मंगलवार, अप्रैल 10, 2007

बिजली के खम्भे, गालियाँ और कुत्ते!!

बिजली विभाग और उसकी रहवासी कॉलिनियों से मेरा बड़ा करीब का साबका रहा है. पिता जी बिजली विभाग में थे और हम बचपन से ही उन्हीं कॉलिनियों में रहते आये.

मैने बहुत करीब से बिजली से खम्भों को लगते देखा है, एक से एक ऊँचे ऊँचे. उच्च दाब विद्युत वाले लंबे लंबे खम्भे और टॉवर भी, सब लगते देखें हैं.

जब बड़े टॉवर और खम्भे लगाये जाते थे साईट पर, तब खूब सारे मजदूर जमा होते थे. खम्भा उठाते और खड़ा करते वक्त सामूहिक ताकत एकत्रित करने के लिये वो नारे के तर्ज पर गंदी गंदी गालियाँ बका करते थे. गाली का पहला भाग उनका हेड मजदूर चिल्ला कर बोलता और बाकी के सारे मजदूर सुर में उसे पूरा करते हुये ताकत लगाते थे और खम्भा खड़ा कर देते.



जब भी कोई मंत्री निरीक्षण के लिये आते, तब उन मजदूरों को गाली न बकने के निर्देश दिये जाते. मैं आश्चर्य किया करता. अरे, खम्भा तो निर्जीव चीज है. इन गालियों के असली हकदार की उपस्थिती में ही उन पर पाबंदी! यह तो अजब बात हुई!! मगर यही तो होता है लोकतंत्र में. जो जिस चीज का असली हकदार होता है, वो ही उससे वंचित रहता है. सब कुछ उल्टा पुलटा. जिन लोगों को जेल में होना चाहिये वो संसद में होते हैं और जिनको संसद में होना चाहिये वो पड़े होते हैं गुमनामी में, बिल्कुल उदासीन और निर्जीव-बिना गड़े खम्भे के समान. उनसे बेहतर तो मुझे यह निर्जीव खम्भा ही लगता है. शायद कल को गड़ा दिया जाये तो खड़ा तो हो जायेगा. ये तो यूँ उदासीन ही पड़े पड़े व्यवस्था पर कुढते हुए इसी मिट्टी में मिल जायेंगे एक दिन.

जिन लोगों को जेल में होना चाहिये वो संसद में होते हैं और जिनको संसद में होना चाहिये वो पड़े होते हैं गुमनामी में, बिल्कुल उदासीन और निर्जीव-बिना गड़े खम्भे के समान. उनसे बेहतर तो मुझे यह निर्जीव खम्भा ही लगता है. शायद कल को गड़ा दिया जाये तो खड़ा तो हो जायेगा. ये तो यूँ उदासीन ही पड़े पड़े व्यवस्था पर कुढते हुए इसी मिट्टी में मिल जायेंगे एक दिन.

तो बात चल रही थी, मंत्री जी के निरीक्षण की. तब सब मजदूर ताकत इकट्ठा करने और दम लगाने के लिये दूसरे नारों का प्रयोग करते. सरदार कहता, "दम लगा के" पीछे पीछे सारे मजदूर ताकत लगाते हुए कहते, "हइस्सा" और बस खम्भा लग जाता. मंत्री जी के सामने तो यह महज एक शो की तरह होता. हल्के फुल्के खम्भे खड़े कर दिये जाते. फिर मंत्री जी का भाषण होता. वो चाय नाश्ता करते. कार्य की प्रगति पर साहब की पीठ ठोकी जाती और वो चले जाते. और फिर भारी और बड़े खम्भों की कवायद चालू...बड़ी बड़ी मशहूर हीरोइनों के नाम लिये जाते सरदार के द्वारा और बाकी मजदूर उन नारों वाली गालियों को पूरा करते हुए ताकत लगाते और खम्भे खड़े होते जाते.

