रविवार, अगस्त 30, 2009

शादी की सालगिरह और तुम...

२५ अगस्त को जब हमारी शादी की सालगिरह थी, तब बहुत से ईमेल और कमेंट से पाठकों ने अपनी बधाई प्रेषित करते हुए बहुत सी बातें कहीं. सभी का स्नेह हेतु आभार. जो नहीं कर पाये, उनका भी. आगे बने रहना, अभी और आयेंगे, इस हेतु.

किसी ने पूछा कि आपने क्या गिफ्ट दिया?

काहे भाई, गिफ्ट देने को हम ही बनें हैं क्या? उनका काहे नहीं पूछ रहे कि उन्होंने क्या दिया आपको, यू नारी सपोर्टर!! :)

वैसे सच बतायें...उन्होंने हमें हमारे हाल पर रहम खा कर चोरी गया अज़ारो परफ्यूम नया लाकर दे दिया. और हमने क्या दिया?? अरे, सामान तो हमारा चोरी हुआ था न..उनके पास तो है ही..फिर भी लंच पर ले गये और खाकर बड़ी प्यारी सी क्यूट वाली स्माईल दे आया हूँ. कैसी रही?? इससे अच्छी गिफ्ट और क्या दें भई इस उम्र में?

लेकिन क्या बतायें हमारे ही परफ्यूम वाले पैकेट में उससे तीन गुना मँहगा एक लेडीज़ परफ्यूम भी निकला-हमने पूछा कि ये किसके लिए? वो हसीन मुस्कराहट चेहरे पर लाकर बोलीं, जरा शरमाते हुए-ये आपकी तरफ से मेरे लिए. कैसी लगी? अब क्या कहे, हमारी तरफ से है तो खराब, मंहगा आदि कुछ कहने के काबिल तो बचे ही कहाँ..हाँ हाँ हें हें, बहुत बेहतरीन कहने के सिवाय क्या रास्ता रह बचा, सो कह कर चुप हो लिए. बहुते आत्म निर्भर बीबी टकरा गई है भई. हाँ हाँ हें हें की आदत तो खैर ब्लॉगजगत का टिप्पणी विश्व बखूबी डाल ही गया है. :)

कोई पूछता है कितने साल हो गये शादी के?

काहे बतायें जी? इन्श्योरेन्श एजेंट हो क्या? हमारे हिसाब से तो अभी अभी हुई है..साल भी नहीं बीता और सालगिरह मना लिए हैं..अब कहो? दिखा दो आज तक पर..सनसनी खेज खुलासा..साल के पहले सालगिरह मनाई...अमाँ यार, मिठाई खाओ और खुश रहो-काहे याद दिलाते हो!!

तुम्हारे चक्कर में एक सज्जन की बात याद आती है. बड़ा अपना सा लगता है वह भाई.

एक रात उसकी पत्नी की आँख खुली तो देखा, हर पत्नी की तरह आदतन टतोलते हुए,पतिदेव बाजू में नहीं हैं. खोजते खोजते नीचे उतर कर आई तो देखा, वो ड्राईंगरुम में बैठा सुबक सुबक कर रो रहा है.

पत्नी परेशान, पूछा कि अजी, आज हमारी शादी की २० वीं सालगिरह है खुशी का मौका है और आप रो रहे हैं?

पति बोला-डार्लिंग, तुम्हें याद है कि जब हम छिप छिप कर प्यार किया करते थे तो तुम्हारे पिता जी हमें रंगे हाथों पकड़ लिया था एक रात अस्विकार्य अवस्था में..

पत्नी बोली-हाँ हाँ, याद है.

फिर तुम्हारे कर्नल पिता जी ने बोला था कि मेरी लड़की से शादी करो वरना मैं अपने आपको गोली मार लूँगा. इल्जाम तुम सिर पर लिख जाऊँगा और तुमको आजीवन बीस साल की सजा पड़ेगी.

हाँ हाँ, याद है मगर रो क्यूँ रहे हो?

अरे, इसीलिए तो रो रहा हूँ कि आज तो मैं जेल से छूट गया होता... :)

लेकिन ये तो उस मित्र की बात है जो अपना सा लगता है, हमारी नहीं. हमें क्या लेना देना उससे. हम तो बंदी ही सही. आखिर, जीवन से समझौता भी तो एक चीज होती है.

किसी ने कहा कि हमें तो लगा था कि आज आप साधना जी पर कुछ गज़ल लिख कर पेश करेंगे मगर आप तो चुप मार गये.

अब क्या बतायें-शादी के इतने साल बाद अपने हाथ में कहाँ कुछ कि कुछ बोल पायें. जितना आदेश हो, उतना बोल लेते हैं. आपकी सूचना हमने उनको भी दे दी कि पाठक (हमने प्रशंसक बताया ताकि ऐठन बरकरार रहे) ऐसा चाहते हैं, तब जाकर एक दो दिन में परमिशन मिली और हम जुटे लिखने में.

लिखना तो क्या था, दिल के भाव है. बस, शब्द देने थे. कोशिश की और आप देखिये कि कोशिश कारगर रही कि नहीं. व्यवहार वैसा करो जो सरकार चाहे के आधार पर.

आपका एप्रूवल मिले तो फिर उनको सुनाई जाये.

तस्वीर सामने धर कर आँख बंद कर, तुलसी दास बने लिखे हैं. कुछ त्रुटि हो तो बंद आँख को याद करना वरना तो आप जानते ही हैं कि हमने लिखी है:

sadhnaji

तुम...

शून्य में भी चेतना का पूर्ण एक आधार हो तुम
हर सुखद अनुभूतियों में, बसा एक संसार हो तुम.

अग्नि प्रज्जवलित हो चुकी, अब होम की बातें करें
यज्ञ की संपूर्णता में, तेज बन साकार हो तुम.

सात जन्मों तक रहेगा, साथ मेरा और तुम्हारा
इन प्रचारित रीतियों का, खुला मंगलद्वार हो तुम

मैं भटकता जा रहा था, जिन्दगी की राह पर
पथ दिखाती सूक्तियों का, स्वयं एक उच्चार हो तुम.

कुछ गढ़ा कुछ अनगढ़ा आकार है इन मूर्तियों का
अनगढ़ी इन मूर्तियों में प्रणय बन साकार हो तुम.

-समीर लाल ’समीर’

बुधवार, अगस्त 26, 2009

कैसा ये कहर!

१९ अगस्त को ह्यूस्टन से वापस आये और २० अगस्त को टोरंटो मे टरनाडो (Tornado) ने भीषण तबाही मचाई. मानो हमारे आने का इन्तजार कर रहा हो.

थोड़ा सा भला ये रहा कि शायद जान गया होगा कि इनका सामान वगैरह गुम गया है, घाटा लग चुका है और परेशान है तो हमारा मोहल्ला छोड़ दूसरे मोहल्ले में तूफान मचाया. मौसम विभाग के अनुसार १८० से २४० किमी की रफ्तार से लेवल २ का तूफान आया. वूडब्रिज एरिया में कितने ही घरों की छत उड़ गई. कारें पलट गई. बारबेक्यू हवा में उड़ गये. पेड़ धाराशाही हो गये.

मगर जब वो दूसरे मोहल्ले में भरपूर तूफान मचा रहा था तब हालात के हल्ले में हमारा मोहल्ला भी थर्राया. खिड़कियाँ काँपी. बिजली कड़की. पानी बरसा. जो मौसम कहीं तबाही मचा रहा था वो ही हमारे यहाँ दर्शनीय बना हुआ था.

उस मोहल्ले में सैकड़ों घर तबाह हो गये. परखच्चे उड़ गये. देखिये तबाही के कुछ दृष्य:

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गनीमत यह रही कि कोई मरा नहीं. मौसम विभाग चेता चुका था. सरकार ने बिजली तीन घंटे के लिए बंद कर दी ताकि किसी को करेंट न लगे या कहीं शार्ट सर्किट से आग न लग जाये.

