शनिवार, सितंबर 19, 2020

सकारात्मकता ही सफलता की कुंजी है।

 


कहते हैं आज के इस कोविड काल में सकारात्मकता ही सफलता की कुंजी है। सकारात्मक सोच एवं सुरक्षात्मक उपाय अपनाते रहें तो शायद इस काल का पार कर जाएं।

शुरुवात में तो दिन दिन भर बैठ कर यही देखते थे टीवी पर की कितने और मरे? हर बढ़ते आंकड़े के साथ दिल की धड़कन बढ़ती जाती। जितनी बार वो टीवी पर विज्ञापन आते कि हाथ साबुन से २० सेकेंड तक धोते जाओ, उतनी बार उठाकर हाथ धोने जाते। फिर सीएनएन ने बताया की जितनी देर मे दो बार हैप्पी बर्थ सांग  गाओगे, २० सेकेंड पूरे हो जायेगे। देखते देखते धुलते धुलते हाथ बाकी के शरीर से गोरा हो गया और कंठ हैप्पी बर्थडे गाने में माहिर मगर करोना का भय टिका रहा यथावत।

विशेषज्ञों ने सलाह दी कि टीवी दिन में एकबार १० मिनट के लिए देखो वो भी सिर्फ यह देखने के लिए कि सरकार का कोई नया आदेश तो नहीं आया जो आपको पालन करना है। टीवी देखना बंद कर दिया। हाथ धोना बंद नहीं किया अतः भय मानस पर छाया रहा। अब हैप्पी बर्थ डे याने तुम जिओ हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार गाते हुए लगता कि करोना उससे अपने लिए गाया मान कर दिन प्रति दिन विस्तार प्राप्त कर रहा है। आखिर दुनिया भर में उसे याद करके कितने सारे लोग हाथ धोते हुए यही गा रहे है तो दुआओं का असर तो होना ही था। जब गुडडु ये गाना १ साल की उम्र से सुनते आज ८० के होकर चुस्त दुरुस्त हैं तो भला करोना का क्या बिगड़ना है। यही सोच कर अब गाना बिना गाए हाथ धोने लगे हैं।

टीवी पर समाचार देखने की आदत तो शराब पीने की लत से भी ज्यादा खराब बताई गई है। शराब और गांजे की आदत तो छुड़वाई जा सकती है। मगर टीवी पर समाचार देखने का चस्का ऐसा होता है कि बिना देखे जीवन नीरस लगने लगता है। दरअसल दूरदर्शन वाले समाचारों में वो नशा न था जो आजकल वालों में हैं। धूमधड़ाके के साथ ऐसा लगता है समाचार नहीं, कोई फिल्म देख रहे हैं जिसकी एकदम मस्त पटकथा लिखी गई है, सटीक डॉयलॉग लिखे गए हैं और जैसा निर्देशक ने चाहा है वैसा ही मनभावन अभिनय किया गया है अपने फाइनेंसर का पूरा ध्यान रखते हुए। हर समाचार रूपी फिल्म का उद्देश्य मात्र इतना की फाइनेंसर को किसी न किसी रूप से फायदा मिलता रहे। फाइनेंसर आका होता है। उसे नाराज नहीं किया जा सकता। इतिहास गवाह है की जिसने भी उसे नाराज किया है, उसकी दुकान सिमट गई है।

खैर टीवी का नशा छुड़ाने के लिए सोशल मीडिया का हाथ थामा तो पाया की यह तो गाँजा छुड़ाने के लिए चरस पीने लगे। व्हाट्सअप्प, ट्वीटर, फेसबुक, ईमेल जहाँ जाओ, वहाँ करोना पसरा पड़ा है। कोई इलाज बता रहा है तो कोई इसे लाइलाज बता रहा है। कुछ बुद्धत्व को प्राप्त लोग इसे बीमारी मानने को ही तैयार नहीं और इसे अफवाह बता कर निकल जा रहे हैं।  कोई घर पर हैन्ड सेनेटाइज़र बता रहा है तो कोई इम्यूनिटी बढ़ाने का तरीका मगर ले देकर बात करोना की ही हो रही है और हम अभी भी हाथ धो धो कर करोना भगाने में लगे हैं और वो दिमाग पर चढ़ अपनी विकास यात्रा में लगा है।

लगने लगा की कहां चले जाएं जहाँ इसकी कोई बात न हो। कोई जिक्र ही न आए और यह हमारे सिर से उतरे। कहते हैं न कि उदण्ड बच्चे की बदमाशी बंद करवानी हो तो उसे इग्नोर करो। उसकी बात ही न करो। थोडी देर में अपनी उपेक्षा देख कर वो बदमाशी करना बंद कर देगा।

मगर वैसी कौन सी जगह है? क्या देखूँ -क्या सुनूँ? कुछ नहीं समझ आता- जित देखूँ तित लाल की तर्ज पर हर तरफ करोना की बात – कारोना मय वातावरण।

तब एकाएक एक ईश्वर का भेजा कोई दूत मुझे मन की बात सुनने की सलाह दे गया। तब जा कर इस बैचेन दिल को करार आया। न करोना की कोई बात, न आंकडे और न इससे होने वाले नुकसानों की कोई बात। अहा!! कोई तो ऐसी जगह मिली। आराम से बैठो- देशी कुत्तों की प्रजातियाँ जानो। मोर को दाना खिलाओ। सब सुनो बस करोना को छोड़ कर। ऐसे शुद्ध वातावरण और करोना मुक्त स्थल आज बचे कहाँ हैं।

आज फिर हमने अपने आपको विश्व गुरु साबित कर दिया। मैं करोना भय से मुक्त हुआ। आपको भी भय मुक्त होना है तो मन की बात सुनो।

गौतम बुद्ध भी कहा करते थे की जब बाहर बहुत कोलाहल हो तो मन की बात सुनना चाहिए। आज जाकर उनकी बात का गूढ़ अर्थ समझ आया।

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार सितंबर २०,२०२० के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/55078867


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शनिवार, सितंबर 12, 2020

कबूतर उड़ाने का शौक एक बार लग जाए तो फिर जाता नहीं।

 


तिवारी जी को कबूतर उड़ाने के शौक था। एक शाम कबूतर उड़ाते हुए उनके मन ने भी उड़ान भर ली और तिवारी जी राजनीति में उतर आए।

इंसान में सीखने की ललक हो तो कहीं से भी ज्ञान ग्रहण कर लेता है। तिवारी जी ने भी कबूतरों से पैतरेबाजी के गुर सीख लिये थे। उन्हीं को अंजाम देते हुए वे शीघ्र सरपंच हो गए।

सरपंच का चुनाव जीतने के लिए तिवारी जी के दिखाए गए सब्ज बाग ऐसे थे कि उनका लगना तो दूर, उनके तो बीज भी शायद चांद पर भी न मिलें। अतः गांव वालों को बहलाने के लिए तिवारी जी ने ‘गाँव की बात, सरपंच के साथ’ कार्यक्रम की घोषणा की। इस कार्यक्रम को तिवारी जी ने ‘बात’ का नाम तो दिया मगर था असल में घोषणा का मंच। घोषणा स्वभावतः जबाबदेही से मुक्त होती हैं एवं नई घोषणा पुरानी घोषणा एवं वादों को स्मृति धुमिल कर देती हैं। एक मंझा हुआ नेता घोषणा के इस स्वभाव से भली भांति परिचित होता है।

घोषणा की गई कि गाँव कों चारों तरफ से ऊंची ऊंची दीवार से घेर दिया जायेगा। इससे गाँव पड़ोसी गाँवों से सुरक्षित हो जायेगा। मगर उससे भी गहरी बात जो गाँव वाले सोच भी नहीं सकते वो यह बताई गई कि जो बारिश का पानी बह कर पड़ोस के गाँवों में चला जाता है, वो गाँव की जमीन में समाहित हो जायेगा और गर्मी में बोरवेल को अच्छा जलस्तर मिलेगा। यह ज्ञान उन्होंने पर्यावरण पर अखबार में छपे एक आलेख को पढ़कर अर्जित किया था। अध्ययन की अपनी महत्ता है भले ही अखबार का ही क्यूँ न हो।

