शनिवार, दिसंबर 30, 2006

आपके लिये..

नूतन वर्षाभिनन्दन : दो मुक्तक

-१-

रोशन राहें दूर तलक हैं, मंजिल तक अब जाना है
नये साल में आशाओं का, फिर से खुला खजाना है
अब तक जो भी सीखा तुमने, उसको नींव बना लेना
आने वाले साल मे उसपर, तुमको महल बनाना है.

-२-

खुशहाली हो साथ तुम्हारे, सफल हो साधना तेरी
ईश कृपा हो तुझ पर हर पल, यही अराधना मेरी.
पूरे हों वो स्वपन सभी जो, अब तक तुमने देखे हैं
मंगलमय हो साल तुम्हारा, यही है कामना मेरी.

--नव वर्ष की ढ़ेरों मंगलकामनाओं के साथ

--समीर लाल 'समीर'

हैलो , हैलो, मैं सुंदर चिडिया हूँ...

//भावनाओं में बहकर लेख कुछ ज्यादा लंबा हो गया है कृप्या क्षमा करें//

मम्मी-पापा दोनों आये थे. मई २००४ की बात है. चार महिने मेरे पास रहे. पता ही नहीं चला, कब आये और कब वापस जाने का समय आ गया. बहुत घूमें थे हम सब. कनाड़ा और अमेरीका के अनेकों शहरों में.सितम्बर में जाने से पहले मम्मी एक तोता (बज्जी) खरीद कर मुझे तोहफे में दे गयीं थी. दुकान वाले ने बताया था कि लड़की है तो नामकरण हुआ ऐना. बहुत जल्दी सब से हिल मिल गई. मम्मी के साथ तो दस दिन ही रही और फिर मम्मी पापा भारत लौट गये.वही मेरी और ऐना की आखिरी मुलाकात थी मम्मी से. फिर मेरी पत्नी दो माह बाद ही भारत गई और जिस दिन वह लौटी, मम्मी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. खैर, मेरी बदनसीबी, मैं तो उनकी अंतिम क्रिया के बाद पहूँचा.

इस बीच, पत्नी जब भारत गई थी, तब ऐना की देख रेख की सारी जिम्मेदारी मेरी उपर आ गई. बहुत जल्दी उसने सब सिखना शुरु कर दिया था. उसके मन से इंसानों का डर भी खत्म हो गया था. उसका पिंजड़ा हमेशा खुला रहता था. जब तक मन हो बाहर खेले और फिर अपने आप ही अंदर चली जाती थी. अब तो हम उससे डर कर चलते थे कि कहीं पैर के नीचे न दब जाये मगर उसे हम पर विश्वास था और वह स्वछंद यहाँ वहाँ घुमती थी. काश, हम इंसान भी एक दूसरे पर ऐसा ही भरोसा कर पाते. उसे अपना घंटी लगा खिलौना बहुत पसंद था, हमेशा उससे खेलती. अगर उसे अलग करके दूसरा खिलौना टांग दें तो चीं चीं करके लड़ने लग जाती थी. उसी खिलौने से उसने मुँह से घंटी बजाना सीख लिया था. दिन भर बैठे मुँह से घंटी बजाती रहती. कोई बड़ा ज्ञानी ही जान सकता था कि सच में घंटी बज रही है कि ऐना आवाज निकाल रही है. धीरे धीरे उसके पास ढ़ेरों खिलौनों का आंबार लग गया मगर घंटी वाले खिलौने का मोह उसने कभी नहीं छोड़ा. आज सोचता हूँ तो लगता है हर एक की जिंदगी में एक न एक प्रिय खिलौना जरुर आता है जिसका मोह जिंदगी भर नहीं छूटता, भले आप उससे खेल ना पाये मगर याद रहता है. जैसे हमारे पंकज भाई को उनका पहिये वाला प्लास्टिक का लाल हाथी आज भी याद है. जबकि अब वो २७ साल के हो चले हैं.

उसके आवाज सीख लेने की काबिलयत से प्रभावित हो, मैं उसके लिये एक शीशा खरीद लाया जिसमें आवाज भरने की सुविधा है और जब भी ऐना उसके सामने जाये तो वो बोलता था. मैने उसमें अपनी आवाज में रिकार्ड किया-हैलो , हैलो, मैं सुंदर चिडिया हूँ. ऐना ने बहुत कोशिश की, मगर कभी भी मेरी आवाज कॉपी नहीं कर पाई. लगता है, अपनी आवाज में ही कुछ डिफेक्ट है वरना तो वो घंटी की आवाज सीख ही गई थी.

रात में हमेशा झूले पर चढ़ कर सोती थी. बाकि सारे दिन झूला देखती भी नहीं थी. जब भी घर में किसी को देखती, अपनी खुद की धुन का गाना, चीं चीं आवाज में सुनाती. सोचती थी हमारा दिल बहला रही है, वैसे सच में, बहलाती तो थी. खाने में थोड़ा पिकी थी. हम कोई सा भी लेटेस खा लें, उन्हें फ्रेश रोमन लेटेस (सबसे महंगा) ही खाना है. साधारण वाला लगाकर तो देखो, वो देखे भी न उसकी तरफ. रईसों के बच्चों वाले सारे चोचले पाल लिये थे. हर महिने नया खिलौना, खाने में हाई स्टेन्डर्ड और लड़की थी तो स्वभाविक है, शीशा दिख तो जाये, घंटों खुद को निहारती थी. एक बार शीशा देखे, फिर हमें कि देखो, कितनी सुंदर दिख रही हूँ. सच में बहुत सुंदर थी, दिखने में भी और दिल से भी.

शाम को उसको टीवी देखना बहुत पसंद था, खास कर सिंदूर....., जो ज़ी टीवी पर आता है. उसके टाईटिल गीत में बजते घूंघरु की आवाज पर पूरी तल्लीनता से सुर मिलाकर नाचती थी. हमसे ज्यादा उसे आभास था कि कब आयेगा वो सिरियल. अगर टीवी बंद हो तो हल्ला मचा मचा कर चालू करवा लेती थी और अब देखें, आप ठीक आठ बजे सोती हैं तो उन्हें हल्ला गुल्ला, रोशनी कुछ भी पसंद नहीं. उन्हें उठा कर अलग कमरे में अंधेरा करके, कंबल से पिंजड़ा ढ़को और आवाज न जाये, इसलिये दरवाजा भी लगा दो, तब वो सोयें. वरना मजाल है कि आपको टीवी देखने दे या कोई काम करने दे. गोद में बैठ कर टीवी देखना, खाना खाना आदि उनकी अदायें थीं. नहाने में उसके जैसा खुश होते मैने आज तक किसी मानव को तो नहीं देखा. हर हफ्ते कुद कुद कर बेसिन में नहाती थी, वही उसका बाथिंग टब था. फिर टावेल में लपेट कर उन्हें निकाला जाता था और सुखाया जाता, तब खाना खाकर, उस दिन वो दुपहर में भी सोती.

समय उड़ता चला गया. एक रोज इसको इनकी बेबी सिटर के पास छोड़ने गये कि हम दो दिन को कहीं जा रहे हैं. उसके पास पचास से ज्यादा चिडियां एक वक्त में बेबी सिटिंग को होती हैं और वो चिडियों को प्यार करने वाली जानकार महिला है. उसी ने हमें ऐसी बात बतायी कि हम तो धक से रह गये. इनका गीत सुनकर और अन्य अवलोकन कर उसने बतलाया कि जिसे आप लड़की समझते हैं वो लड़का है. अब लिजिये. खैर हम उसे लड़की ही मानते रहे और न ही कभी उसका नाम बदला.

कुछ समय से हमने महसूस किया कि ऐना कभी कभी उदास हो जाती थी और चुपचाप बैठी रहती थी. हम समझ गये कि अब वो बड़ी हो गई है और उसे साथी की जरुरत महसूस हो रही है. इन सब बातों में हम यूँ भी ढ़ेड समझदार है लेकिन अपने लड़कों के मामले में इसे प्रदर्शीत नहीं होने देते, हालांकि हम समझ वहां भी रहे हैं.

खैर हम ऐना के लिये साथी ले आये. इस बार लड़की परखवा कर लाये, हालांकि कनाडा के हिसाब से कोई सी भी युगलबंदी गाई जा सकती थी, सब जायज होता. मगर यहाँ हमारा भारतीय होना आडे आ गया. नव आगंतुक का नामकरण किन्हीं विशिष्ठ कारणों से किया गया-बोलू. आप भी अगर फुरसतिया जी की तरह सोचेंगे तो समझेंगे कि नामकरण का कारण उसका अत्याधिक बोलना रहा होगा. नहीं भाई, इसकी भी एक दिलचस्प कथा है.



" हमारी ससुराल मिर्ज़ापुर की है. हम गये वहाँ और हमारे ससुर साहब, अब नहीं हैं इस दुनिया में, के मित्र कालिन का धंधा करते थे ,उन्होंने मुझे उनकी फेक्टरी देखने भेजा ,वहां मालिक ने हमारी खातिरदारी की, दामाद जो थे और वो भी विदेश से गये. अपने खास नौकर को न जाने क्या समझा कर हमारे साथ किया. वो हमें गोदाम दिखाने लगा, पहली कालीन दिखाई और कहा कि ई बोलू है हम सोचे कि यह कोई क्वालिटी होती होगी. तब तक दूसरी कार्पेट दिखाई और कहा कि ई रेड है, लाल रंग की थी वो. तब हम यह समझ पाये कि पहले वाली नीली थी इसलिये बोलू ....यह नयी वाली भी नीले रंग की है सो नामकरण हुआ "बोलू". :)


बोलू ने आते ही अपना माहौल जमा लिया, और जैसा कि होता है कि अगर लड़का ज्यादा उम्र तक बिना लड़की के रह जाये तो जब भी लड़की मिल जाये, शादी हो जाये, तो बस गुलामी करने लगता हैं. वो ही ऐना के साथ भी हुआ. सुबह से शाम तक बोलू के पीछे पीछे घुमना, उसे खाना खिलाना, यहाँ तक की ऐना ने अपना झुला भी सोने के लिये उसको दे दिया और खुद नये झुले पर सोने लगी. अपने सारे खिलौने भी उसके नाम. आजकल जैसा होता है, बोलू ने भी इसका खुब फायदा उठाया और खुब ऐश की. सब हथिया लिया और ऐना के हिस्से मे आई हमारी गोद और अपने पिंजड़े का एक कोना. बाकि सब बोलू का हो गया. बोलू हद से उपर व्यवहारिक और व्यवसायिक और ऐना उतनी ही शर्मिली और संस्कारी. बोलू स्ट्रीट स्मार्ट और ऐना, सभ्य पारिवारिक बाला.

आपस में प्रेम तो बहुत था मगर अचानक, शायद, बोलू को चाँद लाने का वादा कर बैठी ऐना ने इतनी ऊँची उड़ान भरी कि प्रेमांध वो छत न देख पाई और टकरा कर गिर पड़ी. फिर ऐना कभी न चल पाई और न उड़ पाई. सब इलाज करा लिये पाँच दिन में. सी टी स्केन से होम्योपेथिक से एंटिबायोटीक...कुछ भी न काम किया.

पांच दिन से डॉक्टर के ऑफिस चक्कर, सी टी स्केन, दुआयें, पूजा पाठ, हमारे प्रिय फुरसतिया जी की मानता, सबने बस इतना ही काम किया कि आज ऐना शांति से ब्रह्म लोक सिधार गई. अब तक तो मम्मी के पास भी पहूँच गई होगी. मगर मम्मी की जिंदा याद, ऐना, हम तुमको नहीं भूल पायेंगे.

तुम्हें सेब पसंद था न!! आंगन में सेब के पेड़ के नीचे ही तुम्हारे पार्थिव शरीर को दफनाया है. अगले बरस जब उसमें सेब आयेंगे, तुम हमें खुब याद आओगी तुम हमारे दिल में हमेशा जिंदा रहोगी. वहां खुब उडना और मम्मी के पास रहना. वैसे तो तुम खुद ही समझदार हो. एक दिन जरुर मिलेंगे फिर.

बोलू भी दुखी है. ऐना तो चली गई मगर शीशा बोलू को देख कर बोल रहा है, "हैलो , हैलो, मैं सुंदर चिडिया हूँ"

अभी बोलू को सोने के लिये अलग कमरे में रख कर आया हूँ, मन भर आया है बिल्कुल वैसे ही, जैसे मम्मी के जाने के बाद पापा को भारत में अकेला छोड़ कर निकला था......

अंत में ऐना की आत्मा को शांति मिले, इस हेतु अनेकों प्रार्थना और उसे नमन और हार्दिक श्रृद्धांजली...तुम हमेशा याद आओगी.





गुरुवार, दिसंबर 28, 2006

हमेशा देर कर देता हूँ मैं..





उर्दु और पंजाबी के मशहूर शायर मुनीर नियाज़ी. कौन जानता था कि मंच से गुंजती यह आवाज़ २६ दिसम्बर, २००६ की रात में दिल का दौरा पड़ने से हमेशा के लिये चुप हो जायेगी. वैसे नियाज़ी साहब साँस की बीमारी से एक अर्से से परेशान थे.


जिंदा रहे तो क्या हैं जो मर जायें हम तो क्या
दुनिया में खामोशी से गुजर जायें हम तो क्या.


उर्दु और पंजाबी की शायरी को मुनीर नियाज़ साहब, जिनका असली नाम मुनीर अहमद था, के निराले अंदाज को सुनकर मुशायरों में आये श्रोता मंत्र मुग्ध हो जाया करते थे. आपका जन्म १९ अप्रेल, १९२८ को होशियारपुर, पंजाब, भारत में हुआ. आपकी प्रारंभिक शिक्षा साहिवाल जिले में और फिर उच्च शिक्षा के लिये आपने दियाल सिंग कॉलेज, लाहौर मे दाखिला लिया.

नियाज़ी साहब बंटवारे के बाद साहिवाल में बस गये थे और सन १९४९ में ‘सात रंग’ नाम मासिक का प्रकाशन शुरु किया. बाद में आप फिल्म जगत से जुड़े और अनेकों फिल्मों में मधुर गीत लिखे. आपका लिखा मशहूर गीत ‘उस बेवफा का शहर है’ फिल्म ‘शहीद ‘ के लिये स्व. नसीम बेगम ने १९६२ में गाया. बकौल शायर इफ़्तिकार आरिफ़, मुनीर साहब उन पांच उर्दु शायरों में से एक हैं, जिनका कई यूरोपियन भाषाओं में खुब अनुवाद किया गया है.

आपको मार्च २००५ में ‘सितार-ए-इम्तियाज’ के सम्मान से नवाज़ा गया.

मुनीर नियाज़ी साहब के ११ उर्दु और ४ पंजाबी संकलन प्रकाशित हैं, जिनमें ‘तेज हवा और फूल’, ‘पहली बात ही आखिरी थी’ और ‘एक दुआ जो मैं भूल गया था’ जैसे मशहूर नाम शामिल हैं.

मुनीर नियाज़ी साहब को श्रृद्धांजली अर्पित करते हुए, उनकी मशहूर रचना पेश करता हूँ:


हमेशा देर कर देता हूँ मैं, हर काम करने में.

जरुरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो,
उसे आवाज देनी हो, उसे वापस बुलाना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..

मदद करनी हो उसकी, यार की ढ़ाढ़स बंधाना हो,
बहुत देहरीना रस्तों पर, किसी से मिलने जाना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..

बदलते मौसमों की सैर में, दिल को लगाना हो,
किसी को याद रखना हो, किसी को भूल जाना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..

किसी को मौत से पहले, किसी गम से बचाना हो,
हकीकत और थी कुछ, उसको जाके ये बताना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..


और मुनीर साहब को आगे सुनें:



फूल थे बादल भी था और वो हंसीं सूरत भी थी
दिल में लेकिन और ही एक शक्ल की हसरत भी थी.

क्या कयामत है मुनीर अब याद भी आते नहीं
वो पुराने आसनां जिनसे हमें उल्फत भी थी.



मैं तो मुनीर आईने में खुद को ताक कर हैरां हुआ
ये चेहरा कुछ और तरह था पहले किसी जमाने में


डर के किसी से छुप जाता है जैसे सांप खजाने में,
ज़र के जोर जिंदा हैं सब खाक के इस वीराने में.
जैसे रस्म अदा करते हों, शहरों की आबादी में,
सुबह को घर से दूर निकल कर, शाम को वापस आने में.



और यह गज़ल देखें:



जिंदा रहे तो क्या हैं जो मर जायें हम तो क्या
दुनिया में खामोशी से गुजर जायें हम तो क्या.

अब कौन मुंतजीर है हमारे लिये वहां,
शाम आ गई है, लौट के हम घर जायें तो क्या.

दिल की खलिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र
दरिया-ए-गम के पार उतर जायें हम तो क्या.


मुनीर साहब को पुनः एक बार नमन और भावभीनी श्रृद्धांजली.

--समीर लाल ‘समीर’

बुधवार, दिसंबर 27, 2006

हजारों ख्वाहिशें ऐसी….

मिर्ज़ा असदुल्ला बेग खान यानि गालिब का आज २७ दिसम्बर को जन्मदिन है. ज्ञात सूत्रों के अनुसार गालिब का जन्म २७ दिसम्बर, १७९७ में आगरा में हुआ था.




चित्र साभार: बोलोजी.कॉम

इसी मौके पर गालिब को याद करते हुये उनके चन्द शेर और गज़ल पेश कर रहा हूँ:

उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है


देखिये पाते हैं, उश्शाक बुतों से क्या फ़ैज़
इक बराह्मन ने कहा है कि ये साल अच्छा है


हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है!


मंज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श के परे होता काश के मकां अपना
हम कहां के दाना थे, किस हुनर में याक्ता थे
बेसबब हुआ "ग़ालिब" दुश्मन आसमां अपना

अर्श: आकाश ; मकां: घर ; दाना: अमीर ; याक्ता: माहिर ; बेसबब: बिना कारण


ये जो हम हिज्र में दीवारो-दर को देखते हैं
कभी सबा को कभी नामाबर को देखते हैं
वो आये घर में हमारे खुदा की कुदरत है
कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं

हिज्र : वियोग , जुदाई ; सबा : हवा ; नामाबर : संदेश पहुंचाने वाला


फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं
फिर वो ही ज़िन्दगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है

बेसबब : बिना कारण ; पर्दादारी : छुपाया जाना


रग़ो में दौडते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है
जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो अब राख जुस्तजु क्या है.

