रविवार, मई 19, 2019

जो गप्पी नहीं हैं, उनकी देश में कोई पूछ नहीं है


भारत गपोड़ियों का देश है. जो गप्पी नहीं हैं, उनकी देश में कोई पूछ नहीं है.
ऐसे में एक बड़ी सी गप्प हम भी हाँक ही लें. हुआ यूँ कि जब हमने सहित्यिक कृति ’बाल नरेन्द्र’ पढ़ी, तो हमसे रहा नहीं गया और हम पहुँच गये साहब का साक्षात्कार लेने.
सर, आपके बचपन पर लिखी गई ’बाल नरेन्द्र’ पढ़ी. उसमें गेंद वाला वाकिया जब गेंद तालाब में चली जाती है जिसमें घड़ियाल (मगरमच्छ) रहते हैं और सबके मना करने के बाद भी आप सर्जिकल स्ट्राईक कर घड़ियालों के घर में कूद कर न सिर्फ अपनी गेंद बल्कि घड़ियाल का एक बच्चा भी साथ ले आते हैं. इस शौर्य गाथा पर कृप्या प्रकाश डालें’
हें हें! मैं आपको बताऊँ. हुआ यूँ कि जब मैं ६ साल था तब अपने गांव के कुछ खास मित्रों के साथ टीम बनाकर गांव से दूर तलाब के किनारे सतौलिया खेल रहा था. मित्रों में बाल अरुण, बाल अमित, बाल बर्राक जो विदेश से छुट्टी मनाने अपनी मौसी के पास आया था, और भी कई थे, अब तो नाम याद भी नहीं. हमारे समय तो सतौलिया, कब्बड़ी, छुपनछुपाई बस यही सब खेल हम गरीबों के खेल थे.
मेरी पारी थी सतौलिया फोड़ने की. बाल बर्राक सामने गेंद लोकने को खड़ा था. आपको बताऊँ कि मैं गेंद इतनी ताकत से फेंकता था कि खास खास दोस्त तो प्यार से फेंकू बुलाते थे. आज भी बुलाते है जी. मैनें गेंद मारी. बाल बर्राक लोक न पाया और गेंद का दूसरा टिप्पा सीधे एक किलोमीटर दूर तलाब में लगा. तालाब में ढ़ेरों घड़ियालों का बसेरा था. जब तक हम तालाब के पास पहुँचे, एकाएक बूंदाबांदी होने लगी.
हम सभी टीम प्लेयर जिसमें से कुछ तालाब और घड़ियाल के विषय में काफी जानकारी रखते थे, आपस में विमर्श करने लगे. मेरा तभी से टीम के साथ काम करने का स्वभाव ही बन गया. जानकार टीम प्लेयरों का कहना था कि बारिश की बूँदों की टिप टिप मार से ये घड़ियाल यूँ ही गुस्से में बौखलाये होगे, ऐसे में इनके बीच जाना मतलब अपनी जान गंवाना है. हमें गेंद निकालने के अभी की बजाय समय परिवर्तित कर रात का कर देना चाहिये. तब एक तो ये घड़ियाल बूँदों से पिट पिटा कर थक कर सो चुके होंगे और अंधेरे में इन्हें बाल बर्राक नजर भी नहीं आयेगा. तो इस बात का फायदा ऊठाकर इसे तालाब में धीरे से उतार देंगे और ये गेंद लेता आयेगा. दोस्तों में हम लोग में यूँ मजाक और तू तड़ाक भी हो जाता था. आज भी कर लेते हैं.
