजन की वजह से कहो मरणोपरांत आक्षेप लगा दें कि इनके वजन के कारण गिरा है जहाज, अतः घर वाले जुर्माना भरें. अमरीका है भई!! अपने फायदे के लिए जब सद्दाम को चूहे के बिल से पकड़ा दिखा सकता है तो हमारी क्या बिसात.

बस ऑटवा पहूँच ही गये जैसे तैसे. लेट हो गये तो ऑटवा में भी भागते ही अगला हवाई जहाज पकड़े. फ्लाईट कम समय की होने के कारण-नो फूड. जय हो!!

बस, किसी तरह भगवान से मनाते भूखे प्यासे सिंगल पीस घर पहूँचे तो आपसे मुखातिब हो पा रहे है वरना तो उड़न तश्तरी फुस्स्स्स्स्स्स होने में कोई कसर न थी. Indli - Hindi News, Blogs, Links

86 टिप्‍पणियां:

हिमांशु ने कहा…

"किसी की नजर न लग जाये."
इतना उर्जस्वित लिखते हैं और 'ह्यूमर' के साथ कि वाह तो कहना ही पड़े.
लिखने का हौसला बढ़ता जाता है हम नए लोगों का, आप को पढ़कर .

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

अभी कनाडा में ही चक्कर लगा रहे हैं? चक्कर क्या है? ...हम तो आपको भारत में घूमता हुआ समझ रहे थे। ...शायद पुराना माल ठेल दिए हैं का? :)

वैसे लिखा आपने चौचक है...। शुक्रिया।:D

ranjan ने कहा…

अच्छा किया अम्मा का बताया टीका लगा लिया.. वरना नजर लग जाती तो?

"बियर से मुख शु्द्धी की"... ठाठ है साहब.. मुह साफ करने को भी बियर.. जय हो..

Arvind Mishra ने कहा…

समीर भाई आप हैं कहाँ ? मैं तो आपकी राह बनारस में देख देख उकता गया .!

Manoshi ने कहा…

बहुत हँसाया समीर आपने। आ गये क्या वापस आप? इतनी जल्दी?

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

समीर भाई ,
आजकल सच मेँ
हवाई यात्रा एक त्रासदी बन गई है :(
उपर से कुछ खाने को भी नही मिलता :-(
हम तो बिना
घर की रोटी /पराँठा लिये
निकलते ही नहीँ -
बुरी नजरवालोँ से खुदा बचाये रखे :)
स्नेह,
- लावण्या

आलोक ने कहा…

अगली बार मट्ठी और अचार ले के निकलना और सबको दिखा दिखा के खाना।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

इस बला की भूख पर वारे जाएँ साहब, यह हम जैसे लोगों को खुदा ने बख्शी है, वर्ना डाक्टर के यहाँ बहुत लोग कहते हुए आते हैं, भूख नहीं लगती। जरा इसे संभाल कर रखिएगा।

रविकांत पाण्डेय ने कहा…

खुदा का शुक्र है कि आप सही-सलामत घर पहुँच गए। कहते हैं ना कि अंत भले का सब भला।

अशोक मधुप ने कहा…

भाई बहुत बढ़िया लिखा है। मजा आ गया।बधाई

अशोक मधुप ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है। मजा आ गया। बधाई

अशोक मधुप ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है। मजा आ गया।

"अर्श" ने कहा…

माँ के अनुसार टिका लगा लिया बढ़िया किया वरना नज़र लग ही जाती ... बहोत बढ़िया लिखा है अपने...ढेरो बधाई आपको...

seema gupta ने कहा…

अम्मा फूली न समाती और तू नजर लगाता है. अम्मा हमें ठिठोना लगा देती थी काजल का कि किसी की नजर न लग जाये.
"bhgawan kre aaj bhi kisee ke nazarna lge... magar confusion hai.... canada ya india... jhan bhee hain khuda aapko slamat rke.."

Regards

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

कहो मरणोपरांत आक्षेप लगा दें कि इनके वजन के कारण गिरा है जहाज, अतः घर वाले जुर्माना भरें. अमरीका है भई!! अपने फायदे के लिए जब सद्दाम को चूहे के बिल से पकड़ा दिखा सकता है तो हमारी क्या बिसात.

शानदार और रोचक व्यंग ! बधाई ! पर आप कौन से भारत में हो अभी तक ?

