शनिवार, सितंबर 07, 2019

अच्छी नींद लेना मौलिक अधिकारों में से एक है



आजकल मौलिक अधिकारों पर लगातार चर्चा हो रही है. किसी गलत बात को भी सही ठहरा देना और उसे राष्ट्रहित में बताना भी एक वर्ग विशेष के लिए आजकल मौलिक अधिकार की श्रेणी में आ गया है. मौलिक अधिकारों से छेड़छाड़ कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी. अगर आप उनके मौलिक अधिकार में दखल देंगे तो आप देशद्रोही करार कर दिए जायेंगे,
एक जमाने में सुप्रीम कोर्ट ने बताया था कि अच्छी नींद लेना मौलिक अधिकारों में से एक है. यही खबर थी जो उस दिन सभी चैनलों के ट्रिकर पर चल रही थी. तुरंत ही इन्टरनेट पर आग की तरह फैल गई थी. देख-सुन कर लगा था कि मानो हनुमान जी को समुन्दर की किनारे खड़ा करके याद दिलाया जा रहा हो कि तुम उड़ सकते हो. उड़ो मित्र, उड़ो.
बहुत अच्छा किया जो आज सुप्रीम कोर्ट ने बतला दिया वरना हम तो अपने और बहुत से अधिकारों की तरह इसे भी भुला बैठे थे. अच्छी नींद- यह क्या होता है? हम जानते ही नहीं थे. हमें तो अब यह भी भूल जाना होता है कि महंगाई आई है या मंदी है क्यूंकि उस वर्ग विशेष के लिए यह सही राह तक पहुँचने के लिए वो पगडंडी है जिसे पर पहले से ही बबूलके कांटे कोई बिछा गया था.
गरमी की उमस भरी रात- और रात भर बिजली गुम और पास के बजबजाते नाले में जन्में नुकीले डंक वाले मच्छरों का आतंकी हमला वो भी डेंगू जैसे परमाणु बम के साथ. ओह!! मेरे मूल अधिकार पर हमला. केस दर्ज करना ही पड़ेगा. ऐसे कैसे भला एक मच्छर मेरे मूल अधिकारों का हनन कर सकता है. कैसे बिजली विभाग इसका हनन कर सकता है. गरमी की इतनी जुर्रत कि सुप्रीम कोर्ट से प्राप्त मेरे मूल अधिकार पर हमला करे.
भुगतेंगे यह सब राष्ट्रद्रोही. रिपोर्ट लिखाये बिना तो मैं मानूँगा नहीं. जेल की चक्की पीसेंगे यह तीनों, तब अक्ल ठिकाने आयेगी. पचास बार सोचेंगी इनकी पुश्तें भी मेरी नींद खराब करने के पहले.
वैसे मूल अधिकार तो और भी कई सारे लगते हैं जैसे खुल कर अपने विचार रखना (चाहे फेसबुक पर ही क्यूँ न हो), बिना भय के घूमना, शांति से रहना, स्वच्छ हवा में सांस लेना, शुद्ध खाद्य सामग्री प्राप्त करना, अपनी योग्यता के आधार पर मेरिट से नौकरी प्राप्त करना, बिना गड्ढे वाली सड़कें, अपने द्वारा ही चुने नेता से प्रश्न करना आदि मगर ये सब अभी पेंडिंग भी रख दूँ तो भी अच्छी नींद लेने को तो सुपर मान्यता मिल गई है. इसके लिए तो अब मैं जाग गया हूँ. सोच लेना कि मेरी नींद डिस्टर्ब हुई तो मैं जागा हूँ. फट से शिकायत दर्ज करुँगा. जेल भिजवाये बिना मानूँगा नहीं. पता नहीं पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना मेरा मूल अधिकार है कि नहीं? खैर, वो तो मैं चैक कर लूँगा वरना ले देकर तो दर्ज तो हो ही जायेगी रिपोर्ट.

अब मैं सबकी लिस्ट बना रहा हूँ- सबकी शिकायत लगाऊँगा.

नगर निगम सुबह ५ से ५:३० बजे तक बस पानी देते हो, मेरी नींद खराब करते हो. संभल जाओ, बक्शने वाला नहीं हूँ अब मैं तुम्हें.
और आयकर और जी एस टी वालों- कितना टेंशन देते हो यार. जरा सा कमाया नहीं कि बस तुम सपने में आकर नींद तोड़ देते हो. तुमसे तो मैं बहुत समय से नाराज हूँ- तुम तो बचोगे नहीं अब. बस, अब गिनती के दिन बचे हैं तुम्हारे. तुम तो भला क्या आओगे अब- मैं ही आ जाता हूँ.
और हाँ, तुम- बहुत बड़े स्कूल के प्रिंसपल बनते हो. मेरे बच्चे के एडमीशन को अटका दिया मेरा टेस्ट लेकर. मेरी बेईज्जती करवाई मेरी ही बीबी, बच्चों की नजर में- कितनी रात करवट बदलते गुजरी. नोट हैं मेरे पास सारी तारीखें. अब जागो तुम-जेल में. बस, तैयारी में जुट जाओ जेल जाने की.
बाकी लोग भी संभल जाओ- बहुतेरे हैं मेरी नजर की रडार पर. एक वो नालायक चौकीदार- जिसे मैने ही रखा है कि इत्मिनान से सो पाऊँ. वो रात भर सीटी बजा बजा कर चिल्लाता घुमता है- जागते रहो, जागते रहो. अरे, अगर हमें जागते ही रहना होता तो क्या मुझे पागल कुत्ता काटे है जो तुम्हें पगार दे रहा हूँ. तुम कोई धर्म गुरु तो हो नहीं कि बेवजह तुमको चढ़ावा चढ़ायें और अपने मूल अधिकार वाले अधिकार प्राप्त कर प्रसन्न हो लें. चौकीदार हो चौकीदार की तरह रहो- यह अधिकार मूल अधिकारों से उपर सिर्फ धर्म गुरुओं को प्राप्त है.
आज कुछ संविधान की पुस्तकें निकालता हूँ. सारे मूल अधिकारों की लिस्ट बनाता हूँ. फिर देखो कैसी बारह बजाता हूँ सब की.
अब मैं पूरी तरह से जाग गया हूँ इत्मिनान से सोने के लिए.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार सितम्बर ८, २०१९ में प्रकाशित:
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रविवार, सितंबर 01, 2019

