रविवार, नवंबर 17, 2019

लबड़हत्था: प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती


बचपन से ही मैं बाँये हाथ से लिखता था. लिखने से पहले ही खाना खाना सीख गया था, और खाता भी बांये हाथ से ही था. ऐसा भी नहीं था कि मुझे खाना और लिखना सिखाया ही बाँये हाथ से गया हो लेकिन बस जाने क्यूँ, मैं यह दोनों काम ही बांये हाथ से करता.
पहले पहल सब हँसते. फिर डाँट पड़ने का सिलसिला शुरु हुआ.
अम्मा हुड़कती कि लबड़हत्थे से कौन अपनी लड़की ब्याहेगा? (उत्तर प्रदेश में बाँये हाथ से काम करने वालों को लबड़हत्था कहते हैं)
आदत छुड़ाने के लिए खाना खाते वक्त मेरा बाँया हाथ कुर्सी से बाँध दिया जाता. मैं बहुत रोता. कोशिश करता दाँये हाथ से खाने की लेकिन जैसे ही बाँया हाथ खुलवा पाता, उसी से खाता. मुझे उसी से आराम मिलता.
एक मास्टर साहब रखे गये थे, नाम था पं.दीनानाथ शर्मा. रोज शाम को आते मुझे पढ़ाने और खासकर दाँये हाथ से लिखना सिखाने. जगमग सफेद धोती, कुर्ता पहनते और जर्दे वाला पान खाते. ऐसा नहीं कि बाद में और किसी मास्टर साहब ने मुझे नहीं पढ़ाया लेकिन उनका चेहरा आज भी दिमाग में अंकित है.
बहुत गुस्से वाले थे, तब मैं शायद दर्जा तीन में पढ़ता था. जैसे ही स्कूल से लौटता, वो घर पर मिलते इन्तजार करते हुए. पहला प्रश्न ही ये होता कि आज कौन से हाथ से लिखा? स्कूल में दाँये हाथ से लिख रहे थे या नहीं. मैं झूठ बोल देता, ’हाँ’. तब वो मुझसे हाथ दिखाने को कहते और बाँये हाथ की उँगलियों में स्याहि लगी देख रुलर से हथेली पर मारते. उनकी मुख्य बाजार में कपड़े की दुकान थी. पारिवारिक व्यवसाय था. उन्हीं में से थान के भीतर से निकला रुलर लेकर आते रहे होंगे क्यूँकि जिन दो साल उन्होंने मुझे पढ़ाया, एक सा ही रुलर हमेशा लाते.
फिर मैं जान गया कि वो स्याहि देखकर समझ जाते हैं. तब स्कूल से निकलते समय वहीं पानी की टंकी पर बैठ कर मिट्टी लगा धो धोकर स्याहि छुड़ाता और फिर घर आता.
मगर दीनानाथ मास्टर साहब फिर दाँये हाथ पर स्याहि का निशान न पाकर समझ जाते कि कुछ बदमाशी की है. मैं फिर मार खाता.
इसी दौर में मैने यह भी सीख लिया कि सिर्फ स्याहि धोने से काम नहीं चलेगा तो दाँये हाथ की उँगलियों में जानबूझ कर स्याहि लगा कर लौटता. ऐसा करके काफी हद तक मास्टर साहब को चकमा देता रहा और मार खाने से बचता रहा.
फिर जाने कैसे उनकी पहचान मेरे क्लास टीचर से हो गई. फिर तो वो उनसे पूछ कर घर पर इन्तजार करते मिलते. गनीमत यह रही कि परीक्षा में नम्बर बहुत अच्छे आ जाते तो बाँये हाथ से लिखना धीरे धीरे घर में स्वीकार्य होता चला गया और दीनानाथ मास्टर साहब को विदा दे दी गई. हाँ, खाने के लिए फिर भी बहुत बाद तक टोका गया.
उसी बीच जाने कहाँ की शोध किसी अखबार में छपी कि बाँये हाथ से काम करने वाले विलक्षण प्रतिभा के धनी होते हैं और किसी सहृदय देवतुल्य व्यक्ति ने पिता जी को भी वो पढ़वा दिया. पिता जी ने पढ़ा तो माता जी को ज्ञात हुआ. एकाएक मैं लबड़हत्थे से प्रमोट हो कर विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्तियों की जमात में आ गया.
तब मैं चाहता था कि वो मेरे बड़े भाई को अब डांटे और मास्टर साहब को लगवा कर उसे रुलर से मार पड़वाये कि बाँये हाथ से लिखो. मगर न जाने क्यूँ ऐसा हुआ नहीं. बालमन था, मैं इसका कारण नहीं जान पाया या शायद मेरी विलक्षणता अलग से दिखने लगे इसलिये उसे ऐसे ही छोड़ दिया होगा. ऊँचा पहाड़ तो तभी ऊँचा दिख सकता है, जब नापने के लिए कोई नीचा पहाड़ भी रहे. वरना तो कौन जाने कि ऊँचा है कि नीचा.
लबड़हत्थों की जमात में अमिताभ बच्चन, बराक ओबामा जैसे अनेक लोगों का साथ मिला तो आत्मविश्वास में और बढ़ोतरी हुई और मेरी उस शोध परिणाम में घोर आस्था जाग उठी. काश, उस पेपर की कटिंग मेरे पास होती तो फ्रेम करा कर नित दो अगरबत्ती लगाता और ताजे फूल की माला चढ़ाता.
शोध परिणाम तो खैर समय, जरुरत, बाजार और स्पान्सरर्स/ प्रायोजकों के हिसाब से बदलते रहते हैं मगर अपने मतलब का शोध फ्रेम करा कर अपना काम तो निकल ही जाता. फिर नये परिणाम कोई से भी आते रहते, उससे मुझे क्या?
किन्तु सोचता हूँ क्या इससे वाकई कोई फरक पड़ता है कि आप बाँये हाथ से काम करते हैं या दाँये? फिर क्यूँ न जो सहज लगे, सरल लगे और जो स्वभाविक हो, उसे उसके स्वतंत्र विकास की लिए जगह दे दी जाये..प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती. प्रतिभा तो मेहनत और लगन का परिणाम होती है,मेहनत किस हाथ/तरह से की गई उसका नहीं.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर १७, २०१९ में प्रकाशित:
http://epaper.subahsavere.news/c/45837393



#Jugalbandi
#जुगलबंदी
#व्यंग्य_की_जुगलबंदी
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
#Hindi_Blogging

Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, नवंबर 09, 2019

ये स्वयंभू सेलीब्रेटी समाज का बंटाधार कर देंगे



कुछ लोग नमस्कार करने में पीर होते हैं और कुछ नमस्कार करवाने में. नमस्कार करने वाले पीर, चाहे आपको जाने या न जाने, नमस्ते जरुर करेंगे. कुछ हाथ जोड़ कर और कुछ सर झुका कर, शायद उनको मन ही मन यह शान्ति प्राप्त होती होगी कि अगले को नमस्ते किया है और उसने जबाब भी दिया है याने वो पहचानने लगा है और साथ वालों पर उसकी पहचान की धाक पड़ेगी.
नमस्कार करवाने वाले पीर, सीधे चलते चलते, इतना स्टाइल में धीरे से सर को झटकते हैं और कभी कभी सिर्फ आँख को कि मानो आपको नमस्ते कर रहे हों और जब आप पलट कर नमस्ते करते हो तब वो इतनी जोर से जबाबी नमस्ते करते हैं जैसे कि पहल आपने की हो. अक्सर वो अपनी वापसी नमस्ते के साथ हाल भी पूछते नजर आ जाते हैं कि कैसे हो? और बिना जबाब सुने आगे भी बढ़ चुके होते हैं अगले नमस्ते के इन्तजार में. इस केटेगरी में नेता बनने की पहली पायदान पर खड़े बहुतेरे शामिल रहते हैं और उससे उपर की पायदान वाले तो इसी पायदान से गुजर कर निकले हैं अतः उनकी तो खैर आदत हो गई है.
वैसे नमस्कार, प्रणाम, चरण स्पर्श आदि पहले कभी आदर, अभिवादन के सूचक रहे होंगे किन्तु समय के साथ साथ मात्र पहचान और नाम जमाने की औपचारिकता मात्र रह गये हैं. नेताओं को उनके चेले इतनी तत्परता से चाचा कह कर चरण स्पर्श करते हैं जितनी जोर शोर से उन्होंने अपने सगे चाचा की तो छोड़ो, कभी अपने पिता जी का भी न किया होगा.
इन नेताओं के चेलों को भी पता होता है कि चाचा को चरण स्पर्श करवाना कितना पसंद है. अतः जब आप जैसे किसी को उनसे मिलवाने ले जाते हैं तो आपकी रीढ़ की हड्डी का जाने कौन सा हिस्सा, चाचा से मिलवाते हुए, पीछे से दबाते हैं कि आप थोड़ा सा झुक ही जाते हो और चाचा, एकदम से, खुश रहो के आशीष के साथ पूछते हैं –बोलो, काम बोलो. कैसे आना हुआ?
और इन सबके आगे एक जहाँ और भी याद आता है. पहले हम किसी को पसंद करते थे और पसंद पसंद करते प्यार कर बैठते थे. याने किसी को लाइक करना लव करने की पहली पायदान होती थी. तब के जमाने में लड़का लड़की को, लड़की लड़के को लाइक करके धीरे धीरे लव यू तक का सफर पूरा किया करते थे. अब तो खैर लड़का लड़की का फार्मूला भी आवश्यक न रहा. कोई भी किसी को लाइक करके लव तक का सफर कर सकता है.
ये सब दुनियावी बातें अब सड़क से उठकर इन्टरनेट पर आ पहुँची है मगर व्यवहार वैसा का वैसा ही है. मगर यहाँ लाइक, मात्र लव का गेट वे न होकर नमस्कार, प्रणाम और चरण स्पर्श आदि सबका पर्याय बन चुका है.
फेसबुक पर यदि कोई आपकी फोटो को, लिखे को या पोस्ट को लाइक करे तो कतई ये न समझ लिजियेगा कि उसे आप बहुत पसंद आ गये. आपका फोटो फिल्म स्टार जैसा है और आपका लेखन बहुत उम्दा है. इनमें से अधिकतर ने तो उपर बताई किसी एकाध वजह से पसंद किया होता है और वो भी सिर्फ इसलिए चूँकि फेसबुक एक क्लिक मात्र में लाइक करने की अद्भुत क्षमता प्रदान करता है - बस इससे ज्यादा कुछ भी नहीं. अन्यथा यदि लिखकर बताना होता कि आप को लाइक किया है तब देखते कि कितने सही में लाइक करते हैं.
अब आप ही देखिये, वो तो एक एक करके सौ जगह पसंद बिखरा कर चले गये मगर जब इन सौ लोगों ने पलट नमस्ते में इनकी तस्वीर या पोस्ट लाइक की, तो वहाँ एक साथ सौ लाइक दिखने लगे और जनाब हो लिए सेलीब्रेटी टाईप. ऐसे लोग आपको लाइक करने तभी आते हैं जब इन्होंने अपनी टाईम लाईन पर कुछ नया पोस्ट किया हो और उन्हें लाइक की दरकार हो.
इनका संपूर्ण दर्शन मात्र इतना है कि मैं तेरी पीठ खुजाता हूँ, तू मेरी खुजा!!
इन फेसबुकलतियों को इन लाइकों से वही उर्जा प्राप्त होती है जैसी इन फूहड़ चुटकुले बाज कवियों को तालियों से, इन छुटभय्यिया नेताओं को भईया जी नमस्ते से और इन सड़क छाप स्वयंभू साहित्यकारों को सम्मानित होने से भले ही उस सम्मान का नाम कोई जानता भी न हो!!
आप देख ही रहे हैं कि आपसे उर्जा प्राप्त किए इन कवि सम्मेलनों की हालत, इन छुटभय्यिये नेताओं की हरकतें और साहित्यिक सम्मानों के नाम पर गली गली खोमचेनुमा दुकानें. ध्यान रखना, यह समाज के लिए कतई हितकर नहीं है.
तो जरा संभलना, जहाँ फेसबुक पर लाइक करना एक लत बन जाती है वहीं यह अपने आपको सेलीब्रेटी सा दिखाने का नुस्खा भी है.
इसका इस्तेमाल अपने विवेक के साथ करें वरना इस लत से आपका जो होगा सो होगा मगर समाज का ये स्वयंभू सेलीब्रेटी बंटाधार करके रख देंगे.

-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर १०, २०१९ में प्रकाशित:

ब्लॉग पर पढ़ें:
#Jugalbandi
#जुगलबंदी
#व्यंग्य_की_जुगलबंदी
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
#Hindi_Blogging


Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, नवंबर 03, 2019

आगे देश कौन चलायेगा यही चिंता सताती है?



