गुरुवार, अगस्त 16, 2007

हज़ारों ख्वाईशें ऐसी,कि हर ख्वाईश पे दम निकले

आज तो कुछ लिखने का मन ही नहीं है. रात हो गई है.अँधेरा घिर आया है. मैं घर के पिछवाड़े में निकल कर लॉन में बैठ जाता हूँ. शीतल मनोहारी हवा मद्धम मद्धम बह रही है. बिल्कुल सन्नाटा. अड़ोस पड़ोस सब सो गया है, ऐसा जान पड़ता है.



मैं आकाश में देखते हुये वहीं लॉन पर लेट जाता हूँ. विस्तृत आकाश. बिल्कुल साफ मौसम. एक कोने में खड़ा चाँद. ऐसा लगता मुझे बेमकसद ताकते देखकर मुस्करा रहा है. पूरा आसमान टिमटिमाते तारों से भरा अदभूत नजर आ रहा है. मानो किसी बड़े से ताल में दोने में तैरते असंख्य दीपक. मेरे मन में हरकी पौड़ी, हरिद्वार की याद सहसा जीवंत हो जाती है. गंगा में तैरते असंख्य प्रज्वलित दीप. यह याद भी क्या चीज है, शिद्दत से याद करो तो सब नजारा जैसे एकदम जीवित हो जाता है. मुझे हवा में घी और अगरबत्ती की मिली जुली खूशबू आने लगती है और कान में घंटों और घड़ियालों के संग बजती गंगा आरती साफ सुनाई देने लगती है:

ओम जय गंगा माता......

मैं डूब जाता हूँ. एकाएक एक कार की आवाज से तंद्रा भंग होती है. शायद पड़ोसी देर से लौटा है आज. मैं भी हरिद्वार से वापस कनाड़ा की लॉन में लौट आता हूँ.



फिर एक टक आकाश में दृष्टि विचरण. बचपन में जब छत पर सोया करते थे तब दादी उत्तर में ध्रुव तारा और फिर सप्तऋषि मंडल दिखाया करती थी और उनकी कहानी न जाने कितनी बार सुनाती थीं. मैं आज फिर उसी ध्रुव तारे को खोजने लगता हूँ और फिर वो सप्तऋषि मंडल दिखाई देता है. दादी की कहानी याद आती है कि कहाँ चंद्रशिला शिखर के नीचे, तुंगनाथ स्थित है. निकटवर्ती स्थलों से सर्वोच्च स्थल पर अवस्थित होने के कारण इसे तुंगनाथ कहा जाता है. केदारखंड पुराण में इसे तुंगोच्च शिखर कहा गया है. यहाँ पूर्वकाल में तारागणों यानि सप्तऋषि ने उच्च पद की प्राप्ति हेतु घोर तप किया था. सप्तऋषियों के तप से प्रफुल्लित हो भगवान शिव ने उन्हें आकाश गंगा में स्थान प्रदान करवाया था. बचपन फिर जीवित हो उठता है.

वापस लौटता हूँ आज में तो इस अथाह आकाश गंगा को देख यूँ ही टिटहरी चिड़िया की याद आ जाती है. सुनते हैं वो आकाश की ओर पैर उठा कर सोती है. सोचती है कि अगर आकाश गिरा तो पैर पर उठा लेगी और खुद बच जायेगी. अनायास ही अनजाने में मेरे पैर आकाश की तरफ उठ जाते हैं. तब ख्याल आता है टिटहरी की इस हरकत को लोग उसकी मुर्खता से जोड़ते हैं और मेरे चेहरे पर अपनी मुर्खतापूर्ण हरकत के लिये मुस्कान फैल जाती है और मैं पैर सीधे कर अपने आपको विद्वान अहसासने लगता हूँ. स्वयं को विद्वान अहसासने का भी एक विचित्र आनन्द है, जो इस पल मैं महसूस कर रहा हूँ. इस आनन्द को शब्दों में बाँधना शायद संभव नहीं.

