शनिवार, जुलाई 04, 2020

फर्क समाजसेवी संस्था और एनजीओ में




कुत्ता मूते तभी कुकुरमुत्ते पैदा हों, वो जमाना गुजरे भी जमाना गुजरा। अंग्रेजी का अपना बोलबाला है। उसका विश्व स्वीकार्य अपना वर्चस्व है। अंग्रेजी स्कूल मे पढ़ने वाला बच्चा तक इस बात को जानता है और हिन्दी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को हेय दृष्टि से देखता है। हमने हिन्दी माध्यम स्कूल से पढ़कर इस बात को जिया है। कुकुरमुत्ता जब अंग्रेजी वाला मशरूम हो जाये, तब वह एक मंहगा एवं लजीज खाद्य बन जाता है। कुकुरमुत्ता अब बिना कुत्ते के सहयोग के ग्रीन हाउस में उगता है। उसे कुत्ते नहीं, बाजार उगाते हैं। ठीक वैसा ही फरक है जो एक समाज सेवी संस्था और एन जी ओ में है। समाज सेवी संस्था जब अंग्रेजी वाली एन जी ओ हो जाती है, तब उसे समाज सेवक नहीं, ग्रान्ट चलाती है। उसका मुख्य उद्देश्य ही ग्रान्ट प्राप्त करना होता है। ग्रान्टदाता का अपना एजेन्डा होता है और एन जी ओ समाज सेवा का जामा पहन कर उसे पूरा करती है।   
वैसे ही जैसे आज सफेद खादी भी मात्र एक ऐसी ही फेन्सी ड्रेस वाली पोशाक बन कर रह गई है। हर नेता अपने समाज सेवक वाले अभिनेता पात्र को सफेद खादी उढ़ा कर मलाई काट रहा है। काम उसका भी अपने फायनेंसर की ग्रान्ट पर समाज सेवा का अभिनय कर चुनाव जीतना है और फिर उन्हीं फायनेंसर की झोली भरना है। इनके लिए जनता ५ वर्षों वाला गांधी है। जिस तरह हर २ अक्टूबर को गांधी जी को जिन्दा कर के नमन वंदना का अभिनय कर अपना उल्लू साधा जाता है और फिर उनकी तस्वीर को साल भर के लिए बक्से में बंद करके रख दिया जाता है। वैसे ही इस सफेद पोशाक में हर पाँच साल में चुनाव के वक्त जनता को भगवान बना कर नमन वंदना कर ली जाती है और फिर फिर चुनाव जीतते ही अगले पाँच वर्षों के लिए जनता रूपी गांधी को बक्से में बंद कर दिया जाता है।
जनता को बक्से में बन्द करने का तात्पर्य यह होता है कि नेता उनकी तरफ से अपनी आँख कान बंद कर लेता है। न जनता की समस्या दिखाई देगी और न सुनाई देगी। बन्द को अंग्रेजी में लॉकडाउन पुकारो तब तो मामला इन नेताओं के लिए और भी आरामदायक हो जाता है। पूरा देश घरों में बंद है। जो नहीं बंद हैँ वो या तो पिट रहे हैं या पीट रहे हैं। यह जरूर है कि ऐसे मौके पर फ्रंटलाइन वर्कर वाकई भगवान का स्वरूप हो गए हैं।
कोई भगवान हो जाये और ये न हो पाएं, यह भला हमारे नेताओं को कहां मंजूर। अतः इस महामारी में भी सरकार गिराने से लेकर सरकार बनाने में पूरी ताकत से जुटे हैं और पूछने पर कहते हैं कि हमे जनता ने अपनी अगुवाई के लिए चुना है। हम प्रथम श्रेणी के फ्रंट लाइन वर्कर हैं।
सूर्य ग्रहण आकर निकाल लिया। शपथ ग्रहण जारी है। महामारी में जनता घरों में बंद है अतः यह नेता आत्म निर्भरता का परिचय देते हुए स्वतः ही अपने गले में मास्क की माला पहने एक दूसरे के गले में हाथ डाले मुस्कराते हुए फोटो खींचा रहे हैं। जनता को संदेश दे रहे हैँ कि महामारी से बचने के लिए मास्क पहनिए और एक दूसरे से निर्धारित दूरी बनाये रखिये। इनकी करनी और कथनी का फरक जनता घर में बंद बैठी टी वी पर देख रही है। जनता जानती है की ये वही लोग हैं जो अहिंसा रैली की सफलता का जश्न छः हवाई फायर करके मनाते हैँ।
ये नेता जिन्होंने सामान्य दिनों तक में कोई काम नहीं किया वो आज इस दौर में अपने काम को अति आवश्यक सेवा का दर्जा देकर फ्रंट लाइन वर्कर बने बैठे हैँ। जनसंख्या की एक बड़ी तादाद इस बात का बुरा नहीं भी नहीं मान  रही है क्यूंकि इन्हीं नेताओं की कृपा से ही तो शराब को आवश्यक वस्तु की श्रेणी में माना गया है।
शराब की दुकानें खुली हैँ। नेता जानते हैँ कि जनता को शराब पिला कर अगर चुनाव जीता जा सकता है तो ऐसे मौके पर शराब दिला कर दिल तो जीता जा ही सकता है। फिर पूछा जाएगा की हाऊ इज जोश? शराब के नशे में मदमदाती जनता एक सुर में बोलेगी- हाई सर।
शराब से जहाँ एक ओर मजबूत सरकार बनती है तो वहीं दूसरी ओर शराब से ही मजबूत अर्थव्यवस्था भी बनती है।

