शनिवार, दिसंबर 31, 2016

नये साल का नया प्रश्न:



नया साल आते ही एक नया प्रश्न मूँह बाये खड़ा हो जाता है कि इस साल क्या संक्ल्प लिया जाये? हालांकि नया साल एकाएक नहीं आता. पिछली बार जब नया साल आया था तब से पता था कि अगली बार नया साल कब आयेगा मगर नये साल में क्या नया किया जाये, यह प्रश्न नया साल आते ही एकदम नया हो कर फिर से खड़ा हो जाता है.
फिर लोग बहुत सोच समझ कर किन्तु भगदड़ में इस नये प्रश्न के जबाब में तरह तरह के संकल्प करते हैं. एक बहुत बड़ी आबादी का निरंतर साल दर साल का संकल्प होता है कि इस साल सेहत पर ध्यान देना. वजन कम से कम ३० पोण्ड कम करना है. कोई इस साल शादी कर के मानेगा तो किसी को इस साल कार लेना है. कोई मकान खरीदेगा तो कोई हम माह एक नई किताब पढ़ेगा. किसी का कहना कि अब बस बहुत हुआ, अब से बस १ घंटा देंगे फेस बुक को रोज.
किसी के पास बचत की योजना है तो किसी को यूरोप घूमना है.
कोई अपनी दिनचर्या में बदलाव करेगा तो कोई नई नौकरी पाने के लिए जी जान लगा देगा.
याने कि संकल्पों की एक फौज खड़ी हो जाती है नया साल आते ही और ९९.९ प्रतिशत संकल्पों की नियति एकदम ठीक चुनावी वादों की तरह कभी न पूरा होना है. हर संकल्पकर्ता हर वर्ष अपने नये के जबाब में एक नया संकल्प यह भी जोड़ देता है कि इस बार पहले की तरह नहीं होगा, इस बार तो पूरा करके ही मानूँगा. पुनः जैसा हर नेता हर चुनाव में अपने चुनावी वादे के लिए कहता है इस बार यह जुमला नहीं वादा है. मगर वक्त के साथ फिर से वादा जुमले में तब्दील हो जाता है.
२०१७ कुछ अलग सा है. इसमें नये प्रश्न के उतत्तर में कुछ नये संकल्प भी जुड़ेंगे मसलन किसी को आप कहते सुनेंगे कि इस साल तो काला धन आते ही ठिकाने लगाना है, नगद रखने का तो सवाल ही नहीं. कोई कह रहा था कि सारी प्रापर्टी गलानी है इसके पहले की इस दिशा में कोई दीमक पकड़ने निकले. चुहिया तो पकड़ा गई जो नोट कुतरती थी. एक सज्जन अजब सा संकल्प लेते दिखे कि इस साल अजगर बनना है. हम पूछने को मजबूर हो गये कि ऐसा क्यूँ? तो कहने लगे कि अजगर कुतरता नहीं, निगलता है और उसके साथ साहेब की संगाबित्ती है, बीन सपेरा डांस खेलने की. अजगर को सजा का प्रवधान नहीं है. मानो अजगर न हुआ..राजनितिक दल हो गया हो.
सरकार के संकल्प हैं कि चुन चुन कर मारुँगा. कोई नहीं बचेगा सिवाय उनके जिन्हें हम बचाना चाहेंगे और आम जन के संकल्प हैं कि काश!! किसी तरह उस श्रेणी में आ जायें जिसे वो बचाना चाहते हैं.
पता है कि संकल्पों का क्या हश्र होना है मगर फिर भी, कुछ अपवाद स्वरुप, संकल्प पूरे भी तो होते हैं.