तब तक अचानक ही एक तारा टूट कर गिरता है बड़ी तेजी से. दादी कहा करती थी कि जब तारा टूटे तो उसके बुझने के पहले जो भी वर मांग लो, वो पूरा हो जाता है. जाने क्या मान्यता रही होगी या शायद अंधविश्वास रहा होगा मगर मेरी दादी ने कहा था तो आज भी मेरा मन इस पर विश्वास करने का होता है. कारण मैं नहीं जानता. कभी कोशिश भी नहीं की जानने की.

मैं एकाएक सोचने लगता हूँ क्या मांगू?
हज़ारों ख्वाईशें ऐसी,कि हर ख्वाईश पे दम निकले,.......

मैं सोचता ही रह जाता हूँ और तारा बूझ जाता है.

सोचता हूँ कि हमारी कितनी सारी चाहतें हैं कि अक्सर ईश्वर कुछ पूरा करने का मौका भी प्रदत्त करता है मगर हम ही नहीं तय कर पाते कि कौन सी चाहत पूरी कर लें. हर वक्त बस एक उहापोह. शायद सभी के साथ ऐसा होता हो और फिर कोसते हैं अपनी किस्मत को कि हमारी तो कोई इच्छा ही नहीं पूरी हो पाती.
क्या हम कभी भी तुरंत तय कर पायेंगे, तारे के टूटने और बूझने के अंतराल में कि खुश रहने के लिये हम आखिर चाहते क्या हैं या यूँ ही हर आये मौके गंवाते रहेंगे?

असीमित चाह और सीमित समय और संसाधन. काश, हम सामन्जस्य बैठा पाते तो कितना खुशनुमा होता यह मानव जीवन.

मैं अनिर्णय की अवस्था में लॉन से उठकर घर के भीतर आ जाता हूँ.

टीप : 'गुरुदेव, इस 'हज़ारों ख्वाईशें ऐसी,कि हर ख्वाईश पे दम निकले ' का हल क्या है? यह प्रश्न एक भक्त पूछ रहा है.
हल बताने के लिये स्वामी समीरानन्द जल्द ही प्रवचन देंगे, तब तक आते रहिये और पढ़ते रहिये.
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35 टिप्‍पणियां:

अभय तिवारी ने कहा…

तरल है.. सीधे भीतर उतर गया..

Basant Arya ने कहा…

समीर जी, बहुत बढिया लिखा.हृदयस्पर्शी. मजा आ गयाजब न लिखने का मन हो तो भी आप अच्छा लिखते हैं

yunus ने कहा…

बहुत सही । क्‍या ये आपने मेरे लिए लिखा है समीर भाई । ऐसा लगा मेरा अनुभव है आपकी ज़बानी ।

Sanjeeva Tiwari ने कहा…

आचार्य मजाक नहीं, मर्मस्‍पर्शी है यह लेख वहां कनाडा में प्रत्‍येक भारतीय को देश याद आता होगा पर उसे याद करने एवं उसे सुन्‍दर ढंग से व्‍यक्‍त करने का आपका तरीका लाजवाब है ।
धन्‍यवाद ।

अनिल रघुराज ने कहा…

इत्ती-सारी छवियां...पढ़कर लगा जैसे चंद मिनट में ही हज़ारों सालों की यात्रा हो गई। आकाशगंगा से लेकर दादी के किस्सों और मिथकों तक। जबरदस्त प्रवाह है।

ALOK PURANIK ने कहा…

ठीक है भईया,वहां रहकर ऐसे ही इमोशनियाते रहिये बाकी इंडिया वालों के बवाल सवाल दूसरे हैं।
जी जिन हरिद्वार के घंटे-घड़ियालों की बात आपने की है, उसका सीन कुछ बदला सा है-
यहां घंटे कम घड़ियाल ज्यादा हैं
जवाब कम सवाल ज्यादा हैं
आप इधर कुछ सीरियसा रहे है। इमेज सी खराब हो जायेगी।

