शनिवार, अगस्त 17, 2019

विपश्यना के राजपथ का साईड वॉक



हाल ही गोयनका जी के विपश्यना शिविर से लौटे. एक अद्भुत अनुभव. शायद अब बार बार जाना हो. लेकिन हम जैसे व्यंग्यकारों का मन तो हर जगह से कुछ और ही खोज लाता है. हमें तो राजपथ पर भी चलवाओ तो भी नजर साईड वॉक पर ही रहती है. अन्यथा मेरा अब मानना है कि हर व्यक्ति को अगर मौका लगे तो जीवन काल में एक बार इस शिविर में जरुर जाना चाहिये, फिर तो आप अपने आप बार बार जायेंगे.
शरीर से जब आत्मा अलग होती होगी, तो कैसा अहसास होता होगा? जानना चाहते हैं? आज के जमाने में इसका अहसास करना है तो आज के जमाने में पहुँच जाईये किसी भी गोयनका जी के विपश्यना शिविर में. जैसे ही पहुँचेंगे, वो आपसे आपका फोन, कागज, पैंसिल सब कुछ जमा करवा लेने के बाद कहेंगे कि अब किसी से कोई बातचीत नहीं, न ही आँख से संपर्क, न गाना, न इंटरनेट, न टीवी, न समाचार पत्र. जो हो वो बस आप अगले १० दिनों के लिए. ५ मिनट में जान जायेंगे उस अहसास को.
फिर शील, झूठ नहीं बोलना, काम और क्रोध से परे रहना, किसी जीव को मारना नहीं का प्रण दिलवाया जाता है. अकसर यह आश्रम बहुत बड़े हरे भरे पेड़ों से घिरे जंगलनुमा स्थानों में बस्ती के शोरगूल से दूर होते हैं. ऐसे में यह जंगल मच्छरों के लिए स्वर्ग हैं. उस पर से उन्हें तो जैसे गोयनका जी ने जेड सिक्यूरीटी दे दी हो. उन मच्छरों की जितनी मर्जी हो, उतना आपको काटें मगर आप उन्हें छू भी नहीं सकते, मारने की बात तो दूर. वो तो हम हिन्दुस्तान से हैं और जेड सिक्यूरीटी मिले लोगों के कारनामों और शोषण को जानते हैं, इसलिए मच्छर का द्वारा काटे जाने का उतना बुरा नहीं लगा. शिविर में सिखाया ही यह जा रहा था कि कुछ भी सदा के लिए नहीं है. अतः मच्छर काटेगा, हमारे खून से उसका पेट भर जायेगा, फिर वो उड़ जायेगा. विपश्यना करने तो हम गये थे, अतः नियम का पालन भी हमें ही करना था. मच्छर तो वहीं रहता है, वो थोड़ी न विपश्यना करने आया था. यूँ भी जेड सिक्यूरीटी प्राप्त व्यक्ति को आपके शोषण का अधिकार आप स्वयं ही देने के आदी भी तो हो.
सुबह ४ बजे जागने से लेकर रात १० बजे सोने जाने तक सुबह एक नाश्ता और ११ बजे दिन में एक खाने पर ११ घंटे पीठ सीधी रखे ध्यान में बैठे बैठे शरीर की क्या हालत हो जाती है, वो तो आप समझ ही सकते हो. ऐसा नहीं कि इससे बदत्तर आपके शरीर के साथ और कुछ हो नहीं सकता. रोड़वेज की सरकारी बस में मध्य प्रदेश की सड़कों पर १२ घंटे के सफर का रियाज यहाँ काम आया. लेकिन उस सफर में इतना इत्मिनान रहता था कि घर पहुँच कर आराम से लम्बा सोवेंगे. मगर यहाँ तो कल सुबह फिर ४ बजे जागना है. ऐसे में पुनः ५० पार हिन्दुतानी होने का फायदा मिला. सोने के पहले अमृतांजन का घुटने से लेकर सर तक लेपा और तान कर सो गये. बढ़िया नींद आ जाती थी.
अमृतांजन बनाने वाले ने भी कभी न सोचा होगा कि वो हम ५० की उम्र पार कर चुके हिन्दुस्तानियों के लिए वाकई अमृत बना रहा है. सर दर्द तो, जुकाम तो, घुटने में दर्द तो, नींद नहीं आ रही है तो, जुकाम लगा तो, नाक सूखी तो, कहीं हल्का सा जल गया तो, कहीं कीड़े न काट लिया तो और आज कहीं कोई दर्द नहीं है तो यूँ ही लगा लिया कि कल दर्द न हो जाये, मने हर हाल में अमृतांजन लगाना जरुरी है. आदत ऐसी कि सब ठीक ठाक हो तो भी बिस्तर के बाजू में अगर अमृतांजन की शीशी न हो तो टेंशन में नींद नहीं आती कि अमृतांजन खत्म है.  
अमृतांजन न हो गया कि जैसे भारत में हमारे पड़ोस में एक ८५ वर्षीय मलहोत्रा जी रहा करते थे, उनकी छड़ी, टार्च और घंटी हो गई हो. वे रोज सोने के पहले बिस्तर पर लेटे लेटे घंटी बजा कर अपने बेटे को बुलाते और कहते बेटा, वो छड़ी मेरे नजदीक खड़ी कर दे और टार्च में देख लेना कि मसाला तो है न? रात में बाथरुम जाना हुआ तो?
बेटा रोज झल्लाता कि क्या बाबू जी!! आप भी अब सिर्फ परेशान करते हो!! २ साल हो गये बिस्तर पकड़े. आँख से दिखता नहीं है और केथेटर लगा है. दिन में दो बार नर्स पेम्पर बदल कर जाती है और आप हो कि टार्च में मसाला और छड़ी रोज चैक करवाना छोड़ ही नहीं रहे. अब बेटे को कौन समझाये कि साईकोलॉजिकली बाबू जी को कितना इत्मिनान मिलता होगा और नींद आ जाती होगी कि टॉर्च और छड़ी साथ में है. बेटा बुढ़ापे की छड़ी होता है, भी तो अधिकांशतः अब साईकोलॉजिकल बल ही देता है. फिर अपवाद तो हमेशा होते ही हैं.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अगस्त १८, २०१९ में प्रकाशित:

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चित्र साभार: गूगल Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, अगस्त 10, 2019

टी आर पी देने वाले ही मुँह मोड़ कर आर आई पी (RIP) न देने लगें



कोई सुन्दर बाला आपसे कहे कि वो २०-२० मैच में हिस्सा लेकर लौट रही है, तो सीधा दिमाग में कौंधता है कि चीयर बाला होगी. किसी के दिमाग में यह नहीं आता कि हो सकता है महिला लीग का २०-२० खेल कर लौट रही हो. वही हाल हमारा होता जा रहा है जब शाम हमारे घर लौटते समय कोई मिल जाये और उसे हम बतायें कि जिम से लौट रहे हैं. सब समझते हैं कि ऑडिट करके आ रहे होंगे या जिम में एकाऊन्टेन्ट होंगे. सी ए होने के यह लोचे तो हैं ही. शरीर देखकर कोई यह सोच ही नहीं पाता कि बंदा कसरत करके लौट रहा है. कई मारवाड़ी मित्र सोचते हैं कि बोलने में मात्रा गलत लगा दी होगी तो पूछते हैं कि कहाँ से जीम कर लौट रहे हो? उनको लगता है कि किसी दावत से जीम (खा) कर लौट रहे हैं. 
अतः अब हमने यह सोच कर बताना ही बंद कर दिया है कि बाद में तब बतायेंगे जब करनी और कथनी एक सी दिखने लगेगी. हालांकि जिम जा जा कर हम वजन के जिस मुकाम से लौट कर आज जिस मुकाम पर खड़े हैं, इस मुकाम तक आने के लिए हमें जितना वजन घटाना पड़ा, उसका आधा वजन घटा कर बंदे देश भर में फिटनेस गुरु से बने फिटनेस के मंत्र बांटते नहीं थक रहे. वो ९० किलो से ८० पर आकर अपनी शौर्य गाथा सुना रहे हैं और एक हम हैं कि १२० से १०० पर आकर भी मूँह खोलकर बता नहीं पा रहे हैं कि जिम से लौट रहे हैं. ऐसा मानो कि कोई एवरेस्ट के बेस कैम्प नेपाल तक जाकर लौट आया हो दिल्ली वापस और देश भर को पर्वतारोहण के तरीके और गुर सिखा रहा हो और मीडिया उसके इर्द गिर्द लट्टू सी नाच रही हो. एक हम हैं कि एवरेस्ट पर झंडा गाड़ कर वापस उतर रहे हैं और किसी को दिल्ली में कानों कान खबर तक नहीं है. 
मीडिया भी एवरेस्ट पर चढ़कर कवरेज करने से तो रही और सनसनीखेज की तलाश भी अनवरत बनी रहती है तो ऐसे ही लोग बच रहते हैं जो बेस कैम्प से लौट नुस्खे बांट रहे हों और पत्रकार उनसे पूछ रहे हों कि आप युवाओं को पर्वतारोहण के लिए क्या टिप देना चाहेंगे? और टिप के नाम पर बंदे ज्ञान का मंत्र उच्चारण शुरु कर देते हैं.
वक्त वक्त की बात है. एक दिन हम भी एवरेस्ट से उतर कर जब दिल्ली पहुँचेंगे तो तहलका मचायेंगे, ऐसा विचार है मगर तब तक मीडिया ऐसे छद्म पर्वतारोहियों से इन्टरव्यू ले लेकर पर्वतारोहण का ही क्रेज  खत्म कर डालेगी तो हमारी सुनेगा कौन?
ये वैसे ही है जैसे कि बच्चे आज भी बोरवेल में गिरते हैं मगर कोई खबर तक नहीं लेता. सब मीडिया की अति का कमाल है. एक समय में २४ घंटे बोरवेल में गिरने को ऐसी हाईप दी कि अब क्रेज ही खत्म हो गया. एक दिन ऐसा भी आयेगा कि जब मर्डर, रेप, रेल दुर्घटनायें, भ्रष्टाचार, बाबाओं का सियासत से मिल कर रचा जा रहा सामराज्य एवं तांडव, सिस्टम की कार गुजारियाँ आदि सब बच्चे के बोरवेल में गिरने जैसा ही बिना कान पाया हादसा होने लगेंगे. न कोई सुनाने वाला होगा और न कोई सुनने वाला. 
सजग होना होगा मीडिया को कि दिल्ली की गोदी से उतर कर हिमालय की वादी तक पहुँचे पर्वतारोहण की खबर जुटाने. खबर की तह को पहचाने बजाये इस्त्री से बनी फुलपेन्ट की क्रीज को जायज ठहराने के. उसे फरक करना होगा खबर और सनसनीखेज चमकदार वारदात के बीच. वरना शायद एक रोज टीआरपी देने वाले ही मुँह मोड़ कर आरआईपी (RIP) कहने लग जायेंगे. तब हाथ मलने के सिवाय कुछ न बच रहेगा. याद रहे सोशल मीडिया नित जिम जा जा कर मजबूत हुआ जा रहा है.