रचना ने कहा…

padhane mae majaa aayaa aur pura padha jo aap kae laekhan ki saflataa haen

संगीता पुरी ने कहा…

इंडिया में हैं या कनाडा में या फिर अमेरिका में ? मन नहीं लग रहा है क्‍या यहां ?

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

घर पहुंच कर क्या खाया; ये भी तो बताते।:)

बवाल ने कहा…

हा हा लाल साहब बहुत ख़ूब !
इस पर ये शेर पढ़ें ज़रा ---
सुड्ड्ते थे भूख से हम, बिलबिला कर यान में !
और तुम खाया किए, गुल को मिलकर पान में !!
बस अब बम्बई (हमसे मुंबई बोलते ही नहीं बनता हा हा) से सरज़मीने-जबलपुर की यात्रा का वर्तांत (वृतांत) भी सुना डालें जी शुभस्य-शीघ्रम. देखिये कुछ लोग कन्फ्यूज़ हो रहे हैं, आप पाए कहाँ जाते हैं अभी ?

mehek ने कहा…

ha ha bahut badhia,agli baar jeb mein sandwich pack karke le jana ghar se hi:):).

संजय बेंगाणी ने कहा…

हँसते हँसते भूख लग आयी है. कुछ खा कर आता हूँ. :)

Zakir Ali 'Rajneesh' ने कहा…

सुना है आजकल आप भारत भ्रमण पर निकले हैं। अगर लखनउ आने का प्रोग्राम हो, तो जरूर बताएं, मिलकर प्रसन्नता होगी।

Parul ने कहा…

kam log itni muskuraahaten baant paatey hain...sameer ji ...:-)

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

हँसते हँसते कट गए रस्ते :) नजर वाला टीका तो अभी भी लगवा ले आप ..

PN Subramanian ने कहा…

वाकई मज़ा आ गया. गनीमत है कि ओटावा में रुकना नहीं पड़ा. वेग्गी कि बात चली तो हम बता देन कि यहाँ १२० लोगों का डेलिगेशन विभिन्न देशों से आया था, एक वर्ल्ड कान्फरेन्स के लिए. १०० लोग शुद्ध शाकाहारी. दूध, दही, मक्खन, घी, चीज़, पनीर कुछ भी नहीं चलता. जितना चिकन खाना है अभी खा लो बाद में ना जाने हड्डी लेस चिकन बाज़ार में मिले ना मिले. आभार.

मीत ने कहा…

अरे ये उड़न तश्तरी ऐसे फुस्स्स्स्स्स्स होने वाली नहीं है...
इसके कान के पीछे ठिठोना जो लगा है...
वो भी अम्मा का..

cmpershad ने कहा…

अच्छा किया ठिठोना लगा लिया। बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला - कहीं मेरे लाल का समीर न उड़ जाय!

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

पढ़ते पढ़ते भूख लग गई! टेबल पर रखे बिस्कुट/नमकीन का कल्याण कर दिया। बस नजर न लगे, यह मना रहे हैं।
बढ़िया पोस्ट।

Anil Pusadkar ने कहा…

उडन तश्तरी आखिर उड़ कहां रही है।भारत मे कनाडा मे या अमेरिका में।

अशोक पाण्डेय ने कहा…

ईश्‍वर का शुक्र है कि उड़न तश्‍तरी फुस्‍स होने से बच गयी..लगता है अमरीकियों को हमारा खाना पीना नहीं सुहा रहा है :)

परमजीत बाली ने कहा…

समीर जी,अच्छा हुआ हवाई जहाज मे आपको कुछ खाने को नही मिला।इसी बहाने वजन जरूर कुछ कम हुआ होगा। वैसे काले टीके के बहानें माँ का दुलार शायद आदमी मरते दम तक नही भूल सकता।आप की यह पोस्ट भी बहुत अच्छीऒ लगी। भले ही आप को सफर मे तकलीफ सहनी पड़ी।:)

समयचक्र - महेद्र मिश्रा ने कहा…

जब आपको भूख लगी थी तभी आपको नारे लगाना शुरू कर देना था . वगैर नारों के आजकल कुछ नही होता . वैसे हमारे देश में चुनाव का माहौल चल रहा है . आप जोर जोर से नारे लगाते तो तो सभी लोगो को पता भी चल जाता कि अपने भाई उड़नतश्तरी जी भारत के है . खैर छोडिये अब अब भारत में है खूब नारे लगाये . हा हा बहुत आभार..