१२ वीं के परिणाम घोषित हुए. लड़कियों ने फिर बाजी मारी. ये अखबार की हेड लाईन्स बता रही थी. जिस बच्ची ने टॉप किया था उसे ५०० में से ४९६ अंक मिले हैं यानि सारे विषय मिला कर मात्र ४ अंक कटे, बस! ये कैसा रिजल्ट है?
हमारे समय में जब हम १० वीं या १२ वीं की परीक्षा दिया करते थे तो मुझे आज भी याद है कि हर पेपर में ५ से १० नम्बर तक का तो आऊट ऑफ सिलेबस ही आ जाता था तो उतने तो हर विषय में घटा कर ही नम्बर मिलना शुरु होते थे. यहाँ आऊट ऑफ सिलेबस का अर्थ यह नहीं है कि किताब में वो खण्ड था ही नहीं. बल्कि वो तो बकायदा था मगर मास्साब बता देते थे इसे छोड़ दो, ये नहीं आयेगा. पहले भी कभी नहीं आया और हम लोगों की मास्साब में, कम से कम ऐसी बातों के लिए अटूट आस्था थी मगर अपनी किस्मत ऐसी कि हर बार ५ - १० नम्बर के प्रश्न उसी में से आ जाते. तो बस हम घर आकर बताते थे कि आज फिर आऊट ऑफ सिलेबस १० नम्बर का आ गया. घर वाले भी निश्चिंत रहते थे कि कोई बात नहीं ९० का तो कर आये न!! एक भारतीय इस मामले में बड़ा संतोषी जीव होता था.
तब आगे का खुलासा होता कि ५ नम्बर का रिपीट आ गया. सो वो भी नहीं कर पाये और पेपर इत्ता लंबा था कि समय ही कम पड़ गया तो आखिरी सवाल आधा ही हल कर पाये, अब देखो शायद कॉपी जांचने वाले स्टेप्स के नम्बर दे दें तो दे दें वरना तो उसके भी नम्बर गये. अब आप सोच रहे होंगे कि ये ’रिपीट आ गया’ क्या होता है?
दरअसल हमारे समय में विद्यार्थी चार प्रकार के होते थे..एक तो वो जो ’बहुत अच्छे’ होते थे, वो थारो (Thorough) (विस्तार से)घोटूं टाईप स्टडी किया करते थे याने सिर्फ आऊट ऑफ सिलेबस छोड़ कर बाकी सब कुछ पढ़ लेते थे. ये बच्चे अक्सर प्रथम श्रेणी में पास होते थे मगर इनके भी ७० से ८५ प्रतिशत तक ही आते थे. काफी कुछ तो आऊट ऑफ सिलेबस की भेंट चढ़ जाता था और बाकी का, बच्चा है तो गल्तियाँ तो करेगा ही, के नाम पर.
दूसरे वो जो ’कम अच्छे’ होते थे वो सिलेक्टिव स्टडी करते थे यानि छाँट बीन कर, जैसे इस श्रेणी वाले आऊट ऑफ सिलेबस के साथ साथ जो पिछले साल आ गया है वो हिस्सा भी छोड़ देते थे क्यूँकि वो ही चीज कोई बार बार थोड़ी न पूछेगा जबकि इतना कुछ पूछने को बाकी है, वाले सिद्धांत के मद्दे नजर. तो जो पिछले साल पूछा हुआ पढ़ने से छोड़ कर जाते थे, उसमे से अगर कुछ वापस पूछ लिया जाये तो उसे ’रिपीट आ गया’ कहा जाता था. उस जमाने के लोगों को ’रिपीट आ गया’ इस तरह समझाना नहीं पड़ता था, वो सब समझते थे. ये बच्चे गुड सेकेन्ड क्लास से लगा कर शुरुवाती प्रथम श्रेणी के बीच टहलते पाये जाते थे. गुड सेकेन्ड क्लास का मतलब ५५ से लिकर ५९.९% तक होता था. ६० से प्रथम श्रेणी शुरु हो जाती थी.
तीसरी और चौथी श्रेणी वाले विद्यार्थी धार्मिक प्रवृति के बालक होते थे जिनका की पुस्तकों, सिलेबस, मास्साब आदि से बढ़कर ऊपर वाले में भरोसा होता था कि अगर हनुमान जी की कृपा हो गई तो कोई माई का लाल पास होने से नहीं रोक सकता. इस श्रेणी के विद्यार्थी परीक्षा देने आने से पहले मंदिर में माथा टेक कर और तिलक लगा कर और दही शक्कर खाकर परीक्षा देने आया करते थे और उत्तर पुस्तिका में सबसे ऊपर ’ॐ श्री गणेशाय नम:” लिखने के बाद प्रश्न पत्र को माथे से छुआ कर पढ़ना शुरु करते थे. ये धार्मिक बालक १० प्रश्नों का गैस पेपर याने कि ’क्या आ सकता है’ और अमरमाला कुँजी जो हर विषय के लिए अलग अलग बिका करती थी और उसमें संभावित २० प्रश्न जिसे वो श्यूर शाट बताते थे और जिस कुँजी में उनके जबाब भी होते थे, को थाम कर परीक्षा के एक रात पहले की तैयारी और भगवान के आशीर्वाद को आधार बना परीक्षा देकर सेकेण्ड क्लास से पीछे की तरफ से चलते हुए थर्ड क्लास और ग्रेस मार्क से साथ पास श्रेणी के साथ साथ सप्लिमेन्ट्री और फेल की श्रेणियों में शुमार रहते थे. यह सब इस बात पर निर्भर किया करता था कि गैस पेपर और साल्व्ड गाईड से कित्ता फंसा? ये ’फंसा’ भी तब की ही भाषा थी जिसका अर्थ होता था कि जो गैस पेपर मिला था उसमें से कौन कौन से प्रश्न आये. नकलचियों का शुमार भी इसी भीड में होता था. मगर देखा यह जाता था और है कि अंततः यही देश चलाते हैं
कुछ उस जमाने के हम, इस जमाने के नौनिहालों को ९९.२% लाता देखकर आवाक न रह जायें तो क्या करें!! आगे देश कौन चलायेगा यही चिंता सताती है?
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर ३, २०१९ में प्रकाशित:

#Jugalbandi
#
जुगलबंदी
#
व्यंग्य_की_जुगलबंदी
#
हिन्दी_ब्लॉगिंग
#Hindi_Blogging

Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अक्तूबर 29, 2019

जो बिकता है वो दिखता है




कालेज के दिनों की याद आई. हम दोस्तों के साथ पिकनिक पर जाया करते थे तो सब मिलकर चिकन पकाते थे. वो स्वाद अब तक जुबान पर है और बनाने की विधि भी कुछ कुछ याद थी. बस फिर क्या था, मैंने एलान कर दिया कि आज रसोई खाली करो, चिकन हम बनाएंगे.
अँधा क्या चाहे, दो आँखें. पत्नी तुरंत रसोई खाली करके टीवी के सामने जा बैठी. हमने तमाम मशक्कत करके प्याज़ काटने से लेकर मसाला भुनने तक में जान लगाते हुए दो घंटे में आराम आराम से चिकन बना डाला. बना भी बेहतरीन और सबने खाया भी दबा कर अर्थात बेहतरीन बने का प्रमाण भी सामने आ गया तुरंत. बस फिर क्या था, पत्नी और बच्चों की तरफ से एक सुर में घोषणा हुई कि अबसे जब भी नॉन-वेज बनेगा, मैं ही बनाया करूँगा. मैंने भी सोचा, अच्छा है. हफ्ते में एक बार तो बनता है, बना दिया करेंगे. अतः बनाने लगे. खूब तारीफ़ होती. तारीफ किसे अच्छी नहीं लगती. लोग तो स्क्रिप्ट लिखकर फिल्म अभिनेताओं से अपनी तारीफ करा लेते हैं.
देखते देखते पत्नी आये दिन कहने लगी की आज सादा खाने का मन नहीं है, आज फिश खाने का मन है, तो आज आपके हाथ की एग करी, तो कभी कीमा, कभी चिकन. बस फिर क्या था, कुछ ही महीने में मैंने पाया की जहाँ पहले हफ्ते मे एक दिन नॉन-वेज के लिए आरक्षित था और बाकी दिन वेज. वहीं अब एक दिन वेज और बाकी के दिन नॉन-वेज पर आ गये. आरक्षण का यही तो कमाल है. शुरु होता है कहीं से फिर वो ही वो दिखता है. हमारा स्टेटस भी अब कुशल रसोईए मे बदल दिया गया.
अब जब मैं कहता कि वेज खाने का मन है तो बता दिया जाता कि बिल्कुल ऐसे ही तो बनाना है, बस चिकन की जगह आलू डाल देना या कभी एग भूर्जी जैसे बनाते हो ना, उसमे अंडे की जगह टिंडोरा काट कर डाल देना. याने की अब सातों दिन खाना मैं ही बनाता. कोई चाल काम ना आती. बना कर देने की बजाय यूट्यूब के लिंक दे दिया जाता कि इसमें से देख कर बना लो, मगर बनाओ ज़रूर. तुम्हारे हाथ मे स्वाद का जादू है, देखो सब कितना स्वाद लेकर खाते हैं. क्या बोलता? खाते तो पहले भी थे ही सब. कभी पत्नी की शिकायत तो किसी से ना सुनी और न ही की. खैर, महिलाओं की शिकायत करने के लिए भी तो हिम्मत चाहिए.
एक कथा सुनी थी कि असली बनिया वो होता है जो अगर भूले से कुएँ में गिर जाए, तो यह सोच कर कि गिर तो गये ही हैं, क्यूँ ना स्नान कर लिया जाए फिर मदद के लिए गुहार लगाएँगे. लोगों का क्या है, अभी जैसे बचाएँगे वैसे ही तब बचाएँगे. नहाना तो निपटाते ही चलें, कम से कम घर पर पानी ही बचेगा.
यही सोच कर मेरी लाला बुद्धि ने भी जोर मारा कि खाना तो अब बनाना ही है तो क्यूँ ना इसकी रिकॉर्डिंग करके यूट्यूब पर खाने का चैनेल ही शुरू कर दिया जाए. देर सबेर पॉपुलर हो गया तो कमाई का ज़रिया बन जाएगा वरना नाम तो हो ही जाएगा. ऐसा ही कुछ सोच कर तो हिन्दी ब्लॉग पर लिखना शुरू किया था.१३ साल लिखते हुए पूरे हो गये, कमाई की गुंजाइश तो अभी आने वाले १३ साल भी नज़र नहीं आती मगर नाम तो कुछ कुछ मिल ही गया. अब तो लगने लगा है की हिन्दी लेखन से कमाई में बस देर है, सबेर तो शायद है ही नही. विकास से मिलता जुलता है, सुनें रोज मगर देखने के लिए आँख तरस जाये.
यूएफओ किचन के नाम से चैनेल शुरू हो गया. हम खाना बनाएँ, पत्नी शूटिंग और रिकॉर्डिंग करें. अब वो बहाना भी ख़त्म कि खाना बना कर थक गये, अब ज़रा बढ़िया चाय बना कर पिला दो. जब तक हम यह बोलें, उसके पहले ही वो कह उठती हैं, शूटिंग करते करते थक गये, खाना तो बन ही गया है. अब ज़रा चाय भी बना लो, तो आराम से बैठ कर तुम्हारे साथ चाय पियें. अब चाय भी अब हम बनाने लगे. रात में की गई शूटिंग की थकान सुबह तक तारी रहती तो सुबह की चाय भी हम पर ही. कसम से अगर शूटिंग करने के लिए किचन में ना आना होता तो अब तक तो किचन का रास्ता भी इनको जीपीएस से देख कर आना पड़ जाता.
ऐसे ही तो आदत बदलती है. ये नेता और बड़े अधिकार कोई पैदायशी बेईमान थोड़ी न होते हैं.सहूलियत मिल जाती है और मौका लग जाता है तो हो लेते हैं. कौन नहीं धन धान्य और आराम चाहेगा? आराम मिलने का मौका लग गया तो कर रहे हैं.
एक बड़ी दिलचस्प बात किसी ने यूट्यूब पर कमेंट करके पूछी कि आप कितने प्यार से खाना बनाते हो हँसते मुस्कराते हुए और न तो कोई गंदगी होती है, न ही कभी मसाला कम ज्यादा और न ही कभी खाना देर तक पकने से जला.
अब उनको कौन समझाए कि जो दिखाया जाता है, वो वो होता है जो दिखाना होता है. सब कुछ पूरा पूरा दिखायें तो हमारा चैनेल तो बहुत छोटी सी बात है, सरकार भी दुबारा ना बन पाये. ये बात हम भी जानते हैं, सरकार भी और फ़िल्में बनाने वाले भी. फरक सिर्फ़ इतना है कि बाद वाले दो यही सब अच्छा अच्छा दिखा कर एक दिन में 50- 50 करोड़ बना लेने का माद्दा रखते हैं.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अक्टूबर २७, २०१९ में प्रकाशित:

#Jugalbandi
#जुगलबंदी
#व्यंग्य_की_जुगलबंदी
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
#Hindi_Blogging


Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, अक्तूबर 19, 2019

सत्य की नहीं, जुमलों की चलती है बाजारवाद में



बाजार जाता हूँ तो देख कर लगता है कि जमाना बहुत बदल गया है. साधारण सी स्वभाविक बातें भी बतानी पड़ती है. कल जब दही खरीदने लगा तो उसके डिब्बे पर लिखा था कि यह पोष्टिक दही घास खाने वाली गाय के दूध का है. मैं समझ नहीं पाया कि इसमें बताने जैसा क्या है? गाय तो घास ही खाती है. मगर इतना लिख देने मात्र से वो दही सबसे तेजी से बिक रहा था. बाकी के दही के डिब्बे जैसे सजे थे वैसे ही सजे थे. किसी को तो क्या कहें, हमने खुद भी वही खरीदा जबकि बाकी दहियों से मंहगा भी था.
ऐसे ही एक दिन बिकते देखा फ्रेश ब्रेड’. अब भला बाजार में बाकी के ब्राण्ड क्या बासी ब्रेड बेच रहे हैं? और फिर यह जानने के लिए उस पर एक्सपायरी डेट भी तो लिखी होती है. फ्रेश ब्रेड भी तो एक्सपायरी के बाद बासी ही हो जायेगी मगर पन्नी पर तो फिर भी फ्रेश ब्रेड ही लिखा रहेगा.
ऐसा ही युग है बाजारवाद का यह. लोगों की मानसिकता पर प्रहार करके उन्हें अपने जाल में फंसा कर अपना उल्लु सीधा करने का युग. अण्डा है तो पाश्चर रैज्ड एग याने कि जिन मुर्गियों का यह अण्डा है वो पिंजरे की शकिस्ति में न पलकर खुले में घास पर बड़ी जगह में टहल टहल कर खाकर अंडा देती है. अब अंडा तो अंडा है, पिंजरे में दो तो या खुले में दो तो. मगर बाजार उन्हें ज्यादा ताकतवर और स्वादिष्ट बता कर बेच ले रहा है.
अब निंबू को पेड़ से हाथ से तोड़कर या टूट कर गिरा हुआ निंबू उठाकर आपने उसके ताजा रस को मिलाकर मेरे कपड़े धोने का साबुन बनाया, उससे क्या फरक पड़ेगा? निंबू का रस तो वो ही है मगर बताने का तरीका ऐसा कि लगा फेक्टरी वाले सिर्फ मेरे लिए कांटों के बीच अपना हाथ जख्मी करते हुए निंबू तोड़कर उसका ताजा रस निचोड़े हैं मेरे कपड़े धोने का साबुन बनाने के लिए. तो बेचारे कुछ रुपया ज्यादा मांग रहे हैं तो बनती है उनकी. वरना इतना ख्याल तो बीबी भी नहीं रखती. शिकंजी मांगो तो बोतल वाले निंबू के रस से फटाफट बनाकर टिका देती है. कौन जहमत उठाये निंबू निचोड़ने की. वही निचोड़ कर के तो फेक्टरी वालों ने बोतल में पैक करके दिया है.
हर बार बेवकूफ बनते हैं मगर बाजार उस्ताद है. बार बार बेवकूफ बना देता है. बचपन में ६ हफ्ते में गोरा बनाने का वादा करके हमको फेयर एण्ड लवली क्रीम बेच दी थी. ६ हफ्ते में रंग २० का १९.९ भी न हुआ तो उम्मीद त्याग दी और कसम खाई कि भगवान को अगर यही रंग मंजूर है तो यही सही. अब कभी इस पर पैसा नहीं खर्च करेंगे. साल भर बाद फिर यह कह कर कि अबकी बार पहले से ज्यादा मुलायम और पहले से ज्यादा असरदार, एक बार फिर मन ललचवा दिया. हम फिर ६ हफ्ते घिसते रहे और वही ढाक के तीन पात.
फिर तो जीवन भर बाजार तरह तरह के नुस्खे हमें बेचता रहा हर बार नया प्रलोभन देकर. कभी इसमें आंवला है तो कभी हल्दी. नुस्खे बदलते रहे, बैंक का बेलेन्स बदलता रहा मगर जिस रंग को बदलने की कवायद थी वो कभी न बदला. सब काम नकली, प्रभु का काम असली. अब जाकर समझ आया है.
हालिया हालात देखकर तो लगा कि अगली बार नोबल पुरुस्कार देते समय नोबल वालों को बताना पड़ेगा कि ये असली वाला नोबल है जो असली अर्थशास्त्री को दिया जा रहा है वरना तो ये सब मिलकर नोबल की धज्ज उतार ही चुके हैं इस बार. यही हालत रहे तो इनके चलते किसी दिन नोबल भारतियों को मिलना ही न बंद हो जाये.
इनके पास भी नुस्खे हैं हर पांच साल में खुद को बेच लेने के तो फिर क्यूँ न मन की करें? क्यूँ निंदा सुनें, क्यूँ सुधरें? बाजार का भरपूर ज्ञान है. कभी विनाश को टाइपो बता कर विकास कर देंगे और कभी देशभक्ति का अर्थ ही हिन्दुत्व रख देंगे. जनता का क्या है उसे तो बाजार सदा से ही बेवकूफ बनाता आ रहा है तो सत्ता के बाजार ने भी बेवकूफ बना दिया तो इसमें नया क्या है?
अच्छा हुआ कबीर समय पर निकल लिए वरना यह कहने पर तो निकाल ही दिये जाते:

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय!!’

 

जब अच्छे खासे अंतरराष्ट्रीय के अर्थशास्त्री जिनका लोहा विश्व मान रहा है, नोबल से नवाज़ रहा है, वो नहीं बर्दाश्त सिर्फ इसलिए कि उन्होंने इनकी नितियों की निंदा कर दी, सही राय दे दी, तो खैर कवि की तो क्या बिसात!!

बाजारवाद में सत्यता कोई नहीं परखता, जुमलों की चलती है.