यूँ तो मीडिया में हिम्मती और दिग्गज अपवाद हैं, जान की परवाह किये बगैर सच को सच कहना जानते हैं- उन्हीं से कुछ सीख ले लो. रेमन मैग्सेसे सम्मान यूँ ही नहीं मिला करते. 
-समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे दैनिक में रविवार अगस्त ११, २०१९ के अंक में:
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शनिवार, अगस्त 03, 2019

चाय की एक गरमागरम चुस्की के साथ


भारत में जब रहा करते थे तब अक्सर पंखे के ऊपर और रोशनदान आदि में लगभग हर ही जगह चिड़िया का घोसला देख पाना एक आम सी बात थी. अक्सर घोसले से उड़ कर घास और तिनके जमीन पर, बाल्टी में और कभी किसी बरतन में गिरे देख पाना भी एकदम सामान्य सी घटना होती थी.
उस रोज एक मित्र के कार्यालय पहुँचा तो एकाएक उनकी टेबल पर एक कप में गरम पानी पर वैसे ही तिनके और घास फूस गिरे दिखे. अनायास ही नजर छत की तरफ उठ गई. न पंखा और न ही घोसला. सुन्दर सी साफ सुथरी छत. पूरे कमरे में एयर कन्डिशन और काँच की दीवारें. समझ नहीं आया कि फिर ये तिनके कप में कैसे गिरे? जब तक मैं कुछ सोचता और पूछता, तब तक मित्र ने कप उठाया और उसमें से एक घूँट पी लिया जैसे की चाय हो. मैं एकाएक बोल उठा कि भई, देख तो ले पीने से पहले? कचरा गिरा है उसमें.
वो कहने लगा कि अरे, ये कचरा नहीं है, हर्बस हैं और यह है हर्बल टी. हमारे जमाने में तो बस एक ही चाय होती थी वो काली वाली. चाय की पत्ती को पानी, दूध और शक्कर में मिला कर खौला कर बनाई जाती थी. उसी का जो वेरीयेशन कर लो. कोई मसाले वाली बना लेता था तो कोई अदरक वाली. एक खास वर्ग के नफासत वाले लोग चाय, दूध और शक्कर अलग अलग परोस कर खुद अपने हिसाब से मिलाया करते थे. कितने चम्मच शक्कर डालें, वो सिर्फ इसी वर्ग में पूछने का रिवाज़ था. फिर एक वर्ग ऐसा आया जो ब्लैक टी पीने लगा. न दूध न शक्कर. समाज में अपने आपको कुछ अलग सा दिखाने की होड़ वाला वर्ग जैसे आजकल लिव ईन रिलेशन वाले. अलग टाईप के कि हम थोड़ा बोल्ड हैं. कुछ डाक्टर के मारे, डायब्टीज़ वाले बेचारे उसी काली चाय में नींबू डालकर ऐसे पीते थे जैसे कि दवाई हो. 
फिर एकाएक न जाने किस खुराफाती को यह सूझा होगा कि चाय की पत्ती को प्रोसेसिंग करके सुखाने में कहीं इसके गुण उड़ तो नहीं जाते तो उसने हरी पत्ती ही उबाल कर पीकर देखा होगा. स्वाद न भी आया हो तो कड़वा तो नहीं लगा अतः हल्ला मचा ग्रीन टी ..ग्रीन टी..सब भागे ..हां हां..ग्रीन टी. हेल्दी टी. हेल्दी के नाम पर आजकल लोग बाँस का ज्यूस पी ले रहे हैं. लौकी का ज्यूस भी एक समय में हर घर में तबीयत से पिया ही गया. फिर बंद हो गया. अब फैशन से बाहर है.