Gyandutt Pandey ने कहा…

यूनुस सही कहते हैं. हर आदमी सोच सकता है कि उसी को सामने रख कर लिखा है. हृदय से लिखने का यही रंग होता है.

mamta ने कहा…

समीर जी आजकल बहुत ही ज्यादा भावुक लेख लिख रहे है। क्या बात है ?
एक बार घर(भारत ) घूम जाइए।

Pramod Singh ने कहा…

इस उमर में इतना बहकना अच्‍छी बात है? हज़ार ख़्वाहिश पालना? अच्‍छी बात है?

Neeraj Rohilla ने कहा…

समीरजी को पढ लिया, श्री श्री श्री १००८ समीरानन्द महाराज को पढने दोबारा उपस्थित होंगे । चलिये सब संजीदा टिप्पणी कर रहे हैं तो हम आपको ज्यादा सेंटियायेंगे नहीं, बस गालिब चचा का एक किस्सा सुनायेंगे ।

एक बार गालिब से किसी ने कहा कि शराब पीने वाले की दुआ कुबूल नहीं होती तो गालिब बोले जिसे शराब मिल गयी हो उसे और क्या चाहिये :-)

चाहो तो आप भी एक-आध पैग नाप लो, वरना कहो तो जीतूजी से सिफ़ारिश करके पेंचकस भिजवायें :-)

साभार,

राहुल ने कहा…

आह ...
वाह ....
बस इतना ही निकल पा रहा है ....

परमजीत बाली ने कहा…

समीर जी,अच्छा लिखा है,हमे तो समीरान्द महराज के प्रवचनों द्वारा उत्तर का इन्तजार है,क्यूँकि आप की कथा पढ़ यह प्रश्न हमारे मन मे भी उठा...इन्सान की इच्छाएं तो कभी खतम होती नही..तो कया करें ?....फिलहाल अपनी तो अब कोई इच्छा नही:(...फिर भी जानना चाहते हैं...फिर आएगें...

anuradha srivastav ने कहा…

यादें ,यादें ,यादें न जाने कितनी यादें शिद्दत से न चाहते हुये भी चुपके से पैर पसार ही
लेती हैं । शायद अपनी जडों से दूर होने पर इनकी चुभन ज्यादा होगी ।
असीमित चाह और सीमित समय और संसाधन. काश, हम सामन्जस्य बैठा पाते तो कितना खुशनुमा होता यह मानव जीवन.
समीर जी बहुत गहरी बात कह गये ।

Dr.Bhawna ने कहा…

भले ही हम लोग परदेश में रहते हों किन्तु हमें हमने देश की हर छोटी से छोटी याद भी भावुक बना देती
हैं,आपने अपने मन के उदगारों को बहुत ही अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है हमेशा अपने दिल में अपने वतन की यादों को यूँ ही ताजा रखिये...

Pankaj Bengani ने कहा…

न लिखते लिखते बहुत कुछ लिख गए आप तो.. इतना हृदयस्पर्शी तो लिखते लिखते नही लिख पाते आप.

कभी कभी बस युँ ही लिखते समय कोई जोरदार चीज लिख दी जाती है. और फिर आप लिखोगे तो.....

Sanjeet Tripathi ने कहा…

बहुत खूब, देखते कुछ में और कुछ की तलाश बस यही तो करता है हमारा मन!!

आजकल आप इमोशनिया बहुत रहैं है!! का बात है!!

Rama ने कहा…

डा. रमा द्विवेदी said....

समीर जी,

सारी झंझटों की जड़ हजारों ख्वाहिशें ही हैं...हास्य का पुट देकर बहुत ही सारगर्भित बात लिख दी है आपने...आजकल आप कुछ ज्यादा ही भावुकता पूर्ण लेख लिखते हैं ...मस्तिष्क का स्क्रू ड्राईवर ठीक तो है ना :) चिन्ता हो रही है...इतनी भावुकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है....बहुत अच्छे मर्मस्पर्शी लेख के लिए बधाई :)

Kavi Kulwant ने कहा…

बहुत खूब...!!