कलयुग का नाम भी आजयुग रख देना चाहिये


जिस हिसाब से आज इतिहास बदला जा रहा है, सड़को और शहरों के नाम बदले जा रहे हैं, गांधी नेहरू के काम बदले जा रहे हैं, ऐसे में पुराने समय की कहावतें और मुहावरों को भी एक बार पुनः देखा जाना चाहिये एवं अगर आवश्यक लगे तो बदला जाना चाहिए. यूँ तो अन्य चीजों में बदलाव बिना आवश्यकता के भी किया जा रहा है वरना स्टेशनों के नाम बदलने से क्या होने जाने वाला है? शहर वही, रहने वाले वही. बस मन भटकाने के लिए नाम बदल दो तो ताकि अन्य जरुरी मूलभूत समस्याओं से ध्यान भटका रहे. वैसे ही जैसे स्मार्ट सिटी के नाम पर एक नया शगुफा छोड़ा हुआ है. न जाने कितने लोग स्मार्ट हो गए उस फंड से और शहर वहीँ का वहीँ.
बीते वक्त का एक मुहावरा है:
‘जितने मूंह, उतनी बात’
आज वक्त बदला है. आज कोई मूंह से कहां बोलता है? जो कहना है व्हाटसएप पर कह रहा है. वो टाइप करता है –वो बोलता नहीं है. आमने सामने बैठे दोस्त भी व्हाटसएप पर बात कर रहे हैं. अब इस मुहावरे को बदल देने का समय आ गया है:
‘जितने हाथ, उतनी बात’
मूंह की जगह हाथ ने ले ली है. काश! ऐसा युग आज से 25 बरस पहले आया होता तो तम्बाकू खाने वालों की चल निकलती. उन बेचारों को तो इत्मिनान से घोली तम्बाकू जब आकाश की तरफ मूंह उठाकर भी न संभलती तो थूक कर बात करना पड़ती थी. अपनी तरफ से बढ़कर तो वे बात न करते थे मगर हर जबाब भी तो उं आ ना में नहीं हो सकता अतः थूकना ही पड़ता है. मेरी सोच से तो आज का वक्त तम्बाकू युग कहलाना चाहिये. मगर जब तम्बाकू युग आया तो तम्बाकू खाने वाले कम हो गये.
यही होता है की जब सही वक्त आता है तो वक्त का सही आनंद लेने वाले नहीं रहते. शायद इसीलिए जिन्दगी को कहा गया है की जिन्दगी इन्तिहान लेती है. कोई कहता है कि यह जीना नहीं आसान. वजह बस इतनी सी कि आप जैसा जीना चाहते हैं वैसा वक्त नहीं होता और जैसा वक्त होता है वैसा आप जीना नहीं चाहते.
आज जब तम्बाकू खाने का मुफीद वक्त आया है तो आप हैल्थ के प्रति सजग हो लिए. और जब वक्त मूंह से बात करने का था तब आप तम्बाकू दबाये बैठे थे.
कई बार वक्त का तकाज़ा देखते हुए लगता है कि सरकार को एक काल ऐसा बना देना चाहिये जहाँ भ्रष्टाचार करने की पूरी सुविधा हो. पूरा संरक्षण दिया जाए. तब शायद हो ऐसा जाए कि भ्रष्टाचारी मिले ही न जैसे कि आज तम्बाकूबाज मिलना कम हो गये हैं.
यही हालत है कि कहने को तो कलयुग है मगर कल की कोई सोच ही नहीं रहा है. वे आज हर वो करम किये जा रहे हैं की घर भर जाये. कल सीबीआई छापा मारेगी, पकड़े जायेंगे. बदनामी हो जायेगी -इन सब की कोई परवाह नहीं. कल की कल देखी जायेगी. ऐसे में कलयुग का नाम भी आजयुग रख देना चाहिये.
जबसे हाथ ने मूंह की जगह ली है, तब से हालात बदले हैं. मूंह एक है मगर हाथ दो. हर बात में दो बात. दो के पीछे दो छिपी बात. मीडिया कुछ कहे. सोशल मीडिया कुछ और. और सत्यता कुछ और.
इन सबके बीच एक सामंजस्य बना कर आज की दुनिया में जी लेना ही एक कला है. वरना तो हर तरफ नकारात्मकता का ही माहौल हो चला है. सब इन्हीं हाथों से बोली गई बातों का कमाल है.  
शायद इसीलिए ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ का तरीका भी बदलना होगा. जब सब बदल रहा है तो ये भी सही.
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार सितम्बर १, २०१९ में प्रकाशित:


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शनिवार, अगस्त 24, 2019

समस्यायें परेशान करतीं तो उनसे मूंह फेर लेते हैं नेता जी



बचपन से परिचित - हम सहपाठी थे दर्जा आठ तक.
फिर उसकी पढ़ाई की रफ्तार शनैः शनैः मद्धम पड़ गई और ११ वीं तक आते आते उसकी शिक्षा यात्रा ने उस वक्त के लिये दम तोड़ दिया.
अक्सर मौहल्ले के चौराहे पर खड़ा दिखता ४-६ आवारा लड़कों के साथ. किसी ने बताया कि अब वो छोटी मोटी चोरी की वारदातों में शामिल रहने लगा है. स्वभाव से मिलनसार एवं व्यवहारकुशल.जब भी दिखता तो हाथ उठा कर अभिवादन करता और चाय के लिये जरुर पूछता. यह उसकी आदत का हिस्सा बन गया था. पूछना उसका काम होता और मना करके किसी कार्य की जल्दी बतला कर निकल जाना मेरा.
दरअसल मैं डरा करता था कि कहीं उसके साथ साथ किसी लफड़े में न अटक जाऊँ. वो भी शायद समझता होगा तो बस, इतना सा कह कर मुस्करा देता कि ठीक है. आगे कभी सही. मेरे लायक कोई काम हो तो बताना. यह पूछना भी उसकी आदत का ही हिस्सा था अन्यथा किसी चोर से क्या काम बतायें? यही उसकी सहृदयता की निशानी है. धार्मिक वो शुरु से रहा. मंदिर मे सुबह शाम दोनों वक्त माथा टिकाने जाता. बस, कभी कभी मौका देख कर चढ़ावे पर हाथ साफ कर लेता.
फिर सुना बड़ी चोरियों में उसकी गैंग चलने लगी. बहुत कर्मठ है. इलेक्ट्रानिक्स गुड्स की चोरी में स्पेशलाइजेशन हासिल कर लिया. शहर उपर नाम चलने लगा और वो चोर से प्रमोट होकर गुण्डे की केटेगरी में आ गया. आदत वही: हाथ दिखाना, चाय और काम को पूछना. मुस्कराना और मेरा विदा हो जाना.
कहते हैं उसकी किस्मत बहुत बुलंद है और हौसला फौलादी. गुण्डागर्दी में भी वो जल्द ही ग्रेड ए का गुण्डा हो लिया. बहुत नाम कमाया. आधा काम तो उसके नाम से हो जाता. वो स्वयं सिर्फ बड़े केसेस हैंडल करने जाता जैसे मकान खाली कराना, चुनाव के दौरान नेताओं के लिये बूथ केप्चरिंग आदि. रसूकदार हो लिया और कालांतर में उच्चस्तरीय गुण्डागीरी के राजमार्ग की स्वभाविक मंजिल को हासिल करते हुए वह नेता हो गया.
शिक्षा और शिक्षा के समाज में योगदान का उसे पूरा भान था. जीजीविषा ऐसी कि ११वीं में दम तोड़ी शिक्षा यात्रा को उसने पुन: जीवित किया और अपने नाम के चलते किसी को भेजकर उसने इस बीच १२वीं और फिर बी.ए. और एल.एल.बी. की उपाधि अर्जित की.
अपनी रसूकदारी और अनेकों नेताओं पर पुराने अहसानों के चलते पार्टी टिकिट से विधायक का चुनाव लड़ा और जैसा की होना था-जीता भी भरपूर मार्जिन के साथ. एक बार नहीं. लगातार दो बार और आज भी तीसरे दौर में विधायकी बरकरार है.