मैं तब से ही गालियों के महत्व और इनके योगदान से परिचित हूँ. क्रोध निवारण के लिये इससे बेहतर कोई दवा नहीं. बहुत आत्म विश्वास और ताकत देती हैं यह गालियाँ. जितनी गंदी गाली, जितनी ज्यादा तर्रनुम में बकी जाये, उतनी ज्यादा ताकत दिलाये. काश इस बात का व्यापक प्रचार एवं प्रसार किया जाता, तो न तो च्यवनप्राश बिकता और न ही गुप्त रोग विशेषज्ञों की दुकान चलती. जड़ी बूटियों से ज्यादा ताकत तो इन गालियों में हैं, वरना वो मजदूर जड़ी बूटी ही खाते होते. गालियाँ तो बस गालियाँ होती हैं:

मुफ्त का उपाय सीधा-सादा,
भरपूर ताकत का पूरा वादा.

उम्र के साथ साथ बाद में इन गालियों के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व के विषय में भी ज्ञानवर्धन होता रहा. (फुरसतिया: गालियों का सांस्कृतिक महत्व और फुरसतिया: गालियों का सामाजिक महत्व, इसी लेख का अंश याद आता है: )


गाली का सबसे बडा़ सामाजिक महत्व क्या है?

मेरे विचार में तो गाली अहिंसा को बढा़वा देती है। यह दो प्राणियों की कहासुनी तथा मारपीट के बीच फैला मैदान है। कहासुनी की गलियों से निकले प्राणी इसी मैदान में जूझते हुये इतने मगन हो जाते हैं कि मारपीट की सुधि ही बिसरा देते हैं। अगर किसी जोडे़ के इरादे बहुत मजबूत हुये और वह कहासुनी से शुरु करके मारपीट की मंजिले मकसूद तक अगर पहुंच भी जाता है तो भी उसकी मारपीट में वो तेजी नहीं रहती जो बिना गाली-गलौज के मारपीट करते जोडे़ में होती है। इसके अलावा गाली आम आदमी के प्रतिनिधित्व का प्रतीक है। आप देखिये ‘मानसून वेडिंग’ पिक्चर। उसमें वो जो दुबेजी हैं न ,जहां वो जहां मां-बहन की गालियां देते हैं पब्लिक बिना दिमाग लगाये समझ जाती है कि ‘ही बिलांग्स टु कामन मैन’।


तब हमारे पास एक कुत्ता होता था. हम चाहते तो उसका नाम कुत्ता ही रख देते. मगर फैशन के उस दौर की दौड़ में हाजिरी लागाते हुए हम ने उसका नाम रखा - टाईगर. बस नाम टाईगर था अन्यथा तो वो था कुत्ता ही. वो तो हम उसका नाम टाईगर की जगह बकरी भी रख देते तो भी वो रहता कुत्ता ही, न!! नाम से कोई अंतर नहीं पड़ता, चाहे छ्द्म या असली. भूरे भूरे रोयेदार बालों के साथ बड़ा गबरु दिखता था टाईगर. नस्ल तो मालूम नहीं. उसकी माँ को शायद विदेशियों से बहुत लगाव था, इसलिये वो जरमन सेपर्ड, लेबराडोर और शायद बुलडाग भी, की मिली जुली संतान था. कोई एक नस्ल नहीं, कोई एक धर्म नहीं, बिल्कुल धर्म निरपेक्ष. बस एक कुत्ता. सब घट एक समान में विश्वास रखने वाला प्यारा टाईगर.

जब भी टाईगर हमारे नौकर के साथ घूमने निकलता, तो उसकी एक अजब आदत थी. हर खम्भे के पास जाकर वो नाक लगाता मानो कोई मंत्र बुदबुदा रहा हो और फिर एक टांग उठा कर उसका मूत्राभिषेक करता. चाहे कितने भी खम्भे राह में पड़ें, वो यह क्रिया सबके साथ समभाव से निपटाता. खम्भों के अलावा वो सिर्फ नई स्कूटर और नई कार को पूजता था. अन्य किसी चीजों से उसे कोई मतलब नहीं होता था. भले ही आप उसके सामने नई से नई मंहगी पैन्ट पहन कर खम्भे की तरह खड़े हो जाये, वो आपको नहीं पूजेगा. आप उसकी नजरों में पूजनीय नहीं हैं तो नहीं हैं. पैसे की चमक दमक से आप अपने को पूजवा लेंगे, यह संभव नहीं था. इस मामले में वो आज की मानव सभ्यता से अछूता था. कुत्ता था न!!

