शनिवार, मई 02, 2020

झूठ की शेल्फ लाईफ बहुत लम्बी नहीं होती



अक्सर सुनते थे कि फलाना आदतन अपराधी है. बार बार जेल जाता है. छूटता है फिर अपराध करता है, फिर जेल चला जाता है. कोई आदतन शराबी होता है. कितना ही उधार में डूब जाये, स्वास्थय गिर जाये, बीबी छूट जाये मगर आदत ऐसी कि शराब नहीं छूटती. अभी लॉकडाउन में तो ५ गुना रकम देकर भी ये खरीदे जा रहे हैं, अदत जो है. बेचने वाले भी मौके का फायदा उठाने की आदत से ग्रस्त हैं, अत: वो भी आदतन खतरा उठा कर बेचे चले जा रहे है. वैसे खतरा उतना ज्यादा भी नहीं है. रास्ते में पकडे भी गये तो एक दो बोतल उन पकड़ने वालों को देकर छूट ही जायेंगे. वो भी तो आदतन ले देकर छोड़ देने के आदी हैं.
झूठ की शेल्फ लाईफ बहुत लम्बी नहीं होती, वहीं सच की कोई एक्पायरी डेट नहीं होती. कुछ लोग आदतन झूठ बोलने के आदी होते हैं. फैंकना शुरु करते हैं, तो भूल ही जाते हैं कि कल को झूठ खुल ही जाना है. मगर उससे क्या, जब तक पता चलेगा तब तक तो ५ साल के फिर चुन ही लिये जायेंगे. जायेंगे क्या, चुन ही लिए गये हैं फिर से.
विकट समस्या आदतन आंदोलनकारियों और अनशनकारियों पर आ गिरी है. लॉकडाऊन खुल नहीं रहा. मुद्दे पर मुद्दे जमा होते जा रहे हैं. जन्तर मन्तर खाली पड़ा इनकी बांट जोह रहा है, और मजबूरी ऐसी कि घर से निकल नहीं सकते. धरना प्रदर्शन करते हुए लाख चीख चीख कर, नाच नाच कर नारे लगा लें, मगर घर में तो बीबी के सामने चूँ भी नहीं कर सकते. दिमाग में मुद्दे कब्बडी खेल रहे हैं और बीबी के सामने नारे लगाना तो दूर, आवाज तक नहीं निकल रही. बस, मजबूरी ऐसी कि पेट में मरोड़ पड़ने लगी है. बस, मन ही मन प्लानिंग चल रही है कि लॉक डाऊन हटते ही किन किन मुद्दों को लेकर अनशन पर बैठना है. 
पहला मुद्दा तो यही दिमाग में आया कि जंतर मंतर पर बैठ जायेंगे सरकार की करोना से लड़ने में नाकामी का मुद्दा उठाकर. फिर ख्याल आया कि अगर सरकार नाकाम ही रहेगी तो लॉकडाऊन कैसे खुलेगा? अतः इस मुद्दे को तुरंत फ्लश कर दिया.
फिर सोचा कि जैसे विकसित देशों में सरकारें अपने बन्दों को तरह तरह की रियायतें, कोविड से हुए नुकसान की भरपाई, अनुदान, ब्याजमुक्त कर्ज, नौकरी चले जाने पर नागरिकों के घर खर्च आदि दे रही है, उसी तर्ज पर अनशन करके सरकार से मांगे उठायेंगे. मांग पूरी न होने पर भारत बंद का आह्वान करेंगे. मगर बंद करने के लिए पहले भारत खुलना भी तो जरुरी है. वो तो वैसे ही बंद है. अतः इस मुद्दे को भी फल्श करके चद्दर तान कर सो गये.  
कुछ सोचते हुए सो जाओ, तो सपने में वही आता है. सपने में भी मुद्दे बुन रहे हैं. सोच रहे हैं कि बहुत ज्यादा तो नहीं मगर कम से कम कुछ की मांग तो उठाई ही जा सकती है, मिलना जाना तो वैसे भी कुछ नहीं है. 
जो दो एक मुद्दे लॉकडाऊन को लेकर दिमाग में सपने में उपजे, वो सुबह उठते ही नोट कर लिए.
पहला मुद्दा, दिन भर घर में पड़े पड़े इतनी बोरीयत होती है कि शराब ज्यादा हो जा रही है. शराब की दुकानें भी सामने से बंद हैं अतः ब्लैक में पीछे के दरवाजे से खरीद कर पी रहे हैं. ब्लैक का दाम और असली दाम का अंतर सरकार भरे एवं जो एक्स्ट्रा पी रहे हैं उसका पूरा दाम भरे.
दूसरा मुद्दा कि हल्दी का खर्च बढ़ गया है. एक तो एक आयुर्वेदिक एप से ज्ञानार्जन कर रोज दूध में एक चम्मच मिला कर पीने लगे हैं ताकि इम्यून सिस्टम ठीक रहे और कोरोना न पकड़े और दूसरा, जितनी बार ब्लैक में शराब खरीदने निकलते हैं, उतनी बार लट्ठ खाकर लौटते हैं तो हल्दी लगवा कर ही सूजन जा पाती है. सरकार हल्दी पर ५०% सब्सीडी दे और उसे जीएसटी से मुक्त करे.
फिर अगले मुद्दे कि दिन भर डाटा इस्तेमाल कर करके नेट का बिल, बिजली का बिल, खाने का बिल सभी बहुत बढ़ गये हैं, उनका भुगतान सरकार करे.
अभी लिख ही रहे थे कि ख्याल आया कि अनशन तो लॉकडाऊन के बाद करना है, तब तक यह सब खर्चा तो हो ही गया होगा.
सरकार पूछेगी कि इतना खर्च कैश में क्यूँ किया और इसके लिए कैश आया कहाँ से, तो क्या जबाब देंगे?
अतः मुद्दे लिखना स्थगित करके पुनः कल रात की बची बोतल खोल ली और सुबह से ही पीने लग गये.
अनशन न कर पाने की टेंशन में इतना पी रहे हैं आजकल कि लोकडाऊन खुलने के पहले शायद कोरोना से तो बच जायेंगे मगर लीवर की किसी बीमारी से न चल बसें.
फिर तो ऊपर जाकर ही अनशन कर पायेंगे. आदत है तो वहाँ भी मुद्दे मिल ही जायेंगे धरने पर बैठने के लिए.
-समीर लाल ’समीर’   