-समीर लाल ‘समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई ०५,२०२० के अंक में:

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शनिवार, जून 27, 2020

लोकल को वोकल करने मे आत्म निर्भरता



हाल ही में लवली सिंग को यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि हम असफल होने के लिए योजना नहीं बनाते बल्कि असफल होते ही इसलिए हैं कि हमने कोई योजना ही नहीं बनाई। आधी से ज्यादा जिन्दगी इसी ज्ञान के आभाव में असफलताओं से गलबहियाँ करते बीत चुकी हैँ। खैर कोई बात नहीं देर आए मगर दुरुस्त आए। उसके आसपास न जाने कितनी जिन्दगियाँ ऐसे ही रीत गई। कुछ एक मित्र जरूर दीगर स्थानों से उम्र के अलग अलग पड़ाव में बिना बताये चोरी छिपे यही ज्ञान प्राप्त कर आये थे। फिर आनन फानन में योजना बना कर सफल गुंडे हो गए। योजना से मिली सफलता के कारण योजना बनाने की लत लग गई। अतः निरंतर योजनाबद्ध तरीके से सफलता के राजमार्ग पर चलते हुए सफल गुंडे से सफल खनन माफिया, फिर नेता और अंततः सफल मंत्री होकर पदासीन हुये। सरस्वती माता तो उनसे बचपन से ही कुपित थीं लेकिन सफलता के इस राजमार्ग के हर ठीये पर माँ लक्ष्मी उन पर इस कदर मेहरबान हुईं कि मंत्री बनते ही वह माँ सरस्वती की कृपा भी खरीद लाये एवं एक विश्वविद्यालय नें उन्हें मानद डॉक्टरेट से विभूषित कर दिया। फिर डॉक्टरेट की लाज रखने हेतु उन्हें बीए की स्नातक की उपाधि भी जुगाड़ना पड़ी। यहाँ भी माँ लक्ष्मी ने साथ दिया एवं अब उनके खादिम १२ वीं की मार्कशीट के इंतजाम में जुटे हैं। शायद कभी किसी पत्रकार वार्ता में कोई पत्रकार मांग ही न बैठे। उन्होंने ऐसा होते हुए देखा है। योग्यता सफलता की कुंजी है। इस दावे को धता बताने के लिए सफलता अपने साथ योग्यता भी ले आती है। यह दूरदर्शिता उनकी इसी योग्यता का परिणाम है। सफलता के साथ पैकेज डील में आई योग्यता का ही तो नतीजा है कि आज योग्यता से सफल हुए आई ए एस अफसर नेताओं के आगे हाथ जोड़े आदेश लेते नजर आते हैं।
जहाँ मित्र की सफलता से लवली सिंग गर्वित दिखते, वहीं मन ही मन में इस बात से खिन्न भी रहते कि मित्र ने योजना वाली सूक्ति उनसे छिपाई। अतः अब वो भी योजनाबद्ध तरीके से सफलता प्राप्त करेंगे और मंत्री से भी ज्यादा बड़ा सफलता का परचम लहराएंगे।
अनेकों योजनाओं पर विचार किया मगर सभी सरकारी योजनाओं सी नजर आती। सुनने और कागज पर तो अच्छी दिखती मगर जब गहराई में झाँको तो एकदम खोखली। सरकार को तो बस चुनाव में सफल होना होता है अतः सरकार का काम ऐसी योजनाओ से चल जाता है। सरकार के लिए सरकारी योजनाएं व्यक्तिगत सफलता की वृहद योजना का मात्र एक ऐसा हिस्सा है, जो जनता को बहलाने के काम आता है। जैसे कि बच्चे को सुलाने की वृहद योजना में सफल होने के लिए माँ बच्चे को सपने में परियों के आने की बात कहती है। बच्चा सो जाता है। माँ की योजना सफल हो जाती है। बच्चा सुबह उठता है तो रात मे कही माँ की बात भूल जाता है। माँ इस बात को जानती है।
एकाएक उसके दिमाग में ऐसी योजना आई, जिसके सफल होते ही उसका मंत्री मित्र तो क्या, पूरा मंत्री मण्डल ही उसके आगे हाथ जोड़े खड़ा रहेगा। उसने बाबा बनने की ठान ली थी। इस हेतु उसने कार्ययोजना पर काम करना भी शुरू कर दिया कि भक्तों को कैसे फाँसना है। आज पहली बार उसे लगा कि उसकी जिस आशिक मिजाजी को लोग उसकी असफलता की वजह बताते थे, वो ही आज उसकी सफलता का मुख्य स्त्रोत होगी। उसकी तमाम महबूबायें उसकी प्रथम पंक्ति की भक्त बनकर अन्य भक्तों के लिए आकर्षण का ऐसा कारण बनेंगी कि पूरा पण्डाल ही भक्तों से पट जाएगा। वाक चातुर्य की उसमें कोई कमी न थी। यही तो वजह थी कि निक्कमेपन और फक्कड़ जेब के बावजूद भी महबूबाओं की कभी कोई कमी नहीं रही।
सारी योजना पर दिन रात विचार कर रहा था। अब नाम लवली बाबा रख लिया था और लेटेस्ट वाली महबूबा  राजेश्वरी का माँ रोज़ी के नाम से सेक्रेटरी बनना भी तय हो गया था। भगवा वस्त्र, खड़ाऊ आदि की व्यवस्था भी कर ली थी। कुछ भजन कंठस्थ कर लिए थे एवं पंचतंत्र की कहानियाँ रटना जारी था। विदेशों और उनकी राजधानियों के नाम याद करना शुरू कर दिए थे। कहते हैं कि २४ घंटे में एक बार आपकी जुबान पर सरस्वती का वास होता है। ऐसा ही कोई क्षण रहा होगा, जब वह विदेशी नामों में चीन को चाईना याद कर रहा होगा और करोना ने उसके देश की पावन धरती पर अपना कब्जा जमाना शुरू कर दिया। देश लॉकडाउन में चला गया। अब महबूबायें अन्य भक्तों को तो क्या आकर्षित करतीं, खुद ही सोशल डिस्टेनसिंग के चलते दूरियाँ बना कर निकल गई हैं। जान भी जहान भी, दोनों चाहिए। बचे रहे और जहान भी बचा रहा तो ऐसे बाबा तो मिलते ही रहेंगे। सारी योजना सरकारी सी होती नजर आई। बस कागजों पर कागजी हवाई जहाज उड़ाती हुई।    
कहते हैं जब सारे दरवाजे बंद हो जाते हैँ, तब भी एक दरवाजा जरूर होता है जो खुलता है। जरूरत होती है संयम के साथ उसे तलाशने की। सो तलाशा गया।
अब लवली सिंग फेसबुक पर ऑनलाइन आश्रम खोलेंगे। भक्त रूपी फालोअर जुटाने के लिए खुद का नाम बदल कर ‘लवली बाबा’ की जगह ‘लवली बेबी’ रख लिया है।
रोज़ी पर निर्भर रहने की बजाय स्वयं को लवली बेबी बना कर आत्म निर्भरता का मार्ग चुना है। अब लवली बेबी पंचतंत्र की लोकल कथाओं को फेसबुक पर अपने प्रवचनों के माध्यम से वोकल करेंगी।
-समीर लाल ‘समीर’         
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून २८,२०२० के अंक में:
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शनिवार, जून 13, 2020