भले ही आप उसके सामने नई से नई मंहगी पैन्ट पहन कर खम्भे की तरह खड़े हो जाये, वो आपको नहीं पूजेगा. आप उसकी नजरों में पूजनीय नहीं हैं तो नहीं हैं. पैसे की चमक दमक से आप अपने को पूजवा लेंगे, यह संभव नहीं था. इस मामले में वो आज की मानव सभ्यता से अछूता था.कुत्ता था न!!

बाद में हमारे घर के पिछवाड़े में मीलों तक फैले खुले मैदान में बिजली का सब-स्टेशन बना. खूब खम्भे गड़े. हमें, न जाने कितनी हीरोईनों के नाम मालूम चले और खूब तरह तरह की गालियाँ सीखीं. दिन भर खम्भे गड़ते और हम दिन भर गालियों का रसास्वादन करते और नई नई गालियाँ सीखते.

सब-स्टेशन लगभग तैयार हो गया था. हर तरफ खम्भे ही खम्भे. निर्माण कार्य अंतिम चरणों में था. टाईगर उसी तरफ घूमने जाने लगा. भाग भाग कर हर खम्भा कवर करता. अति उत्साह और अति आवेग में भूल गया कि " अति सर्वत्र वर्जयेत" . बस उसकी अपनी उमंग. इसी अति उत्साह में शायद विद्युत प्रवाहित खुले तार पर, जो कि किसी खम्भे से छू रहा था, मूत्राभिषेक कर गुजरा और भगवान को ऑन द स्पॉट प्यारा हो गया. नौकर उसके मृत शरीर को गोद में उठाकर लाया था. फिर वहीं उसी मैदान के एक कोने में उसे गड़ा दिया गया. टाईगर नहीं रहा, मगर खम्भे खड़े रहे.कई और छद्म और दूसरे नामों के टाईगर उन पर मंत्र फूकते रहते हैं और अभिषेक भी अनवरत जारी है. एक टाईगर के चले जाने से न तो अभिषेक रुक जाते हैं और न ही स्थापित खम्भे गिर जाते हैं.

मेरा मानना है, स्थापित खम्भे इन्सानियत में आस्था का प्रतीक होते हैं, स्थिर और अडिग. चन्द हैवानी हवाओं से बिल्कुल अविचलित - तटस्थ!!


मेरी पसंद में राकेश खंडेलवाल, वाशिंगटन का एक गीत:

नेता और कुत्ता

लूटता समान एक हिन्दू मुस्लिम सिख को है
दूसरे को एक जैसे बिजली के खंभे हैं
नाता नही कोई देखे फिर भी समान दिखें
देख देख सब लोग करते अचंभे हैं
दोनों ही हैं धर्म-निरपेक्षता के प्रतिनिधि
संसद की सड़क हो या पानी वाले बंबे हैं
नेता हो या श्वान, दोनो एक ही समान रहे
कहने को व्यस्त, किन्तु दोनों ही निकम्मे हैं.




नोट:

१. खम्भों के गिरने की अपनी वजह होती है. कभी जानने का दिल करे तो पढ़ियेगा बमार्फत फुरसतिया, हरी शंकर परसाई का लेख: उखड़े खम्भे
२.अभी रेडियो तरकश सुनता था, ब्रेकिंग न्यूज चलायी जा रही थी. तरकश स्तम्भ का नया स्तम्भ (खम्भा) : व्यंग्यकार रवि रतलामी . बहुत मेहनत और लगन से लगाये गये हैं, आईये स्वागत करें. Indli - Hindi News, Blogs, Links

33 टिप्‍पणियां:

Tarun ने कहा…

जिन लोगों को जेल में होना चाहिये वो संसद में होते हैं और जिनको संसद में होना चाहिये वो पड़े होते हैं गुमनामी में