-समीर लाल समीर
#Jugalbandi #जुगलबन्दी

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2016

अँगूठा महात्म


आज समाचार आया कि साहेब ने अँगूठा छाप की परिभाषा बदल दी है. यह अनेकों बदलती परिभाषाओं की कड़ी में एक और कदम है.
बताया गया कि पहले अँगूठा छाप का मतलब अनपढ़ होता था और आज जमाना बदल गया है. मितरों, अब यह आपका अँगूठा आपकी पहचान होगा. मेरी समझ से अनपढ़ को अँगूठा छाप जरुर कहते थे मगर अँगूठे की छाप (थम्ब इम्प्रेशन) की महत्ता अपनी जगह तो थी ही. जमीन की खरीद बेची और अनेक कानूनी दस्तावेजों में अँगूठे की छाप ही मान्य थी. आज भी रजिस्ट्री कार्यालय में काली स्याही से लदे और पुछे टेबल के मेजपोश अँगूठे की छापों की जाने कितनी जानी अनजानी कहानियाँ समेटे हैं.
समझ में आया कि बस, अब जो है सो आपका अँगूठा. कोई भीमकाय एवं ताकतवर भीम एप लाया जा रहा है तब न इन्टनेट, न स्मार्ट फोन, न फीचर फोन, न मोबाईल- बस, अँगूठा सलामत रखो, पूरी दुनिया आपकी. बाद में पता चला कि इस एप का नाम इसके ताकतवर होने के कारण भीम नहीं रखा गया और न ही राहुल बाबा को खुश रखने के लिए छोटा भीम की तर्ज पर, यह बाबा भीम राव अम्बेडकर के नाम पर रखा गया है.
इसके बाद दृष्य कुछ यूँ उभरे:
आने वाले समय में किसी से आप पूछेंगे कि क्या पढ़े हो? वो आपको अँगूठा दिखायेगा याने कि उसे अनपढ़ समझने की भूल मत करना.
बाजार में जेबकतरों के बदले अँगूठाकतरे घूमा करेंगे. आवाज सुनाई देगी..पकड़ो पकड़ो, वो मेरा अँगूठा काट कर भागा जा रहा है.
कोई अधिकारी रिश्वत मांगेगा और बंदा उसे अँगूठा दिखायेगा. अँगूठा ही रुपया, अँगूठा ही प्रमाण पत्र, अँगूठा ही पढ़े लिखे होने का सबूत.
बैंक से पैसा निकालना हो तो अँगूठा ही सब कुछ होगा. अँगूठा दिखाओ, पैसा पाओ.
आने वाले समय में हेलमेट की जगह बाजार में अँगूठा सेविंग पाईप टाईप की कोई वस्तु बिकती दिखेगी. सर फट जायें मगर अँगूठा न चोटिल हो. न पट्टी चढ़े, न प्लास्टर. अगर अँगूठा गया तो आप गये. भूखे मरने की नौबत आ जायेगी.
अब अँगूठा दिखाने को याने कि ठेंगा दिखाने को चिढ़ाने की श्रेणी से बाहर कर दिया गया. अतः अगले चुनाव में जब ये नेता वोट मांगने आये तो खुले आम ठेंगा (अँगूठा) दिखाईये.
कोई बुरा नहीं मानेगा.

-समीर लाल समीर

आज http://www.newsbox4u.com/details.php?news_id=6812&module_id=23
 में प्रकाशित...