ऐसे मौके कितनी बार आते हैं यहाँ, जब बिजली न हो. मेरी याद में पिछले १० सालों में यह दूसरा मौका था. पिछली बार जब २००३ में बिजली गई थी, तब अमरीका के राष्ट्रपति ने टीवी पर जनता से माफी माँगी थी. तब मैं सोचा करता था कि अगर भारत का राष्ट्रपति बिजली जाने के लिए टीवी पर माफी माँगने लगे तो वो तो २४/७ टी वी पर ही नजर आये. आखिर खाना कब खायेगा. :) खैर, इस बार फिर बिजली गई सो रोशनी की खातिर मोमबत्ती जला ली गई.

शायद आपको लाला लोगों की मौका परस्ति का अंदाजा न हो. लालाओं के स्वभाव के ज्ञानियों का कहना है कि अगर कोई लाला कभी कुऐं में गिर जाये तो पहले वो स्नान करेगा और फिर मदद के लिए चिल्लाना शुरु करेगा.

तो आदतन जब मोमबत्ती जली तो हमने भी फायदा उठाया और झट अपनी ही केंडल लाईट फोटो खींच लिए. काम आयेगी शायरी/गज़ल के साथ चिपकाने में. :)

 

दिख रहा हूँ?
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मजेदार यह रहा कि जब बरामदे में खड़े मौसम का नजारा ले रहे थे तो तेज चलती हवाओं में पत्नी हमारा हाथ थामें थी निश्चिंतता के लिए. ऐसा नहीं कि हमारी चिंता में बल्कि इसलिए कि वे इस बात को सुनिश्चित थीं कि इनको तो उड़ा पायेगा नहीं वजन के चलते तो वो भी उड़ने से बच जायेंगी. :)

अब टरनाडो की बात चली है तो थोड़ी सी बात टरनाडो के विषय में भी कर ही ली जाये:

शब्द ’Tornado' या "अंधड़" लैटिन शब्द tonare से आता है, जिसका मतलब ’तेज गरजते आँधी तूफान वाले बादल’ होता है. स्पेनिश में इस शब्द को tornear से जाना गया जिसका अर्थ होता है घुमावदार या मुड़ा हुआ. Tornadoes, जो घूर्णन या हवा में घुमाव द्वारा गठित होते हैं, इसी कारण से इन्हें twisters या चक्रवात भी कहा जाता है.

यह बवंडर (’Tornado' ) कम वायुमंडलीय दबाव के एक केंद्र के आसपास घुमावदार हवाओं के एक ताकतवर स्तम्भ है. यह काले बड़े तूफान, बादल से नीचे लटके कुप्पी (Funnel) की तरह दिखते है. संकीर्ण अंत पृथ्वी को छूता हुआ आगे बढ़ता रहता है.

इस बवंडर के भीतर हवा का तेज बहाव सर्पिल गति से नीचे से उपर होता है और जब यह किसी वस्तु से छूता हुआ चलता है तो उसके टुकड़े टुकड़े कर देने में इसका वेग सक्षम होता है. टूटे हुई वस्तुएं और यहाँ तक की गाय भैंसे और छोटे मोटे समान इसकी पूँछनुमा धरती को स्पर्श करती आकृति में खींच कर कई मीटर उपर चले जाते हैं और बहुत मीलों दूर जा गिरते हैं.

इसकी हवा का वेग 500 मील प्रति घंटे तक की गति में घूम (स्पिन कर) सकता है. आमतौर पर यह लगभग 300 मील प्रति घंटे की रफ्तार से यात्रा करता है. यह बवंडर मानव जाति को ज्ञात सबसे खतरनाक तूफान होता है.

हालांकि कोई भी अमेरिकी राज्य tornadoes से पूरी तरह मुक्त नहीं है, किन्तु वे रॉकी और Appalachian पर्वत के बीच मैदानी इलाकों में सबसे अधिक पाये जाते हैं. हालांकि आंकड़े बताते हैं कि tornados संयुक्त राज्य के पूरे मध्यपश्चिम को प्रभावित करता रहते हैं, किन्तु ’ओकलाहोमा’ नामक प्रान्त सबसे ज्यादा प्रभावित है. जब अमेरीका मे आने वाले सब tornadoes को खाते में लिया जाता है, तो फ्लोरिडा में बवंडर घटना का देश में सबसे ज्यादा घनत्व है. लेकिन फ्लोरिडा के tornadoes कमज़ोर एवं अल्पजीवी रहते हैं और ओकलाहोमा जैसे "क्लासिक" supercellular tornadoes की तरह नुकसान नहीं पहुँचाते. इसके विपरीत, पूर्वोत्तर और पश्चिम संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे कम बवंडर आते हैं.

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नोट: आज पहली बार विंडोज़ लाईव राइटर पर लिख कर पोस्ट करने की ट्राई कर रहे हैं. भूल चूक लेनी देनी.

रविवार, अगस्त 23, 2009

दुबले हैं तो दौड़ते हैं!!

११ तारीख को रात ९ बजे ४ घंटे की हवाई यात्रा ७ घंटे में पूरी कर ह्यूस्टन पहुँच गये थे. जैसा कि बताया था, नीरज रोहिल्ला एयरपोर्ट लेने आ गये थे. पहली मुलाकात थी मगर दूर से हमने उनको और उन्होंने हमको पहचान लिया.

एयरपोर्ट से उनके घर की दूरी लगभग ६० मील याने तकरीबन ४५ मिनट की कार ड्राईव.


अमेरीका का अजब शिगूफा है. बस सबसे अलग दिखना है, मानो यही मोटो हो. आज भी माईल में दूरी आँकते हैं जबकि पूरा विश्व किलो मीटर पर आ गया है. तापमान फेरेन्हाईट में, पेट्रोल गैलन में, वजन पॉण्ड में. हमारा क्या है, हम तो सी ए हैं, एक से दूसरे में बदल जल्दी से करके समझ लेते हैं.

कनाडा अच्छा है या बुरा, क्या पता-मगर कनाडा में दूरी ये मूढमति घंटों और मिनटों में आँकते हैं. किसी से पूछो कि एयरपोर्ट कितना दूर है तो बतायेगा कि हूम्म!! ४० मिनट ड्राईव!! मानो स्पीड, साईकिल या कार या रिक्शा-इन सब बातों से कुछ लेना देना ही न हो.

कई बार लगता है कि कह दें- आओ बेटा भारत. फिर भेजेंगे तुम्हें ट्रेन से. जब चलेगी तब न ड्राईव. खड़ी में क्या? दिल्ली में बैठ जाना कार में २० मिनट की ड्राईव पर. ऐसे उलझोगे ट्रेफिक जाम में कि सुबह के निकले शाम पूरी होगी २० मिनट की ड्राईव.

खैर, उनकी वो जाने. हमने तो जब उनके उल्टे बिजली के स्विच पर कुछ नहीं कहा-नीचे ऑफ और उपर ऑन, तो और क्या कहें. हमें तो इनके उल्टी तरफ ड्राईव से भी कोई परेशानी नहीं.

हमें तो इस हिन्दी लेखन क्षेत्र में भी कई बार अमरीकी हस्तक्षेप लगता है. ऐसे ऐसे शब्द इस्तेमाल करेंगे कि आम पाठक को समझ आए या न आये, बस अलग दिखना है. दिखे भी क्यूँ नहीं-आखिर साहित्यकार श्रेणी से आते हैं.

बात नीरज की हो रही थी और कहाँ चली गई. मानो, भारत, पाकिस्तान की संधि वार्ता हो, कभी ट्रेक पर रहती ही नहीं.

हाँ, तो नीरज, सब जानते हैं कि वो एक मैराथन धावक है. ह्यूस्टन मैराथन जैसी उच्च श्रेणी की मैराथन में हिस्सा लेने वाला. वो अपनी यूनिवर्सिटी, अपना शहर आदि मजे से घूमाते घर ले जा रहे थे. तरह तरह की बात में पता चला कि लेने आने के पहले ७ माईल दौड़ कर आये हैं. हमें लगा कि सुबह से निकले होगें तो शाम लौटे होंगे. फिर भी पूछ लिया तो आँख निकलते निकलते ही रह गई. ५० मिनट में दौड़े. हद है.

