शनिवार, जुलाई 06, 2019

कानून तोड़ने का मजा ही कुछ और है!!


कुछ दिन पहले फ्रांस ने जब बच्चों को चपत लगाने को गैर कानूनी घोषित किया तो वो इस तरह का ५५ वाँ देश बना. सबसे पहले १९५७ में स्वीडन ने इसकी शुरुवात की थी

हमारा जन्म १९५७ के बाद हुआ. मगर जब किस्मत में पिटना लिखा हो तो कौन बचा सकता है? अतः भारत में पैदा हुए. शायद पिछले जन्म में नेता रहे होंगे या पहुँचे हुए बाबा, इसलिए कर्मों का फल भुगतने भेजे गये हों भारत. रुप रंग में भी उन्हीं कर्मों की सजा का स्वरुप झलकता है.
बचपन में नित ही कूटे पीटे जाते रहे. सिर्फ माँ बाप से पिटते, तो भी चला लेते. मगर वो जमाना ऐसा था कि पड़ोस वाले चाचा भी हाथ साफ कर लेते थे. घर आकर बताओ तो फिर पिटो कि जरुर तुमने कोई बदमाशी की होगी.
स्कूल में मास्साब लोग तबीयत से पीटा करते थे. कभी खुद की गल्ती पर तो कभी सहपाठी की गल्ती पर. मगर पिटते जरुर थे नियमित रुप से. हमारे एक मित्र थे गुड्डू. एक रोज उनके पिता जी ने उसे घर की दलान में जबरद्स्त पीटा छड़ी से. पूरे मोहल्ले ने देखा. किसी बुजुर्ग ने आगे बढ़कर गुड्डू को बचाया. पूछने पर गुड्डू ने बाताया कि उसने तो कोई गल्ती की ही नहीं है. तब उसके पिता जी बोले कि नहीं की है तो क्या हुआ. करेगा तो जरुर, बदमाशी इसका हर रोज का काम है और आज मुझे दो दिन के लिए दौरे पर जाना है. वे टैक्स विभाग में काम करते थे अतः शायद एडवान्स टैक्स का अभिप्राय भली भाँति समझते रहे होगे. 
हद तो तब हो गई जब हमारे एक अन्य मित्र मंटू घर की छत पर सिगरेट पीते हुए पकड़ा गये. उनके पिता जी अभी उनकी पिटाई कर ही रहे थे कि हम पहुँच गये किस्मत के मारे उनके घर. तब उसके साथ साथ हमें भी पीटा गया कि तुम इसके साथ दिन भर रहते हो तो तुमसे ही सीखा होगा इसने सिगरेट पीना. हमने कहा कि हम तो पीते ही नहीं सिगरेट. तो फिर पीटे गये कि नहीं पीते तो इसे पीने से रोका क्यूँ नहीं? हमको बताया क्यूँ नहीं? अब हम क्या कहते, चुपचाप पिट लिए मित्र का साथ साथ. जबकि सच्चाई तो यह थी कि वो अपने पिता को अपना रोल मॉडल मानता था और चूँकि वो सिगरेट पिया करते थे अतः उन्हीं के समान दिखने के लिए मंटू उन्हीं की पाकिट से चुरा कर सिगरेट पिया करता था. मुझे लगता है कि अगर उसे सिगरेट पीने के बदले चोरी करने के लिए पीटा गया होता तो शायद ज्यादा उचित होता. मगर जिसके हाथ में पीटने का अधिकार हो वो तो बस मौका खोजता है. उचित अनुचित की आप जानो.
वैसे भी आजकल सब तरफ ऐसा ही माहौल दिख भी रहा है. कोई बल्ले से मार रहा है. कोई रोमियो स्कॉवाड के नाम पर भाई बहन को ही पीटे डाल रहा है. कोई गाय का इलाज करवाने ले जाते व्यक्ति को गौ तस्कर कह कर पीट रहा है. कोई शिद्दत से की गई मोहब्बत को मजहब से जोड़कर लव जिहाद का नाम देकर पीटे डाल रहा है. मुद्दा कोई भी हो, बस मतलब पीटने से है. अब सईंया भये कोतवाल तो डर काहे का की तर्ज पर लोग कानून हाथ में लिए घूम रहे हैं. पीटने का मौका खोज रहे हैं. झूठी ताकत के नशे में डूबे हैं.
खैर, फ्रांस में नया नया आया बच्चों को चपत लगाने को गैर कानूनी करार देने वाला कानून थोड़ा ध्यान से पढ़ा. पता चला कि हालांकि बच्चों को चपत लगाना गैर कानूनी बना दिया गया है मगर माता पिता के लिए कोई सजा का प्रावधान नहीं है. फ्रांस की सरकार का मानना है कि मात्र गैरकानूनी करार कर देने से माता पिता को लगेगा कि वो गैरकानूनी काम करने जा रहे हैं अतः वह नहीं करेंगे.
मुझे लगा कि यह तो अपने यहाँ भी हो ही रहा है. लोग घूस खाये जा रहे हैं. घूस खाना गैर कानूनी तो है ही बल्कि सजा का प्रावधान भी है किन्तु घूस खाने वाला यह भी जानता है कि अगर पकड़े गये तो घूस खिलाकर बच जायेंगे. अगर भारत भी ऐसे ही बच्चों को चपत लगाने को गैर कानूनी घोषित कर दे तो अपने यहाँ तो वो बच्चे जो अब तक नहीं पिट रहे हैं, वो भी इसी चक्कर में पिट जायेंगे कि कानून हमारा क्या बिगाड़ लेगा?
कानून को चैलेन्ज करने में जो मजा हमें आता है वो पालन करने में कहाँ? कानून तोड़ने का मजा ही कुछ और है.
तभी तो जिस कोने में पान थूकना मना लिखा होता है, वहीं लोग शान से सीना तान कर पान थूकते हैं.
-समीर लाल समीर
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई ७, २०१९ में