गुरुवार, दिसंबर 29, 2016

मित्र को पत्र



प्रिय मित्र बराक
कैसे हो? बहुत दिन हुए तुमसे गप्प सटाका नहीं कर पाया फोन पर. अब तो २०१६ खत्म होने में २ दिन का समय बचा है और उसके २० दिन बाद तुम्हारा कार्यकाल भी समाप्त हो जायेगा. जानता हूँ तुम चलते चलते समेटने में लगे होगे. मिशेल भौजी भी घर भांड़े का सामान नये घर में शिफ्ट कराने के लिए पैकिंग में जुटी होंगी. नमो नमो बोल देना उनसे. सुना है जो नया घर अलॉट हुआ है वो भी काफी बड़ा और खुला खुला सा है. मगर जो भी हो व्हाईट हाऊस तो नहीं ही हो सकता है. अगली दफा जब अमरीका आऊँगा तो कोशिश करुँगा तुम्हारे नये घर पर आने की.
मैं जानता हूँ कि अब २० जनवरी के बाद तुम्हारे पास काफी खाली समय रहेगा और तुम किताबें लिखोगे. तुम्हारे यहाँ तो सभी राष्ट्र्पति सेवानिवृति के बाद लेखन को पेशा बनाते हैं सो तुम भी बनाओगे ही. पैसा भी तो बहुत बरसता है इन पुस्तकों से. अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति होने पर इतनी तो बनती है. हमारे यहाँ यह हथकंडा नेता जेल जाने पर अपनाते हैं. वहाँ भी खाली समय काफी रहता है. कभी किताब लिखते हुए मन उचाट हो जाये तो खबर करना. यहाँ भारत में किसी चैरीटी कार्यक्रम का बुलावा भिजवा दूँगा. यहाँ कुछ समय के लिए हमारे मेहमान बन कर घूम जाना. कुछ आदिवासी नृत्य आदि का प्रबंध करा दूँगा...किताब के लिए नया मटेरियल भी मिल जायेगा...तुम तो जानते ही हो मैं यारों का यार हूँ.
याद है जब तुम पिछली बार आये थे और कह रहे थे कि मेरा नाम उच्चारित करना थोड़ा मुश्किल है ..कहीं प्रेस के सामने भूल न जाऊँ तो मैने अपने पूरे सूट पर अपना नाम गुदवा मारा था ताकि तुम वहाँ से पढ़कर मेरा सही नाम बोलो और कोई जान भी न पाये. मन तो था कि माथे पर अपने नाम का गुदना गुदवा लूँ तुम्हारे लिए मगर फिर ख्याल आया जो युवा प्रेमी प्रेमिका जवानी के आवेश में आकर एक दूसरे का नाम हाथ पर गुदवा लेते हैं, उनका बुढ़ापा फुल स्लीव की कमीज पहने ही गुजरता है. फिर अगर मैं माथे पर गुदवा लेता तो टोपी पहने गुजरता और तुम तो जानते ही हो कि मैं टोपी पहनाता हूँ, पहनता नहीं.
तुमने मुझसे एक बार गपाष्टक के दौरान पूछा था कि मेरी हॉबीज़ क्या क्या है और मैने तुमसे बताया था कि एक तो यारी निभाना और दूसरा, पतंग उड़ाना. हर गुजराती को पतंग उड़ाना बहुत पसंद होता है.
तो हाल में दो तीन बड़ी यारियाँ निभाते हुए मैने ८ नवम्बर को ऐसी पतंग की पैंग भरी कि पूरा देश देखता रह गया और तब से रोज, कभी ढील छोड़, कभी टाईट कर, कभी दायें, कभी बायें, कभी ऊपर, कभी नीचे, ऐसी ऐसी कुलाचें लगा रहा हूँ कि पूरा देश हलाकान है और मैं अपनी कार गुजारियों पर ताली बजा बजा कर नाच रहा हूँ. पप्पू आज कह रहे थे कि १२५ से ज्यादा कुलाचियाँ भरी हैं मैने इस बीच.
बहुत मजा आ रहा है. आसमान में तूफान है, देश हलाकान है और मेरी पतंगबाजी की पारंगतता से मेरी पतंग आसमान में तनी है. मेरे साथी बता रहे हैं कि देश लहालोट हो रहा है मेरी इस कलात्मक्ता पर. यारों के यार, अपने इस यार को काँधे पर उठाये हैं. नमो नमो के नारे ऐसे गुँजायेमान हैं कि देश में आये तूफान की गर्जन दब गई है.
एक बात बताऊं? ८ नवम्बर के बाद शुरु में जनता कहती थी कि ये कैसी पतंग उड़ा दी आपने?
तुम तो जानते ही हो मेरी मौके पर भावुक हो जाने की आदत...फेसबुक के दफ्तर के विडियो में भी तुमने देखा होगा मेरा आँसूं बहाना...मैंने आँख में आँसू भर के अवरुद्ध कंठ से ५० दिन की पतंग बाजी का समय मांगा था. अब वो भी अगले १ दिन में खात्मे पर ही हैं मगर मुझे कोई चिन्ता नहीं है. मैंने कैशलैश इकनॉमी वाली एक नई पतंग भी उड़ा छोड़ी हैं. नोटबंदी वाली पतंग कट कर गिरे, उसके पहले कैशलैस वाली पतंग की ऐसी करामात दिखाने लगूँगा कि लोग पचास दिन भूल कर नई पतंग के साथ साथ ठुमके लगायेंगे..ये इधर..ये उधर...और मैं ताली बजा कर नाचूँगा..
१४ जनवरी को संक्रांत है. उस दिन गुजरात में खूब पतंग उड़ाई जाती है और तिल के लड्डु बांटते हैं मित्रों में.
मैं लगा हुआ हूँ विचार में कि उस दिन एक नई पतंग तानूँ...डिजिटल कंदील लटका कर..कि सब देखने वालों की आँख जगमग हो जाये..एकदम से आँख चौंधिया कर रह जाये...शिकायत दर्ज करेंगे तो उनको मोतिया बिन्द के इलाज शिविर में भिजवा दूँगा..उन शिवरों के लिए एक बाबा से बात चल रही है, योगा से मोतिया बिन्द का इलाज..मात्र ६ माह में.. तब तक यूपी, पंजाब और गोवा के चुनाव भी निपट ही जायेंगे...
वैसे जिस तरह लोग तुम्हें ओबामा केयर के लिए हमेशा याद करेंगे, उसी तर्ज पर लोग मुझे मेरे नमो फेयर (जो डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, मेक इन इण्डिया, सफाई और कैश लेश मेला मैने सजाया है) के लिए याद करेंगे, ऐसा मेरा अटूट विश्वास है.
संक्रांत पर तिल के लड्डु भिजवाऊँगा..भौजी को भी खिलाना...कब्ज में फायदा करते हैं.
फ्री होकर बात करते हैं किसी दिन...और हाँ, डोनाल्ड से दोस्ती जमाने के लिए कोई टिप है क्या?
चालो...नमो नमो!!