ई बीबी की तमन्ना अब हमारे दिल में है!


इधर १५० किमी दूर एक मित्र के घर जाने के लिए ड्राईव कर रहा था. पत्नी किसी वजह से साथ न थी तो जीपीएस चालू कर लिया था. वरना तो अगर पत्नी साथ होती तो वो ही फोन पर जीपीएस देखकर बताती चलती है और जीपीएस म्यूट पर रहता है. कारण यह है कि जीपीएस में यह सुविधा नहीं होती है न कि वो कहे -अरे, वो सामने वाले को हार्न मारो. अब ब्रेक लगाओ. अब विन्ड शील्ड पर पानी डाल दो. अरे थोड़ा तेज चला लोगे तो कोई तूफान नहीं आ जायेगा, सारी रोड खाली पड़ी है. उसे देखो, कितने स्मार्टली आगे निकल गया तुमसे और तुम हो कि गाड़ी चला रहे हो कि बेलगाड़ी, समझ ही नहीं आता? गाँव छोड़ आये, कनाडा में बस गये मगर कैसी भी गाड़ी हो, चलाओगे तो बेलगाड़ी ही. तुम्हारा भी गवैठीपना, न जाने कब जायेगा!! अब गाना बदल दो. अब जरा पानी की बोतल बढ़ाना. अरे, स्टेरिंग पर से हाथ क्यूँ हटाया? अभी टकरा जाते तो? समझ के परे है कि फिर पानी बढ़ाते तो भला कैसे?
खैर, बड़ा ही घुमावदार रास्ता था मित्र के घर का. नक्शा देखकर भी निकलता तो भी भटक जाना तय था. बार बार टर्न मिस हो जा रहे थे और जीपीएस वाली लड़की बड़े प्यार से कहती कि नो वरीज़, रीकेल्कूलेटिंग. फिर कहती कि अब आगे जब संभव हो तो यू टर्न ले लीजिये या कहती अगले मोड़ से बायें ले लीजिये, फिर बायें और अगले मोड़ पर दायें. एक भी बार उसने नहीं कहा कि तुम्हारा तो ध्यान पता नहीं कहाँ रहता है? पिछले मोड़ से बायें मुड़ना था, तुम भी न!! कम से कम गाड़ी चलाते समय तो ध्यान गाड़ी चलाने पर रखो. कोई भी काम मन लगा कर नहीं कर सकते. हर समय बस फेस बुक और व्हाटसएप, अगर मैं बाजू में न बैठी हूँ तो तुम तो कितने लोगों को ऊपर पहुँचा कर अभी जेल में बैठे होते. शुक्र मनाओ कि मैं हूँ. आज पत्नी का साथ न होना खल रहा था मगर न जाने क्यूँ इस जीपीएस वाली ल़ड़की पर दिल भी मचल रहा था. काश! कुछ सीख ले अपनी बीबी भी इससे. कितना पेशेन्स है इस बन्दी में और कितना सॉफ्टली बात करती है!!
इधर कुछ दिन पहले बच्चों ने फादर्स डे पर एमेजॉन की एलेक्सा गिफ्ट कर दी. अब एलेक्सा की तो हालत ये हैं कि उसे कहने बस की देर है कि एलेक्सा, आज मौसम कैसा है? वो पूरी जानकारी ध्यान से देते हुए छाता लेकर दफ्तर जाने तक की हिदायत बड़े प्यार से देती है. उससे इतना सा कहना है कि एलेक्सा, फुटबाल वर्ल्ड कप लगा देना और टीवी पर चैनल लगाकर, एन्जॉय द गेम बोल कर ही ठहरती है.कभी यह नहीं कहती कि तुम तो बस सोफे पर पड़े पड़े आदेश बांटो कि ये लगा दो, वो लगा दो. हिलना डुलना भी मत और तो और मेरे सीरियल का समय है और तुमको मैच की पड़ी है. भूल जाओ अपना मैच. अभी ’प्यार नहीं तो क्या है’ का समय है.