क्या बात कही है, छा गये। हम तो ये पढकर अफसोस ही कर रहे हैं अभी तक गालियां देने से क्यों वंचित रहे क्या पता उसी बहाने कुछ हैल्थ बन जाती। इसे पढकर सोच रहे हैं किस हिरोईन के नाम से शुरू करें ;)। यह पढकर ये भी पता लगा कि कुत्ते से ज्यादा निरपेक्ष शायद ही कोई हो।

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

आपकी जो लेखनी है उसकी क्या बात करें
कभी बने तीर कभी बने तलवार है
सीधा साधा दिन ऐसे जगमगाने लगता है
लौट कर आया ज्यों दिवाली का त्यौहार है
तीर तरकश में हों म्यान में कॄ[आण रहे
तो पता कहां चले कि किसमें कितनी धार है
शब्द, लेखनी, किताब, चिट्ठे की क्या करें बात
पोरे का पूरा ही नारद दिया गया वार है

अभय तिवारी ने कहा…

क्या बात है आपके अन्दाज़े बयां की.. वाह..

RC Mishra ने कहा…

वाह वाह!

अरुण ने कहा…

समीर भाई जरा फ़ुरसत से टिप्पणी दूगा अभी तो जरा मुहल्ले के प्रायोजित कार्यक्रम पर आप लोगो का सहयोग मांन रहा हू

बजार वाला ने कहा…

समीर भाई . वाकई बहुत अच्छा लिखते हैं आप . बधाई ! लेकिन एक बात हज़म नही हो पा रही है . आपने कहा कि जिन लोगों को जेल मे होना चाहिए थ वो संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं . दरअसल ये अपनी यथास्थिति को स्वीकार कर लेने का सबसे आसान तरीक़ा होता है कि हम ये मान कर चलें कि भई हम क्या कर सकते हैं क्योंकि जिन लोगों को जेल मे होना चाहिए था वो संसद पहुच गये हैं . अगर यथास्थिति को अस्वीकार करने का माद्दा हो तो ये वाक्य कुछ इस तरह से होना चाहिए था. जिन लोगो को संसद मे होना चाहिए था , उन्हे जेलों मे ठूंस दिया जाता है और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाते हैं . क्यों ना उन सारी जेलों को बम से उड़ा दिया जाए जहाँ पर जनता के लिए लड़ने वाले ज़बरदस्ती बाँध कर रखे जाते हैं . या फिर कोई नया नेतृत्व पैदा होना चाहिए . समीर भई , आपमे वो बात है .. आप ही क्यों नही नया नेतृत्व देते हैं . कम से कम अगर आप जेल मे होंगे तो हम लोग ये तो कह सकेंगे कि जिन लोगों को संसद मे होना चाहिए था वो जेल मे हैं . आइए , सिर्फ़ एक बार जो निचले तबके के लोग हैं , बिना किसी एन जी ओ या पार्टी की मदद के कुछ कर के देखिए . मैं शर्त लगा सकता हूँ , आप भी जेल मे होंगे .

संजय बेंगाणी ने कहा…

सुबह सवेरे थोड़ा गुदगुद दिया, बड़ा अहसान रहा. अब दिन भर स्फूर्ति बनी रहेगी, टेंशन कम हुआ.
वैसे टेंशन कम करने का एक राम बाण इलाज गाली भी है. मैं समबके सामने न सही अपनी खीज मिटाने के लिए दिवारों को एक दमदार गाली देता हूँ, और तनाव मुक्त....

जिन्हे जेल में होना चाहिए वे संसद में हैं, क्योंकि जिन्हे संसद में होना चाहिए वे निश्क्रिय है. जागो.

Pankaj Bengani ने कहा…

दुनियादारी और समझदारी का सारा ठेका बजार से मौहल्ले तक जाता है!! ;-)


उपरोक्त टिप्पणी के सन्दर्भ कह रहा हुँ. :)


अपनी गिरहबान मे झांकने की हिम्मत कितनों मे होती है?