भव्य शिलान्यास का आयोजन हुआ। बताया गया कि ऐसी दीवार से घिरा दुनिया का यह पहला गाँव होगा। हम इस क्षेत्र में विश्व गुरु कहलाएंगे। तुरंत गाँव वालों को काम पर लगा दिया गया। उत्साहित गाँव वाले यह भी न जान पाये कि वह पड़ोस के गाँव से असुरक्षित कब थे। उन्हें तो बस अब इस बात की धुन थी कि गाँव का पानी गाँव के बाहर न जाए। पूरा गाँव दीवार से घेर दिया गया। सरपंच जी को हर कार्य में उत्सव मनाने की आदत थी। अतः दीवार बन जाने पर उसके लोकार्पण का मेगा उत्सव मनाने का कार्यक्रम रखा गया जिसमें शहर से नाना प्रकार के व्यंजन मंगा कर ग्रमीणों में वितरित करने की बात तय पाई गई।

शहर से व्यंजन लाए जाने की बात पर एकाएक यह पता चला कि गांव तो अति उत्साह में चारों तरफ से दीवार से घेर दिया गया है, अब शहर जायेंगे कैसे? बात सरपंच जी तक पहुंचाई गई। सरपंच जी गुणों की खान हैं, इस बात का परिचय देते हुए उन्होंने इसे योजना की भूल न बताते हुए, ग्रामीणों की मूर्खता बताया। बताया गया कि दीवार के साथ दोनों तरफ से सीढ़ी बनाने जैसा सामान्य बुद्धि वाला काम भी अगर सरपंच जी ही बताएंगे तो फिर विकास की अगली योजना पर विचार कब करेंगे?

लोकार्पण कार्यक्रम स्थगित कर सीढ़ी बनाई गई और धूमधाम से लोकार्पण हुआ।

मौसम आया तो बारिश हुई। पानी गिरता और धरती में समा जाता। ‘गाँव की बात, सरपंच के साथ’ में इसे विश्व स्तरीय उपलब्धि बताया गया और सभी गाँव वासियों को ताली पीट कर और दिया जला कर इस उपलब्धि का समारोह मनाने की घोषणा की गई। गाँव हर्षोल्लास में डूबा ताली बजाता रहा, दीपक जगमग जलाता रहा। बारिश थी कि रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

दीवारों से घिरा गाँव जल निकास के आभाव में जब कमर तक पानी में डूबने लगा तब लोग चिंतित हुए। कुछ दिन सबको घरों में बंद रहने की घोषणा की गई और किसी आदि कालीन कुनबे की साल में सात दिन घर में बंद रहने की प्रथा के फायदे बताए गए। लोग घरों में बंद हो गए और सरपंच गाँव के सबसे ऊंचे टीले वाले अपने घर में कबूतरों को दाना खिलाने में मगन रहा।

धीरे धीरे गांव जलाशय में तब्दील होने लगा। मगर काबिल सरपंच पुनः ‘गाँव की बात, सरपंच के साथ’ में नई घोषणा के साथ अवतरित हुए। उन्होंने इसे आपदा में अवसर खोजने का वक्त बताया और कहा कि इस पानी में क्यूँ न मछली पाल ली जाएं और बारिश रुकते ही उन्हें शहर ले जाकर बेचा जाए? इस आय और व्यापार के नए अवसर से गाँव आत्म निर्भरता की ओर अग्रसर होगा।

शहर से मछली के बीज बुलवा कर गाँव रुपी जलाशय में छोड़ दिए गए। घर पानी में डूबते रहे और मछलियाँ बड़ी होती रहीं। गाँववासी घर की छतों पर बैठे अपनी अपनी बंसी जलाशय में डाले मछली फसने का इन्तजार करते रहे।

सरपंच कबूतरों को दाना खिला कर न जाने कब शहर जाकर मछलियों के बाजार और व्यापार की संभावनाओं पर गोष्ठियों में व्यस्त हो गए।

देखते देखते गाँव मय गाँववासियों के जलमग्न हो गया।

सरपंच जी ने शहर में पत्रकारों से चर्चा करते हुए इसे ईश्वर का कहर बताया और अपनी संवेदनाएं प्रकट की।

आजकल तिवारी जी अपने शहर वाले मकान से कबूतर उड़ा रहे हैं। कहते हैं कि कबूतर उड़ाने का शौक एक बार लग जाए तो फिर जाता नहीं।

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार सितंबर १३,२०२० के अंक में:

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रविवार, सितंबर 06, 2020

तरक्की की राह पर दौड़ने के आशय।

 



यहाँ कनाडा में हम साल में दो बार समय के साथ छेड़छाड़ करते हैं जिसे डे लाईट सेविंग के नाम से जाना जाता है. एक तो मार्च के दूसरे रविवार को समय घड़ी में एक घंटा आगे बढ़ा देते हैं और नवम्बर के पहले रविवार को उसे एक घंटे पीछे कर देते हैं. ऐसा सूरज की रोशनी के अधिकतम उपयोग हेतु किया जाता है.

नवम्बर में जब एक घंटा पीछे घड़ी करते हैं तब ऑफिस से लौटते वक्त पूरा अँधेरा घिर आता है, जो एक दिन पहले तक रोशनी में होता था. यह दिन कनाडा में वो दिन होता है जब सबसे ज्यादा दुर्घटनायें पैदल सड़क क्रास करते लोगों की कार से टकराने से होती है. कार चालको की आँखे पहले दिन उस वक्त लौटते हुए अँधेरे से अभयस्त नहीं हुई होती है और न ही एक दिन में अधिक सतर्कता बरतने की आदत लौटी होती है. बरफ में इससे ज्यादा खतरनाक हालात रहते हैं मगर लोग सतर्क होते हैं और उन्हें मालूम होता है कार फिसल सकती है.

उस दिन घड़ी पीछे करके जब स्टेशन पर कार पार्क करके प्लेटफार्म की तरफ बढ़ा तो क्षेत्र के एम पी (सांसद), एम एल ए, पार्षद और साथ में एरिया के पुलिस अधिकारी लोगों को शाम को सतर्क रह कर कार चलाने और सड़क पार करने का निवेदन करते हुए कॉफी के साथ रिफ्लेक्टर बाँट रहे थे जो अँधेरे में चमकता है. अपने कोट, बैग, गाड़ी पर रिफ्लेक्टर लगा लेने से एक उम्मीद होती है कि अँधेरे में सड़क पार करते पैदल चल रहे व्यक्ति पर कार चालक की नजर आसानी से पड़ जायेगी.

मैं रिफ्लेक्टर अपने बैग पर लगा कर प्लेटफार्म पर आकर अपनी ट्रेन का इन्तजार करने लगा. सामने हाई वे पर ११०/१२० किमी तेज रफ्तार भागती गाड़ियों से दफ्तर पहुँचने की जल्दी में जाते लोग. मैं सोचने लगा कि इस विकसित देश में इतनी तेजी से गाड़ी दौड़ा कर कहाँ और आगे जाने की जल्दी है इन लोगों को. थोड़ा आराम से भी जाओ तो भी विकसित हो ही, क्या फरक पड़ जायेगा और कितना विकसित होना चाहते हो? मगर नहीं, शायद मेरी सोच गलत हो..शायद यही समय की पाबंदी और सदुपयोग इनको विकसित बना गया होगा और ये अब भी विकास की यात्रा पर सतत अग्रसर हैं. अच्छा लगता है ऐसी रफ्तार से कदमताल मिलाना.

ट्रेन अभी भी नहीं आई है और मैं इन्तजार में खड़ा हूँ और मेरे विचार सामने भागती गाड़ियों के साथ भाग रहे हैं. भागते विचार में आती है पिछली भारत यात्रा.

यह यात्रा कुछ वर्ष पूर्व उस युग में हुई थी जब एटीएम में एवं लोगों की जेबों में में रुपये हुआ करते थे और लोग गाडियों, रिक्शों, बसों, मोटर साईकिलों पर सवार सड़क जाम में आड़ी तिरछी कतार लगाये खड़े घंटो व्यतित कर दे रहे थे अपने गन्तव्य तक पहुँचने के लिए. वह युग आज के युग से बहुत अलग था. आज वही लोग एटीएम की कतार में खड़े हैं. एटीएम और जेब से रुपये नदारत हैं और गन्तव्य रुपये निकलवाने की छाँव में कहीं खो गया है. मगर दोनों ही युगों की समानता इस जुमले में बरकरार रहीं कि अच्छे दिन आने वाले हैं और भारत विकास की यात्रा पर है.