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शनिवार, जून 29, 2019

क्रिकेटरों के लिए रिटायरमेंट के बाद रोजगार का नया अवसर



आज सुबह से ही चौक पर भीड़ लगी है. विश्व कप चल रहा है. बिट्टू ने टीवी दुकान के बाहर निकाल कर रख दिया है. आज भारत पाकिस्तान का मैच होना है. पान की दुकान, चाय की दुकान सब आजू बाजू में ही हैं. कहीं भी बैठ लो और मैच के मजे लो.
चौक पर मैच देखने का आनन्द ही अलग होता है. टीवी के समानन्तर एक कमेन्ट्री चौक पर बैठे एक्सपर्ट भी देते चलते हैं. थर्ड एम्पायर का निर्णय तो बाद में आता है, उसके पहले ही चौक पर तय हो जाता है कि आऊट था कि नहीं और अगर थर्ड एम्पायर का निर्णय उनसे अलग आया इसका मतलब थर्ड एम्पायर ने पैसे खायें हैं. हर भारतीय चौके, छक्के पर, हर पाकिस्तानी कैच ड्राप पर, हर पाकिस्तानी विकेट गिरने पर बकायदा नगाड़े बज कर नाच होता है. वहीं हर भारत के गिरते विकेट पर, पाकिस्तानी चौके छक्के पर, हर भारतीय कैच ड्राप पर नगाड़े के बदले गालियाँ और सलाहों का अम्बार लग जाता है. ऐसा नहीं वैसा करना था. ये शॉट गलत लगाया. अगर भारत की टीम का कोच इस चौक पर आ जाये तो अपनी अज्ञानता पर शर्मिन्दा हो जाये. 
बहुत से लोग भारत की टीम की टी शर्ट पहन कर आये हैं. किसी ने गाल पर भारत के झंडे का टैटू लगवा रखा है. कोई भारत का झंडा थामे है तो कोई विंग कमांडर अभिनन्दन का पोस्टर.. पूरा का पूरा माहौल एकदम उत्सव का. सब पहले से मान कर चल रहे हैं कि पाकिस्तान को तो हराना ही है, भले विश्व कप कोई भी ले जाये.
इस बार के चुनाव के बाद से एक नया डायलॉग भी चल पड़ा है कि चाहे कैसी भी बैटिंग कर लो, चाहे कैसी भी बालिंग कर लो, जितेगा तो भारत ही. मैने पूछा भी कि इतने विश्वास से आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? खेल है कोई भी हार जीत सकता है? जबाब मिला कि आप तो चुनाव के समय भी कहाँ हमारी बात मान रहे थे. मेरे पास चुप रह जाने के सिवाय रास्ता न था मगर मन ही मन सोचना तो मना नहीं है अतः सोचा कि यहाँ तो खुले में मैच हो रहा है और रन भी कोई ईवीएम तो गिन नहीं रही फिर भी ऐसा विकट विश्वास. चुनाव की तरह ये भी नहीं कह सकते कि कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है.
इसके अलावा कुछ अंतर और आये हैं. रनों के साथ जय श्री राम का उदघोष, चौक्के छ्क्के को विंग कमांडर अभिन्नदन के शौर्य से जोड़ कर उसके पोस्टर लहराना हर चौक की कहानी बन गये हैं.
