गुरुवार, मई 31, 2007

"हास्य-दर्शन"- कवि अभिनव का जयकारा

"हास्य-दर्शन" - कवि अभिनव की प्रभावशाली प्रस्तुति - एक समीक्षा

भाई अभिनव शुक्ल का नाम यूँ तो किसी परिचय का मोहताज नहीं है. आप नियमित उन्हें निनाद गाथा ब्लॉग पर पढ़ते और सराहते आये हैं. यह मेरा सौभग्य ही है कि मेरे पहले कवि सम्मेलन में मंच प्रस्तुतिकरण के समय वो मेरे बाजू में बैठे मेरा हौसला बढ़ाते रहे. हमको अपना बड़ा भाई मानने वाले स्नेही अभिनव ने उसी कवि सम्मेलन के दौरान अपनी नई सी.डी. "हास्य-दर्शन" भेंट की. हमने बड़ी खुशी खुशी अपना अधिकार जताते हुये ले भी ली और धन्यवाद भी शायद नहीं दिया. फिर कभी दे लेंगे सोचते हुए. तब से अब तक वो सी.डी. कई बार सुन चुका हूँ, मगर मन ही नहीं भरता तो सोचा कि धन्यवाद स्वरुप उसकी समीक्षा ही पेश कर दी जाये.



'हास्य-दर्शन' में अभिनव की १९ कविताओं को उनकी अपनी आवाज़ में सुना जा सकता है। इसमें हास्य, व्यंग्य, राष्ट्रीय चेतना तथा जीवन दर्शन से जुड़ी हुई कविताओं को बहुत सुंदर रूप में प्रस्तुत किया गया है। अपनी इसी विविधता के कारण यह एलबम हास्य से दर्शन तक की यात्रा तय करता प्रतीत होता है। 'हास्य-दर्शन' का विमोचन 'अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति' के रजत जयंती समारोह में अमेरिका की राजधानी वाशींगटन डी सी में हुआ। 'हास्य-दर्शन' को कवि अभिनव की प्रथम काव्य प्रस्तुति होने का गौरव भी प्राप्त है। अभिनव की कविताओं में जो लोक तत्व है वह अनुकरणीय है। उन्होंने बड़ी सहज भाषा में जटिल से जटिल भावों को कुशलतापूर्वक प्रस्तुत किया है।

जिन्होने अभिनव को मंच पर बोलते सुना है, वे सभी जानते हैं कि उनमें भाषा की गहनता तथा प्रस्तुति का सौंदर्य एकमएक हो गया है। मैं अभिनव के साथ 'नियाग्रा फाल्स कवि सम्मेलन' के मंच पर काव्य पाठ कर चुका हूँ। मैंने वहाँ देखा कि किस प्रकार श्रोताओं को सम्मोहित करते हुए अभिनव अपने पिटारे में से एक के बाद एक उत्कृष्ट रचना निकाल रहे थे। एक ओर जहाँ उनमें मंचीय कवियों की अदाएँ हैं तो वहीं दूसरी ओर भीषण साहित्यिक रचनाकारों की गम्भीरता भी उनके व्यक्तित्व का अंग है। सामान्य से सामान्य विषय पर बात करते करते वे न जाने कब गहनता के महासागर में प्रवेश कर जाते हैं। यह विषयांतर तथा विविधता अभिनव के काव्य पाठ को तथा उनकी रचनाओं को समृद्ध करती है।

हास्य दर्शन हमें हास्य से दर्शन तक की एक यात्रा पर ले जाता है। एलबम का प्रारंभ भाषा की भावपूर्ण वंदना, "राष्ट्रभाषा हिंदी" नामक रचना से होता है तथा फिर अभिनव हमें हास्य-व्यंग्य लोक में ले जाते हैं। एलबम के अंत में चार गम्भीर कविताओं को स्थान दिया गया है, मेरे विचार से ये कविताएँ बहुत ज़रूरी थीं क्योंकि इन्हीं से श्रोता को दर्शन की अनुभूति होती है। एलबम के दो पड़ाव हैं, एक जब हास्य रचनाएँ व्यंगय में विलीन हो जाती हैं तथा दूसरा जब व्यंग्य रचनाएँ दार्शनिकता को स्थान देती प्रतीत होती हैं। सुस्पष्ट और कानों को अच्छी लगने वाली सुमधुर प्रवाहपूर्ण भाषा तथा सरल प्रस्तुति के कारण कवि सामने बैठ कर आपसे संवाद करता सा प्रतीत होता है।

अभिनव की बहुआयामी काव्य प्रतिभा तथा उत्कृष्ट प्रस्तुति के कारण 'हास्य दर्शन' काव्य प्रेमियों में खासा लोकप्रिय हुआ है। मेरी कार में भी 'हास्य दर्शन' जब तब बज कर मुझे काव्य लोक की यात्रा करवाता रहता है। अगली बार जब आप अभिनव से मिलें तो उनके आटोग्राफ सहित 'हास्य दर्शन' की सीडी को भी अपने साथ संजो लीजिएगा।

एलबमः 'हास्य-दर्शन' - A journey from laughter to philosophy.
कविः अभिनव शुक्ल
परिकल्पनाः अखिल अग्रवाल
परिचयः डा आदित्य शुक्ल
चित्रः कल्पा रमैया
फोटोः शबरेज़ इरफान खान
सर्वाधिकारः दीप्ति शुक्ल

अनुक्रमः

१ राष्ट्रभाषा हिंदी - (हिंदी भाषा से कवि के संबंध की अंतर्गाथा।)
२ वैलेंटाइन डे - (घनाक्षरी छन्दों में प्रस्तुत विनोदपूर्ण प्रेम संदर्भ।)
३ रेल-यात्रा - (बरेली से लखनऊ तक की रेल यात्रा का व्यंग्यपूर्ण वर्णन करती हास्य कविता।)
४ रसगुल्ला - (हलवाईगिरी करने की आनंददायक संस्मरणात्मक कविता।)
५ हमें तो बहुत पैसा कमाना है - (प्लास्टिक समाज पर प्रहार करती सटीक व्यंगय रचना।)
६ मुट्टम् मंत्र - (चेतावनीः स्वास्थय के प्रति जागरुकता मोटापे के लिए हानिकारक है।)
७ इंटरव्यू - (इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के साक्षात्कार पर मज़ेदार हास्य कविता।)
८ वर्लड वार - (आखिर क्यों होती है।)
९ जेब में कुछ नहीं है - (प्रेम के पीछे के सच का खुलासा।)
१० हम तो आई आई एम जाएँगे - (संसद और आई आई एम के मध्य झूलती व्यंग्य रचना।)
११ कोई तो जीवित है - (संवेदनहीनता पर चुटीला व्यंग्य।)
१२ मोटा काग़ज - (शिक्षा व्यवस्था पर क़रारा व्यंग्य।)
१३ साहस - (जोश और हिम्मत का संचार करती उत्साहपूर्ण कविता।)
१४ मशाल दीपक और चिंगारियाँ - (चिंगारी से मशाल बनने की प्रेरणा देती छोटी सी रचना।)
१५ एक स्वप्न - (राष्ट्र भक्ति से परिपूर्ण ओज कविता।)
१६ अंदर से बाहर तक - (तुलनात्मक अध्यनात्मक कविता।)
१७ हम भी वापस जाएँगे - (प्रवासी मनोभावों की सशक्त प्रस्तुति।)
१८ नदी के दो किनारे - (जीवन को प्रकृति से जोड़ती हुई अद्भुत कविता।)
१९ पिता का जन्मदिवस - (बुज़ुर्ग पिता की अवस्था का मार्मिक चित्रण।)




भाई अभिनव और उनके सशक्त प्रस्तुतिकरण की एक झांकी आप यहाँ भी देख सकते हैं. इसी प्रस्तुतिकरण से आप समझ जायेंगे कि हमें अभिनव से इतना लगाव क्यूँ है, आखिर मोटापे का घोर समर्थक जो है. अभिनव के उज्जवल भविष्य के लिये अनेकों शुभकामनायें. उसका नाम होगा तो हमारा भी तो करवायेगा, यह हम तय मान कर चल रहे हैं. :)


पुनश्चः : इस समीक्षा के छप जाने पर अभिनव भाई ने घोषणा की है कि जिसे भी यह सी.डी. चाहिये, उनके हस्ताक्षर के साथ, वो यहाँ टिप्पणी के माध्यम से प्राप्त कर सकता है. हर संभव प्रयास होगा कि आप को सी.डी. जल्द मिले, जब भी आपसे अभिनव भाई की मुलाकात होगी.