फिर जब तारीफ की गई तो पता चला कि हफ्ते में तीन दिन ७-७ माईल दौड़ते हैं और रविवार को १५. गरमी का आलम ह्यूस्टन में न पूछो. १०० डीग्री फेहरनाहाईट से ज्यादा याने ४३ डीग्री सेल्सियस से उपर. बिना एसी के तो कार से हम कूद गये होते और ये सज्जन इसमें दौड़ते हैं. हम तो उनके बारे में सोच कर ही दो पौन्ड अमरीकन लूज़ कर गये.

किसी तरह घर पहुँचे तो रही सही कसर नीरज बाबू ने अपने दौड़ का लॉग और दौड़ने के पाँच जोड़ी जूते दिखा कर पूरी कर दी. साल भर में १००० माईल से उपर दौड़ चुके हैं. सीधे दौड़ रहे होते तो वाशिंग्टन के आसपास कहीं मिलते.

एम एस एक्सेल में डाटा मेन्टेन किये हैं कि किस दिन कितना, कहाँ से कहाँ तक, क्या तापमान, आदि आदि. खुद के तो खैर क्या काम आता होगा. खुद तो जानते ही हैं कि कितना दौड़े और कैसे मगर हमारी बैण्ड बजवाने को काफी था.

रात अपने कमरे में सोने पहुँचे तो पत्नी व्यंग्य बांण लिये अर्जुन की तरह मछली की आँख का निशाना साधे तैयार-कुछ तो शरम करो. उनको देखिये, कितना दौड़ते हैं. आप इसका आधा भी कर लें तो बात बन जाये. उसे कैसे समझाऊँ कि अब इस उम्र में बात बन भी जाये तो फायदा क्या?

हमने समझाने की कोशिश भी की कि भई, उसे देखो..एकदम दुबला पतला है, इकहरा से भी कम कोई विशेषण हों तो नवाजा जाने योग्य, सो दौड़ लेता है. और फिर अमरीका में तो ये लोग स्लिम ट्रिम या एकदम फिट कहलाते हैं.

इतना दुबला पतला कोई हमारे लाला समाज में होवे तो लोग डोनेशन जमा कर खाना खिलवाने ले जायें.


वही होता है असली लाला-

जो खाने में ले गोश्त
और
पीता हो छक कर हाला !!!


नीरज जैसी काया तो हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश, बलिया-गोरखपुर स्पेशल बेल्ट, में पूरे खानदान की बदनामी करा दे. मगर मिर्जापुरी पत्नी को कौन समझाये? वो तो अपने आपको पूर्वी उत्तर प्रदेश का माने, जब न!! इसके लिए हर व्यक्ति में साहस नहीं होता.

फिट फाट नीरज

पत्नी तो और गुस्से में आ गई और कहने लगी कि दुबले हैं इसलिये दौड़ पा रहे हैं-ऐसा नहीं है. दौड़ रहे हैं, इसलिये दुबले हैं. और समझ लो, दुबले नहीं, वो मेन्टेन हैं.

'वो दुबला है इसलिए दौड़ ले रहा है
या
वो दौड़ रहा है, इसलिए दुबला है.'

इस बात से मैं उतना ही कन्फ्यूज हो रहा हूँ जितना कि मैं इस बात से हमेशा रहा हूँ:

'वो मक्कार है इसलिए नेता है
या
वो नेता है इसलिए मक्कार है.'

सोने पूर्व तरह तरह की बहसें, संसारिक भाषा में वार्तालाप और राजनितिक भाषा में विमर्श, इस बाबत हुई कि मेन्टेन तो हम भी हैं पिछले ८ वर्षों से वही १०० का १००.. नींद निकालने की खातिर नेताई वादे आदि किये गये कि अब से हम भी दौड़ेंगे. मन ही मन नीरज को कोसा भी गया और सो गये.

अब टोरंटो आ गये हैं. वो तो अच्छा हुआ कि सामान वगैरह बीच में खो गया तो पत्नी के दिमाग से बात उतर गई और हमारा आराम जारी है. क्या पता कि कब याद आ जाये और गाज गिरे. जब याद आयेगा तो पाँच जोड़ी जूते खरीदने की बात याद दिलाऊँगा. शायद बात कुछ दिन टल जाये. लाला दिमाग तो है ही उसका भी. एक साथ पाँच जोड़ी तो खरीदने से रही, बस यही एक उम्मीद की किरण बाकी है.

वैसे पूरे टेक्सस में, इतनी गरमी के बाद भी, जितने लोग मुझे हर वक्त दौड़ लगाते दिखे..उतने मैने आज तक नहीं देखे थे.

नमन है तुम धावकों को मगर हमें तो बक्शो!!! हमारे आराम में क्यूँ विघ्न डालते हो.

चलो, हमारी तरफ से ओलम्पिक के सारे मैडेल तुम्हारे!!

खूब जीतो, फलो फूलो और हमें सोने दो!! गुड नाईट.

नीरज-दौड़ लगाते

बुधवार, अगस्त 19, 2009

लाल शर्ट और ब्लैक फुल पैण्ट : टेक्सस यात्रा

दस दिवसीय चार पड़ावीय यात्रा का प्रथम पड़ाव ह्यूस्टन -रात साढ़े नौ बजे नीरज रोहिल्ला अपने घर से १ घंटा कार चला कर एयरपोर्ट से आकर शहर का चक्कर लगवाते हुए और अपनी यूनिवर्सिटी और अपने डिपार्टमेन्ट ऑफ केमिकल इन्जिन्यरिंग घूमवाते हुए अपने घर ले गये.

गप्पे हुईं. उनके फ्लैट मैट अंकुर से मुलाकात बात हुई. खाना खाया गया और रात १ बजे निद्रा को प्राप्त हुए. सुबह ११ बजे डेलस के लिए रवाना होना था बस़ द्वारा अतः ९ बजे नहा धोकर रास्ते में एक रेस्टॉरेन्ट में नाश्ता कराते हुए नीरज बाबू हमें बस अड्डे उतार कर यूनिवर्सिटी रवाना हो गये और हम सपत्नीक बस मे लाद दिये गये जिसके नीचे हमारे दोनों बैग चैक इन हो गये.

नीरज और समीर

बस में यात्रा करनी थी. हालाँकि बस तो एयर कन्डीशन्ड थी मगर फिर भी बस में चढ़ना, उतरना और टेक्सस का गरम मौसम. यही सब विचार कर अपने खुद के रंग की परवाह किये बगैर लाल रंग की टीशर्ट और काली फुल पैण्ट पहन लिये थे कि पसीने में थोड़ा गन्दी भी हो जाये तो पता न लगे.

फिर डैलस पर मित्र लेने भी आ रहे थे. उनके घर जाकर स्नान आदि कर झकाझक सफेद शर्ट पहन, परफ्यूम लगा शाम घूमने निकलेंगे शहर में, ऐसा सोचा था.

पाँच घंटे की शानदार यात्रा में तीन चार जगह रुकते हुए बस ठीक चार बजे आ लगी डैलस. उतरे, मित्र लेने आये हुए थे. हाथ गले मिलाये गये और सामान उतरा. पत्नी का बैग उठाया और हमारा? यहाँ देखा, वहाँ देखा. ड्राईवर से पूछा. बाहर भागे कि शायद कोई भूले से तो नहीं ले गया. सब बेकार. बैग गायब. इस रुट के बारे में सुना जरुर था मगर सुनी बात आज तक मानी हो, तब न!! सामान चोरी-लगा बांदा मानिकपुर लाईन पर यात्रा की हो.