मैने उनकी बात सुनी. हालांकि मुझे घड़ियालों के व्यवहार की साईंस की उत्ती जानकारी नहीं थी. मगर साथ ही मुझे- मैं आपको बताऊँ कि एक मिनट समय खराब करना खराब लगता है. ऐसा ही स्वभाव है जी मेरा. कईयों को बुरा भी लगता होगा कि घाई मचाता है. तो मेरे दिमाग में एक बात आई कि ये घड़ियाल तो मांसाहारी होते हैं. ऐसे में अगर मैं अपने आपको केले के पत्तों में लपेट कर धीरे से तालाब में चला जाऊँ तो बारिश की बूँदों से पिटते ये घड़ियाल समझेंगे कि केले का पत्ता है, बारिश में बहता हुआ चला आया है और मैं बारिश का फायदा उठाकर गेंद भी निकाल लाऊँगा.मैने अपनी बात सबके सामने रख दी जी और सबने मेरी बुद्धि का लोहा माना. अब प्रश्न यह उठा कि केले का पत्ता लेने तो गांव तक जाना पड़ेगा जिसमें एक घंटा एक तरफ लग जायेगा.
ऐसे में मैने आसमान में देखा तो कुछ गिद्ध उड़ते नजर आये. अच्छा, ये जो आप मेरी एक्टिंग देखते हो न, वो मुझे जन्मजात है जी. मैं बस वहीं लाश बन कर लेट गया. एक्टिंग इतनी मस्त कि गिद्ध ने समझा कि लाश पड़ी है. वो उतरा खाने और मैंने झप्पटा मार कर उसकी टांग पकड़ ली. वो घबरा कर उड़ा और मैं लटके लटके ७ मिनट में गांव आ गया केले के खेते में. फटाफट पत्ते तोड़े और फिर से लाश का इतना जीवंत किरदार निभाया कि गिद्ध को लगा कि इस बार तो पक्का लाश है. मैने फिर वो ही चकमा दिया और लटक कर वापस तालाब पर आ गया. तब मुझे पता चला कि काठ की हांड़ी भी बार बार चढ़ सकती है और मैने उसे अपने जीवन का मूल मंत्र बना लिया. आज भी बार बार काठ की हांड़ी चढ़ा ही देता हूँ.
अब मैने खुद को केले के पत्तों में लपेट कर धीरे से तालाब में बहा दिया और गेंद उठा ली. लौटते में एक घड़ियाल के बच्चे को भी साथ उठा लिया. सब घड़ियाल समझते रहे कि उनका बच्चा केले के पत्ते की सवारी के मजे लूट रहा है. किनारे आते ही मैने पत्ते उतारे और बच्चे और गेंद को लेकर सरपट भागा. तब घड़ियालों को समझ आया कि मैं तो उनसे भी बड़ा वाला घड़ियाल निकला. आपको बताऊँ कि उसी घड़ियाल के बच्चे से मैंने आंसू बहाना सीखा.
ऐसे ही एक मजेदार वाकिया और है जी. मैने बचपन में गिरगिट का बच्चा भी पकड़ लिया था. उससे भी सीखा. उसकी कहानी बाल नरेन्द्र के अगले संस्करण में आयेगी.
अगर आप में ललक है तो आप हर किसी से कुछ न कुछ सीख सकते हैं, ऐसा मेरा मानना है जी!!
-समीर लाल ’समीर’  
   