-समीर लाल समीर


भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अक्टूबर २०, २०१९ में:


#Jugalbandi
#
जुगलबंदी
#
व्यंग्य_की_जुगलबंदी
#
हिन्दी_ब्लॉगिंग
#Hindi_Blogging

Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, अक्तूबर 12, 2019

हर साल नकली रावण को नकली राम ही मारते आ रहे



बचपन में वह बदमाश बच्चा था. जब बड़ा हुआ तो गुंडा हो गया. और बड़ा हुआ तो बाहुबली बना. फिर जैसा कि होता है, वह विधायक बना और फिर मंत्री भी. नाम था भगवान दास.
रुतबे और कारनामों की धमक ऐसी कि पुलिस भी काँप उठे. कम ही होते हैं जो इस कहावत को धता बता दें कि पुलिस से बड़ा कौन गुंडा. भगवान दास उन्हीं कम में से एक थे. लोग बताते थे पुलिस भी गैरकानूनी मसले सुलझाने के लिए उन्हीं की शरण लेती थी.
धता बताने को तो वो खैर इस मान्यता की भी धज्जियाँ उठा डालते हैं कि यथा नामे तथा गुणे’. मगर उसमें उनकी गल्ति नहीं कहूँगा वो तो आज कल का प्रचलन है जो नाम दो होवे उसका उल्टा. चाहे वो फिर विकासहो या स्वदेशी’.
भगवास दास के क्षेत्र में दौलत राम, नाम में यहाँ भी वही झोल है, नामक एक अत्यन्त निर्धन एवं दलित व्यक्ति रहता था. दौलत राम भगवान दास के अहाते की साफ सफाई और चाय पान लाने का काम कर दिया करता था और बदले में कुछ धन पा जाता था जीवन यापन करने को. भगवान दास उसे दौलत के बदले दो लात पुकारता और हो हो करके हँसता. गरीब की किस्मत, उसके हो हो के साथ साथ दौलत राम भी मुस्करा कर रह जाता. 
पुनः गरीब की किस्मत कि भगवान दास ने दौलात राम की पत्नी को देख लिया. ठीक ठाक नाक नक्श और भगवान दास को अपने रुतबे का नशा. नशे में ठीक ठाक कुछ ज्यादा ही मन भावन लग जाता है. अतः उठवा लिया. भगवान दास प्रचलन के अनुरुप नाम के विपरीत रावण हो गये. दौलत राम नाम में भर राम लिये बैठे रहे. न तो रावण का कुछ बिगाड़ पाये और न पत्नी को बलात्कार का शिकार होने से बचा पाये.
दौलत राम और उसकी पत्नी बाद में पुलिस से लेकर हर तरफ गुहार लगाते रहे. एक दिन थाने जाते समय उनके रिक्शे को किसी ट्रक ने टक्कर मार दी और दौलत राम की ईहलीला समाप्त हुई. उसके बाद उसकी पत्नी कहाँ गई, किसी को पता ही न चला. किसी ने कहा कि धरती फट गई और उसमें समा गई और किसी ने कहा कि आसमान लील गया. अखबार से लेकर टीवी तक सब इस हो हल्ले के बाद पुनः भगवान दास की अर्चना में जुट गये. भगवान दास मंत्री के साथ साथ आतंक का पर्याय बन गये. मंत्री हैं इसलिए आतंक है या आतंक है इसलिये मंत्री है, यह कहना जरा कठिन कार्य है.
इधर दशहरा आया. भगवान दास ने नई बुलेट प्रुफ कार खरीदी. फैशनानुरुप उसका पूजन किया गया. नींबू मिर्च की झालर टांगी. फिर नये प्रचलन के हिसाब से अपने आंगन के पिछले कमरे में अपने शस्त्रागार में एक लाईसेंसी बन्दूक, बाकी बिना लाईसेंस की तीन माऊजर, कई देशी कट्टे, सैकड़ों पैट्रोल बम और सुअर मार बम, गोलियाँ के बक्से, तलवार, बका आदि के बेहिसाब असले का शस्त्र पूजन किया. अब इस तरह की शस्त्र पूजा खुल कर तो कर नहीं सकते थे अतः हड़बड़ी में पूजन करते करते दीपक हाथ से छूट गिर पड़ा. बम दनादन छूटने लगे. भगवान दास उसी में फंस कर अपने चिथड़े उड़वा बैठे. ठीक उसी वक्त रामलीला मैदान पर रावण का पुतना धूँ धूँ कर जल उठा.
असली नकली दोनों रावण मारे गये. शहर भर में भगवान दास के मरने की खबर बिजली की तरह फैल गई.
लोग आपस मे फुसफुसाये कि भगवान के घर देर है मगर अँधेर नहीं. इस वक्त वे असली भगवान के घर की बात कर रहे थे. इस तरह से बात स्पष्ट करते रहना आज के युग की जरुरत हो गई है.
लोगों की आस्था कलयुग के एक अदृश्य राम में बहुत अरसे के बाद पुनः जाग उठी. वरना तो नकली रावण को नकली राम हर साल मारते ही आ रहे हैं.
-समीर लाल समीर 
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अक्टूबर १२, २०१९ के अंक में प्रकाशित
ब्लॉग पर पढ़ें:
#Jugalbandi
#
जुगलबंदी
#
व्यंग्य_की_जुगलबंदी
#
हिन्दी_ब्लॉगिंग
#Hindi_Blogging

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्तूबर 06, 2019

अन्तरराष्ट्रीय स्तर के होने की योग्यता


बहुत सूक्ष्म अध्ययन एवं शोध के बाद लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि यदि आपके नाम के अन्त में आ की मात्रा लगाने के बाद भी नाम आप ही का बोध कराये तो आप अन्तरराष्ट्रीय स्तर के हो सकते हैं.

जैसे उदाहरण के तौर पर लेखक का नाम समीर है. यदि आपको समीर नाम सुनाई या दिखाई पड़े तो आपकी नजरों के आगे मेरी तस्वीर उभरती है, शायद कविता पढ़ते हुए या आपकी रचनाओं पर दाद देते हुए मगर जैसे ही मेरे नाम के अंत में आ की मात्रा लगा दी जाती है याने समीरा तो आपकी आँखों के आगे फिल्मों वाली समीरा रेड्डी की तस्वीर उभर आती है बीच पर गीत गुनगुनाते. समीर और समीरा- एकदम दो विपरीत ध्रुव. अतः समीर नाम अन्तरराष्ट्रीय स्तर का होने की पात्रता नहीं रखता.

अब दूसरा उदाहरण लें. नरेन्द्र- सुनते ही आँखो के सामने ५६ इंच का सीना तन गया न और कान में गूँजा- मितरों......!!! अब अगर आप इस नाम के अन्त में आ की मात्रा लगा दें याने कि नरेन्द्रा – तब भी आँख के आगे वही ५६ इंच की सीना और कान में..मितरों..!!!!! याने की इनमें अन्तरराष्ट्रीय हो जाने की योग्यता है और हो ही रहे हैं. राष्ट्र में तो होते ही कब हैं? अधिकतर अन्तर्राष्ट्र में ही बने रहते हैं. मित्र भी अन्तरराष्ट्रीय- जैसे बराक!! वरना तो किस की हिम्मत कि ओबामा साहब को बराक पुकारे. इसके लिए तो ५६ इंच के सीने के साथ साथ अन्तरराष्ट्रीय होना भी जरुरी है. अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जहाँ जाते हैं वहीं नाम का डंका बज रहा होता है.