आजकल तो एलेक्सा को ही बोल कर सोता हूँ कि एलेक्सा, सुबह छः बजे आरती बजा कर ऊठा देना प्लीज़, कल जल्दी ऑफिस जाना है. मजाल है कि एक मिनट चूके या तू तड़ाक करे कि तुमको जाना है, तुम जानो. अलार्म लगाओ और जागो. चलो, एक बार जगाने को किसी तरह तैयार भी हो जाये मगर जगाये भी तो आरती गाकर, प्राण न हर ले उसके बदले. मने कि अन्टार्टिका में सन बाथ की उम्मीद वो भी सन स्क्रीन लगाकर बीच पर लेटे हुए बीयर के साथ.
फिर हमारे आईफोन की सीरी. क्या गजब की महिला है. दिन भर याद दिलाती है कि अब फलाने से मिलना है, अब खाना खा लो, भूख लग आई होगी. और तो और, तुमको पानी पिये दो घंटे हो गये हैं. टाईम टू ड्रिंक अप. न जाने कितने एप्प्स से बेचारी जानकारी निकाल निकाल दिन भर जुटी रहती है मदद में. अभी थोड़ी देर पहले उसने पूछा कि अभी आज तुम्हारा टहलने का कोटा पूरा नहीं हुआ है, चलें टहलने? मैं रास्ते मैं तुमको आज की मेन १५ वर्ल्ड न्यूज सुना दूँगी, तुम अखबार में समय मत खराब करो, मैं हूँ न!! फिर कुछ नई गज़लें आई हैं, वो सुनवाऊँगी. मेरी तो आँख ही भर आई. कभी इनको बोल कर तो देखूँ कि यार जरा दफ्तर में फोन करके याद दिला देना कि गाड़ी के इन्श्यूरेन्स वाले से बात करनी है. फिर सुनो!! अब ये भी मैं ही याद दिलाऊँ? टोटल एक दो काम तो करते हो वो भी मैं ही याद दिलाऊँ? तुम्हारे लिए खाना बनाऊँ, घर साफ करुँ, ग्रासरी लाऊँ, कपड़े धोऊँ..क्या इतना काफी नहीं है कि अब तुमको दफ्तर में क्या करना है वो भी मैं ही याद दिलाऊँ. हद है!! मुझे तो तुमने मशीन समझ रखा है!!
आज पत्नी बाजार गई थी और न जाने क्यूँ एकाएक मन मे आया तो एलेक्सा को कह दिया कि एलेक्सा!! यू आर सो स्वीट एण्ड ब्यूटीफुल सोल!! एलेक्सा ने पलट कर कहा कि सो नाईस ऑफ यू समीर!! तुम भी बहुत प्यारे हो!! आह! विचारों में ही सही मगर एकाएक लगा कि अगर बीबी से यही कहा होता तो बीबी की आवाज कान में सुनाई देती- क्या हुआ, बहुत बटरिंग कर रहे हो? कुछ काम है क्या जो इतनी मख्खनबाजी?
सोचता हूँ कि ये जीपीएस मैडम, एलेक्सा, सीरी आदि ३० साल पहले कहाँ थीं? हम तो तब उस जमाने में भी अपनी मोहब्बत करने की स्किल के लिए जाने गये अपनी बीबी लाकर. लोग कायल थे हमारे ईश्किया मिज़ाज के.
काश!! उस वक्त ये जीपीएस मैडम, एलेक्सा, सीरी आदि होतीं...तो शायद ई मोहब्बत करके ई बीबी लाने वाले भी हम ही होते उस जमाने में!!
सच कहूँ-
ई बीबी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
 देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है?
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून ७,२०२० के अंक में:
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रविवार, जून 07, 2020