तुम्हारा..मोटा भाई 

बुधवार, दिसंबर 28, 2016

बदलता कानून...



ये १ जनवरी, २०१७ की बात है. (टाईम मशीन फॉरवर्ड मोड में)
चौराहे पर खड़े हवलदार ने इशारा करके उसकी गाड़ी रोकी और सिपाही से बोला- तलाशी लो इसकी?
वो आश्चर्यचकित था कि आज तक तो ट्रेफिक पुलिस लाईसेन्स और कागज मांगती थी., ये तलाशी वाला काम कब से शुरु कर दिया?
सिपाही ने उसकी जेब की तलाशी ली और हवालदार को बरामाद रुपये देते हुए बोला- साहेब, ये बीस हजार के पुराने नोट बरामद हुए हैं इसके पास? गिरफ्तारी बनाऊँ इसकी?
उसने हवलदार से पूछा- ये कौन से कानून में लिखा है कि २०००० रुपये लेकर नहीं चल सकते? मैने भी कानून पढ़ा है, ये देखो कानून की किताब, बताओ इसमें कहाँ लिखा है? उसने बाजू वाली सीट से कानून की किताब उठा कर हवलदार को दिखाते हुए कहा.
हवलदार हँसते हुए बोला- ये कानून की किताब थी, अब इतिहास की किताब कहलाती है. आजकल तो कानून बुलेट ट्रेन की स्पीड़ से भी तेजी से बदलते हैं और आप नवम्बर का एडीशन लिये घूम रहे हो. डिजिटल इंडिया का जमाना है, अपडेटेड ईबुक रखा करो कानून की अपने फोन में. अब १०००० से ज्यादा के पुराने नोट रखने पर ४ साल की सजा है.  
फिर हवलदार ने धमकाते हुए कहा- कहाँ से लाया ये रुपये?
मामला बिगड़ता देख उसने पैतरा बदला, आखिर वकील जो ठहरा- ये नोट मेरे नहीं हैं. पीछे सीट के नीचे तमंचा रखा है, वो ही अड़ा कर वो कोने में जो मोटरसाईकिल लिये बंदा खड़ा है उससे लूटा है.
क्या बात करते हो? हवलदार आश्चर्यचकित सा उसे देख रहा है और वह अपनी बात जारी रखते हुए कहता है कि मेरे ऊपर आर्मस एक्ट और राहजनी का केस लगा दो? जल्दी छूट जाऊँगा.
हमसे ज्यादा होशियारी नहीं. हमे तो ये नोट तुम्हारे पजेशन में मिले सो हम तो तुम पर ही केस बनायेगे. हवलदार नें २०००० रुपये के नोट दिखाते हुए कहा.
इतनी देर में उसने अपनी जेब से मोबाईल निकाला और हवलदार की २०००० रुपये पकड़े हुए तस्वीर ले ली और क्लाऊड में सेव भी कर दी और बोला- अगर पजेशन से जुर्म बनता है तो ये तो अभी आपके पजेशन में हैं, ये देखो फोटो भी प्रूफ के लिए.
हवलदार झल्लाया, हमारे पजेशन से क्या होता है, हम तो पुलिस वाले हैं?
पुलिस वाले ही हो न..कोई राजनेतिक दल तो हो नहीं कि कितना भी केश धरे रहो, कोई कानून ही नहीं लागू होता. मैं तुम्हारी फोटो लेकर अखबार और मीडिया में जाऊँगा, वो तुमसे भी बड़े वाले हैं, फिर देखना तमाशा.
अब हवलदार परेशान हुआ और कहने लगा- चलो अच्छा निकलो, ज्यादा बहस की तो अन्दर कर दूँगा.
वकील भला हाथ आया मौका कैसे जाने देता- उसने उसी हवलदार से उन नोटों को बदले २००० के नये नोट लिए और मुस्कराते हुए निकल गया.
सुना है कि थोड़ी ही देर में हवलदार ने भी उन २०००० रुपयों को ठिकाने लगवा दिया.
कहीं पैतरेबाजी, कहीं पोजीशन और कहीं पावर- सब मजे में हैं.
एटीएम की लाईन में जो खड़ा है न. उसके पास ये तीनों स्किल सेट नहीं है..वो आम आदमी है..