इनसे जब अरविन्द, राहुल टक्कर लेते हैं तो ये क्यूँ नहीं सोचते कि उनके नाम में अन्तरराष्ट्रीय होने की योग्यता नहीं है तो वो क्या होंगे. बेवजह टकराते हैं. अरविन्दा और राहुला- न जाने कोई होगा भी या नहीं कहीं पर इस नाम का तो तस्वीर क्या खाक उभरेगी भला?

एकदम ताजा ताजा- योग और योगा. योग कहो तो बाबा रामदेव गुलाटी खाते नजर आयें और कान में आवाज गूँजे- करत की विद्या है. करने से होता है- करो करो. और आ की मात्रा लगा कर योगा कह दो तो भी बाबा राम देव ही नजर आयें गुलाटी लगाते और कान में वही- करत की विद्या है. करने से होता है- करो करो.

और फिर ये तो संपूर्ण योग्यता वाले हैं- योग और योगा, राम और रामा और देव और देवा. ’समरथ को नहीं दोष गोसाईं’

अब तो मान जाओ इनका लोहा.

मितरों!! चलो करो- योग (योगा) का जोर है. करो करो- करने से होता है.

-समीर लाल ’समीर’



भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अक्टूबर ५, २०१९ के अंक में प्रकाशित

http://epaper.subahsavere.news/c/44391570



#Jugalbandi

#जुगलबंदी

#व्यंग्य_की_जुगलबंदी

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

#Hindi_Blogging

Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, सितंबर 07, 2019

अच्छी नींद लेना मौलिक अधिकारों में से एक है



आजकल मौलिक अधिकारों पर लगातार चर्चा हो रही है. किसी गलत बात को भी सही ठहरा देना और उसे राष्ट्रहित में बताना भी एक वर्ग विशेष के लिए आजकल मौलिक अधिकार की श्रेणी में आ गया है. मौलिक अधिकारों से छेड़छाड़ कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी. अगर आप उनके मौलिक अधिकार में दखल देंगे तो आप देशद्रोही करार कर दिए जायेंगे,
एक जमाने में सुप्रीम कोर्ट ने बताया था कि अच्छी नींद लेना मौलिक अधिकारों में से एक है. यही खबर थी जो उस दिन सभी चैनलों के ट्रिकर पर चल रही थी. तुरंत ही इन्टरनेट पर आग की तरह फैल गई थी. देख-सुन कर लगा था कि मानो हनुमान जी को समुन्दर की किनारे खड़ा करके याद दिलाया जा रहा हो कि तुम उड़ सकते हो. उड़ो मित्र, उड़ो.
बहुत अच्छा किया जो आज सुप्रीम कोर्ट ने बतला दिया वरना हम तो अपने और बहुत से अधिकारों की तरह इसे भी भुला बैठे थे. अच्छी नींद- यह क्या होता है? हम जानते ही नहीं थे. हमें तो अब यह भी भूल जाना होता है कि महंगाई आई है या मंदी है क्यूंकि उस वर्ग विशेष के लिए यह सही राह तक पहुँचने के लिए वो पगडंडी है जिसे पर पहले से ही बबूलके कांटे कोई बिछा गया था.
गरमी की उमस भरी रात- और रात भर बिजली गुम और पास के बजबजाते नाले में जन्में नुकीले डंक वाले मच्छरों का आतंकी हमला वो भी डेंगू जैसे परमाणु बम के साथ. ओह!! मेरे मूल अधिकार पर हमला. केस दर्ज करना ही पड़ेगा. ऐसे कैसे भला एक मच्छर मेरे मूल अधिकारों का हनन कर सकता है. कैसे बिजली विभाग इसका हनन कर सकता है. गरमी की इतनी जुर्रत कि सुप्रीम कोर्ट से प्राप्त मेरे मूल अधिकार पर हमला करे.
भुगतेंगे यह सब राष्ट्रद्रोही. रिपोर्ट लिखाये बिना तो मैं मानूँगा नहीं. जेल की चक्की पीसेंगे यह तीनों, तब अक्ल ठिकाने आयेगी. पचास बार सोचेंगी इनकी पुश्तें भी मेरी नींद खराब करने के पहले.
वैसे मूल अधिकार तो और भी कई सारे लगते हैं जैसे खुल कर अपने विचार रखना (चाहे फेसबुक पर ही क्यूँ न हो), बिना भय के घूमना, शांति से रहना, स्वच्छ हवा में सांस लेना, शुद्ध खाद्य सामग्री प्राप्त करना, अपनी योग्यता के आधार पर मेरिट से नौकरी प्राप्त करना, बिना गड्ढे वाली सड़कें, अपने द्वारा ही चुने नेता से प्रश्न करना आदि मगर ये सब अभी पेंडिंग भी रख दूँ तो भी अच्छी नींद लेने को तो सुपर मान्यता मिल गई है. इसके लिए तो अब मैं जाग गया हूँ. सोच लेना कि मेरी नींद डिस्टर्ब हुई तो मैं जागा हूँ. फट से शिकायत दर्ज करुँगा. जेल भिजवाये बिना मानूँगा नहीं. पता नहीं पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना मेरा मूल अधिकार है कि नहीं? खैर, वो तो मैं चैक कर लूँगा वरना ले देकर तो दर्ज तो हो ही जायेगी रिपोर्ट.

अब मैं सबकी लिस्ट बना रहा हूँ- सबकी शिकायत लगाऊँगा.