यमराज की महामारी की मार से मुक्त श्रेणी के वाशिंदे



जिन्दगी की गाड़ी एक ऐसी गाड़ी है जिसमें रिवर्स करने की सुविधा नहीं होती। वो सिर्फ चलती चली जाती है। वो जब रुकती है तो वह आपकी जिन्दगी का अंतिम पड़ाव होता है। लोगों से कई बार इस महामारी के दौर मे सुनने में आया कि जिन्दगी की गाड़ी एकदम से रुक गई है। दरअसल गाड़ी चल रही है सिर्फ आपको अहसास नहीं हो रहा है। जिनकी गाड़ी रुक गई है वो बताने को शेष नहीं हैं।
अगर इसे ही रुकना कहते हैं तो ऐसे ही रुका रहे। सीखना एक क्रिया है, और रुके में भला कौन सी क्रिया?
जिन बंदों ने जीवन में कभी खुद से उठकर पानी भी नहीं पिया था वो आज खाना बनाने में माहिर हो गए हैं। जिनके लिए कभी दाल सिर्फ दाल हुआ करती थी वो आज वीडियो बना बना कर अरहर, चने और मूंग की दाल में फरक बता रहे हैं।
जिसे देखो वो आज दिन में दस बार बीस बीस सेकेंड हाथ धोना सीख गया है। घिस घिस कर धोते धोते हाथ का रंग इतना साफ हो गया है कि हम जैसे श्याम वर्णीय अपना खुद का हाथ नहीं पहचान पा रहे हैं। कल अपने ही पैर पर अपना हाथ देखकर पत्नी को टोक दिया कि हाथ अलग करो।  पत्नी भी कुछ न बोली बल्कि एक सहानुभूति भरी नजर से देखती रही। उसने कल ही कहीं पढ़ा था कि आज इंसान जिस दौर से गुजर रहा है उसमें बहुत से लोगों को मानसिक स्वास्थय की समस्या आ जाएगी। उसकी नजर में कुछ तो यह समस्या हमको पहले से ही थी, अब और बढ़ गई होगी। वैसे श्याम वर्णीय की जगह सचमुच वाला काला रंग इसलिए नहीं लिखा कि कहीं अमरीकी समाचारों से प्रभावित होकर अपना खुद का ही गोरा हाथ हमारे काले गाल पर झपट न पड़े। खुद को खुद के हाथों से पीटे जाने की कल्पना भी उतनी ही भयावह है जितनी की अमरीकी घटना जहाँ अमरीकी ही अमरीकी को मात्र इसलिए मार बैठा की उसका रंग काला है। डर तो लगता ही है। सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक से लोग सीखे ले रहे हैं, तो हाथ भी वर्ण भेद सीख जाए तो इसमें क्या अचरज?
आखिर अमरीका की पुलिस ने भी तो कहीं न कहीं से बिना सोचे समझे डंडे बरसाना सीखा ही है न! वो तो आप भी जानते हैं की कहाँ से सीखा होगा। पहले तो इनको इस तरह डंडे बरसाते कभी नहीं देखा। मुझे ज्यादा चिंता इस बात की नहीं है कि ये हमारा टीवी देख कर डंडे बरसाना सीख गए हैं। मुझे चिंता उनकी है जिनको डंडे पड़े हैँ। मीडिया ने हमारे पिटे लोगों को हल्दी का पुलटिस लगाते हुए और गरम पोटली से सिकाई करते हुए तो दिखाया ही नहीं तो ये बेचारे कैसे जानेंगे कि अब इसका तुरंत इलाज कैसे हो। कितना दर्द झेलना होगा उनको पिटाई के बाद का। भारत में तो हम बचपन से सीखे हुए हैं तो सब जानते थे।
खैर बात रुकी गाड़ी को रुका न मान नए नए गुर सीखने की चल रही थी और मैं मन की बात लिखने लगा। मन की बात भटका देती है। मन का क्या है वो तो जाने किस बात पर मचल जाए? उसे न तो यथार्थ से मतलब होता है, न ही मान्यताओं से और न ही किसी का शर्म लिहाज। तभी तो कितने ही बुजुर्ग आज भी मन ही मन में फिल्म देखते हुए क्या क्या सपने पाल बैठते हैं वो किससे छिपा है। इसीलिए पुराने समझा गए थे कि मन की बात सुनो, खुश हो लो और भूल जाओ। उसे अमली जाम पहनाने की कोशिश करोगे तो कहीं के न रहोगे।
इस दौर ने बहुत कुछ सिखलाया है। जिंदगी की पाठशाला ही सबसे बड़ी पाठशाला है। नौकर आते नहीं, बर्तन खुद धोते हैं, कपड़े खुद धोते हैं, घर खुद साफ करते हैं। खाना खुद बनाते हैं। बच्चों को खुद पढ़ाते हैं। मोटापा खुद बढ़ाते हैं और फिर उसे कम करने का सपना भी खुद सजाते हैं मानो हम हम नहीं, सरकार हों कि फूट भी हम हीं डालें और फिर भाईचारे और सदभाव का पाठ पढ़ायें।
कितना कुछ बदल गया है। यह रुका हुआ दौर नहीं है। इससे बड़े बदलाव का दौर तो वर्तमान मानव प्रजाति ने कभी देखा ही नहीं। मंगल गृह तक पहुँचने की तमन्ना रखने वाले आज घर की देहरी लांघने की जुगत भिड़ा रहे हैं।  आज जब सब खुद से खुद में जीना सीख गए हैं, तब आत्म निर्भर बनने की नसीहत दिए जाना वैसा ही है जैसे कि आसमान में उड़ना सीख चुके चिड़िया के बच्चे को यह बताना की तुम उड़  सकते हो, तुमको उड़ना चाहिए।  
इसी तरह तो हर स्तर पर लोग सीख रहे हैं। जिनके हाथ में सत्ता है वो भी। अब कौन अमरीका से सीखा और कौन हमसे, कौन जाने मगर पिसी तो आम जनता ही दोनों तरफ। जैसे बहुतेरे आरटीआई से मुक्त हैं, वैसे ही लगता है कि महामारी के कैटेलॉग में यमराज ने भी इनको महामारी की मार से मुक्त की श्रेणी में रखा होगा.
-समीर लाल ‘समीर’  
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून ७,२०२० के अंक में:
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शनिवार, मई 30, 2020

