बुधवार, मार्च 25, 2026

चुनना गलियों से कलियों का

 


साधु महाराज - नाम -तिवारी 


स्वास्थ्यवर्धक अंकुरित 


मुस्तैद पुलिसिया ऑन ड्यूटी 


इलाकाबंदी मास्टर 


आज चाय बेच रहे हैं तो क्या?


धर्म का व्यापार 

इधर स्ट्रीट फोटोग्राफी का चलन तेजी से बढ़ा है। दरअसल चलन तो फोटोग्राफी का ही बढ़ गया है। फोन जब से कैमरा हुए हैं, जितने हाथ उतने कैमरे और उतनी ही तस्वीरें। लोग फोन बातचीत के लिए न खरीद कर उसके कैमरे की गुणवत्ता के आधार पर खरीद रहे हैं।

शादी ब्याह हो, जन्म दिन हो, किसी से मिलना हो या अकेले हो- कैमरा मुस्तैदी से तस्वीरें खींचता रहता है। उत्सवों में प्रोफेशनल फोटोग्राफर भी होते हैं मगर जब तक उनके द्वारा खींची तस्वीरें एडिट होकर आती हैं तब तक उन्हीं अवसरों की तस्वीरें सब परिवार और मित्रों द्वारा पहले ही फोन से खींच खींच कर साझा हो चुकी होती हैं अतः कुछ बांटने को बचता ही नहीं। बस समझो खुद को खुश करने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है सोचकर वो फोटोग्राफर वाली तस्वीरें देखी जाती हैं।

खैर बात चल रही थी स्ट्रीट फोटोग्राफी की। जिसे देखो वो ही इस कार्य में जुटा है। गधा खड़ा दिख जाए। कुत्ता बैठा दिख जाए। रिक्शा खींचता इंसान दिख जाए। वजन ढोता मजदूर दिख जाए। चाय बेचता बालक दिख जाए। ड्यूटी बजाता पुलिस वाला – असीमित दायरा है स्ट्रीट फोटोग्राफी का। खींचने के बाद बांटने के भी असीमित सोशल मीडिया के साधन हैं। हर जगह लोग तस्वीरें ठेल रहे हैं और लोग लाइक भी कर रहे हैं। फोन तो सभी के पास हैं और स्ट्रीट पर भी सभी घूम रहे हैं – भीड़ और मजमे की भी कोई कमी नहीं है तो तस्वीर खींचने में भला वक्त ही कितना लगता है। खींची और लगे हाथ सोशल मीडिया पर डाल दी। उद्देश्य – नहीं पता। क्यूँ खींची – नहीं पता। क्यूँ बांटी – नहीं पता। क्यूँ लाइक की – नहीं पता। बस -सब होता जा रहा है बेवजह। वैसे भी आज के जीवन में अधिकतर चीजें क्यूँ हो रही हैं – नहीं पता। क्यूँ फोन से चिपके हो? क्यूँ रील देख रहे हो? क्यूँ चुनाव में वोट दे रहे हो? क्यूँ एक दूसरे मजहब से नफरत कर रहे हो? नहीं पता!!

मेरी नजरों में स्ट्रीट फोटोग्राफी का सार होना चाहिए गलियों से कलियाँ चुनना। वजह यह बताने की हो कि तस्वीर क्या कहानी कह रही है?

मुझे एक साधु दिखे – बातचीत हुई। नाम बताया तिवारी। मैंने पूछा कि तिवारी तो सरनेम हुआ, नाम क्या है? वो कहने लगे कि गाँव से परेशान होकर जब विंध्याचल आए थे तो एक बाबा की शरण में रहने लगे थे, वो ही तिवारी पुकारने लगे तो तिवारी हो गए वरना तो एक दलित परिवार से आते हैं। रामसुख नाम है। गाँव में गरीबी की मार थी और पढे लिखे कुछ थे नहीं तो यहाँ आकर साधु हो गए। गुरु ने तिवारी नाम दे दिया और अब दान दक्षिणा से बढ़िया गुजारा चल रहा है। मंदिर के पास ही रहते हैं। सुबह से तैयार होकर दिन भर यहीं घूमते हैं। मंदिर आए दर्शनार्थी दान दक्षिणा दे जाते हैं और बदले में यह आशीर्वाद दे देते हैं। चेहरे पर थोड़े न लिखा है कि ब्राह्मण नहीं है और तिवारी नाम से भी आशीर्वाद देने की मुहर लगी ही है।

एक अंकुरित बेचता ठेला दिखा। बताया कि अंकुरित खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहता है अतः एक सज्जन समोसा खा लेने के बाद भी एक दोना अंकुरित खाने से नहीं चूके ताकि स्वास्थ्य अच्छा रहे। वहीं कुछ नवयुवा एक पैकेट में उसकी अंकुरित चाट बनवा कर चखने के लिए लेते गए। बता रहे थे कि शाम को ठंडी बियर के साथ इस चाट का अलग ही आनंद है। देवी दर्शन को आए हैं अतः आज नॉनवेज नहीं खाएंगे।

एक पुलिस वाला फोन पर बात करने में मगन आधी नींद में मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी बजा रहा था उसे देख कर लगा कि वो निश्चिंत है अगर कुछ गड़बड़ हुआ तो देवी माँ सब संभाल लेंगी। इसी आस्था पर पूरा देश चल रहा है तो उसे तो बस एक पुलिस चौकी की जिम्मेदारी निभानी है। वहीं एक स्वान अपने इलाके में शांत भाव से खड़ा प्रसाद प्राप्त करने का इंतजार कर रहा था। उसे तब तक कोई परेशानी नहीं थी जब तक कोई दूसरा कुत्ता उसके इलाके में न आ जाए। देखकर लगा कि काफी समय से प्रांगण में है और खासा दबदबा बना लिया है क्योंकि कोई और कुत्ता उसके इलाके में आने की हिम्मत करता दिखा नहीं। इलाका बंदी के सबके अपने तरीके होते हैं।

बाकी तो आज के समय में चाय वाले को आप कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? उसकी तो फोटो बनती है – कौन जाने कल को दिल्ली में नजर आए। उसी के आस पास धर्म के नाम पर बिकती पूजा सामग्री की दुकान – अपने आप में एक पूरी इंडस्ट्री और वहीं से संचालित पैसा लेकर जल्दी अलग से दर्शन करवा देने का व्यापार – वो भी अपने आप में एक पूरी कहानी कहता नजर आया। पैसा और पॉवर जो न करवा दे फिर यहाँ तो मात्र देवी दर्शन की बात थी।  

बस!! उस रोज तो गलियों से कलियाँ चुनने में यही कुछ हासिल रहा तो तस्वीरें लगा दे रहे हैं बाकी तो कहानियां ही कहानियाँ फैली हैं हर गली में - कितनी तस्वीरें ली जाए उनकी, कम ही है। लेते रहेंगे आगे भी – क्योंकि हमारे पास फोन भी है, गलियां भी हैं और पता हमें भी नहीं है कि आखिर कहानी सुना क्यूँ रहे हैं। मगर कहानी सुनाने की आदत है तो सुनाते रहेंगे।  

   

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