शनिवार, जनवरी 16, 2021

कलयुग का सेल्फी युग

 



जैसे एक आदमी होते हैं कई आदमी उसी तरह एक युग में होते हैं कई युग.

कलयुग के इस सेल्फी युग में जब व्यक्ति फोन खरीदने निकलता है तब उसमें फोन की नहीं, उस फोन में लगे कैमरे की खूबियाँ देखता है.. फोन की साऊन्ड क्वालिटी में भले ही थोड़ी खड़खड़ाहट हो, चाहे जगह जगह सिगनल लूज हो जायें.. मगर कैमरे की रिजल्ट चौचक होना चाहिये. यहाँ चौचक से यह तात्पर्य नहीं है कि तस्वीर की डीटेल एकदम विस्तार से दिखाये. अच्छे और चौचक रिजल्ट वाले कैमरे का यहाँ अर्थ है कि हम भले ही सच में कैसे भी दिखते हों, फोटो में कैमरा हमें सलमान और पत्नी को कटरीना दिखाये. बाकी की सारी डीटेल विस्तार से छिपाये, यही उम्मीद रहती है दिल में.

कहने का तात्पर्य यह कि आदतें कुछ यूँ बदली कि व्यक्ति खरीदता फोन है, चाहता अद्भुत कैमरा है जो उसे हीरो दिखाये. यह वैसा ही है जैसे इन्सान चुनता अपना नेता है मगर उसे मिलता फकीर है. और फकीर भी ऐसा..जिसके सेल्फी के चलते तो कई बार सेल्फी सोचती होगी अगर ये न होते तो मेरा क्या होता?  इसी शौक के चलते जब वे कश्मीर में नई बनी लंबी सुरंग में खड़े सेल्फी खींच कर यहाँ मोह मोह के धागे सुलझा रहे थे, उस वक्त ज्ञानी लोग उनकी इस सेल्फी के खींचने के कारण की पहेली बुझा रहे हैं.

सेल्फी का माहौल ऐसा चला कि सेल्फी खींचना एक विधा हो निकली. फटो का नाम बदल कर सेल्फी हो गया.   फोटो स्टूडियो खुल गये सेल्फी खींचने वाले..अपना अटपटा सा विज्ञापन करते कि हमारे यहाँ नेचुरल सेल्फी खींची जाती है..बिना सोचे हुए कि नेचुरल चाहता कौन है? लोग तो अपने अच्छे खासे चेहरे को पाऊट बना बना कर बन्दर सा कर लेते हैं..उस पर से फोटो शॉप फोन में ही..कभी कुकर जुबान लगा कर तो कभी सींग लगा कर.

ग्रुप टूर बस से उतरे लोग, हर पर्यटन स्थल के फेमस प्वाईंटस पर कतारबद्ध सेल्फी खींचने के लिए भीड़ लगाये खड़े हैं..दूर से देखो तो भेद कर पाना मुश्किल हो जाये कि सेल्फी खींचने वालों की कतार है या नोट बन्दी के समय वाली एटीएम की कतार है या अच्छे दिनों का इन्तजार करने वालों की..यहाँ भी संभावना वही कि जब तक नम्बर आये आये, बस चलने का समय हो गया..जो सेल्फी खींच पाया उसके चेहरे पर वही विजयी भाव जैसे उस वक्त जो नोट निकाल लेता था मशीन में नोट खत्म होने के पहले.

लम्बी लम्बी सेल्फी स्टिक निकल पड़ी हैं..हाथ का विस्तार सीमित है..लट्ठ का असीमित..शायद इसी लिए लठेतों से लोग डरते हैं. स्टिक दूर से सेल्फी लेगा..मतलब की ज्यादा कवरेज..कवरेज का जमाना है. जितना ज्यादा कवरेज, उतना सफल व्यक्तित्व.

बुजुर्ग परिशां दिखे..कि यह तो हद हुई कि दादी मर गई और बंदा उनकी डेथ बॉडी के साथ सेल्फी उतार कर फेस बुक अपडेट कर रहा है..है तो हद ही मगर उससे कम..जहाँ बंदें को बचाने के बदले उसकी आत्म हत्या की कोशिश को अपने बैकग्राऊण्ड में कैच कर शेयर कर देने की होड़ मची हो.

