कुछ बूंदें बारिश की
छाजन से मैने
हाथ अपने बढा के
बारिश की बूंदो को
अंजूरी मे सजा के
क्या पाया है मैने
यूँ सपने जगा के
अपंग समाज है इसे
अपना बना के.
--समीर लाल
--ख्यालों की बेलगाम उड़ान...कभी लेख, कभी विचार, कभी वार्तालाप और कभी कविता के माध्यम से......
हाथ में लेकर कलम मैं हालेदिल कहता गया
काव्य का निर्झर उमड़ता आप ही बहता गया.
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दूसरों की गलतियों से सीखें। आप इतने दिन नहीं जी सकते कि आप खुद इतनी गलतियां कर सके।
-अमिताभ बच्चन के ब्लॉग से
और क्या इस से ज्यादा कोई नर्मी बरतूं
दिल के जख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह
-जाँ निसार अख्तर
अधूरे सच का बरगद हूँ, किसी को ज्ञान क्या दूँगा
मगर मुद्दत से इक गौतम मेरे साये में बैठा है
-शायर अज्ञात
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2 टिप्पणियां:
समीर जी,
बहुत सुंदर पंक्तियाँ हैं। Robert Frost की कविताएँ मैंने भी पढ़ी हैं परंतु आपके द्वारा किया गया रूपांतर मूल कविता से किसी भी प्रकार उन्नीस नहीं है। बहुत बढ़िया।
आपको मेरा प्रयास पसंद आया,बहुत धन्यवाद आपका,शालिनी जी।
समीर लाल
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