तिवारी जी ईरान अमरीका युद्ध को लेकर
भयंकर चिंतित थे। घंसू से बता रहे थे कि रात रात भर नींद नहीं आती। पेट्रोल के दाम आकाश छू रहे हैं। गैस मिल नहीं रही। डॉलर के
मुकाबले रुपया गिरता चला जा रहा है। कैसे काम चलेगा?
घंसू के साथ साथ पान की
दुकान पर बैठे अन्य लोगों ने भी तिवारी जी की चिंता का साथ देते हुए चिंता जताई।
सबका मानना था कि जीना हराम हो गया है बस कुछ लोगों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं
के चलते। झगड़ा किसी का और भुगत रहे हैं हम। सारे दिन वो सब इसी चिंता में मशगूल
कभी पान खाते तो कभी तंबाकू और कभी किसी की कृपा हो जाती तो चाय समोसा भी।
दिन पर दिन गुजर रहे थे। न
युद्ध रुक रहा था और न ही चिंता। न ही महारथियों की महत्वाकांक्षाओं में कोई कमी आ
रही थी। आज भी तिवारी जी का, दुनिया भी की तमाम समस्याओं की तरह, यह मानना था कि
वो इस युद्ध का समाधान जानते हैं और इसे रुकवा सकते हैं। सभी पार्टियों का फायदा
ही फायदा रहेगा और युद्ध भी रुक जाएगा। मगर फिर हमेशा की तरह ही उनका कहना था कि
ये हमारी बात मानेंगे थोड़ी न! मरो कटो आपस में हमारा क्या? हम अपने आप से बढ़कर
सलाह देने न पहले कभी गए न आज जाएंगे। जिसको चाहिए हो वो यहाँ आए तो हम बताएं। पान
की दुकान पर हर समस्या का समाधान रहता है।
खैर, जहाँ भीड़ हो वहां सारे
आपके अपने ही भक्त हों ये जरूरी तो नहीं। कुछ दूसरी तरफ के भक्त भी हर जगह होते ही
हैं। उन्हीं मे से एक भक्त बोल उठा कि आप कैसी बात कर रहे हैं? गैस की कहां किल्लत
है? खुले आम मिल रही है। बस!! बात इतनी सी बदली है कि अब उसका दाम आपकी औकात के
बाहर हो गया है। फिर वो अपने दोस्तों के साथ ठहाका लगाते हुए बोला – तिवारी जी,
अपनी औकात बढ़ाईए तो सब उपलब्ध है। उसने आगे बात बढ़ाते हुए कहा कि भारत में तो
रुपया चलता है – ऐसे में डॉलर गिरे या उठे, उससे हमें क्या? जिस गली जाना नहीं
उसका पता लिए बैठे रो रहे हो। और फिर आपको तो कहीं जाना आना है नहीं – दिन भर यहीं
पान की दुकान पर बैठे रहना है। पेट्रोल का दाम बढ़े या घटे – मिले न मिले – आपको
इससे क्या फरक पड़ता है?
इतना ही रोने का मन है तो इस
बात पर रो लो कि एलोन मस्क एक मिलियन डॉलर में अंतरिक्ष की यात्रा करा रहा है –
कितना महंगा कर रखा है थोड़ी सी देर की इस यात्रा को – लूट मचा रखी है। जाना आपको
वहाँ भी नहीं है। मगर रोने में क्या बुराई है।
तभी एक दूसरे भक्त ने याद
दिलाया कि तिवारी जी तो जमाने से साईकल पर चलते आए हैं – फिर पेट्रोल के लिए क्यूँ
परेशान हैं? डॉलर का नोट आज तक देखा नहीं सिवाय अखबार में छपी फोटो के सिवाय और
पान की दुकान की दो महीने की उधारी बाकी है मगर चिंता ऐसी मानो डॉलर में कोई बड़े सौदे
की पेमेंट की ड्यू डेट आ रही हो।
भक्त जब बात की बाल की खाल
निकालते हैं तो बड़ी दूर तक जाते हैं – कभी कभी तो आज की स्थितियों के लिए आजादी के
पहले का इतिहास खोद डालते हैं तो तिवारी जी कैसे अछूते रह जाते? उन्होंने याद
दिलाया कि तिवारी जी ने आज तक गैस का सिलेंडर लिया ही कब- हमेशा सिगड़ी पर खाने का
अलग ही स्वाद होता है का नारा लगाते रहते थे। स्वाद की तो कौन जाने मगर रेलवे लाइन
के पास घर होने के कारण उनका चेला अरसों से रेलवे का कोयला बीन कर उनके घर की
सिगड़ी सुलगाता आया है, यह बात कम ही लोग जानते थे।
तिवारी जी आखिर क्या कहते?
बस इतना ही बोले- तुम लोग और कुछ बना पाओ या न बना पाओ – बातें बनाना खूब जानते
हो!!
-समीर लाल ‘समीर’









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