दैनिक सुबह सवेरे में रविवार मई १, २०१९ को:





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रविवार, मई 12, 2019

गालियों का सामाजिक महत्व एवं भाषा में उनकी उपयोगिता


सुजलाम सुफलाम, मलयज शीतलाम//शस्यश्यामलाम, मातरम//शुभ्रज्योत्स्ना पुलाकितायामिनिम//फुल्लाकुसुमिता द्रुमदला शोभिनीम//सुहासीनीम, सुमधुर भाषिणीम//सुखदम, वरदाम, मातरम//
तिवारी जी भाव विभोर हुए मंच से आँख मींचे पूरे स्वर में गीत गा रहे थे. वे ’भाषा का स्तर और संयमित भाषा के महत्व’ पर बोलने के लिए आमंत्रित किये गये थे. वे सरकारी उच्च भाषा समिति के मनोनीत गैर सरकारी प्रदेश महासचिव हैं अतः उन्हें मुख्य अथिति भी बनाया गया था.पद बना रहे इस हेतु आजकल हर मंचों से अपने बोलने की शुरुवात इस गीत से करते हैं. कुछ लोगों के बोल लेने के बात अभी गीत खत्म कर वो अपनी बात कहने को ही थे कि एकाएक माइक खराब हो गया. माइक वाले को आवाज दी गई मगर वह नदारत. पता चला कि उसे आख्यान व्याख्यान से क्या लेना देना? उसे तो आज कमाई हुई है तो वो कुर्सी वाले के साथ दारु पीने निकल गया है और रात में माइक खोलने ही लौटेगा.
तिवारी जी का कार्यक्रम असमय ही वीर गति को प्राप्त हुआ और वो ही हाल उनके भाषा के संयम का हुआ. वे एकाएक माइक वाले को गालियाँ बकने लगे जोर जोर से चीख चीख कर. तिवारी जी के मूँह से ऐसी निम्न स्तरीय भाषा और गालियाँ निकलते देख सभी दिग्गज संभ्रांतों और अपने आपको स्तरीय भाषा के मठाधीष और ठेकेदार समझने वालों का चेहरा हक्का बक्का रह गया. हालांकि व्यक्तिगत तौर पर उनके हाल भी बेहाल ही हैं मगर चोर जब तक पकड़ा न जाये, चोर नहीं कहलाता. हमाम में तो सभी नंगे हैं मगर मंच पर अपना नहीं तो मंच का तो ख्याल रखना था, ऐसा सबका मानना था.
उपस्थित लोगों ने माइक वाले को दी जा रही गालियाँ सुनी मगर उसने बस न सुनी जिसे सुनाई गई थी. वो तो दारु पीने में मगन था. गाली माइक वाले के पिता को भी बकी, मगर उन्होंने भी नहीं सुनी. दिवंगत के कान नहीं होते. इसीलिए कहा जाता है कि दिवंगत का असम्मान करना आसमान की तरह मूँह उठाकर थूकने जैसा है. सारा थूक तुम्हारे मूँह पर ही गिरेगा और जो देखेगा वो हँसेगा कि ये इनके चेहरे पर कौन थूक गया? इसी कतार में बकी गई गालियाँ न उसकी दादी ने सुनी और न ही उसके नाना ने, क्यूँकि वह भी दिवंगत थे. सुनी तो उसकी माता जी ने भी नहीं, क्यूँकि वह तो घर पर सो रहीं थी.
अगले दिन के अखबारों ने इस समाचार को मुख प्रष्ठ पर पूरी तवज्जो से छापा कि ’स्तरीय भाषा के महत्व पर आख्यान देते हुए तिवारी जी ने भाषा के निम्नतर स्तर का नया रिकार्ड बनाया’. बेवजह तिवारी जी भड़के. अगले ही रोज उन्हें उच्च भाषा समिति के प्रदेश महासचिव पद से भी हटा दिया गया. अब वे लेटर पैड में प्रदेश महासचिव के आगे पैन से भूपू (भूतपूर्व) लगाकर ज्ञापन जारी करते हैं, जिसे कोई नहीं छापता. भूपू वह भौंपू होता है जिसे सिर्फ बजाने वाला ही सुनता है बाकी कोई नहीं. यह मात्र अपने सामाजिक सम्मान की गिर चुके महल की आखिरी दीवार को बल्ली से टिका कर उसे भी महल कहलवाने का कवायद है. जबकि वो भी जानता है कि अब न ये महल रहा और न ही उसकी शान और शौकत. मगर यह भी उतना ही सच है कि राजा चाहे फकीर ही क्यूँ न हो जाये मगर किस्से तो राज दरबार के ही सुनायेगा. भले ही एक फकीर से राज दरबार के किस्से सुन लोग उसे पागल ही करार क्यूँ न दे दें.
आजकल तिवारी जी चौक पर पान की दुकान पर बैठे घंसू और अन्य चौकबाजों को ’गालियों के सामाजिक महत्व एवं भाषा में उनकी अपयोगिता’ पर आख्यान देते नजर आते हैं. धीरे धीरे उनको सुनने वालों की संख्या भी दिन ब दिन बढ़ती जा रही है. कंठ तो शुरु से ही मधुर पाया था तो गालियाँ भी लयबद्ध तरीके से बिना सुर टूटे बककर तब अपना आख्यान शुरु करते हैं कि कुछ बातें बिना गाली का संपुट लगाये समझ में आ ही नहीं सकती. बिना गाली के वो बात अपना वजन खो देगी.
आगे कहते हैं कि दो खास मित्रों की दोस्ती की गहराई भी आपस में बातचीत के दौरान बकी गई गालियाँ से ही नापी जाती है, तो दूसरी तरफ, दुश्मन से दुश्मनी कितनी है उसे नापने में भी गालियाँ ही सहायक होती हैं.
तिवारी जी बताते हैं कि तुम क्या जानों इसका सांस्कृतिक महत्व. यूपी और बिहार में तो विवाह के शुभ मौके पर लड़की वाले लड़के के एक एक रिश्तेदार का नाम ले लेकर गालियाँ गाते हैं तब दो परिवार आपस में परिवारिक संबंधी बन पाते हैं.
तो आगे से याद रखना कि कोई यदि आपको गाली बक रहा है तो जरुरी नहीं कि दुश्मनी ही कर रहा है. हो सकता है उसके साथ आपका जीवन भर का प्रगाढ संबंध जुड़ रहा हो.  
-समीर लाल ’समीर’

दैनिक सुबह सवेरे में रविवार मई १२, २०१९ को:


 




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शनिवार, मई 04, 2019

चुनावी तूफान - जनता पर किसका बस चला है!!