स्वभावतः यात्रा गति माँगती है गन्तव्य की दिशा में. लम्बे ठहराव की परिणिति दुर्गंधयुक्त अंत है. चाहे वो पानी का हो, जीवन का हो या विचारों का हो.लम्बी यात्रा में विश्राम हेतु ठहराव सुखद है किन्तु सतत ठहराव का भाव दुर्गंध युक्त प्रदुषित माहौल के सिवाय कुछ भी नहीं देता.

विकास यात्रा पर अग्रसित होने का दावा करने वाले देश के हालात उस युग में भी ट्रेफिक जाम रुपी ठहराव के चलते यूँ थे कि जब मैं अपने मित्र के घर से, जहाँ में रुका हुआ था, अपना कुछ जरुरी काम निपटाने बैंक जाने को तैयार हुआ, जो कि उनके घर से दो किमी की दूरी पर था, तो मित्र ने कहा कि ड्राईवर आ गया है उसके साथ गाड़ी में चले जाओ. बैंक बंद होने में मात्र एक घंटे का समय था और मुझे उसी शाम दिल्ली से वापस निकलना था. मेरे पास यह विकल्प न था कि अगर आज न जा पाये तो कल चले जायेंगे. अतः पिछले तीन दिनों के अनुभव के आधार पर मैने मित्र से कहा कि भई, मैं पैदल चले जाता हूँ और आप गाड़ी और ड्राईवर बैक भेज दो. लौटते वक्त उसके साथ आ जाऊँगा. मित्र मुस्कराये तो मगर मना न कर पाये. उनको तो दिल्ली का मुझसे ज्यादा अनुभव था.

मैं विकास की ओर बढ़ते मेरे देश की राजधानी की मुख्य सड़क पर धुँए से जलती आँख और धूल से खांसते हुए पैदल बैंक जाकर काम करा कर जब पैदल ही लौट रहा था तो मित्र के घर के पास ही मात्र एक मोड़ दूर उनकी गाड़ी में ड्राईवर को ट्रैफिक से जूझते देख उसे फोन किया कि जब मौका लगे, गाड़ी मोड़ कर घर चले आना.. मैं वापस पैदल ही पहुँच रहा हूँ. 

घर जाकर ठंडे पानी से स्नान कर आराम से बैठे नीबू का शरबत पीकर खत्म किया ही था कि ड्राईवर वापस गाड़ी लेकर मुस्कराते हुए हाजिर पूछ रहा था कि साहेब, शाम एयरपोर्ट कब छोड़ना है?

मन आया कि कह दूँ कि फ्लाईट तो रात दो बजे हैं मगर चलो, अभी दोपहर चार बजे ही निकल पड़ते हैं...इन्तजार यहाँ करने से बेहतर है कि एयरपोर्ट पर कर लेंगे कम से कम फ्लाईट तो न मिस होगी.

विचारों में विकासशील और विकसित देशों के बीच की दूरी नापते नापते ट्रेन आ गई और मैं फिर वही, दफ्तर पहुँच कर विकसित को और विकसित कर देने के राह पर चल पड़ा.

आंकलन ही तो है वरना मुझे भी यहाँ क्यूँ होना चाहिये?

वो विकासशील देश भी तो मेरा योगदान मांगता है.

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार सितंबर ०६,२०२० के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/54741372

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शनिवार, अगस्त 29, 2020

हाय रे, ये जी का जंजाल!!




मुन्नू याने पिछले ढाई दशक से भी ज्यादा समय से मेरे जी का जंजाल.
मेरे मित्र शर्मा जी का बेटा है. पारिवारिक मित्र हैं तो सामन्यतः न पसंदगी को भी पसंदगी बता कर झेलना पड़ता है. शायद शर्मा जी का भी यही हाल हो मगर उससे हमें क्या?
मुन्नू क्या पैदा हुए, शर्मा शर्माइन सारी शरम छोड़ कर उसी के इर्द गिर्द अपनी दुनिया सजा बैठे. फिर क्या, मुन्नू ने आज माँ कहा, मुन्नू आज गुलाटी खाना सीख गये, मुन्नू चलने लगे. मुन्नू सलाम करना सीख गये और जाने क्या क्या. हर बात की रिपोर्टिंग बदस्तूर फोन के माध्यम और आ आकर या बुला बुलाकर मय प्रदर्शन के जारी रही.
बेटा, अंकल को सलाम करो..बीस बार बोलने पर मुन्नू भी टुन टान करके एक बार सलाम किये..फिर क्या, सब लगे उसे चूमने..खूब खुश होकर अतः हम भी खुशी से हँसे. वाह, वेरी गुड करते हमारा मूँह दुख गया मगर शर्मा दंपत्ति न थके. नित नये किस्से.
देखते देखते मुन्नू चार साल के हो गये. दीवार से लेकर फ्रिज तक पर पेन्टिंग ड्राईंग में महारत हासिल कर ली. मूंछ वाली रेलगाड़ी, कुत्ते से बदत्तर सेहत वाला पंखधारी शेर, गमले में उगता आधा कटा पपीते के आकार का सेब, नीला केला..सब बनाना सीख गया. शर्मा दंपत्ति का सीना गर्व से फूला न समाता और हम एक चाय की एवज में वाह वाह करते रह जाते.
वाह वाही से बालक मुन्नू इतना उत्साहित हुए कि एक दिन हमारे ड्राईंग रुम की दीवार पर उड़ती हुई मछली के सर पर गुलाब का फूल उगा गये. अब हमें काटो तो खून नहीं, मगर क्या करते. खुद ही तो वाह वाह करके उत्साहित किये थे. मिटा भी नहीं सकते, शर्माइन के बुरा मान जाने का खतरा. वो तो इस चक्कर में साल भर बाद एक पैच मिटाने के लिए पूरे घर को पेन्ट करवा कर बहाना बनाया कि पेन्ट छूटने लगा था, तब बच पाये.
अब तक मुन्नू स्कूल जाने लगे. हमारे लिए नई जहमत रोज साथ लाने लगे. अब जब भी वो लोग बुलायें या हमारे यहाँ आयें तो कभी गिनती, कभी ए बी सी, कभी पहाड़ा और कभी कविता. दोनों हाथ एक के उपर एक चिपका कर दोनों अंगूठे उड़ा उड़ा कर नचाते हुए..
मछली जल की रानी है..(पीछे पीछे शर्माइन बैकअप में..हाथ लगाओ...!!!)
हाथ लगाओ, डर जाती है (शर्माइन की देखादेखी डरने का अभिनय करते हुए और फिर दोनों हाथ समेट कर बाजू में उस पर गाल टिकाते हुए)
बाहर निकालो...(आँख बंद करके मरने का अभिनय) मर जाती है....
शर्मा शर्माइन की तालियाँ..मैं सोचने लगा कि कितनी खुश किस्मत है यह मछली जो मर गई, मुन्नू की जमाने से सुनी जा रही घिसी पिटी कविता से निजात पा गई और हम अटके हैं जब मुन्नू पुनः मनुहार पर जैक एण्ड जिल सुनाने की ऐंठते हुए तैयारी कर रहे हैं. दिखाने के लिए हम भी ताली बजाते रहे और मुन्नू सुनाना शुरु हुए...

जैक एण्ड जिल....और अंतिम पंक्ति में...
जिल केम टंम्बलिंग आफ्टर...