आज का इन्सान वक्त की महत्ता को अहसासता नहीं...आज का इन्सान गुलाब की महक को महकता नहीं..आज का इन्सान किसी के दर्द से गमजदा होता नहीं..आज का इन्सान उन्हें कैद करता है अपने फोन के कैमरे के माध्यम से..अपनी सेल्फी के साथ.....मात्र वक्त के साथ वो लम्हे बाँटने के लिए जो उसने खुद मिस कर दिये सेल्फी खींच कर बांटने में...बिना उन्हें अहसासे..

न जाने किस ओर ले जायेगा ये सेल्फी का युग इस युग को..इसलिए आज एक सेल्फी खींच लेते हैं कि कल काम आयेगी आज को परिभाषित करने के लिए...

-समीर लाल ’समीर’  

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी १७, २०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57776633

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शनिवार, जनवरी 09, 2021

हे मानस के राजहंस, तुम भूल न जाने आने को!!

 

जिन्दगी का सफ़र भी कितना अजीब है. रोज कुछ नया देखने या सुनने को मिल जाता है और रोज कुछ नया सीखने.

पता चला कि दफ्तर की महिला सहकर्मी का पति गुजर गया. बहुत अफसोस हुआ. गये उसकी डेस्क तक. खाली उदास डेस्क देखकर मन खराब सा हो गया. आसपास की डेस्कों पर उसकी अन्य करीबी सहकर्मिणियाँ अब भी पूरे जोश खरोश के साथ सजी बजी बैठी थी. न जाने क्या खुसुर पुसुर कर रहीं थी. लड़कियों की बात सुनना हमारे यहाँ बुरा लगाते हैं, इसलिए बिना सुने चले आये अपनी जगह पर.

जो भी मिले या हमारे पास से निकले, उसे मूँह उतारे भारत टाईप बताते जा रहे थे कि जेनी के साथ बड़ा हादसा हो गया. उसका पति गुजर गया. खैर, लोगों को बहुत ज्यादा इन्टरेस्ट न लेता देख मन और दुखी हो गया. भारत होता तो भले ही न पहचान का हो तो भी कम से कम इतना तो आदमी पूछता ही कि क्या हो गया था? बीमार थे क्या? या कोई एक्सीडेन्ट हो गया क्या? कैसे काटेगी बेचारी के सामने पड़ी पहाड़ सी जिन्दगी? अभी उम्र ही क्या है? फिर से शादी कर लेती तो कट ही जाती जैसे तैसे और भी तमाम अभिव्यक्तियाँ और सलाहें. मगर यहाँ तो कुछ नहीं. अजब लोग हैं. सोच कर ही आँख भर आई और गला रौंध गया.

हमारे यहाँ तो आज मरे और गर सूर्यास्त नहीं हुआ है तो आज ही सूर्यास्त के पहले सब पहुँचाकर फूँक ताप आयें. वैसा अधिकतर होता नहीं क्यूँकि न जाने अधिकतर लोग रात में ही क्यूँ अपने अंतिम सफर पर निकलते हैं. होगी कोई वजह..वैसे टोरंटो में भी रात का नजारा दिन के नजारे की तुलना में भव्य होता है और वैसा ही तो बम्बई में भी है. शायद यही वजह होगी. सोचते होंगे कि अब यात्रा पर निकलना ही है तो भव्यता ही निहारें. खैर, जो भी हो मगर ऐसे में भी अगले दिन तो फूँक ही जाओगे.

मगर यहाँ अगर सोमवार को मर जाओ तो शनिवार तक पड़े रहो अस्पताल में. शानिवार को सुबह आकर सजाने वाले ले जायेंगे. सजा बजा कर सूट पहना कर रख देंगे बेहतरीन कफन में और तब सब आपके दर्शन करेंगे और फिर आप चले दो गज जमीन के नीचे या आग के हवाले. आग भी फरनेस वाली ऐसी कि ५ मिनट बाद दूसरी तरफ से हीरा का टुकड़ा बन कर निकलते हो जो आपकी बीबी लाकेट बनवाकर टांगे घूमेगी कुछ दिन. गज़ब तापमान..हड्ड़ी से कोयला, कोयले से हीरा जैसा परिवर्तन जो सैकड़ों सालों साल लगा देता है, वो भी बस ५ मिनट में.