देश में चक्रवाती तूफान आया है. ऐसा नहीं है कि बिना बताये चुपचाप से चला आया हो. मौसम विभाग को पूरी जानकारी होती है. कितने बजे आयेगा. कहाँ से शुरु होगा, किन राहों से गुजरता हुआ कहाँ पर खत्म होगा. कितनी रफ्तार से गुजरेगा. सभी जानकारी दे दी जाती है. तैयारियाँ भी भरपूर की जाती हैं. शीर्षस्थ नेता शीर्षस्थ अधिकारियों से बैठक करके तैयारियों का जायजा लेते हैं. आजकल तो जायजा लेते हुए फोटो भी खिंचवा कर मीडिया का दे देते हैं ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आये. वरना बाद में लोग सबूत मांगते हैं कि जायजा लिया भी था या नहीं?
सारी तैयारियों के बाद संपूर्ण मुश्तैदी और चाक चौबंद व्यवस्था की घोषणा कर दी जाती है कि आँधी आये या तूफान, हम खड़े हैं सीना तान. तब शुरु होता है स्थितियों पर नजर बनाये रखने का दौर. मीडिया का तूफान की राह में पलक पावड़े बिछाये इन्तजार शुरु हो जाता है. जब तक तूफान आ नहीं जाता तब तक तूफानों के बारे में ज्ञान का तूफान बांटा जाता है. उनका इतिहास बताया जाता है. पिछले तूफानों के विडिओ और तस्वीरें दिखाई जाती हैं. तब तूफान आता है.
हर बार की तरफ फिर वो तबाही मचाता है. कारें लुढ़काता है. बिल्डिंगों के काँच तोड़ता है. बड़े बड़े पेड़ गिराता है. छत उड़ा ले जाता है. बिजली के खंबे गिरा देता है. बड़ी बड़ी क्रेन, जिसे हटाना शायद तैयारी का हिस्सा नहीं था, को गिराता है जिसके गिरने से आस पास के मकान जो चुपचाप खड़े थे, वो भी बैठ जाते हैं. जान माल की हानि करता हुआ तूफान आगे निकल जाता है और फिर निर्धारित समय में तूफान रुक जाता है.
इस प्रक्रिया में आजकल एक तूफान और आकर जुड़ गया है. सबका साथ सबका विकास का तो क्या हुआ पता नहीं!! मगर बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था, मंहगाई और अन्य किसी भी समस्याओं से अप्रभावित ’हर हाथ कैमरे के साथ’ का माहौल बुलंद है. उस तूफान की राह में जिसे देखो वो ही विडिओ बनाने में जुटा है. सामने तबाही का मंजर है और उसके बीच ये विडिओ पीर!! छत पर खड़े, खिड़की से चिपके, दरवाजे से झांकते – जाने कहाँ कहाँ से विडिओ निकाल रहे हैं. सब तबाह हो रहा है. खंबे गिर जा रहे हैं. बिजली गुम है मगर नेटवर्क चालू. दनादन फॉरवर्ड. व्हाटसएप, ट्विटर, फेसबुक पर उस ओरीजनल तूफान से भी बड़ा तूफान उनके हजारों विडिओ और उनके साथ सेल्फियों का है.
फोटोऑप का जमाना है. कोई एक पल नहीं चूकना चाहता और एक होड़ सी मची है कि सबसे पहले मैं ही. फिर जिसे भेजा जाता है उसको भी फॉरवर्ड करने की उतनी ही जल्दी. वो भी तुरंत आगे बढ़ाता है. सभी विडिओ सभी ग्रुपों में सैकड़ों बार घूमते हैं चक्रवात की तरह.
इधर चुनाव का मौसम है. शहर शहर नेताओं की सभाओं और रोड शो की आँधी आई हुई है. इनकी मचाई तबाही की तो खैर एक अलग गाथा है किन्तु अब हेलीकॉप्टरों की गड़गड़ाहट की सुनामी उन तूफान से ग्रसित शहरों पर से जायजा लेने को गुजरेगी. सच्चे झूठे राहतों को पैकेज घोषित किये जायेंगे. कितने ही टन घड़ियाली आँसूओं की बारिश होगी.
इस तूफान का नाम फानी था. कोई फणि, कोई फानी, कोई फनी, कोई फ़ानी बोल रहा है. कुछ खास लोगों का तो यह भी मानना हो चला है कि इस तूफान का नाम फ़ानी (उर्दु शब्द) है इसलिए इतनी तबाही मचा गया. इसका नाम बदल कर तुरंत पानी या जल कर दिया जाना चाहिये. ताकि भविष्य में जब ये आवे तो तबाही न मचावे.
फिर नाम बदलने से जब शहर स्मार्ट हो सकता है. शहर मुसलमान से हिन्दु हो सकता. शहर सहिष्णु हो सकता है तो फिर तूफान की क्या मजाल. नाम बदलने के बाद आकर तो देखे? लिंचिंग मास्टर दौड़ा दौड़ा कर मारेंगे. लेकिन फिर जैसा कि हमेशा होता आया है कि इन खास लोगों का मानना बस इनकी सोच का अंजाम होता है असल बात कुछ और ही होती है.
दरअसल इस तूफान का नाम फणि अर्थात बंगाली में सर्प के नाम पर बांग्लादेश से पड़ा, जिसे बांगला में फोनी उच्चारित करते हैं. वही भारत़ में आते आते बंगाली टू अंग्रेजी टू मीडिया की खास हिन्दी ने फानी में बदल दिया. फ़ानी तो बस इन खास लोगों के दिमाग की उपज है.
बाकी तो जो तूफान को करना होगा, वो करेगा ही!! मदर नेचर पर किसका बस चला है.
वैसे तो चुनावी तूफान में भी क्या होगा, कौन जाने!! जनता पर भी किसका बस चला है!
-समीर लाल ’समीर’