घंसू भी आज क्रिकेट का बल्ला लेकर आये हैं. क्रिकेट का महापर्व चल रहा हो और घंसू पीछे रह जायें, ऐसा कैसे हो सकता है. मैच शुरु होने में अभी समय है. घंसू बीच सड़क में चौक्का छक्का मारने की मुद्रा में बल्ला घुमा रहे हैं. कभी कभी दो चार कदम आगे दौड़ कर भी बल्ला घुमा रहे हैं.
तिवारी जी ने आवाज लगाई कि भाई घंसू, अगर नेट प्रेक्टिस हो गई हो तो आ जाओ, पान खाया जाये. घंसू के आने पर तिवारी जी चुटकी लेते हुए कहने लगे कि बड़ी स्टाईल से शॉट लगा रहे थे घंसू. कोहली और धवन की बेटिंग भी फीकी लगेगी इसके सामने तो. लगता है अगले विश्व कप की तैयारी कर रहे हो. तुम्हारा सेलेक्शन तो पक्का समझो. तुम्हें कोई नहीं रोक सकता सेलेक्ट होने से.
घंसू जोर जोर से ठहाके लगाने लगा. कहने लगा कि यहाँ किसे क्रिकेट खेलना है. मैने तो आज तक मौहल्ले की  क्रिकेट टीम से भी नहीं खेला, विश्व कप में क्या खेलूंगा?
जो खेल खेलना नहीं, उसके लिए नेट प्रेक्टिस क्यूँ कर रहे हो फिर? तिवारी जी ने जानना चाहा.
घंसू बताने लगे कि दरअसल वो अगली विधानसभा के चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं. भाषण देना सीख लिया है. झूठे वादे करना सीख लिया है. घड़ियाली आंसू बहाना सीख लिया है. बस एकाएक पता चला कि एक नई विधा में भी महारत होना चाहिये और वो है क्रिकेट के बल्ले से सरकारी अधिकारियों की कुटाई करने की. तो उसी की नेट प्रेक्टिस कर रहा था. विश्व कप का मौका भी है. सोचा लगे हाथों प्रेक्टिस भी कर लूँ और किसी को पता भी न चलेगा कि मैं विधायकी की तैयारी कर रहा हूँ.
मैने देखा तिवारी जी घंसू की दूरद्दष्टिता से अभिभूत उसे एकटक निहार रहे हैं. उन्होंने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया और विधायक भवः का आशीष दिया. तिवारी जी आँखों में खुशी के आंसू हैं.
घंसू ने खुशी में दो तीन बार फिर बल्ला घुमाया और तभी उधर से जय श्री राम का उदघोष गूंजा.
मैच प्रारंभ हो चुका है. भारत बैटिंग करने उतर रहा है.
अब इन क्रिकेट के खिलाड़ियों के लिए भी क्रिकेट से रिटायर होने के बाद एक नया रोजगार का अवसर हो गया है. वे विधायकी का चुनाव लड़ सकते हैं.
-समीर लाल समीर
   
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून ३०, २०१९ में:




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रविवार, जून 23, 2019

बिना सेल्फी के सभी योगा बेकार हैं



कल कलेक्टर साहब शाम को ही बोतल खोल कर बैठ गये. कहने लगे कि आज जल्दी सोना है. सुबह ५ बजे से अंबेडकर मैदान में योगा डे की ड्यूटी लगी है. वैसे भी जल्दी सोना और जल्दी जागना स्वास्थय के लिए बहुत लाभदायक है. ये खासियत है हमारे देश की. अगर बिजली चली जाये तो हम अँधेरे के फायदे गिनाने लगते हैं. २ पैग लगाये और फिर तो ऐसी ज्ञान वर्षा की कि मैं तो सुनते सुनते ही फिट महसूस करने लगा.
कहने लगे कि मैं तो आज की शिक्षा प्रणाली से सहमत नहीं हूँ. हमारे वक्त में स्कूल में हमें हफ्ते में जहाँ दो दिन पीटी कराई जाती थी, वहीं हर दिन पीटा भी जाता था. उससे मांस पेशियाँ मजबूत होती थी. कम से कम तीन दिन ३० -३० मिनट मुर्गा बनने से खून का प्रवाह ठीक रहता था. हाल ही में एक अमेरीकन वैज्ञानिक ने शोध करके बताया कि कान पकड़ कर उठक बैठक करने से न सिर्फ दिमाग तेज होता है वरन अल्ज़ाईमर जैसी बीमारियों से भी बचाव होता है. हम तो हर रोज किसी न किसी पीरियड में ५० -५० उठक बैठक लगाते पाये जाते थे. कितनी बार स्कूल के पूरे मैदान के १० चक्कर लगाने के लिए मास्साब भेजा करते थे.
सुनते सुनते मूँह से निकल गया कि सर!! इसका मतलब तो यह लग रहा है कि आप स्कूल के जमाने में बहुत बदमाश रहे होंगे?
कहने लगे- अरे नहीं, वह तो सब बाल सुलभ नादानियाँ थीं. तब जरुर लगता था कि बेवजह छोटी छोटी बातों पर मास्साब सजा दे रहे हैं मगर अब जाकर पता चला कि वह तो हमें स्वास्थय दे रहे थे. हमसे योगा करवा रहे थे ताकि हमारी उर्जा सही दिशा में प्रवाहित की जा सके. धन्य थे वो शिक्षक. इतना कहते कहते कलेक्टर साहब भावुक हो गये और उनका गला रुँध आया. शायद यह तीसरे पैग का असर था कि उनकी आँखें नम थी और वह अपने पाठशाला के मास्साब को याद कर रहे थे. याद करते हुए उन्होंने अपनी तोंद पर याद फिराया और कहने लगे कि उनके बाद किसी ने मेरे स्वास्थय की परवाह न की. स्कूल क्या छूटा जैसे स्वास्थय वहीं छूट गया हो.
मैने उनको याद दिलाया कि सर, कल ५ बजे आपको अंबेडकर मैदान पहुँचना है. मगर वो अब मूड में आ चुके थे. मेरी मर्जी मैं जब पहुँचू, कोई मेरा क्या कर लेगा? वो ४ था पैग बना कर शुरु हो गये अंबेडकर जी गुणगान करने. इनके कारण आज मैं कलेक्टर हूँ. बहुत सम्मान है इनके प्रति मेरे दिल में. इन्होंने ही हम दलितों को समाज में सही स्थान दिलाया. यह मेरा सौभाग्य है कि कल मैं अंबेडकर मैदान में योगा डे में सम्मलित हूँगा. तब जाकर समझ आया कि स्कूल के दिनों का इतना बदमाश बालक आज कलेक्टर कैसे बना.