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई ०३, २०२० के अंक में:

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10 टिप्‍पणियां:

Gyan Vigyan Sarita ने कहा…

Excellent sattire on professional protesters cum drunkards.

How do you generate these thoughts? Amazing!!!!

दिगंबर नासवा ने कहा…

सही लिखा है बेचारों का हाल ... पर जंतर मंतर का सूनापन तो ठीक करना ही होगा ... TV वालों को भी ख़बर चाहिए मिल नहीं रही ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

सत्यता के दर्शन कराता आलेख

अजय कुमार झा ने कहा…

वाह दादा क्या लपेट लपेट के मारा है आपने तो अपने शब्दों से हर कोने हर क्षेत्र और हर एक पर तानकर संधान किया आपने । बड़ा ही अचूक निशाना लगा है कमाल की पोस्ट । बोले तो गज़ब

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

शानदार 👍

डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) ने कहा…

सटीक ।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

फीवर से बचा रहे आदमी, लीवर का क्या है

Sangita Puri ने कहा…

जल्द लॉक डाउन समाप्त होगा ..अनशन का भरपूर मौका मिलेगा :) !

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

आपके हास्य व्यंग्य का कोई जवाब नहीं. एक एक मुद्दे को बड़ी शिद्दत से याद किया है आपने जिससे आजकल सभी भिड़ रहे हैं. क्या पता रात के आठ बजे अचानक घोषणा हो जाए जिस जिस के पास दिमाग है उसे ट्रिपल टैक्स देना होगा. मुद्दा न उठाने में भलाई है.

Jyoti khare ने कहा…

सार्थक और सटीक आलेख