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

वाह सर मन न होने पर तो इतना सुंदर लिख दिया कहीं मन से लिखा होता तो क्या होता?

Shrish ने कहा…

"निकटवर्ती स्थलों से सर्वोच्च स्थल पर अवस्थित होने के कारण इसे तुंगनाथ कहा जाता है. केदारखंड पुराण में इसे तुंगोच्च शिखर कहा गया है।"

हमें भी आपने यादों में भेज ही दिया, बाबा तुंगनाथ हमारे इष्टदेव हैं।

Lavanyam -Antarman ने कहा…

समीर भाई,
मेरे पापा भी हमेँ सप्तर्षि और " लुब्धक" तारे से परिचित करवाते थे.
ऐसे पूर्वजोँ के सँबल से ही हम, जहाँ कहीँ भी रहेँ,एक विचारशील स्नेही जन बने रहेँगे.
आपने इच्छा शक्ति पर बहुत अच्छा लिखा -- और, आपके चिठ्ठे पे तो आऊँगी ही ..
एक आप ही हो जो मेरा लिखा हर पृष्ठ पठ लेते हो और टिप्पणी भी कर जाते हो :)
अपनी उडन तश्तरी मे सवार .
.स स्नेह,
- लावण्या

महावीर ने कहा…

आज हास्य/व्यंग्य के माध्यम से गंभीर विषयों की गहराई में ढूंढ कर गूढ़ बात कहने वाले समीर के हृदय के उदगारों की भावपूर्ण प्रस्तुति देख कर संशय नहीं रहा कि हंसने हंसाने वाला लेखक पाठक की पलकों के पीछे की नमी को बाहर ला सकता है।
तुम्हारा ब्लागी-रोल देखकर राजकपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' की याद आगई जिसमें हंसाने वाले का दिल कितना संवेदनशील होता है, दर्शाया था।
"असीमित चाह और सीमित समय और संसाधन. काश, हम सामन्जस्य बैठा पाते तो कितना खुशनुमा होता यह मानव जीवन."
काश! ऐसा हो जाए तो...
बधाई स्वीकारें।

अनामदास ने कहा…

बाइस टिप्पणियों के बाद कहने को बाकी क्या रहा. सितारों के बीच उड़न तश्तरी आपको नहीं दिखी, हमें तो दिखी.

बेनामी ने कहा…

अनामदास भाई के तरह के बड़े साहित्यिक लोग तारीफ कर गये तो हमें भी दिखी उड़न तश्तरी ध्रुव तारे के सामने उड़ते. बहुत अच्छा लिखा है समीर भाई. हम तो आपसे रोज मिलते हैं तो समझ नहीं पाते. माफी चाहूँगा.

--खालिद

अरुण ने कहा…

"ह्जारो ख्वाहिशे ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले"
"पूरी हो तेरी हर ख्वाहिशे ऐसे कि जो ना हो वो बहुत कम निकले"
गुजरे तू जिधर से भी हर घर पे तेरा ही परचम निकले"
माफ़ करना भाई जिंदगी की व्यस्तताये भी कभी कभी मन चाहा नही करने देती है..:)

दीपक भारतदीप ने कहा…

गजब! भाई आपको मान गये।
दीपक भारतदीप

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

बस इसी सोच में डूबा हूं कि आपका लिखने का मन नहीं था फिर भी आपकी उंगिलयों से इतना अच्छा निकलकर आ गया। हमारी भी हजारों ख्वाहिशें हैं लेकिन यही सोचकर रह जाते हैं कि क्या करें...? आप ही बतायें गुरुवर। प्रवचन में ही सही।

sunita (shanoo) ने कहा…

गुरूदेव लगता है स्वतंत्रता दिवस पर हिन्दुस्तान की याद बहुत सता रही है जो आप दिन पर दिन भावुक होते जा रहे है...अगर एसा है तो बहुत दिन हुए अब आभी जाईये अपने वतन...

