बुधवार, जुलाई 19, 2017

पानी केरा बुदबुलदा, अस मानस की जात



कम्प्यूटर पर उपल्ब्ध अनगिनित खेलों में से एक है – बर्स्ट द बबल.
इस खेल में कम्प्यूटर स्क्रीन के अलग अलग कोने में कहीं से भी एक बबल (बुलबुला - बुदबुदा) उठता है और आपको अपने कर्सर से नियंत्रित सुई को उस बबल पर ले जाकर उसे फोड़ना होता है. अगर आप निर्धारित समय में निशाना साध कर बबल न फोड़ पाये तो बबल चंद सेकेंडों के लिए इधर उधर उड़ते हुए अन्नत में कहीं खो जाता है और दूसरा बबल दूसरी जगह उभर कर आ जाता है.
बबल फोड़ लेने पर आपको एक पाईंट मिलता है और न फोड़ पाने पर कम्प्यूटर को एक. आप बस कभी यहाँ कभी वहाँ बबल का पीछा करते हुए इस खेल में ऐसा उलझ जाते हैं कि आपके जीवन में मानो बबल फोड़ लेना ही एक मात्र समस्या हो..ऐसे में बाकी दिन भर की परेशानियाँ और जिन्दगी की समस्यायें बाजू में खड़ी मूँह बाये आपकी नजरे इनायत का इन्तजार करती हैं.
इसी वजह से इस खेल को स्ट्रेस बस्टर केटेगरी में रेड कार्पेट गेम ऑफ द गेम्स के अवार्ड से नवाजा गया है.
निश्चित ही कम्प्यूटर खेल खिला रहा है तो जीतना भी उसी का तय है मगर बस आप निराश न हों और जीत की आशा कायम रहे इस हेतु बीच बीच में आपको एक दो बबल फोड़ने भी देता है और आपके खेलने का उत्साह देखते हुए एक दो बार आपको जिता भी देता है...जैसे हम अपने बच्चों को दौड़ना सिखाते हुए कई बार बहाने से हांफते हुए उन्हें रेस में जीत जाने देते हैं और बच्चा खुशी के मारे चिल्लाते हुए आत्म विश्वास से भर जाता है कि मैने पापा को हरा दिया...मम्मी भी उसका कंधा थपथपाती है..ओह मेरे बेटे, पापा को हरा दिया..मेरा बेटा सुपर मैन हैं. बच्चे को छोड़ सब जानते हैं कि यह उसके आत्मविश्वास के खोखले गुब्बारे में भरी जा रही वो हवा है जिससे वह अपने आने जीवन को जी जाने को उत्साहित होता है.
इधर जबसे इस खेल को जाना, खेला और सोचा तो समझ आया कि..ये बबल और कुछ नहीं..कभी अच्छे दिन, कभी काला धन, कभी नोटबन्दी, कभी भगवा ब्रिगेड, कभी घर वापसी, कभी रोमियो एक्ट, कभी मंदिर मस्जिद, कभी पशुरक्षक, कभी आतंकवाद, कभी भारत पाक, कभी कश्मीर, कभी वन्दे मातरम, कभी क्रिकेट विश्व कप, कभी राष्ट्रपति चुनाव, कभी जी एस टी, कभी भारत चीन समस्या.... तो कभी कुछ और हैं...
खिलाने वाला कम्प्यूटर और कोई नहीं..हमारी सरकार है...जीतना उसी को है..आपके मन बहलाने के लिए कभी कभी आप जीते का भ्रम पैदा करती रहती है बस!!
और खेलने वाले आप...सारे दुख दर्द भूल कर कभी इस बबल को फोड़, कभी उस बबल को फोड़ में उलझे जीवन जिये जा रहे हैं..कल फिर एक नया बबल उगेगा..आज का भारत चीन समस्या का बबल फिर अनन्त में खो जायेगा..फिर कभी भविष्य में आपके जीवन के स्क्रीन पर उबरने के लिए..
और आप फिर तत्पर होंगे एक बौखलाहट की सुई लिए इस बबल को फोड़ डालने के लिए..शायद फोड़ देने का भ्रम आपके खाते में कभी आ भी जाये मगर जीत तो खिलाने वाले की ही तय है..
कबीर का कहा याद आया:
पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात
आपकी नियति उन्हें हरा कर भी हार जाना है और उनकी सियासी सोची समझी चाल.. कभी कभी हार कर जीत सुनिश्चित करना..

-समीर लाल ’समीर’ 

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5 टिप्‍पणियां:

surender yadav ने कहा…

लगातार हर पांच साल बाद

हार कर जितने वाले को महामुर्ख कहते है...... ?

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

वाकई जबरदस्त व्यंग लिखा है आपने, बेहतरीन.
रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

फिर भी कोशिश जारी है, कुछ तो नष्ट हो ही रहा है, पूरी ना से कुछ हाँ तो अच्छी ही है !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (21-07-2017) को "जब-जब ये सावन आता है" चर्चा - 2673 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’देश के प्रथम नागरिक संग ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...