-समीर लाल ’समीर’

सोमवार, दिसंबर 26, 2016

नये युग का नया फकीर

जात न पूछो साधु की,पूछि लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ।।
ये तो थे कबीर..जो आज से ६०० साल पहले इतना कुछ लिख गये जो आज तक प्रासंगिक है. कबीर दास पक्के में फकीर थे- कहन से भी एवं पहनावे और रहन सहन से भी। उन्हें कभी यह कहने की जरुरत नहीं महसूस हुई कि मैं फकीर हूँ. जो भी उन्हें देखता, सुनता, जानता वह स्वतः ही उनके फकीर होने को जान लेता.
नये जमाने के फकीर तो चीख चीख कर कहते हैं कि मेरा क्या है, मैं तो फकीर हूँ. तब मात्र हँसी के और कुछ सूझता ही नहीं. कई बार गुगल पर जाकर फकीर का अर्थ जानने की कोशिश की. अनेक ग्रन्थ पढ़ डाले मगर फकीरी के जितने भी सांचे मिले, किसी में भी यह स्वयंभू फकीर फिट ही नहीं होता. अहम ब्रह्मा के भाव चेहरे पर लिए, हर विरोध का उपहास करते हुए नये फकीर नई नई परिभाषा गढ़ने में लगे हैं...
कालजयी ज्ञान को खुद के लिए धता बताते हुए और दूसरे के लिए जरुरी ठहराते हुए जाने कौन सी एक नई दुनिया का ढोल पीट रहा है यह फकीर.
सच्चे फकीर कबीर कहते थे:
निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
और नये स्वंयभू फकीर हर निन्दक को देश द्रोही ठहरा कर पाकिस्तान जाकर बस जाने की सलाह देने वाले दोहे सुना रहे हैं. आलोचक का नया अर्थ देश द्रोही बता रहे है.
नया फकीर स्वयं रचे नये दोहे पर कभी नाचता है, कभी विदेश जाकर ड्रम पीटता है, कभी मंच से आंसू बहता है तो कभी ताली पीट कर आँख नचा कर कुटिल मुस्कान से नवाजता है.
मुझे कतई आश्चर्य न होगा कि कल को फकीरी की भी एक नई परिभाषा घोषित कर दी जाये और पुराने सारे सच्चे फकीर देश द्रोही घोषित कर दिये जायें. 
दोहों में बदलाव लाया जा रहा है. बदलाव नित दिनचर्या का अंग बना दिया गया है. कल जो नियम थे वो आज नहीं है और जो आज हैं वो कल नही रहेंगे. बस, एक अड़धप का माहौल.
सूत्र मात्र एक अंग्रेजी का:
If you can’t convince someone, confuse him!!
याने कि अगर सामने वाले को आप अपनी बात समझा नहीं पा रहे हो तो उसे कन्फूज कर डालो.
खैर इधर तो खुद को ही अपनी बात न समझा पाने वाला इसके सिवाय करे भी तो क्या करे.

