रविवार, मार्च 15, 2026

भारत यात्रा 2026: ज्ञानदत्त पाण्डे जी से एक मुलाकात

 

बहुत सालों बाद भारत जाना हुआ मिर्जापुर एक पारिवारिक शादी के सिलसिले में। जबलपुर से बाई रोड गए। हाई  वे जो पहले खाई वे की तरह हुआ करते थे वो अब बहुत बढ़िया हो गए हैं। जिस यात्रा में पहले 10 से 12 घंटे लगा करते थे और वो भी हिचकोले के चलते थका देने वाले वो अब मात्र 6-7 घंटे में आराम से पूरी हो गई। शहरों के भीतर तो खैर पहले से भी बेहाल गालियां और सड़कें मिलीं। हाई वे पर गाड़ी की तेज रफ्तार और वहीं मवेशियों को खुले आम घूमते देख कर कई बार दिल धक से हो गया किन्तु वहाँ के ड्राइवर और मवेशी दोनों ही एक दूसरे के सानिध्य में सहज नजर आए।   

जहां इस यात्रा की उपलब्धि पारिवारिक शादी, मिर्जापुर की गंगा आरती और विंध्याचल देवी और काशी विश्वनाथ के दर्शन रहे, वहीं विंध्याचल देवी और काशी विश्वनाथ के दर्शन में भीड़ और अव्यवस्था की हालत देखते हुए दर्शन से ज्यादा बड़ी उपलब्धि मानो जेब का न कटना और भगदड़ का न होना ही रहा। भीड़ से गुजरते पूरे समय बस यही दिमाग में था कि किसी तरह दर्शन पूरे हों और नैया उस पार लगे। वीआईपी कतारों में जब ये विचार उठें तो विषय निश्चय ही चिंताजनक है। आजकल सभी धार्मिक स्थलों के यही हाल हो लिए हैं और वीआईपी कल्चर और पैसे लेकर दर्शन कराने का सिलसिला अपनी अति पर दिखता है। श्रद्धा भाव से ज्यादा पावर और पैसे का भाव दिखता है। अवसर उपलब्ध था तो फायदा हमें भी मिला मगर कुछ उचित सा नहीं लगा।

बहरहाल, इसी यात्रा की अन्य उपलब्धि पुराने मित्र और ब्लॉगर साथी ज्ञानदत्त पांडे जी (मानसिक हलचल https://gyandutt.com/ ) उनके गाँव में घर जाकर मिलना भी रहा। जहां हम ठहरे थे वहाँ से उनका गाँव 30-35 किमी दूर था किन्तु अच्छी सड़क के चलते 1 या 1:30 घंटे में पहुँच गए थे। पिछली बार उनसे 16-17 साल पहले इलाहाबाद स्टेशन पर मुलाकात हुई थी उनके लावा-लश्कर के साथ। तब वह एनई रेलवे के सर्वेसर्वा थे।

इतने बरसों बाद मिलने पर भी कतई नहीं लगा कि इतना समय हुआ न मिले हुए। बड़ा आत्मिक मिलन रहा। पाण्डे जी भी पहले की तरह ही एकदम फिट और मुस्कराते हुए मिले। हालांकि पहुँचने के पहले उन्होंने फोन पर बताया था कि वो तुरंत ही दांत के डॉक्टर से इलाज करा कर लौटे हैं। मगर उनकी मुस्कराहट के पीछे दांत का दर्द न जाने कहाँ छिप गया था कि हम बीमार का हाल पूछना ही भूल गए। गाँव के शांत वातावरण में शानदार मकान और वहीं बरामदे में बैठे कर चाय और भाभी जी द्वारा बनाये गए स्वादिष्ट गाजर के हलवे के साथ ढेरों बातचीत हुई। हमने उन्हें उनके आलेखों को पुस्तक के रूप में लाने के लिए बहुत उकसाया। लगता तो है कि जल्द ही वो इस दिशा में प्रयासरत होंगे।

समय की कमी थी। शादी ब्याह के कार्यक्रम भी अटेन्ड करना थे अतः बहुत लंबा न रुक पाए मगर जितना भी रुके पाण्डे दंपति की मेहमान नवाजी ने दिल जीत लिया। हमारे साथ हमारे साडू भाई भी थे वो भी शहर के इतना नजदीक गाँव के माहौल से बहुत प्रभावित हुए। खास तौर पर पाण्डे जी के सानिध्य में चिड़ियों का दाना चुगना उन्हें काफी भाया।

एक छोटी सी आत्मिक मुलाकात निश्चित ही लंबे समय तक याद रहेगी। शायद भविष्य में जल्द फिर भारत यात्रा हो और उस दिशा में जाना हो तो पुनः मुलाकात का वादा है। मैं उनसे अपनी पुस्तकों को पहुंचाने का वादा करके आया था – अब कनाडा वापस आ गए हैं तो जल्द ही मेल करते हैं ईबुक संस्करण।


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