जैसा बताया कि उसकी किस्मत बहुत बुलंद है और आदमी काम का, अतः इस बार उसे मंत्री बनाया गया. भावुक हृदयी होने के कारण जनसमस्यायें उसे विचलित करतीं अतः अक्सर उनसे वह मूँह फेर लेता.
कुछ दिनों पहले पुनः दिखा. मानो पद प्रतिष्ठा का घमंड उसे छू तक न सका. वही तरीका: हाथ दिखाना, चाय और काम को पूछना. मुस्कराना-इस बार लाल बत्ती की कार को किनारे रोक कर उसने यह रसम अदायगी की अतः स्वभाविक रुप से हमेशा की तरह मैं मना नहीं कर पाया और उसके साथ वहीं चाय पी.
बड़ा दबदबा. पीछे पीछे पुलिस की गाड़ी. हालांकि उसे कुछ भी नया नहीं लगता होगा. पहले भी उसके पीछे पुलिस की गाड़ी रहती ही थी. मगर तब जनता की उससे सुरक्षा की वजह से. आज जनता से उसकी सुरक्षा की वजह से. बस, इतना सा ही तो अंतर पड़ जाता है गुण्डे से नेता की यात्रा तय कर लेने में. आज जब उसकी चुनाव बाद शोभा यात्रा निकलती है तो भी वह बीच में, चारों ओर पुलिस और समर्थक टाईप आवारा बालक. बहुत पहले भी कई बार उसकी ऐसी ही यात्रायें पुलिस ने निकाली हैं मौहल्ले में मगर तब वो शिनाख्ती परेड की शक्ल में होती थीं और वो कुछ इसी अन्दाज में तब भी मुस्करा कर ही पुलिस को बताया करता था कि फलानी जगह से यह चुराया और फलानी जगह से वो. साथ साथ बहुतेरे आवारा लड़कों की भीड़ भी ऐसे ही चलती थी कुतहलवश.
वह यारों का यार है. पहचान वालों से पैसा लेकर काम करना उसे गवारा नहीं और बिना पैसे लिये कोई काम आज तक उसने करवाया नहीं. अतः उसकी पहचानवालों का उसके माध्यम से कोई कार्य नहीं होता किन्तु किसी को उसने कभी नहीं भी नहीं कहा. एक सकारात्मक सोच का धनी-हमेशा हाँ में ही जबाब देता.
चाहे वो मंत्री हो गया हो किन्तु जमीन से उसका जुड़ाव वन्दनीय है. वह जमीनी नेता के तौर पर जाना जाता है. जमीन से लगाव ऐसा कि क्षेत्र की सारी कभी विवादित रही जमीनों पर आज उसका मालिकाना हक है और सारे कागजात उसके नाम. शहर के बीचों बीच एकड़ों में जमीन का मालिक.
समाज में उनके सराहनीय कार्यों एवं क्षेत्र विकास को समर्पित जीवनशैली को देखते हुए विश्व विद्यालय शीघ्र ही उन्हें मानद डाक्टरेट देने पर विचार कर रही है. सारे जुगाड़ सेट हो चुके हैं.
आज उसका मौहल्ले में सम्मान समारोह है. मुझे मंत्री जी का परिचय देने के लिये मंच से बोलना है. अतः, सोच रहा हूँ इसी में से उनके स्वभाव के मुख्य मुख्य अंश निकाल कर पढ़ दूंगा. अब कहाँ समय मिलेगा फिर से नया लिखने का?
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अगस्त २५, २०१९ में प्रकाशित:
http://epaper.subahsavere.news/c/42836995