कई बार पाठक पूछने लगते हैं कि सारे कांड आपके साथ ही क्यूँ होते हैं आखिर. अब ये बात तो खुदा ही जाने मगर मुझे लगने लगा कि मेरे प्रति कांडो का कुछ सहज आकर्षण हैं. सलमान खान को कभी किसी ने लड़कियों को आकर्षित करने वाल ’ए चिक मैगनेट’ कहा था. मुझे अब लगता है कि मेरे लिए भी एक खिताब तय कर दिया जाना चाहिये -’ए काण्ड मैगनेट’

बैग चला गया और हम खड़े खड़े, हाथ सर पर धरे.....लूट में लुटे हुए..गुबार देखते रहे. बैग में ७ फुल पैण्ट, १० शर्ट, ९ मौजे, अनेक रुमाल, चप्पल, अन्डर गार्मेन्टस (ब्रेन्डेड :)), १२ प्रिन्टेड कविताऐं (वहाँ पढ़कर सुनाने के लिए रखे थे कि मौका सुनाने का तो निकाल ही लेंगे) , परफ्यूम अज़ारो की बोतल और एक स्कॉच की बेहतरीन नई बोतल. सब चली गई. स्कॉच वाली बोतल ही बच गई होती तो वहीं बैठ कुछ गम गलत कर लेते मगर वो भी जाती रही तो गम गलत न हो पाया.

चोर चोर होता है. उसे इस बात से कुछ मतलब नहीं कि क्या चुराया. वो इसी में खुश हो रहा होगा कि चुरा लिया. क्या करोगे भला हमारी फुल पेन्टों का? सात जन्म लगेंगे हेल्थ बनाने में तुमको और कविता?? पढ़ भी लोगे तो तुमसे सुनेगा कौन? कविता तो ठीक है, उसे सुनाना एक कला है, वो भी चुरा लोगे क्या?

क्लेम वगैरह लिखवा घर लौट आये मित्र संग. पत्नी, मित्र और सभी नहा कर फ्रेश तैयार और हम वही लाल टीशर्ट और काली फुल पेन्ट. दो दिन की दाढ़ी भी उग आई और दाढ़ी बनाने वाला रेज़र भी बैग के साथ ही निकल लिया. बस वालों ने कहा था कि अगली बस ८ बजे आयेगी, शायद उसमें चढ़ गया होगा. आकर देख लेना. तो ८ बजे फिर गये. ८.३० बजे तक उस नई बस का सामान भी खाली और हम भी. कोई सामान नहीं आया. सारी आशायें खत्म.

अब ९ बजे बाजार भी बन्द कि कुछ नये कपड़े खरीद लें. बाहर ही लाल टीशर्ट और काली फुलपेन्ट में खाना खा कर चले आये. रेस्टारेन्ट वाले को क्या मालूम कि सुबह से ही यही पहने घूम रहे हैं. दाढ़ी भी रफ लुक वाले फैशन में मान ली होगी-धन्यवाद अनिल कपूर एण्ड रित्विक रोशन!!

घर आये. सब नाईट सूट पहन सोने चले और हम लाल टीशर्ट और काली फुलपेन्ट. क्या पहनें? सब तो चला गया. अच्छा हुआ बेडरुम में दरवाजा था तो जो चादर औढने को दी गई, उसे लूँगी समझ लपेट कर सो गये. सुबह सबके उठने के पहले ही जागे और लाल टीशर्ट और काली फुलपेन्ट में आ गये.

वही ड्रेस:नीरज के घर

मित्र का घर शहर से बाहर और जरा एकांत में है. जब तक हम बाथरुम वगैरह से फुरसत होकर आये, मित्र हमारी पत्नी से यह कह कर कि शाम को तैयार रहें. ५ बजे दफ्तर से आते ही बाजार चलेंगे और फिर वहीं से घूमने चले चलेंगे. मित्र की माता जी ने नाश्ता वगैरह बड़ा शानदार कराया और हम लाल टीशर्ट और काली फुलपेन्ट में बैठे खिड़की से बाहर झांकते समय काट रहे हैं कि कब ५ बजे और मित्र लौटें तो बाजार जायें. लंच भी हो गया. दोपहर की हल्की नींद भी काट ली मगर ५ हैं कि बज ही नहीं रहे.

जब यह आलेख लिख रहा हूँ, ४ बजा है. घर में हलचल मची है. सब तैयार हो रहे हैं कि ५ बजे बाजार जाना है और फिर वहीं से घूमने. हमें भी भूले से कोई कह गया है कि तैयार हो जाईये, ५ बजे निकलना है. अरे महाराज, जो तैयार ही हो सकते तो बाजार काहे जाते. :) तैयार ही समझो. लाल टीशर्ट और काली फुलपेन्ट- कोई खराब लग रही है क्या?

मुश्किल ये है कि हमारे साईज की फुल पेन्ट तो मिलती भी नहीं. भारत से सिलवा कर लाते हैं हर बार. जैसा पहले भी बता चुके हैं कि यहाँ के लोगों के साईज़ अजब है. इनकी कमर हमें अट जाये, तो लेन्थ डबल होती है और अगर लेन्थ फिट तो कमर आधी से भी कम. पत्नी से कहा तो कहती है, सबको तो अट जाती है. आप ही की साइज़ डिफेक्टिव होगी मगर अपनी कमीज का छेद कब किसे नजर आया है. दोष तो दूसरे का ही होता है.

लगता है वो इलास्टिक वाली पेन्ट खरीदना पड़ेगी. वन साइज फिट ऑल वाली जो गर्भवति महिलाओं की दुकान पर मिलती है कि महिने के महिने साईज बदलता भी रहे तो भी पेन्ट एडजस्ट होती जाये. वहीं जाता हूँ और क्या रास्ता है?

मित्र के घर से उनकी पत्नी का डिस्पोजेबल रेज़र लेकर दाढ़ी तो किसी तरह बना ली. लेड़ीज़ रेजर था. क्या सोच रहा होगा हमारे गाल पर घूमते. शरम भी आई, लाल हुए..मगर करते क्या?

कमीज तो मिल जायेगी नाप की. चप्पल की जरुरत नहीं. जूते से काम चल जायेगा. स्कॉच उनकी मेहमान नवाज़ी के लिए छोड़ देते है. अभी तो सात दिन काटने हैं टोरंटो पहुँचने के पहले.

वैसे पहुँच कर भी क्या कर लेंगे. सारी अच्छी वाली ड्रेस तो रुआब झाड़ने के लिए साथ लेते आये थे. वहाँ तो अब वो ही हैं जो नित में पहन काम चलता रहे.

हे प्रभु, इस काण्ड मैगनेट के साथ इतना बड़ा कण्ड-क्या चाहते हो!!! आगे अभी यात्रा बची ही है, जाने क्या क्या देखना बाकी है!!!

(नोट: १३ अगस्त का लिखा आज प्रकाशित हो रहा है)

रविवार, अगस्त 16, 2009

जिन्दगी एक पज़ल: विल्स कार्ड भाग ५

पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ और भाग ४ को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.

(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)


विल्स कार्ड का एक और बंडल खींचता हूँ दराज मे से.

सोचने लगता हूँ उन्हें पढ़कर. जाने कैसे कैसे टुकड़ों को जोड़ जोड़ कर बनी है अब तक की यह जिन्दगी. बिल्कुल पज़ल के टुकड़ों सी. जो जहाँ लगना है वहीं लगेगा वरना पज़ल अधूरा ही रहेगा.

कब सोचा था कि ये जो मैं विल्स कार्ड के पीछे दर्ज कर रहा हूँ, आज किस वक्त की याद दिलायेगा. ये कार्ड ही तो मेरी जिन्दगी के पज़ल के टुकड़े हैं. वक्त की मार ने सब तितर बितर कर दिया. और फिर हर रोज कुछ नये जुड़ते भी तो जा रहे हैं. बस, जब कभी खुद से मिलने का मौका मिलता है, लगता हूँ सहेजने, बड़े जतन से, इन टुकड़ों को. कोशिश करता हूँ और थक हार कर सब फिर से आपस में मिलाकर वापस वक्त के झोले में भर कर रख देता हूँ सहेज कर दराज में. सोचता हूँ फिर कभी सही, कभी तो हल कर ही लूँगा.

