मंगलवार, अगस्त 22, 2006

हम तो चले परदेश रे भईया....

आजकल प्रवासी, अमरीका-कनाडा प्रवास और प्रवासीयों की जीवन शैली या उन देशों की जीवन शैली बड़ा गरम विषय बना हुआ है, चिठ्ठा जगत मे. कई लेख, निवेदित लेख, शिघ्र लेख, टिप्पणियां और ना जाने क्या क्या खबर मे हैं. इसे लेकर कई तरह की भिड़ंत हुई, यहां तक की एक चिठ्ठा तो भगवान को प्यारा होते होते बचा. भला हो चिठ्ठा जगत के निवासियों का, जिन्होने समझा समझा कर बचा लिया वरना तो अब तक तो सर्व रस्म आदायगी के बाद लोग भूल भी गये होते और भाई जी नये नाम से चिठ्ठा लिखते होते क्योंकि यह भूत तो छूटता नही. लिखते जरुर.
अब कोई समझा रहा है, यहां अच्छा ही अच्छा है, आ जाओ. कोई कहता है कि इस तरफ़ की घास वहीं से हरी लगती है, है वैसी ही भूरी, तो आने के पहले सोच लेना.बहुत पापड़ बेलना पड़ेंगे. यहां तक कि यह भी बता दिया कि कितने तो लौट गये.
हम तो भईया किसी को ना समझायेंगे कि मत आओ. हमने देखा है कि जिसको भी समझाया, वो आया जरुर मगर हमसे संबध खतम कर लिया कि खुद तो ऎश कर रहे हो और हमे मना कर हो. अब तो यह बात गांठ मे बांध कर चलते हैं कि कोई भी पूछे कि क्या प्रोस्पेक्टस हैं. हम बस इतना ही कहेंगे, थोड़ी मेहनत और लगन की जरुरत है फिर सब बढ़ियां. अब कैसे समझायें, थोड़ी मेहनत और लगन से तो हर जगह सब कुछ ठीक है, चाहे यहाँ, चाहे वहाँ.
भले ही कितनी मेहनत करनी पड़े, नये नये कोर्स करने पड़ें, अपने प्रोफ़ेशन को छोड़ कर दूसरा काम करना पड़े, अपना नाम खो देना पड़े, मगर आना जरुर. हम मना नही करेंगे. हम मना भी करें तो तुम मानोगे कहाँ.
बस अनूप जलोटा का एक भजन याद करता हूँ और फिर तुमको सलाह देता हूँ, मात्र एक:

"इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले,
गोविन्द नाम लेकर, यह प्राण तन से निकले."


अब जब आ ही रहे हो, तो मात्र यह ध्यान रखना कि यह बात आपके शहर मे बहुत ना फैले. अब जहाँ बचपन से आज तक रहते आये हैं, वहाँ जब सब जान जायेंगे कि आप अमरीका-कनाडा रहने जा रहे हो, तो एक तो आपका ओहदा बढ़ा हुआ सा, कम से कम आपको, महसूस होने लगेगा. जो दोस्त बिना गाली गलोज से आपको संबोधित करना पसंद नही करते थे, वो भी सभ्यतावश आपसे सभ्य हो जायेंगे और कुछ तो अंग्रेजी मे भी बात करने लगेंगे. आप भी मजबूरी वशा ठिठोली छोड़ कर गंभीरता चेहरे पर चिपका कर घूमना पसंद करने लगेंगे.
महीने भर पहले से ही आप मित्रों के घर या होटलों मे दावत खाने लगेंगे. तरह तरह के गिफ़्ट्स का आदान होता रहेगा. प्रदान का तो सवाल ही नही है क्योंकि आप तो जा रहे हैं और इसी आधार पर जब आयेंगे तो प्रदान करेंगे.
जब आप अपने शहर से निकलेंगे तो आदतन और अन्य किसी काम के आभाव मे, आपके जानने वाले ५०-६० लोग तो आपको स्टेशन छोड़ने आयेंगे ही.फिर शायद एयर पोर्ट पर आपके परिवार, रिश्तेदार और खास मित्रों के साथ मुस्कराते, रोते हुये सबुततन तस्वीर उतरवाते हुये आप विदेश प्रस्थान पर निकलें. अब अगर आप शहर मे थोड़े जाने जाने वाले जन्तु हों तो शायद आपके शहर का दैनिक अखबार भी आप की तस्वीर के साथ आपके विदेश प्रस्थान का समाचार छाप दे.
अब इतना सब हो जाने के बाद, अगर यहाँ आकर आपको नही जमा या बेहतर तरीके से यूँ कहें कि आप इनको नही जमे, तो आप क्या करेंगे.किस मुँह से वापस लौट सकते हैं? लोग क्या कहेंगे? कैसे फेस करुँगा सब को?