कुश ने कहा…

ऐसे लेखन के लिए तो वाकई एक काला टीका लगाना चाहिए

Dr Prabhat Tandon ने कहा…

शुक्र है कि खबर बनते-२ रह गई :)

yaksh ने कहा…

thithona bachaye buri nazar se,kudne do salo ko,aap to jara sehat ka khayal rakho..

मयंक ने कहा…

उड़नतश्तरी महाराज आजकल और अधिक चमत्कारी और भ्रमकारी होते जा रहे हैं...
पहले पोस्ट लिख कर तान दी कि भारत में लैंड करने वाले हैं.......फिर एक पोस्ट में तो विमानपत्तन की कथा भी बांच डाली और अब ससुर अगली पोस्ट का इंतज़ार करते करते अँखियाँ पथरा गई तो एक नई ही कहानी सामने कि वाशिंगटन से ओटावा .....????
ऐसा है पहले तो अगली पोस्ट में स्पष्ट करें कि अभी हैं कहाँ ......फिर बताएं कि भारत आए थे कि भारतीय ब्लोगियों को इमोशनल ब्लैकमेल कर रहे थे ????
एक लिख इतना मजेदार दिया कि कई लोग असल मुद्दा ही भूल गए कि हैं कहाँ ?
समीर लाल की उड़नतश्तरी अभी कहाँ है ..... जबलपुर से कनाडा या कनाडा से जबलपुर या फिर ???????

अभिषेक ओझा ने कहा…

हा हा ! चलिए जान बची तो लाखो पाये... लौट के बुद्धू... नहीं, नहीं ! जान बची तक ही ठीक है :-)

क्या करें आपकी पोस्ट पढ़ के ऐसी ही टिपण्णी निकलती है... शुद्धिकरण बड़ा बढ़िया रहा.

स्वाति ने कहा…

वाह समीर जी

मन तो किया कि उठ के दो चमाट रसीद कर दें कि एक तो तेरे पास खाने को कुछ है नहीं. मरसिड्डा सा धरा है और हमारी सेहत पर नजर लगाता है. अरे खुद कमाते हैं और खाते हैं, तुझे क्या.

-''आपका हाल पढ़कर बहुत हसी आई । अत्यन्त रोचक ! हमारे पंजाबी में एक कहावत है जिसका अर्थ है की घर से यदि भूखे निकलो तो आगे भी कुछ नही खाने को मिलेगा ,और यदि घर से पेट भर के खा कर निकले तो आगे सब जगह खाने को मिलेगा.इसलिए आगे से ध्यान रखियेगा .
!''

Vidhu ने कहा…

आज सुबह से ही मूड ऑफ़ था ,सोचा ब्लॉग देखें ,-आपकी पोस्ट खोली ,और हँसी आ गई ,अच्छा लगा आपको पढ़कर ,शब्दों की रफ्तार के साथ का ये सफर ,बिना लगलपेट के आपको खूब आता है ,एक नया शब्द ,मर सिददा पढने को मिला,दुसरे अब तो मध्य्प्रेदेश की सड़कों का नेटवर्क ५० पर्सेंट्स से ज्यादा हो चुका है यहाँ आयें स्वागत है मुश्किल नही होगी,बधाई बधाई ....वास्तविक लेखन हेतु

गौतम राजरिशी ने कहा…

हा-हा

....मजेदार वर्णन---और बड़े दिनों बाद किसी के मुंह से ये "ठिठौना" शब्द सुना..

ALOK PURANIK ने कहा…

क्या केने क्या केने। अभी ना मर रहे आप। जब तक हिंदी के एक एक ब्लाग पर आपकी टिप्पणी ना हो लेगी। जब तक हर नवोदित, उग चुके चुके लेखक को आप शुभकामना ना दे देंगे, तब तक आप ना मरेंगे। लिखवा कर गारंटी ले लीजियेगा। पक्की।

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर ने कहा…

bhagvaan !!
aapko bhookhi najron se bachaye!!
jitna aap kha payen usase adhik dikhaaye!!

राकेश जैन ने कहा…

किसी की नजर न लग जाये...hum bhi hain to sukhadiya se par apko nazar kabhi nahi lagai..tandurust rahen..