रविवार, मई 27, 2007

तुम....सिर्फ तुम

चलो, यह "तुम" शब्द बहुत व्यापक है, फिर आत्मिय भी. और सच में तुम तो तुम हो और तुम्हारे लिये यह गीत:

तुम....

आज फिर जब दो घड़ी को, साथ तेरा मिल गया
क्या वजह थी कौन आकर, ओंठ मेरे सिल गया
बात मेरे मन की मेरे मन में घुट कर रह गई
तू उठा चल कर तो तेरे, साथ मेरा दिल गया.

बाग से आती है खुशबू, उड़ पवन के साथ में,
मैंने समझा तुम खड़ी हो, आज मेरे पास में,
रात भर खिड़की से आ के, चाँदनी छूती रही
यों लगा तुम घुल रही हो,एक उस अहसास में.

मेरे ख्वाबों मे जो बसती, एक वही तस्वीर हो तुम
मेरे जीवन की राहों की, बन गई तकदीर हो तुम
मैं तुम्हें पाऊँ, लिये ख्वाइश सदा जलता रहा हूँ
डूब पाऊँ त्राण जिसमें, उस नदी का नीर हो तुम.

छंद सब चुन कर तुम्हारे,गीत अब यह गा रहा हूँ
खुद उऋण होने को तुमसे,प्रीत करता जा रहा हूँ
आज का यह दौर कैसा, प्रेम भी कर्ज़ा हुआ अब
प्यार टुकड़े, किश्त में करके तुम्हें लौटा रहा हूँ

--समीर लाल 'समीर'

गुरुवार, मई 24, 2007

हॉट स्पॉट यानि....

हमेशा हास्य व्यंग्य वगैरह लिखते लिखते ईमेज बड़ी खराब होती जा रही है. सब समझते हैं कि हमें सिवाय ठिठोली के और कुछ आता ही नहीं. जो मिलता है बस मजाक. हमारी अपनी सोच से की गई गंभीर बातें भी मजाक में उड़ा दी जाती हैं. हमसे आधी उमर के लोग चैट पर हमसे कहते है कि और मामू, अभी भी टुन्न हो कि होश में..क्या चल रहा है? लालू की सी स्थिती हो गई है. अब रेल्वे कितना ही बढ़िया काम करे या कोई बेहतरीन योजना घोषित करे, सब एक बार को तो हंस ही देते हैं. इसीलिये आज हमने सोचा है कि बीच बीच में गंभीर चिंतन भी किया करेंगे. इसी के मद्दे नजर आज हम आपको पूरी क्लास लगा कर पढ़ायेंगे:

फुरसतिया जी आये हैं , ले कर कलम दवात
अखबारों मे वह छापते इंकब्लॉगिंग की बात.
इंक ब्लॉगिंग की बात, हस्त लेखन से होती
अरमानी के सूट पर, बाँध ली उन्होंने धोती *
कहत समीर कि सीखो इसमें लिंक लगाना
समझ तुम्हें आ जाये, तब करके दिखलाना.
-समीर लाल ‘समीर’
* अब कम्प्यूटर सामने रखा हो और आप यूनिकोड में टंकण में भी माहिर हों, फिर भी हाथ से लिखकर उसे कम्प्यूटर पर चढ़ाने में तुले हों, इसे अरमानी सूट पर धोती पहनना नहीं कहेंगे तो और तो कोई उपमा मुझे नहीं सूझती!!







उपरोक्त तस्वीर में अगर आप फुरसतिया जी के नाम पर जाकर चटका लगायेंगे तो वह आपको उनके चिट्ठे पर ले जायेगा, जहाँ उन्होने ऐरिहासिक अखबार निकाला है और यदि इंक ब्लागिंग पर चटका लगायें तो वो देबाशीष के चिट्ठे पर, जहाँ उन्होंने इंक ब्लॉगिंग से हम सबका परिचय कराया था. जब सब के पास ले जा रहा है यह चटका, तो हम कौन पाप किये हैं? हमारे नाम पर भी लगा कर देख लो. यह सब संभव होता है, हाईपर लिंक की ही तरह हॉट-स्पाट लिंक देकर. जिस तरह से आप टेकस्ट में हाईपर लिंक देते हैं, वैसे ही चित्र में अमुक स्थान पर हॉट-स्पाट लिंक. और इसे लगाने के औजार के रुप में मैं माईक्रो सॉफ्ट के फ्रंट-पेज (Microsoft Front Page) का इस्तेमाल करता हूँ, जो कि माईक्रो सॉफ्ट ऑफिस के साथ आमूमन स्थाफित रहता है. अगर आपके पास फ्रंट पेज नहीं है, तो आपका सफर यहीं खत्म कर लें. आपने यहाँ तक पढ़ा, आपका बहुत आभार और साधुवाद. अन्य औजारों से भी इसे लगाया जा सकता है, मगर हम यहाँ सिर्फ फ्रंट पेज धारकों को समझा रहे हैं, माईक्रो सॉफ्ट की चमचागिरी में कि शायद उनकी नजर पड़ जाये तो लेपटाप वगैरह कुछ ईनाम में दे दें.

क्रमवार दिशा निर्देश:

१.एक हस्त-लेख (छोटा सा-मात्र सलाह है. बाकि आपकी इच्छा, चाहो तो उपन्यास लिख लो) (ध्यान रहे उसमें उड़न तश्तरी का नाम आये, उसी का लिंक लगाना सिखाऊंगा, इस आलेख में :)) तैयार कर लो.
२.फिर उसकी तस्वीर ले लो (स्कैनर से या कैमरा से, ये आपकी इच्छा पर)
३.फिर उसे किसी फोटो वाली साईट पर चढ़ा लो (जैसे कि फ्लिकर- फ्री है न भाई) .साथ ही सरलता के लिये अपने कम्प्यूटर भी एक कॉपी सेव किये रहो. आगे काम आयेगी.
४.वहाँ से उसका लिंक नोट कर लो (और अपने पास धरे रहो, वो भी अभी आगे काम आयेगा-उस समय मांगूगा तो हे हे मत करने लगना. सम्भाल कर रखो.)
५. अब फ्रंट पेज खोल लें.
६. फिर File> New> Blank Page खोल लें.
७.इस पन्ने के Design View में Insert>Picture>From File क्लिक करके कंडिका ३ में जो कॉपी आपने अपने कम्प्यूटर में सेव की है, उसे खोल लें.
८. अब वह फोटो फ्रंट पेज में खुल जायेगी. (यह अपने आप हुआ, आपकी मेहनत कंडिका ८ का परिणाम, इस कंडिका के लिये आपका योगदान भारत के विकास में नेताओं के योगदान के सम-तुल्य माना जायेगा.)
९.अब फ्रंट पेज में View>Toolbars>Pictures पर क्लिक कर दें.
१०.इस नीचे तस्वीर की तरह की टूल बार आपको दिखने लगेगी.




११. इसमें दायें से पांचवा जो आयताकार चित्र दिख रहा है, उसे क्लिक करें.
१२. फिर माऊस को चित्र पर ले जाकर समीर (आपने शायद उड़न तश्तरी लिखा है, चलेगा, उसी को कवर कर लो) का नाम को इस आयत से कवर कर लो. जैसे ही आप माऊस रिलिज करेंगे, अपने आप हाईपर लिंक का बक्सा खुल जायेगा, वहाँ http://udantashtari.blogspot.com/2007/05/blog-post_22.html का लिंक दे दें.



