शनिवार, जनवरी 11, 2020

काश!! आशा पर आकाश के बदले देश टिका होता!!


काश!! आशा पर आकाश के बदले देश टिका होता!! वैसे सही मायने में, टिका तो आशा पर ही है.
जिन्दगी की दृष्टावलि उतनी हसीन नहीं होती जितनी फिल्मों में दिखती है. इसमें बैकग्राऊंड म्यूजिक म्यूट होता है, वरना तो जाने कब के गाँव जाकर बस गये होते. मुल्ला मचान पर बैठे, खेतों में नाचते गाते-मेरे देश की धरती, सोना उगले से..जिन्दगी नहीं कटा करती. काम करना पड़ता है और फिर किस्मत. वो तो दो कौड़ी की भी हिस्से में नहीं आई. बिना मशक्कत वो भी नहीं आती निठ्ठलों के हाथ.
शहर में नल में पानी नहीं आता और न अधिकतर समय बिजली-खेत में खों खों करते क्या खाक सिंचाई करोगे?
बारिश है कि ससुरी, बरसती ही नहीं. गरमी हालत खराब किये रहती है.
किस लिये ऐसा हो रहा है, सोचा कभी-पेड़ काटने के पहले और पेड़ न लगाने के बाद?
आशा लगाये बैठे हो चातक की तरह मूँह बाये कि हे बादल!! आ जाओ. बादल तो आते हैं मगर वो नहीं जिन्हें बुलाया. उनके न आने से संकट के बादल छाने लगते हैं. लो आ गये, बुलाये थे न!! काहे नहीं साफ साफ कहे, कि हे पानी वाले बादल, आ जाओ. मारे अनुष्ठान और यज्ञ सब कर डाले मगर डिमांड, एकदम अगड़मबगड़म!! तो लो, बादल मांगे थे, बादल आ गये-संकट के बादल छा गये.
और फिर तुम रोने लगते हो. अपनी गलती मानने तैयार ही नहीं. तुमको जार जार रोता देख, संयम खोता देख, भगवान भी रहम खा जाता है और हड़बड़ी में इतने सारे बादल भेज देता है कि बाढ़ आने लगती है.
बादल आये मगर इतने आये कि साथ फिर संकट के बादल ले आये.
इस बार भी तुमने साफ साफ नहीं बताया कि बस, काम भर के पानी वाले बादल भेजना. बस, रोने लग गये कि वो रोता देख समझ ही जायेगा.
वैसी ही आशा सरकार से करते हो. ७०% को तो पता ही नहीं कि चाहिये क्या सरकार से. बस, जिस मूँह सुनो तित-सरकार कुछ करती ही नहीं और लगे रोने.
कितनी गलत बात करते हो कि सरकार कुछ करती ही नहीं. इतना सारा तो कर रही है, देखो, सरकार तुमको लूट रही है. सरकार मँहगाई बढ़ा रही है. सरकार भ्रष्टाचार मचा रही है. सरकार विद्वेष फैला रही है. सरकार पाकिस्तान से सत्तर साल से शांति वार्ता चला रही है. सरकार गद्दी बचा रही है. सरकार गठबंधन कर रही है. सरकार अपने देश पर ही हमला करने वालों को माफ करने में लगी है, सरकार देश के भीतर भाषा और धर्म के आधार पर विघटन का सपना संजोए लोगों को मौन रह समर्थन दे रही है, सरकार ये कर रही है, सरकार वो कर रही है..अब क्या जान लोगे सरकार की. इत्ते के बाद भी कोई समय बच रहेगा क्या कि वो खोजे तुम क्या चाहते हो उससे करवाना?
कितने आराम से निश्चिंत होकर पान दबाये घर लौट आते हो ठेले पर बतिया कर. काम नहीं मिला, सरकार कुछ नहीं कर रही. खाना नहीं बना, सरकार जिम्मेदार. बच्चे को नौकरी नहीं मिल रही, सरकार जिम्मेदार. इलाज के आभाव में पिता जी गुजर गये, सरकार जिम्मेदार. बच्चा नहीं हुआ, सरकार जिम्मेदार, कुत्ते ने काट लिया, सरकार जिम्मेदार...और तुम, तुम्हारी जिम्मेदारी?
काहे चुने थे भाई ऐसी सरकार? साँप काटे था क्या?
बस, शाम शराब पिला दी या धमका दिया या कुछ रकम टिका दी और तुम समझे कि सब काम बन गया और लगा आये अपना सिक्का!! तो अब भुनाओ.
भईया मिले और कहने लगे कि हमें तो कोई पसंद ही नहीं इसलिये हम तो सिक्का लगाये ही नहीं और ऐन चुनाव के दिन, शहर से दूर, परिवार के साथ पिकनिक मना आये.
तो अब तुम्हारे हिस्से में पिकनिक ही बची है. खूब मनाईये और कोसिये सुबह शाम, कि सरकार कुछ नहीं कर रही.
किसी और ने नहीं चुनी है. तुमने नहीं चुनी, इससे क्या अंतर पड़ता है. भुगतना तो पड़ेगा तुम्हें ही उस पिकनिक के जश्न का मोल!!
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार जनवरी १२, २०२० में प्रकाशित:
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