सोमवार, मार्च 13, 2006

महाकवि Robert Frost: एक नज़रिया..अनजान राहें

Robert Frost हमेशा से मेरे अंग्रेजी के सबसे पसंदीदा कवि रहे है. उनकी कविताओं को जितनी बार पढता हूँ, एक अलग ही अर्थ पाता हूँ, ऎसा इसलिये नही कि अंग्रेजी मे मेरा हाथ बहुत ज्यादा तंग है या दिन पर दिन मेरी अंग्रेजी सुधर रही है.बस उनकी कविताऎं हैं ही इतनी गहरी कि पूर्ण थाह पाना सिर्फ़ तथाकथित विद्वानों के बस की बात है. मै जानता हूँ कुछ ऎसे विद्वानों को. खैर, उनको मेरा साधुवाद. अब फ़िर से रोर्बट बाबू की बात करें. जाने कहाँ कहाँ अकेले घूमते रहते थे और वो भी कलम ले कर. बिन बात की बात पर, बस कहीं भी किनारे बैठ गये और कविता दाग दी. अब आप हम भी तो कितने तिराहों से गुज़रे हैं, बल्कि रोज़ ही कहीं ना कहीं तिगड्डा ( ये जबलपुरीया वर्जन है तिराहे का) पडता है, कितनी बार शार्ट कट के चक्कर मे दूसरे वाले रोड से निकल गये...क्या कभी कविता लिखी इस पर..नहीं..क्या कभी इससे कोई जीवन मे अंतर आया, नहीं..ब्लकि कई बार वन वे वगैरह के चक्कर मे जरुर फ़सें. मगर, भईया(रोर्बट भाई) ने तो ऎसी सटीक कविता लिख डाली कि अच्छे अच्छे हिल गये..The Road Not Taken...जब सब हिले तो हम क्यों ना हिलें. अब हिलें तो पता भी तो लगे कि हिले..तो पेश है हमारा भईया की कविता का हिन्दी रुपांतरण. आशा है, आपको इसका भावनात्मक पहलू पसंद आयेगा. पहले आप रोर्बट भाई को पढें, फ़िर मुझे. भईया अग्रज हैं, हक बनता है.

The Road Not Taken

TWO roads diverged in a yellow wood,
And sorry I could not travel both
And be one traveler, long I stood
And looked down one as far as I could
To where it bent in the undergrowth;
Then took the other, as just as fair,
And having perhaps the better claim,
Because it was grassy and wanted wear;
Though as for that the passing there
Had worn them really about the same,
And both that morning equally lay
In leaves no step had trodden black.
Oh, I kept the first for another day!
Yet knowing how way leads on to way,
I doubted if I should ever come back.
I shall be telling this with a sigh
Somewhere ages and ages hence:
Two roads diverged in a wood, and I—
I took the one less traveled by,
And that has made all the difference.

--Robert Frost

अब मेरी बारी, सुनना ही पडेगा:

अनजान राहें.........

राह पकड मैं चल रहा था, मंज़िल थी बस ध्यान मे
देखा तब दॊ राह को बनते, उस पर्ण वन उद्यान मे.

एक मैं और सीमा मेरी है, दोनो पर कैसे चल पाऊँगा
किस पर चलूँ उलझन बस इतनी, मंज़िल किस पर पा पाऊँगा.

एक वो जो अल्लहड बाला सी, बना ना सकी कोई पहचान
दूसरी जिस पर थे अंकित, असंख्य कदमों के निशां.

मैने चुनी वो राह जिस पर, घाँस थी बस हरी हरी
शायद अब तक बहुत थोडे, जिसने इसकी थाह धरी.

सोचता था फ़िर कभी, यह दूसरी मै राह लूँगा
अंर्तमन मे जानता था, कहाँ कभी ये अंज़ाम दूँगा.

चल पडा बिन पद चिन्ह की, उस राह का दामन मै थाम
शायद वो ही फ़ैसला था, जिससे पाया अभिनव मुकाम.

--हिन्दी नज़रिया एवं रुपांतरण: समीर लाल

अपनी प्रतिक्रिया बतायें, तब तक मै मेरी दूसरी कविता जो फ़िर से भईया की सोच पर आधारित है, को तैयार करता हूँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links

8 टिप्‍पणियां:

Pratyaksha ने कहा…

ये कविता मुझे भी बेहद पसंद है, खासकर अंतिम तीन पंक्तियाँ.
आपका हिन्दी रूपाँतरण भी बहुत अच्छा लगा

Greg Goulding ने कहा…

मुझे 'रुपाँतरण' का मतलब जानता नहीं, लेकिन जो भी, वहीं मुझे अच्छा लगा। खास तौर पर वह शब्द मुझे पसंद है जिससे फ़्रोस्ट की उदासी एहसास दिखाई देती है। एक अजीब बात है कि जब हम बाचपन में हैं तब कि हमसे रोबर्ट फ़्रोस्ट की कविताएं सुनाया करतीं हैं, लेकिन सच में इतनी गंभीर उदासी है उनमें। यहाँ भी माजुद है आपका शब्द थाह। इस कविता में महसूस करता हूँ कि बोलनेवाले के लिए 'regret' ही है (माफ़ कीजिए लेकिन मालुम नहीं सही हिन्दी शब्द इस अंग्रेज़ी शब्द के लिए, जिसमे इतनी ही एहसासें हैं)।

Greg Goulding ने कहा…

और भी समीर भी,

मैने एक लिंक लगाया अपना चिट्टे पर; सोच रहा हूँ कि यह कविता हिन्दी सीखनेवालों को मदद दे सकती है... मज़ा के आलावा

Udan Tashtari ने कहा…

प्रत्यक्षा जी

जानकर अच्छा लगा कि ये कविता आपको भी बेहद पसंद है...हिन्दी रुपाँतरण की सराहना के लिये बहुत धन्यवाद..एक प्रयास किया था.

शुभकामनायें

समीर लाल

Udan Tashtari ने कहा…

ग्रेग जी
आपने पसंद किया, बस मेरा प्रयास सफ़ल हुआ.
लिंक करने के लिये बहुत धन्यवाद...आपका ब्लाग देख रहा हूँ, बहुत सार्थक प्रयास है, बधाई.

शुभकामनाओं सहित

समीर लाल

Laxmi N. Gupta ने कहा…

समीर जी,

मैं ने राबर्ट फ्रास्ट को अधिक नहीं पढ़ा है किन्तु यह कविता पढ़ी है। मुझे भी बहुत पसंद है। आपका अनुवाद भी बहुत अच्छा लगा। क्या कोई तरीका है कि आखिरी पंक्तियों को अधिक forceful बनाया जा सके? मैं भी सोचूँगा। होली की शुभ कामनाओं के साथ।

लक्ष्मीनारायण

Udan Tashtari ने कहा…

लक्ष्मी जी
जरुर सुझाव दें.मुझे भी कहीं एहसास था इस बात का...बदल देंगे इसे, जैसे ही आपका सुझाव मिलेगा..
समीर लाल

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi ने कहा…

विचार देने वाली कविता, उतना ही सुंदर अनुवाद।