शनिवार, मार्च 28, 2026

चमत्कार कर्मों से होते हैं

 


एक पहचान 


अपने शहर का बदला हुआ रूप 


लौटकर जाना होता है जब उस शहर तक जहां आपका बचपन और जवानी गुजरी हो। यादों के कितने जगमग महल होते हैं वहाँ जिन तक पहुँच जाने का मन होता है और साथ ही नत्थी रहती हैं खण्डहर में तब्दील हो चुकी वो यादें जिन्हें अनदेखा कर गुजर जाने को जी चाहता है। तय भी खुद को ही करना होता है किस में खो जायें और किसे नजर अंदाज कर आगे बढ़ जायें

पाकिस्तानी शायरा नोशी गिलानी का शेर है:

उस शहर में कितने चेहरे थे, कुछ याद नहीं सब भूल गए

इक शख़्स किताबों जैसा था, वो शख़्स जुबानी याद हुआ।

तब एक नई किताब उठाई पढ़ने के लिए। पहले ५० पन्ने पढ़ने में दो दिन लगे बस!! जितना समय मिला फटाफट पढ़ गए। आनंद आ रहा था। समय उड़ता गया और हम पढ़ते गए।

फिर न जाने क्यूँ किताब के पाठ नीरस लगने लगे। पता नहीं क्यूँ अध्याय ने अपनी पकड़ खो दी थी। ५१ वां पन्ना और आज चौथा दिन है, वहीं अटक कर रह गया हूँ। 

याद आता है एक बार और ऐसे ही अटक गया था किसी और किताब के किसी पन्ने पर। मगर तब बात और थी- उस पन्ने ने बांध लिया था। डूब गया था उस पन्ने में और डूब इतनी गहरी कि उबर पाना ही नहीं हो पा रहा था। न जाने यादों की किस दुनिया में डूबो कर ले गया। किताब बंद कर के किनारे रख दी फिर भी न जाने कैसे वो पन्ना आंखों में तैरता रहा। कई दिनों तक जब वो किताब खोलता तो बस वही पन्ना बाँचता और सब कुछ ठहर जाता जैसे किसी गहरे शांत समुन्द्र का पानी मगर भीतर वैसी ही हलचल मचाता।

कई दिन लगे थे उस पन्ने से आगे बढ़ने में। मगर न जाने क्यूँ कुछ आगे बढ़ कर फिर लौटा उसी पन्ने पर और फिर उस किताब को वहीं पढ़ना रोक दिया। उस अध्याय को खतम करने का कभी मन ही नहीं हुआ। उसमें डूबे रहना अच्छा लगता था। किसी तरह खुद को समझाया कि यादें अच्छी हों या बुरी- उसमें जीते रहना तो ठीक नहीं। न जाने क्या मन ने समझा मगर कुछ नई किताबें उठा ली बाँचने को। कुछ नयापन आया – बहाव ने एक नया मायने दिया यात्रा को। शायद कुछ ताजगी भी आगे बढ़ते रहने की।

मगर यह अध्याय – इसने रोका तो मगर डुबाया नहीं। बस!! एक रोक सी लगा दी आगे बढ़ने की चाह पर। बार बार लौटता उस पन्ने पर और रुका रहता – इतनी नीरसता और कभी किसी किताब के किसी अध्याय में पहले कभी नहीं दिखी। शायद मेरे पठन का दायरा ही कम रहा होगा।

आज तय किया कि अब इस किताब को आगे नहीं पढ़ूँगा। एक नई किताब उठा ली – इसमें नयापन है, बहाव का अहसास है अतः मनभावन है। अच्छा लग रहा है इसे पढ़ना हाल फिलहाल तो। पुनः पठन ढर्रे पर आया है। रफ्तार भी मिली है और आनंद का भाव भी।

कभी सोचता हूँ तो किताबों से गुजरना और हमारा जीवन- कितनी समानता है दोनों में। जीवन भी तो एक किताब ही है। पन्ना दर पन्ना, एक अध्याय के बाद दूसरा अध्याय – न जाने कितने पात्र और न जाने कितने वाकयात।

इस किताब में भी कभी कहीं हम डूब जाते हैं तो कभी कहीं खो जाते हैं- खुश होते हैं तो कभी किसी पन्ने पर मन विचलित हो जाता है और हम खिन्नता का भाव लिए उचाट मन से जीने लगते हैं।

शायद हम भूल जाते हैं कि जिंदगी के सफर की किताब भी हम खुद ही चुन रहे होते हैं और हर मोड पर उस किताब को बदल कर नई किताब उठा लेने का विकल्प भी हमारे ही हाथ में होता है। होता तो नए सिरे से नई किताब लिख देने का विकल्प भी है मगर हम उस पन्ने से उबर ही नहीं पाते हैं। हम उस पन्ने को, उस अध्याय को ही अपना प्रारब्ध मान कर किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करते रहते हैं। कभी तो प्रभु कृपा होगी और जीवन बदलेगा।

काश हम जान पाते कि चमत्कार आसमान से नहीं बरसते वो कर्मों का परिणाम होते हैं।

अगर जीवन में परिवर्तन देखना है तो खुद को बदलना होगा। खुद को नहीं बदलोगे तो कुछ भी नहीं बदलेगा।

-समीर लाल ‘समीर’

  

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2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति. इस खूबसूरत विचार धारा के लिए बधाई.
सच जीवन एक पुस्तक ही तो है ” यह पहले से लिखा हुआ भाग्य नहीं, बल्कि हमारे विचारों, कर्मों और निर्णयों से निरंतर रची जाने वाली कहानी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का लेखक है। सुख-दुख, सफलता-असफलता ये सभी अध्याय हमें परिपक्व बनाते हैं। सकारात्मक सोच इस पुस्तक को प्रेरणादायक बनाती है, जबकि नकारात्मक विचार इसकी सुंदरता को कम कर देते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने विचारों को उज्ज्वल रखें, क्योंकि वही हमारे जीवन की दिशा और अर्थ तय करते हैं।
एक बार फिर बधाई.

बेनामी ने कहा…

Ragini Shrivastava