रग़ो में : नसो में ; कायल होना : किसी बात को चाहना ; जुस्तजु :इच्छा

ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है



और अब गालिब की एक गज़ल:-

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले

मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले

हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले

हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले

खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले

कहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले .

-समीर लाल ‘समीर’

मंगलवार, दिसंबर 26, 2006

चिट्ठाकारों के लिये गीता सार

मित्रों, यह बात तो मुझे कहने की जरुरत ही नहीं कि मैं आप सबके लिये कितना विचारता और चिंतित रहता हूँ. :)
जो कुछ भी करता हूँ, पढ़ता हूँ, लिखता हूँ, बस हर वक्त आपका ख्याल रहता है और आजकल तो कुछ ज्यादा ही, पता नहीं क्यूँ. :)
अब देखिये, गीता पढ़ी, सार पढ़ा और आप याद आये, तो आप भी पढ़ें, चन्द पंक्तियों में पूरी गीता का सार:

चिट्ठाकारों के लिये गीता सार

क्यूँ व्यर्थ परेशान होते हो, किससे व्यर्थ डरते हो
कौन तुम्हारा चिट्ठा बंद करा सकता है.
चिट्ठाकार न निकाला जा सकता है और न ही निकलता है
.
(भले ही नाम बदल ले, मगर रहेगा जरुर-यह एक लत है)

कल टिप्पणी नहीं मिली थी, बुरा हुआ.
आज भी कम मिली, बुरा हो रहा है.
कल भी शायद न ही मिले, वो भी बुरा होगा.

व्यस्तता का दौर चल रहा है...
(चुनाव का समय चल रहा है..किसी के पास समय नहीं है)

वैसे भी तुम्हारा क्या गया, कोई पैसा देकर तो लिखवाये नहीं थे, जो तुम रो रहे हो.
वैसे भी बहुत अच्छा तो लिखे नहीं हो, जो दुखी होते हो.
(वरना तो अखबार में छपते, यहाँ क्या कर रहे होते)
तुमने ऐसा लिखा ही क्या था जो पढ़ा जाता.

तुम्हें तो यूनिकोड में लिखना भी नहीं आता था
जो कुछ सीखा, यहीं से सीखा
जो कुछ सीखा, यहीं लिख मारा.

कम्प्यूटर लेकर आये थे, यूनिकोड सीखकर चले
जो आज तुमने सीखा, कल कोई और सिखेगा
(कोई तुम्हारा पेटेंट तो है नही)

जो टूल लिखने को इस्तेमाल करते हो, वो भी तुम्हारा नहीं है .
आज तुम इस्तेमाल कर रहे हो, कल कोई और भी करेगा और परसों कोई और.

ब्लाग का पन्ना भी तुम्हारा नहीं है, या तो ब्लाग स्पाट का है या वर्डप्रेस का
और तुम इसे अपना मान बैठे हो और खुश हो मगन हो रहे हो.

बस यही खुशी तुम्हारे टेंशन का कारण है.

ब्लाग, ब्लागर बीटा से होता हुआ न्ये ब्लागर पर चला गया
तुम्हारा टेम्पलेट चौपट हो गया और अब तुम रो रहे हो.

जिसे तुम बदलाव समझ रहे हो, यह मात्र तुमको तुम्हारी औकात बताने का तरीका है.
जिसे तुम अपना मानते रहे वो तुम्हारा नहीं.

(अब फिर बैठो और टेंम्पलेट ठीक करो, और जो पुरानी टिप्पणियों के नाम गये वो तो ठीक भी नहीं कर सकते)

एक पोस्ट पर ढ़ेरों टिप्पणियां मिल जाती है,
पल भर में तुम अपने को महान साहित्यकार समझने लगते हो.
दूसरी ही पोस्ट की सूनी मांग देख आंख भर आती है और तुम सड़क छाप लेखक बन जाते हो.

टिप्पणियों और तारीफों का ख्याल दिल से निकाल दो,
बस अच्छा लिखते जाओ... फिर देखो-
तुम चिट्ठाजगत के हो और यह चिट्ठाजगत तुम्हारा है.

न यह टिप्पणियां तुम्हारे लिये हैं और न ही तुम इसके काबिल हो

(वरना तो किसी किताब में छपते)
यह मिल गईं तो बहुत अच्छा और न मिलीं तो भी अच्छा है.

कम से कम छप तो जाता है, फिर तुम्हें परेशानी कैसी?

तुम अपने आपको चिट्ठे को समर्पित करो
यही एक मात्र सर्वसिद्ध नियम है

और जो इस नियम को जानता है
वो इन टिप्पणियों, तारीफों और प्रतिपोस्ट की टेंशन से सर्वदा मुक्त है.


-स्वामी समीर लाल 'समीर'

<< कभी कहीं इसी वातावरण की बातचीत साफ्टवेयर इंजिनियरों के बारे में भी पढ़ी थीं, उसी से प्रभावित>>

रविवार, दिसंबर 24, 2006

आज का आह्वान

मित्रों, गुजरे जमाने में जब शहरों मे दंगे घिर आया करते थे, तब जन नायक शांति के लिये आह्वान किया करते थे. गाँधी जी ने दंगे रोकने के लिये व्रत रखा. आज के नेता, इसके ठीक विपरीत, जब बहुत दिनों तक शहर में दंगे नहीं होते तो अनमने से हो जाते हैं. उनका आह्वान देखिये और कृप्या यह जरुर नोट किया जाये कि इसका आगामी सरगर्म चुनाव से कुछ लेना देना नहीं है, हम तो उस बारे में चुप हैं और न ही कुछ बोलेंगे:

आज का आह्वान

बहुत दिनों से शहर में, कोई दंगा नहीं हुआ
छुपा हुआ इंसानी चेहरा, फिर नंगा नहीं हुआ
अखबारों की सुर्खियों का रंग लगता उड़ गया
कफन की दुकानों में कुछ धंधा नहीं हुआ .

खो रहा है यह शहर, अपनी जमीं पहचान को
जुट रहा हर आदमी बस आज अपने काम को
इस तरह मिट जायेगी जो दहशती फितरत तो फिर
ढूंढता रह जायेगा तू, खुद ही के खोये नाम को.

मंदिर में आरती गूंजें, तो मस्जिद में अजानें
अपने अपने धर्म की राहें सभी यदि आज जानें
मौलवी पंडित को पूछेगा भला फिर कौन बोलो
भाईयों में शेष हों गर अंश भी रिश्ते पुराने.

चल उठा तलवार फिर से,ढूंढ फिर से कुछ वजह
धर्म का फिर नाम ले तोड़ो इमारत बेवजह
फिर मचे कोहराम और फिर आग उठे हर गली
डूबने पाये शहर का, नाम फिर न इस तरह.

-समीर लाल 'समीर'

शनिवार, दिसंबर 23, 2006

हम अभी भी चुप हैं

यह पोस्ट रिपेयर होने मुन्नु मेकेनिक के यहां गई है. बाद में फिर आयेगी. :)

गुरुवार, दिसंबर 21, 2006

हम कुछ नहीं कहेंगे

भई, हम तो इन चुनाव प्रचारियों से बहुते परेशान हूँ. चैन ही नहीं लेने दे रहे. सुबह से चार चार बार समाचार आ चुके हैं कि आपका घोषणा पत्र नहीं छ्पा. अब कब तक सहते, हम तो डांट दिये कि यार, जब हमें नहीं छापना है तो काहे पीछे पडे़ हो. हम चाहे हारें या जीतें, हमे नहीं पंगे में पड़ना है और न ही कुछ बोलना है.

हमारा सबसे प्रेम है. हम किसी के बारे में कैसे कुछ कह सकते हैं और न ही यहाँ कोई राजनिती हो रही है कि एक दूसरे पर कींचड़ उछालना नितांत आवश्यक हो और इसके बिना सब बेकार. हम तो बिल्कुल नहीं बोलेंगे और न छापेंगे.

हम तो उस नामांकित चिट्ठाकार का न तो नाम लेंगे और न ही उनका नामांकन खारिज करने को हल्ला मचायेंगे जिसने अपने घोषणापत्र में न सिर्फ मदिरा बल्कि भांग और देशी शराब का भी इस्तेमाल किया है और ठाकुरों से वोट मांग कर (हमको जीताय दो ठाकुर!!) जातिवाद को भड़काने जैसे जघन्य अपराध किये है और अपने जजों के साथ की सांठगांठ को, खुले आम उजागर कर लोकतांत्रिक प्रणाली का मजाक उठाया है. हम तो चुप ही रहेंगे, हमें तो सबसे प्रेम है, आप खुद ही देखें:

जजों की चिंता ना करें.... हम इतने तो लायक हैं कि उ लोग हमरा परचा खारीज नहीं ना करेंगे।

हम तो इनका नाम भी नहीं लेंगे.हमारा तो इनके साथ प्रेम भाव है

हम तो उस दूसरे वाले नामांकित चिट्ठाकार का नाम भी नहीं लेंगे जिसे अपना घोषणापत्र लिखने तक का एक बार में टाईम नहीं है और वादे दूनिया भर के कि यह करा दूँगा, वह करा दूँगा. अरे, घोषणापत्र तो एक सिटिंग में लिखो. ये क्या कि बीच में स्कूल चले गये कि अब आकर लिखूँगा. आपके भरोसे सब रहे तो आप तो स्कूल कट लोगे और बाकी अपनी समस्या लिये टपते रहेंगे.

स्कूल जाने का समय हो गया है। अभी और भी है आकर लिखता हूँ …

हमें तो उनके द्वारा लोगों के वोट के लिये सुन्दरियों के दर्शन का प्रलोभन (घोर असंवेधानिक बात, नामांकन खारिज होने का एक पुख्ता आधार) और वोट न देने वालों को कवियों के साथ कमरे में बंद करने देने की धमकी (जान से मार डालने की धमकी पर तो एक बार विचार भी हो सकता है, मगर उससे भी कई गुना बड़े इस अपराध पर तो अगर नामांकन खारिज नहीं हो, तब तो चुनाव प्रणाली ही शक के दायरे में आ जायेगी). और लुभाने के लिये अंग्रेजी शराब और साथ साथ दो गिलास की फोटो लगाकर सांकेतिक प्रलोभन ऐसा दे रहे हैं कि हम तो खुद ही उन्हें वोट देने निकल पड़े थे, बड़ी मुश्किल से रुके. वैसे अपने नाम के साथ पंडित शब्द का प्रयोग भी जातिवाद उकसाने के लिये किया गया है, यह सब जानते है वर्ना शर्मा जी से भी काम चल सकता था. लेकिन हम तो उनका नाम भी नहीं लेंगे.

हमें क्या करना है. हमारे तो उनसे भी प्रेम भाव है, हम तो कुछ नहीं कहेंगे. बिल्कुल चुप रहेंगे और न ही उस तीसरे नामांकित चिट्ठाकार के बारे में कुछ कहेंगे. वो तो हमारा शिष्य है. मगर हम उसका नाम नहीं लेंगे. अपने शिष्यों को भी कोई बदनाम करता है क्या? भले ही उसने हमसे सिखी विधा रुपी अस्त्र से ही हम पर वार किया हो मगर यह उसका अधिकार क्षेत्र है, उससे हमें क्या. हमसे कहे कि गुरुदेव हम आपका चुनाव प्रचार करेंगे और एक पोस्ट लिख रहे हैं. हम प्रेमी स्वभाव के अनुरुप आशिष दे दिये और जब पोस्ट देखते हैं तो शिष्य बाबू अपने नारे लगवा रहे हैं हाईकु में. अब भले ही उसने हमारे पिछवाडे पड़े घुरे से कचरा बीन कर छाप दिया, मगर हमें बुरा नहीं लगा. यही तो होता है जब किसी से प्रेम भाव हो. हालांकि शिष्य ने कोई असंवेधानिक कार्य नहीं किया कि बाकियों की तरह इनका परचा खारिज हो, मगर कचरा पेटी में मुँह मारना भी तो शोभा नहीं देता. अब जो कचरे में गया, गया. उसमें कौन ढ़ूँढ़ता है और जो ढ़ूढ़ता हो वो चुनाव में. न न!! मन खराब सा हुआ जा रहा है. पत्थर मारने तक का मन होता.

अब मन खराब हो या अच्छा, हम तो अपना प्रेमभाव बनायें रखेंगे और बिल्कुल चुप रहेंगे और न ही कुछ छापेंगे.

बाकी के नामांकित चिट्ठाकारों के तो घोषणापत्र तक नहीं आये हैं बाकि तो भगवान मालिक है कि उनका क्या होगा. कहीं लड्डू तो लुटाये नहीं जा रहे कि मुँह बाये खडे रहो, एक आध तो अपने आप आकर गिर जायेगा और जिसकी गरज हो वो खुद आकर इन्हें वोट दे. अब सब तो हम नहीं हो जायेंगे, चलो हम तो अपना वोट इन्हें दे भी देंगे मगर क्या सभी यही करने लगें. क्या सबको अपना चेला समझ कर रखा है कि साहब आ रहे हैं, बिछकर सलाम करो. क्यूँ? अरे बाबू, यही जनता है, इंदिरा गाँधी तक को धूल चटवा चुकी है, तो आप क्या!! और वो भी राजनारायण जैसों के लिये तो हम तो कुछ बेहतर ही हैं.

खैर, हमें तो चुप ही रहना है, बिल्कुल चुप, कुछ भी न तो कहेंगे और न ही छापेंगे और उस पर से घोषणापत्र- वो तो बिल्कुल नहीं. जबकि इनको जीतना था तो घोषणा पत्र में छापते कि:

१.हम चिट्ठाकारों को हिन्दी की अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध करायेंगे, भले ही वो उपलब्ध हो तब भी फिर से करायेंगे.

२.टिप्पणी के लाँग इन द्वार पर मेटल डिटेक्टर लगवायेंगे ताकि कोई टिप्पणी रुपी बम लेकर किसी की पोस्ट में न घुसे.

३.परिचर्चा जैसे पवित्र स्थलों पर जूते पहन कर जाने की मनाही करवायेंगे ताकि इनका गलत इस्तेमाल रुक सके.

४.नारद को चव्यनप्राश और ताकत के लिये रोज दो लिटर दूध, ताकि वो थक थक कर धीरे धीरे काम न करे, बल्कि हम जवानों और युवाओं की तरह सजग रहे.

आदि आदि.

हमें तो कुछ घोषणा करनी नहीं है, न ही कुछ कहना है. बिल्कुल चुप रहेंगे और कुछ छापेंगे भी नहीं. हमारा तो सबसे प्रेम भाव है, हम चाहते हैं, सब जीतें और हमारी शुभकामनायें सबके साथ हैं. एक बार टिप्पणियों के सिवाय यहां बस यह कहना चाहता हूँ कि इन सभी उम्मीदवारों को यदि यह लगे कि कैसे युगपुरुष के दर्शन हो गये जो खुद भी रेस में होकर हमारे जीतने की उम्मीद और अभिलाषा कर रहा है और शुभकामनायें देता घूम रहा है और इस तरह मिली तहे दिली शुभकामनाओं को पाकर अगर आपका दिल भर आया हो, आँखें नम सी लगें या गला रुँध जाये, तो चुनाव से नाम वापस ले लेना. मन हल्का लगेगा. हमें बुरा नहीं लगेगा, प्रेम भाव जो है.

हम तो कुछ नहीं कहेंगे, बिल्कुल चुप रहेंगे और न ही कुछ छापेंगे.


टीप:
कृप्या कोई अन्यथा न ले, यह सिर्फ़ मौज मजे के लिये पोस्ट है और साथ ही जीत सुनिश्चित करने को. किसी को ठेस पहुँचाने को नहीं और न ही दिल दुखाने को. सभी से तो प्रेम भाव है और बाकि तो हम चुप हईये हैं!!! :)

बुधवार, दिसंबर 20, 2006

कबीर दास का चिट्ठाकाल

आज से ६०० वर्ष पूर्व १३९८ एडी मे कबीर दास का जन्म भारत में हुआ. कहा जाता है कि वो १२० वर्ष की उम्र में १५१८ में समाधिस्त हुये. यही भक्तीकाल का शुरुवाती समय माना गया है. व्यवसाय से जुलाहे होते हुये भी, जिस काम का उस वक्त मशीनीकरण नहीं हुआ था और बहुत मेहनत करना होती थी, कबीर दास जी ने चिट्ठाजगत के लिये इतने दोहे लिखे कि इससे हम सबको सबक लेना चाहिये जबकि हम तो दिन भर कम्प्यूटर पर कार्य करते है और कोई शारीरिक परिश्रम भी ज्यादा नहीं करते.

अब जब उस जमाने में कबीर दास ने अपने सारे दोहे हिन्दी चिट्ठाकारों के लिये लिखे, तो हिन्दी चिट्ठाकार तो रहे ही होंगे नहीं तो क्या उन्हें उस समय सपना आया था? इसका अर्थ यह हुआ कि भक्तिकाल में ही चिट्ठाकाल की भी शुरुवात हुई या उससे भी पहले.

वो तो कतिपय चिट्ठा विरोधी ताकतों ने उन्हें सामाजिक कवि का दर्जा दे दिया कि सब समाज के लिये लिखा गया. सही कहा मगर चिट्ठा समाज के लिये कहते तो बिल्कुल सही होता.

अब इतने सारे दोहे चिट्ठाकारों की समझाइश के लिये लिख गये हैं कि सबकी व्याख्या करना तो यहाँ संभव नहीं है, उदाहरण के लिये ७ दोहों की व्याख्या कर दे रहा हूँ. बाकि कुछ और आगे की जायेगी या यदि आप किसी कबीर दास के खास दोहे पर हमारा व्याख्यान चाहते हों तो टिप्पणी के माध्यम से बतायें, हम कर देंगे. समाज सेवा में तो कभी पीछे हटने का सवाल ही नहीं, यह तो आप सबको पता ही है. :)



आग जो लगी समुंद्र में, धुआं न परगट होए
सो जाने जो जरमुआ जाकी लागे होए.


भावार्थ: जब किसी चिट्ठाकार का कम्प्यूटर या इंटरनेट कनेक्शन खराब हो जाता है तो उसके दिल में चिट्ठाजगत से दूर होने पर ऐसी विरह की आग लगती है कि धुँआ भी नहीं उठता. इस बात का दर्द सिर्फ़ वही जान सकता है जो इस तकलीफ से गुजर रहा हो. बाकी लोगों को तो समझ भी नहीं आता कि वो कितना परेशान होगा अपनी छ्पास पीड़ा की कब्जियत को लेकर.