जिन्दगी की पज़ल

मुझे लगता है कि जैसे भी हो, चाहे मशक्कत कर या यूँ ही सहज भाव से, नियमित जिन्दगी की घटनाओं को शब्द रुप दे सहेज लेना चाहिये. शायद आज, जब हम उसे दर्ज कर रहे हों, वो यूँ ही बेतरतीब सी बिखरी बातें लगें मगर वक्त के सांचे में ढल, जिन्दगी की कड़ी धूप में तप, एक दिन वो कंचन हो उभरेंगी और तब मेरी ही तरह सब लिख रहे होंगे-विल्स कार्ड पर उतरी बातें....

और हल करेंगे अपनी जिन्दगी की पज़ल. बिना किसी क्लू के. बस, एक धुँधलकी यादों के सहारे.

कुछ भी दफन नहीं होता. साथ साथ चलता है. बस, आज की चमक में दमित. मगर चमक कब तक? जब उतरेगी तो यही यादें और यही बातें, एकाकी मन का सहारा बनेंगी. विश्वास जानो!!!

तो आज वैसे ही किसी दौर में दर्ज कुछ विल्स कार्ड. लगता है दिल टूटने का मौसम रहा होगा, जब ये दर्ज हुए होंगे.

सभी के जीवन में तो ऐसे मौके आते हैं. कोई दर्ज कर लेता है और कोई सर झटक कर किनारा कर लेता है.

मैने दर्ज किये हैं तो पढ़वाने में कैसा गुरेज..


क्या सोचूँ, क्या याद रखूँ!!


*१*

काँच का गिलास गिरा

और

छन्न!! से टूट गया...

ये रिश्ते भी कितने नाजुक होते हैं!!



*२*


वो तेरी गर्म सांसों का अहसास

उन नाजुक लम्हों की याद....

आँसूंओं की बारिश थमती नहीं....

क्या बादलों ने कभी इश्क नहीं किया!!



*३*


मेरे सूने कमरे की

खिड़की से उतर आती है उसकी याद

हर रात

बैठ जाती है मेरे सिराहने

और

नींद आ जाती है मुझे

उन थपकियों के अहसास से...

काश!! तुम तुम नहीं, तुम्हारी याद होती!!


*४*


जिस दिन तुम गैर हुई....

मेरे कान उस दिन से

अब तक बहते हैं..

न जाने क्यूँ लोग-

शहनाई को सुरीला कहते हैं...


*५*


दिल की

तराजू में

तौल कर देखा है..

सबसे दुखद है

उसे चाहना

जिसने कभी तुम्हें चाहा था...


*६*


वक्त बेवक्त

खुद को खुद से

मिलवाता हूँ मैं...

डर जाता हूँ मैं..


*७*


इसे रोकूँ

उसे टोकूँ...

अक्सर पी कर

बहक जाता हूँ मैं...

आजकल बहुत

थक जाता हूँ मैं...

-सुना है, हालात बदलेंगे!!


*~*~*~*~*~**~*~*~*~*~*

--समीर लाल ’समीर’

बुधवार, अगस्त 12, 2009

संगत कीजे साधु की...

आस पड़ोस समझ कर और जानकर मकान खरीदने के दिन अब खत्म हुए. आज जान भी गये और कल पड़ोसी किसी और को बेच गया, तब? और यूँ भी आपको अपने घर में रहना है, पड़ोस में तो नहीं.

याद है वो जमाना भी, जब बाप दादाओं का बनाया घर पुश्त दर पुश्त चलता रहता था. पूरा का पूरा मोहल्ला-तिवारीपुर. हर घर तिवारियों का. न बिकना और न खरीदा जाना.

मगर भारतीय हैं तो जरा देख परख कर ही छः साल पहले घर खरीदा था. तबसे देखा दिखाया सब जाता रहा. सामने पीछे, इस बाजू और उस बाजू सब बदल गये हैं. सब नये. एक बाजू तो इतने दिनों में तीन बार.

एकदम पड़ोस में पिछले ४ माह से नये लोग आ गये हैं. दो लड़के, 'क्रिस' और 'एरेन', एक माँ 'आईवी'. नाम से जान गये होंगे कि भारतीय तो नहीं ही हैं. पहले मैं समझता था कि भाई भाई होंगे. रहते, आते जाते, मिलते पता चला कि सेम सेक्स पार्टनर हैं. माँ एरेन की है. धन्य हुए ऐसा पड़ोस पाकर.

रोज सुबह देखता हूँ. एरेन कार से क्रिस को स्टेशन छोड़ने जाता है. रास्ते में रुक कर दोनों कॉफी खरीदते हैं और फिर क्रिस को स्टेशन छोड़ एरेन अपने दफ्तर.एरेन मात्र ५ घंटे की नौकरी करता है और क्रिस पूरे ८ घंटे वाली. शाम को भी एरेन स्टेशन जाकर क्रिस को ले आता है. दोनों रास्ते से कॉफी खरीदते हुए और एक कप माँ के लिए लेकर लौटते हैं.

अक्सर ही जब वो लौटते हैं तो देर हो चुकी होती है और मैं बरामदे में बैठा उन्हें लौटता देखता हूँ. हाय हैल्लो और कुछ औपचारिक बातचीत भी तभी हो जाती है.बाकी तो शनिवार, इतवार को जरा ज्यादा बात हो ले तो हो ले.

दिमाग ही तो है. कुछ भी देखे और उड़ान भरने लगता है.

सोचने लगता हूँ कि एरेन की माँ पर क्या गुजरती होगी, जब दोनों लड़के उसे गुडनाईट कह कर सोने जाते होंगे. क्या सोचती होगी वह?

पता नहीं हम भारतियों की तरह शायद उसने भी कभी अपने पुत्र के होने की खुशियाँ मनाते हुए कभी सोचा होगा कि सुन्दर सी काबिल बहु आयेगी मेरे अँगना.

खैर, अब जैसी भी आ गई वैसी ही सही कह के तो बहुत सी माँऐं अपना जीवन काट लेती हैं लेकिन यहाँ तो आई कहाँ-आया !!!!!

सर पकड़ लिया होगा, जब लड़का पहले दिन अपने पार्टनर को मिलवाने लाया होगा.

सात जन्मों का साथ !

माना कि प्रगतिशील लोगों के मूँह से ऐसी बातें अच्छी नहीं लगती मगर कई बातें भी तभी तक अच्छी लगती हैं जब तक दूसरों के साथ घटित हों वरना अच्छे अच्छे प्रगतिशील पटखनी खाये पड़े देखे हैं मैने.

ये तो वैसी ही बात है जैसे किसी के शैतान बच्चे को देखकर खूब खुशी से पूछो कि इसके कारण तो काफी चहल पहल रहती होगी घर में. चहल पहल तो उसे समझ में आती है जो दिन भर उसकी शैतानी झेलता है. आप क्या है, दस मिनट को आये. उसकी हरकतों का मजा लूटा और निकल लिए.

खैर, ढूँढो तो कचरे में भी मोती मिल जाये. वैसे ही इसमें भी एक फायदा जरुर एरेन की माँ को हुआ होगा कि बहु सास वाली खटखट से बच गई और जो बहु की मूँह दिखाई और अन्य आयोजनों के लिए ज्वेलरी वगैरह सहेज कर रखी होगी, वो भी पूरी की पूरी खुद की हो गई. ठाठ से पहन कर घूमो!!

कल शाम बिजली कड़कती थी. घनघोर बादल छाये थे. धुआँधार बारिश. दो घर छोड़ हमारी सड़क के मोड़ पर पूरा जंगल है और सामने ही कुछ दूर पर ऑन्टारियो लेक. उस पर से ये मौसम. समा ही बँध गया.

बरामदे में आराम कुर्सी पर बैठे, 'मौसम है आशिकाना, ऐ दिल कहीं से उनको...' पाकीज़ा के गीत की मद्धम आवाज, बेहतरीन स्कॉच का गिलास और उस पर से हवा के साथ आती बारिश के पानी की छिटकन..आह्ह!!!