१३. अब फ्रंट पेज के कोड वाले पन्ने पर जाकर फोटो का लिंक C:\\ या जो भी आपके कम्प्यूटर वाला है, को बदल कर कंडिका ४ वाला लिंक, जो हम कहे थे धरे रहो, आगे काम आयेगा, वो लगा लें.
१४. अब यहाँ से '<'Body'>' के बाद से '<'/Body'>' के पहले तक का कोड कॉपी कर लें.
१५. अब इसे ब्लॉग के पोस्ट वाले पन्ने पर पेस्ट कर दें. बस!! हो गया.
१६. अब अपनी पोस्ट पर जाकर लिंक पर क्लिक करें.

वाह, पहुँच गये उड़न तश्तरी पर. अब वहाँ कमेंट कर दें और फिर जो मर्जी सो करो. हमें क्या!!

आशा है समझ आ गया होगा. अगर नहीं आया तो पूछने में शरमाना मत. सबका बुद्धि पर समान अधिकार थोड़े ही न होता है. कोई जल्दी समझ जाता है, कोई देर से और कोई नहीं भी समझ पाता. यही सब देखकर ईश्वर के कहीं न कहीं होने की भावना बलवती हो जाती है. :) अगर कमेंट नहीं करोगे तो हम समझेंगे कि आपको समझ नहीं आ पाया और ट्रेफिक काउन्टर से हमें मालूम तो चल ही जायेगा कि आप आये थे...हा हा!!!


नोट: वैसे अब तक की हिन्दी इंक ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी पहली पोस्ट कनाडा अमेरिका न जाओ... का सेहरा हमारे फुरसतिया जी के सिर पर जाता है. एक न एक दिन उन्हें इसके लिये पुरुस्कार से नवाजा जायेगा. वो तैयारी रखें. आज से वो ईनामी कहलाये.

अब आज की क्लास खत्म. अब चलो, थोड़े जाम-शाम हो जायें. ऐसे मास्साब फिर नहीं मिलेंगे, जो क्लास के बाद कॉकटेल पिलवायें. :)

सोमवार, मई 21, 2007

अश्वम जेलम गच्छन्ति

हफ्ते भर पहले समाचार सुनता था:

छ्त्तीसगढ़ के किसी शहर में एक न्यायाधिश महोदय को टहलते वक्त किसी आवारा घोड़े ने काट लिया. इससे नाराज माननीय न्यायाधिश महोदय ने शहर के सभी आवारा घोड़ों को पकड़ने का आदेश दे दिया. नगर निगम के कर्मचारी भाग भाग कर घोड़ों को पकड़ने लगे. आनन फानन में इनाम भी घोषित कर दिया गया: प्रति घोड़ा पकड़वाई: रुपये ३०० मात्र. ७ घोड़े पकड़े जा कर कांजी हाऊस (नगर निगम द्वारा संचालित आवारा पशुओं की जेल) में बंद हैं.




अब यहाँ तक तो समाचार हो गया, जो कि एक सत्य समाचार है. अब आगे उड़न तश्तरी की उड़ान:

इस घटना से मेरी घोड़ों का मात्र गधों के बड़ा स्वरुप होने की सोच को और अधिक बल मिला है.

अरे, काटने के पहले देख तो लो कि किसको काट रहे हो? कोई आम आदमी को काट लेते तो वो आदमी ही हँसी का पात्र बनता. सब कहते कि अब तक उसका दुलत्ती मारना या अगली दो टांगों से धौल जमाना तो सुना था, यह घोड़ा काटना तो पहली बार सुना. भई, कुत्ता काटते तो सुना है. जरुर तुमने ही कुछ शरारत की होगी उसके मुँह के पास जाकर और उसने काट लिया होगा. वरना आजतक किसी और को तो काटा नहीं. कोई कहता कि तुम्हारा बाल देखकर तुम्हें घास का मैदान समझ लिया होगा और बस चरने घुस गया होगा. इसीलिये कहते हैं कि टहलने निकलो तब भी बाल वाल संवार लो जैसे पार्टी वगैरह में जाते हो. टहलने तो सुबह सुबह ऐसे निकलते हो कि मानो अभी भी बिस्तर में ही डले हो. ऐसी बातें करते लोग.

अब दिमाग तो है नहीं, आखिर ठहरे तुम गधे का बड़ा स्वरुप. आव देखा न ताव और इतने बड़े आदमी को काट लिया. तो बंद तो होना ही था. गल्ती तुम्हारी और सारी कौम बदनाम हुई. सब बंद हो गये बेचारे वो भी ईनामी घोषित होकर. हल्का फुल्का अपराधी तो फिर भी चुपचाप जेल होकर लौट आता है, किसी को पता नहीं चलता और आकर फिर भीड़ में शामिल होकर आम सा नजर आने लगता है. मगर ईनामी-बाबा रे बाबा!! आओ अब निकल कर. देखना मिडिया कितना उछालता है. सबकी टीमें पहुँच गई है वहीं कांजी हाऊस के दरवाजे पर बैठी हैं. अब देना जबाब. एक से एक तुमसे भी बड़ी बड़ी बेवकूफी की बातें पूछेंगे. जबाब दे देकर तुम थक जाओगे घोड़ा होना के बावजूद भी, जनता सो जायेगी मगर वो पूछने से नहीं थकेंगे. सारे देश के घोड़े कुख्यात हो जायेंगे सिर्फ तुम्हारी एक बेवकूफी से. खैर, अब जो होगा सो झेलना. बस शुभकामना यही है कि सही सलामत लौट आओ. कहीं एन्काऊन्टर न हो जाये, बहुत फैशन में है. यही चिन्ता खाये जाती है.

वैसे, काश सभी रक्षक ऐसे होते तो दुनिया कितनी खुशनुमा जगह होती. एक गुंडा कुछ हरकत करता. आदेश आता कि सारे गुंडों को बंद कर दो. सब गुंडे एक दुसरे की गुंडागिरी रोकते नजर आते कि कहीं उसके चक्कर में वो भी न बंद हो जाये. वही हाल चोरों, हत्यारों का होता. और सबसे बढ़िया तो नेताओं का होता. सब एक ही जगह मिल भी जाते पकड़ने के लिये. एक को आजीवन होती, पूरी कौम अंदर, हमेशा के लिये. बड़ा आराम लगा सोच कर ही.

फिर सोचता हूँ कि अगर यह सरकारी ३०० रुपये प्रति घोड़ा पकड़वाई स्किम रामचन्द्र जी के जमाने में आ गयी होती तो लव कुश अश्वमेघ यज्ञ वाला घोड़ा पकड़वा कर एक टाईम तो कंद मूल से निजात पाकर पिज्जा वगैरह खा ही लेते. कितने खुश होते बेचारे बच्चे. लेकिन सरकारी स्किमों से कब किसी जरुरतमंद का लाभ हुआ है सो उनका भी नहीं हुआ. कोई आश्चर्य नहीं.

एक विचार और आता है कि अगर ये कांजी हाऊस नगर निगम की जगह पुलिस विभाग के तहत आता होता तो ७ की जगह कम से कम १०३ घोड़े पकड़ में आते. ७ तो यही वाले. ३ रज्जन मियाँ के टांगे वाले घोड़े, उन्हें भी यह उसके घर से धमका के ले आये होते. घर में बंधे थे बेचारे मगर यह उनको आवारा घूमता दर्शाते. वही हाल होता मश्ताक भाई की २ शादियों वाली घोड़ियों का. मश्ताक भाईजान जिद्द करते तो वो भी एक अलग केस में धारा १५१ के तहत बंद पाये जाते. बाकि के ९१ में ईंट भट्टे के ५४ और धोबी घाट के ३३ गधे और बेंदू किसान के ४ खच्चर. यह गधे और खच्चर भी डंडे की भाषा समझते हैं और वो भी पुलिसिया डंडे-बड़े आराम से कहते कि हम घोड़े है. आप भी कहाँ सोच में पड़ गये कि लोग पहचान लेंगे. कोई नहीं पहचान पायेगा. सब बंधकों के ३०० रुपये के हिसाब से बने ३०९००. इसका हिस्सा बांट लगेगा. क्या अब भी आप सोचते हो कि कोई पहचान पायेगा. हवलदार साहब का तो इसमें जो हिस्सा बनेगा सो तो है ही और उपर से बोनस में मश्ताक भाई को छोड़ने के २००० और. वाह भई वाह!!!