ऐसी वाणी बोलीए, मन का आपा कोए
अपना तन शीतल करे, औरन को सुख होए.


भावार्थ: जब भी कोई पोस्ट या टिप्पणी लिखो तो उसे रात में लिखकर रख लो, सुबह उठकर फिर पढ़ो कि कहीं भावावेश तो कुछ नहीं लिख गये और तब पोस्ट करो. इससे जहाँ दूसरों का सुख मिलेगा, आपको भी काफी शीतलता का अनुभव होगा. और चिट्ठा लेखन का उद्देश्य भी यही है.अन्यथा तो भडभडाहट वाली पोस्टों और टिप्पणियां ने किस किस तरह के तांडव नृत्य इसी चिट्ठाजगत में करवाये हैं.


बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर


भावार्थ: चिट्ठालेखन में कोई उम्र से छोटा बड़ा नही होता. उम्र भले ही ८० साल हो मगर यदि आप अच्छा नहीं लिखेंगे तो न तो कोई पढ़ेगा और न ही टिप्पणी मिलेंगी. तो आपका लिखना भी बेकार, आपका समय जो खराब हुआ सो तो हुआ ही (खैर जब ऐसा लिखोगे तो वो तो कौडी का नहीं होगा) और अगर किसी ने गल्ती से पढ़ लिया तो उसका समय और आपकी छ्बी भी खराब. अतः भले ही उम्र से कम और छोटे हो, मगर अगर अच्छा लिखोगे तो पूछे जाओगे. सिर्फ उम्र में बड़ा होने से कुछ नहीं होता है.


बुरा जो देखण मै चला, बुरा न मिलया कोए
जो मन खोजा आपणा तो मुझसे बुरा न कोए


भावार्थ:यह चिट्ठाजगत बहुत विशाल है. इसमें अगर खराब पोस्ट खोजने निकलोगे तो खोजते रह जाओगे और अंत में पाओगे कि सबसे खराब पोस्ट तो तुम्हारी स्वंय की है और तुम व्यर्थ ही यहां वहां टहलते रहे. बस अपने लिखन को चमकाओ और दूसरों की लेखनी में बुराईयां खोजने मत निकलो. जब तुम बहुत अच्छा लिखने लगोगे तो दूसरी तो उससे कम अच्छी अपने आप हो जायेंगी तो खोजने जाने की क्या जरुरत है.


धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होए
माली सींचे सौ घड़ा, रितु आए फल होए


भावार्थ: इन पंक्तियों मे कवि ने सभी चिट्ठाकारों से धीरज रखने की सलाह दी है. अगर आप किसी वरिष्ठ चिट्ठाकार की पोस्ट पर टिप्पणियां और वाह वाही देखकर अपनी पोस्ट को कमजोर समझें और मन उदास होने लगे कि मुझे क्यूँ नहीं इतनी वाह वाही. तो आपको धीरज धरने को कहा गया है. धीरे धीरे सब होगा, उन्होंने भी महिनों सालों मेहनत की है, कई सौ पोस्ट लिखी है, तब जा कर उनका वट वृक्ष टिप्पणी रुपी फल से लहरा रहा है. आपका भी मौसम आयेगा, फल मिलेगा, मगर सब धीरे धीरे होगा, धीरज धरो.


काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में परलय होएगी, बहूरी करोगे कब.


भावार्थ: यह खास तौर पर इन बातों को ध्यान मे रखकर लिखी गई है जैसे बिना बताये बिजली कई कई दिन तक गायब रहती है या इन्टरनेट कनेक्शन नहीं मिलता. कम्पयूटर सुधारक नहीं मिलते आदि आदि. तो अगर आज सब ठीक चल रहा है, तो आज ही लिखकर पोस्ट कर दो, कल पर मत टालो. क्या पता कल बिजली गायब रुपी, कनेक्शन गायब रुपी या कम्प्यूटर खराब रुपी परलय आ जाये, तो बस पोस्ट धरी की धरी रह जायेगी, फिर कब छापोगे क्या मालूम और नारद की रेटिंग से जाओगे, सो अलग.

चलती चक्की देखकर, दिया कबीरा रोए
दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए


भावार्थ: देखिये, एक दूसरे पर टीका टिप्पणी, परिचर्चा के ज्वलंत मुद्दे, बात के बतंगड बनाने वालों को देखकर कबीर दास रो दिये. झगड़ा दो पाटन के बीच मचा और बाकी भी सब कुद कुद कर एक एक की तरफ हो गये और सब पीस गये. निवेदन है कि कबीर दास जी, जो सब चिट्ठाकारों के लिये इतना कुछ लिख रहे हैं, उन्हें न रुलाया जाये.


तो, अब तो आप मान गये कि और भी दोहे सुनाऊँ. :)


-समीर लाल 'समीर'

मंगलवार, दिसंबर 19, 2006

चुनाव आ गये!!

उत: छोटू, कहाँ जा रहा है. आ, चाय तो पीता जा!
छोटू: क्या बात है, चाचा. आज बड़ी चाय वाय पूछ रहे हो?
उत: अरे, तू भी कैसी बातें कर रहा है. तू तो हमारा खास है, तुझको चाय नहीं पूछेंगे तो और किसे.
छोटू: नहीं चाचा, कोई तो बात है!!
उत: अरे, कोई खास नहीं. अच्छा, यह बता कि तूने सुना क्या कि तरकश पर क्या हो रहा है?
छोटू: नहीं तो!
उत: अरे, वो वहाँ पर “२००६ का हिन्दी चिट्ठाकार” का चुनाव करा रहे हैं. उसके लिये सबको दो-दो ऐसे चिट्टाकारों का नामिनेट करना है, जिन्होंने २००६ में अपना चिट्ठा लिखना शुरु किया है.
छोटू: यह तो बहुत बढ़िया काम हो रहा है, यहाँ भी चुनाव. मगर इससे आपको क्या लेना देना?
उत: अरे, हम भी तो २००६ में ही लिखना शुरु किये हैं, हमें काहे नही लेना देना.
छोटू: अरे, हम तो समझे कि आप पहले से लिखना जानते थे.
उत: देख छोटू, ऐसी बातों पर हमसे मजाक न कर. लिखना तो जानते थे मगर चिट्ठा तो २००६ में ही न शुरु किये हैं.
छोटू: चाचा, आँख न दिखाओ. चुनाव का समय है. कोई गाली भी बके तो भी हाथ जोड़कर मुँह पर वो उसकी छोटी बेटी को चिपकाये रहो.
उत: अबे, क्या बकता है, किसकी छोटी बेटी?
छोटू: क्या चाचा, कितना गलत सोचने लगते हो? उ फुरसतिया जी बताये थे न, हँसी की छोटी बेटी मुस्कान है, यह अलग बात है कि उसमें हँसी से भी ज्यादा जान है. वही वाली का ख्याल आ गया.
उत: अच्छा,अच्छा. ऐसा ही करेंगे. और सबके दरवाजे जा जा कर टिप्पणियां डाल डालकर अपनी याद दिलायेंगे ताकि कोई भूले न!!
छोटू: मगर यह बात आपको पता कैसे चली कि तरकश पर चुनाव हो रहे हैं?
उत: अरे, वो अपना पंकजवा है, उसी का चिट्ठा मन्तव्य पर नोटिस सांटा गया है. वहीं पढ़्कर आ रहे हैं.
छोटू: तो वहीं टिप्पणी डालकर नामिनेशन कर आयें का!
उत: अरे नहीं भाई, तेरी बुद्धि भी तेरे नाम के जैसी ही है. वहां कोई कैसे नामिनेट कर सकता है, सबको पता नहीं चल जायेगा और सिर्फ दो को करना है तो बाकी मुँह फुलायेंगे तुमसे कि हमें काहे नहीं किये. ऐसे में ईमेल contact@tarakash.com का फायदा समझ में आया कि सबसे कह देंगे कि बस तुमको ही किये हैं.
छोटू: चाचा, मतलब सबको गोली दोगे. और दो कि जगह कहीं उ तीन साथ साथ बैठ कर बात कर लिये तो तीनों ही कहेंगे कि चाचा हमको नामिनेट किये हैं, तब.
उत: अरे, कभी दो चिट्ठाकार, वो भी हिन्दी के, आपस में नहीं मिलते तो तू भी तीन की लगाये है. तीन अगर मिल भी गये तो आपस के ही इतने झगडे हैं कि वहाँ नामिनेशन वाली बात उठे, इसका कहाँ समय होगा.
छोटू: चाचा, आप भी न! हो बहुते दूर की कौडी.
उत: तो चल, तू शुरु कर नामिनेशन भरना.
छोटू: कैसे भरना है, चाचा?
उत: बस, इतना सा तो भरना है-


“ मैं, …….., मेरा चिट्ठा, ………., निम्न लिखीत चिट्ठों को '२००६ के हिन्दी चिट्ठाकार' के लिये नामिनेट करता हूँ:

१. उड़न तश्तरी (समीर लाल)
२. ………………….”


बस, और भेज दो.

छोटू: मगर नम्बर दो पर किसी का नाम ही नहीं है?
उत: अबे, यह तो फार्म है, इसी को तो भरना है. खाली स्थान भरो, और भेज दो.
छोटू: आपका नाम तो पहले से ही छपा है, फार्म में. तो सिर्फ़ नम्बर दो वाला भरना है, क्या?
उत: तू भी छोटू, प्रश्न बहुत करता है. इतना ही जो सोचना था तो चाय किस बात की पी?
छोटू: अरे, चाचा, मैं तो मजाक कर रहा था और आपने अन्यथा ले लिया.
उत: मजाक कर रहा था तो बात के बाद में स्माईली क्यूँ नहीं लगाया.
छोटू: आगे से ध्यान रखूँगा, चाचा. अभी जाकर साईबर कैफ़े से इसे भेज देता हूँ.
उत: ठीक है, छोटू. जल्दी जा. २२ तारीख आखिरी तारीख है नामिनेशन की. और हाँ, उ जो ईमेल करेगा न, उसकी जरा BCC मुझे भी कर देना.
छोटू: क्या चाचा, इतना भी भरोसा नहीं क्या, भतीजे पर.
उत (मुस्कुराते हुये): अरे नहीं छोटू, तुझ पर तो पूरा भरोसा है, मगर जमाना खराब है.

चलते-चलते:
समस्त चिट्ठाकारों के हितार्थ मैने उपर दिया फार्म कॉपी लेफ्ट कर दिया है. आप लोग इसे यहाँ से कॉपी कर खाली स्थान भरने के बाद कृप्या इस पते पर प्रेषित करें: contact@tarakash.com

:)

रविवार, दिसंबर 17, 2006

कृप्या अन्यथा न लें

सन २००६ तो अब बीता ही समझो. बड़ा ऐतिहासिक वर्ष रहा हमारे लिये. इसी वर्ष हमारी उड़न तश्तरी ने चिट्ठा जगत में प्रवेश किया और अन्य चिट्ठाकारों का असीम स्नेह भी पाया. इतने कम समय में ऐसा लगने लगा कि न जाने हम कब से इस हिन्दी चिट्ठा परिवार के सदस्य हैं.

इतने कम समय में ही कितनी नई पहचानें बनीं, कितनी नई मुलाकातें हुई. बहुत ही आन्नदकारी रहा यह अबतक का सफर. इस बीच काफी नियम सीखे, काफी नियम बदलते देखे और काफी नियम बनते देखे.

अब २००६ को धन्यवाद करने को तो बहुत सारी चीजें है, सब तो लिख पाना संभव नहीं है और २००७ के स्वागत का रोमांच भी है कि न जाने क्या क्या ला रहा है अपनी झोली में भर कर.

वैसे जब २००६ पर चिट्ठा जगत के नजरिये से नजर डालता हूँ तो पाता हूँ कैसे हमने पोस्ट लिखना सीखा और कैसे लोगों ने हमारा लिखा पढ़ना सीखा. कैसे हमने औरों के लिखे पर टिप्प्णियां करना सीखा और कैसे लोगों ने हमारे लिखे पर. देखते देखते टिप्प्णियों के तरीके में भी बदलाव देखे. कुछ नये रिवाज भी देखें. कुछ टिप्पणियों को पोस्टों में बदलते देखा तो कुछ पोस्ट रुपी टिप्पणियां देखीं. कुछ पोस्टों पर पंगे होते देखे तो कुछ टिप्पणियों पर दंगे होते देखे. कहीं दिखीं ज्ञान की बातें तो कहीं हास्य और फिर कहीं गीत संगीत. सब देखा, देख रहा हूँ और लगता है कि देखता रहूँगा. लोगों को खुश होते देखा, दम देते देखा और गम पीते देखा. किसी की भविष्यवाणियां की और इसी बहाने अपना वर्तमान सुरक्षित करने का प्रयास किया, कभी टिप्पणी के तरीके बखाने, कुछ विधायें सीखीं तो कुछ सिखायी. कभी चित्रों के माध्यम से बादलों के उस पार गये, उत्तरांचल घुमे फिर कभी खंडहरी किलों में, तो कभी इस पार पचमढ़ी फिर अहमदाबाद फिर गुजरात का डैम और कभी गयाना और न जाने कहाँ कहाँ. इतना सब कुछ बस अपने लेपटाप के सामने बैठे बैठे होता चला गया, एक अजूबा सा लगता है.

कितने जाने अनजानों के बारे में जाना, कितना साहित्य के बारे में जाना. कभी तकनिकी के बारे में, कभी देश विदेश की जानकारी, कभी पुराणों में तो कभी गीता-रामायण में. कभी दंगा प्रधान शहर का और कभी पंगा प्रधान परिवेश का ब्यौरा. कभी जाना कि गीत और गीत का अर्थ क्या होता है तो कभी जाना कि आवारा भीड़ का खतरा क्या होता है. किसी ने बताया कि लड़कियां क्या चाहें तो कोई बता गया कि भैंस के पेट में दर्द क्यूँ होता है. कितने कवि सम्मेलन सुनें, कितनों में बुलाये गये और कितनों में बुलाये जाने की आस लगाये घर में बैठे रहे. न जाने कितने चिट्ठे नये खुले, कितने खुलते ही बंद हो गये, कुछ दम खा कर और कुछ बिना कुछ खाये बंद कर गये तो कुछ ने स्थान बदल लिये. कितने चिट्ठों पर चर्चा हुई और कितनी चर्चा चिट्ठों पर हुई. अथाह सागर में गोते लगा रहे हों जैसे और बस, लगाते ही चले जा रहे हैं.

इसी जगत में अभी अभी एक नया फैशन आया-बुरा मानने का. मगर जैसे ही कोई नया फैशन आता है, नये नये परिवेश और उनकी काट भी तुरंत निकाल लेते हैं हम सब. तो इस नये फैशन के साथ भी नये तरीके दिख रहे हैं. लोग कुछ कहना भी चाह रहें हैं, कह भी रहे हैं और पहले से बढ़ चढ़ कर कह रहे हैं. सहनशीलता नये समय के साथ साथ खत्म होती जा रही है. कतिपय लोग एक दूसरे की टांगे खींच रहे हैं गोया चिट्ठा लेखक, लेखक नहीं कोई सांसद हों. जो उर्जा सार्थक लेखन में लगना चाहिये, वही उर्जा समय के साथ साथ एक दूसरे की खिंचाई में और परनिंदा की गंदी नाली में बहने लगी है और अनेकों उस नाली में कुद कर छपाक छपाक स्नान का आन्नद ले रहे हैं. वैसे तो खिंचाई मौज मजे में, सदभावनापूर्वक करना एक स्वस्थ परंपरा है और मनोरंजक और आन्नददायक भी मगर व्यक्तिगत आक्षेप और द्वेषवश की गई खिंचाई देखकर क्षोब भी होता है और खेद भी.

ऐसे ही माहौल में कुछ और तरीके दिखे कि कुछ भी कहना हो, कह जाओ, सोचो मत और अपना लिखा कथन दुबारा मत पढ़ों. भूल जाओ कि सामने वाले को अच्छा लगेगा कि बुरा. या जो आप कहना चाह रहे हैं वो वाकई आपके शब्द भी कह रह हैं कि नहीं. बस शुरुवात कुछ यूँ करो कि कृप्या अन्यथा न लें और शुरु हो जाओ जो कहना है कि आप बेवकूफ हैं, नालायक है.. और जब बात खत्म करो तो एक स्माईली लगा दो ताकि सनद रहे और बात बढ़े तो आप कह सकें कि मै मजाक कर रहा था, वो देखो स्माईली. यह स्माईली दिखने में जरुर छुटकु सा है मगर मौके पर बजरंगी पहलवान से ज्यादा जबरी और बेहतरीन अंग और चरित्र रक्षक. मुफ्त में अंतरजाल पर उपलब्ध अनेंकों जुगाड़ों का बेताज बादशाह.

आने वाले साल २००७ में तो हमेशा ख्याल रखना होगा और टिप्पणियों का स्वरुप शायद और भी बदले मगर अभी तो कुछ इस तरह का आसार लगता है:

-कृप्या अन्यथा न लें मगर आपकी कविता बहुत अच्छी लगी. :)

-कृप्या अन्यथा न लें मगर आप क्या वाहियात बात करते हैं, बेवकूफी भरी। आशा है आप बुरा नहीं मानेंगे। :)


आदि आदि...यानि तारीफ में भी और गरियाने में भी, हर जगह -कृप्या अन्यथा न लें का प्रयोग संस्कारों का हिस्सा बन जायेगा. क्या मालूम कब कौन किस बात का बुरा मान जाये. आपकी कौन सी सिरियस बात को मजाक और मजाक को सिरियसली ले लिया जाये. समय बदल रहा है, आप जिसे रोता हुआ समझ रहे हैं दरअसल वो हंस रहा है और जिसे आप हंसता देख रहे हैं वो रो रहा है और जो चुपचाप बैठा है उसका तो क्या-क्या मालूम हंस दे कि रो दे या यूँ ही तटस्थ बना रहे. वैसे तो श्यूर शाट पंगे वाली टिप्पणी में एक से ज्यादा स्माईली लगाने का प्रचलन भी है.


खैर, अब यह सब यहीं छोडें और २००६ को खुशी खुशी एक और वर्षीय अनुभव के खिताब के रुप में अपनी कमीज पर टांक लें और स्वागत की तैयारी करें २००७ की.