हालत ये हो गये कि ठेले से लेकर मेले तक हर कोई ग्रीन टी पीने लगा. अब अलग कैसे दिखें? यह ग्रीन टी तो सब पी रहे हैं. तो घाँस, फूस, पत्ती, फूल, डंठल जो भी यह समझ आया कि जहरीला और कड़वा नहीं है, अपने अपने नाम की हर्बल टी के नाम से अपनी जगह बना कर बाजार में छाने लगे. ऐसा नहीं कि असली काली वाली चाय अब बिकती नहीं, मगर एक बड़ा वर्ग इन हर्बल चायों की तरफ चल पड़ा है. 
बदलाव का जमाना है. नये नये प्रयोग होते हैं. खिचड़ी भी फाईव स्टार में जिस नाम और विवरण के साथ बिकती है कि लगता है न जाने कौन सा अदभुत व्यंजन परोसा जाने वाला है और जब प्लेट आती है तो पता चलता है कि खिचड़ी है. चाय की बढ़ती किस्मों और उसको पसंद करने वालों की तादाद देखकर मुझे आने वाले समय से चाय के बाजार से बहुत उम्मीदें है. अभी ही हजारों किस्मों की मंहगी मंहगी चाय बिक रही हैं.
हो सकता है कल को बाजार में लोग कुछ अलग सा हो जाने के चक्कर में मेनु में पायें बर्ड नेस्ट टी - चिड़िया के घोसले के तिनकों से बनाई हुई चाय. एसार्टेड स्ट्रा बीक पिक्ड बाई बर्ड फॉर यू याने कि चिड़िया द्वारा चुने हुए घोसले के तिनके अपनी चोंच से खास तौर पर आपके लिए. इस चाय में चींटियों द्वारा पर्सनली दाने दाने ढ़ोकर लाई गई चीनी का इस्तेमाल हुआ है. 
अब जब ऐसी चाय होगी तो बिकेगी कितनी मँहगी. क्या पता कितने लोग अफोर्ड कर पायें इसे. मुश्किल से कुछ गिने चुने और यही वजह बनेगी इसके फेमस और हेल्दी होने की.
गरीब की थाली में खिचड़ी किसी तरह पेट भरने का जरिया होती है और रईस की थाली में वही खिचड़ी हेल्दी फूड कहलाता है, यह बात बाजार समझता है.
बस डर इतना सा है कि चाय के बढ़ते बाजार का कोई हिस्सा हमारा कोई नेता न संभाल ले वरना बहुत संभव है कि सबसे मंहगी चाय होगी- नो लीफ नेचुरल टी. बिना पत्ती की प्राकृतिक चाय और चाय के नाम पर आप पी रहे होंगे नगर निगम के नल से निकला सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त गरमा गरम पानी.
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समीर लाल समीर

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे दैनिक में रविवार अगस्त ४, २०१९ के अंक में:


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