डिसक्लेमर: इस बार फानी में प्रशासन की मुस्तैदी ने ११ लाख लोगों की विस्थापित करके एक जबरदस्त काम किया है, उड़ीसा के प्रशासनिक अधिकारियों को सलाम!! इस व्यंग्य का उद्देश्य उन्हें कमतर आंकना कतई नहीं है.

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार मई ५, २०१९ को:



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शनिवार, अप्रैल 27, 2019

झूठा है तेरा वादा! वादा तेरा वादा


पास के घर से रेडिओ पर फरमाईशी नगमों के कार्यक्रम में गाना बज रहा था.गाने की फरमाईश इतने लोगों ने की थी कि लगा जैसे लोगों के पास पोस्ट कार्ड लिखकर गाने की फरमाईश करने के सिवा कोई काम ही नहीं है. जितनी देर गाना न बजता, उससे ज्यादा देर फरमाईश करने वालों के नाम बजते. मेरा बस चलता तो इस कार्यक्रम का नाम बदल कर नगमों के फरमाईशकर्ताओं के नाम कर देता. नाम बदलने का दौर चल निकला है तो ये भी सही. गाने बजा:  
निंदिया से जागी बहार,
ऐसा मौसम देखा पहली बार,
कोयल कुँहके, कुँहके, गाये मल्हार
बहार जागी कि नहीं, यह तो पता नहीं मगर मेरी नींद जरुर खुल गई. आज थक कर बेसमय सो गया था. शायद गाना या फरमाईशकर्ताओं के नाम न बजते तो तीन चार घंटे और सोता रहता. मगर कोई मेहनतकश कुछ देर आराम कर ले, यह किसी को कहाँ बर्दाश्त? उल्टे आजकल तो आराम न करने का डंका पिटवाने में इंसान समय बिता रहा है. बिस्तर पर लेटे लेटे खिड़की के बाहर की बहार का नज़ारा लिया. वाकई हल्की हल्की बारिश हो रही थी.
कहते हैं कभी कभी किसी की जुबान पर सरस्वती विराजमान हो जाती है और वो जो कहता है वो सच हो जाता है. मुझे लगा कि जैसे आज रेडिओ की जुबान पर सरस्वती विराजमान हो गई हों, कौन जाने. ऐसा विचार कभी भी रेडिओ पर माननीय की मन की बात सुनते हुए न आया आज तक न जाने क्यूँ? शायद सरस्वती को भी इनकी फितरत मालूम हो अतः कभी नहीं आतीं उनकी जुबान पर.
यही कुछ सोचते जल्दी से मौसम के मिज़ाज के हिसाब से चाय बना लेता हूँ और बाहर छज्जे पर आ जाता हूँ हाथ में चाय का कप थामें. उम्मीद थी कि कहीं कोई कोयल मल्हार गा रही होगी.
जैसा कि होता है अब पड़ोस से गाने की आवाज आना बंद हो गई थी. जब मन है कि वो बजे तब वो गुम. किस्मत का खेला भी ऐसा है मानो सरकारी योजनायें कि मधुमेह के अस्पताल में मिठाई बंटवाती हैं. कहने को बाँटना भी हो गया और डॉक्टर की पाबंदी से मिला भी किसी को नहीं. बाँटने वाले भी सरकारी और पाबंदी लगाने वाले भी सरकारी. बादल छाये हैं मगर बारिश बंद हो गई है.