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शनिवार, अगस्त 17, 2019

विपश्यना के राजपथ का साईड वॉक



हाल ही गोयनका जी के विपश्यना शिविर से लौटे. एक अद्भुत अनुभव. शायद अब बार बार जाना हो. लेकिन हम जैसे व्यंग्यकारों का मन तो हर जगह से कुछ और ही खोज लाता है. हमें तो राजपथ पर भी चलवाओ तो भी नजर साईड वॉक पर ही रहती है. अन्यथा मेरा अब मानना है कि हर व्यक्ति को अगर मौका लगे तो जीवन काल में एक बार इस शिविर में जरुर जाना चाहिये, फिर तो आप अपने आप बार बार जायेंगे.
शरीर से जब आत्मा अलग होती होगी, तो कैसा अहसास होता होगा? जानना चाहते हैं? आज के जमाने में इसका अहसास करना है तो आज के जमाने में पहुँच जाईये किसी भी गोयनका जी के विपश्यना शिविर में. जैसे ही पहुँचेंगे, वो आपसे आपका फोन, कागज, पैंसिल सब कुछ जमा करवा लेने के बाद कहेंगे कि अब किसी से कोई बातचीत नहीं, न ही आँख से संपर्क, न गाना, न इंटरनेट, न टीवी, न समाचार पत्र. जो हो वो बस आप अगले १० दिनों के लिए. ५ मिनट में जान जायेंगे उस अहसास को.
फिर शील, झूठ नहीं बोलना, काम और क्रोध से परे रहना, किसी जीव को मारना नहीं का प्रण दिलवाया जाता है. अकसर यह आश्रम बहुत बड़े हरे भरे पेड़ों से घिरे जंगलनुमा स्थानों में बस्ती के शोरगूल से दूर होते हैं. ऐसे में यह जंगल मच्छरों के लिए स्वर्ग हैं. उस पर से उन्हें तो जैसे गोयनका जी ने जेड सिक्यूरीटी दे दी हो. उन मच्छरों की जितनी मर्जी हो, उतना आपको काटें मगर आप उन्हें छू भी नहीं सकते, मारने की बात तो दूर. वो तो हम हिन्दुस्तान से हैं और जेड सिक्यूरीटी मिले लोगों के कारनामों और शोषण को जानते हैं, इसलिए मच्छर का द्वारा काटे जाने का उतना बुरा नहीं लगा. शिविर में सिखाया ही यह जा रहा था कि कुछ भी सदा के लिए नहीं है. अतः मच्छर काटेगा, हमारे खून से उसका पेट भर जायेगा, फिर वो उड़ जायेगा. विपश्यना करने तो हम गये थे, अतः नियम का पालन भी हमें ही करना था. मच्छर तो वहीं रहता है, वो थोड़ी न विपश्यना करने आया था. यूँ भी जेड सिक्यूरीटी प्राप्त व्यक्ति को आपके शोषण का अधिकार आप स्वयं ही देने के आदी भी तो हो.
सुबह ४ बजे जागने से लेकर रात १० बजे सोने जाने तक सुबह एक नाश्ता और ११ बजे दिन में एक खाने पर ११ घंटे पीठ सीधी रखे ध्यान में बैठे बैठे शरीर की क्या हालत हो जाती है, वो तो आप समझ ही सकते हो. ऐसा नहीं कि इससे बदत्तर आपके शरीर के साथ और कुछ हो नहीं सकता. रोड़वेज की सरकारी बस में मध्य प्रदेश की सड़कों पर १२ घंटे के सफर का रियाज यहाँ काम आया. लेकिन उस सफर में इतना इत्मिनान रहता था कि घर पहुँच कर आराम से लम्बा सोवेंगे. मगर यहाँ तो कल सुबह फिर ४ बजे जागना है. ऐसे में पुनः ५० पार हिन्दुतानी होने का फायदा मिला. सोने के पहले अमृतांजन का घुटने से लेकर सर तक लेपा और तान कर सो गये. बढ़िया नींद आ जाती थी.
अमृतांजन बनाने वाले ने भी कभी न सोचा होगा कि वो हम ५० की उम्र पार कर चुके हिन्दुस्तानियों के लिए वाकई अमृत बना रहा है. सर दर्द तो, जुकाम तो, घुटने में दर्द तो, नींद नहीं आ रही है तो, जुकाम लगा तो, नाक सूखी तो, कहीं हल्का सा जल गया तो, कहीं कीड़े न काट लिया तो और आज कहीं कोई दर्द नहीं है तो यूँ ही लगा लिया कि कल दर्द न हो जाये, मने हर हाल में अमृतांजन लगाना जरुरी है. आदत ऐसी कि सब ठीक ठाक हो तो भी बिस्तर के बाजू में अगर अमृतांजन की शीशी न हो तो टेंशन में नींद नहीं आती कि अमृतांजन खत्म है.  
अमृतांजन न हो गया कि जैसे भारत में हमारे पड़ोस में एक ८५ वर्षीय मलहोत्रा जी रहा करते थे, उनकी छड़ी, टार्च और घंटी हो गई हो. वे रोज सोने के पहले बिस्तर पर लेटे लेटे घंटी बजा कर अपने बेटे को बुलाते और कहते बेटा, वो छड़ी मेरे नजदीक खड़ी कर दे और टार्च में देख लेना कि मसाला तो है न? रात में बाथरुम जाना हुआ तो?
बेटा रोज झल्लाता कि क्या बाबू जी!! आप भी अब सिर्फ परेशान करते हो!! २ साल हो गये बिस्तर पकड़े. आँख से दिखता नहीं है और केथेटर लगा है. दिन में दो बार नर्स पेम्पर बदल कर जाती है और आप हो कि टार्च में मसाला और छड़ी रोज चैक करवाना छोड़ ही नहीं रहे. अब बेटे को कौन समझाये कि साईकोलॉजिकली बाबू जी को कितना इत्मिनान मिलता होगा और नींद आ जाती होगी कि टॉर्च और छड़ी साथ में है. बेटा बुढ़ापे की छड़ी होता है, भी तो अधिकांशतः अब साईकोलॉजिकल बल ही देता है. फिर अपवाद तो हमेशा होते ही हैं.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अगस्त १८, २०१९ में प्रकाशित:

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शनिवार, अगस्त 10, 2019

टी आर पी देने वाले ही मुँह मोड़ कर आर आई पी (RIP) न देने लगें



कोई सुन्दर बाला आपसे कहे कि वो २०-२० मैच में हिस्सा लेकर लौट रही है, तो सीधा दिमाग में कौंधता है कि चीयर बाला होगी. किसी के दिमाग में यह नहीं आता कि हो सकता है महिला लीग का २०-२० खेल कर लौट रही हो. वही हाल हमारा होता जा रहा है जब शाम हमारे घर लौटते समय कोई मिल जाये और उसे हम बतायें कि जिम से लौट रहे हैं. सब समझते हैं कि ऑडिट करके आ रहे होंगे या जिम में एकाऊन्टेन्ट होंगे. सी ए होने के यह लोचे तो हैं ही. शरीर देखकर कोई यह सोच ही नहीं पाता कि बंदा कसरत करके लौट रहा है. कई मारवाड़ी मित्र सोचते हैं कि बोलने में मात्रा गलत लगा दी होगी तो पूछते हैं कि कहाँ से जीम कर लौट रहे हो? उनको लगता है कि किसी दावत से जीम (खा) कर लौट रहे हैं. 
अतः अब हमने यह सोच कर बताना ही बंद कर दिया है कि बाद में तब बतायेंगे जब करनी और कथनी एक सी दिखने लगेगी. हालांकि जिम जा जा कर हम वजन के जिस मुकाम से लौट कर आज जिस मुकाम पर खड़े हैं, इस मुकाम तक आने के लिए हमें जितना वजन घटाना पड़ा, उसका आधा वजन घटा कर बंदे देश भर में फिटनेस गुरु से बने फिटनेस के मंत्र बांटते नहीं थक रहे. वो ९० किलो से ८० पर आकर अपनी शौर्य गाथा सुना रहे हैं और एक हम हैं कि १२० से १०० पर आकर भी मूँह खोलकर बता नहीं पा रहे हैं कि जिम से लौट रहे हैं. ऐसा मानो कि कोई एवरेस्ट के बेस कैम्प नेपाल तक जाकर लौट आया हो दिल्ली वापस और देश भर को पर्वतारोहण के तरीके और गुर सिखा रहा हो और मीडिया उसके इर्द गिर्द लट्टू सी नाच रही हो. एक हम हैं कि एवरेस्ट पर झंडा गाड़ कर वापस उतर रहे हैं और किसी को दिल्ली में कानों कान खबर तक नहीं है. 
मीडिया भी एवरेस्ट पर चढ़कर कवरेज करने से तो रही और सनसनीखेज की तलाश भी अनवरत बनी रहती है तो ऐसे ही लोग बच रहते हैं जो बेस कैम्प से लौट नुस्खे बांट रहे हों और पत्रकार उनसे पूछ रहे हों कि आप युवाओं को पर्वतारोहण के लिए क्या टिप देना चाहेंगे? और टिप के नाम पर बंदे ज्ञान का मंत्र उच्चारण शुरु कर देते हैं.
वक्त वक्त की बात है. एक दिन हम भी एवरेस्ट से उतर कर जब दिल्ली पहुँचेंगे तो तहलका मचायेंगे, ऐसा विचार है मगर तब तक मीडिया ऐसे छद्म पर्वतारोहियों से इन्टरव्यू ले लेकर पर्वतारोहण का ही क्रेज  खत्म कर डालेगी तो हमारी सुनेगा कौन?
ये वैसे ही है जैसे कि बच्चे आज भी बोरवेल में गिरते हैं मगर कोई खबर तक नहीं लेता. सब मीडिया की अति का कमाल है. एक समय में २४ घंटे बोरवेल में गिरने को ऐसी हाईप दी कि अब क्रेज ही खत्म हो गया. एक दिन ऐसा भी आयेगा कि जब मर्डर, रेप, रेल दुर्घटनायें, भ्रष्टाचार, बाबाओं का सियासत से मिल कर रचा जा रहा सामराज्य एवं तांडव, सिस्टम की कार गुजारियाँ आदि सब बच्चे के बोरवेल में गिरने जैसा ही बिना कान पाया हादसा होने लगेंगे. न कोई सुनाने वाला होगा और न कोई सुनने वाला. 
सजग होना होगा मीडिया को कि दिल्ली की गोदी से उतर कर हिमालय की वादी तक पहुँचे पर्वतारोहण की खबर जुटाने. खबर की तह को पहचाने बजाये इस्त्री से बनी फुलपेन्ट की क्रीज को जायज ठहराने के. उसे फरक करना होगा खबर और सनसनीखेज चमकदार वारदात के बीच. वरना शायद एक रोज टीआरपी देने वाले ही मुँह मोड़ कर आरआईपी (RIP) कहने लग जायेंगे. तब हाथ मलने के सिवाय कुछ न बच रहेगा. याद रहे सोशल मीडिया नित जिम जा जा कर मजबूत हुआ जा रहा है.

यूँ तो मीडिया में हिम्मती और दिग्गज अपवाद हैं, जान की परवाह किये बगैर सच को सच कहना जानते हैं- उन्हीं से कुछ सीख ले लो. रेमन मैग्सेसे सम्मान यूँ ही नहीं मिला करते. 
-समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे दैनिक में रविवार अगस्त ११, २०१९ के अंक में:
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शनिवार, अगस्त 03, 2019