यह सब तो नियम है, सब परिवर्तनशील है. समय के साथ आ रहे बदलावों को न हम रोक सकते हैं न आप. बस साक्षी बने इनका स्वरुप देखते रहें और अपने आपको इनके अनुरुप ढ़ालते चलें.

चलते-चलते:
"कृप्या अन्यथा न लें मगर हम तो सोच रहे हैं कि २००७ में हर बार दो टिप्पणी किया करेंगे. एक तो तारीफ वाली और दुसरी एक दम सही सही-अब अगर पंगा हुआ, तो दूसरी से मुकर जायेंगे कि ये कोई और कर गया हमारे नाम से. और बता दें यह तरीका कोई हमने नहीं ईज़ाद किया है, यह दूसरी टिप्पणी का प्रचलन हमने इसी २००६ में कहीं कहीं देखा है, अब याद नहीं आ रहा- कहाँ- कहाँ? :) :)"

कोई बुरा मत मानना भाई, वो देखो, कोने में दो दो स्माईली!!!

वैसे मुझे मालूम है कि कुछ लोगों के साथ वाकई में कोई दूसरा चोरी से टिप्पणी कर गया मगर पुलिस वालों को भी तो चोरों से नये नये रास्ते पता चलते हैं, वरना उन बेचारे नादानों को क्या आता है!! :)

बुधवार, दिसंबर 13, 2006

वाशिंगटन में उड़न तश्तरी भाग ३

वाशिंगटन में राजधानी मंदिर के सभाग्रह में हिन्दी समिति और राजधानी मंदिर के संयुक्त तत्वाधान में शनिवार तारीख ९ दिसम्बर को कवि सम्मेलन का भाग ३:

मित्रों के आग्रह पर अपलोड की समस्या को देखते हुये विडियो हटा कर लिंक दिया जा रहा है:

श्रीमती बीना टोडी जी:

यहां क्लिक करें

या

इसे कट पेस्ट करें:

http://www.youtube.com/watch?v=_3JWLE8uQhA

समीर लाल द्वितीय चक्र में:

यहां क्लिक करें

या

इसे कट पेस्ट करें:

http://www.youtube.com/watch?v=r_2UccfVcmE

वाशिंगटन में उड़न तश्तरी भाग २

वाशिंगटन में राजधानी मंदिर के सभाग्रह में हिन्दी समिति और राजधानी मंदिर के संयुक्त तत्वाधान में शनिवार तारीख ९ दिसम्बर को कवि सम्मेलन का भाग २:

मित्रों के आग्रह पर विडियो हटा रहा हूँ, अपलोड में टाईम ले रहा है, उसकी जगह लिंक दे रहा हूँ:


राकेश खंडेलवाल जी का काव्य पाठ:

यहां क्लिक करिये

या

इसे कट पेस्ट करें:

http://www.youtube.com/watch?v=qEkteH9lgV4

डॉ अबदुल्ला जी:

यहां क्लिक करें

या

इसे कट पेस्ट करें:

http://www.youtube.com/watch?v=yAcu6N5FpWA

वाशिंगटन में उड़न तश्तरी भाग १

वाशिंगटन में राजधानी मंदिर के सभाग्रह में हिन्दी समिति और राजधानी मंदिर के संयुक्त तत्वाधान में शनिवार तारीख ९ दिसम्बर को कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया. कवि सम्मेलन में जिन कवियों ने शिरकत की, उनके नाम:

विद्या पुरोहित,जयगोपाल गुप्ता,सतीश कुमार,विशाखा ठाकर, अब्दुल्लाजी,बीना टोडी, मधु माहेश्वरी,गुलशन मधुर, धनंजय कुमार,कुसुम रस्तोगी, मोना गुलाटी, समीर लाल और राकेश खंडेलवाल.


शाम पौने सात बजे से प्रारंभ होकर कार्यक्रम रात साढ़े ग्यारह बजे तक चला. कार्यक्रम का शुभारंभ समीर लाल ने गणेश जी की प्रतिमा के सम्मुख दीप प्रज्जवलित कर किया. सम्मेलन का संचालन श्री राकेश खंडेलवाल जी ने और सभापतित्व श्री गुलशन मधुर जी ने किया.

इस सम्मेलन के कुछ हिस्से मैं यू ट्यूब के माध्यम से यहां पेश कर रहा हूँ तथा फोटो के लिये फ़्लिकर पर एलबम बना दी है. इसका स्लाइड शो देखने के लिये नीचे तस्वीर पर क्लिक करें.






यू ट्यूब दो भाग यहाँ दे रहा हूँ, बाकी चार भाग दो पोस्टों के माध्यम से भाग २ और ३ में.

यहाँ देखें:

मित्रों के आग्रह पर विडियो के लिंक डाल रहा हूँ क्योंकि विडियो अपलोड होने मे टाईम लग रहा है:

समीर लाल का काव्य पाठ:

यहां क्लिक करें.

या

http://www.youtube.com/watch?v=_4673qhM6MI


समीर लाल भाग २:

यहां क्लिक करें

या

http://www.youtube.com/watch?v=horkJO6vbkk

सोमवार, दिसंबर 04, 2006

इक धुँआ धुँआ सा चेहरा

ओबेद उल्लाह अलीम को सुनता था कभी...गजब की शक्सीयत है। ऐसा खोया कि खोता ही चला गया और खो गया कुछ पुरानी यादों में। अब पुरानी यादें हैं तो कहानियाँ क्यूंकि हम भी अपने समय में एक चीज हुआ करता थे...अब यह अभी के रिसेन्ट नौजवानों को न भी समझ आये तो कोई रंज नहीं क्योंकि यह हम जैसे उन नौजवानों की कथा है जो जवानी में अनुभव प्राप्त कर चुके हैं और फिर भी अभी जवान हैं, बस थोडे से उम्र से ढीले...या गीले..:)..हालाँकि बारिश तेज है, जल्द ही पूरे गीले होकर बुढापे के कॉरिडोर में खड़े नजर आयेंगे: अब यह एक अलग तरह का दर्शन है, हमारी अन्य रचनाओं से, तो थोड़ा हमारे साथ चलें:

खैर, सुनें, मेरे खोने में उठे डूबे हुये उदगार:


इक धुँआ धुँआ

इक धुँआ धुँआ सा चेहरा
जुल्फों का रंग सुनहरा
वो धुँधली सी कुछ यादें
कर जाती रात सबेरा।

इक धुँआ धुँआ सा चेहरा……

कभी नाम लिया न मेरा
फिर भी रिश्ता है गहरा
नींदों से मुझे जगाता
जो ख्वाब दिखा, इक तेरा।

इक धुँआ धुँआ सा चेहरा……

वहाँ फूल है अब भी खिलते
जिस जगह कभी दिल मिलते
उन्हीं फूलों की वादी में,
अब पाँव लगते फिसलते।

इक धुँआ धुँआ सा चेहरा……

बातें हैं बहुत पुरानी
यूँ लगे की एक कहानी
क्या यादें भी बन जायें,
दरिया का बहता पानी।

इक धुँआ धुँआ सा चेहरा……

--समीर लाल ‘समीर’

मंगलवार, नवंबर 28, 2006

खोया मुसाफिर

मैथली शरण गुप्त ने लिखा है कि राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है। इस पर आपातकाल के दौरान बंद नेताओं के छुटने पर उनकी काव्य प्रतिभा का देश को एकाएक ज्ञान हुआ जिसमें अटल बिहारी बाजपेयी के कवि होने पर हरि शंकर परसाई कहते हैं, कि कारागार निवास स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है। मेरा मानना है कि विदेश प्रवास स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है। तो बस उसी काव्य धारा में, प्रवासी पीड़ा को दर्शाती मेरी यह प्रस्तुति:




बहुत खुश हूँ फिर भी न जाने क्यूँ
ऑखों में एक नमीं सी लगे
मेरी हसरतों के महल के नीचे
खिसकती जमीं सी लगे

सब कुछ तो पा लिया मैने
फिर भी एक कमी सी लगे
मेरे दिल के आइने पर
यादों की कुछ धूल जमीं सी लगे

जिंदा हूँ यह एहसास तो है फिर भी
अपनी धडकन कुछ थमीं सी लगे
खुद से नाराज होता हूँ जब भी
जिंदगी मुझे अजनबी सी लगे

कुछ चिराग जलाने होंगे दिन मे
सूरज की रोशनी अब कुछ कम सी लगे
चलो उस पार चलते हैं
जहॉ की हवा कुछ अपनी सी लगे.

--समीर लाल 'समीर'

शनिवार, नवंबर 25, 2006

बर्थ-डे बेबी के श्रीमुख से.....

आज तरकश के तीर या यूँ कहें, तरकश के खोल(इसी में तो सारे तीर थमें हैं) का जन्म दिन है. सोचा था, इस शुभ दिन पर इनकी कुछ बर्थ-डे बम्पिंग की जायेगी. रवि कामदार ने दोस्ती का यह फर्ज हमसे पहले ही कूद कर निभा दिया, लोकल है भाई. हम तो हर मौकों पर देर से ही पहूँच पाते हैं. फिर सोचा, चलो केक कटवायेंगे, तो वो भी सागर भाई निपटा गये. अब हम क्या करें, सोचा, इस स्वपन देखने वाले बालक की भविष्य की योजनाओं पर ही कुछ लिखें, तो तब तक ये खुद ही वो भी लिख मारे और हम फिर कलम कागज लेकर बैठे रह गये. फिर हमने सोचा, समय समय पर अपने बडे भाई संजय के भक्त बालक पंकज से हुई बातचीत को ही उनकी आत्मकथा का रुप में पेश कर देते है, बिना कोई कैंची चलाये...वाकई, एक भी बोल, जैसे पंकज के श्रीमुख से निकले, नहीं बदले, बस एक गठरी में बाँधे और आप के लिये ले आये हैं:

चेतावनी: थोड़ा रुमाल वगैरह साथ में लेकर बैठियेगा.कभी आँख भर आयी तो काम आयेगा और कभी हंसी आयेगी, तो भी रुमाल से मुँह दबाकर रोक सकते है. नींद आ जाये तो उससे मुँह ढककर सो जायें!!





बचपन में 6 साल तक बिदासर नामक कस्बे में रहता था जो राजस्थान में है। मुझे बचपन की धुन्धली धुन्धली तस्वीरें याद हैं। पापा तब कोलकाता में व्यवसाय करते थे और गाँव में मै माँ, दादी और भैया के साथ रहता था।

मैं बहुत ही शरारती था और कामचोर भी था। भैया को मैने जितना परेशान किया है शायद ही किसी को किया होगा। और भैया शुरू से ही मेरा इतना ध्यान रखते आए हैं कि क्या कहुँ। मुझे याद है इतना बडा हो गया था फिर भी भैया की पीठ पर ही सवारी करता था चाहे कहीं भी जाना हो। कभी पैदल नहीं चलता था। कई बार भैया को उल्लु भी बनाता था और उनको वचन देता था कि बाज़ार में पैदल चलुंगा पर फिर बाज़ार आते ही अड जाता था कि अब मुझे गोदी लो। भैया बेचारे फिर मुझे लादकर चलते थे। मैं था भी गोलमटोल मोटा ताजा। आज जैसा नही था।

एक बार तो भैया गिर पडे मैरे बोझ से और उनके घुटने छिल गए। आज शर्म आती है मुझे पर उस वक्त तो बडा बेशर्म था क्योंकि उसके बाद भी बाकी का रास्ता भैया पर लदकर ही पुरा किया था। :)

मेरे जीन में फिल्म और विज्ञापन है। छोटा था ना तब से अन्दर का कीडा कुलबुलाने लगा था।

तब तो गाँव में सिनेमा क्या टीवी भी नहीं थी। शायद बिजली ही नही थी। पर मेरा दिमाग फिर भी कैमरा एंगल की तरह से सोचता था।

मैरे पास प्लास्टीक का लाल रंग का हाथी था पहिए वाला। मुझे बडा प्यारा था। मैं रेत के टीले बनाता फिर उसपर से उसको चलाता। कभी एक आँख बन्द करके देखता। फिर दुसरी फिर जो एंगल अच्छा लगता उससे देखता। :)

माँ को भी बहुत परेशान करता था। हमारे यहाँ पक्का शौच नही था। सुबह में मैरे घर के बाहर खुल्ली जगह में पैखाने से लक्ष्मण रेखा बनाता था, और माँ को सब साफ करना पडता था।

भैया की चित्रकारी की पदर्शनी गाँव की दिवारों पर देखने को मिलती थी और मैं कोयले से बनाई उनकी कलाकृतियों की समिक्षा करता था।

फिर हम सब सूरत आ गए। यहाँ भी बचपन से ही बहुत एक्सेपेरीमेंट किया करता था, स्कूल में भी घर में भी।
एक अलमारी के नीचे गत्ते लगाकर पुरा अन्धेरा करता फिर अलमारी के नीचे एकदम अन्दर सफेद काग़ज लगाता। फिर फिल्मों की छोटी रील के टुकडे ( जो हम कहीं से लाते थे ) की सीरीज बनाता और टार्च से प्रोजेक्शन करता। निर्देशक भी मैं, प्रोजेक्टर भी मैं, अल्मारी वाला मल्टीप्लेक्स भी मेरा और दर्शक भी मैं। कभी कभी मेरी छोटी बहन खुशी भी मेरी फिल्मे देखती थी और मुझे यश चोपडा से कम नही समझती थी।

मैं पापा से बहुत डरता था, आज भी डरता हूँ। माँ से कभी नहीं -याद ही नही कभी उन्होने डाण्टा भी हो।

मुझे अस्थमा था, बहुत बुरा अनुभव है वो तो। अस्थमा है भी वैसे तो पर अब दौरा नही पडता। तब तो इन्हेलर का अविष्कार ही नही हुआ था। मै फल नही खा सकता था, चोकलेट नही खा सकता था, तली चिजे नही खा सकता था, कोल्ड ड्रिंक, दूध, वेफर, मावा मिठाई कुछ नही कुछ नही।

संतो की तरह जीया इस मामले में तो। पुरे बचपन में एकाध बार ही चोकलेट चखी। केले का तो स्वाद ही नहीं पता था, दो चार साल पहले ही पता चला। :)

रात को दौरा पडता था, सांस नहीं आता था। पुरी रात बैठा रहता था, जैसे तैसे सांस लेता था।

पता है, मैं हँस भी नही सकता था। क्योंकि बहुत हंस लेता तो शरीर में हवा की मात्रा कम हो जाती और दमे का दौरा पड जाता और मेरी लग जाती। मैं रो भी नही सकता था, क्योंकि रोने से हिचकी बन्ध जाती और दमे का दौरा पड जाता था।

आज वो दिन याद करके रो सकता हुँ। :) क्योंकि अब नही पडता दौरा।

हम जब सूरत आए तो हमारे पास एक सुटकेश ही थी। उसमे कुछ बर्तन और कुछ कपडे थे। बस।
मैने गरीबी को बहुत करीब से देखा है। और सिखा है कि जिन्दगी की भयावहता कैसी होती है। पर माँ ने कभी शिकायत नही की और यह अहसास भी नही होने दिया कि हम अभाव मे हैं।

पापा तो मेरे लिए कुछ भी कर सकते थे। उन्होने मेरी फरमाइश पर घर में टीवी लगाई जब तब की बेंक में टीवी जितने ही पैसे थे। :) (यह बात माँ ने बताई बाद में)

घर में केबल टीवी भी मेरी फरमाइश पर लगा। मैं टीवी पर विज्ञापन देखता था। सिर्फ विज्ञापन। पागलों की तरह।
बस फिर युँही कटती रही...... सूरत से आसाम फिर अब अहमदाबाद।

भविष्य की योजनाएँ:

मुझे छवि को भारत की अग्रणी डिजायन कम्पनी बनाना है। तरकश.कॉम को सबसे लोकप्रिय हिन्दी साइट बनाना है। डिजायन वर्क्स, अपूर्व जिसमें मैं पार्टनर हुँ को भी देखना है।

करीबी मित्र रवि के सारे ड्रीम प्रोजेक्टस जैसे कि गो शोपी, ब्युगल बिजनेस वगैरह की ब्रान्डिग करनी है। जनवरी से हमारी इ-कोमर्स शोपिंग साइट की लोंचिंग करनी है।

फिर भविष्य में मुझे रेस्टोरेंट खोलना है, कोफी शोप खोलनी है। नाम वगैरह सब सोच रखे हैं। :)

और बिल्कुल मुझे फिल्म बनानी है। और टीवी धारावाहिक भी। मैं नागेश कुकुनुर टाइप की फिल्में बनाउंगा। मसाला फिल्मे शायद ना बनाऊँ।

बहुत काम है... आज एक और जन्मदिन आ गया... अभी तो इतने काम पडे हैं।
मै कभी रिटायर नही होने वाला।

भारत के बारे में:

मुझे मेरे देश से बहुत प्यार है। मै इसे छोडकर कभी नही जाउंगा। बल्कि इसे फिर से सोने की चिडीया बनाना है। भारत को शेर बनना है। हमें कायरों की तरह नहीं जीना। हमे दुनिया से लोहा लेना है और पुरी दुनिया को झुकाना है।

मैं सपने बहुत देखता हुँ। रोज देखता हुँ। मुझे यह भी करना है वो भी करना कितना कुछ करना है।

मुझे गुस्सा नही आता, बहुत शांत रहता हुँ। सिर्फ छः बजे के बाद मनमोहन सिह पर गुस्सा आता है।
क्योंकि इन लोगों ने मेरे देश का बंटाढार करके रखा है।

और क्या बताऊँ? मै आपसे बहुत कुछ कहना चाहता हुँ पर कैसे?

बस एक आखिरी बात... हम संघर्ष कर रहे हैं और सारी जिन्दगी करते रहेंगे।

मै हार नही मानने वाला।

//बालक पंकज को जन्म दिन की ढ़ेरों शुभकामनाऐं एवं बहुत बहुत बधाई.//

नोट: पंकज के विषय में काफी जानकारी निरंतर के पिछले अंक में भी अनूप शुक्ल जी के द्वारा दी गई थी.

शुक्रवार, नवंबर 24, 2006

बस्ती से दूर....

चलो, बस्ती से दूर चलें!!!!
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कृप्या पंक्तियों के भीतर भावनाओं को पढ़िये:


बस्ती में जब भी आग लगी
भग निकले तब शैतान सभी
मरने वालों मे वो भी थे
जिनको कहते भगवान कभी.