उपरोक्त आंकड़ों का प्रतिशत आप किसी भी कारागृह के कार्यालय से पुष्टीकरण करवाने के लिये स्वतंत्र हैं. बहुत अंतर नहीं मिलेगा.

शुक्रवार, मई 18, 2007

चिट्ठाकार मिलन: रमन कौल जी पधारे द्वार हमारे

रविवार को दिन में रमन भाई का फोन आया कि सोमवार शाम को टोरंटो आ रहे हैं. हमें बड़ी प्रसन्नता हुई और हमने आग्रह किया कि भाई, हमारे ही घर रुकें. अब रमन जी संकोची जीव और दूसरा, हमसे पहले कभी मिले भी नहीं थे तो सोचे कि हम कहीं घर पर रुकवा कर सारी शाम कवितायें न झिलवा दें. कहने लगे, आयेंगे जरुर मगर ठहरेंगे अपने रिश्तेदार के यहाँ. हम समझ तो गये कि क्या वजह है मगर फिर भी सोचा कि शाम को आयेंगे और खाना खाने को हम जबरदस्ती रोक ही लेंगे. इस बीच ७-८ की जगह २-३ कविता तो सुना ही डालेंगे मौका निकाल कर. हमें इसीलिये संकोची लोग अच्छे लगते हैं कि खुलकर कविता न सुनाने के लिये बोल नहीं पाते. बस फिर क्या था, हमने बेसब्री से सोमवार शाम का इंतजार करना शुरु कर दिया. ३ बढ़िया वाली कविता कंठस्थ कर लीं और एक गजल का भी तर्रनुम में गाने का रियाज कर लिया. १० और कवितायें प्रिंट करके रख लीं ताकि अगर रुकने के लिये मान गये तो वो इसी यज्ञ में आहूति चढ़ा देंगे.

सोमवार सारा दिन दफ्तर में प्रफुल्लित घूमते रहे. कोई काम नहीं किया रमन भाई को कविता सुनाने की उमंग में. शाम को घर लौट कर बस फटाफट स्नान किया. बढ़िया क्रिम-पाउडर वगैरह लगाकर बाहर बरामदे में ही बैठ गये सड़क पर नजर गड़ाये. आखिर फोटो और कविता सुनाते समय विडियो लेने का भी प्लान बनाये थे, इसीलिये क्रिम-पाउडर.

अति उत्साह में हम भूल ही गये कि अगला भी वरिष्ठ चिट्ठाकार है. सारे इंडीब्लागीज विजेताओं से पहले से मिला जुला है. सब गुर समझता है. हम तो खुद को ही होशियार समझे बैठे थे. शाम ७ बज गये इंतजार करते, रमन भाई नहीं आये और न ही उनका फोन. हमने इस बीच दो तीन बार फोन उठाकर चेक भी कर लिया कि ठीक काम तो कर रहा है कि नहीं. मन को तसल्ली देते रहे कि लम्बा रास्ता है ९०० किमी का, शायद कहीं समय लग रहा होगा बार्डर वगैरह पर भीड़ में कभी कभी २-३ घंटे भी लग जाते हैं क्लिरेंस मिलने में. सवा सात बजे फोन की घंटी बजी और हमारा चेहरा खिल उठा. रमन भाई ही थे. हमने कहा, स्वागत है भाई, कहाँ तक पहुँचे? रमन भाई बोले, पहुँचे हुये तो देर हो गई है. अपने रिश्तेदार के यहाँ हैं. अब बहुत थक गये हैं, कल सुबह ही आ पायेंगे आपके पास. हम तो बुझ से गये. एक दो मनुहार के बाद हमने कल सुबह आने वाली बात मान ली कि कहीं समझ न जायें हमारी स्कीम. मन को मना लिया कि सुबह ही कुछ एक सुना डालेंगे. वैसे हमारा गला शाम को ज्यादा सुर में रहता है. ११ बजे दिन में आने की बात तय पायी गई.

सुबह जल्दी उठकर थोड़ा बहुत ऑफिस का काम निपटाया, फिर तैयार होने लगे. १०.३० बजे दरवाजे पर घंटी बजी. बिना पावडर लगाये भागे दरवाजा खोलने. इसी से बाद में जो फोटू ली गई, उसमें हमारा रंग थोड़ा दबा सा आ गया है. :)

भये प्रकट कृपाला.......

सामने रमन भाई और आशा भाभी खड़े थे. नमस्कार बंदगी हुई और बस फिर ड्राइंग रुम में बातचीत शुरु हुई. टोरंटो आने का मकसद, रास्ता कैसे गुजरा आदि. तब तक साधना (हमारी पत्नी) भी आ गई. उनसे परिचय. फिर महिलाओं की अलग और हमारी और रमन भाई की आपसी बातचीत आगे बढ़ी. हम क्या करते हैं, कब कनाडा आये. रमन भाई क्या करते है आदि सामान्य शिष्टाचार की बातें. हम सोच ही रहे थे कि बात को कैसे घूमा फिरा कर चिट्ठों पर लायें और फिर धीरे से कविता पर. हमने रमन भाई को सूचित किया कि ई-स्वामी जी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है. यह उनके लिये समाचार था जो उन्हें नहीं मालूम था. बात शुरु हुई थी कि पत्नी नें बताया कि नाश्ता लगा दिया है. पहले नाश्ता कर लें. हमने पत्नी को आँख भी मारी कि जरा कुछ देर तो रुको. मगर ऐसे मौके पर उनको समझ ही नहीं आता सो आज भी नहीं आया. अब हम सब खाने के मेज की इर्द गिर्द बैठे थे, तो खाने की बात चलना स्वभाविक थी. यह अच्छा बना है, यह कैसे बनाया यानि कि खाने की मेज पर जैसे शिष्टाचारवश बात होती है, बस वो ही.



रमन जी और उड़न तश्तरी (हम)

हम बात का रुख फिर घुमाने के चक्कर में थे तो जुलाई में विश्व हिन्दी सम्मेलन में जायेंगे कि नहीं, से शुरु की कि इस बीच रमन भाई को चाय पीने की इच्छा होने लगी. भाभी जी ने बताया कि रमन भाई चाय के बहुत शौकीन हैं और हर समय चाय पीने को लालायित रहते हैं. रमन भाई ने भी कन्फर्म किया कि खाना कैसा भी हो, चल जाता है. चाय बेहतरीन ही पसंद है और वो भी देशी वाली उबाल कर. अब अच्छी चाय, यानि जिम्मेदारी हमारी पत्नी से लुढ़क कर हम पर आ गिरी.तो हम उसमें व्यस्त हो गये. चाय बना कर फुरसत पायी, तो रमन भाई कैमरा ले आये. फिर फोटो सेशन. साथ चाय भी चलती रही. फोटू का सेशन खत्म हुआ तो रमन भाई ने ऐलान किया कि १० घंटे गाड़ी चला कर वापस पहुंचना है तो अब चलेंगे. हम तो कविता धरे ही रह गये और रमन भाई बच कर निकल गये. हमने भी कहा कि यह आपका आना माना नहीं जायेगा (कैसे मानें जब कविता सुना ही नहीं पाये) अगली बार समय निकाल कर आयें और हमारे पास ही रुकें. उन्होंने भी वादा किया और हमें भी अपने घर आने का निमंत्रण दे गये. अब सोचता हूँ कि किसी समय यात्रा कर ही ली जाये. वहाँ पहुँच कर तो सुना ही लूँगा जी भर कविता और खूब होगी चिट्ठाकारी की बातें!!

हमारी पत्नी हमें भारत की आदत के अनुरुप आज भी लाल साहब ही बुलाती हैं. इस तरह का संबोधन देख आशा भाभी बड़ी खुश हुई और हमें भाग्यवान होने की बधाई दी कि कनाडा/ अमेरीका में भी कोई साहब बुला रहा है. वरना ऐसा नसीब किसी का यहाँ पर कहाँ-यहाँ तो सबको पहले नाम से ही पुकारा जाता है.