चाय की एक गरमागरम चुस्की के साथ


भारत में जब रहा करते थे तब अक्सर पंखे के ऊपर और रोशनदान आदि में लगभग हर ही जगह चिड़िया का घोसला देख पाना एक आम सी बात थी. अक्सर घोसले से उड़ कर घास और तिनके जमीन पर, बाल्टी में और कभी किसी बरतन में गिरे देख पाना भी एकदम सामान्य सी घटना होती थी.
उस रोज एक मित्र के कार्यालय पहुँचा तो एकाएक उनकी टेबल पर एक कप में गरम पानी पर वैसे ही तिनके और घास फूस गिरे दिखे. अनायास ही नजर छत की तरफ उठ गई. न पंखा और न ही घोसला. सुन्दर सी साफ सुथरी छत. पूरे कमरे में एयर कन्डिशन और काँच की दीवारें. समझ नहीं आया कि फिर ये तिनके कप में कैसे गिरे? जब तक मैं कुछ सोचता और पूछता, तब तक मित्र ने कप उठाया और उसमें से एक घूँट पी लिया जैसे की चाय हो. मैं एकाएक बोल उठा कि भई, देख तो ले पीने से पहले? कचरा गिरा है उसमें.
वो कहने लगा कि अरे, ये कचरा नहीं है, हर्बस हैं और यह है हर्बल टी. हमारे जमाने में तो बस एक ही चाय होती थी वो काली वाली. चाय की पत्ती को पानी, दूध और शक्कर में मिला कर खौला कर बनाई जाती थी. उसी का जो वेरीयेशन कर लो. कोई मसाले वाली बना लेता था तो कोई अदरक वाली. एक खास वर्ग के नफासत वाले लोग चाय, दूध और शक्कर अलग अलग परोस कर खुद अपने हिसाब से मिलाया करते थे. कितने चम्मच शक्कर डालें, वो सिर्फ इसी वर्ग में पूछने का रिवाज़ था. फिर एक वर्ग ऐसा आया जो ब्लैक टी पीने लगा. न दूध न शक्कर. समाज में अपने आपको कुछ अलग सा दिखाने की होड़ वाला वर्ग जैसे आजकल लिव ईन रिलेशन वाले. अलग टाईप के कि हम थोड़ा बोल्ड हैं. कुछ डाक्टर के मारे, डायब्टीज़ वाले बेचारे उसी काली चाय में नींबू डालकर ऐसे पीते थे जैसे कि दवाई हो. 
फिर एकाएक न जाने किस खुराफाती को यह सूझा होगा कि चाय की पत्ती को प्रोसेसिंग करके सुखाने में कहीं इसके गुण उड़ तो नहीं जाते तो उसने हरी पत्ती ही उबाल कर पीकर देखा होगा. स्वाद न भी आया हो तो कड़वा तो नहीं लगा अतः हल्ला मचा ग्रीन टी ..ग्रीन टी..सब भागे ..हां हां..ग्रीन टी. हेल्दी टी. हेल्दी के नाम पर आजकल लोग बाँस का ज्यूस पी ले रहे हैं. लौकी का ज्यूस भी एक समय में हर घर में तबीयत से पिया ही गया. फिर बंद हो गया. अब फैशन से बाहर है.
हालत ये हो गये कि ठेले से लेकर मेले तक हर कोई ग्रीन टी पीने लगा. अब अलग कैसे दिखें? यह ग्रीन टी तो सब पी रहे हैं. तो घाँस, फूस, पत्ती, फूल, डंठल जो भी यह समझ आया कि जहरीला और कड़वा नहीं है, अपने अपने नाम की हर्बल टी के नाम से अपनी जगह बना कर बाजार में छाने लगे. ऐसा नहीं कि असली काली वाली चाय अब बिकती नहीं, मगर एक बड़ा वर्ग इन हर्बल चायों की तरफ चल पड़ा है. 
बदलाव का जमाना है. नये नये प्रयोग होते हैं. खिचड़ी भी फाईव स्टार में जिस नाम और विवरण के साथ बिकती है कि लगता है न जाने कौन सा अदभुत व्यंजन परोसा जाने वाला है और जब प्लेट आती है तो पता चलता है कि खिचड़ी है. चाय की बढ़ती किस्मों और उसको पसंद करने वालों की तादाद देखकर मुझे आने वाले समय से चाय के बाजार से बहुत उम्मीदें है. अभी ही हजारों किस्मों की मंहगी मंहगी चाय बिक रही हैं.
हो सकता है कल को बाजार में लोग कुछ अलग सा हो जाने के चक्कर में मेनु में पायें बर्ड नेस्ट टी - चिड़िया के घोसले के तिनकों से बनाई हुई चाय. एसार्टेड स्ट्रा बीक पिक्ड बाई बर्ड फॉर यू याने कि चिड़िया द्वारा चुने हुए घोसले के तिनके अपनी चोंच से खास तौर पर आपके लिए. इस चाय में चींटियों द्वारा पर्सनली दाने दाने ढ़ोकर लाई गई चीनी का इस्तेमाल हुआ है. 
अब जब ऐसी चाय होगी तो बिकेगी कितनी मँहगी. क्या पता कितने लोग अफोर्ड कर पायें इसे. मुश्किल से कुछ गिने चुने और यही वजह बनेगी इसके फेमस और हेल्दी होने की.
गरीब की थाली में खिचड़ी किसी तरह पेट भरने का जरिया होती है और रईस की थाली में वही खिचड़ी हेल्दी फूड कहलाता है, यह बात बाजार समझता है.
बस डर इतना सा है कि चाय के बढ़ते बाजार का कोई हिस्सा हमारा कोई नेता न संभाल ले वरना बहुत संभव है कि सबसे मंहगी चाय होगी- नो लीफ नेचुरल टी. बिना पत्ती की प्राकृतिक चाय और चाय के नाम पर आप पी रहे होंगे नगर निगम के नल से निकला सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त गरमा गरम पानी.
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समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे दैनिक में रविवार अगस्त ४, २०१९ के अंक में:


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शनिवार, जुलाई 06, 2019

कानून तोड़ने का मजा ही कुछ और है!!