कल को वो फिर से लौटेंगे
जब आग बुझा दी जायेगी
इस बस्ती की सूरत भी तब
बद से बदत्तर हो जायेगी.

कोई रोको इनको आने से
या बच बच कर भग जाने से
इनका है हमसे मेल नहीं
बस्ती में रहना खेल नहीं.

--समीर लाल 'समीर'

सोमवार, नवंबर 20, 2006

ताली पुराण

मित्रों

ताली पुराण की मुण्ड़लियाँ लिखते समय मेरे दिल में यह ख्याल कतई नहीं था कि जब हम कविता पाठ करें तो लोग तालियां बजायें. यह तो मैने महज इसकी उपयोगिता और फायदों को मद्दे नजर रख कर जनहित मे लिखी है. यह एक ऐसा साज है कि जिस किसी के भी दोनों हाथ सलामत हैं, वो इसे बजा सकता है. और आजकल तो अगर एक खास तरीके से आप इसे बजाना सीख जायें तो पटना नगर निगम में नौकरी भी मिल सकती है. तो चलिये सुनते हैं, इस गुणों की खान, मुफ्त में उपलब्ध और बिना खास रियाज के बजने वाले इस वाद्य, ताली का पुराण:

ताली पुराण

नेता, कवि, महात्मा कि गायक गीत सुनाय,
बिन ताली सब सून है, रंग न जमने पाय.
रंग न जमने पाय, ताली से मच्छर हैं मरते
डेंगू, गुनिया, मलेरिया, पास आने से डरते.
गुरु मंत्र लो; तुम डिप्रेशन को दूर भगाओ
सुन कर मेरे कवितायें, ताली खुब बजाओ.

हाथों में गर हो झुनझुनी, ताली से मिट जाय
गठिया वात के रोग में, झट ही आराम लगाय.
झट ही आराम लगाय कि औषधी है ये गुणकारी
डॉक्टर साहब बतलायेंगे, तो दवा न बिके बेचारी
जड़ी बुटियां और कितनी भी कसरत करते जाओ
सब मर्जों की बस एक दवा है, ताली खुब बजाओ.

ताली के अंदाज में, हैं छुपे हुये कई राज
किसकी भद्द उतार दे, किसको दे दे ताज.
किसको दे दे ताज, इसको मै शीश नवाता
ताली बजती जाये, सोच कर गीत सुनाता
सन्नाटे का राज हो, अगर यह धर ले मौन
इसका बस है आसरा, वरना हमको पूछे कौन.

खैनी कभी मत खाईये, बिन ताली मारे आप
कितना भी हो घिस चुके, आता नहीं वो स्वाद
आता नहीं वो स्वाद, ताली करवाती सब काज
बच्चा हो या बड़ा कोई, रहा ताली का मोहताज
हम जो लिख कर लाये हैं, वो कैसा लगा श्रीमान
जब ताली की आवाज उठे, तब हम भी लेंगे जान.

याददाश्त पर आपकी, हमको पूरा है विश्वास
मानव ही तो हैं आप भी, थकने का इतिहास
थकने का इतिहास कि इसकी चिंता न करना
हाथ हिला कर बतलाऊँगा कब ताली है भरना
कहते है कविराय कि तुम बस डूब के सुनना
जब मजा बहुत आ जाये, तब तुम ताली धुनना.


ताली का विस्तार देखिये, सारे जग में आज
भाषा का मोहताज नहीं, ऐसा है यह साज
ऐसा है यह साज कि हर धुन में बजता है
बच्चे, बुढ़े और जवान, सबहि पर फबता है
कहे समीर, इस बाजे में लागे न एक भी पैसा
खुल कर खुब बजाईये, इसमें शरमाना कैसा.

सदियों का इतिहास है, इस पर हमको नाज
मानव की पहली खोज में, आता है यह साज
आता है यह साज कि हरदम मंदिर में बजता
भजन, कीर्तन या आरती, जब भक्त है करता
इसकी ही सुर ताल है जो सबको रखे जगाये
वरना अखंड रामायण में, भक्त सभी सो जाये.


चुन्नु का है बर्थ-डे, अब इसकी महिमा देख
ताली की आवाज बिन, कभी न कटता केक
कभी न कटता केक , न ही कोई फीता कटता
शिलान्यास का मौका हो, तब भी यह बजता
बिन इसके नहीं कोई बंदर भी नाच नाचता
फिर मेरी कहाँ बिसात जो मैं लिखा बांचता.

सरदी लगती आपको, ताली से गरमी आये
निपट अकेले जो आप हों, डर को दूर भगाये
डर को दूर भगाये कि बहुत ही है हितकारी
गूँगों की आवाज भी, यही तो बनी बिचारी
कहे समीर कविराय कि कितनी महिमा गाऊँ
खुद बजा कर देखिये, मैं भी क्या क्या बतलाऊँ.



--समीर लाल ‘समीर’


// अब यहाँ ब्लाग पर ताली का मतलब टिप्पणी होता है, यह तो सभी सुधीजनों को विदित ही है.//

गुरुवार, नवंबर 16, 2006

सबको 'तरकश' सलाम

सुबह सुबह उठे, नहाये, पूजा किये और कंम्प्युटर पर आ गये. अभी ठीक से लोग इन भी नहीं किये थे और न ही गणेश जी वाला वाल पेपर लोड हो पाया था कि डिंग डांग.... "क्या हो रहा है, मै, पंकज बैगाणी 'तरकश'."

हम थोड़ा घबराये. इस तरह वो पहले कभी अवतरीत नहीं हुए थे. हमने कहा, " मैं समझ गया कि आप पंकज हैं. गुगल चैट में दिखता है कि किसने मैसेज भेजा."
वे बोले, " पंकज नहीं, पंकज बैंगाणी 'तरकश' कहो, आज से यही नाम है. और हाँ, यह मत समझना कि हमने 'सहारा ग्रुप' या अमर सिंग से कोई समझौता किया है. यह हमारा अन्नु मलिक की तरह मौलिक प्रयास है और आप, चूँकि कोर टीम में हैं, तो आप भी अपने नाम के आगे तरकश लगाया करें. नये कार्ड छपवायें और अपना नाम रखें, समीर लाल 'तरकश'. संजय और बाकी सदस्यों को भी बता दिया गया है."

और चेतावनियों का दौर जारी रहा कि कल से यह नमस्कार, प्रणाम आदि न सुनाई दे, बस 'तरकश सलाम'.
हम तो घबराये थे सो हाँ करते चले गये.

लेकिन पंकज बैंगाणी 'तरकश' तो बस तीर की तरह चलते रहे और रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

अगला तीर आया कि "कोर टीम में पोस्ट लेते समय तो बड़ॆ खुश दिख रहे थे, कोई सरकारी कापरेटिव समझ रखा है क्या. कि बस अध्यक्ष बन गये, लाल बत्ती की गाड़ी मिल गई, अब ऐश करो, काम करने की क्या जरुरत."

बोले, "हमारे यहाँ ऐसा नही चलेगा, काम करोगे तो ही प्रसाद मिलेगा. न तो लिखते हो और न ही लिखने वालों को लाते हो.सब कुछ क्या मेरी जिम्मेदारी है? एक तो मेरी लाल बत्ती की गाड़ी ले गये, विदेश घुम रहे हो और जवाबदारी के नाम पर, 'बड़ा शून्य'."

हमने कहा, 'चिंता न करें, जल्दी ही लिख कर कुछ भिजवाते हैं."

बोले, " क्या भिजवाते-भिजवाते लगा रखा है. अरे, और लोगों को जोड़ो. नये लोगों को लाओ. तुम्हारा लिखा तो भगवान का रचा है. न जाने क्या क्या लिखते हो. वो ख्वाबों की रानी, न जाने क्या लिख कर चैंप दिया, एक्को टिप्पणी नहीं आई. ऐसा ही लिखते रहे तो एक दिन भजिये की दुकान में भजिया तलते नजर आओगे. मैं हितैषी हूँ सो बता भी दे रहा हूँ, वरना आज की दुनिया में कौन बताता है. आगे से इस तरह के पर्सलन मैटर घर में ही सुलटाया करो, पब्लिक में लाने की जरुरत नहीं है. इसके लिये नहीं दी है आपको लाल बत्ती की गाड़ी."

हम तो भाव विभोर हो गये. आँख से आँसू टपक गये. चैट पर ही पैर पड़ लेने का मन हुआ, मगर मुआ स्क्रिन आड़े आ गया.

मैने हिम्मत जुटा कर कहा, "महाराज, हम अकेले थोड़े ही हैं, जो लाल बत्ती लिए घुम रहे हैं, आप संजय को तो कुछ नहीं कहते. और तो और न निधी जी, न सागर, न शुएब, न रवि, सब ऐश कर रहे हैं और जवाबदारी सिर्फ हमारी. यह तो गलत बात है."

बोले, "अभी सब की क्लास ले रहा हूँ, तुम पहले हो वैसे कोई बचने न पायेगा."

मैने कहा, "और आप खुद? आपको कौन कुछ कहेगा."

कहने लगे, "ज्यादा न बोला करो, और कई छिपी चीज जिस पर हम दिन रात जुटे रहते हैं, वो भी देखा करो. जाओ, देखो, कैसा मध्यांतर मस्ती में विभिन्न प्रकार के खेल लाये हैं हम, सुडोकु और शतरंज और अभी एक मेहमान लेखक कॉलम भी ला रहे हैं, एक से एक ब्लागर उसमें लगे हैं लिखने को."

हम तो उनके प्रयास पर नतमस्तक हो गये, अब आप लोग भी देखें और तरकश के लिये भी लिखें, अपने ब्लाग के सिवाय भी.

अब देखिये, परसों ही यह बात हुई और सबकी क्लास ली गई, तो संजय 'तरकश' और रवि 'तरकश' तुरंत हाजिर हुये अपनी बेहतरीन प्रस्तुति के साथ और हम यहाँ, हाजिर ही समझो. भईया, डंडे से खुदा डरता है मगर हमारा शुएब नहीं डरा. अब तक कुछ नहीं भेजा और न ही निधी और सागर ने.

अब चलते हैं, सबको 'तरकश सलाम'.

-समीर लाल 'तरकश'

बुधवार, नवंबर 15, 2006

हैप्पी मधुमेह दिवस

कल विश्व मधुमेह दिवस था। मैं शाम भाभी जी के घर पहूँचा तो बड़ी खूश नजर आ रहीं थी। मेरे पहुँचते ही तपाक से बोलीं, “हैप्पी मधुमेह दिवस, भाई साहब।“

और फिर एक प्लेट में सजी मिठाई इस दिवस के उपलक्ष्य में मेरी तरफ बढ़ा दी गई।

मैने दोनो हाथ जोड़कर क्षमायाचना की और कहा, “भाभी जी, अफसोस कि मै आपकी खुशी में शामिल नहीं हो पा रहा हूँ, जबकि यह त्यौहार विश्व स्तरीय है। मेरी अपनी मजबूरियाँ हैं, मुझे डॉक्टर ने मधुमेह की वजह से ही मिठाई न खाने की हिदायत दे रखी है।“

भाभी जी के चहेरे पर मुस्कान की जगह वाया उदासी, आश्चर्य ने ले ली। कहने लगीं, “जरुर किसी इंडियन डॉक्टर के चक्कर में हैं, आप?”

मैने कहा, “जी, हैं तो वह भारतीय ही, मगर फिर भी है काबिल।“ वैसे यह भी उनके लिये आश्चर्य की ही बात थी, मगर इस वक्त विषय वस्तु मिठाई थी, न कि डॉक्टर।

बोलीं, “अरे भाई साहब, इनको कुछ नहीं मालूम। आजकल डाईट (लो शुगर) मिठाईयाँ आने लगी हैं, और ये सब हिन्दुस्तानी डॉक्टर इससे बेखबर हैं, बस मिठाई खाने को मना कर देते हैं।“

मन में आया कि कह दें, “वो डॉक्टर है, हलवाई नहीं।“

खैर, मैने भी शरमाते हुये और अंदर ही अंदर घबराते हुए मिठाई ले ली और बात का सिलसिला आगे बढ़ा. भाभी जी ने बताया कि कैसे उनके क्लब में मधुमेह दिवस पर विशेष गोष्ठी का आयोजन किया गया था और उसी में ‘शंकर मिठाईवाले’ ने लो शुगर पर कुछ रेसिपिस भी बताईं और अपनी दुकान पर विश्व मधुमेह दिवस के उपलक्ष्य मे लो शुगर की मिठाईयों की सेल भी लगाई थी. खुब जम कर बिक्री हुई.

मैने भी उन्हें नई तरीके की मिठाई सीख जाने की बधाई दी. भाभी जी ने मुस्कराते हुए बताया कि “उन्हें भी पिछले छः माह से मधुमेह है।“

उनका चेहरा देख कर लग रहा था कि मानो, कोई बड़ी उपलब्धी हासिल की हो, इस मधुमेह को पाल कर.
मैने सांत्वना जताई तो एकाएक लगभग भड़क सी पड़ी,” कैसी बात करते हैं आप भी। इसमें कोई दुख की बात थोड़े ही है।“

फिर सामान्य होते हुये, चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट और विजय भाव लाते हुए आगे कहने लगीं,“ आजकल तो मधुमेह का फैशन है, यहाँ पर। मुझे तो जब नहीं था, तब ही मैने क्लब में बता रखा था कि मुझे है, ताकि मैं कहीं ऑड-मेन-आऊट न हो जाऊँ। मैं तो तभी से लो-केलोरी डाइट और शूगर फ्री चाय अपने लिये आर्डर करती थी।“

“इसके कई फायदे हैं-आप किसी के घर जायें तो भी आपकी अलग से खातिर की जाती है। चाय अलग से बन कर आती है। आपको यह राजसी रोग है, यही आपको सोसाईटी में ऊँचा स्थान दिलाता है और साथ ही अगर रक्तचाप भी हो, तो क्या कहने, सोने में सुहागा” उन्होंने अपनी बात आगे जारी रखते हुए, एक आँख हल्की सी दबाते हुए, कहा, “ आप अभी भारत से नये आये हैं, थोड़ा समय लगेगा फिर यहाँ पर भारतीय समाज के भी चाल चलन समझ जायेंगे।“

मैने कहा, “सो तो लग रहा है। जल्दी जल्दी सीख भी रहा हूँ।“

भाभी जी की बात अभी पूरी नहीं हुई थी, सो आगे बोलीं,” वैसे हम यहाँ रहकर भी किसी आम भारतीय से कम भारतीय नहीं हैं। बल्कि यूँ कहें कि ज्यादा ही हैं। हम अपने सारे भारतीय त्यौहार इन्क्लूडिंग करवा-चौथ और छ्ट भी क्लब में सेलिब्रेट करते हैं, और विश्व स्तरीय जैसे यह मधुमेह दिवस और वैलेंटाईन डे आदि भी।“

मैने कहा, “आप जैसों पर ही हमें गर्व है, जो भारतीयता को जिंदा रखें हैं। वरना तो यह कब की दफन हो जाती। आपका बहुत साधुवाद। अब चलता हूँ, इजाजत दें।“

भाभी जी ने भी मुस्कुराते हुये नमस्ते किया और कहा, “ये आपको न्यू ईयर पार्टी का आमंत्रण भिजवा देंगे, आइयेगा जरुर, समाज के बाकी लोगों से भी आपका परिचय हो जायेगा।“

अपनी स्विकारोत्ति देकर मैं चल पड़ा मगर रास्ते भर यह प्रश्न मेरे दिमाग में गुंजता रहा; यह कैसा भारत के भारतियों से ज्यादा भारतीय समाज है, जो १४ नवम्बर को विश्व मधुमेह दिवस तो मनाता है, मगर नेहरु जी के जन्म दिन-बाल दिवस भूल जाता है।

खैर, जैसा भी है, अब तो मै भी उसी क्लब का सदस्य होने जा रहा हूँ, शायद मुझे देख और सुनकर भी कोई नया आया भारतीय कुछ सालों बाद यही प्रश्न उठाये।

रविवार, नवंबर 12, 2006

गाँधीगिरि का क्या !!!

इधर जबसे लगे रहो मुन्ना भाई आई, गाँधीगिरि जोरों पर है. कोई देशद्रोही इसकी आड़ में चुनाव लड़ने की तैयारी मे है तो कोई गुंडा इसकी आड़ में जेल से छूटने की तैयारी कर रहा है. इसी की नज़र मेरी एक रचना, अब अगर कुत्ते को आप नेता समझें और बिल्ली को आम जनता, तो यह आपकी गल्ती है, मैने तो ऐसा नही कहा:

एक कुत्ते ने जब
लगे रहो मुन्ना भाई देखी
उसने भी बड़े दिल से सोचा
गाँधीगिरि कर-करें कुछ नेकी

एक बिल्ली को तुरंत
अपने सामने खड़े पाया
उसे बड़े प्यार से डर छोड़ने
गांधीगिरि का सबक सिखाया

बिल्ली को बड़ा मजा आया
और कुत्ते ने उसे मय परिवार
दावात का न्योता पकडा़या

नियत तिथी पर अपने
सब दोस्तों को भी
दावात पर बुलवाया
बिल्ली का परिवार भी
अपने मित्रों के संग आया

सारे कुत्तों ने मिल
खुब जश्न मनाया
और गाँधीगिरि के नये अध्याय को
नया आयाम दिलाया.
उन बिल्लियों का फिर कभी
कुछ पता न चल पाया.

-समीर लाल 'समीर'

शुक्रवार, नवंबर 10, 2006

ऑफिस ऑफिस

एक बार कुछ माह पूर्व ऑफिस कुंण्डलियां और दोहा लिखने का प्रयास किया था. तब नया नया कुंण्डलियां लिखने का शौक जागा था, बड़े नियम कायदे कानून से लिखने का प्रयास होता था. समय बीता, और फिर समय के साथ नियम तोड़ने का साहस जुटने लगा और अब तो इन्हें कुंण्डलियां कहने की जुर्रत भी नहीं कर सकते तो आज नये नाम मुंडलियां (यह नामकरण संस्कार पंडित अनूप शुक्ल जी से करवाया गया है) की शुरुवात, इसी पुरानी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुये कर रहा हूँ.

ऑफिस मुंडलियां-भाग २
(ध्यान दें इसे जनहित में प्रकाशित किया जा रहा है)

मैनेजर से मत लिजिये, कभी भी पंगा आप
जरा जरा सी बात पर, वो दे देता है श्राप.
दे देता है श्राप कि उसको खुश करते जाओ
प्रमोशन मिल जायेगा, साथ में बोनस पाओ
चमचागिरि का आप, नया इतिहास बनाना
जब भी वो घर जाये, उसी के बाद में जाना.