एक बात बताऊँ लालाजी, दुःख देखेंगे तो सब तरफ दुःख ही दुःख है और अत्याचार देखेंगे तो लगेगा कि जैसे मुझसे ज्यादा कभी किसी पर अत्याचार हुआ ही नहीं.

मनुष्य की प्रवृति ही नेगेटिव सोच की होती है. ऐसी सोच किसी मे कम होती है किसी भी सिर्फ वही होती है. हमारे देश के मौहल्लो और बजारों मे ऐसे लोग बहुत दिखते हैं!

दुनिया में खुशी भी है. बस इंसान बनने की देर है.

काकेश ने कहा…

तो भाई साहब अब आपने खंबा-कुत्ता पुराण यज्ञ चालू कर दिया . आहुति देने का मन तो अपन का भी था..पर अभी जाने दीजिये..

Shuaib ने कहा…

खंबे पर गालियां और गालीयों का नारा - वाह ज़बर्दस्त लिखा है। आपके लेख पढते हुए बहुत मज़ा आता है।

rachana ने कहा…

बिजली की खम्भे, गालियाँ और कुत्ते!!

**भारत, राजनीति और नेता!!!**

बस इतना ही कहना है...

Sanjeet Tripathi ने कहा…

खम्भा पुराण कहें या कुत्ता पुराण। आपकी लेखन शैली न केवल गुद-गुदा जाती है बल्कि एक तीर से कई शिकार कर जाती है।

Neelima ने कहा…

क्या बात है समीर जी आप तो हिट पे हिट पे हिट............मारे ही चले जा रिए हो 40 -40 टिप्पणियां पाकर भी आपका मन नहीं भरा क्या ;)

Pankaj Bengani ने कहा…

कैसी विडम्बना है , आज नेताओं को सब गालीयाँ देते हैं (सही करते हैं) पर नेता कोई नही बनना चाहता.. वोट नही देंगे पर चुनाव मे खडे भी नही होंगे. :)

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

समीर जी,
कुत्ते और खम्बे का तो वैसे भी पुराना रिश्ता है...
खम्बा देखा नही कि टांग उठी नही‍...
यही हाल देश के नेताओं का है, कुर्सी देखी नही कि..... आप खुद ही समझ्दार हैं

बेनामी ने कहा…

Kissa-gohi ka anokha andaaz to koi aapse sikhe.

-K.

sunita (shanoo) ने कहा…

वाह! क्या खूब लिखते है,मुझे लगता है कुत्ता फ़िर भी नेता से श्रेष्ठ है,..कम से कम स्वामिभक्त तो होता है,..मगर आज नेता देश भक्त नही मिलते,
बहुत ही सुन्दर रचना है,..बधाई स्वीकार करे...
सुनीता(शानू)

sunita (shanoo) ने कहा…

वाह! समीर भाई बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने,मुझे लगता है कुत्ता फ़िर भी बेहतर है नेता से क्युकि कुत्ता मालिक का वफ़ादार होता है,..और नेता का क्या कहिये उसकी तो फ़ितरत ही मक्कारी है,..बधाई स्वीकारे,...राजनैतिक सत्ता का अच्छा चित्रण किया है।
सुनीता(शानू)

अनूप शुक्ला ने कहा…

बढ़िया है। आप हमारे लिये मुसीबत बनते जा रहे हो! मैं कल से यही सोच रहा हूं कि कुत्ते खम्भे पर क्यों मूतते हैं, मजदूर हीरोइनों को क्यों गरियाते हैं। रवीश जी के सवाल पर सोच रहा हूं कि लोग जेल जाने को तैयार क्यों नहीं होते? हमने एक इंटरव्यू में पत्रकार विजय मनोहर तिवारी सेपूछा था- आप युवा हैं, मेधावी हैं। जनता के अधिकारों के लिये आपके मन में तड़प भी है। क्या कभी यह नहीं लगा कि कैमरा, माइक छोड़ हरसूद की जनता का नेतृत्व करके उनके विस्थापन को राजनीति के मार्ग से ही रोकते या मानवीय तरीके से विस्थापन के लिये आंदोलनरत हो जाते?
उनका जवाब था-
ऐसा कई बार लगा कि मैदान में आकर हरसूद और २५० गांवों की बरबादी की आवाज बुलंद की जाए, लेकिन मैं मिडिया में रहकर अपना काम ठीक से कर पाया, इस बात का सुकून है। हमने हरसूद को गुमनामी की मौत नहीं मरने दिया। दुनिया भर को खबर मिली की एक हजार मेगावाट बिजली कितने घरों में अंधेरा लेकर आई और हमारी तथाकथित जनहितकारी व्यवस्था का व्यवहार कितना सभ्य रहा?