खैर, पता लगा कि जेनी के पति का फ्यूनरल शनिवार को है. अभी तीन दिन हैं. घर आकर दुखी मन से भाषण भी तैयार कर लिया शेर शायरी के साथ जैसा भारत में मरघट पर देते थे. शायद कोई कुछ कहने को कह दे तो खाली बात न जाये इतने दुखी परिवार की. बस, यही मन में था और क्या.

शुक्रवार को दफ्तर में औरों से पूछा भी कि भई, कितने बजे पहुँचोगे? कोई जाने वाला मिला ही नहीं. बड़ी अजीब बात है? इतने समय से साथ काम कर रहे हैं और इतने बड़े दुखद समय में कोई जा नहीं रहा है. हद हो गई. सही सुना था एक शायर को, शायद यही देखकर कह गया होगा:

सुख के सब साथी, दुख का न कोई रे!!’

आखिर मन नहीं माना तो अपने एक साथी से पूछ ही लिया कि भई, आप क्यूँ नहीं जा रहे हो?

वो बड़े नार्मल अंदाज में बताने लगा कि वो इन्वाईटेड नहीं है.

लो, अब उन्हें फ्यूनरल के इन्विटेशन का इंतजार है. हद है यार, क्या भिजवाये तुम्हें कि:

भेज रही हूँ नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें बुलाने को,

हे मानस के राजहंस, तुम भूल न जाने आने को.’

हैं? मगर बाद में पता चला कि वाकई उनका फ्यूनर है STRICTLY ONLY BY INVITATION याने कि निमंत्रण नहीं है तो आने की जरुरत नहीं है.

गजब हो गया भई. तो निमंत्रण तो हमें भी नहीं आया है. फिर कैसे जायेंगे. कैसे बाँटूं उसका दर्द. हाय!!

सोचा कि शायद इतने दुख में भूल गई होगी. इसलिये अगले दिन सुबह फोन लगा ही लिया. शायद फोन पर ही इन्वाईट कर ले. चले जायेंगे. भाषण पढ देंगे. आंसू बहा लेंगे. भारत में राजनीति की है , आंसू तो कभी भी बहा सकते हैं

पता चला कि ब्यूटी पार्लर के लिए निकल गई है फ्यूनरल मेकअप के लिए. भारतीय हैं तो थोड़ा गहराई नापने की इच्छा हो आई और जरा कुरेदा तो पता चला कि ब्लैक ड्रेस तो तीन दिन पहले ही पसंद कर आई थी आज के लिए और मेकअप करवा कर सीधे ही फ्यूनरल होम चली जायेगी. कफन का बक्सा प्यूर टीक का डिज़ायनर रेन्ज का है फलाना कम्पनी ने बनाया है और गड़ाने की जमीन भी प्राईम लोकेशन है मरघटाई की. अगर इन्विटेशन नहीं है तो आप फ्यूनरल अटेंड नहीं कर सकते हैं मगर अगर चैरिटी के लिए डोनेशन देना है तो ट्रस्ट फण्ड फलाने बैंक में सेट अप कर दिया गया है, वहाँ सीधे डोनेट कर दें.

हम भी अपना मूँह लिए सफेद कुर्ता पजामा वापस बक्से में रख दिए और सोचने लगे कि अगर हमारे भारत में भी ऐसा होता तो भांजे का स्टेटमेन्ट भी लेटेस्ट फैशन के हिसाब से निमंत्रण पत्र में जरुर रहता:

"मेले मामू को छनिवाल को फूँका जायेगा. आप जलूल आना....चोनू"

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी १० ,२०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57625431

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शनिवार, जनवरी 02, 2021

नए जमाने के साथ कदमताल

 


नया जमाना आ गया था. एक या दो बच्चे बस. बेटा या बेटी-क्या फरक पड़ता है? दोनों ही एक समान.

शिब्बू नये जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलाने में विश्वास करने वाला था. खुली सोच का मालिक. ऐसा वो भी सोचता था और उसके जानने वाले भी.

एक प्राईवेट फर्म में सुपरवाईजर था.