गल्ती कभी न मानिये, जब दफ्तर का हो काम
गल्ती तो स्वभाव है, आखिर तुम भी हो इंसान.
तुम भी हो इंसान कि दिल से यह मंत्र लगा लो
जो साथी छुट्टी पर हो, बस उसके नाम लगा दो
कहत समीर कि जब तक बंदा वापस आयेगा
बात हमारी मानिये, मामला खुद ठंडा जायेगा.

ऑफिस से जब घर चलो, फाइल लाद लो सारी
थोडी सी मेहनत लगे, पर इंप्रेशन पड़ता भारी
इंप्रेशन पड़ता भारी कि ऑफिस में नाम मिलेगा
घर के कामों से भी तो, तुमको आराम मिलेगा
बतलाया है गुर आपको, अपने तक रखना बात
जीवन भर सजती रहे, यूँ ही मस्ती की बारात.

ऑफिस में जब तक रहो , करते रहो आराम
फाइलों का जब ढ़ेर हो , तबहि मिले सम्मान
तबहि मिले सम्मान कि आज जो कीजे सारे काम
कल फिर ऑफिस में आकर, क्या करियेगा श्रीमान
कहत समीर कविराय कि आज की कल पर टालो
ऑफिस में आराम से, दनादन कवितायें रच डालो.

--समीर लाल समीर

गुरुवार, नवंबर 09, 2006

त्रिवेणी: एक विधा

हमारे शिष्य गिरिराज पुनः परेशान नजर आये चैट पर कि त्रिवेणी विधा की कविता के विषय में जानकारी नहीं मिल रही है. हमने समझाया भी कि भाई, कुछ और लिख लो. कोई जरुरी तो नहीं कि त्रिवेणी ही लिखी जाये, जिसकी जरा भी जानकारी नहीं. मगर अब वो तो प्रयोगवादी जीव हैं, उन्हें न मानना था, न मानें. बस जुटे रहे कि आप बताईये, त्रिवेणी कैसे लिखते हैं.

अब हम तो जानते नहीं मगर शिष्य की बात कैसे टालें.

कुछ समय पूर्व अनूप भार्गव जी ने ई-कविता के सदस्यों के ज्ञानवर्धन के लिये त्रिवेणी के विषय में जानकारी प्रेषित की थी, उसी को यहां अनूप जी के साभार के साथ पेश कर रहा हूँ.



'त्रिवेणी' गुलज़ार साहब की अपनी खुद की ईज़ाद की हुई विधा है, जिसमें पहली दो पंक्तियां अपने आप में एक बात कहती हैं, तीसरी पंक्ति जरा घुमावदार होती है जो पहली दो पंक्तियों को एक नया अर्थ देती हैं.

इसे और समझने के लिये यूँ समझें:

त्रिवेणी में तीन मिसरे होते हैं, पहले दो में लगता है कि बात पूरी हो गई; जैसा कि एक गज़ल के शेर में होता है. शेर की तरह ही ये पहले दो मिसरे अपने आप में मुक्कमिल भी होते हैं. तीसरा मिसरा रोशनदान की तरह खुलता है, उसके आने से पहले दो मिसरों का मानी या तो बदल जाता है. या उनमें इज़ाफा हो जाता है. यह एक तरह की शोखी है, जो त्रिवेणी में ही मिलती है.

एक दुसरी जगह गुलज़ार साहब कहते हैं:

शुरु शुरु में जब यह फोर्म बनाई थी, तब पता नहीं था तह किस संगम तक पहूँचेगी- त्रिवेणी नाम इसलिये दिया था कि पहले दो मिसरे गंगा जमुना की तरह मिलते हैं, और एक ख्याल, एक शेर को मुक्कमिल करते हैं. लेकिन इन दो धाराओं के नीचे एक और नदी है- सरस्वती. जो गुप्त है. नजर नहीं आती; त्रिवेणी का काम सरस्वती दिखाना है. तीसरा मिसरा, कहीं पहले दो मिसरों में गुप्त है. छुपा हुआ है.




गुलजार साहब

अब यहां त्रिवेणी पर पढ़ी एक किताब से अनूप जी की पसंद की त्रिवेणियां:




इतनें लोगों में , कह दो आँखों को
इतना ऊँचा न ऐसे बोला करें
लोग मेरा नाम जान जाते हैं ।

*

शाम से शमा जली , देख रही है रास्ता
कोइ परवाना इधर आया नहीं देर हुई
सौत होगी जो मेरे पास में जलती होगी

*

रात के पेड पे कल ही देखा था
चाँद बस पक के गिरने वाला था
सूरज आया था , ज़रा उस की तलाशी लेना

*

उफ़ ये भीगा हुआ अखबार
पेपर वाले को कल से 'चेन्ज' करो
पाँच सौ गाँव बह गये इस साल

*

सामनें आये मेरे , देखा मुझे ,बात भी की
मुस्कुराये भी पुरानी किसी पह्चान की खातिर
कल का अखबार था , बस देख लिया ,रख भी दिया

*

--गुलज़ार


और फिर एक और:

आओ जबानें बाँट ले अपनी अपनी हम
न तुम सुनोगे बात , न हम को कुछ समझना है
दो अनपढों को कितनी मोहब्बत है अपनें अदब से ...

--गुलज़ार




फिर कुछ मेरी पसंद की, गुलजार साहब की लिखी हुई त्रिवेणियां:


तेरे गेसु जब भी बातें करते हैं,
उलझी उलझी सी वो बातें होती हैं.
मेरी उँगलियों की मेहमानगी, उन्हें पसंद नहीं.

*

मुझे आज कोई और न रंग लगाओ,
पुराना लाल रंग एक अभी भी ताजा है.
अरमानों का खून हुये ज्यादा दिन नहीं हुआ है.

*

ये माना इस दौरान कुछ साल बीत गये है
फिर भी आंखों में चेहरा तुम्हारा समाये हुये है.
किताबों पे धूल जमने से कहानी कहां बदलती है.

*

चलो आज इंतजार खत्म हुआ
चलो अब तुम मिल ही जाओगे
मौत का कोई फायदा तो हुआ.

*

क्या पता कब, कहां से मारेगी,
बस, कि मैं जिंदगी से डरता हूँ.
मौत का क्या है, एक बार मारेगी.

--गुलज़ार


नोट: रुपा एण्ड कं. ने गुलजार साहब की ६६ पन्नों की पुस्तक 'त्रिवेणी' प्रकाशित की है, जिसका की मुल्य १९५ रुपये निर्धारित किया है और ISBN No.:8171675123 है.






आशा है, अब जल्दी ही गिरिराज जी की शेरों से हट कर कुछ त्रिवेणियां पढ़ने मिलेंगी. शुभकामनायें.

लौटते हुये:
एक बार यह लेख लिख कर हम जा चुके थे, तब तक फुरसतिया जी ने बताया कि वो भी हमारी गैरहाजिरी में, जब जून में हम भारत यात्रा पर थे, तब त्रिवेणी के बारे में विस्तार से लिख चुके हैं, बहुत सी त्रिवेणियां वहां बह रही हैं, आप भी देखें. पता नहीं, हमारी नजरों से कैसे बचा रह गया यह लेख.

अब गिरिराज जो न करवा दें, सो कम. :) एक ही विषय पर फिर से लिखवाई दिये.

मंगलवार, नवंबर 07, 2006

कब आओगे, प्रिये!!






अभी बस चांद उगता है, सामने रात बाकी है
बड़े अरमान से अब तक, प्यार में उम्र काटी है
पुष्प का खार में पलना,विरह की आग में जलना
चमन में खुशबु महकी सी, प्रीत विश्वास पाती है.

गगन के एक टुकडे़ को, हथेली में छिपाया है
दीप तारों के चुन चुनकर, आरती में सजाया है
भ्रमर के गीत सुनते ही, लजा जाती हैं कलियां भी
तुम्हारी राह तकते हैं, तुम्हें दिल में बसाया है.

तुम्हीं हो अर्चना मेरी, तुम्हीं हो साधना मेरी
प्यार के दीप जलते हैं, तुम्ही हो कामना मेरी
धरा से आसमां तक है यही विस्तार आशा का
तुम्हीं में मै समा जाऊँ, यही अराधना मेरी.


--समीर लाल 'समीर'

गुरुवार, नवंबर 02, 2006

कोई नाजुक बदन लड़की




चित्र साभार: रिपुदमन पचौरी, हमारे खास मित्र

मैं जो भी गीत गाता हूँ, वही मेरी कहानी है
मचल जो सामने आती, वही मेरी जवानी है
मैं ऐसा था नहीं पहले, मुझे हालात ने बदला
कोई नाजुक बदन लड़की, मेरे ख्वाबों की रानी है.

नहीं उसको बुलाता मैं, मगर वो रोज आती है
मेरी रातों की नींदों में, प्यार के गीत गाती है
मेरी आँखें जो खुलती हैं, अजब अहसास होता है
नमी आँखों में होती है, वो मुझसे दूर जाती है.

मगर ये ख्वाब की दुनिया, हकीकत हो नहीं सकती
थिरकती है जो सपने में, वो मेरी हो नहीं सकती
भुला कर बात यह सारी, हमेशा ख्वाब देखे हैं
न हो दीदार गर उसके, तो कविता हो नहीं सकती.


--समीर लाल ‘समीर’

मंगलवार, अक्तूबर 31, 2006

दुई पाटन के बीच में..

आज सुबह सुबह टहलने निकला. मन पता नहीं क्यूँ अनमना सा था. जबकि मौसम बड़ा खुशनुमा था. मगर इधर अक्सर मैं देख रहा हूँ कि जब मौसम खुशनुमा होता है तो मेरा मूड खिन्न. शायद अच्छे मौसम, पूरी बिजली और पूरी पानी स्पलाई, शुद्ध दूध आदि की आदत ही नहीं रही. शुद्ध दूध से पेचिश पड़ने लगती है और सात्विक एवं शुद्ध भोज से कब्जियत. वैसे ऐसा कहा गया है कि प्रातः भ्रमण अति आनन्दकारी होता है और अति सुख प्रदानकर्ता.

मगर मेरा मानना है कि अति सुख और आनन्द की परिभाषा समयविशेष और व्यक्तिविशेष पर आधारित है, कब्जियत के शिकार को एनिमा लगवाने के बाद जो निस्तार में सुख मिलता है और दाद के मरीज को दाद खुजलाने में, दोनों किसी भी अन्य सुख से अतुलनीय है, मगर बिना अनुभव के इस आनन्द की कल्पना करना भी संभव नही है. कुछ इसी तरह का सुख और आनन्द मैने कुछ राजनैतिक पार्टियों को सरकार गिरा कर और कुछ लोगों को पड़ोसियों पर आयी विपदा में प्राप्त करते हुये देखा है हालांकि वो भी जानते हैं, न तो सरकार गिराने से वो सरकार में आ जायेंगे और न ही पड़ोसी पर आयी विपदा से इन्हें कोई फायदा होगा, मगर फिर भी. अब यह बात तो हम भावावेश में बता गये, मगर यही एक सिद्ध सत्य है

हम तो निकले थे टहलने सो टहलने लगे. कुछ और लोग भी सुबह की टहल कदमी में व्यस्त थे, कुछ स्वास्थय के कारणों से, ज्यादा फैशन के कारण से और उससे भी ज्यादा, अधिकारियों से संबंध बनाने के चक्कर में. मगर हमारा तो पूरा कारण मात्र एक था पत्नी का दबाव, डॉक्टर की सलाह पर, वजन कम करने के लिये. सो टहल रहे थे. हालांकि टहल खतम होने पर, मै और मेरे मित्र राकेश जी, औपचारिकतावश, नुक्कड़ की दुकान से पोहा जलेबी खाते हुये घर लौटते हैं जिसका ज्ञान हमारी पत्नियों को अब तक नहीं है और वो संपूर्ण टहल का सार बराबर कर देते हैं, और हम जैसे निकले थे वैसे ही सेम टू सेम घर लौटते हैं और पत्नी हमारे वजन को अनुवांशिक दोष मान कर संतोष कर लेती है. हमें इससे कोई अंतर नहीं पड़ता, जब तक कि पोहा जलेबी का नाश्ता चलता रहे.

वैसे आज की टहल में नियमित की तरह राकेश जी नहीं थे, कारण शायद उनके घर आये पत्नी पक्ष के मेहमान थे अन्यथा तो इस तरह की स्वतंत्रता उनको और हमको कहां नसीब. यमराज भी लेने आ जायें तो पत्नी कहेगी कि पहले टहल कर आओ फिर और कहीं जाना. खैर, कारण जो भी रहा हो वो आज हमारे साथ नहीं थे और हम अकेले ही गुनगुनाये चले जा रहे थे कि:

अपनी धुन में रहता हूँ, मै भी तेरे जैसा हूँ.

तभी एकाएक ठोकर लगी और साथ ही आवाज आई-"कौन है, बे! देख कर नहीं चल सकता, अंधा है क्या?

हम तो आश्चर्य में पढ़ गये. ठोकर हमें लगी, चोट हमें लगी, दर्द हमें हुआ और चिल्ला वो रहे हैं. गल्ती हमारी बता रहे हैं कि "देख कर नहीं चल सकता, अंधा है क्या?"

हमने कहा, "क्या बात करते हो, पत्थर भाई, आप मेरे रास्ते में आये हैं, न कि मै आपके रास्ते में."

पत्थर तुरंत ऐंठ गया, क्या बात करते हैं, हम तो अपनी जगह ही हैं, आप आ गये रास्ते में. क्या भारत में नये आये हो? हम तो ऐसे ही हैं, आपको सड़क पर देख कर सिर्फ़ सड़क पर चलना चाहिये.

हमने कहा-नहीं भाई, हम तो पैदाईश से निरंतर यहीं रहते आये हैं, मगर सड़क पर चलने का यह नियम तो पहली बार सुन रहे हैं

वो जारी रहे- बेटा, सड़कें, हमारे बाजू से नीचे नीचे चलती हैं और हम जहां हैं वहीं है, इसीलिये हम उच्च वर्गीय कहलाते हैं, सब हमसे दामन बचा कर चलते हैं, खास कर सड़क पर चलने वाले आम वर्गीय लोग, जो न आरक्षित हैं और न उच्च वर्गीय, वरना तो वो अपना खमजियाना अपने आप भुगतते हैं और बड़ों के मुँह लगने का परिणाम झेलते हैं.

हमने तुरंत अपनी आम वर्गीय औकात पहचानी और घटना स्थल से क्षमा मांग कर गमित हुये और एक भारतीय आम वर्गीय के पास रास्ता भी क्या हो सकता है. हमने भी वही किया जो हमारे सम वर्गीय करते हैं.

अब हमें टहलते समय ध्यान था कि उच्च वर्गीय पत्थर से बच के चलना है. बस चलते गये, बचते गये. इसी आपाधापी में गड्डे में पांव धर बैठे, फिर असहनिय दर्द और असहनिय गर्राहट: कौन है बे! देख कर नहीं चलता, अंधा है क्या?

हम तो बस भौचक रह गये, किससे बचें, किसको छोड़ें.

हमने कहा, भाई साहब, हम आम वर्गीय, उच्च वर्गीय पत्थर बचा कर सड़क पर चल रहे थे कि सड़क के आभाव में आप पर पैर पड़ गया और आपने अपने को हमारे द्वारा रौंदा महसूस किया, उसके लिये हम अति क्षमापार्थी हैं.

गड्डा कहने लगा हमने यह ढकोसले बाजी खुब देखी है, हमें न सिखाओ. मध्य प्रदेश के रहने वाले हो, जगह जगह हरिजन थाने खुले हैं और हमारे उद्धारक मंत्री जी भी यहीं के हैं, इतना भी नहीं जानते. अरे, तुमने तो हमें रौंद कर वाकई जुर्म किया है, वरना तो हमारा इल्जाम लगाना ही काफी है, सात साल को गैर जमानती अंदर हो जाने को. तुम नये और सज्जन दिखते हो तो तुम्हे बताये देते हैं कि तुम्हारे लिये सड़क हमारे आस पास उपर से जाती है, देख कर चला करो और अभी की गल्ती के लिये कुछ ढीला कर जाओ नहीं तो जिंदगी चक्की पीसते बीतेगी दलितों पर अत्याचार के मामले में. हम पर भी जो सक्षमता थी उस आधार पर ढीला होकर आगे बढ़ गये. अब हम आम वर्गीय भारतीय की तरह गड्डे और पत्थरों के बीच सड़क खोजते टहलते रहे और अंत में हार मान करअपने घर की छत को अपने टहलने का अखाड़ा बना कर सड़क को कम से कम इस हेतु अलविदा कह आये.

फिर समाचार में माननीय मंत्री जी को सुनते हैं. सरकार इन गड्डों को स्थिती से चिंतित है और प्रयासरत है. प्रयास इनको पत्थर बनाने का नहीं है और न ही इन्हें समतल कर सड़क बनाने का है बल्कि जहाँ हैं जैसे हैं, के आधार को सुरक्षित कर बची हुई समतल सड़को पर और अधिक स्थान प्रदान करने का है. अब सड़कों पर और गड्डे होंगे और उनकी स्थिती आरक्षित होगी. मगर समाचार आगे जारी था एक आम नागरीक को चिन्ता की आवश्यक्ता नहीं है, सड़को पर इन गड्डों के लिये अधिक आरक्षण से आई कमी की भरपाई के लिये सड़क का दोनो बाजू थोड़ा थोड़ा चौड़ीकरण किया जायेगा ताकि चलने का जो स्थान आपको आज उपल्ब्ध है, गणना के आधार पर लगभग उतना ही उपलब्ध रहेगा बस उचकना और कुदना ज्यादा पड़ेगा ताकि इन गड्डों को अपने अस्तित्व के होने और अपने विस्तार में किसी भी प्रकार की समस्या का सामना न करने पड़े.

हम तो सब कुछ झेल जाने के आदी हैं, बस चिन्ता और इंतजार उस वक्त का है, जब यह सरकार हमारी खुद की बनाई खुद के घर की छत पर अपनी नीतियां थोपेगी और हमारे घर की छत भी इन पत्थरों और गड्डों से भरी नजर आयेगी और हमें इतना अधिकार भी न होगा कि हम इन्हें हटा सकें. तब हम कहां टहलेंगे. कबीर दास जी को सुनें, न जाने कबका कह गये थे:

चलती चक्की देखकर, दिया कबीरा रोए
दुई पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए.


