जब कभी घर पर पकोड़ी वाली कढ़ी बनती है तो पकोड़ी तल कर निकलते ही दो चार पकोड़ी यूँ
ही खा जाना आम सी बात है। इसका कोई बुरा भी नहीं मानता बल्कि ऐसा ही होता है मान कर
चला जाता है। ऐसे ही सब्जी के लिए मटर छीलते हुए कुछ मटर खा जाना, पोहे मे पड़ने के
पहले ही कुछ तली मूंगफली खा जाना सब इतना आम है कि कभी अजीब नहीं लगता। यही देखते हुए
हमारे पूर्वज बड़े हुए और वही देखते हम- तो कभी ऐसा लगा ही नहीं कि जब पकोड़ी कढ़ी के
लिए बनी है तो अलग से काहे खाना?
ये वैसा ही है जैसे सरकारी दफ्तरों
में अपनी ही फाईल सरकवाने के लिए ऊपर से कुछ रकम दे देना – हमेशा से देखा है तो कभी
अजीब लगा ही नहीं। बल्कि हालत तो ये है कि अगर न देना पड़े तो अजीब लगता है।
इधर एक मित्र पास ही के एक रेस्टोरेंट
में खाना खाने गए और थाली की तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली। मैं तो दंग ही रह गया कि
कोई इतना सारा खाना कैसे खा सकता है? उस पर से उनका नोट था कि अनलिमिटेड थाली है याने
जितना जी चाहे, उतना खाएं। मैं तो थाली में रखी इतनी सारी व्यंजनों से भरी कटोरियाँ
देख कर ही सोच रहा था कि कैसे खाया होगा? उधर वो कह रहे हैं कि जितना चाहो उतना खाओ
– कई बार कई व्यंजन बार बार मंगाए – मजा ही आ गया। जरूर जाना- मजा आएगा।
अजीब तो लगा कि हम कहाँ खा पाएंगे
इतना? मगर फिर भी मित्र का सुझाव था तो पहुँच गए एक रोज। थाली परोसी गई। 10-12 कटोरियाँ
– तरह तरह के व्यंजन। उस पर से ग्लास में लस्सी। थाली में भी रोटी, पूरी, पापड़, आचार,
पकोड़े और भी जाने क्या क्या? खाना शुरू हुआ- कब पूरा खा गए और ऊपर से भी कई व्यंजन
बार बार परोसवाये – पता ही नहीं चला और खाते चले गए। चलते चलते मीठे में गुलाब जामुन
और गरमा गरम जलेबी भी खाई। लगा कि इतना खा लिया है तो अब एक दो दिन तक तो भूख लगने
वाली ही नहीं है। मगर ये क्या -रात होते होते खाना पूरा पच गया और रोज की तरह ही नियमित
समय पर भूख लग आई।
मैं तो एकदम अचरज में पड़ गया
कि हद हो गई। लगा कि हम इंसान भी कितने अजीब हैं अगर परोस दिया जाए तो कितना भी खाकर
पचा जाते हैं। सिर्फ सोच की बात होती है। रोज रोज में कौन इतने सारे व्यंजन खाता है
तो कभी दिमाग में भी नहीं आता कि हम इतना खा भी सकते हैं। खुद का न खाना तो समझे, हम
तो इस पर अचरज ही करते हैं कि कोई दूसरा भी कैसे इतना खा सकता है? मगर यह मात्र एक
भ्रम ही था। जैसे ही खुद को परोसा गया आखिर खा ही गए और आराम से पचा भी गए।
ऐसे ही कई बार मैं इन नेताओ को
देखकर सोचने लगता हूँ कि ये सब इतना पैसा कैसे खा जाते हैं? एक चुनाव क्या जीत लेते
हैं – इतना खाते हैं कि अगली तीन पीढ़ी बिना कमाए खाए आराम से जीवन गुजार ले जाए। मगर
फिर भी इनका पेट नहीं भरता – हर रोज नई डील और नित पैसे पर पैसा कमाते और खाते जाने
की भूख ऐसी जो कभी मरती ही नहीं।
उस रोज वो थाली खा कर सोच कुछ
बदली है। हो सकता है कभी चुनाव जीत कर मैं भी नेता बन जाऊँ और फिर जब पैसा परोसा जाए
तो अनलिमिटेड थाली की तरह मैं भी खाता जाऊँ। और भूख ऐसी कि फिर से लग आए। फरक शायद
बस इतना हो कि इन नेताओ को थाली परोसी जा रही है और मैं अभी चूंकि नेता बना नहीं हूँ
तो थाली परोसी ही नहीं गई है और मैं आश्चर्य में बैठा हूँ कि कोई आखिर इतना खा कैसे
सकता है?
-समीर लाल ‘समीर’


















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