सोमवार, मार्च 06, 2006

घबरा गया हूँ


परछाई

से अपनी

घबरा गया हूँ

लगे है कि

घर से

दूर

आ गया हूँ.


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8 टिप्‍पणियां:

जयप्रकाश मानस ने कहा…

सचमुच परछाईयाँ डराती हैं । परदेश में अपने होने का बोध नहीं होता अक्सर । वहाँ की भीड़ में व्यक्ति अजनबीयत का शिकार हो जाता है । कम शब्दों में आपने जैसा अपनी कविता में कहा है, वह आपकी कविता की ताकत हैं । वधाई लेवें । मेरी ओर से ।

Udan Tashtari ने कहा…

भाई जय प्रकाशा जी
यह आपका बडप्पन है कि आपने मेरी रचना पसंद की. आभारी हूँ...आशा है भविष्य मे भी आप इस उडान को लेते रहेंगे...यह उडन तश्तरी का सौभाग्य होगा.
समीर लाल

यशवन्त माथुर ने कहा…

कल 16/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

2006 के बाद आज 2012 तक तो घर से दूर रहने की आदत हो गयी होगी ... लेकिन फिर भी कभी कभी सच ही यह दूरियाँ घबराहट दे जाती होंगी ...

Bharat Bhushan ने कहा…

घर से दूर जाकर जीवन सपने-सा बीतता है और परछाइयों का साथ रहता है.
सुंदर कविता.

Saras ने कहा…

खुद पर विश्वास हो और सच साथ हो .....तो सारे डर काफूर हो जाते हैं !!!!

Unknown ने कहा…

अपने साये से घबराना तो अच्छा संकेत नहीं है...

Kavita Rawat ने कहा…

tabhi to apna ghar ghar kahlata hai..
kam shabdon mein jaandar baat..