वाह रे, ये खादीधारी और वाह रे, इनकी सोच. कहां ले जा रहे हैं यह इस देश को.



मेरी पसंद: (ये फुरसतिया जी की स्टाईल टीप दी)


टोपियों में छिपे चेहरे,सब सुख दुख से बेअसर
लगते तो आदमी हैं, कोई कुकुरमुत्ते नहीं हैं
वफादारी पर डालते रहे, ये तिरछी इक नजर
ये नेता लगते देशभक्त हैं, कोई कुत्ते नहीं हैं

खादीधारी ये सभी, आदमी हैं गधे नहीं हैं
ध्यान से तो देखिये, खुंटी में बंधे नहीं हैं

मार कर ज़मीर अपना, जिंदा हैं किस तरह
अंतिम सफ़र को मयस्सर, चार कंधे नहीं हैं
लगती रहीं ठोकरें, फिर भी रहते हैं बेखबर
आंखों पर हैं काले चश्मे, कोई अंधे नहीं हैं.

खादीधारी ये सभी, आदमी हैं गधे नहीं हैं
ध्यान से तो देखिये, खुंटी में बंधे नहीं हैं

रविवार, अक्तूबर 29, 2006

गुरु ग्रेग स्पेशल

आज भारत की टीम चैम्पियन ट्राफी से बाहर हो गई. उम्मीद और कयास तो पहले से ही लगाये जा रहे थे. आज सब अखबार, टी वी चैनल अपनी अपनी तरह से यह बात रख रहें है, तो हम अपनी तरह से कुण्ड़लीनुमा रचनाओं और हाईकु के माध्यम से:

//१//

क्रिकेट के इस खेल की, मची हुई है जंग.
ग्रेग बनें यमराज हैं, खिलाड़ी हो रहे तंग.
खिलाड़ी हो रहे तंग कि उनके क्या कहने है
जिसपे नज़र पड़ जाय, जुर्म उसको सहने हैं
कहे समीर के गुरु जी,तुम बिस्तर लो लपेट
बिन तेरे ही, हे प्रभु, हम सीख लेंगे क्रिकेट

//२//

चैंम्पियन ट्राफी में हुआ, यह कैसा अत्याचार
पाकिस्तान पहले गया, फिर भारत का बंटाधार
फिर भारत का बंटाधार कि अब खेलो गुल्ली डंडा
ग्रेग गुरु ही बतलायेंगे,जीत का फिर से हथकंडा.
कहे समीर कवि कि बैठ कर अब पियो शेम्पियन
गुल्ली डंडे के खेल में,बनना तुम विश्व चैंम्पियन.


हाईकु

खेलें क्रिकेट
गुरु ग्रेग हों संग
रंग में भंग.


-समीर लाल 'समीर'

मंगलवार, अक्तूबर 24, 2006

हिन्दी चिट्ठों का वार्षिक भविष्यफल

दीपावली से हिन्दु नववर्ष प्रारंभ हो गया है.

इधर चिट्ठा जगत में भविष्य वक्ताओं की बाढ आई है, तो हमने भी सोचा कि अपनी इतनी गहरी और सधी हुई पंडिताई हम कैसे छोड़ दें, तो सुनें अपने चिट्ठों का वर्षफल. यह आपके चिट्ठे के अंग्रेजी नाम के आरंभिक शब्द पर आधारित है:
तुरंत देखें, आपका चिट्ठा किस शब्द से शुरु होता है और जानें वार्षिक फल:

A,C,F,G,U, R

यह साल आपके चिट्ठे के लिये बहुत शुभकारी रहेगा. वर्ष के पूर्वार्द्ध में टिप्पणियां बहुतायत में मिलेंगी. इस अति प्राप्ति के अहम में डुबकर आप अपने आपको एक वरिष्ठ चिट्ठाकार मानने लगेंगे और आपकी प्रविष्टियों की गुणवत्ता पर इसका प्रभाव दिखने लगेगा और उसमें कमी आने की संभावनायें हैं. गुणवत्ता की गिरावट के साथ ही प्रविष्टियां प्रविष्टी कम और खानापूर्ति ज्यादा नजर आने लगेंगी. कुछ अहम और कुछ आलस्यवश, जो कि वरिष्टता के साथ आना स्वभाविक है, आप दूसरे के ब्लागों पर टिप्पणियां करना कम देंगे या सिर्फ़ औपचारिकतावश, बढ़ियां है या अच्छा लगा, तक सिमित हो जायेंगे जो कि आपके ब्लाग पर वर्ष के उत्तरार्ध में आई टिप्पणियों की कमी का कारण बनेगा.

एक बात पर आप विशेष ध्यान दें कि जो भी लिखें वो दूसरों को समझ में पूरी तरह आये या बिल्कुल न आये, तभी टिप्पणियां मिलेंगी.

टिप्पणियों का जवाब अवश्य दें अन्यथा कई लोगों को यह आभास हो सकता है कि आप उनकी टिप्पणियां पढ़ते ही नहीं हैं और वो हतोत्साहित हो टिप्पणी करना बंद कर देते हैं.

कई बार आपकी अच्छी पोस्ट भी लोग पढ़ने से कतरा जाते हैं. उसके लिये सिद्ध मंत्र है कि पोस्ट का शिर्षक भड़काऊ रखें ताकि लोग उसे देखें जरुर, भले ही उसका पोस्ट से कुछ लेना देना न हो. लोग शिर्षक और पोस्ट के सामाजस्य को बिठाने के चक्कर में ही पूरी पोस्ट पढ़ जायेंगे. ऐसे शिर्षकों के लिये रामायण और गीता की पंक्तियां या कबीर और रहिम के दोहों के अंश उच्च फलकारी होते हैं.

अपने ब्लाग की साज सज्जा पर ध्यान देने की आवश्यकता है. हल्का हरा, गहरा पीला और भूरे रंग का बेकग्राउंड़ शुभ फलकारक होगा. फोंट का रंग यदि काला है, तो उसे बदल कर कोई भी और दूसरा गाढ़ा रंग चुनें, इससे टी आर पी में बढ़त आयेगी. यदि आप एक ही विधा में लिखते हैं तो अपनी लेखनी में विवधता लायें, जैसे कि व्यंग, हास्य और गंभीर लेखन का मिश्रण आपेक्षित से बेहतर परिणाम देगा.




E,K,L,M, X

इस वर्ष आपके चिट्ठे को मिले जुले परिणाम मिलेंगे. टी आर पी की बढ़त के बावजूद टिप्पणियों की संख्या में भारी गिरावट आयेगी. ब्लाग पर स्थानान्तरण योग है. अगर आप ब्लाग स्पाट पर हैं तो संभव है आप वर्ड प्रेस पर स्थानान्तरित हो जायें मगर प्राईवेट होस्टिंग का अगर मन बनाते हैं तो पहले ट्रेफिक काउंटर लगा कर अपनी औकात का आंकलन कर लें अन्यथा कहीं लेने के देने न पड़ जायें. कभी आपको यह अहसास भी हो सकता है कि आप इससे कुछ कमा लेंगे. तो ऐसे बहकावे में न आयें. इस तरह की अफवाह फैलाने वाले खुद भी फ्री ब्लाग स्पाट पर ही हैं और वो इतना बेहतरीन लिख लिख कर कुछ नहीं उखाड़ पा रहे तो आप क्या कर लोगे. कम से कम दृष्टिगत भविष्य में तो इसकी संभावनायें नहीं दिखती हैं.

इस वर्ष ग्रहों की वक्र दृष्टी के कारण आपके द्वारा की गई १० टिप्पणियों के बदले आपको दो ही प्राप्त होंगी तो अधिक पाने के लिये उससे कहीं अधिक देना होगा. हतोत्साहित होने की आवश्यकता नहीं है, वर्षांत तक स्थितियों में सुधार दिखने लगेगा, मगर किसी भी भ्रम का शिकार होने के पहले पुनः ट्रेफिक काउंटर देख कर अपनी औकात का आंकलन कर लें.

आप में से कुछ ने जो पूर्व में कीर्तिमान स्थापित कियें है, उनसे परेशान हो कर शत्रु वर्ग आपको तरह तरह से परेशान कर सकता है, मसलन छदम भेष धर कर आपके नाम से टिप्पणी या आपके चिट्ठे की हैकिंग का प्रयास इत्यादि. ऐसे में विचलित होने की आवश्यकता नहीं है. संयम बनाये रखें, अपनी स्थिती स्पष्ट करते रहें और अपना कार्य पूर्ववत जारी रखें. अगर दिल करे तो कहीं कहीं मौके का फायदा उठाकर मन के उदगार व्यक्त कर सकते है और उसका ठिकरा भी छदमनामी के सिर फोड़ कर चैन से पड़े रहें, आपका कोई नुकसान नहीं होगा.

चिट्ठे के बेकग्राउंड़ के लिये उदासीन रंगों का प्रयोग करें जैसे कि सफेद, हल्का गुलाबी, आसमानी आदि. फोंट साईज अगर १२ के नीचे हैं तो टी आर पी पर घातक असर कर सकते हैं. कवितायें, खुद की या चुराई हुई, दोनों ही अच्छा परिणाम लायेंगी मगर कृप्या कविताओं को कविता ही रहने दें. अगर स्व-लेखन से यह संभव न हो तो चुरा लें बजाय कि कहानी को कविता कहने के. इससे विपरीत परिणाम की प्राप्ति हो सकती है. अपने चिट्ठे के नाम में हिज्जे परिवर्तन से भी लाभ मिलने की संभावना है, जैसे कि उडन तश्तरी को उड़न तश्तरी या उडन तस्तरी कर दें, अच्छे परिणाम मिलेंगे.




B,D,H,W,Z

चिट्ठे का तो खैर जो भी हो, आपके तिरछे तेवर के कारण आपकी बदनामी तय है और उसका परिणाम झेलेगा बेचारा आपका चिट्ठा बिना किसी वजह के. कोशिश करके इस वर्ष कम से कम लिखें और जब भी लिखें तो सिर्फ लिखें न की बकर करें. दूसरों के उपहास से सबको फायदा नहीं पहूँचता, यह आपको याद रखना चाहिये. पहले अच्छा लिखें फिर बुरा ढूँढें, अन्यथा चर्मयुक्त किसी वस्तु के सिर पर पड़ने की पूरी संभावना है. बड़ों के आशिर्वाद को स्विकारें न कि उन्हें उनका माखौल उड़ाने का एंट्री पास समझें. यह ब्लाग जगत बहुत सेंसिटिव जगह है, यहां कब कैसे और क्यूँ कोई बुरा मानेगा और आप पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, कोई नहीं जानता. इसके आगे सब ग्रह नक्षत्र फेल हैं.

टिप्पणियों की अपनी गरिमा और महत्ता होती है, उसे समझने का प्रयास करें. टिप्पणिकर्ता के मनोभाव को समझने का प्रयास करें, न कि उस पर अपना मनोभाव लादें जो कि आप अपनी पोस्ट के माध्यम से कर ही चुके होते हैं.

अन्य लोगों की भावनाओं का आदर करें.--तभी आदर की आशा करें और तभी आपका भविष्य भी उज्जवल होगा. अन्यथा तो आप यथोचित पा ही रहे हैं.

ब्लग डूब जायेगा, कोई बात नहीं, दूसरा खोला जा सकता मगर आपका व्यतित्व डूब जाये तब फिर क्या? सोचो. कोई यहां झगड़ने नहीं आया है, यह मात्र वैचारिक मंच है और तुम इसे पर्सनल अखाड़ा बना कर कुश्ती लड़ते हो. बाकि जगह क्या कम पड़ गई. इस दिशा में लिया गया सकारात्मक कदम आने वाले समय में बहुत अच्छे परिणाम देगा.

अपने ब्लाग को लोकप्रिय बनाने के तमाम उपायों को अंगिकृत करने से पहले पढ़नीय सामग्री प्रेषित करें और मात्र खानापूर्ति के सिवाय कुछ वाकई में लिखें ताकि इस टिप्पणी, जिसे आप तारिफ मानते हैं, "क्या लिखा है", के लुप्त प्रश्नचिन्ह को भी आप देख पायें.."क्या लिखा है ?" तो कोई आश्चर्य न होगा.

साजसज्जा और फोंट कलर और साईज के ठीक होने के बावजूद वर्तनी पर ध्यान देने की आवश्यकता है, अन्यथा वर्तनी पीर से कुछ सांठ गांठ करो या फिर उसका वार झेलो. कोई पूजा पाठ आपको इससे नहीं बचा सकता. बस एक उपाय है, उसके लिये अलग से चार्जेबल बेसिस पर लिखें.


P,Q,N,S,O

आपका चिट्ठा इस वर्ष उतार चढ़ाव के नये कीर्तिमान स्थापित करेगा. कुछ चिट्ठे वर्षांत के पहले बंद होने की कागार पर आ जयेंगे, तो कुछ बंद हो चुके होंगे. वहीं कुछ अपने होने का ऊँचा परचम लहरा रहे होंगे. अति उत्साह अक्सर पूर्ण विराम की ओर अग्रसित मार्ग का फ़्लाई ओवर होता है. आपको सलाह दी जाती है कि उत्साहपूर्वक लिखना अच्छी बात है मगर अति उत्साह के प्रवाह में बहकर कुछ भी लिखना घातक सिद्ध हो सकता है. संभल कर चलें.

चिट्ठे के बंद करने की घोषणा कई बार उसको नये आयामों तक ले जाती है और कई बार इसके बड़े अच्छे परिणाम देखे गये हैं, दोनो तरह से टी आर पी और टिप्पणी के आधार पर. पर यह कार्य काठ की हांड़ी जैसा है जो बार बार नहीं चढ़ाई जा सकती, अतं में इसे अजमाने के पहले साख अच्छी जमा लें और एकदम ब्रह्मास्त्र की तरह उपयोग करें.

नारद से अच्छे संपर्क रखना उच्च फलकारी होगा. बिना नारद के अच्छे अच्छों का गुजारा नहीं हो पाया है, फिर आप तो खैर आप हैं.

स्थान परिवर्तन यानि कि ब्लाग स्पाट से वर्ड प्रेस या उल्टे से कोई लाभ नहीं होगा और न ही फोंट का रंग या साईज कोई विषेश प्रभाव डालेंगे. हां, नाम परिवर्तन का प्रयास शायद कुछ सफलता दे.

नकली फोटो और बेनाम चिट्ठाकारी दोनों आपके लिये उचित नहीं है, उसके लिये बेजोड़ लेखनी की आवश्यकता है और उस दिशा में पहले आपको प्रयास करने होंगे. अपने ब्लाग पर कहीं न कहीं सरसों के तेल के दिये का चित्र अवश्य लगायें, इससे यह महादशी समय आसानी से कट जायेगा.

टिप्पणियां करने में कोताही न बरतें क्योंकि वो ही एक मात्र साधन है कुछ टिप्पणियां प्राप्त करने का. अन्यथा लेखनी सुधरने तक इंतजार करें, मगर यह भी ख्याल रहे कि कहीं चिट्ठा सुधार आते आते वीरगति को न प्राप्त हो जाये.



I,J,T,V,Y


बस आप अंतिम हैं, और अंतिम टाईप लग भी रहे हैं. भईया, आपका तो क्या कहें, जब तक लिखोगे नहीं तो पूछेगा कौन. न तो आप कोई ऐसी कोशिश करते हो कि नारद की उच्च पायदान पर बनें रहें और न ही बहुत अच्छा मटेरियल लाते हो. सिर्फ दूसरों की प्रस्तुति प्रस्तुत कर और फोटो सोटो चिपका कर क्या दुनिया की अस्मिता लूट लोगे? टिप्पणी भी चाहिये, नारद भी आपको रिपोर्ट करे और चिट्ठा चर्चा वाले भी आपके गुणगान करें और आप बैठे ठर्राओ. ऐसा कहीं होता है क्या? नारद महात्म पढ़ना शुरु कर दें हर बुधवार को और चिट्ठाकारों से मधुर सबंध बनाओ. उनकी हर लेखनी पर वाह वाह करके, तभी उद्धार होगा, वरना अपने आप आपकी नियती तो तय है.

सिर्फ दूसरों की गज़ल, कविता और लेख कहानी से कब तक चलेगा. थोड़ा तो चलेगा, यह भी तय है. मगर जब रेस लगाने निकले हो तो पूरा दौडो, थोड़े से क्या?

ब्लाग का स्थानन्तरण कुछ असर दिखायेगा, शायद नई जगह पहूँचने का स्वागत समारोह में कुछ टिप्पणियों से नवाजा जाये या कम से कम स्थानान्तरण की सूचना की एक ओरिजनल पोस्ट तो बन ही जायेगी.

परिवार में वृद्धि की संभावनायें हैं, तो और ब्लाग खोल डालिये अलग अलग नाम से. शायद कहीं टिप्पणी आ जाये, अन्यथा बन्द कर देना. कौन सा घर से पैसा लगा है जो चिंता करें.

कभी कभार थोड़ा अपना खुद का कुछ लिखा करो, उससे अंतर पड़ेगा. लिखना तो शुरु करो, रंग अपने आप आता जायेगा.

चिट्ठे के बेकग्राउंड़ के लिये गाढ़े रंगो का प्रयोग और फोंट हल्के रंगों में उपयुक्त सिद्ध होंगे, भविष्य के लिये. जब तक लिखना भी सीख जाओगे और तब फिर फोंट गाढ़े कर लेना ताकि लोग वाकई में पढ़ पायें.

इन उपायों पर काम करो, सफलता कदम चूमेगी.



इसके सिवाय यदि कोई अपने ब्लाग की पर्सनल समीक्षा चाहता है तो वो पहले हमारे ब्लाग पर ५१ टिप्पणियां कर दें और उनका विवरण दे हमें अलग से ईमेल करें, हम उसको अलग से बतायेंगे. अरे भई, सब कुछ तो सार्वजनिक किया नहीं जा सकता हालांकि अब बचा क्या है. :)


अंत, हमेशा की तरह एक कुण्ड़ली नुमा रचना के साथ:


ज्योतिष विद्या सीख लई, पढ़ कर एक किताब
सबका भविष्य बताये रहे, खुद का नहीं हिसाब
खुद का नहीं हिसाब कि सब परेशां से दिखते हैं
उज्ज्वल भविष्य की चाह लिये, सब भगते हैं.
कहे समीर कवि कि कुछ खुद कर लो कोशिश
बाकी तो सब लूटते, क्या पंडित क्या ज्योतिष.