पत्नी को आवाज देता हूँ कि बाहर ही आ जाओ और मौसम का आनन्द लो. रोमांटिक मौसम है. सास बहू सीरियल तो रोज ही आना है.

बरामदे के अँधेरे कोने में कुर्सी पर बैठे(अलग अलग कुर्सी पर :)) हम मियाँ बीबी मौसम का आनन्द ले रहे थे. ज्यादा सोचो मत, इस उम्र में अलग अलग कुर्सी पर बैठ कर ही मौसम का सही आनन्द लिया जाता है. रह रह कर बिजली चमकती और पूरा एरिया चमक उठता. ऐसे में मेरी नजर एरेन के घर की बालकनी पर पड़ गई. नजर है, घूमना स्वभाव है, घूम गई.

एरेन और क्रिस भी मौसम की रुमानियत में डूबे, एक दूसरे से आलिंगनबद्ध मद्धम गति के नाच में मशगूल हैं. वाईन का गिलास भी सामने दीवार पर रखे हैं. इरादे कुछ नेक नहीं. वैसे पति पत्नी ही तो हैं तो फिर इरादों की नेकता पर क्या प्रश्नचिन्ह !!

बेटे का फोन आता है. "डैड, गुड न्यूज़!!"

बता रहा है कि अब वो शादी करने को तैयार है. कह रहा है कि लड़की देख रहा है. बड़ी खुशी हुई कि कम से कम लड़की देख रहा है. लगा कि जैसे गंगा नहा गये.

बड़ा बेटा पिछले दिसम्बर में एक लड़की से ही शादी कर ही चुका है. छोटे ने भी वैसा ही करने की ठानी है. कम से कम ये जनरेशन तो तर ही गई, समझो.

आने वाली जनरेशन के लिए भी शुभकामनाऐं ही दर्ज कर सकता हूँ वरना अड़ोस पड़ोस का आपके व्यक्तित्व निर्माण पर गहरा असर तो होता ही है इसलिए तो बचपन में बड़े बुजुर्ग डांटा करते थे कि फलाने के साथ मत रहो, फलाने के साथ मत खेलो.

सीखा तो यही है: 'संगत कीजे साधु की...'



आकाश
में
बिजली की डरावनी तड़कन
बादलों की खूँखार गरजन
अपना आपा खोती
तेज मूसलाधार बारिश...

लगता है..

मेरी ही तरह
देख कर दुनियाँ की हालत..

कोई
उस पार भी
हैरान है

और

शायद
मेरी ही तरह
वो भी
परेशान है!!!

-समीर लाल 'समीर'


नोट: पिछली पोस्ट 'एक हारा हुआ योद्धा' के लिए अपने प्रशसकों, पाठकों और मित्रों से क्षमाप्रार्थी. पोस्ट का उद्देश्य कतई अपने दुख और मानसिक तनाव से आपको दुखी और तनावग्रस्त करना नहीं था. बस, मन की बात थी और धारा प्रवाह अपने साथियों के बीच बह निकली. इतने कमेंट और इतने सारे व्यक्तिगत ईमेल इस विषय को लेकर आ गये हैं कि अब सही तनाव हुआ है कि सबका जबाब कैसे दूँ. :) आपने समझा, समझाया, साथ दिया-आप सभी का बहुत आभारी.

रविवार, अगस्त 09, 2009

एक हारा हुआ योद्धा!!!

जिन्दगी के फलसफे हर मोड़ पर बदलते जाते हैं. जो आज हैं, वो कल नहीं थे और शायद कल नहीं रहेंगे. ऐसे बिरले ही होंगे जो एक ही फलसफा लिए सारी जिन्दगी जी गये. क्या पता वो सफल रहे या नहीं. क्या पता मेरा तरीका, इन बदलते फलसफों का सही है या नहीं. मगर है तो ऐसा ही.

शायद उस उम्र का जोश और फिर इस उम्र की शिथिलता, अनुभव, परिस्थितियाँ और वातावरण इस बदलते फलसफे के जिम्मेदार हों. कौन जाने, लगता तो ऐसा ही है.

जिन्दगी की किताब के पन्ने पलटाता हूँ. कितने ही जबाब दर्ज हैं बिना प्रश्न के. आज शायद उन जबाबों के आधार पर प्रश्न गढ़ कर खुद से ही करुँ तो जबाब बदल जायें मगर ऐसा होता कहाँ है. जिन्दगी की किताब में तो जो एक बार दर्ज हो गया सो हो गया. आगे ही कुछ बदलाव संभव है, पीछे तो जो है, जैसा है, वैसा ही है. रो लो, मुस्करा लो या सीख लो.

कभी सोचता हूँ आज के डी वी डी युग को देख. काश, जिन्दगी ये सुविधा देती. उसे जहाँ तक मन किया, रिवाइंड किया, फेर बदल की, और फिर से जी लिए. कितनी सुखद परिकल्पना है. बस, एक परिकल्पना..जैसे आसमान छू लेने की. परिंदों के माफिक पर लगा कर स्वछंद आसमान में विचरने की अपनी मर्जी से अपने मन के अनुरुप.

लगता नहीं कि हम अपने हिसाब से जीते हैं. हम बस जीते हैं उस हिसाब से जो जीने के लिए जरुरी हो और ढाल लेते हैं अपने आपको उसके अनुरुप और खुश हो लेते हैं इस सामन्जस्य को बैठाकर कि हम जिन्दगी अपने हिसाब से जी रहे हैं. भूल जाते हैं कि हम जिन्दगी जैसे चल रही है, उसके अनुरुप जीना सीख गये हैं. एक समझौता कर लिया है हमने. शायद, खुश रहने का ये ही सूत्र हो मगर मुझे कहीं न कहीं, अब ये बात कचोटने लगी है.

पहले चुभते काँटों से अलग हो अपना रास्ता बनाना अपना तरीका मान लिया करता था. सोचता था कि राह में जो काँटे आये हैं, उनसे बच कर निकल गया और वो पीछे छूट गया. मगर शायद मैं ही गलत था, वो कांटे अदृश्य हो पीछा करते हैं. जब खुद से मिलो एकांत में, अपने आपसे सच सच रुबरु हो, तो चुभते भी हैं. अपने घाव छोड़ते हैं जो पक कर गंधाते हैं और हम अपनी झूठी जिन्दगी की उड़ानों का परफ्यूम उस पर छिड़के सड़ांध के खत्म हो जाने को गुमान पाले बैठे हैं. मगर, ऐसा होता है क्या कहीं. इन घावों के कोई मलहम भी नहीं होते. पकते जाना ही इनकी नियति है.

मैं अब बीमार हो जाता हूँ. कल्पना की उड़ानों वाला परफ्यूम अब चुक गया है. इसकी सप्लाई सीमित रहती है, और धावों की सड़ांध असीमित.कब तक दबाता और उस पर से रोज एक नया घाव.

जिन्दगी से थका हारा ये योद्धा आज आत्मसमर्पण करता है क्योंकि वो औरों के लिए जिया और अपनी शर्तों से ज्यादा दूसरों की भावनाओं को मान देता रहा.

काश!! वो जान पाता कि जिन्दगी एक समझौता नहीं, अपनी शर्तों पर जीने का सलीका है. आज बतला रहा है ये हारा योद्धा वरना हर जिन्दगी उसकी तरह ही हारेगी.

हे घाव देने वालों, तुम जीत गये. मेरी जिन्दगी की समझ, जो संस्कारों से मैने पाई थी और बदलते सामाजिक मूल्यों में अपनी मान्यता खो चुकी मेरी कल्पना की उड़ान हार गई. अब जो चाहो, मेरे साथ सलूक करो मैं प्रतिरोध नहीं करुँगा. मैं एक हारा हुआ योद्धा हूँ - खुद की करनी के चलते, इसमें किसी का कोई दोष नहीं.