और मुन्नू जी पूरी तन्मन्यता से धड़धड़ा कर गिरे. सबने ताली बजाई, मुन्नू हँसे, हम दिल दिल में रोये.चेहरे पर मुस्कान चिपकाये ताली बजाने लगे., समझिये कि भयंकर झेले. सर पकड़ लिया. घर पर सेरीडॉन की सर दर्द गोली का पत्ता हफ्तावारी लिस्ट में शामिल हो गया. लगने लगा जैसे सेरीडॉन ने शर्मा जी को अपना ब्रॉण्ड एम्बेसडर बना दिया हो. उन्हें देखते ही इसकी याद आ जाये.
अच्छा या बुरा, कहते हैं कैसा भी वक्त हो, गुजर ही जाता है. सो यह भी गुजरा. झेलते झिलाते मुन्नू २६ साल के हो लिये. दो महिने पहले उनका ब्याह भी कर दिया गया. तब से आज तक बुल्लवे पर उनके घर चार बार हम जा चुके है और वो हमारे घर प्रेशर क्रियेट कर बुल्लवे पर तीन बार आ चुके हैं. हर बार शादी के चार फोटो एलबम, जिसमें हल्दी, मेंहदी, शादी, रिसेप्शन और फिर हनीमून की तस्वीरें हैं और इन्हीं समारोहों का विडियो देख देख कर पक चुके हैं. ये बुआ जी, ये चाची, ये दादी, ये साला, ये दूर की साली-इन्फोसिस में, ये गुलाबी साड़ी में नौकरानी छल्लो, ये भूरा ड्राईवर..ये ये...वो वो...हाय, मेरे कान क्यूँ न फट गये, आँख क्यूँ न फूट गई. कहो उनकी बहू जिन रिश्तेदारों को न पहचाने, उन्हें हम बिना मिले अंधेरे में पहचान जायें, बिना किसी गफलत के. एक बार फिर घर में सेरीडॉन चल निकली है.
कल रात आये थे..इस बार शादी का विडियो बर्न करके दे गये हैं क्यूँकि हमें बहुत पसंद आया था. हमारे झूठ मूठ की प्रशंसा अगली बार लेड़ीज संगीत वाला भी बना कर दे जायेंगे, यह बात उन्होंने समय की कमी के कारण क्षमा मांगते हुए बता दी है. अब तो जब उस विडियो पर नजर जाती है, बस मन से एक ही उदगार निकलता है-
धन्य हो तुम..मेरे मुन्नू.
हम आगे के लिए भी तैयार हैं, जब अगले बरस तुमको बच्चा होगा. हमें तो मानो परम पिता परमेश्वर ने किसी पुराने जन्म का बदला लेकर सिर्फ झेलने को रचा है.
शायद, पिछले जनम में कवि रहा होऊँगा और लोगों को खूब झिलवाया होगा.
-समीर लाल ‘समीर’



भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अगस्त ३०,२०२० के अंक में:
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शनिवार, अगस्त 22, 2020

सुझावों का व्यक्तित्व बहुत कमजोर होता है


तिवारी जी को किसी ने बताया था कि अगर जीवन में सफल होना है, तो अपना एक मेंटर (उपदेशक) बनाओ। साफ शब्दों मे कहा जाए तो उस्ताद बनाओ। उन्हीं उस्ताद से उन्होंने सीखा था कि जनसेवक को जनता के लिए किए जा रहे कार्यों और योजनाओं के लिए जनता से सुझाव लेना चाहिये। उन सुझावों को अच्छी नजर से देखना परखना चाहिये। फिर अपने साथियों (जिसे मंत्रीमंडल भी कहते हैं) से सलाह करना चाहिये। परियोजना अमल हो जाने पर जनता से फीडबैक लेते रहना चाहिये। साथ ही यह भी समझाया कि  ‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय।
आई आई टी में दाखिले के लिए जो मास्साब ट्यूशन पढ़ाने आते थे, उनकी दाखिले के बाद क्या जरूरत? अतः जैसे ही सफल हो गए तो सबसे पहले तो मेंटर (उस्ताद) को अलग किया। मगर सलाहें झोले में सहेज कर रख लीं।
कुर्सी पर काबिज होते ही जो मकान मिला वो एकड़ों में फैला था। उसी के आंगन के आखिरी कोने में निंदक की कुटिया बनवा दी गई। निंदक शोर मचाता तो काम में विघ्न पड़ता अतः तिवारी जी का घर साउण्ड प्रूफ कर दिया गया। कुर्सी में बड़ी ताकत होती है अतः आनन फानन में उस कुटिया में निंदक के आने जाने का मार्ग भी पिछली सड़क से करवा दिया गया। लेकिन उस्ताद की सलाह से टस से मस न हुए। बहुत बाद में पता चला कि निंदक का दर्जा देकर उस्ताद को ही उस कुटिया में रखा गया था। जिसकी बातें सफल होने तक सलाह हुआ करती थीं, उसी की सलाहें सफल होने के बाद निंदा लगने लगी थीं। यही दुनिया का नियम हैं और मानव का स्वभाव।
जनता के सुझावों को इतना अधिक महत्व दिया गया की तिवारी जी ने एक सुझाव मंत्रालय ही बना डाला। उस मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार भी खुद अपने पास रखा।
जनमानस की भलाई हेतु हर परियोजना के लिए सुझाव मँगवाए जाते। जैसे ही सुझाव जनता से चल कर मंत्रालय में दाखिल होते वो सरकारी हो जाते। उन्हें फाइल में रखवाया जाता। सुझावों को किसी की बुरी नजर न लग जाए अतः उन्हें देखने पर ही अघोषित पाबंदी लगा दी गई। उन फाइलों को अलमारी में ताला लगा कर बंद करवा दिया जाता।
सुझावों का व्यक्तित्व बहुत कमजोर होता है। जैसे ही परियोजना पूरी हो जाती है तब कुछ सुझाव, सुझाव से बदल कर यथार्थ हो जाते हैं और कुछ सुझाव बेकार। अब किसका क्या हुआ, ये तो पता करोगे तो पता चलेगा मगर यह तय है कि परियोजना आ गई है अतः सुझाव अब सुझाव नहीं रहे। अब उन्हें सरकारी रद्दी का दर्जा प्राप्त हो गया है। जनता के मासूम हाथों से चलकर सरकारी कागजों के राजमार्ग से गुजरते हुए सरकारी रद्दी में तबदील होना ही  सुझावों की जीवन यात्रा है।
अतः उस परियोजना से संबंधित सुझावों की सरकारी रद्दी को कतरन बनवा कर उसे पैकिंग मटेरीयल की तरह से इस्तेमाल करने के लिए नीलाम करवा दिया जाता। इस तरह से तिवारी जी ने, न सिर्फ पैकिंग के श्रेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक सफल कदम उठाया बल्कि पर्यावरण के प्रति अपनी सजगता भी दर्शाई। एक तीर से दो निशाने तो बहुतेरे लगा लेते हैं, लेकिन तिवारी जी का तो अंदाज ही निराला है। अतः तीसरा निशाना उनके चाहने वालों ने यह कह कर लगवाया कि इसे कहते हैं मौलिक सोच।
वह अपने साथियों से सभी परियोजनाओं पर सलाह लेते। सभी मंत्रीमंडल के साथी बारी बारी अपनी सलाह रखते, जिसे तिवारी जी कान में यूएनओ स्टैन्डर्ड वाले ट्रांसलेटर हैडफोन लगा कर ध्यान से सुना करते। ट्रांसलेटर हैडफोन की खासियत यह होती हैं कि उसमें से आ रहा संवाद किसी भी भाषा में बोला गया हो, सुनने वाले की भाषा में परिवर्तित होकर सुनाई देता है। यह प्रोग्रामिंग के जरिए उस हैडफोन को सिखाया जाता है।  तिवारी जी के निर्देश पर उनके हैडफोन से हर संवाद का अनुवाद सिर्फ इतना ही होता था कि  ‘जी  साहब, आपने बिल्कुल सही सोचा है और मैं आपका अनुमोदन करता हूँ। आपकी जय हो, आप हो तो सब मुमकिन है’। तिवारी जी अपने साथियों की सलाह सुन कर आनंदित होते और उनको धन्यवाद ज्ञापित करते। धन्यवाद पाकर सभी साथी प्रसन्न होते कि  उनकी सलाह तिवारी जी पसंद आई। एक प्रसन्न टीम ही टीम लीडर की लीडरशिप की सफलता का प्रमाण होती है। इस तरह से तिवारी जी ने अपनी लीडरशिप का लोहा मनवा लिया था।
परियोजना के अमल होते ही तिवारी जी अपने उस्ताद की अंतिम सलाह को अमली जामा पहनाते हुए जनता का फीडबैक लेने के सर्वे कराते। जनता से निवेदन किया जाता की बिना किसी दबाव के निष्पक्ष सर्वे का विकल्प चुन कर तिवारी जी के कार्यों का आंकलन करें। जनता को चार विकल्प में से कोई भी एक चुनना होता बिना किसी दबाव के – (अ) बेहतरीन, (ब) अतुलनीय, (स)अद्भुत, (द) विश्व स्तरीय
अगले दिन सर्वे का परिणाम सार्वजनिक कर दिया जाता। तिवारी जी पुनः किसी नई परियोजना में पुनः इसी परिपाटी को अपनाते हुए अथक लगे रहते और एक सच्चे जनसेवक होने का श्रेय अर्जित करते रहते।  
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अगस्त २३ ,२०२० के अंक में:


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शनिवार, अगस्त 08, 2020

जादूनगरी से आया है कोई जादूगर



नाम है सेवकराम। वह शुरू से पैदावार के पक्षधर रहे। पैदावार में उनकी अटूट आस्था का चरम यह रहा कि जब गाँव मे भीषण सूखा और अकाल पड़ा, तब भी उनके घर में मुन्ना पैदा हुआ। बाकी बरसों में जब जब खेतों में फसल लहलहाती, उनके आँगन में भी नई नई किलकारियाँ गूँजा करतीं।
उनका दूसरा स्वभाव खुद किसी भी बात का श्रेय न लेने का था। अपने खेत में भी चाहें वह खुद कितनी भी मेहनत करके फसल की पैदावार करें, श्रेय सदा मजदूरों को देते। उनका मानना था कि बिना इन मजदूर भाईयों के पसीना बहाये इतनी फसल कभी न होती। इसी वजह से मजदूर और मेहनत करते और वह फसल बेचकर मजदूरों को अच्छी मजदूरी देते। उनके परिवारों का ख्याल रखते और पूरे गांव में खुशहाली पैदा करते। इस तरह मजदूरों की मदद से धन पैदा करके वह खुद भी खासे धनवान हो चले थे।     
देखते देखते उनके आंगन में एक पूरी क्रिकेट टीम मय अंपायर के तैयार हो गई। खुद कभी श्रेय न लेने की आदत के चलते वह इस टीम को भगवान का दिया प्रसाद बताते। प्रसाद को जिस श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता है, उसी तरह ग्रहण करते रहे।
उनका यही स्वभाव उन्हें न सिर्फ अपने मजदूरों के बीच बल्कि पूरे गांव में लोकप्रियता के चरम पर ले गया। जैसा कि लोकप्रियता का परिणाम होता है, उनके अंदर भी लोकप्रियता भुनाने की ललक पैदा हो गई, जिसे उन्होंने पुनः ईश्वर का प्रसाद एवं आदेश माना और वह सरपंच हो गए।  कहते हैं न कि वातावरण और माहौल मानसिकता पैदा करता है और इसीलिए शायद आपसी रिश्तों में रोमांस पैदा करने के लिए नवयुगल हनीमून मनाने कश्मीर और स्वीटजरलैण्ड जाते हैं।
राजनीति के वातावरण और माहौल में आते ही उनके भीतर भी कूटनीति और चालबाजी पैदा हुई किन्तु भीतर की पैदाइश का बाहर किसी को पता न लगने देना भी उनके चतुर्भुजीय स्वभाव का तीसरा कोण था। इसी स्वभाव के चलते गाँव वाले सिर्फ उनके आँगन में खेल रही क्रिकेट टीम से परिचित थे अन्यथा अगर भीतर की बात जानें तो वह सब मिला जुला कर कम से कम दो टीमों की मैनेजरी तो काट ही रहे थे। इसे भी वह ईश्वर का गुप्तदान की तर्ज पर दिया गया गुप्तप्रसाद मान कर गुप्त ही बनाए रहते।
सरपंची में भी समस्त कार्यों का श्रेय ठेकेदारों को देकर वह गुप्तदान प्राप्त करते रहे। इस तरह एकत्रित दान से पैदा हुई अकूत संपदा को भी कुछ ऐसा गुप्त रखा कि कोई कानों कान न जान पाया। गुप्त बनाए रखने की इस आदत ने लोकप्रियता में इत्र का काम किया। लोकप्रियता हवा के संग लहराती बलखाती गांव की सरहद पार करके पूरे राज्य में सर्वत्र फैल गई।
इस तरह सेवकराम ने पूरे राज्य की सेवा करने का अवसर पैदा कर लिया। इस सफलता की चढ़ाई चढ़ते हुए उन्होंने तमाम पायदानों को पाठशाला माना और लगन से चालबाजियों के नये नये पैंतरे सीखते रहे। हर पैंतरे को वो नए नए नाम देकर उनके नए स्वरूप पैदा करते। किसी को समाजसेवा, तो कभी जनहित और कभी गरीबों के प्रति अपना दुलार आदि आदि न जाने क्या क्या बताते। इन नामों की पैकेजिंग के भीतर क्या है, उसे वह आदतानुसार गुप्त ही रखते। इस तरह वह आमजन में उनके परिणाम के इन्तजार की ललक पैदा करते। जब इंतजार की घड़ियां असह्य होने लगती, तब वह एक नई ललक पैदा कर देते। सतत ललक की पैदावारी में वह महारत की उस चोटी पर जा पहुंचे, जहाँ से महारत जादूगरी नजर आती है।
इस जादूगरी ने उनके भीतर एक ऐसा जादूगर पैदा कर दिया जो एक पूरी आबादी को हिपनोटाईज करना जान गया था। वो गांव में कचरे के ढेर पर बैठे कव्वे को हरियाली भरे बाग में नाचता मोर बताता और सम्मोहितजन नृत्य करने को मचल उठते और उसका जयकारा लगाते। अब वह नित नए खेल दिखाता। सम्मोहितजनों को कभी देश को सिंगापुर तो कभी हस्तिनापुर बताकर नए नए नजारे दिखाता और तालियां बटरोता।
पैदावारी का वो आज भी उतना ही बड़ा पक्षधर है। इसी के चलते भले ही किसी को रोजगार मिले न मिले मगर वह रोजगार के अवसर पैदा करने में जुटा है। जिस वक्त आपदा की रोकथाम पर काम होना चाहिये, वह उस आपदा से अवसर पैदा करने में जुटा है।
बचपन में जादूगर पी सी सरकार का जादू देखने जाया करते थे और आज सेवकराम की सरकार का जादू। दोनों में ही तालियों की गड़गड़ाहट के रुकते ही अगला खेला पेश कर दिया जाता है। अंतर सिर्फ इतना है कि वो तीन घंटे दिखाते थे और ये पाँच साल।
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार अगस्त ९ , २०२०




