शनिवार, मार्च 16, 2019

सत्य किताबों में जीतता है और शातिर झूठा चुनावों में!!


उस रोज सरकारी अधिकारी घंसु को साथ ले गये थे सुबह सुबह. घंसु को मंहगे साबुन से नहला धुला कर एक कमरे में कैमरे के सामने कुर्सी पर बैठा दिया गया. मंत्री जी आये और उसके सामने एक छोटी चौकी लगाकर बैठ गये. फिर मंत्री जी ने घंसु के धुले हुए पैर फिर से धोये, पोंछे और फिर उसे शॉल उढ़ाकर झुक कर नमन किया. मंत्री जी ने उसे कैमरे के सामने बताया था कि उनके लिए वो बहुत सम्मानीय है और यह उसका बड़प्पन है कि उसने मंत्री जी को चरण धोने का सौभाग्य दिया. घंसु पूरे समय सकपकाया से बैठा रहा.
उसके बाद कैमरा बंद. मंत्री जी सरकारी अधिकारियों के साथ गाड़ी में बैठकर कहीं लंच के लिए रवाना हो गये. जब तक घंसु कुछ समझ पाता, तब तक सब जा चुके थे. घंसु सुबह का भूखा प्यासा रोड़वेज की बस से घर लौटा. रास्ते भर सोचता रहा कि मंत्री जी ने उसे कहा है कि वो बड़ा आदमी है और ये उसका बड़प्पन है कि वो उनके निमंत्रण पर आया. मगर लौटते समय उसका बड़प्पन वो कैसे भूल गये? बड़े आदमी को घर वापस छुड़वाना तो दूर, खाने तक को न पूछा? क्या वो तब तक ही बड़ा था और उसमें तब तक ही बड़प्पन था, जब तक तस्वीरें खींच रही थी? कैमरे बंद होने के साथ साथ क्या वो बड़प्पन जाता रहा?
क्या बड़प्पन और बड़ा आदमी कैमरे के सामने होने से ही होता हैं? हो सकता है तभी तो ये नेता और अभिनेता, हमेशा साथ में कैमरे वाले को लिए घूमते रहते हैं. हर वक्त उनकी तस्वीरें खींची जाती रहती है ताकि वो लगातार बड़े आदमी बने रहें और उनका बड़प्पन सदा तारी रहे. शायद तभी जब जो नेता चुनाव हार जाते हैं या अभिनेता चमक दमक के बाहर हो जाता है, तब कोई पूछता तक नहीं उन्हें. कैमरा गुम, लाईम लाईट गुम तो बड़े आदमी होने का तमगा गुल और बड़प्पन गुम. गुम भी ऐसा कि फिल्मी लोग जो हर वक्त ही कैमरे के सामने रहते हैं, बड़प्पन गुमते ही डिप्रेशन में चले जाते हैं. नशे के सो कॉल्ड भवसागर में डूब जाते हैं. कभी कभी तो आत्म हत्या भी कर बैठते हैं इसके पहले की नशे के भवसागर की वैतरणी पार हो.
नेता डिप्रेशन में नहीं जाता. वो एक मक्कार प्रजाति का होता है. उसे बड़े होने का और बड़प्पन का लबादा ओढ़ना आता है. वो इसके लिए रियाज़ करता है और हर पांच साल में चुनाव के पहले बाकी सबको बड़ा बता बता कर खुद को एकदम छोटा कर लेता है. कभी पैर धोता है. कभी पैर छूता है. कभी नमन करता है. कभी दण्डवत होता है. छोटा होने की प्रेक्टिस तो ऐसे करता है कि अपने ही लोगों को, जिन्हें वो बड़ा बता रहा होता है, माई बाप कह रहा होता है. भगवान का दर्जा दे रहा होता है. उन्हें वह यह सब माईक पर बोल कर भाषण के माध्यम से सुनाता है और सुनाते हुए उत्ते छोटे से बंदे को बड़े बड़े लोग देख भी पायें, इसलिए मंच पर खड़ा होता है. वरना इतने छोटे से बंदे को बड़े बड़े आम जनता के लोग कैसे देख पायेंगे?
सत्य किताबों में जीतता है और शातिर झूठा चुनावों में. यह मुहावरा नहीं वरन हजारों बार सिद्ध प्रदर्शित सत्य है. वह शातिर है अतः मंच पर चढ़कर माईक से चीख चीख कर आपको विश्वास दिला देता है कि आप ही माई बाप हो, आप ही तारणहार हो और इस तरह अपनी नैय्या पार लगवा लेता है.
नैय्या पार होते ही उस पार की तो दुनिया ही अलग है. मक्कार और शातिरों के जमावड़े में सभी महाप्रभु हो लेते हैं तो उनके सामने आप जैसे प्रभु की क्या बिसात?
आप को बड़ा बताने वाला विशाल हो जाता है और आपका बड़प्पन उनके महा बड़प्पन के आगे फीका पड़ जाता है. बड़ा या छोटा होना बहुत रिलेटिव है. आप किसी के लिए बड़े और वही आप किसी के लिए छोटे हो सकते हैं. इस सत्य को काल की कसौटी में कसना ये नेता बखूबी जानते हैं. आज आपको बड़ा बता कर आपके चरण धोने वाले कल चुनाव जीतते ही आप से इतने बड़े हो जायेंगे कि आप उनके साये को भी न छू पायेगे अगले साढ़े चार साल तक. छूना तो दूर की बात, दिख जायें वो ही बड़ी बात होगी.
तिवारी जी घंसु को समझा रहे हैं कि परेशान न हो.
बड़े और छोटे होने का आधार ही इन नेताओं के लिए निराधार है. ये तो मौका परस्त कौम है, जो वक्त पड़ने पर गधे को भी अपना बाप मान लेती है.
इनकी बातों को अगर इतनी गंभीरता से लोगे तो वो दिन दूर नहीं जब तुम भी भक्तों की लाईन में खड़े होकर गुनगुना रहे होगे कि अच्छे दिन आ गये!!    
समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार मार्च १७, २०१९ को:
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6 टिप्‍पणियां:

Subhash Joshi ने कहा…

Ghansu in your articled remind me
Common man in cartoons of Laxman the great cartoonist.

Satire is very effective.

Looking forward fot next release

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (18-03-2019) को "उभरे पूँजीदार" (चर्चा अंक-3278) (चर्चा अंक-3264) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन श्रद्धांजलि - मनोहर पर्रिकर और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

यही सत्य है।

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

बिल्कुल सही .

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

बिल्कुल सही .