मेरी शक्ति क्षीण हो गई है. मैं अब और नहीं लड़ सकता. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो या सूली पर टांग दो, सब तुम्हारे हाथ है. मैं कर चुका, जितना कर सकता था. बस, एक अनुरोध, मेरी जिन्दगी की किताब का अंतिम पन्ना तुम लिख दो!!

कर दोगे न इतना तुम मेरे लिए!! तुम तो मेरे अपने थे न कभी..लोगों की नजर में आज भी....





कैसे गीत सुनाऊँ मैं, सुर मिलते ना साज
द्वार नहीं कोई कहीं , जिस पर लौटूँ आज

आँखों में आंसू भरे, भीगे मन के ख्वाब
बचपन जिसमें तैरता, सूखा मिला तलाब....
अमिया की डाली कटी, तुलसी है नाराज
द्वार नहीं कोई कहीं , जिस पर लौटूँ आज

राहों को तकते नयन, बन्द हुए किस रोज
माँ के आँचल के लिये, रीती मेरी खोज
कोई अब ऐसा नहीं, हो मेरा हमराज
द्वार नहीं कोई कहीं , जिस पर लौटूँ आज

ना मितवा ना मीत हैं, ना पीपल की छांव
बेगाना मुझ से हुआ, मेरा अपना गांव
कैसे सब कुछ लुट गया, है ये गहरा राज
द्वार नहीं कोई कहीं , जिस पर लौटूँ आज

वो सूरज का झांकना, वो मुर्गे की बांग
ऐसा अब कुछ भी नहीं, अर्थहीन है मांग
अपनों की घातें लगीं, जैसे ताके बाज
द्वार नहीं कोई कहीं , जिस पर लौटूँ आज

याद लिए कट जायेगा, जीवन थोड़ा पास
मन पागल कब मानता, पाले रखता आस
खोज रहा मैं अंश वो, जिस पर करता नाज
द्वार नहीं कोई कहीं , जिस पर लौटूँ आज

-समीर लाल ’समीर’


नोट: अगले दस दिनों नेट पर आना अनियमित रहेगा. ११ तारीख की सुबह टेक्सास, यू एस ए जा रहा हूँ. ह्यूस्टन, डैलेस एवं ऑस्टिन. नीरज रोहिल्ला से मुलाकात होनी है.

बुधवार, अगस्त 05, 2009

हाय रे, ये विचार-रुकते क्यूँ नहीं!!

बीमारी से उतनी परेशानी नहीं, जितनी खाली लेटे लेटे आते जाते विचारों से होती है.

अब रक्तचाप ऐसी बीमारी भी नहीं कि तकलीफ दे या बुखार आ रहा हो. बस, हल्की सी कमजोरी रहती है और क्या.

खूब नापो!!

एक तो यहाँ के मेडीकल रिवाज मुझे पसंद नहीं आते. डॉक्टर बिना टेस्ट, जैसा भारत की तरह मौसम देख बीमारी जान जायें, सिम्पटमबेस कुछ दवाई ही नहीं देते. फिर टेस्ट कराने का एपॉइंटमेन्ट कब का मिलेगा. स्पेश्लिस्ट से कब का समय मिल पायेगा, कोई भरोसा नहीं.

एक मित्र हैं, उनके स्पेश्लिस्ट का समय उन्हें ६ माह बाद का मिला है, तब तक शायद वो ही बच रहें या उनकी बीमारी. वैसे हमारे मित्र हैं, भारतीय हैं तो भरोसा है कुछ न कुछ नया सा ही होगा. कहो वो स्पेश्लिस्ट ही न निपट जाये. अनुभव अर्जित करने में इतना व्यस्त होते होते काफी उम्र गुजार ही चुका है.

एक बार याद आता है कि मुझे बड़ी तेज एसीडिटी का अटैक हुआ. लगा कि हार्ट अटैक ही होगा. तुरंत पत्नी और एक मित्र के साथ भागे अस्पताल. पहला डॉक्टर तुरंत मिलता है और हालत का अंदाजा लेकर आपको क्यू में डाल देता केसानुसार. हम भी क्यू में लगा दिये गये स्ट्रेचर पर लेटे.

कई बार झूट मूट मूँह लटका कर नर्स से कहा कि छाती में बाईं तरफ दर्द उठ रहा है जिससे वो उसे हार्ट की समस्या समझ डॉक्टर को बता दे और वो तुरंत अटैंड कर ले. मगर आप एक शातिर तो वो दो. सब समझते हैं और हम टंगे रहे वेटिंग में. पहली जो दवा उसने दी थी माईल्ड सी, वो खा कर. ५ घंटे बाद जब हमारा भरती होने का नम्बर आया, तब तक एसिडिटी अपने आप ही बिदा हो ली थी. उसके रुकने की भी एक सीमा रेखा है.

बीबी और महबूबा में यही तो अंतर है. बीबी दिल की धड़कन, अंतिम दम तक साथ बनाये रहती है और महबूबा, आई, मिली और बाय बाय, चली. दोनों की ही अपनी अपनी अच्छाईयाँ हैं मगर यहाँ वो विषय वस्तु नहीं है इस आलेख की, तो प्रकाश नहीं डाला जा रहा है.

जब नम्बर आया तो डॉक्टर ने कहा कि हाँ, अब आप अपनी समस्या बतायें. क्या हुआ है?

हमने कहा कि इतनी देर बाद तो अब आप ये पूछो कि क्या हुआ था. अभी तो सब बेहतरीन है. आप तो क्षमा ही करें और अब हमें जाने दें. मगर वो काहे आये मेहमान को जाने दे. पचास तरह के टेस्ट करा डाले. मेहबूबा एसीडिटी तो निकल ही ली थी, वो तो पकड़ाई नहीं बल्कि टेस्ट वेस्ट के चक्कर में उसकी सहेली जो उसे लेकर आई थी, पथरी पकड़ गई, जिससे कुछ लेना देना न था. अरे, चार छः बीयर पीते, खुद ही बह निकलती मगर तब वो डॉक्टर अपनी लेज़र तलवार कहाँ चलाता. बोफोर्स तोप टाईप शो पीस तो है नहीं, काम करती है, यह उसने साबित कर दिया तब माना. दो दिन अस्पताल में भरती रहे थे.

तब ब्लॉगिंग नहीं किया करते थे वरना तो खूब चटखारे लेकर अस्पताल के किस्से सुनाते. डॉक्टर से लेकर ऑपरेशन रुम से नर्स तक के. खैर, नहीं सुना पाये तो अब नहीं ही सुनायेंगे जब तक आप जिद्द न करने लगो.

वैसे, अब जाकर समझ में आया कि यहाँ के डॉक्टर विश्व भर में काहे नाम कमाये हुए हैं. जब तक मरीज को देखने का नम्बर आता है, ७०% तो अपने आप ठीक हो जाते है. २० % इनकी दवा से और १०% मर भी जायें, तो उनकी आवाज ९०% के जयकारे के आगे सुनेगा कौन?

ये डॉक्टर तो इस आधार पर कनाडा की ३.५ करोड़ आबादी को चला लिए जा रहे हैं. हमारे पुरनिया प्रधान मंत्री नरसिंहा राव तो १०० करोड़ से उपर की आबादी को आँख बंद किये, मूड़ हिलाते इसी लॉजिक पर चला ले गये.

किस्से और सोच की कडियाँ तो चलती ही रहेंगी. पिछले हफ्ते सब ब्लड टेस्ट, इसीजी, यूरीन और जाने क्या क्या टेस्ट हुए. इस पर भी ऐसा है कि ’नो न्यूज इज गुड न्यूज’. अगर डॉक्टर को कुछ सलाह देने लायक लगेगा तो ही फोन आयेगा समय बुक करने के लिए अन्यथा मस्त रहिये. आपकी रिपोर्ट आपके डॉक्टर की फाईल में जाकर लग जायेगी.

एक तरह से अच्छा ही है मगर जब ऐसे टेस्ट के बाद डॉक्टर के ऑफिस से फोन आता है कि समय बुक करिये, डॉक्टर आपसे मिलना चाहते हैं आपकी रिपोर्ट पर बात करने को, तो उस समय से लेकर मिलने तक घिघ्घी बंधी ही सी रहती है, कि जाने क्या हो.