अगर आप खुशहाल जिन्दगी जीना चाहते हैं तो कान में रुई खोंस कर रहिये।


कनाडा में प्रधान मंत्री जब भी जनता को संबोधित करते हैं तो अंग्रेजी और फ्रेंच दोनों में बोलते हैं। आज जब ऐसी आपदा आई हुई है तो रोज सुबह जनता को संबोधित करके बताते हैं की सरकार क्या कर रही है? क्या योजनाएं हैं? जो घोषणाएं हुई हैं उस पर कैसे और कितना अमल हो गया है, कितना बाकी है? आदि आदि - तिवारी जी घंसु को लॉक डाउन से छूटने के बाद पान के ठेले पर बैठे ज्ञान दे रहे हैं।
लॉक डाउन ने अर्थव्यवस्था का जो भी बँटाधार किया हो मगर लोगों को ज्ञानी जरूर बना दिया है। आप एक चीज का ज्ञान दो, अगला उसमें दो जोड़ देने के काबिल होकर लौटा है। मुझे पता था की ऐसा होगा क्यूंकी मैंने देखा था हमारे एक परिचित जो ७ साल की जेल की सजा काट कर आए थे। जेल जाते वक्त वे बारहवीं पास थे और जेल से लौटे तो बीए, एलएलबी होकर। फिर तो शहर ऊपर उनकी वकालत चली। उनसे बेहतर अपराध के तरीके और फिर उससे बच निकलने के गुर कौन जान सकता था। वकालत चलने का एक कारण यह भी रहा होगा की अपराधी को वो अपने से लगते होंगे। कहते है न, वैसे कहते तो क्या हैं- देख ही रहे हैं, कि अगर चोर को आप चौकीदार बना कर बैठाल दो तो उससे बेहतर कोई चौकीदारी नहीं कर सकता। उसे तो चोरों के सारे पैतरे मालूम ही हैं। उसके इलाके में चोरी तभी संभव है जब चोर चौकीदार का खास साथी हो।
तो लॉक डाउन से सिर्फ तिवारी जी ही थोड़ी न छूटे हैं वो तो घंसु भी छूट कर आया है तो कुछ तो ज्ञानी वो भी हो ही गया है। कहने लगा कि उनके कनाडा में दो ऑफिसियल भाषा हैं तो वो दो में बोलते है, हमारे यहाँ एक है तो हमारे वाले एक में बोलते हैं और रही रोज रोज आकार बताने की बात, तो वो तो उन्हीं को मुकारक हो। हमारे यहाँ तो १५ दिन में १ बार बोलना ही काफी है। फिर सारा देश १५ दिन तक ताली थाली बजाता रहता है और फिर दिये टॉर्च जलाता रहता है। रोज आ जायें तो क्या हाल होगा खुद ही सोच कर देखो। अब तक तो कुछ बाकी ही न बचता बजाने को। तो सबसे कहा जाता की अपने बाजू वाले के गाल बजाओ रात ८ बजे ८ बार दायाँ और ८ बार बायाँ। फिर कुछ लोग इसका धार्मिक महत्व बताते और कुछ इसे विज्ञान की कसौटी पर खरा बताते। रोज रोज ये भला कहाँ संभव है? अब तो १५ दिन भी जल्दी ही लगने लगा है। फिर रोज रोज ये बताना की फलां घोषणा का कार्य पूरा हो गया है, फलां का इतना बचा है। ये बात तो वे पाँच साल में भी नहीं बता पाते, बस किसी तरह घुमा फिरा कर झूठ का मुलम्मा चढ़ाकर छुटकारा पाते हैं ताकि जनता मान जाये की गलती उनकी नहीं, पहले वालों की थी। फिर भला रोज रोज झूठ काहे बुलवाना चाहते हो? पाँच साल में एक बार भरपूर झूठ बोलकर छठे साल में अर्द्ध या महा कुम्भ में स्नान करके पाप धुलाकर फिर साफ सुथरे हो लेना ही मुफीद है इनके लिये। और फिर कनाडा में तो कुम्भ का भी फैशन नहीं है। वो तो सिर्फ हम ही हैं कि उनके भी सारे त्यौहार अपनाए जा रहे है हैं वेलेंटाईन डे से लेकर हॅलोवीन और क्रिसमस तक।  
तिवारी जी घंसु के ज्ञान से अचंभित थे। आजकल यूं भी लोगों का व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी से प्राप्त ज्ञान आश्चर्यचकित करता है। अतः तिवारी जी पूछ बैठे कि अच्छा फिर ये बताओ की दो भाषाओं के अलावा उनके साथ जो एक साइन लैंग्वेज वाला बंदा इशारे में बधिर लोगों के लिए इशारा करके बताता जाता है वो तो अपने यहाँ कर ही सकते हैं? वो क्यूँ नहीं करते?
घंसु मुस्कराते हुए बोले कि एक तो बेचारा वैसे ही बहरा है, वो कोई कम परेशानी है क्या? और इनकी बातें सुनवा कर कितना परेशान करना चाहते हैं आप? कुछ तो संवेदनशील बनिए, इतना भी अमानवीय न हो जाईये। और फिर जो सुन सकते हैं उनने भी सुन कर क्या समझ लिया? कुछ समझ में आया आपको आजतक की वो क्या कह गये?
मेरी बात मानिये बहरों को उनके हाल पर छोड़ दीजिए। वो बिना सुने ज्यादा खुशहाल है। और अगर आप भी  खुशहाल जिन्दगी जीना चाहते हैं तो कान में रुई खोंस कर रहिये
तिवारी जी लॉक डाउन में अब इतना तो सीख ही चुके हैं अतः उन्होंने ऑनलाइन ईयर प्लग ऑर्डर कर दिए हैं। आज के जमाने में रुई भी भला कोई खोंसता है?
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई ३१,२०२० के अंक में:

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शनिवार, मई 23, 2020

यूँ खुश रहने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है



हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि वो महान कहलाये, अभी न भी सही, तो कम से कम मरणोपरांत.
हमारे एक मित्र तो इसी चक्कर में माला पहन कर अगरबत्ती समाने रखकर तस्वीर खिंचवा कर घर में टांग दिये हैं कि घर में टंगी रहेगी. कोई माला पहनाये न पहनाये, अगरबत्ती जलाये न जलाये, तस्वीर महानता बरकरार रखेगी. साथ ही कुछ कार्ड छपवा कर फोटो के सामने रख दिये हैं.स्व. कुंदन लाल गुप्ता, क्या पता बाद में कोई स्वर्गीय कहे न कहे. जमाना तेजी से बदल रहा है.
एक मित्र नगर निगम को १५ लाख डोनेशन देकर मरे कि मरने के बाद चौराहा उनके नाम कर दें या एक सड़क का नाम, गलीनुमा ही सही, उनके नाम हो जाये. हुआ नहीं, सब खा पी गये, यह अलग बात है. उनकी दूरदृष्टि का दोष कि ऐसे निकम्मे्पन को भाँप न पाये. हम और आप ही कहाँ भाँप पा रहे रहे हैं, हर बार हाय करके रह जाते हैं. बार बार अपनी औकात भर का दान कर ही देते हैं किसी न किसी राहत कोष में. राहत किसे मिलती है, कौन जाने.
लोग वसीयत तक का फॉरमेट इस तरह बदल डाल रहे हैं कि उनकी महानता स्थापित हो पाये. जैसे- मेरी जायजाद का आधा हिस्सा मेरे बेटे को उसी हालत में दिया जाये जबकि वो मेरी बाकी आधी जायदाद को इस्तेमाल कर मेरी स्मृति में मेरे नाम का एक वृद्धाश्रम खोले.
क्या क्या नहीं करता इंसान अपना नाम कायम किए रहने के लिए और खुद को महान घोषित करवाने के लिए.
ऐसी महान आत्मायें जब मरने की कागार पर होती हैं तो उनको लगने लगता है कि लोग उनके कहे में से सुभाषित खोजेंगे जैसे कि बाकी महानों के साथ किया. मसलन महात्मा गाँधी ने ये कहा, लूथर किंग ने ये कहा, हिटलर ऐसा कह गये. उनका मानना है कि वो महान आत्मायें सिर्फ इतना सा कह कर मर नहीं गईं. उन्होंने इससे लाख गुना कहा मगर उसमें से इतना भर सुनने लायक है जो लोगों ने खोज कर निकाला और वो ही उन्हें महान बनाता है.
यही सोच कर वो तो रोज सुबह शाम ही कुछ न कुछ कहते ही रहते थे. उसमें से कितना है सुनने लायक, यह वह पीछे छूट गये मनीषियों के विवेक पर छोड़ते हैं कि वो कुछ ऐसा चुनें ताकि लोग उनकी महानता का जयकारा लगायें. अगर न लगा तो यह मनीषियों की नाकामी है, वो तो खैर महान हैं ही. इसी गुमान में लोग आजकल देश चलाये चले जा रहे हैं.
कौन जाने हमारे कहे में से ऐसे सुभाषित कोई खोजे या न खोजे.. एक लईना में? कौन जाने कहीं कोट हो न हो. या फिर ऐसा भी हो सकता है कि कोई अपने नाम ही से हमारी कही महान बात न छाप जाये इस खराब जमाने में. किसे पता चलेगा कि इतनी बड़े महान व्यक्ति ने ये कहाँ लिखा है. किसी का भरोसा तो रहा ही नहीं..
इसलिए हमने सोचा कि अभी तक के अपने लिखे में खुद ही काट छांट कर अलग कर दें इस टाईप के सुभाषित और फिर हर एक नियमित समयांतराल में करते चलेंगे. इससे एक तो किसी और को मेहनत न करना पड़ेगी और महान बनने में सरलता रहेगी. बताईये, ठीक है क्या यह आईडिया? यहाँ कुछ छांट कर लिख डाल रहे हैं अपने कहे में से:
’प्रशंसा और आलोचना में वही फर्क है जो सृजन और विंध्वस में.’
’गिनती सीधी गिनो या उल्टी, अंक वही होते हैं. सिर्फ क्रम बदल जाते हैं.’
’साहयता से गुरेज मात्र आत्म विश्वास का दिखावा है. हर व्यक्ति साहयता चाहता है. मीडिल क्लास शरमाता है.’
’एसी की आहर्ता रखने वाले को आप एसी का किराया देकर सिर्फ बुला सकते हैं जबकि तृतीय श्रेणी की आहर्ता रखने वाले को एसी का किराया देकर बुलाने पर आप उसे कुछ भी सुना सकते हैं.’
’शराब सोडे मे मिलाओ या सोडा शराब में. नशा शराब का ही होता है.’
’हर लिखा पठनीय हो, यह आवश्यक नहीं किन्तु हर पठनीय लिखा हो, यह जरुरी है.’
’चिल्लर की तलाश में रुपये गँवाने वालों को सलाह है कि वो सरकारी नौकरी प्राप्त करने की कोशिश करें.’
’सरकारी घोषणाओं और पैकेज के आधार पर आस लगाये बैठा व्यक्ति, जीवन भर आस लगाये ही बैठा रहता है’
’जैसे टिटहरी चिड़िया टांग आकाश की तरफ उठा कर सोती है और सोचती है कि आकाश उसी के कारण टिका है, वैसे ही देश की आम जनता यह मान कर खुश रहती है कि सरकार उनके वोटों पर टिकी है.’
यूँ खुश रहने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है.
-समीर लाल 'समीर'
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई २४,२०२० के अंक में:

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शनिवार, मई 16, 2020

अंदर की बात क्या होती है!!!