बायें से दायें: रमन भाई, साधना, आशा भाभी

बहुत अच्छा लगा रमन भाई और आशा भाभी से मिलकर. सच में लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं.

बस, इस तरह यह चिट्ठाकार मिलन बिना चिट्ठाकारी की चर्चा के ही, यह साबित करते ही बीत गया कि-तू डाल डाल, तो मैं पात पात. यही तो पहचान है वरिष्ठ चिट्ठाकार की कि हम उनको नहीं घेर पाये. नमन करता हूँ रमन भाई को.

गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल: तुम जियो हजारों साल

आज गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल जी का जन्म दिवस है. हमारी ओर से अनेकों बधाई और शुभकामनायें.




इस अवसर पर मेरी पसंद का राकेश जी द्वारा रचित एक पुराना गीत पेश कर रहा हूँ

जैसे छंद गीत में रहता

जैसे छंद गीत में रहता, मंदिर में रहता गंगाजल
मीत बसे हो तुम कविता में लहराते सुधियों का आँचल

बच्चन ने तुमको देखा तो निशा निमंत्रण लिख डाला था
रूप सुधा पीकर दिनकर ने काव्य उर्वशी रच डाला था
कामायनी उदित हो पाई सिर्फ़ प्रेरणा पाकर तुमसे
प्रिय-[रवास का मधुर सोमरस तुमने प्यालों में ढाला था
एक तुम्हारी छवि है अंकित काव्यवीथियों के मोड़ों पर
बसी हुई कल्पना सरित में बसा नयन में जैसे काजल

मन के मेरे चित्रकार की तुम्ही प्रिये कूची सतरंगी
तुम अषाढ़ का प्रथम मेघ हो, तुम हो अभिलाषा तन्वंगी
तुम कलियों का प्रथम जागरण,तुम हो मलयज की अँगड़ाई
तुम दहले पलाश सी, मन में छेड़ रहीं अभिनव सारंगी
पा सान्निध्य तुम्हारा, पूनम हो जाती है, मावस काली
खनक रही मेरे गीतों में मीत तुम्हारे पग की पायल

तुम गीतों का प्रथम छंद हो, तुम उन्वान गज़ल का मेरी
तुमने मेरे शिल्पकार की छैनी बन प्रतिमायें चितेरी
वेद ॠचा के गुंजित मंत्रों का आव्हान बनी तुम प्रतिपल
तुमने आशा दीप जला कर ज्योतित की हर राह अंधेरी
तुम गायन की प्रथम तान हो, तुम उपासना हो साधक की
बासन्ती कर रहा उमंगें शतरूपे यह धानी आँचल

जैसे छंद गीत में रहता, मंदिर में रहता गंगाजल
मीत बसे हो तुम कविता में लहराते सुधियों का आँचल

बुधवार, मई 16, 2007

का करें इन अनर्गल प्रलापियों का......

घाव लगता है कोई, गहरा लगा है
आपकी दहलीज पर, पहरा लगा है
दो पलों को सो गये जो रात में
आपको मालिक मकां, बहरा लगा है.


उपरोक्त पंक्तियाँ चिट्ठाकारी से संबंधित हैं. इन पंक्तियों में कवि ने टिप्पणी पर माडरेशन और वर्ड वेरीफिकेशन से जूझते लोगों की वेदना और इस तरह का सुरक्षा इंतजाम करने वालों का संदेश देने का प्रयास किया है. उद्देश्य है दुर्घटना से सुरक्षा भली. सभी एडस विरोधी जागरुकता अभियान के हिमायती भी इस नारे से सहमत हैं और इसको प्रमोट कर रहे हैं. कहीं कुछ गड़बड़ हो जाये, उससे बेहतर है कि सुरक्षा के उपाय पहले से कर लो वरना कहने वालों का क्या है वो तो कह कर निकल जायेंगे-"अब पछतावे क्या होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत." कवि हृदय विशाल होता है. वह चिंतनशील होता है. वह भावुक होता है और उसकी सोच अनंत होती है. वह पागलपन की हद तक सोच सकता है, ऐसा वह सोचता है. वह किसी भी बात का काव्यात्मक छंदमय विवरण कर सकता है, वो ऐसा भी सोचता है. आजकल अगर वो नामी है तो वो कवि कोकिल-कंठी होता है. जितनी मधुर आवाज, उतना सशक्त प्रस्तुतिकरण और उतना नामी कवि. वो स्वरों का उतार चढ़ाव जानता है बिना उसके उसकी कविता कारगर नहीं होती. कविता का अर्थ निकले, यह आज की नव-कविता में आवश्यक नहीं. कविता में छंदात्मक प्रवाह हो, उसमें स्वर निकले और कंठ मधुर हो, यह आज के सफल मंचीय कविता और कवि के सूत्र हैं. बात उद्देश्य से भटक गई हमेशा की तरह. यह बात की प्रवृति है. बहता पानी, जहाँ भी ढलान दिखी, बह चले. आवश्यक नहीं कि वहाँ आवश्यक्ता हो. हमारे जैसा कम बात करने वाला भी बह जाये तो यह बात की तारीफ है, हमारी नहीं.

तो बात कर रहे थे उस मुक्तक की जो उपर लिखा गया है. उसका भावार्थ दर्शाने का प्रयास था.

प्रथम पंक्ति में :

घाव लगता है कोई, गहरा लगा है

कवि कहना चाह रहा है घिघियाते हुये कि भाई साहब, कहाँ इतनी दिक्कत में फँस गये. लगता है कहीं मन माफिक रच रच कर की गई टिप्पणी छपी नहीं. अगले ने माडरेशन में मिटा दी और आपके मन के भाव की भ्रूण हत्या हो गई. इस बात का तो हम भी विरोध करते हैं. इसके लिये तो आंदोलन की बनती है. स्टेट ट्रांस्पोर्ट की बसों में आग लगाने की बनती है. भ्रूण हत्या को हत्या का दर्जा मिलना चाहिये जिसकी सजा को माफ करने का अधिकार मात्र आज कलाम जी को है और कल अटल जी को होगा. भैरों सिंग जी को तो बिल्कुल भी नहीं. सर्व सम्मती भी तो आखिर कोई चीज है और वो भी सर्व दलीय. वैसे जब तक अटल जी अपनी हामी पॉज के साथ भरें , कोई और ही न अपाईन्ट हो जाये और या फिर कार्यकाल समाप्त हो जाये. बस यही चिंता खाये जा रही है. और कोई भी इस योग्य नहीं. माफी हो जायेगी, यह भी तय है. जब अफजल को हो सकती है तो यह टिप्पणी महाशय तो अभी पैदा भी नहीं हुये थे.


अब अगली पंक्ति:


आपकी दहलीज पर, पहरा लगा है

यानि यह कहा जा रहा है कि आपके दहलीज पर टिप्पणी करना आसान नहीं. वो माडरेशन में चली जाती है, फिर अप्रूव हो या न हो. और उस पर से पहरा शब्द का बोल्ड होना यह दर्शाता है कि सिर्फ माडरेशन ही नहीं है बल्कि वर्ड वेरीफिकेशन भी चालू है. क्या भाई, अंग्रेजी पढ़ने का इम्तिहान ले रहे हो कि अपनी रक्षा में जुटे हो. आगे, दहलीज का अर्थ चिट्ठे से है जो कि विषय वस्तु है अतः प्रधान की भूमिका में है.