अपने क्षेत्र में अपना काम अच्छी तरह से करते रहें यही बहुत है।
लेख अच्छा लिखा ! बधाई! लेकिन हमें परेशान करते हैं ये अच्छी बात नहीं :)

Raviratlami ने कहा…

कुत्ता मूत्राभिषेक से संबंधित एक मजेदार कथा का मुझे भी अनुभव है.

एक मित्र ने नई चमचमाती होंडा पैशन खरीदी. पूजा पाठ किया और मिठाई खिलाई. पांचेक मिनट के लिए गाड़ी बाहर गेट पर रह गई. थोड़ी देर में वापस आकर देखा तो इंजन के नीचे पीले रंग का द्रव्य बह रहा था. नव-गाड़ी प्रेमी मित्र ने सोचा ये नई गाड़ी में से ऑइल कहां से टपक रहा है. बड़ी देर तक मुआयना किया - फिर भी समझ नहीं आया तो द्रव्य को उंगली में लेकर सूंघा.

तब फिर तत्काल समझ में आया कि यह तो नव-वाहन का कुत्ता-मूत्राभिषेक है!

Raviratlami ने कहा…

बिजली की खम्भे को बिजली के खम्भे कर दें व यह टिप्पणी मिटा दें :)

renu ahuja ने कहा…

समीर जी...भई ऊ कहावत तो सुनी रहें हैं ना आप, और जो नई सुनी तो हमउ सुनाय देत है..

काने को काना कहों , काना जाओगा रूठ
भईये प्रेम प्यार ते पूछी लै , के कैसे गई थी फ़ूट!

अब तो आपके लिखेबे का आलम ई है, कुता होवे, खंबा होवे, जा के संसद भवन पे लगा फ़्यूज़ बल्ब होवे, कौनो आपकी कलम से बच ना पाइवे...!!!!

महावीर ने कहा…

बहुत ही रोचक और भारी भरकम लेख है - यह कहना मुश्किल हो रहा है क्योंकि दिमाग़ हम पर झल्ला रहा है कि यह कह "समीर का कौन सा लेख रोचक और भारी भरकम नहीं है?"
फिर भी दिल कहने से चूका नहीं "हंसाते हंसाते ही समाज का नंगा ढांचा चलचित्र की तरह सामने रख दिया।
मज़ा आगया पढ़ने में!

Udan Tashtari ने कहा…

तरुण

अच्छा है, अभी भी कहाँ देर हुई है और इधर मौके भी बहुत हैं, दिल भर कर गाली बको. :)
बहुत धन्यवाद आलेख पसंद करने को!!


राकेश भाई

सब आपका स्नेह है और आप जानते हैं इस बात को. बस स्नेह बनाये रखें.


अभय भाई

आपने पढ़ा, सराहा, बहुत आभार. लिखना सफल हो गया.


मिश्रा जी

धन्यवाद!! :)


अरुण भाई

आराम से सब काम निपटा लें. वो ज्यादा जरुरी है. सहयोग मांगा गया है, नेताई वादा कर देता हूँ.. :)

Udan Tashtari ने कहा…

बाजार वाला जी

इसे जैसा लिखा है वैसा ही रखें तो?? बस लिखते लिखाते रहें, आवाज उठाते रहें, और जिसका जो कार्य है वो उसे करता रहे तो सामन्जस्य बना रहे. सभी तलवार उठायें, यह जरुरी तो नहीं.