नगर निगम सुबह ५ से ५:३० बजे तक बस पानी देते हो, मेरी नींद खराब करते हो. संभल जाओ, बक्शने वाला नहीं हूँ अब मैं तुम्हें.
और आयकर और जी एस टी वालों- कितना टेंशन देते हो यार. जरा सा कमाया नहीं कि बस तुम सपने में आकर नींद तोड़ देते हो. तुमसे तो मैं बहुत समय से नाराज हूँ- तुम तो बचोगे नहीं अब. बस, अब गिनती के दिन बचे हैं तुम्हारे. तुम तो भला क्या आओगे अब- मैं ही आ जाता हूँ.
और हाँ, तुम- बहुत बड़े स्कूल के प्रिंसपल बनते हो. मेरे बच्चे के एडमीशन को अटका दिया मेरा टेस्ट लेकर. मेरी बेईज्जती करवाई मेरी ही बीबी, बच्चों की नजर में- कितनी रात करवट बदलते गुजरी. नोट हैं मेरे पास सारी तारीखें. अब जागो तुम-जेल में. बस, तैयारी में जुट जाओ जेल जाने की.
बाकी लोग भी संभल जाओ- बहुतेरे हैं मेरी नजर की रडार पर. एक वो नालायक चौकीदार- जिसे मैने ही रखा है कि इत्मिनान से सो पाऊँ. वो रात भर सीटी बजा बजा कर चिल्लाता घुमता है- जागते रहो, जागते रहो. अरे, अगर हमें जागते ही रहना होता तो क्या मुझे पागल कुत्ता काटे है जो तुम्हें पगार दे रहा हूँ. तुम कोई धर्म गुरु तो हो नहीं कि बेवजह तुमको चढ़ावा चढ़ायें और अपने मूल अधिकार वाले अधिकार प्राप्त कर प्रसन्न हो लें. चौकीदार हो चौकीदार की तरह रहो- यह अधिकार मूल अधिकारों से उपर सिर्फ धर्म गुरुओं को प्राप्त है.
आज कुछ संविधान की पुस्तकें निकालता हूँ. सारे मूल अधिकारों की लिस्ट बनाता हूँ. फिर देखो कैसी बारह बजाता हूँ सब की.
अब मैं पूरी तरह से जाग गया हूँ इत्मिनान से सोने के लिए.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार सितम्बर ८, २०१९ में प्रकाशित:
ब्लॉग पर पढ़ें

#Jugalbandi
#जुगलबंदी
#व्यंग्य_की_जुगलबंदी
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
#Hindi_Blogging

चित्र साभार: गुगल Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, सितंबर 01, 2019

कलयुग का नाम भी आजयुग रख देना चाहिये


जिस हिसाब से आज इतिहास बदला जा रहा है, सड़को और शहरों के नाम बदले जा रहे हैं, गांधी नेहरू के काम बदले जा रहे हैं, ऐसे में पुराने समय की कहावतें और मुहावरों को भी एक बार पुनः देखा जाना चाहिये एवं अगर आवश्यक लगे तो बदला जाना चाहिए. यूँ तो अन्य चीजों में बदलाव बिना आवश्यकता के भी किया जा रहा है वरना स्टेशनों के नाम बदलने से क्या होने जाने वाला है? शहर वही, रहने वाले वही. बस मन भटकाने के लिए नाम बदल दो तो ताकि अन्य जरुरी मूलभूत समस्याओं से ध्यान भटका रहे. वैसे ही जैसे स्मार्ट सिटी के नाम पर एक नया शगुफा छोड़ा हुआ है. न जाने कितने लोग स्मार्ट हो गए उस फंड से और शहर वहीँ का वहीँ.
बीते वक्त का एक मुहावरा है:
‘जितने मूंह, उतनी बात’
आज वक्त बदला है. आज कोई मूंह से कहां बोलता है? जो कहना है व्हाटसएप पर कह रहा है. वो टाइप करता है –वो बोलता नहीं है. आमने सामने बैठे दोस्त भी व्हाटसएप पर बात कर रहे हैं. अब इस मुहावरे को बदल देने का समय आ गया है:
‘जितने हाथ, उतनी बात’
मूंह की जगह हाथ ने ले ली है. काश! ऐसा युग आज से 25 बरस पहले आया होता तो तम्बाकू खाने वालों की चल निकलती. उन बेचारों को तो इत्मिनान से घोली तम्बाकू जब आकाश की तरफ मूंह उठाकर भी न संभलती तो थूक कर बात करना पड़ती थी. अपनी तरफ से बढ़कर तो वे बात न करते थे मगर हर जबाब भी तो उं आ ना में नहीं हो सकता अतः थूकना ही पड़ता है. मेरी सोच से तो आज का वक्त तम्बाकू युग कहलाना चाहिये. मगर जब तम्बाकू युग आया तो तम्बाकू खाने वाले कम हो गये.
यही होता है की जब सही वक्त आता है तो वक्त का सही आनंद लेने वाले नहीं रहते. शायद इसीलिए जिन्दगी को कहा गया है की जिन्दगी इन्तिहान लेती है. कोई कहता है कि यह जीना नहीं आसान. वजह बस इतनी सी कि आप जैसा जीना चाहते हैं वैसा वक्त नहीं होता और जैसा वक्त होता है वैसा आप जीना नहीं चाहते.
आज जब तम्बाकू खाने का मुफीद वक्त आया है तो आप हैल्थ के प्रति सजग हो लिए. और जब वक्त मूंह से बात करने का था तब आप तम्बाकू दबाये बैठे थे.
कई बार वक्त का तकाज़ा देखते हुए लगता है कि सरकार को एक काल ऐसा बना देना चाहिये जहाँ भ्रष्टाचार करने की पूरी सुविधा हो. पूरा संरक्षण दिया जाए. तब शायद हो ऐसा जाए कि भ्रष्टाचारी मिले ही न जैसे कि आज तम्बाकूबाज मिलना कम हो गये हैं.
यही हालत है कि कहने को तो कलयुग है मगर कल की कोई सोच ही नहीं रहा है. वे आज हर वो करम किये जा रहे हैं की घर भर जाये. कल सीबीआई छापा मारेगी, पकड़े जायेंगे. बदनामी हो जायेगी -इन सब की कोई परवाह नहीं. कल की कल देखी जायेगी. ऐसे में कलयुग का नाम भी आजयुग रख देना चाहिये.
जबसे हाथ ने मूंह की जगह ली है, तब से हालात बदले हैं. मूंह एक है मगर हाथ दो. हर बात में दो बात. दो के पीछे दो छिपी बात. मीडिया कुछ कहे. सोशल मीडिया कुछ और. और सत्यता कुछ और.
इन सबके बीच एक सामंजस्य बना कर आज की दुनिया में जी लेना ही एक कला है. वरना तो हर तरफ नकारात्मकता का ही माहौल हो चला है. सब इन्हीं हाथों से बोली गई बातों का कमाल है.  
शायद इसीलिए ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ का तरीका भी बदलना होगा. जब सब बदल रहा है तो ये भी सही.
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार सितम्बर १, २०१९ में प्रकाशित:


#Jugalbandi
#जुगलबंदी
#व्यंग्य_की_जुगलबंदी
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
#Hindi_Blogging



चित्र साभार: गुगल Indli - Hindi News, Blogs, Links