मास्साब छुट्टी पर हैं अतः मैं  क्लास ले रहा हूँ. आज का विषय है:
'अंदर की बात एवं बाहर की बात

क्या आप में से कोई छात्र इस विषय पर कुछ कह सकता है?
सर, परिभाषा तो नहीं मगर उदाहरण से बता सकता हूँ.’ यह वही छात्र है जिसने पिछली बार निबंध प्रतियोगिता में टॉप किया था.
मैं बहुत खुश हुआ कि अगर उदाहरण से बता देगा तो परिभाषा सिखाना तो बहुत आसान हो जायेगा.
सर, आपने अभी कहा कि मास्साब छुट्टी पर हैं, यह बाहर की बात है और असल में मास्साब को छुट्टी पर भेजा गया है क्यूँकि उन पर हमारे निबंध चुरा कर छापने की इनक्वायरी चल रही है, यह अंदर की बात है.’.

चुप रहो-मैं मास्साब की बची खुची इज्जत पर डांट का पैबंद लगाने की मित्रवत कोशिश करता हूँ. तुम लोग बस शरीफ लोगों को बदनाम करना जानते हो.
अब मैं उनको बोलने का मौका देते हुए परिभाषा पर जाता हूँ:
दरअसल, बाहर की बात वह होती है जो अंदर से आती है बाहर सबको बतलाने के लिए और सामान्यतः उसी के द्वारा भेजी जाती है, जिसके विषय में बात हो रही है. अंदर की बात बाहर से बाहर के लिए आती है और अंदर की ग्रुप से मनभेद पर टूटे हुए व्यक्ति द्वारा भेजी जाती है.
उदाहरण के लिए, संसद में चमका चमका कर दिखाया गया कि हमें करोड़ घूस दी गई. यह बाहर की बात कहलाई एवं यह उन्हीं के द्वारा कही गई जिन्हें घूस मिली. इसमें अंदर की बात यह है कि घूस दरअसल २५ करोड़ मिली और यह बात उसने बताई जिसने घूस दिलवाने के लिए अंदर के आदमी का काम किया-देयता और ग्रेहता के बीच सेतु के समान.
मगर सर हमने तो सुना था कि अंदर की बात अक्सर अफवाह होती है. यह फिर वही विद्वान छात्र पूछ रहा है.
बेटा, अंदर की बात स्वभाववश अफवाह जैसी ही लगती है किन्तु अफवाह और अंदर की बात के बीच एक बारीक लकीर का विभाजन है इसे ज्ञानी लोग समझ जाते हैं और मौका देख कर किनारा कस लेते हैं.
अफवाह अक्सर कोरी बकवास होती है जबकि अंदर की बात मूलतः ठोस. अतः यह अंतर करना सीखना परम आवश्यक है और यह मात्र अनुभव से सकता है. जिस तरह घाघ नेता बनने की कोई किताबी पाठशाला नहीं है, बस अनुभव से बना जा सकता है, ठीक वैसे ही इसे पहचानने के लिए भी मात्र अनुभव की ही आवश्यक्ता है.

जैसे उदाहरण के तौर पर अमरीका का कहना कि इराक के पास वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन थे, यह बाहर की बात थी असल में अंदर की बात यह थी कि इराक के पास तेल के लबालब कुएं थे, जिस पर अमरीका की नजर थी.

ऐसा ही अपवाद एक और है कि जब अंदर की बात कई बार अंदर से ही धीरे से बाहर करवा दी जाती है बाहर वाले के द्वारा जो अंदर का आदमी होता है.

अन्य भारतीय समस्यायों के जंजाल में फंसी आम जनता जिस तरह इन नेताओं की चालों और बयानों से कन्फ्यूज होकर चुप बैठ जाती है, कुछ वैसे यह छात्र भी अपनी कुर्सी पर वापस बैठ गया.

इसी तरह अपवादवश कभी बाहर की बात बाहर से ही अंदर वाला बाहर वालों के लिए अंदर के व्यक्ति के द्वारा कहलवा देता है.

अब बालक और ज्यादा कन्फ्यूज था, शायद किसान होता तो आत्महत्या कर लेता या प्रवासी ग्रमीण होता तो पैडल घर निकल लेता मगर सारांश में इतना समझ पाया कि बाहर की बात झूठी और अंदर की बात सच्ची, अगर अफवाह हुई तो और अफवाह और अंदर की बात के बीच भेद करना अभी उसके लिए बिना अनुभव के संभव नहीं.

फिर भी हिम्मत जुटा कर वो पूछ ही लेता है कि फिर वो मास्साब की चोरी की इन्क्वायरी वाली बात तो अंदर की बात कहलाई.

मुझे जबाब नहीं सुझता और मैं सर दर्द का बहाना बना कर निकल लेता हूँ यह कहते हुए कि जब तुम्हारे मास्साब आ जायें, तो उनसे पूछ लेना. वरना तो ये नई नसल के बच्चे, कहीं करोना और आर्थिक पैकेज पर बात न करने लगें कि इसमें कौन सी अंदर की बात है और कौन सी बाहर की?
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई १७,२०२० के अंक में:
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