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रविवार, अगस्त 02, 2020

जो शौक नहीं पालते, उनकी जिन्दगी शोक में गुजरती है।


तिवारी जी शौकीन मिजाज के आदमी हैं। उन्हें गुस्सा होने का शौक है। वो कभी भी कहीं भी अपना यह शौक पूरा कर लेते हैं। उनके गुरु जी ने उन्हें बचपन में सिखाया था की हर इंसान को कोई न कोई एक शौक जरूर रखना चाहिये। जो शौक नहीं पालते, उनकी जिन्दगी शोक में गुजरती है। अतः गुरु की सीख को शिरोधार्य करते हुए कालांतर में उन्होंने गुस्से को अपना शौक बनाया। तिवारी जी उस जमाने के आदमी हैं जब गुरु का दर्जा मां बाप से भी ऊपर ईश्वर तुल्य होता था। अब तो न गुरु का कोई दर्जा है और न मां बाप का। आजकल तो बिना किसी दर्जे के विश्वगुरु बनने की होड़ में सभी जुटे हैं और गाली खा रहे हैं। खा तो वो और भी बहुत कुछ रहे  हैं मगर गाली सुनाई और सोशलमीडिया पर दिखाई दे जाती है।
आज तिवारी जी अखबार वालों से गुस्सा थे। उनका कहना है कि हम इस वैश्विक महामारी से नहीं डरते और न ही मौत से।  मगर मास्क इसलिए लगाए हैं की अगर गलती से वायरस लग गया और रिपोर्ट पाज़िटिव आ गई, तो ये अखबार वाले हमें मात्र ५६ साल की आयु में ही लिखेंगे कि ५६ साल का बुजुर्ग पॉजिटिव पकड़ाया। एक तो पकड़ाया ऐसे लिखते हैं मानो कोई डाकू पकड़ाया हो और उस पर ५६ साल की बाली उम्र में बुजुर्ग?
तिवारी जी उनको बुजुर्ग लिखा जाना बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे। बीमारी से भले न मरें मगर बुजुर्ग कहे जाने का आधात उनका दिल नहीं बर्दाश्त कर पाएगा। वो तो ४ साल बाद होने वाले चुनाव लड़ने का मन इसीलिए बना रहे हैं ताकि शहर को युवा नेतृत्व प्रदान कर पायें। वैसे इनको जिनसे विज्ञापन मिलता है वो तो ७० साल में भी युवा और कर्मठ नेतृत्व करने वाला दिखाई देता है और बाकी हम ५६ साल में बुजुर्ग। इसीलिए ये अखबार वाले हमें पसंद नहीं हैं।
इसी शौक के चलते एक बार वे अपने मोहल्ले के कुछ लोगों से महज इस बात पर गुस्सा हो गए थे क्यूंकि  उन्होंने तिवारी जी नेता जी कह दिया। तिवारी जी का मानना है की वे समाजसेवी हैं और जब वे चुनाव लड़ेंगे तो नेतागिरी  के लिए नहीं, समाज की सेवा के लिए लड़ेंगे। नेता उनकी नजर में भृष्ट व्यक्ति होता है और वे अपने आपको नेता कभी नहीं कहलवाया सकते।
चूंकि वे पुराने समय के भावी युवा हैं अतः उनकी अपनी मान्यताएं और समझ है। वह नेता नहीं समाज सेवी हैं। उनका सहज और सरल जीवन एक साधु जीवन है तो वह स्वयं के लिए नहीं अपितु समाज के लिए जी रहे हैं। वह जनता को भाषण नहीं देते, वे उसे प्रवचन पुकारते हैं। उनके प्रवचनों में वादे नहीं, उच्च जीवन शैली हेतू सूक्तियां समाहित होती हैं। वह गरीबी दूर करने से लेकर रोजगार के कूत अवसरों को उपलब्ध कराने वाले वाक्यों को उच्च जीवन जीने की सूक्ति बताते हैं। समाज के शोषण, फिर वो चाहे जैसा भी हो उसे ईश्वर द्वारा निर्धारित तप और परीक्षा का वह कठिन मार्ग बताते हैं जिसकी आग में तप कर यह समाज सोना बनेगा और देश पुनः वही सोने की चिड़िया कहलाएगा जो न जाने कब और कहां उड़ गई। 
वह अपने गुस्सा हो जाने के शौक को भी समाज सुधार की दिशा में लिया गया एक कदम ही मानते हैं। उन्होंने तुलसी पढ़ा है और तुलसी की खासियत ही यही है की जिसका जो दिल करे वो उसे उन अर्थों में समझ कर व्याख्या कर ले। अतः ‘भय बिन होय न प्रीत गोसाई’ की तिवारी जी की व्याख्या यह है की भय के बिना कोई काम नहीं होता, यहां तक की प्रीत भी नहीं। अतः प्रेमपूर्वक काम करवाने हेतु उन्हें गुस्सा करना पड़ता है। उन्हें ज्ञात है की इस शौक का विपरीत असर उनकी तबीयत पर पड़ता है किन्तु समाज सेवा में समर्पित यह संत समाज की भलाई के लिए ये दर्द भी सहता है।
उनका विकास का मॉडल किसी प्रदेश का नहीं, अध्यात्म और ध्यान का है। उनका मानना है की अगर इंसान ने अध्यात्म और ध्यान का मार्ग अपना कर अपना चित्त शांत कर लिया तो वह खुशहाल हो जाएगा। फिर वह अगर रोडवेज की टूटी बस मे भी यात्रा करेगा तो इस बात से कृतज्ञ महसूस करेगा कि अगर यह न होती तो मैं आज थकाहारा पैदल जा रहा होता। जिस दिन समाज की ऐसी मानसिकता हो जाएगी तो उसे हर जगह विकास ही विकास नजर आयेगा। विकास हेतु मानसिकता विकसित करना जरूरी है।
मैं तो तब उनका मुरीद हो गया, जब उन्होंने अपने द्वारा  भविष्य में स्वीकार की जाने वाली रिश्वत को दक्षिणा बताया। वह दक्षिणा जो कि लोग उनके द्वारा समाज उत्थान हेतु किये गए कार्यों से अभिभूत होकर चढ़ावे में दे जायेंगे। कुछ और पूछने की हिम्मत मुझमें थी नहीं।
क्या पता मुझ पर ही न वो अपना शौक पूरा करने लगा जाएं। किसी के गुस्से से भला कौन नहीं डरता?
-समीर लाल ‘समीर’    

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के अगस्त ३,२०२० के अंक में:
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शनिवार, जुलाई 25, 2020

जाओ तो जरा स्टाईल से...