लगा कि अब बच क्या रहा है, एक डायबटीज़ ही बाकी है जो आज नहीं तो कल, चला ही आयेगा उम्र के इस पड़ाव में. उससे भेटें बगैर तो निकल न पायेंगे तो जब डॉक्टर का कल फोन आया कि मिलना चाहता है तो बस, न जाने क्या क्या ख्याल दिल में आने लगे. खराब खराब से. एक ई सी जी लिया था. प्री मील और पोस्ट मील ब्लड और यूरीन. तब या तो ई सी जी गड़बड़ाया है या फिर ब्लड शुगर. राम राम भजते रहे.

रात में दो ठो मिठाई भी दबा लिए कि कहीं डायबटीज निकली तब तो इससे दूरी हो ही जाना है. मिठाई से मिलते एकदम वो ही फीलिंग रही जैसे कॉलेज के बाद गर्ल फ्रेण्ड की शादी और कहीं तय हो जाये और हम आखिरी बार मिल रहे हों. इससे आपको समझने में सहूलियत होगी, इसलिये यह उदाहरण दिया और कोई खास वजह नहीं है.

आज गये थे डॉक्टर के यहाँ. ईश्वर का लाख लाख शुक्र-न शुगर की शिकायत निकली और दिल तो ऐसा बेहतरीन आया कि डॉक्टर कहने लगा कि अगर अभी भी फेंक दो तो टूटेगा नहीं यह मेरा दावा है. हमने कहा कि दिल की गारंटी तो तुम ले ले रहे हो, हाथ पैर की कौन लेगा? बताओ? चुप हो गया बेचारा. बस, कहने लगा कि B12 की कमी जोरों पर हैं तो बूस्टर लगेंगे. हमें क्या गुरेज, लगाओ. हम तो है ही तुम्हारी छत्र छाया में.

रक्तचाप भी शनैः शनैः काबू में आ ही रहा है. कितना कौन उधम कर पाया है, सभी को आना ही होता है एक दिन काबू में तो यह तो बेचारा रक्तचाप है. और है भी तो अपना ही.

खैर, सुनते हैं भारत में गरमी अभी भी बेतरह सता रही है. हाय!! पानी क्यूँ नहीं बरसता. गरमी के लिए इतना मधुर गीत अभी कुछ दिन पहले ही नवगीत की पाठशाला के लिए लिखा था. शायद बहुतों की तरह गरमी नें भी वहाँ न पढ़ा होगा इसलिए बारिश ठीक से नहीं आई. इसलिए यहाँ फिर से कि शायद गरमी पढ़ ले:

चले आओ!!

द्वारचार कर जाती गरमी


सोचो, जानो और समझ लो,
कैसे है सह जाती धरनी.
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी.

अक्सर शांत समुन्दर ने ही,
तूफां का आगाज किया है.
कठिन डगर चलने वाले को,
मंजिल ने सरताज किया है.

काम लगन से करने वालों,
मीठे फल है लाती करनी.
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी.

उजियारा होने से पहले,
होती है अंधियारी रात.
दुख के पीछे सुख आयेगा,
लगती कितनी प्यारी बात

बुरे वक्त में अच्छा सोचो,
दिल में है आ जाती नरमी.
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी.

जीवन जीना एक कला है,
उससे यूँ घबराना कैसा.
धूप छांव के बीच रहा है,
रिश्ता अजब पुराना जैसा

भावी खुशियों के खातिर ही,
पीड़ा है पड़ जाती सहनी.
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी.

-समीर लाल ’समीर’


-चित्र साभार: गुगल

रविवार, अगस्त 02, 2009

बीबी तो बीबी होती है!

मेरे अजीज डॉ अमर कुमार मेरी तबीयत खराब होने की खबर से चिन्तित हो उठे और इस बात से नाराज भी कि आखिर किसने हमें मोटा कह दिया. भरपूर समझाये, बातों बातों में कुछ इलाज भी समझा गये.

अपने बचपन की फोटू भी ठेल दी. कितनों की क्या कहूँ, मैं तो अपनी खुद की भी बचपन की फोटू उठा लूँ और शीशे के सामने खड़े हो जाऊँ तो न पहचान पाऊँ अपने आप को मगर ये डॉक्टर का मेनटेन्स तो देखो, बचपन से अब तक जस के तस धरे हैं. न तो चेहरा मोहरा बदला और न ही बाल!! :) कहते हैं कि पचपन का हो गया हूँ. वर्तनी की त्रुटियाँ वो करते नहीं वरना हम समझते बचपन का हो गया हूँ.

देखो, कितना मासूम सवाल कर रहे हैं-कि किसने आपको मोटा कहा, अंकल!! अरे क्या बतायें डॉक्टर, किसने नहीं कहा. खुद ने खुद से भी कहा शीशा देखकर!! सच बोलने की आदत है न!! :)

बताओ, बताओ!!

आभार देने को बहुत जी चाहा मगर तबीयत का क्या कहें और उस पर से बीबी. अगर कम्प्यूटर पर बैठे रहें तो वो माने कैसे कि बीमार हैं. फिर तो आराम से भी जायें. तो मूँह ढापे सोये रहते हैं. डॉक्टर भी उसी पाले से खेल रहा है. वैसे तो उसका आभार कि बीबी मान गई कि वाकई बीमार हैं वरना तो काँपते डग भरते चाय बना रहे होते. मगर खाना जो बता गया है कि क्या कहें? इतने जालिम तो भारत के डॉक्टर भी नहीं होते. जितना खाना मिल रहा है, उतना तो पहले चखने में हजम कर लेते थे और क्वान्टिटी से जायें तो जायें क्वालिटी से भी गये, बिना नमक. हे ईश्वर!! किस जनम का बदला रहा है इस नादान बालक से?

न जाने क्यों क्यूँ वो फिल्म वाला शेर याद आ रहा है:

अब तो इतनी भी मयस्सर नहीं मयखाने में,

जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में...

अभी बीबी बाजार निकली तो हम चादर के बाहर निकले हैं. फटाफट २-४ ब्लॉग पर आमद दी है और ये आत्म व्यथा पोस्ट ठेलने की तैयारी है, इसके पहले की वो लौटे, हम इस पोस्ट को छापें और मूँह तक चादर ढांपें.

कमजोरी तो खैर बरकार है ही. आराम भी जारी है. मित्रों की ढेरों शुभकामनाऐं आ रही हैं तो मानो ठीक होने का मन ही नहीं हो रहा. :)

बीबी आये तो कुछ सूप वगैरह खाने में नसीब हो. जो भी खिला दे रही है, धन्य मना रहा हूँ और बीबी का धन्य मनाये बिना रास्ता भी क्या है.

बीबी तो बीबी होती है, इनका हाल देखो, तो हम कौन खेत की मूली हैं:

बीबी तो बीबी होती है !


बस, इनकी हालत देख चन्द पंक्तियाँ मचल उठीं:


जब भी मैके जाती बीबी
अपनी याद कराती बीबी

सबकी किस्मत अलग अलग है
सबको ना मिल पाती बीबी.

नाचें गायें सब बाराती
तब घर में है आती बीबी

होगे राजा तुम जंगल के
सबको डांट लगाती बीबी.

यूँ ही डरने वालों से तो
खाना भी बनवाती बीबी

किस्मत फूटी निकली गर तो
बरतन भी मंजवाती बीबी.

इधर उधर जो नजर फिरे गर
आँखें है दिखलाती बीबी.

साड़ी जेवर ला कर दे दो
प्यार बहुत जताती बीबी.

सुबह सुबह परनाम (प्रणाम) करो जो
दिन भर है मुस्काती बीबी.

सुन्दर कितनी दिखती हो तुम
सुन कर के शरमाती बीबी.

कितना भी मैं लिख दूँ गाथा
हमको अपनी भाती बीबी.

-समीर लाल 'समीर'