संजय भाई

सब आपका स्नेह है स्नेह बनाये रखें. दिवारों ने क्या गलती की है?


पंकज

लिखना सफल हो गया. बाकी बहुत सोचते हो भाई..इतना चिंतन ठीक नहीं हेल्थ के लिये. :)


काकेश भाई

चलो जाने दो, धन्यवाद!! :)


शुएब

मजा आये, इसीलिये तो लिखता हूँ भाई. तुम हमेशा सफल कर देते हो, बहुत आभार.

Udan Tashtari ने कहा…

रचना जी

सही है...इस धार पर भी लिखेंगे जल्दी. धन्यवाद लेखन को एक राह देने हेतु. :)


संजीत भाई

सब आपका स्नेह है, बहुत आभार और धन्यवाद!!


नीलिमा जी

आपकी टिप्पणी इतनी मीठी होती है कि कैसे मन भर सकता है, बताईये न!! बहुत धन्यवाद!! :)


पंकज

दिल का गुबार निकल गया हो तो बताओ या और लिखूँ, धन्यवाद!! :)


मोहिन्दर भाई

समझ गया, सही कह रहे हैं, यही हाल है!!! बहुत आभार.

Udan Tashtari ने कहा…

के जी

धन्यवाद :)


सुनीता जी

दोनों टिप्पणियां अच्छी लगीं, बहुत आभार और धन्यवाद!!


अनूप जी

अरे, हम तो आपके शिष्य हैं और इस बात को मैं खुले आम स्विकारता हूँ. हम क्या मुसीबत बन सकते हैं. आप ही मुझे संबल देते हैं लिखने का और आप से प्रेरणा ले मैं लिखता हूँ...मैं तो आपके लेखन के आस पास भी पहुँच जाऊँ तो मेरे लिये संपूर्ण सफलता का मुकाम होगा...आपकी हौसला अफजाई के लिये बहुत बहुत धन्यवाद!! :) परेशान करना उद्देश्य नहीं था, यह तो आप जानते ही हैं :)


रवि भाई

सही है, अच्छा वाकया है और भूल सुधार के लिये आभार, धन्यवाद!! :)


रेणु जी

आपने पढ़ा, हम तर गये...आज वादा है कि एक दिन संसद भवन पर लगे फ्यूज बल्ब पर जरुर लिखेंगे, हा हा !!! आते रहे प्लीज, बहुत आभार और धन्यवाद.

महावीर जी

आपका प्यार मिलता रहता है और हौसला बना रहता है. बस स्नेह देते रहें और मै वादा करता हूँ लिखता रहूँगा आपके मार्ग दर्शन में.

Manish ने कहा…

वाह अद्भुत लेख ! मजा आ गया पढ़ के ।

Shrish ने कहा…

॥इति श्री खम्भा, कुता एवं गालीपुराण॥

रोचक रहा पढ़ना।

Udan Tashtari ने कहा…

मनीष भाई

आपने लेख पसंद कर लिया, बस हो गया. धन्यवाद.


श्रीश भाई

आजकल कम दिखते हैं. लेख पसंद करने के लिये धन्यवाद.

Dr.Bhawna ने कहा…

समीर जी कितनी बार टिप्पणी लिखी पर हर बार गायब लगता है कोई जादू हो रहा है पर मैं भी हार मानने वालों में से नहीं हूँ आज फिर लीजिये। कुत्ता पुराण अच्छा लगा।

Udan Tashtari ने कहा…

भावना जी

आपने कुत्ता पुराण पसंद किया, वाह!! बहुत आभार और शुक्रिया. जादू का कुछ बंदोबस्त देखता हूँ कि आखिर ऐसा क्यूँ हो रहा है. :)

अनामदास ने कहा…

कमाल है, यह वाला तो पढ़ा ही नहीं था. बहुत अच्छा लगा, लिंक भेजने के लिए धन्यवाद. आपने और फ़ुरसतिया जी ने तफस्ली से गालियाँ पहले ही बकी हुई हैं, मुझे इसका अंदाज़ा नहीं था. बहुत खूब.
अनामदास