आज एक चिट्ठी आई. उसे देखकर बहुत पहले सुना हुआ एक चुटकुला याद आया.
एक सेठ जी मर गये. उनके तीनों बेटे उनकी अन्तिम यात्रा पर विचार करने लगे. एक ने कहा ट्रक बुलवा लेते हैं. दूसरे ने कहा मंहगा पडेगा. ठेला बुलवा लें. तीसरा बोला वो भी क्यूँ खर्च करना. कंधे पर पूरा रास्ता करा देते हैं. थोड़ा समय ही तो ज्यादा लगेगा. इतना सुनकर सेठ जी ने आँख खोली और कहा कि मेरी चप्प्ल ला दो, मैं खुद ही चला जाता हूँ.
चिट्ठी ही कुछ ऐसी थी. एक बीमा कम्पनी की. लिखा था कि अपने अंतिम संस्कार का बीमा करा लें. पहले बताया गया कि यहाँ अंतिम संस्कार में कम से कम ५००० से ६००० डालर का खर्च आता है और अक्सर तो १०००० डालर तक भी चला जाता है अगर जरा भी स्टेन्डर्ड का किया. साथ में पिछले १० सालों में बढ़े दाम का ग्राफ भी था. पहली नजर में ग्राफ देख कर लगा की इन्होंने भारत के पेट्रोल के भाव का ग्राफ क्यूँ भेजा है? पेट्रोल छिड़क कर जलाएंगे क्या घी के बदले? फिर ध्यान से पढ़ा तो इनके पैकेज का भाव था जो पिछले १० सालों में बढ़ा था. जरा विचारिये कि जब तक आप का नम्बर आयेगा तब तक मुद्रा स्फिति की दर को देखते हुए यह २५००० डालर तक भी हो सकता है. अब अंतिम संस्कार का मामला है, चाहे जो भाव कर दें, करना तो पड़ेगा. यूरोप घूमना तो मंहगाई के चलते आप टाल भी लो. 
आगे बताया गया कि आप अपनी मनपसन्द का ताबूत चुनिये, डिजाईनर. जिसमें आप को आराम से रखा जायेगा. कई डिजाईन साथ में भेजे ताबूत सप्लायर के ब्रोचर के साथ. सागौन, चीड़ और हाथी दाँत की नक्काशी से लेकर प्लेन एंड सिंपल तक. उसके अन्दर भी तकिया, गुदगुदा गद्दा और न जाने क्या क्या.
फिर आपके साईज का सूट, जूते, मोजे, टाई आदि जो आपको पहनाये जायेंगे पूरी बामिंग और मेकअप के साथ. फेमस मेकअप स्पेशलिस्ट मेकअप करेगी, वाह!! यह तो हमारी शादी में तक नहीं हुआ. खुद ही तैयार हो गये थे. मगर उस समय तो खुद से तैयार हो नहीं पायेंगे तो मौका भी है और मौके की नजाकत भी. मलाल इस बात का रह जाएगा कि न तो जिसने सजाया उसको देख पायेंगे और न ही सज धज हम कितने राजा बाबू लगे वो देख पायेंगे.
फिर अगर आपको गड़ाया जाना है तो प्लाट, उसकी खुदाई, उसकी पुराई, रेस्ट इन पीस का बोर्ड आदि आदि. अगर जलाया जाना है तो फर्नेस बुकिंग और ताबूत समेत उसमें ढकेले जाने की लेबर. सारे खर्चे गिनवाये गये. साथ ही आपको ले जाने के लिये ब्लैक लिमोजिन आयेगी उसका खर्चा. अभी तक तो बैठे नहीं हैं उतनी लम्बी वाली गाड़ी मे. चलो, उसी बहाने सैर हो जायेगी. वैसे बैठे तो ट्रक में भी कितने लोग होते हैं? मगर लेकर तो ट्रक में ही जाते हैँ.
हिट तो ये है कि आप हिन्दु हैं और राख वापस चाहिये तो हंडिया का सेम्पल भी है और उसे लकड़ी के डिब्बे में रखकर, जिस पर बड़ी नक्काशी के साथ आपका नाम खोदा जायेगा और आपके परिवार को सौंप दिया जायेगा. हिन्दुत्व का इतना विश्वव्यापी डंका बज रहा है और कोई बता रहा था कि हिन्दुत्व खतरे में है.
इतने पर भी कहाँ शांति-फूल कौन से चढ़वायेंगे अपने उपर, वो भी आप ही चुनें. गुलाब से लेकर गैंदा तक सब च्वाइस उपलब्द्ध है.
अब जैसी आपकी पसंद वैसा बीमा का भाव तय होगा. चाहो तो इत्र भी छिड़क देंगे. थोड़ा एक्स्ट्रा दाम और दे देना. अम्मा कहा करती थीं कि जितना गुड़ डालोगे, उतनी मीठी खीर बनेगी. खीर तो चलो अगर मीठी बनाते तो खाते भी खुद ही न. यहाँ तो जब निकल लेंगे उसके बाद की खीर पकवाई जा रही है.
तब से रोज उस बीमा वाले का फोन आता है कि क्या सोचा? जल्दी करिए वरना देर हो जायेगी. आधा दिल तो उसकी हड़बड़ी देखकर बैठा जाता है की पट्ठे ने कहीं कुंडली बांचना तो नहीं सीख लिया है इसलिए उसे पता है देर हो जायेगी? कोई आश्चर्य नहीं होगा की उसने कुंडली बांचना सीख लिया हो इस हड़धप में कि भावी विश्वगुरु की विधा में पारंगत रहेंगे तो काम ही आयेगा. 
क्या समझाऊँ उन्हें कि भाई, यह सब आप धरो. हम तो भारत के रहने वाले हैं. समय से कोशिश करके भारत लौट जायेंगे. यह सब हमको शोभा नहीं देता.
हमारे यहाँ तो दो बांस पर लद कर जाने का फैशन है, अब किसी का कंधा दर्द करे कि टूटे. यह उठाने वाला जाने और उस पर खर्चा भी उसी का. अपनी अंटी से तो खुद के लिये कम से कम इस काम पर खर्च करना हमारे यहाँ बुरा मानते है.
भाई, अमरीका/कनाडा वालों, आप लोगों की हर अदा निराली है. कम से कम ये वाली अदा तो आपकी आपको ही मुबारक.
समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई 26,२०२० के अंक में:
http://epaper.subahsavere.news/c/53749498

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रविवार, जुलाई 19, 2020

खेल देखो और खेल की धार देखो


करोना ने जब भारत में अपनी विकास यात्रा आरंभ की थी, तब खबर आ रही थी की जेलों में इसका विकास ठीक उसी मॉडल पर होगा जिसे दिखाकर देश अमरीका से भी आगे निकल जाने वाला था। जहाँ नजर पड़े बस विकास ही विकास। गोया कि विकास न हुआ -मानसून आने पर मचा कीचड़ हो की जहाँ नजर जाये वहीं पोखरे भरे हुए और कीचड़ ही कीचड़। कभी आज तक ऐसा हुआ ही नहीं की मानसून आया हो और हम इतने तैयार हों कि कीचड़ न मचे। हम प्रारबद्ध पर अंध विश्वास रखने वाले इस कीचड़ को भी अपनी नियति मान कर स्वीकार करते हैं और कभी कभी तो इतने लहालोट हो जाते हैं कि इसे स्वास्थयवर्धक मड बाथ का नाम देकर इसमें लोट लगाने लगते हैं। हाल ही में एक फेमस अभिनेता ने अपने फार्म हाउस से अपनी कीचड़ में सनी तस्वीर इंस्टाग्राम पर वायरल कर दी थी। उसका देखा देखी बहुतेरे लोट गए कीचड़ में और लगे सेल्फी चढ़ाने। भक्तों की अंधभक्ति की भला कोई सीमा होती है क्या? भक्ति को सीमाओं में नहीं बांधा करते। जो भक्ति सीमाओं में बंध जाये वो चापलूसी कहलाती है।

खैर, बात जेल में करोना के विकास की चल रही थी। सूचना के आभाव में, वो भी ऐसे वक्त में जब हमारा खुद की दान की हुई राहत कोष की राशि के लिए पूछना भी निषेध है, कोई मासूम जेल में करोना के केसेस के बारे सरकार से जेल की रिपोर्ट मांग बैठा। यूँ तो सरकार ऐसे मूर्खतापूर्ण सवालों पर जबाब देना तो दूर, इनको सुनना भी गवारा नहीं करती। मगर ये मीडिया भी न, इसका पेट न हुआ, मानो फूड कोरपोरेशन का गोडाउन हो गया हो। कितना भी अनाज डालो, सब चूहा खा जाता है। मीडिया ने मामले को बेवजह तूल दे दी। 
प्रशासन भी कभी कभी ऐसे में मजबूर होकर कुछ न कुछ जबाब दे ही जाता है, अतः दिया।
जेल की करोना रिपोर्ट अपने अच्छे आचरण एवं खुद के परिवार पर करोना के प्रकोप के चलते पैरोल पर घर गई है। अभी तो चाँद के आकार पर आधारित कोविड त्यौहार के चलते पैरोल को डेट बढ़ा दी गई है, भले ही हम जीएसटी भरने की डेट न बढ़ा पा रहे हैं। मगर कहीं न कहीं तो हम संवेदनशीलता दिखा ही सकते हैं, अतः पैरोल की डेट पर दिखा डाली। उसके बाद भी अगर सही सलामत बिना एन्काउनटर के रिपोर्ट लौट कर जेल आ जावेगी तो आपको सूचित करेंगे। करोना क्यूंकी विकास पर है, और विकास का अंजाम तो आप देख ही चुके हैं। अतः सही सलामत लौटने की संभावना तभी बनेगी, गर किसी की आबरू पर छींटे न टपकें। वैसे ये जेल में रहने वाले अपराधिक प्रवृति के लोग, चाहे वो करोना रिपोर्ट जैसी हसीना ही क्यूँ न हो, बनारसी पान के समान होते हैं। कितना भी बचाओ, छींटे टपक ही जाते हैं और एकदम वहीं टपकते हैं, जहाँ लिखा होता है कि यहाँ पान थूकना मना है। तो अंजाम ए टपकन, एन्काउनटर की धड़कन!! देखते हैं कब तक नहीं धड़कता है।
वैसे जब तक रिपोर्ट आए, तब तक आप चाहो तो समय बिताने के लिए अंताक्षरी की तर्ज पर ‘कोर्ट में गुहार गुहार’ खेल सकते हो। अभी की गई प्रेक्टिस आगे चल कर स्किल इंडिया योजना में काम आवेगी। काहे की भारत के वर्चस्व के चलते अगले एशियन गेम में 'सुप्रीम कोर्ट में गुहार गुहार' खेल को ससम्मान शामिल किया जाने वाला है - खो खो को अलग कर के। खो खो अब अपना महत्व खो चुका है। अब पीठ पर नहीं, छाती पर खो देकर सत्ता पलटाई जाती है। खो का नाम अब झटका हो गया है। हालांकि नियम वही रहेंगे। विश्व गुरु की एक कोशिश यह भी है कि खेल का नाम 'सुप्रीम कोर्ट में गुहार गुहार' की जगह 'अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में गुहार गुहार' रख दिया जाये ताकि चीन, कोरिया और अन्य प्रतिभाशाली एशियन देश भी इसमें खुल कर हिस्सा ले सकें और आगे चल कर इसे  ओलंपिक में शामिल करने की मांग उठाई जा सके. तब तक के लिए आप रिपोर्ट की मांग करने वालों को हैप्पी गेमिंग - सरकार आपकी खेल के प्रति समर्पण भावना को देख कर उत्साहित है और मौका ताड़ कर आपको अर्जुन अवार्ड से नवाजे जाने पर भी विचार करने का मन बना चुकी है। मन बनाना और मन की बात करना सरकार का एकाकाधिकार है। सरकार खुद भी राजस्थान, महाराष्ट्र, मप्र और छत्तीसगढ़ में व्यापार वाला खरीदो बेचो खेल रही है, जो हम बचपन में लूडो और सांप सीढ़ी के साथ खेला करते थे- ये अब सीखे हैं। बचपन में खेलने का वक्त न मिला। कसी भी वजह से आभावों मे बीता बचपन हो, तो छोटे छोटे खेल भी न खेल पाने का मलाल बड़ा होने पर बड़े खेल खेलने को प्रेरित करता है।
मगर खेल और शौक करने की भी कोई उम्र होती है क्या? गालिब वो दिन लद गए, जब उम्र दीवार हुआ करती थी!
अब वो वक्त है जब खेल देखो और खेल की धार देखो।
-समीर लाल ‘समीर’