Alag sa ने कहा…

जरूर उस ससुरे ने पेट पर नजर लगाई होगी।

मा पलायनम ! ने कहा…

उड़न तश्तरी फुस्स्स्स्स्स्स कभी नही हो सकती .अच्छा चित्रण किया है आपने फैजाबाद के बारे में ,और हाँ मुझे तो पता ही है कि आप कहाँ हैं |

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

दो दर्ज़न जो पैक समोसे किये गये र्हे कहाँ रह गये ?
पैकेट भर कर छोले भी तो दिये साथ में थे खाने को
मेदू बड़े और सांभर का बक्सा शायद घर पर छूटा
टभी स्वाद ने याद दिला कर लिखवाया है अफ़साने को

makrand ने कहा…

aap ki lekhi jaberdast he
regards

amit ने कहा…

ऊपर आलोक भाई सही कहे हैं, अगली बार मट्ठी-अचार साथ बाँध के निकलना, तो सीट आगे मिले या पीछे, हवाई जहाज़ में खाना लेने की नौबत न आएगी!! ;) :D

अल्पना वर्मा ने कहा…

mazedaar vakya --agli baar paranthey aur achar -karele ki sabzi--maththi--baandh kar yatra ke liye nikaleeyega.

singhsdm ने कहा…

भारत के बाहर भी भारत की आदतों को आप बिंदास तरीके से जी रहे हैं......समझ सकता हूँ. सही है कि कोई फैजाबाद से गोंडा का सफर थोड़े ही कर रहे हैं जो लटक के बैठ जाएँ जीते रहिये खंती हिन्दुस्तानी की तरह......हिंदुस्तान के बाहर...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

मैं आप की पीड़ा समझ सकता हूँ,,,मुझे ऐसी हवाई यात्रा का अनुभव हो चुका है...जब न बैठने को उचित सीट होती है और ना खाने को सामान...कमर और पेट दोनों आर्त नाद करने लगते हैं...अब तो भाई जी आप जबलपुर पहुँच चुके हैं कुछ वहां की बातें भी हो जायें...क्यूँ?
नीरज

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

मुआवजे की तो छोड़ो, वजन की वजह से कहो मरणोपरांत आक्षेप लगा दें कि इनके वजन के कारण गिरा है जहाज, अतः घर वाले जुर्माना भरें. अमरीका है भई!! अपने फायदे के लिए जब सद्दाम को चूहे के बिल से पकड़ा दिखा सकता है तो हमारी क्या बिसात.
अच्छा किया अम्मा का बताया टीका लगा लिया.. वरना

राज भाटिय़ा ने कहा…

समीर जी अब तो बच्चो की अम्मा आप कॊ सफ़ेद टीका लगाती होगी, क्योकि काला टीका तो दिखे गा नही,
ओर सुनाये भारत मै केसा चल रहा है,
धन्यवाद

Manish Kumar ने कहा…

matlab humari jamaat ko aap majority mein nahin aane denge :)

विष्णु बैरागी ने कहा…

इस पोस्‍ट से तो बडा अपनापा हो गया समीरजी । मध्‍य प्रदेश की सडक यात्रा को आपने हवाई यात्रा का दर्जा दे दिया ।
और हां, 'चमाटा' बहुत दिनों बाद पढने में आया ।

Jyotsna Pandey ने कहा…

aapki rachanaa jahan havaai-yatra se prapt asuvidha par vynag karti hai vahin aapki lekhan shaili ek haasy bhi prastut karti hai
iss rachanaa ke dwara hamen aanand pradaan karne ke liye aabhar .
apne blog par aapki tippani ki aasha men mai jyotsna aapka swagat karti hoon

Jyotsna Pandey ने कहा…

aapki rachanaa jahan havaai-yatra se prapt asuvidha par vynag karti hai vahin aapki lekhan shaili ek haasy bhi prastut karti hai
iss rachanaa ke dwara hamen aanand pradaan karne ke liye aabhar .
apne blog par aapki tippani ki aasha men mai jyotsna aapka swagat karti hoon

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

हमेशा की तरह बहुत बढिया

आशु ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
आशु ने कहा…

समीर जी बहुत ही अच्छा लिखा है. मैं तो समझा था आप इंडिया पहुँच गए और वहां के हाल सुनायेंगे. आप का वॉशिंगटन से टोरंटो का सफर पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. ऐसे लगा हम आप के साथ ही थे सफर में.

लिखते रहें आप का हास्य और व्यंग के लिखने के स्टाइल पढने में बड़ा रस आता है.