उसके बाद उन्होंने योगा के फायदे गिनाये. कई आसान हाथ से पोज बनाकर समझाये. चौथा पैग भी खात्मे की तरफ ही था. अतः उनकी जुबान भी कई बार योगा पोज बना कर लचक कर लड़खड़ा जा रही थी. टेबल से गिलास उठाने और रखने में ऐसा लगता कि ऐसा पोज तो रामदेव भी न लगा पायें. फिर उन्होंने यह ज्ञान भी दिया कि योगा करने के लिए कहीं जाने की या कुछ करने की जरुरत नहीं है.
योगा जीवन शैली है. आप कुर्सी पर बैठे हो, बिस्तर पर सोये हो, नहा रहे हो, खाना खा रहे हो, टीवी देख रहे हो. बस ऑपर्च्युनिटी खोजो. अगर आप ध्यान से सजगता के साथ मौका तलाशोगे तो हजारों पोज बनाने के मौके हाथ लगेंगे. बस हो गया योगा. इतनी गर्मी पड़ रही है. ऑपर्च्युनिटी है इसमें भी. फटाफट हॉट योगा कर लो. इसे कोसो मत. विदेशों में लोग हीटर लगा कर इतनी गर्मी पैदा करते हैं हॉट योगा करने के लिए. वाटर योगा, स्लीपिंग योगा, ईटिंग योगा, टॉकिंग योगा, वाचिंग योगा, लॉफिंग योगा. अवसर ही अवसर चौतरफा फैले पड़े हैं. बस जरुरत है आपको आँख खुली रखने की और मौके पर पोज़ बनाकर सेल्फी उतारने की. बिना सेल्फी के सभी योगा बेकार हैं, यह बात गांठ बांधने योग्य है.
यह बताते बताते साहब की आँख धीरे धीरे मुँदती जा रही थी. वो स्लीपिंग योगा मोड में जा रहे थे शनैः शनैः. अंतिम कुछ वाक्य जो लड़खड़ाती जुबान से ठीक ठीक सुनाई नहीं दिये वो शायद रोजगार के अवसर, इनोवेशन और आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स जैसे मसलों को योगा के जोड़कर सोचने पर गंभीर बयान थे. सुबह तक तो उनको याद भी न रहेगा वरना पूछ कर क्लियर कर लेते.
 उन्होंने किसी तरह ईटिंग योगा के तहत मुर्गा मटन दबाकर खाया और गेस्ट हाऊस में कमरे में सोने निकल लिए.
सुबह सुबह अंबेडकर मैदान जावेंगे. खादी की मैट पर एडीडास का योगा ऑउटफिट पहन कर जमीन पर बैठ पाने की अवस्था उनकी है नहीं. तोंद आड़े आ जाती है. अतः उन्होंने पार्किग व्यवस्था का जिम्मा अपने सर ले लिया है. शाम को उन्हें मुख्य मंत्री के कर कमलों से विश्व योगा दिवस पर सम्मलित होने हेतु एक प्रमाण पत्र दिया जायेगा एवं योग के प्रचार प्रसार में उनके योगदान हेतु उन्हें सम्मानित किया जायेगा. इस अवसर पर मुख्यमंत्री के साथ उनकी तस्वीर खींची जायेगी जो कि कलेक्टर साहब अपने दफ्तर में ले जाकर टागेंगे. इससे उनके मातहत और शहर की जनता योग हेतु प्ररित होगी.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून २३, २०१९ में