आजा उम्र बहुत है छोटी,
अपने घर में भी है रोटी...

भावनाओं से ओत-प्रोत आपका यह लेख बहुत ही अच्छा लगा...
असीमित चाह और सीमित समय और संसाधन. काश, हम सामन्जस्य बैठा पाते तो कितना खुशनुमा होता यह मानव जीवन.कितना गूढ़ रहस्य है इन बातों में...
सुनीता(शानू)

अजित वडनेरकर ने कहा…

समीर भाई आपकी कलम आजकल गंगा की धार हो रही है। तरल-सरल और सुमंगल। हरिद्वार के उल्लेख से हमें अपने ननिहाल पहुंचा दिया। बचपन से अब तक हर साल हरिद्वार जाते हैं और हर की पौड़ी पर गंगाजल में तैरते हजारों ख्वाहिशों के दीपदान देखते हैं। शिवालिक पहाड़ियों में बसी चंडीदेवी-मंसादेवी से आशीर्वाद मांगते हर बार खुद के स्वार्थपन में थोड़ी बढ़ोतरी होती पाई।

Manish ने कहा…

तीन चार दिन अपन बाहर क्या चले गए आपने घोड़े पर सवारी कर , स्वतंत्रता के गीत गा लिए और अब तारों भरी रात का मुआयना कर रहे हैं वाह भई!

Mired Mirage ने कहा…

समीर जी आप कहते हैं कि हमारी टिप्पणियों से आपको हौसला मिलता है । अब तो हौसले की मात्रा बहुत अधिक हो गई । थोड़ा सा हौसला मित्रों को भी बाँट दीजिये ।
रचना सदा की तरह गजब की है ।
घुघूती बासूती

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ने कहा…

कनाडा में बैठे-बैठे आप अक्सर भारत का दौरा कर लेते हैं। अकेले नहीं, बल्कि अपनी वर्णन क्षमता से अपने पाठकों को भी साथ लेते हुए चलते हैं। बहुत अच्छा लिखा है। मन को छू गया। बहुत अच्छा लगा।

Beji ने कहा…

आपका चिट्ठा पढ़ते पढ़ते यह कविता याद आ गई

सूखा तारा

बाबूजी ने ली
थोड़ी रस्सी
लकड़ी के चार पाहे
बनाई चारपाई

सुबह मीठी धूप में
दादी बैठी
हाथ में मोती की माला

दिन चड़ा
तो छनी धूप में
रची गुड़िया की शादी

दोपहर को माँ ने
पापड़ सुखाये
हमने तेल संग खीचू खाया

शाम को माँ संग
सहेलियों ने गप्पे हाँके
लाल ऊन से स्वेटर बनाया

रात को भैया के साथ
तारों के नीचे
थोड़ी फटी चादर के साथ

छेद से जो निशाना लगाया
गिरा एक तारा
भैया ने दिया था

आज हाथ आई
वो यादों की किताब
सूखा तारा यहाँ
टिमटिमा रहा था

रंजू ने कहा…

'हज़ारों ख्वाईशें ऐसी,कि हर ख्वाईश पे दम निकले '

बहुत ख़ूब समीर ज़ी हम तो पढ़ते पढ़ते "सेंटियाँ "गये
आप एक बार अपने देश आ ही जाए बहुत अच्छा रहेगा :)

Isht Deo Sankrityaayan ने कहा…

आलोक पुराणिक के कहने पर मत जाइएगा. इनका तो काम ही बिगाड़ना है. स्कूल में बच्चों को बिगाड़ते हैं और बोलग में बडों को. आप का सेंटियाना अच्छा लगा.