हरि ने कहा…

कसम आपकी, मजा आ गया

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

:) :) :) aap ka andaaz sach me nirala hai

डॉ .अनुराग ने कहा…

लो कर लो बात हमारे तम्बू का किराया अब कौन देगा ?देसी की कई बोतले भी बच गई है.....हमारा फोनुआ जो आप लिए थे ..वो भी नही बजा .वैसे हम भी इन्दोर गए थे ....आपके एरिया में थे एम् पी. में .....चलिए अगली बार मुलाकात होगी

एस. बी. सिंह ने कहा…

गज़ब ! भाई नज़र ना लगे।

जीवन सफ़र ने कहा…

रोचक व्यंग!आपने बहुत बढ़िया लिखा है बधाई आपको!

Abhishek ने कहा…

ख़ुद को बुरी नजर से बचने को तो ठिठोना लगा लिया आपने, दुआ करता हूँ आपकी लेखनी को किसी की नजर न लगे.

jayaka ने कहा…

पढ्कर बहुत अच्छी अनुभूती होती है।....हास्यरस से भरपूर रचना।

प्रतीक माहेश्वरी ने कहा…

काफ़ी अच्छा लगा यह पोस्ट पढ़कर..आपने सही जगह सभी की अच्छी खिंचाई की है...लिया
एक बात कहना चाहूँगा... वो शाकाहारी/मांसाहारी वाली बात मुझे कुछ सही नहीं लगी...
आपने कहा कि - "ईकोलॉजिकल बैलेंस ठीक रखने के लिए जहाँ कुछ शाकाहारी आवश्यक है, वहीं मांसाहारी भी."
मैं यह मानता हूँ कि ईकोलॉजिकल बैलेंस के लिए इश्वर ने पहले से ही सब सुविधा दे राखी है..
जहाँ हम शाकाहारी खा कर जी सकते हैं वहीं कुछ जानवरों को ऐसी जीवन shailee दी है की मांसाहारी पर ही जीवन व्यतीत कर सकते हैं | इसलिए मनुष्य को इस बैलेंस को बिगाड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए |
जिस तरह भगवान ने इस संसार को सही तरह चलाने का बीड़ा उठाया है, वहीं हमे भी अपने ही संसार को अच्छा बनाने की कोशिश करनी चाहिए |
- शुभकामनाएं

प्रकाश बादल ने कहा…

भाई जान,

आप छा गए। आप जितना बेहतर लिखते उससे भी कहीं अधिक कुशलता से अन्य लोगों को लिखने के लिये प्रेरित करते हैं। आपके स्वस्थ,कुशल, एवम सम्पन्न जीवन की कामना करता हूं।

सचिन मिश्रा ने कहा…

Bahut badiya likha hai. badhayi ho.

नरेश सिह राठोङ झुन्झुनूँ राजस्थान ने कहा…

आपके लिखे यात्रा वर्णन को टिप्पयाने के लिये एक महोदय की अभी कमी है शुक्र है मै आज आखरी नहीं हू । टिप्प्णीकारों में रतन सिंह शेखावात जी की गैर हाजिरी लगाता हूं । उड्नतश्तस्तरी द्वारा उडान वर्णन रोचक है ।

डा. अमर कुमार ने कहा…


समीर दद्दा, घर से पूड़ी सब्जी व नींबू का अचार ले जाते,
तो यह शिकायत ही क्यों रहती ? पैसे बचते सो, अलग !

Radhika Budhkar ने कहा…

बहुत ही मजेदार वर्णन ,कल के बम धमाके कारन तनाव में ही थी ,इसे पढ़कर हँसी आई और तनाव कुछ कम हुआ.धन्यवाद

महावीर ने कहा…

'तुम तो बस नारे लगाओ' आज पढ़ना हुआ पर पूरा नहीं पढ़ पाया। मुंबई के धमाकों की खबरें और हौलनाक तस्वीरें आंखों के सामने नाचती रहीं। खैर, फिर किसी दिन पढ़ेंगे। क्षमा करना।

Akshaya-mann ने कहा…

मैंने मरने के लिए रिश्वत ली है ,मरने के लिए घूस ली है ????
๑۩۞۩๑वन्दना
शब्दों की๑۩۞۩๑

आप पढना और ये बात लोगो तक पहुंचानी जरुरी है ,,,,,
उन सैनिकों के साहस के लिए बलिदान और समर्पण के लिए देश की हमारी रक्षा के लिए जो बिना किसी स्वार्थ से बिना मतलब के हमारे लिए जान तक दे देते हैं
अक्षय-मन

सतीश पंचम ने कहा…

आज मन क्षुब्ध है, तभी आपकी पोस्ट पढने आ गया, थोडा मन बहलाव तो हो गया लेकिन अच्छे मन से टिप्पणी फिर कभी।

neeraj tripathi ने कहा…

सही है .वापसी में सत्तू बाँध लीजियेगा और ठिठोना लगाकर घोल घोल के पीते रहिएगा

बी एस पाबला ने कहा…

देर से यहाँ पहुँचा। झल्लाये मन पर मुस्कुराहट तैर गई।
अब तो हमारा भी मन कर रहा है, बीयर से मुखशुद्धि की और स्कॉच से अँतड़ियोँ की!