चित्र साभार: गुगल Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, जून 15, 2019

रेलगाड़ी में मेंहदी, ब्यूटी पार्लर, सत्यनारायण की कथा जैसे रोजगार के अवसर


हमारे शहर से ६० किमी दूर एक दूसरा शहर था. वहाँ पर स्टेशन के आलूबोंडे (बटाटा बडा) बहुत मशहूर थे. छुट्टी के दिन अक्सर हम मित्र लोग एक ट्रेन से जाते. छक कर आलूबोंडे खाते और दूसरी ट्रेन से लौट आते. रास्ते भर गप्प सटाका भी हो जाता. तब व्हाटसएप, फेसबुक आदि नहीं होते थे, अतः समय की कमी नहीं थी और इस बहाने मित्रों से गप्प सटाका भी हो जाता.
वक्त बदल गया है. अब तो शायद व्हाटसएप से ऑर्डर करते और ऊबर ईट उसे पहुँचा जाता. मगर अब आलूबोंडे खाता कौन है? अब संभ्रातों के लिए पिज़्ज़ा और बर्गर का जमाना है. फिर कुछ तो मात्र संभ्रात दिखने के लिए पिज़्ज़ा और बर्गर मंगा लेते हैं. बाकी के हेल्थ के प्रति सतर्क लोगों को आलूबोंडे में ही सारे दुर्गुण नजर आते है. ये वो लोग हैं जो बर्गर और फ्रेंच फ्राई के साथ डायट कोक पीते हैं और मुस्कराते हुए बताते हैं कि इस कोक में कैलोरी कम होती है. फिर एक वर्ग ऐसा भी है जो आलूबोंडे खाता तो है मगर घर के बने. उसे लगता है कि बाजार के आलूबोंडे में न जाने कैसा आलू डाला होगा और न जाने किस तेल में तला होगा?
पहले लोग धडल्ले से खोमचों से चाट पकोड़ी खाया करते थे. चौक की दुकान पर एक ही पतीली में दिन दिन भर खौलती चाय, जिसके स्वाद में सड़क से उड़ती धूल भी शायद अपना भरपूर योगदान देती थी. उस वक्त भी पूरा शहर असमय वीरगति को तो न ही प्राप्त हो जाता था.
आज जब बच्चों को बताओ कि हम कैसे आलूबोंडे खाने सब दोस्त ट्रेन से जाते थे. कैसे इटारसी स्टेशन आने का इन्तजार करते थे कि ट्रेन पहुँचे तो अंडा पराठा खायें. तो वह आवाक रह जाते हैं. और अब अगर एक छींक भी आ जाये तो कहते हैं देख लिया न, आलूबोंडे का असर. मैं भी नये हालातों में सोचने को मजबूर हुआ जाता हूँ कि काश!! आज से ३५ साल पहले वो आलूबोंडा ना खाया होता तो आज छींक न आती. मगर कल जो पिज़्ज़ा खाया है शायद उसके कारण छींक के साथ बुखार आने से बच गये. वाह रे दुनिया!!
उसी वक्त साईकिल पर चंपी, मालिश करने वाले भी मोहल्ले में आवाज लगाते फिरते थे. लोग बरमादे में दरी बिछा कर इत्मिनान से मालिश कराया करते थे. मालिश वाला शीशी में मालिश के लिए सरसों का तेल और चंपी के लिए लाल वाला ठंडा तेल लेकर चलता था और उसी से मालिश करता. पता ही नहीं चला कि वक्त के किस मोड़ पर वो चंपी मालिश वाले कब गोरैया हो गये. एकदम लुप्त प्रजाति.  देखते देखते मसाज पार्लर खुल गये और फिर मसाज पार्लर के नाम पर कौन कौन से धंधे फलने फूलने लगे, उसकी तो कहानी ही अलग है.
पिछले हफ्ते सुना कि फिर किसी को चंपी मालिश का ख्याल है. किसी आमजन को यह ख्याल आता तो शायद अन्य ख्यालों की तरह ख्याल ही बना मर जाता. किन्तु यह ख्याल मंत्री जी को आया. निश्चित ही पुराने जमाने के होंगे और आज के बेरोजगार युवाओं के लिए चिन्तित होंगे. सोचा कि क्यूँ न युवाओं के लिए रोजगार के नये आयाम खोले जायें. आखिरकार बर्गर से टक्कर लेने के लिए पकोड़े कितने लोग बनायेंगे? अब बारी है मसाज पार्लर को टक्कर देने की. अतः घोषणा की गई कि अब से रेलगाड़ी में रेल्वे के अधिकृत ठेकेदार मालिश की व्यवस्था करेंगे. २० मिनट की चंपी मालिश के १०० रुपये से ३०० रुपये. पॉयलट प्रोजेक्ट ३९ ट्रेनों से शुरु किया जायेगा जिसे फिर आगे विस्तार दिया जायेगा. 
इससे न सिर्फ युवाओं के रोजगार का एक नया आयाम खुलेगा वरन ठसाठस भरी रेल में एक दूसरे पर लदे यात्रियों की थकान और बढ़ते किराये की मार के दर्द दोनों से आराम भी मिलेगा. मालिश शरीर के दर्द और थकान का अचूक नुस्खा है.
शायद कल को किसी इन्टरव्यू में ऐसा सुनने को मिल जाये कि ’मेरे ख्याल में आया कि पकोड़े तलने के बाद जो तेल बच जाता है, उसे फैंकने की बजाय उससे रेल में मालिश करा दी जाये तो? मालिश में पकाया हुआ तेल ज्यादा फायदा करता है. पकोड़े और मालिश दोनों के धंधे में नफा. सबका साथ, सबका विकास!’
वो दिन दूर नहीं जब आप सुनेंगे कि रेलगाड़ी में मेंहदी सर्विस, ब्यूटी पार्लर, हेयर कटिंग, टेलर, सत्यनारायण की कथा और भी न जाने कितने नये नये रोजगार के अवसर आ जायेंगे. मुझे तो लगता है कि कहीं बेरोजगार युवा ही मिलना न बंद हो जायें और हमें अमेरीका की तर्ज पर वर्क वीजा देकर लोग बुलाना पड़े.
इतने सारे रोजगार के अवसर जो हैं.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून १६, २०१९ में




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