कुछ दिन पहले फ्रांस ने जब बच्चों को चपत लगाने को गैर कानूनी घोषित किया तो वो इस तरह का ५५ वाँ देश बना. सबसे पहले १९५७ में स्वीडन ने इसकी शुरुवात की थी

हमारा जन्म १९५७ के बाद हुआ. मगर जब किस्मत में पिटना लिखा हो तो कौन बचा सकता है? अतः भारत में पैदा हुए. शायद पिछले जन्म में नेता रहे होंगे या पहुँचे हुए बाबा, इसलिए कर्मों का फल भुगतने भेजे गये हों भारत. रुप रंग में भी उन्हीं कर्मों की सजा का स्वरुप झलकता है.
बचपन में नित ही कूटे पीटे जाते रहे. सिर्फ माँ बाप से पिटते, तो भी चला लेते. मगर वो जमाना ऐसा था कि पड़ोस वाले चाचा भी हाथ साफ कर लेते थे. घर आकर बताओ तो फिर पिटो कि जरुर तुमने कोई बदमाशी की होगी.
स्कूल में मास्साब लोग तबीयत से पीटा करते थे. कभी खुद की गल्ती पर तो कभी सहपाठी की गल्ती पर. मगर पिटते जरुर थे नियमित रुप से. हमारे एक मित्र थे गुड्डू. एक रोज उनके पिता जी ने उसे घर की दलान में जबरद्स्त पीटा छड़ी से. पूरे मोहल्ले ने देखा. किसी बुजुर्ग ने आगे बढ़कर गुड्डू को बचाया. पूछने पर गुड्डू ने बाताया कि उसने तो कोई गल्ती की ही नहीं है. तब उसके पिता जी बोले कि नहीं की है तो क्या हुआ. करेगा तो जरुर, बदमाशी इसका हर रोज का काम है और आज मुझे दो दिन के लिए दौरे पर जाना है. वे टैक्स विभाग में काम करते थे अतः शायद एडवान्स टैक्स का अभिप्राय भली भाँति समझते रहे होगे. 
हद तो तब हो गई जब हमारे एक अन्य मित्र मंटू घर की छत पर सिगरेट पीते हुए पकड़ा गये. उनके पिता जी अभी उनकी पिटाई कर ही रहे थे कि हम पहुँच गये किस्मत के मारे उनके घर. तब उसके साथ साथ हमें भी पीटा गया कि तुम इसके साथ दिन भर रहते हो तो तुमसे ही सीखा होगा इसने सिगरेट पीना. हमने कहा कि हम तो पीते ही नहीं सिगरेट. तो फिर पीटे गये कि नहीं पीते तो इसे पीने से रोका क्यूँ नहीं? हमको बताया क्यूँ नहीं? अब हम क्या कहते, चुपचाप पिट लिए मित्र का साथ साथ. जबकि सच्चाई तो यह थी कि वो अपने पिता को अपना रोल मॉडल मानता था और चूँकि वो सिगरेट पिया करते थे अतः उन्हीं के समान दिखने के लिए मंटू उन्हीं की पाकिट से चुरा कर सिगरेट पिया करता था. मुझे लगता है कि अगर उसे सिगरेट पीने के बदले चोरी करने के लिए पीटा गया होता तो शायद ज्यादा उचित होता. मगर जिसके हाथ में पीटने का अधिकार हो वो तो बस मौका खोजता है. उचित अनुचित की आप जानो.
वैसे भी आजकल सब तरफ ऐसा ही माहौल दिख भी रहा है. कोई बल्ले से मार रहा है. कोई रोमियो स्कॉवाड के नाम पर भाई बहन को ही पीटे डाल रहा है. कोई गाय का इलाज करवाने ले जाते व्यक्ति को गौ तस्कर कह कर पीट रहा है. कोई शिद्दत से की गई मोहब्बत को मजहब से जोड़कर लव जिहाद का नाम देकर पीटे डाल रहा है. मुद्दा कोई भी हो, बस मतलब पीटने से है. अब सईंया भये कोतवाल तो डर काहे का की तर्ज पर लोग कानून हाथ में लिए घूम रहे हैं. पीटने का मौका खोज रहे हैं. झूठी ताकत के नशे में डूबे हैं.
खैर, फ्रांस में नया नया आया बच्चों को चपत लगाने को गैर कानूनी करार देने वाला कानून थोड़ा ध्यान से पढ़ा. पता चला कि हालांकि बच्चों को चपत लगाना गैर कानूनी बना दिया गया है मगर माता पिता के लिए कोई सजा का प्रावधान नहीं है. फ्रांस की सरकार का मानना है कि मात्र गैरकानूनी करार कर देने से माता पिता को लगेगा कि वो गैरकानूनी काम करने जा रहे हैं अतः वह नहीं करेंगे.
मुझे लगा कि यह तो अपने यहाँ भी हो ही रहा है. लोग घूस खाये जा रहे हैं. घूस खाना गैर कानूनी तो है ही बल्कि सजा का प्रावधान भी है किन्तु घूस खाने वाला यह भी जानता है कि अगर पकड़े गये तो घूस खिलाकर बच जायेंगे. अगर भारत भी ऐसे ही बच्चों को चपत लगाने को गैर कानूनी घोषित कर दे तो अपने यहाँ तो वो बच्चे जो अब तक नहीं पिट रहे हैं, वो भी इसी चक्कर में पिट जायेंगे कि कानून हमारा क्या बिगाड़ लेगा?
कानून को चैलेन्ज करने में जो मजा हमें आता है वो पालन करने में कहाँ? कानून तोड़ने का मजा ही कुछ और है.
तभी तो जिस कोने में पान थूकना मना लिखा होता है, वहीं लोग शान से सीना तान कर पान थूकते हैं.
-समीर लाल समीर
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई ७, २०१९ में


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