Dr.Bhawna ने कहा…

Bahut khub Badhiya raha aapka yatra varnan...

प्रकाश बादल ने कहा…

"आँख बंद करके लगे पूजा करने कि प्रभु, बचवा लियो आज. कहीं जहाज गिर विर पड़ा तो ये हवाई जहाज वाले तो कम से कम हमारे केस में मेडीकल रिपोर्ट से सिद्ध कर ही लेंगे कि भूख से मरा है, हावई जहाज गिरने से नहीं. अतः घर वालों को नो मुआवजा"

"मुआवजे की तो छोड़ो, वजन की वजह से कहो मरणोपरांत आक्षेप लगा दें कि इनके वजन के कारण गिरा है जहाज, अतः घर वाले जुर्माना भरें. अमरीका है भई!! अपने फायदे के लिए जब सद्दाम को चूहे के बिल से पकड़ा दिखा सकता है तो हमारी क्या बिसात"

"अम्मा हमें ठिठोना लगा देती थी काजल का कि किसी की नजर न लग जाये"
वाह भाई जान "ठिठौने" शब्द का प्रयोग। अपनी ज़मीन से आपके गहरे नाते को दर्शाता है। भगवान आपकी कलम को ताकत बख्शे। आज से आपका ब्लॉग मेरे ब्लॉग पर भी नज़र आएगा।

SANJEEV "GAZAL" ने कहा…

bahut achha likhte hain aap.....madhya pradesh ki sadak...bhai wah!! aaj tak nahi sudhri yahan ki sadko kihalat....itne achchhe lekhan ke liye bahut bahut dhanyawad....aur bhavishya me achchhe lekhan ke liye shubhkaamnayein bhi...

ravish ranjan ने कहा…

apne faizabad aur gonda ka jikra kiya..apne sahar bahraich ke jeep yatra yaad aa gayi...masti se likhte hai..achha laga....

दिलीप कवठेकर ने कहा…

फ़ैज़ाबाद से गोंडा खुली जीप में जाना जिसने अनुभव किया है, वह आपके त्रासदी को बखूबी समझ सकता है.

अपन ये गुस्तखी़ कर चुके है, और भोग चुके हैं.

दिलीप कवठेकर ने कहा…

अपने आप पर हंसना बडी़ हिम्मत का काम है.दुख है, कि कम ही लोग उसमें छिपे व्यंग की तह तक जाते है.

आपका ब्लोग अपने नाम कि भांति हकीकत की ज़मीन से लेकर कल्पना की उडान पर बिना हिचकोले लिये ले जाता है. मध्य प्रदेश की सडकों की तरह नहीं जो बिना पेट का पानी हिलाये ले ही नही जा सकता.

चलो आपको तो पेट के पानी हिलाने का मौका नहीं आया क्योंकि पेट में बीयर और अंतडियों में स्कॊच हिले तो और भी सुरूर बढ जाये.

ऐसे ही व्यंग की पहचान है हमारे सभी टिप्पणीकारों को, जो इतनी तादात में यहां उपस्तिथी दर्ज़ करा रहे है.

आखरी बात. आपने अच्छा किया कि आखरी भाग में लिख दिया कि आप सकुशल वापिस लौटे, भले भूके ही सही. नहीं तो अपन पूछ ही लेते तपाक से कि दद्दा, ये तो नहीं बताया कि पहुंचे कि नही!!!!

omsingh shekhawat ने कहा…

वो तो हमारे जैसा ही शरीर है जो झेल गये वरना तो तुम्हारे चक्कर में वाकई स्वर्ग की प्राप्ति हो लेती आज तो...............agar hawai jahaj ...to chale jate na khama kham hi kahe chot me bathte ho mote to ho...

omsingh shekhawat ने कहा…

buri najar wale tera muh kala likhlo jahajo ke andar bhi nahi to kabhi gir padega sameer saab