तो, फिर अनूप जलोटा टाइप कुछ याद करते हुये,

"इतना तो करना स्वामी, जब हम देश से निकलें,
किसी को भी खबर ना हो, जब हम देश से निकलें."


बस इतना करना कि आने के पहले किसी को बताना मत. जब सब सेट हो जाये और जम जाये तो अगली बार जाकर बता देना. वरना तो बस विदेश घूमने गये थे वो भी तो सम्मान का विषय है.उससे भी समाज मे बहुत अंतर पड़ता है कि छुट्टियां मनाने विदेश गये थे. वैसे आयकर वालों से थोड़ा पंगा होगा मगर वो तो आसानी से निपटाया जा सकता है. जब बड़े बड़े निकल गये तो तुम तो फौरेन रिटर्न हो, माननीय.

तो कब आ रहे हो?? बताना जरुर.....

-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

17 टिप्‍पणियां:

Jagdish Bhatia ने कहा…

दिल में छुपे दर्दों को बिना एक भी शब्द के बहुत खूबसूरत तरीके से प्रस्तुत किया है।

अनूप शुक्ला ने कहा…

हमें खबर है कि अभी तक आप इस तरह के जवाबी कीर्तन की बाहर बैठकर मौज लिया करते थे। अबकी बार आ भी गये मैदान में। बढ़िया है! लगे रहें। मुझे तो एकबात ही सही लगती है कि दुखी मनुष्य बहुत खोजी प्रवृत्ति का होता है। हर जगह दुखी
रहने के बहाने तलाश ही लेता है। यह अपरिहार्य दुखदाई पहलू होता है कि बेचारा बाहर गया
व्यक्ति देश में कुबेर ही समझा जाता है। और कुबेर की हालत तो कैसी होती है सबको पता है।

Pankaj Bengani ने कहा…

सही कहा आपने

रत्ना ने कहा…

आप इस कदर जो मुस्कुरा कहे है,क्या दर्द है जो छुपा रहे है---। काफी अच्छी गज़ल थी। जाने क्यों याद आ गई।

Jitendra Chaudhary ने कहा…

सही है, उड़नतश्तरी सही जगह उतर रही है।
ये तो तस्वीर का एक रुख है। दूसरा रुख भी है, जब प्रवासी पहली बार अपने घर/गाँव/शहर वापस जाता है। क्या क्या नही परेशानी उठानी पड़ी हमारे पप्पू भैया को। दोनो एपीसोड पढिएगा, फिर कोई राय बनाइएगा।

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

अपनी ही खींची रेखा हैं, जो लगीं बींधने आज हमें
अपना ही निश्चय, चला नहीं जिस पर था किसी और का वश
यह अपना ही चुनाव तो है, अब कहो फूल या तुम काँटे
चाहो तो ये मधुमास करो, चाहो तो कर डालो नीरस

Atul Arora ने कहा…

समीर जी को उकसाने में हमारा भी योगदान गिना जाये। धुँरंधर लिखते हैं भाई साहब।

Sagar Chand Nahar ने कहा…

मैं अपने घर में ही अजनबी बन गया हूँ आकर
मुझे यहाँ देखकर मेरी रूह डर गई है,
सहम के सब आरजुएं कोनों में जा छिपी हैं
लवें बुझा दी है अपने चेहरों की, हसरतों ने
कि शौक पहचानता ही नहीं है
मुरादें दहलीज ही पे सर रख कर मर गई हैं
मैं किस वतन की तलाश में युँ चला था घर से
कि अपने ही घर में भी अजनबी हो गया हूँ आकर