अगली पंक्ति:

दो पलों को सो गये जो रात में

अब चूंकि हिन्दी चिट्ठाकारी अंतर्राष्ट्रिय स्तर पर हो रही है तो टाईम डिफ्रेंस भी स्वभाविक है. जब भारत में सुबह होती है तो दुबई-कुवैत में दोपहर..लंदन में शाम और अमरीका-कनाडा में रात. ऐसे में यह हमेशा हो जाना संभव है कि जब आप टिप्पणी करें तब वो चिट्ठाकर सो रहा हो. वो आपकी चित्कार व दुत्कार व तारीफी शब्द न सुन पाये, नींद के आगोश में और

चौथी पंक्ति के तहत:

आप उसे बहरा समझ बैठें. मालिक मकां यानि चिट्ठे का मालिक...अरे भाई, वो मात्र सोया है, बहरा नहीं हुआ है. उठेगा तब सुन लेगा. मगर यह व्यवस्था का कमाल है कि संयम खत्म हो गया है. अभी हमने आवाज की और अगर अगले ने तुरंत नहीं सुना का अर्थ कामचोरी, घूस की मंशा और लाल फीताशाही ही लगाना उचित है. अन्य बातों की न तो अहमियत है और न ही गुंजाईश. इस तरह उसे बहरा मान लेना ही बेहतर है.

अगर अहमियत और गुंजाईश चाहिये तो यह माडरेशन और वर्ड वेरीफिकेशन को उखाड़ फैंको और खुल्ला खेल फर्रुख्खाबादी का नाराबुलंद करो. गाली बकने वाले और अनर्गल प्रलापी इंतजार में हैं. और आपका बहरापन अलविदा की बाट जोह रहा है.

रविवार, मई 13, 2007

आप गदहा लेखक हैं……..


आज एक प्रशंसक की अपने लेख पर टिप्पणी मिली. हिन्दी टंकण औजार की अनुपलब्धता की वजह से उन्होंने रोमन में टिप्पणी कर दी. ऐसे होते हैं प्रशंसक कि चाहे जैसे भी हो, अपने भाव जरुर लिख भेजते हैं. हम बहुत खुश हुये. अरे, टिप्पणी तो संस्कृत से लेकर फ्रेंच तक की किसी भी भाषा में मिल जाये. हमेशा आमंत्रित हैं. अंधा क्या चाहे, दो आँख. तुरंत उनकी टिप्पणी पढ़ना शुरु की. आप भी पढ़ें. आपकी सुविधा के लिये उसे देवनागरी में भी टंकित किये देता हूँ.

रोमन में:

Aap ek achche gadha lekhak hain. Aap apni dullati shali se badi karari chot karte hain.Main Gadha nahi, kavita karta hun. Aapke lekh jitne sidhe sadhe dikhte hain,ander se utne hi nukile hote hain. Yahi to asli gadha ki pahchan hai or yahi aapko anya gadhon se alag isthan deti hai. Is lekh se aapne punah sabit kar diya ki Aap ek bahut behtarin gadha lekhak hain. Aapko shat shat naman. Aapke Gadha lekhan ne hume koyal bana diya hai. Likhate rahe, hum aate rahenge.

देवनागरी में उपरोक्त कथन, जैसा मैं पढ़ पाया:

आप एक अच्छे गदहा लेखक हैं. आप अपनी दुल्लती साली से बड़ी करारी चोट करते हैं. मैं गदहा नहीं, कविता करता हूँ. आपके लेख जितने सीधे सादे दिखते हैं, अंदर से उतने ही नुकीले होते हैं. यही तो असली गदहा की पहचान है और यही आपको अन्य गदहों से अलग स्थान देती है. इस लेख से आपने पुनः साबित कर दिया कि आप एक बहुत बेहतरीन गदहा लेखक हैं. आपको शत शत नमन. आपके गदहा लेखन ने हमें कोयल बना दिया है. लिखते रहें, हम आते रहेंगे.

(नोट: साहित्यिक हिन्दी में गधा को गदहा कहते हैं)

अब हम सोचने लगे कि भाई यह प्रशंसक हैं कि आलोचक. मित्र हैं कि दुश्मन. शत शत नमन भी कर रहा है और गदहा भी कह रहा है.यह बात तो समझ आई कि कैसी भी आवाज में कविता गाता होगा तो गदहे की ढ़ेचू के सामने उसकी आवाज कोयल सी लगेगी, तो उसने अपने आपको कोयल समझ लिया होगा. मगर हमको गदहा कह रहा है, वो भी ऐसा वैसा नहीं, सब गदहों में अपनी अलग पहचान रखने वाला बेहतरीन गदहा. यह भी कह गया कि लिखते रहो, हम आते रहेंगे. लगता है इतना गरिया कर भी पेट नहीं भरा. आगे जब भी लिखेंगे और गरियायेगा.हे प्रभु, रक्षा करना. बस इतना ही हमारे मुँह से निकल पाया. लोग कहते हैं रोमन में हिन्दी लिखने से पूरे भाव नहीं आ पाते हैं, मजा नहीं आता. अब और कैसे भाव देखने हैं? और कितना मजा चाहिये?

याद आने लगा कि यह वही बंदा है, जिसे हमने प्रोत्साहित करके इसका चिट्ठा बनवाया था. देवनागरी में टंकण सिखाया था. लालच थी तो बस इतनी कि यह हमारे लिखे की भी प्रशंसा करेगा और इसी उद्देश्य से उसकी हर आड़ी तिरछी कविताओं को दाद देते रहे. कितनी बार अपने मन को मारा. अपने मानस को पीछे ढकेल दिया और इनकी कविता पर लिख आये- बहुत खूब, मजा आ गया आदि आदि. आज उसका ये सिला मिला है. मानो हम अमरीका हो गये और ये तालिबान. हमसे चलना सीखे और हम ही पर वार.

स्थितियों की गंभीरता भांपते हुये हम तुरंत देवनागरी के सबसे बड़े समर्थक बन गये. सोच लिया कि हम रोमन में लिखी टिप्पणी नहीं छापेंगे. शाम का सूरज छिपता, उसके पहले ही हमारे उन तथाकथित प्रशंसक महोदय का फोन आ गया कि हमारी टिप्पणी नहीं छापी. हमने सोचा कि कैसा बंदा है? मन में तो आया कि पलट कर गाली बक दें. फिर अपनी जमीं हुई छवि का ख्याल करते हुये हिम्मत जुटा कर कहा: काहे नाराज हो, भाई! क्यूँ ऐसी टिप्पणी करते हो? क्या गलती हो गई?

वो आश्चर्य से बोला: काहे की गलती, भाई. तारीफ ही तो किये हैं. हमारे सामने तो प्रिंट पड़ा है, क्या गलत लिख दिया?

हमने कहा:’ अच्छा, जरा पढ़कर सुनाना. खुद ही समझ जाओगे. ‘

फिर जब वो सुनाने लगा तो हम तो आवाक रह गये. आप भी सुनो, उन्होंने क्या सुनाया:

‘ आप एक अच्छे गद्य लेखक हैं. आप अपनी दौलती शैली (उच्च शैली) से बड़ी करारी चोट करते हैं. मैं गद्य नहीं, कविता करता हूँ. आपके लेख जितने सीधे सादे दिखते हैं, अंदर से उतने ही नुकीले होते हैं. यही तो असली गद्य की पहचान है और यही आपको अन्य गद्यों से अलग स्थान देती है. इस लेख से आपने पुनः साबित कर दिया कि आप एक बहुत बेहतरीन गद्य लेखक हैं. आपको शत शत नमन. आपके गद्य लेखन ने हमें कायल बना दिया है. लिखते रहें, हम आते रहेंगे.’

(नोट: हमारे प्रशंसक अपनी कवित्तमयी भाषा में उच्च शैली को गज़ल के प्रभाव में दौलती शैली कहते हैं)

फिर उन्होंने कहा कि एक स्पेलिंग मिस्टेक हो गई है वो a की जगह o लग गया है, कायल में. अब उन्हें क्या बतायें कि कहाँ कहाँ स्पेलिंग मिस्टेक हो गई है. हम तो शर्मसार हो गये कि क्यूँ शक कर बैठे इतने बड़े प्रशंसक पर. सामने होता तो गले लग कर रो पड़ते. फोन पर तो बस सॉरी ही कह पाये.

तो देखा आपने कि कितना सही कहते हैं लोग कि रोमन में लिखने से भाव खो जाते हैं और जो उभर कर आते हैं वो कितने खतरनाक हो सकते हैं. अर्थ का अनर्थ हो जाता है.