--समीर लाल 'समीर'

गुरुवार, अक्तूबर 19, 2006

एक दिया जलाया है...





हाईकु रचना



आई दिवाली
जगमग करते
दीप सजे हैं
*
रोशन फिर
कितनी आशाओं के
दीप जले हैं
*
खुशियाँ छाईं
हर पनघट पे
गीत बजे हैं
*
दूर उदासी
हर उपवन में
फूल खिलें हैं
*
भूल दुश्मनी
मन उजला कर
भाई मिलें हैं.
*
एक योजना
स्वर्णिम भविष्य की
लिये चले हैं.
*
नव रचना
भारत की करने
युवा खड़े हैं


और एक कुण्ड़लीनुमा रचना इसी खास मौके पर:



दीप दिवाली के जलते हैं, गली गली हर ओर
लक्ष्मी गणेश को पूजते, सज्जन हो या चोर.
सज्जन हो या चोर कि बच्चे खेलें फोड़ पटाखे
मिठाई मेवे के संग में, बंटते रहे खील-बताशे
कहत समीर कि रात जुयें मे तेरी होवे जीत
दिवाली तुझको शुभ रहे, रोशन जग के दीप.

आप सभी को मेरी और उड़न तश्तरी की ओर से दीपावली और ईद की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनायें.


-समीर लाल 'समीर'

मंगलवार, अक्तूबर 17, 2006

चलत कत टेढ़ो टेढ़ो रे

आज एक ऐसी घटना घटी कि हम ठगे से रह गये. शायद आप भी रह गये हों तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है क्योंकि इस खुशफ़हमी के कई शिकारों से मेरी मुलाकात चैट पर हो ही चुकी है.
हुआ यूँ कि फुरसतिया जी ने आज एक लेख लिखा: लिखये तो छपाइये भी न!अब आदतन तुरंत पढ़े गये. उसी में एक जगह जिक्र आया:


पता नहीं आपको कैसा लगता है लेकिन मुझे कृष्ण बलदेव वैद की डायरी पढ़ते समय अपने तमाम ब्लागर साथियों के लेख याद आ रहे थे और यह कहने का मन कर रहा था कि ब्लाग में लिखने के साथ-साथ अपने लेख, कहानियां, कवितायें जगह-जगह पत्र-पत्रिकाऒं में छपने के लिये भेजते रहें- बिना इस बात की परवाह किये कि वे छपेंगी या नहीं। मुझे अपने तमाम साथियों की रचनायें इस स्तर की लगती हैं जो थोड़े फेर बदल के साथ आराम से पत्र-पत्रिकाऒं में छपने के लायक हो सकती हैं और सच पूछिये तो कुछ साथियों की रचनाऒं का स्तर तो ऐसा है कि वे जिस पत्रिका में छपेंगी उसका स्तर ऊपर उठेगा। मेरा सुझाव है इस दिशा में सोचा जाये और हिचक और आलस्य को परे धकेल कर अपनी रचनायें छपने के लिये भेजने का प्रयास किया जाये।



उपर बोल्ड किया वाक्य देखें:

यह मेरे लिये लिखा गया है ऐसा हमने पढ़कर सोचा भी था और बाद में चैट पर हमसे फुरसतिया जी ने बताया भी तो पूरे से कनफर्म हो गया. हमने कहा भी कि काहे नहीं हमारा नाम भी डाल दिये साथ ही. कहने लगे कि बाकी रचनाकारों का उत्साह कम नहीं करना चाहते बकिया तो सब समझ ही जायेंगे कि ये आप हैं.

हम तो नतमस्तक हो गये. सोचने लगे कि यह होते हैं बड़े रचनाकारों के गुण कि आपके बारे में भी लिख गये, सबको पता भी चल गया और किसी को बुरा भी न लगा और नाम भी न आये.

वाह भई वाह, क्या बात है हमारे फुरसतिया की.

हम सीना फुलाये चैट बज़ार की गलियों में शहंशाह बने घूम ही रहे थे कि एक और ब्लागिया मित्र से मुलाकात हो गई. वह भी अंदर से बेहद प्रसन्न और उपर से गंभीरता का लबादा ओढ़े घूम रहे थे, हमें देखते ही तुरंत चहक उठे: " आपने पढ़ा आज फुरसतिया जी ने हमारे बारे में क्या लिखा? ".

हमारे मन में एकदम साहनभूति जाग गई. एक बार मन में आया कि बेचारा, कितनी बड़ी गलतफहमीं का शिकार हो गया है. रहने देते हैं, कुछ नहीं बताते हैं, कहीं हताशा में कुछ अवांछनिय कदम न उठा ले. रचनाकार तो है ही , चाहे कैसा भी हो. भावुक हृदय होता है. फिर भी रहा न गया. मैने उन्हें समझाया कि भईये, झूठ खुशफहमी न पालिये, वैसे आप ठीकठाक लिखते हैं, मगर अब ऐसा भी नहीं कि फुरसतिया जी आपके लिये कुछ लिखने लग जायें और वो भी इस तर्ज पर. वो हमारे लिये लिखा गया है, हमें तो खुद फुरसतिया जी बताये हैं.

वो आश्चर्य से देखने लगे और भर्राये गले से कहने लगे: "क्या बात करते हो आप भी. हमें भी तो खुद ही वो ही बताये हैं."
विचारों की आंधी चल पड़ी और जब थमीं तब हम दो हो गये थे, एक ही तीर का शिकार तो लगे साथ साथ घुमने. लोग मिलते गये और देखते देखते ऐसे ही शिकारों का कारवां बनता गया और अब तक हम आठ लोगों का हुजूम तैयार कर बाज़ार में ही घूम रहे हैं. अगर आप भी इसका शिकार हैं तो देर किस बात की-आईये न! हम आठ तो घूम ही रहे हैं, आप भी शामिल हो जायें. :)

देर से प्राप्त समाचारों के अनुसार, फुरसतिया जी के इस लेख से चार तरह के घायलों के मिलने की संभावनायें व्यक्त की जा रही है:



१. जिन्हें लगा कि फुरसतिया ने उनके बारे में लिखा है.

२. जिन्हें लगा कि फुरसतिया ने उनके बारे में लिखा है और उनके मित्रों ने उन्हें इस बात की बधाई भी दी (कई ब्लाग दिखते हैं जिसमें सब मित्र मिल कर लिखते हैं और रचना पर एक दूसरे को बधाई देते हैं. अब बाहरी कोई आये न आये, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता)

३. जिन्हें लगा कि फुरसतिया ने उनके बारे में लिखा है और बाद में वो फुरसतिया जी को खोजते रहे कन्फर्म करने को और वो नहीं मिले.

४.जिन्हें लगा कि फुरसतिया ने उनके बारे में लिखा है और बाद में वो फुरसतिया जी को खोजते रहे कन्फर्म करने को और वो मिले तो कन्फर्म कर गये कि वो आप ही हैं जिनके बारे में उन्होंने लिखा है. (मैं इस श्रेणी का कहलाया)




आप भी बतायें न! क्या आप भी शिकार बनें. अगर हां, तो कौन सी श्रेणी में आप रखे जायेंगे?

याद आ रहा है मुझे:

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर, लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया...........

--समीर लाल'समीर'

शुक्रवार, अक्तूबर 13, 2006

चलो आगे चलें..

कल कुछ पंक्तियां लिखी थीं, देश लगे शमशान अब थोड़ा आगे बढते हैं, इन्हें देखें. कहीं कुछ जुड़ा जुडा सा लगता है :

अपने दिल में ही तलाशो,
तह में सच को पाओगे.
खुद की नज़रों से भला,
तुम कब तलक बच पाओगे.

तख़्त फांसी से उतर के,
किस तरह जी पाओगे.
डूब कर निज ग्लानि में,
तुम खुद -ब-खुद मर जाओगे.



//१//


इस जहां मे अब नहीं, कोई खुदा रह पायेगा
वहशती चालों को तेरी, अब नहीं सह पायेगा.
बांध ले सामां तू अपना, गर खुदा से वास्ता
शातिराना बात अपनी कब तलक कह पायेगा.

//२//

हो खुदा ,भगवान हो या, एक ही तो बात है
चाहे घर कोई हो तोड़ा, सिर्फ़ उसकी मात है
तोड़ कर के एक घर को, दूसरा बनवाओगे
मानता हूँ मै निहायत, बेतुका जज्बात है.

सादर
समीर लाल 'समीर'

बुधवार, अक्तूबर 11, 2006

देश लगे शमशान

कितने घर बर्बाद हुये हैं
कितने नर-संहार हुये हैं
तेरे घृणित कृत्य के आगे
देव सभी लाचार हुये हैं.

मानवता का वह हत्यारा
क्यूँ तेरी है आँख का तारा
उसको जीवन-दान दिला के
तूने किसको है ललकारा.

तू समझा है नाम हुआ है
ओ नादां, बदनाम हुआ है
साथ दिया है हत्यारे का
ये अक्षम्य ही काम हुआ है.

आस भोर की शाम नहीं है
जीवन यह आसान नहीं है
क्यूँ है हरदम साबित करता
नेता है तू, इंसान नहीं है.

युवा जाने कहाँ सो गया
देश महान कहाँ खो गया
ऐसा क्यूँ सब मौन धरे हो
देश लगे शमशान हो गया.

भूल यह तेरी, हरदम होगा
कल का युवा कम न होगा
अभी वक्त है जरा संभल जा
दंड भी तुझको भरना होगा.


--समीर लाल 'समीर'

मंगलवार, अक्तूबर 10, 2006

कुण्डली सीखो हे कविराज

// इस लेख के पहले कृप्या एक पाती-समीर भाई के नाम जरुर पढें, तो ज्यादा आन्नद आयेगा//

आज नारद फीड पर नजर के घोडे दौड़ा रहे थे कि एकाएक नजर एक पाती-समीर भाई के नाम पर गई, हम घबराये कि क्या हो गया, भईया. तुरंत चटका लगाये और पहुँच गये:

एक पाती-समीर भाई के नाम

आपकी कुण्डलियाँ पढ़-पढ़कर हमारा मन व्याकुल हो उठा है कुण्डलियाँ लिखने को, मगर हम ठहरे इसमे बिलकुल अनाड़ी, क्या करें???

अब तक ऐसे कांडों मे न जाने कितने लोगों को अधीर होते, उत्साहित होते, आतुर होते और न जाने क्या क्या होते देखा था, पर आपको इस अंदाज में व्याकुल होते देख हमारे तो आँख से अश्रुधार ऐसी फूटी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. अब जब लेख लिखने लगे हैं तो मन कुछ हल्का होता जा रहा है.आशा है पूरा लेख हो जाने पर आपकी व्याकुलता इन्डेक्स में त्वरित गिरावट आयेगी, ऐसी आशा की जाती है.

बड़ी शिकायती लहजे में कविराज जी कह रहे हैं कि वो प्रतीक जी, जीतू भाई, अनूप जी सबके पास गये और हमें गुगल चैट का आमंत्रण भी भेजे जो हमने स्विकार नहीं किया, इसलिये खुली पाती को ईमेल माना जाये.

वाह कविराज जी, आपने इतने दर खटखटाये मगर हमें एक ईमेल भी नहीं? आपका चैट का आमंत्रण भी मिल गया मगर हम समझे कवि है, जरुर कविता सुनायेगा, इसीलिये टक्कर देने के उद्देश्य से सोचे कि पहले कुछ सुनाने के लिये कवितायें लिख लें तब आमंत्रण स्विकारें. वरना तो आप ही आप सुनाते, हम सिर्फ वाह वाह कहते रह जाते औपचारिकतावश. चूँकि आप भी कवि हैं तो आप भी वाह वाह में छुपे आह आह को समझ न पाते और उसे सही की वाह वाह मान कर झिलाते चले जाते. तो सांप के काटे का जहर उतारने के लिये सांप का ही जहर चाहिये, यही सोच कर कविता लिखने में जुटे रहे और आप ईमेल की आड़ में झाड़ ही काट लिये, पूरी पोस्ट ही लिख मारे. हम घबरा गये, तुरंत आमंत्रण भी स्विकार कर लिये और आपकी पोस्ट रुपी ईमेल पर टिप्पणी रुपी पावती भी धर आये:

देखा था गुगल चैट पर, कल ही आपको कविराज
पेंडिंग पड़ा निवेदन भी, एक्सेप्ट कर लिया आज.
एक्सेप्ट कर लिया आज कि अब हम लिखेंगे लेख
कुण्ड़ली पर जो अल्प ज्ञान है तुम भी लेना देख
कहे समीर कि हमरा तो सिर्फ़ कुण्ड़लीनुमा लेखा
नियम लगे हैं बहुत से, जब असल कुण्डली देखा


कविराज जी, आपका लेख भी अच्छा बन गया. अच्छा कहने के लिये जो मापक यंत्र हमने इस्तेमाल किया है वो लेख को मिली हुई टिप्प्णियों की संख्या है. हालांकि यह यंत्र हमेशा सत्य परिणाम नहीं देता है, ऐसा मेरा मानना है और मेरी यह मान्यता तब और बलिष्ट हो जाती है, जब मेरे लेखों को टिप्पणी नहीं मिलती है. खैर, छोड़िये न इन बातों को, इसमें क्या रखा है. मगर आज तो आपके केस में इस यंत्र ने बिल्कुल ठीक कार्य किया है.

तो आपने लेख लिखने में महारथ हांसिल कर ली. हाईकु में वाह वाही तो आप लूट ही रहें हैं, खास तौर पर ब्लागर हाईकु पर तो सच्ची वाली वाह वाह भी:

समीर नहीं
अब बदलो नाम
कुंडली किंग


हमारी टिप्प्णी:

क्या लिखते हो, भाई.

// ध्यान से देखें, टाईपो नहीं है. टिप्पणी में वाक्य समाप्ति पर सच में पूर्णविराम लगाया है, प्रश्नवाचक (?) चिन्ह नहीं. //

तो हम कह रहे थे कि लेख आप लिखें, हाईकु में आप पताका फहरायें, कविता आप करें, गजल आप लिखें, क्षणिकायें आप लिखें और अब मात्र बचा हुआ एक आईट्म, कुण्ड़ली भी व्याकुल होकर करने लगें तो बाकी सब ब्लागर, जीतू भाई की शैली में, क्या तेल बेचें. कुछ तो छोड़ दो, महाराज. हर मैदान में तो आपका झंड़ा ही फहरा रहा है फुरुर फुरुर..कहीं तो हमें भी, झंड़ा न सही, फटा हुआ रुमाल टांगने की जगह तो दे दो, हे महारथी.

वैसे, हम जानते हैं कि अगर हम नहीं बतायेंगे तो भी आप चुप थोड़े बैठोगे. अरे, जब हमारे चैट का निमंत्रण न स्विकार करने की बात आपने नगाड़ा बजा बजा कर वाया प्रतिक भाई, अनूप भाई, जीतू भाई को बताते बताते पूरे ब्लाग जगत को बता दी तो यह कोई दबेगी छुपेगी थोड़ी. फिर कोई न कोई दयालु आपको वो पता भी बता ही देगा, जहाँ से नियम टीप कर हम पूरी तो नहीं, मगर कुण्डलियों के समान दिखने वाली रचनायें लिखना सीख गये. तो हम भी सोचते हैं कि चलो छोड़ो यार, बता ही देते हैं. ज्यादा होगा तो रुमाल जेब में ही रखे रहेंगे और गाहे बगाहे हाथ से ही हवा में लहरा दिया करेंगे.

ठीक है जैसी हरि इच्छा:

हमने सबसे पहले इसके बारे में पढ़ा था अनुभूति पर और फिर इस बारे में कभी कुछ नहीं पढ़ा, तो सो ही आप भी कर लो और अगर वहां जाकर नहीं पढ़ना तो वह भाग विशेष यहां पुनः आपकी सेवा में पेश है. अब चूँकि लेख का इस्तेमाल आपको जानकारी देने हेतु किया जा रहा है, अतः मुझे विश्वास है कि पूर्णिमा वर्मन जी इसके इस हिस्से के बिना अनुमति के पुर्न-प्रकाशन का बुरा नहीं मानेंगी:



कुण्डलियाँ

इसके आरंभ मे एक दोहा और उसके बाद इसमें छः चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में चौबीस मात्रायें होती हैं. दोहे का अंतिम चरण ही रोला का पहला चरण होता है तथा इस छ्न्द का पहला और अंतिम शब्द भी एक ही होता है.

उदाहरण-

दौलत पाय न कीजिये, सपने में अभिमान.
चंचल जल दिन चारिको, ठाऊँ न रहत निदान.
ठाऊँ न रहत निदान, जयत जग में रस लीजै.
मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही की कीजै.
कह 'गिरधर कविराय' अरे यह सब घट तौलत.
पाहुन निशि दिन चारि, रहत सबही के दौलत.


दोहा

इस छ्न्द के पहले-तीसरे चरण में १३ मात्रायें और दूसरे-चौथे चरण में ११ मात्रायें होती हैं. विषय(पहले तीसरे)चरणों का आरम्भ जगण नहीं होना चाहिये और सम (दूसरे-चौथे) चरणों का अन्त लघु होना चाहिये.

उदाहरण-

मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय.
जा तन की झाँइ परे, स्याम हरित दुति होय. (२४ मात्राएं)


रोला

रोला छंद में २४ मात्रायें होती हैं. ग्यारहवीं और तेरहवीं मात्राओं पर विराम होता है. अन्त में दो गुरु होने चाहिये.

उदाहरण-

'उठो उठो हे वीर, आज तुम निद्रा त्यागो.
१२ १२ २ २१, २१ २१ १२ २२ (२४ मात्रायें)
करो महा संग्राम, नहीं कायर हो भागो.
तुम्हें वरेगी विजय, अरे यह निश्चय जानो.
भारत के दिन लौट, आयेंगे मेरी मानो.



गण और मात्राओं के विषय में अधिक जानकारी के लिये अनुभूति पर देखिये.



आशा है अब आप कुण्डली कला मे पारंगत हांसिल करेंगे और शीघ्र ही कुण्डलियाँ दागना शुरु करेंगे.

हम तब तक आपके लिये कुण्डली-वीर का खिताब धो-पोंछ कर रखने की तैयारी में निकलते हैं.

--समीर लाल 'समीर'