संजय बेंगाणी ने कहा…

कोई परदेश जा कर दुखी हैं तो न जा पाने से दुखी हैं.
जो भी हो आपने लिखा अच्छा हैं. पढ़ कर मजा आया, इस हिसाब से हम सुखी हैं.
:)

ई-छाया ने कहा…

अच्छा लिखा।

Manoshi Chatterjee ने कहा…

बहुत बहुत सही। बिल्कुल हमारे मन की बात बता दी आपने। अगर कहते हैं, सोच लीजिये आने से पहले, राह कठिन है तो परेशानी, और अगर कहते हैं आ जाइए तो आने के बाद भी हमें भी कोसेंगे। :-) तो बिल्कुल आप वाला पोलिसी है हमारा भी, " हाँ बस मेहनत की ज़रूरत है, फिर सब बढ़िया"

बहुत अच्छा लिखा है समीर।

Pavan ने कहा…

Sir, Let me say that, YOU ROCK here in your own rocking way, I dont have hindi fonts with me in my laptop otherwise i could enter some poetic comments here....
-Blessed blogging!

Laxmi N. Gupta ने कहा…

सदैव की तरह बढ़िया लिखा है। जो आगया है वह लौटना चाहते हुए भी लौट नहीं सकता। जो नहीं आया है वह आना चाहता है। प्रवासी त्रिशंकु की तरह हैं, न इधर के न उधर के।

Nidhi ने कहा…

बहुत बढि़या आलेख। सोच रही हूँ आऊँ य ना आऊँ :)!

Udan Tashtari ने कहा…

जगदीश भाई

बात की गहराई पहचानी गई, लिखना सफ़ल. धन्यवाद.

अनूप भाई,

अब तो कीर्तन मंडली मे आ ही गये हैं, मजा आ रहा है.
बहुत धन्यवाद आपका हौसला बढ़ाने के लिये, हमेशा की तरह.

पंकज भाई

धन्यवाद, अनुमोदन के लिये.

जीतू भाई,

धन्यवाद, पप्पू भाईया के दोनो एपिसोड पढ़े.आन्नद आ गया.

राकेश जी

पद्य मे क्या बात कही है आपने, मै पूर्णतः सहमत हूँ.
बहुत धन्यवाद.

अतुल भाई

पूरा पूरा श्रेय आपको दिया जाता है. :)
धन्यवाद.

सागर भाई,

"मैं किस वतन की तलाश में युँ चला था घर से
कि अपने ही घर में भी अजनबी हो गया हूँ आकर "
बहुत सही कह रहे हैं आप.
धन्यवाद
समीर लाल

Udan Tashtari ने कहा…

संजय भाई
धन्यवाद.निश्चित तौर पर आप सुखी हैं, यह सब तो अहसासों की बात है.

छाया भाई
बहुत धन्यवाद.

मानोशी जी
धन्यवाद.देखो कैसा संजोग निकला कि हमारी कलम से आपके मन बात निकल गई.

पवन जी
वैसे आप बिना फोंट हुये भी http://www.kaulonline.com/uninagari/ पर जा कर टाइप करके कट पेस्ट कर सकते हैं.
पधारने और प्रोतसाहन के लिये धन्यवाद.

लक्ष्मी जी

बहुत धन्यवाद.सही फरमा रहे हैं.

निधी जी,
आ जाओ, जी.बहुत बढ़िया है, बस थोड़ी सी मेहनत और लगन..:)
बकिया तो हम लोग हैं ही...

समीर लाल

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) ने कहा…

चिट्ठाचर्चा से यहा पहुचा और समीर जी की एक और शख्सियत को देखा :)

ये पोस्ट और टिप्प्णिया देखकर सबको सीखना चाहिये की एक अच्छा ब्लागर कैसे बनते है :) वाह, आपने सबको रिप्लाई किया है.. मै भी ऐसे ही करता हू :D

kidding...