सामने पेड़ पर कोयल तो नहीं दिखी. हाँ, एक कौआ कांव कांव जरुर कर रहा था. उसकी कांव कांव की कर्कशता से मेरा मन किया कि किसी वस्तु को उछाल कर उसे उड़ा दूँ. तभी सामने वाले छज्जे पर नजर पड़ी. वहाँ पांडे जी की पत्नी मुग्ध सी कौव्वे को देख रही हैं. पांडे जी काफी दिनों से दौरे पर हैं. शायद उनकी पत्नी बिहारी की नायिका की तरह इस कांव कांव को अपने प्रिय पति के वापसी का संदेशा मान रही हों और सोच रही हों कि अगर मेरी पति आज आ गये तो तेरी चोंच सोने से मड़वा दूँगी. पांडे जी अच्छे ओहदे वाले सरकारी अधिकारी हैं. अतः उनकी पत्नी के लिए सोने से कौव्वे की चोंच मड़वाना बायें हाथ का खेल है. वो चाह लें तो कौव्वे के लिए पूरा पिंजड़ा ही सोने का बनवा दें. दूसरी तरफ छज्जे पर वर्मा जी बहु नजर आई. वो भी कौव्वे को ही देख रही थी मगर उसकी भाव भंगिमा से लग रहा है कि वो इस कौव्वे की धूर्तता के बारे में सोच रही है. कैसा मजे से बैठा कांव कांव कर रहा है और उधर बेचारी कोयल इसके अंड़े को भी अपने समझ कर से रही होगी.
तभी देखा कि स्वर्गीय गुप्ता जी जिनका आज श्राद्ध है, उनकी पत्नी और बेटा एक थाली में पकवान सजा कर पेड़ के नीचे रख कर कुछ दूर खड़े हो गये. वे बड़े श्रद्धा भाव से कौव्वे को हाथ जोड़े प्रणाम कर प्रार्थना कर रहे हैं कि हे कौआ महाराज, आइये और भोजन ग्रहण करिये ताकि गुप्ता जी आत्मा तृप्त होकर मुक्ति पाये.
कुछ मजदूर पुलिया पर बैठे बीड़ी पीते हुए सुस्ता रहे हैं. उन्हें न कौव्वे की कांव कांव से कुछ लेना देना है और न ही मौसम की रुमानियत से. वो तो अपनी दिहाड़ी कमाने में लगे हैं ताकि शाम को घर में खाना बन जाये.
मैं सोचने लगता हूँ कि एक कौआ और उसकी कांव कांव को सभी किस किस रुप में देख रहे हैं. सबके लिए इसके मायने उनकी सोच के हिसाब से अलग अलग हैं और किसी के लिए इसका कोई मायने ही नहीं है.
तभी ख्याल आता है कि मौसम तो आजकल चुनाव का भी है. नेता सारे आ रहे हैं. पेड़ पर तो नहीं मगर मंच से माईक पर जाने क्या क्या बोल रहे हैं. सब अपनी अपनी समझ से उसका मायने लगा रहे हैं. कोई माईक पर उनकी आवाज की कर्कशता पर परेशान हो रहा है. कोई अच्छे दिन आने का सपना सजा कर इनको स्वर्णजड़ित आसन देने का मन बना रहा है. कोई इनकी धूर्तता के बारे में सोच कर खीज रहा है. कुछ श्रद्धावनत होकर उनको पूजने भी लगे हैं. तो कोई उदासीन सा उनकी तरफ ध्यान भी न दे रहा है.
एकाएक फिर रेडिओ पर गाना बज रहा है कहीं:
सच्चाई छुप नहीं सकतीबनावट के उसूलों से
कि खुशबू आ नहीं सकतीकभी कागज़ के फूलों से!
झूठा है तेरा वादा! वादा तेरा वादावादा तेरा वादा
वादे पे तेरे मारा गयाबन्दा मैं सीधा साधा
वादा तेरा वादावादा तेरा वादा..
-समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अप्रेल २८, २०१९ को:



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