एक बेटी की और बस! तय कर लिया कि इसी को पाल पोस कर इसे बहुत अच्छा भविष्य देना है. सबने खूब तारीफ की. माँ बाप ने कहा कि एक बेटा और कर लो, वो नहीं माना. माँ बाप को पुरातन ठहारा दिया और खुद को प्रगतिशील घोषित करते हुए बस एक बेटी पर रुक गया. पत्नी की भी कोई बात नहीं मानी. पौरुष पर उठती उंगलियों को प्रगतिशील मानसिकता ठेंगा दिखाती रही और वो अपने फैसले पर अडिग रहा.

खूब पढ़ाया बिटिया को. इंजिनियर बना गई आई टी में. नया जमाना था. आई टी का फैशन था. कैम्पस इन्टरव्यू हुआ और बिटिया का मल्टी नेशनल में सेलेक्शन हो गया. सब जैसा सोचा था वैसा चला.

मंहगाई इस बीच मूँह खोलती चली गई. माँ की लम्बी बिमारी ने जमा पूंजी खत्म कर दी. उम्र के साथ रिटायरमेन्ट हो गया. नया जमाना, नये लोग. पढ़ाई और नया काम सीखने में वह पुराना ही रह गया, बिना अपडेट हुआ..वर्कफोर्स से बाहर हो गया. उम्र ५८ पार हो गई. नया कुछ करने का जज्बा और ताकत खो गई. घर बैठ गया. बेटी उसी शहर में नौकरी करती रही. कई लाख का पैकेज. जरुरत भी क्या है कुछ करने की, वह सोचा करता. प्राईवेट कम्पनी में था तो न कोई पेंशन ही बनी और न कोई फंड मिला.

बिटिया को तो समय के साथ साथ बड़ी होना ही था तो बड़ी होती गई. शादी की फिक्र माँ को घुन की तरह खाने लगी मगर शिब्बू-उसे जैसे इस बात की फिक्र ही न हो.

पत्नी कहती तो झल्ला जाता कि तुम क्या सोचती हो, मुझे चिन्ता नहीं? जवान बेटी घर पर है. बाप हूँ उसका..चैन से सो तक नहीं पाता मगर कोई कायदे का लड़का मिले तब न!! किसी भी ऐरे गैरे से थोड़े ही न बाँध दूँगा. यह उसका सधा हुआ पत्नी को लाजबाब कर देना वाला हमेशा ही जबाब होता.

पत्नी अपने भाई से भी अपनी चिन्ता जाहिर करती. उसने भी रिश्ता बताया मगर शिब्बू बात करने गया तो उसे परिवार पसंद न आया. दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी लड़के पर थी. कैसे अपनी बिटिया को उस घर भेज दे.

पत्नी इसी चिन्ता में एक दिन चल बसी. घर पर रह गये शिब्बू और उसकी बिटिया.

जितने रिश्ते आये, किसी न किसी वजह से शिब्बू को पसंद न आये. लड़की पैंतीस बरस की हो गई मगर शिब्बू को कोई लड़का पसंद ही नहीं आता.

लड़की की तन्ख्वाह पर ठाठ से रहता था और बिटिया ही उसकी देखरेख करती थी.

उस रोज शिब्बू को दिल का दौरा पड़ा और शाम को वो गुजर गया.

उसको डायरी लिखने का शौक था. उसकी डायरी का पन्ना जो आज पढ़ा: १० वर्ष पूर्व यानि जब बिटिया २५ बरस की थी और नौकरी करते तीन बरस बीत गये थे तथा शिब्बू रिटायर हो चुका था उस तारीख के पन्ने में दर्ज था...

शीर्षक: बिटिया की शादी

और उसके नीचे मात्र एक पंक्ति:

" मैं स्वार्थी हो गया हूँ."

आज भी न जाने कितने शिब्बू हमारे समाज में हैं जो कभी प्रगतिशील कहलाये मगर अपने स्वार्थवश बिटिया का जीवन नरक कर गये. प्रगतिशील इंसान की सोच भी कभी कितनी पतनशील हो सकती है?

बिटिया अब घर पर अकेले रहती है. अभी अभी दफ्तर सर घर जाने के लिये निकली है-बेमकसद!!

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी ०३,२०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57462723


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