अपील: देवनागरी में हिन्दी लिखना बहुत आसान है, इस लिंक या इस लिंक पर देखें. देवनागरी में लिख कर हिन्दी को समृद्ध बनायें.

बुधवार, मई 09, 2007

सरररर......सबसे तेज!!!

ट्रिन..ट्रिन...

'हेलो, सबसे तेज चैनल "बात-कर"? मैं दस्युराज मरखाम बोल रहा हूँ.'

'अरे दस्युराज, बहुत दिन बाद फोन किया? सब ठीक ठाक तो चल रहा है?'

'हाँ भई, सब ठीक चल रहा है. अभी चुनाव में काफी व्यस्त थे. कल ही फारिग हुये हैं तो सोचा कि अब काम धंधे से लगें. एकाध डकैती डाल ली जाये.'

'यह तो बड़ा नेक विचार है. कहाँ डकैती डालने का विचार है?'

'वही सेठ करोड़ीमल के यहाँ. बहुत माल जमा किये है, स्साला!!. न जाने कैसे ये लोग दो नम्बर का पैसा हजम करते हैं. हम तो जब तक जान की बाजी लगाकर मेहनत से छीनकर न लायें, हजम ही नहीं कर सकते.'

'सेठ करोड़ीमल के यहाँ!! कोई फायदा नहीं. उनके यहाँ तो अभी दस मिनट में सरकारी डाका पड़ने वाला है. हमें लाईव कवरेज का एक्सक्लूसिव कान्टेर्क्ट मिला है.'

'सरकारी डाका??'

'हाँ भाई, आयकर का छापा मारा जा रहा है. अति गोपनीय खबर है. हमारी टीम तो कवरेज के लिये निकल भी गई है स्पॉट पर.'

' बहुत तेज खबर लाते हो भाई!! वाकई, फिर तो कोई फायदा नहीं है वहाँ जाने का. जूठन भी नहीं छोड़ेंगे वो तो.'

'हाँ, तुम्हारे डाके से तो कुछ दिन में आदमी उबर भी जाये. सरकारी डाके में तो रुपये पैसे के साथ इज्जत अलग जाये और सारी जिन्दगी की उगाही बोनस में. जब देखो तब होली दिवाली नज़राना पहुँचाओ, लिस्ट में नाम जो चढ़ गया.'

' बताओ, हमारी तो पूरी टोली तैयार बैठी है. फिर हम सेठ इतवारी लाल के यहाँ डाका डाल देते हैं.'

'दस्युराज, आप वहाँ एक दो दिन रुक कर डाल लें.दो दिन का मसाला तो हमको मिल ही गया है, इस सरकारी डाके से. उसके बाद फिर आपकी कवरेज कर लेंगे.'

'अरे, दो दिन बाद से हम खाली नहीं हैं. राजधानी जाना होगा. चुनाव परिणाम आ रहे हैं. जोड़ तोड़ के बिना सरकार बन नहीं पायेगी. कौनो मेजारटी तो आ नहीं रही. इस बार भी सब हमारी महिमा पर निर्भर करेंगे.'

'तब फिर वहाँ से फुरसत होकर डाल लिजियेगा. न तो सेठ जी कहीं जा रहे हैं, न ही आप और न उनकी दौलत. आराम से डाल लिजियेगा और हम तो हैं ही कवरेज के लिये.'

'नहीं भाई नहीं, हमारे पास बस आज और कल का ही समय है. आप तो अपनी टीम भिजवा कर लाईव कवरेज करवाईये या फिर हम दूसरे चैनल वालों से बात करें?'

'कैसी बातें कर रहे हैं आप? यह मत भूलियेगा कि आपको उठाईगीर से दस्युराज का खिताब दिलाने वाला भी हमारा ही चैनल है. झूठी डकैतियों में भी आपको ही हाई लाइट किया. वारदातों पर वारदात दिखाई. तब जाकर आप जीरो से हीरो बने. बड़े बड़े लुटेरों को बिना कवरेज के निख्खटू बना दिया सिर्फ आपको प्रमोट करने के लिये. आपके नाम की दहशत का माहौल हमने बनाया और आज आप ऐसी बात कर रहे हैं.-

-आपने अगर किसी दूसरे चैनल को अपना काम दिया तो हम फिर किसी और को प्रमोट करेंगे, तब आप हमसे कुछ न कहियेगा. आप तो जानते हैं हम तो मरे गुण्डे तक को वाया आतंकवादी घोषित करवाते हीरो बनवा दें, फिर जिन्दा की तो बात ही क्या है. बहुत तेज चैनल है हमारा. हमसे आगे कोई कहीं नहीं पहुँच पाता. घटनाकार भी नहीं. अरे हमारी तेजी तो ऐसी है कि बच्चा जब घर से गढ्ढे में गिरने के लिये निकलता है तब से कवर करते हैं और तब तक करते हैं जब तक की सरकार उसे गढ्ढे से निकाल न ले. अनेकों उदाहरण हैं हमारी तेजी और फुर्ती के-बंदा कलेक्टरेट में जेब से जहर की बोतल निकालता है और हम कवर करना शुरु कर देते हैं जब तक पुलिस या आम नागरिक उससे जहर की बोतल छीनकर उसे मरणासन्न अवस्था में अस्पताल न पहुँचा दें. हम न तो पुलिस हैं और न ही आम नागरिक कि उसे बचायें. हमारा काम कवरेज करना है, सो हम से बेहतरीन कोई नहीं कर सकता. हमारी कवरेज के लोग मुरीद हैं, कहाँ मिलेगी आपको ऐसी कवरेज?? जाना है तो शौक से जाईये मगर फिर हमसे कोई उम्मीद मत रखियेगा.'

दस्युराज को भावावेश में की गई अपनी गल्ती का एहसास हो गया. वो इस चैनल की फुर्ती और तेजी का आख्यान सुन के भावविभोर हो उठे और अपने उपर किये गये इनके अहसानों से इतने द्रवित हुए कि आँख भर आई.

भर्राये गले से सिर्फ इतना ही बोल पाये कि 'सॉरी' और फोन रख दिया.

अब चुनाव परिणाम आने के बाद ही डाके की सोचेंगे.

तब तक आप देखते रहिये..सबसे तेज चैनल..."बात-कर".

सोमवार, मई 07, 2007

अरे ओ दकियानुसी!!!

समय बदलता जाता है. मान्यतायें बदलती जाती हैं. हम बदलते जाते हैं.

जब भारत में रहते थे तब कोई भी मित्र सर मुंडाये मिल तो भर जाये. हम झट से अपना मुँह तुरंत उतार लेते थे झूठमूठ और बस, पूछ बैठते थे कि भाई, कब हुआ, कैसे हुआ? क्या बीमार थे?

वो भी सर झुकाये बताता कि हाँ, पिता जी गुजर गये. कोई खास बीमार तो नहीं थे. बस, बुढ़ापा था. रात में खाना खा कर सोये और सुबह.....!!! फिर उसकी आँख भर आती. आगे का हम एकस्ट्रा समझदारी में खुद समझ जाते कि सुबह वो जागे नहीं. उसके कँधे पर हाथ धरते. ढाढस बंधाते और तैहरवीं का निमंत्रण सुनश्चित करते.

बस उसके बाद, एक तेहरवीं की दावत..खुले आम सूतमसात....डट कर भोजन....और फिर सब नार्मल. अगले गंजे का इंतजार.

कितना आराम था. मुंडा सर मतलब शोक का संदेश. न पूछना पड़े और न बताना पड़े. सब कुछ अपने आप में कहता सर. पूर्णतः चमकता सर मतलब तेहरवीं का निमंत्रण पत्र. यह होती है संस्कृति..बिना बोले सब कुछ कह जाती है. जैसे हमारे जमाने की भारतीय कन्या. बस, प्रेमाग्रह के जबाब में पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदना और नज़रें झुका देना मात्र, स्विकारोत्ति का प्रमाण पत्र था.

