शनिवार, सितंबर 29, 2018

डीलरशिप क्यूँ बदल गई, इस पर सब चुप हैं



चुनाव में हार जीत का निर्धारण मुद्दे करते हैं. हर चुनाव के पहले न जाने कैसे एक ऐसा मुद्दा फूट पड़ता है जो चुनाव की दिशा निर्धारित कर देता है. अच्छी खासी चलती सरकार न जाने क्यूँ एकाएक पांचवे साल में विपक्ष को एक ऐसा मुद्दा दे देती है कि खुद का बना बनाया मजबूत किला नेस्तनाबूत हो जाता है?
इधर देखने में आ रहा है कि मुद्दे भी ऐसे आने लगे हैं मानों की चुनाव नहीं, युद्ध होने जा रहा हो. होता तो खैर युद्ध ही है आजकल. कहाँ वो भाईचारा देखने में आता है अब, जहाँ चुनावी द्वन्द चुनाव तक ही सीमित रहती थी. अब तो वो चुनाव के बाद भी पूरे पाँच साल व्यक्तिगत द्वन्द और दुश्मनी सी बन जाती है. विपक्ष के लिए वो कहावत तो मानो दुनिया भूल ही गई है कि वो एक अच्छी सरकार का पथ प्रदर्शक होता है. निन्दक नियरे राखिये को भूल भाल कर निन्दक को देशद्रोही ठहरा कर पाकिस्तान भेज दिजिये की बात कहने का जमाना आ गया है.
युद्ध से समानता की बात चली तो याद आया कि हाल ही में जबरदस्त चुनाव लड़ा गया बोफोर्स तोप से. तोप ऐसा मुद्दा बनी कि न जाने किस किस तरह से दागी गई और पूरी जमी जमाई सरकार औंधे मूँह गिर पड़ी. दागने वाले सरकार बना कर बैठ गये.
अब नया मुद्दा आया है. अबकी बार जेट विमान से बम बर्षा की जायेगी. रोफेल विमान उड़ान भरने को तैयार हैं २०१९ के चुनावी संग्राम में. निश्चित ही हवाई बमबारी भारी पड़ने वाली है. हवा हवाई का अपना वजन होता है. हारेगा कौन और जीतेगा कौन- यह तो नहीं पता! किन्तु इतना जरुर ज्ञात है कि युद्ध के बाद जिस तरह दोंनों देश पुनः अपने आप में मशगूल होकर पुर्नस्थापित हो ही जाते हैं किन्तु हारती मानवता है. मरते इन्सान हैं चाहें जिस देश के हों. दोनों देश के बच्चे अपना पिता हारते हैं. दोनों देश की माँयें अपने बेटे हारती हैं. दोनों देश की बेटियाँ अपना सुहाग हारती हैं. दोनों देश अपने बेटे हारते हैं. दोनों अपने नागरिक हारते हैं. फिर भी विजेता सोचता है कि हम जीत गये. क्या जीते और किस जीत का जश्न?...क्या हारे और किस हार का गम? शायद दोनों ही देश न बता पायें..सच तो ये है कि दोनों ही हारे हैं. जीता कोई ऐसा अहम है जिस अहम की कोई माईने नहीं..कोई औकात नहीं...कोई वजह नहीं.
वही हाल चुनावी संग्राम का है. यहाँ हारने वाला इन्सान बस आम जनता है बाकी सब युद्ध का सा ही हाल है. जाने कौन जीतता है? बस मुखौटा बदल जाता है, बाकी तो खून और अरमान आमजन के बहे. उसकी किस को कोई फिकर नहीं.
घंसु जैसे आमजन तो कहते पाये गये कि इस बार चुनाव में तो राईफल चलेगी? तिवारी जी उसे समझा रहे हैं कि राईफल नहीं, रैफल है.
घंसु जानना चाह रहा है कि तो यह रैफल क्या है?
तिवारी जी बता रहे है कि रैफल एक तरह का जुँआ है जिसमें सब खिलाड़ियों को एक टिकिट बांट दी जाती है, और उसी टिकिट का दूसरा हिस्सा एक डब्बे में डालकर ड्रा निकाला जाता है और जिसका टिकिट निकलता है वो विजेता घोषित हो जाता है. उसे जीता माना जाता है.
एकाएक एक अन्य ज्ञानी अवतरित हुए और कहने लगे कि आप क्या बात करते हैं? रोफेल तो युद्धक विमान की डील है जिसमें वो विमान खरीदे जा रहे हैं जो युद्ध में उडाये जायेंगे. हल्ला बस इसलिये मच रहा है कि दाम तीन गुना करके मुनाफा मित्र का दुगुना करने की जुगत हल्ला मचवा गई है.
डील में क्या मुनाफा है और क्या भागीदारी..वो अलग बात है. कोई कहता है मारुति ८०० के बदले ऑडी के दाम में फर्क तो होना ही है मगर डीलरशिप क्यूँ बदल गई, इस पर सब चुप हैं.
गाड़ी के मॉडल बदलने से डीलरशीप बद दें...तो सरकार की रहनुमाई से पार्टी भी बदले ..का सफर तय करना है.
फैसला जनता के हाथ में है..देखो वो क्या कहती है २०१९ में!!
बस एक मुहावरा याद आता है!!...
नाऊ भाई नाऊ भाई कितने बाल?
सरकार!! सब्र रखिये बस दो हाथ आगे ह!! 
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार सितम्बर २९, २०१८ में:


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3 टिप्‍पणियां:

Subhash Joshi ने कहा…

मुझे इस लेख में गीता के अध्यात्म चिंतन का प्रभाव वर्तमान राजनैतिक पर्वेक्ष में लग रहा है | बहुत खूब ...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (02-10-2018) को "जय जवान-जय किसान" (चर्चा अंक-3112) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

भारत में चुनाव का समय जब आता है तब सचमुच युद्ध की स्थिति होती है. कहीं शब्द-वाणों से तो कहीं हथियार से. आरोप प्रत्यारोप तो चुनावी मशरूफियत का एक तरीका है. बहुत अच्छा और सटीक लिखा है. बधाई.