आज फिर एक दोहा बदला गया..
बाप न पूछो साधु का, गुरु का लिख दो नाम
पासपोर्ट दे दो उन्हें ताकि विदेश करें प्रस्थान..
अब यह कौन निर्धारित करेगा कि साधु संत कौन है? उसकी परिभाषा क्या है? कौन साधु संत होने का प्रमाण पत्र देगा.. जाने कौन कौन साधु संत बन कर विदेश निकल लेंगे.
एक नया परिवर्तन...एक नया युग..एक नया दोहा..
आज फिर नया फकीर कहीं नाचेगा है अभी...

-समीर लाल ’समीर’ 

शनिवार, दिसंबर 24, 2016

दिसम्बर में देश


वह रजाई में घुसा हुआ सड़क के किनारे लगभग बुझते हुए सरकारी अलाव के पास न जाने किस बात का इन्तजार कर रहा था, कोई नहीं जानता था. रजाई के बाहर कतार में खड़े लोग बस अनिश्चितता के बादल छँटने का इन्तजार कर रहे थे.. कड़ाके की ठंड और कोहरे की धुंध से ज्यादा धुँधलका वातावरण में अनिश्चितता का था. उसने रजाई में लेटे लेटे न जाने कितनी बार पूछा होगा कि ईज इट देयर? (आया क्या या आई क्या? पूछ रहा था शायद). भीड़ में जो सुनता वो उसे अपनी समझ के हिसाब से जबाब देता कि नहीं, अभी नहीं..और वो फिर रजाई ढ़ाप कर लेटे रहता. किसी ने उससे यह पूछा ही नहीं कि वो जानना क्या चाहता है. अक्सर अपनी परेशानी में उलझा व्यक्ति दूसरे की समस्याओं पर ध्यान हीं नहीं दे पाता और उसे लगता है कि शायद सामने वाला भी उसी समस्या का जबाब चाह रहा है जिससे वह जूझ रहा है.
हर सुनने वाला उसे अपने हिसाब से समझता, मगर जबाब एक ही होता..नहीं, अभी नहीं!
किसी ने समझा कि वो एटीएम में कैश आने के लिए पूछ रहा है..ईज इट देयर? किसी ने समझा कि ठंड से परेशान होकर सूरज के आने के इन्तजार में है..किसी ने समझा कि वो कैश लैश इण्डिया का इन्तजार कर रहा है तो किसी ने समझा कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत का..
कोई समझता रहा कि उसे अच्छे दिनों का इन्तजार है तो किसी ने समझा कि अपने मोबाईल में नेटवर्क आने के इन्तजार में है. कोई समझ रहा था कि शायद कोहरे के चलते अब तक न आई किसी बस का इन्तजार कर रहा है तो कोई समझ रहा था कि कल शाम से गुल बिजली के आने का इन्तजार है. एक की नजर नल पर थी कि शायद वह पानी आने का इन्तजार कर रहा है.
चाहे जिसने जो भी सोचा या जो भी समझा -हर बार जबाब एक ही कि नहीं, अभी नहीं आया या नहीं आई!!
अजब विड़ंबना थी. उसने देर रात ही एटीएम की कतार में खड़े खड़े सीने में दर्द का अहसास किया था और जमीन पर लेट गया था. कतार छोड़ता तो शायद कल फिर रुपये न निकाल पाता. पड़ोस से न जाने कौन उसे रजाई उठा कर डाक्टर लाने का वादा करके चला गया था. वो उसी के आने का इन्तजार कर रहा था. घंटो बाद अभी वह व्यक्ति लौटा किसी डॉक्टर को लिवा कर जिसने आते ही उसकी नब्ज टटोल कर उसके मृत होने की घोषणा कर दी.
एक लम्बे इन्तजार के बाद, जिसमे हर आने का जबाब न में था, मौत हाँ बन कर आई.
सरकारी बयान है कि मृत्यु का कारण एटीएम की लम्बी कतार नहीं, हृदयधात है जिसकी एक पत्रकार वार्ता मे सरकारी डॉक्टर ने पुष्टी भी कर दी है.
कुछ ऐसा हाल रहा इस दिसम्बर में देश का...याद रहेगा यह दिसम्बर भी देश को बहुत बरसों तक... जैसे याद दिलाता है दिसम्बर देश को बावरी मस्जिद की या भोपाल गैस काण्ड की,,,

-समीर लाल ’समीर’  
#व्यंग्यकीजुगलबंदी