गुरुवार, मई 04, 2006

तुम ना आये

अनुभूति ग्रुप मे इस सप्ताह का शीर्षक "तुम ना आये" बडा भारी सा है, इसे ह्ल्का करने के नज़रिये से कुछ पंक्तियां पेश हैं:

तुम ना आये
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इज़हार-ए-मुहब्बत करने को
हमने क्या क्या किये उपाय
प्रेम संदेशे लिखकर भेजे
वो भी तुझको मिल ना पाये.

हरकारे खत ले करके पहूँचे
भाई से तेरे पिटकर आये
फ़ोन उठा कर तेरे बापू
शेर की धुन मे दये गुर्राये.

घर से कालेज के रस्ते मे
निकलो हमसे नज़र बचाये
काली कार के काले शीशे
हरदम रहते चढे चढाये.

जब भी फ़ूल खरीदे हमने
धरे धरे हरदम मुरझाये
तेरे गम मे बनी कविता
संपादक ने दई लौटाय.

छत से कुदे हम तो मरने
बैठे अपनी टाँग तुडाये
सारे लोग देखने पहूँचे
ना आये तो तुम ना आये.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

13 टिप्‍पणियां:

RC Mishra ने कहा…

बहुत अच्छा लगा,
लिखते रहिये।

Sagar Chand Nahar ने कहा…

समीर लाल जी,
एक छोटी सी गलती निकालने की गुस्ताखी कर रहा हुँ; क्यों कि एक मात्रा इधर उधर होने से सारा अर्थ बदल गया है.
"हरकारे खत लेकर पहुँचे
भाई से तेरे पीटकर आये, "
कि बजाय
"भाई से तेरे पिटकर आये" होना चाहिये.

Udan Tashtari ने कहा…

धन्यवाद, मिश्र जी.

सागर भाई,
आभारी हूँ, अभी ठीक कर देता हूँ.
धन्यवाद

समीर लाल

अनूप भार्गव ने कहा…

वाह समीर जी ! क्या बात है ....
अर्ज़ किया है :

व्यथा तुम्हारी सुन कर भैया
आँखों मे आँसू भर आये
ऐसे जालिम की बहना से
काहे तुम ये इश्क लड़ाये ?

Udan Tashtari ने कहा…

वाह, अनूप जी,
क्या खूब कहा है, पहले सलाह मिल जाती तो ठीक रहता..:)
समीर लाल

Atul Arora ने कहा…

कोई चाहे कुछ भी कहे
हमको आपके कवित्त का अँदाज
बहुत भाये, आनँद आ जाये

Udan Tashtari ने कहा…

धन्यवाद, अतुल भाई.
समीर लाल

Pratyaksha ने कहा…

:-)

रत्ना ने कहा…

समीर जी की कविता और अनूप जी की टिपण्णी दोनों ही लाजवाब है
और--
शब्दों के मौजूद हो जब ऐसे तीरन्दाज़
कुछ भी कहना यूँ लगे ज्यों बजे बेसुरा साज़

रजनीश मंगला ने कहा…

समीर जी, आप तो ब्लौगिंग को एकदम नोंक पर रखते हैं

Udan Tashtari ने कहा…

प्रत्यक्षा जी, रत्ना जी, रजनीश भाई

बहुत धन्यवाद, आपकी सराहना से उत्साह बढ जाता है.

समीर लाल

ई-छाया ने कहा…

बहुत बढियां, लिखते रहें

Udan Tashtari ने कहा…

जी, लिखते रहूँगा मगर आप पढते रहें. :)
समीर लाल