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शनिवार, जुलाई 11, 2020

टूटे चश्में से दिखता नव भारत का घोषणा पत्र


जब चपरासी रामलाल जाले हटाता, धूल झाड़ता हुआ कबाड़घर के पिछले हिस्से में गाँधी जी की मूर्ति को खोजता हुआ पहुँचा तो उड़ती हुई  धूल के मारे गाँधी जी की मूर्ति को जोरों की छींक आ गई. अब छड़ी सँभाले या चश्मा या इस बुढ़ापे में खुद को? ऐसे में चश्मा आँख से छटक कर टूट गया. गुस्से के मारे लगा कि रामलाल को तमाचा जड़ दें मगर फिर वो अपनी अहिंसा के पुजारी वाली डीग्री याद आ गई तो मुस्कराने लगे. सोचने लगे कि एक चश्मा और होता तो वो भी इसके आगे कर देता कि चल, इसे भी फोड़ ले. मेरा क्या जाता है? जितने ज्यादा चश्में होंगे, उतने ज्यादा लंदन से नीलाम होंगे. मुस्कराते हुए बोले- कहो रामलाल, कैसे आना हुआ? पूरे साल भर बाद दिख रहे हो?
गाँधी जी की मूर्ति को सामने बोलता देखकर रामलाल बोला-चलो बापू, बुलावा आया है. नई पार्टी बन रही है. नये मूल्यों के साथ. नये जमाने की पार्टी  है. नये लोग हैं. नया इस्टाईल है. गाते बजाते हैं. हल्ला मचाते हैं. एक अलग तरह की पार्टी बना रहे हैं. आज आपका जन्म दिन है, आपके सामने आपका नाम लेकर बनायेंगे. नहा लो, नये कपड़े पहने लो और चलो, फटाफट. बहुत भीड़ लगने वाली है. आपको नई पार्टी की योजनाओं, प्रत्याशियों और भविष्य को शुभकामनाएँ देनी हैं. बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा की उड़ान है. खैर, आप तो जानते ही हो कि ऐसा ही होता आया है हमेशा नई पार्टी के साथ. आपके लिए भला नया क्या है. आप तो हमेशा से ऐसी घटनाओं के साक्षी रहे हो- साबरमती के संत!
गाँधी जी बोले, देख भई रामलाल. एक तो तू ज्यादा चुटकी न लिया कर ये संत वंत बोल कर. बस, आज का ही दिन तो होता है जब मैं थोड़ा बिजी हो जाता हूँ. हर सरकारी दफ्तर से लेकर हर भ्रष्ट से शिष्ट मंडल तक लोग मेरी पूछ परक करके अपने इमानदार और कर्तव्यनिष्ट होने का प्रमाण देते हैं. ऐसे में ये एक और...कह दो भई इनसे कि कल रख लेंगे कार्यक्रम. नई पार्टी ही तो है. आज नहीं जन्मी तो क्या- कल जन्म ले लेगी. रंग तो अगले चुनाव में ही दिखाना है. एक दिन में क्या घाटा हो जायेगा? मेरा भी एक के बदले दो दिन मन बहला रहेगा.
रामलाल उखड़ पड़ा. कहने लगा एक तो साल भर आपको कोई पूछता नहीं. चुपचाप यहाँ पड़े रहते हो. आज पूछ रहे हैं तो आप भाव खा रहे हो कि आज नहीं कल. तो सुन लिजिये- यह कोई आपसे निवेदन या प्रार्थना नहीं है. बस, बुलाया है और आपको चलना है. आदेश ही मानो इसे. उन लोगों ने सारी जनता से पूछ लिया है  देश भर की. सब ने कहा है की पार्टी बना कर चुनाव लड़िये.
गाँधी जी ने परेशान होते हुए पूछा कि सारी जनता से कैसे पूछ लिया भई उन्होंने वो भी बिना वोट डलवाये?
रामलाल ने मुस्कराते हुए कहा कि बापू, आप तो बिल्कुले बुढ़ पुरनिया हो गये. इतना भी नहीं जानते कि उन्होंने फेसबुक से बताया था और खूब लोगों नें लाइक चटकाया. आजकल तो ऐसे ही पूछा जाता है.
गाँधी जी सकपका गये. कहने लगे- मैं क्या जानूँ? मेरा तो फेसबुक एकाउन्ट है नहीं- चल भई, तू कहता है तो चलता हूँ. मगर मेरा चश्मा तो बनवा दे. वरना उनका घोषणा पत्र पढ़े बिना उन्हें कैसे आशीर्वाद दूँगा?
रामलाल हँसने लगा- अरे बापू, इतनी जल्दी भला कोई घोषणा पत्र बनता है. अभी चार दिन पहले तो बात हुई पार्टी बनाने की. सब कार्यक्रम पहले से तय है. आप वहाँ मंच पर विराजमान रहेंगे. आपका माल्यार्पण होगा. ततपश्चयात वो आपको घोषणा पत्र (कोरे कागज का पुलिंदा) पकड़ायेंगे. आप अपना बिना शीशे का चश्मा पहने उसे देखने का नाटक करियेगा और फिर कह दिजियेगा कि मुझे बहुत उम्मीद है इनसे. मैं इन्हें आशीष देता हूँ. ये एक नव भारत का निर्माण करेंगे. अब अच्छा या बुरा- ये तो आपने कहा नहीं- होगा तो नव ही. आप सेफ रहोगे और पूजे जाते रहोगे तो नो टेंसन.
दूर बैठी जनता को क्या समझ आयेगा कि घोषणा पत्र भी कोरा है और आपके चश्में में भी शीशा नहीं है.
गाँधी जी बोले कि रामलाल ऐसा तो मैं सभी पार्टियों के साथ करता आया हूँ मगर तू तो कह रहा था कि यह नई पार्टी है. नये मूल्यों के साथ, नये जमाने की. एक अलग तरह की पार्टी.
अरे बापू, सभी तो एक न एक दिन नये थे. सभी कुछ नया ही करने आये थे. वो तो धीरे धीरे पुराने हो जाते हैं. ये भी हो जायेंगे.  
गाँधी जी रामलाल को देख मुस्कराये. रामलाल उन्हें देख कर एक आँख दबाता है और चल पड़ते हैं गाँधी जी नई धोती पहने. बिना शीशे का चश्मा, एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ से रामलाल का कँधा थामे. पार्टी घोषणा स्थल की ओर. कोशिश बस इतनी सी कि कोई टूटा चश्मा न देख ले.
-समीर लाल ‘समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई १२,२०२० के अंक में:
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