समय बदल गया है. अब तो मुँह बा कर भी कन्या हाँ बोल दे तो भी शंका बनी ही रहती है कि सच में हाँ कहा है कि सिर्फ फन के लिये कि यार, मैं तुम्हारा रियेक्शन देखना चाहती थी. यू आर टू सेन्टीमेन्टल- अर्थ, बड़े दकियानुसी हो जो हाँ को हाँ समझते हो.

यहाँ मित्र मिले. सर मुंडाये हुये. हमने मुँह उतार लिया. हमारे साथ एक और यहाँ के लोकल संस्कारी मित्र थे. वो उसे देखकर तुरंत बोले-औह मैन!! शेव्ड़-लूकिंग सो कूल-वोव!!!! ग्रेट ड्यूड---हम तो भौचक. एक तो अगले के घर गमीं हो गई और यह बंदा बोल रहा है-शेव्ड़-लूकिंग सो कूल-वोव!!!! मगर यह क्या, अगला भी हंसते हुये कहने लगा कि भाई, बाल साथ नहीं दे रहे थे तो सोचा कि शेव करा लें..मे बी आगे ठीक आ जायें.

और फिर वो कूल ड्यूड मेरी ओर मुखातिब हुआ...वाटस रांग विथ यू? कोई शोक वगैरह तो नहीं हो गया घर में..आपका उतरा चेहरा देख कर लग रहा है कि घर में कोई गमीं हो गई है.

अब उसको कैसे समझाऊँ कि भईये, यह चेहरा तो तेरी खोपड़ी देखकर आदतन उतर गया था. हमारे यहाँ तो सब भला चंगा है. यह तो जमाने में ही आग लगी है जो हमारा चेहरा गड़बड़ नज़र आ रहा है. हम बहुत दकियानुसी जो हैं न!!!


नोट:
आदातानुसार बड़ा नहीं लिखे हैं तो क्षमा किया जाये. वैसे ऐसी ही विडंबना कम कपड़ों के साथ भी है जिसे कभी आभाव माना जाता था वो अब फैशन है. :)

गुरुवार, मई 03, 2007

धार्मिक सहनशीलता और पौराणिक तटस्थता

समस्त युग पुरुष, जैसे कि फुरसतिया जी तटस्थता पर लिख चुके और नितिन बागला जी पूछ चुके. अरुण(पंगेबाज) दिनकर जी की इन पंक्तियों में नहा कर डूब चुके.


"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।"


और ऐसे ही कभी परसाई जी ने हम भारतीयों के बारे में कहा था कि हममें अदभुत सहनशीलता है और साथ ही बड़ी भयावह तटस्थता. कोई हमारे पैसे छीन कर भाग जाये और हम तुरंत दान का मंत्र जपने लगते हैं. मैं परसाई जी की आत्मा से क्षमा मांगते हुए उनसे पूर्णतः सहमत न होने की गुस्ताखी कर रहा हूँ. शायद उनकी बात काफी भारतीयों पर सही उतरे मगर हम पर तो नहीं.

(एक अपवाद है जरुर, कि जब किसी पंगे में दोनों तरफ हमसे भारी बजरंगी होते हैं, तब भी हम मजबूरीवश सहनशील और तटस्थ हो जाते हैं. इसे समझदारी समझा जाये, कायरता नहीं. ऐसे वक्त हम दान मंत्र नहीं जपते तद्यपि जपने का ढोंग जरुर करते हैं)

हमारी सहनशीलता सिर्फ अदभुत ही नहीं बल्कि धार्मिक भी है. शायद इसी से हमारी सहनशीलता को देख, हमें जानने वाले और हमारा परिवार खीझ उठता है. हर विषय में धार्मिकता के साथ इस तरह की बातें स्वभाविक हैं. हमने अक्सर बहूओं को सास की पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों पर खीझते देखा है. यह कोई नई या अनोखी बात नहीं. धार्मिक सहनशीलता एक जीवन शैली है, जिसके दो अलग अलग चरित्र एवं पहलू होते हैं. घर में कुछ और व बाहर कुछ और. बहुत घोर धार्मिक महापुरुष देखे, जिन्होंने न जाने कितनी सड़कों पर, रेल्वे की जमीन पर और सार्वजनिक स्थलों पर मंदिर/मजार बना डाले और उनके हटाये जाने पर आंदोलन किये और जेल भी गये. बात मरने/मारने पर आ जाती है. मगर जरा उनसे पूछ कर देखियेगा कि जनता की सुविधा के लिये उनके अहाते में उनकी जमीन पर एक मंदिर/मजार बनवा दें क्या!! सब धार्मिकता एक मिनट में दर किनार हो जायेगी. वो सार्वजनिक धार्मिक हैं, परिवारिक नहीं. वैसी ही धार्मिक सहनशीलता के हम अनुयायी हैं. जब तक हमारी सहनशीलता हमारा व्यक्तिगत नुकसान नहीं करती, हम सहनशील हैं. दूसरा प्रताड़ित होता रहे, हम सहनशील रहेंगे और हर सहनशील व्यक्ति का मूक समर्थन करते रहेंगे.

रही तटस्थता की बात, तो वह हमारी भयावह इसलिये है क्यूँकि उसका आधार पौराणिक है.पौराणिक बातों का इच्छानुसार और समयानुकुल अर्थ निकाला जा सकता है अपनी सुभीता का आंकलन करते हुये. पौराणिकता के कवच में सब अर्थ जायज हो जाते हैं. बस, उसका एक बेहतरीन तार्किक आधार तलाशना होता है. तलाशने से तो कारु का खज़ाना हासिल हो जाता है तो तार्किक आधार की क्या मजाल. इस तरह की कवची अवधारणाओं से तो खुदा भी डरता है कि कब न इंसान अर्थ का अनर्थ कर उसे ही पंचायती चौपाल में खड़ा कर ले. इसीलिये भयावह है. पौराणिकता एक आत्म विश्वास देती हैं और अपने अनुरुप उनके अर्थ को सिद्ध करना एक सम्मानजनक और प्रतिष्ठित स्थिती प्राप्त करता है.

इस धार्मिक सहनशीलता और पौराणिक तटस्था के बीच संतुलन बनाये रखने का हमारा सिद्धांत भारतीय सड़कों पर गढ्ढों से बच कर चलने के सिंद्धांत जैसा है जो कि हर पल बदलता रहता है और जिसके आप कभी अभ्यस्थ नहीं हो सकते, जब तक की भारत सरकार गढ्ढों की गारंटी लेना न शुरु कर दे. अरे बिना गारंटी के, आज जहाँ गढ्ढा है, कल भी वहीं रहेगा, कोई जरुरी नहीं. क्या अभ्यास करें खाक!! इस गढ्ढे को भरने के लिए सड़क पर उससे बड़ा गढ्ढा बना देते हैं.किस को छोड़ें- किस को लांघे. हमसे तो बेहतर शराबी हैं. जितना बड़ा गढ्ढा नहीं, उससे लंबी कुद. क्या पता कितना लंबा गढ्ढा हो. शराबियों का त्रितीय नेत्र खुल जाता है. वो सजग होते हैं. इसीलिये मैं उनका नमन करता हूँ और कायल हूँ. वो सामान्य नहीं होते. वो प्रेरणापरक जीव होते हैं. वो साधुवाद के असली अधिकारी हैं. हर कदम संभल कर उठाते हैं. काश, सब इंसान शराबी होते, तब काहे का पंगा. सब संभले होते. सब संभल संभल कर चलते गढ्ढे बचाते हुए. यह संतुलन का सिद्धांत परिस्थिती जन्य होता है. जैसी स्थितियां दिखीं, वैसी ही संतुलन की कवायत.

परसाई जी की यह बात सही है कि कोई हमारे पैसे छीन कर भाग जाये तब ऐसी स्थिती में हम दान मंत्र जपने लगते हैं. मगर आंख बंद करके नहीं. एक आँख खुली रख कर मंत्र जपना हमने सीख लिया है. यह एक कला है. हम मंत्र जपते हुए भी सब देखते हैं. जानते हैं कि क्या चल रहा है. उसी एक आँख से देखते रहते हैं.

हमारी इन सब स्थितियों से उपजा, जन हित में जारी, सूत्र जिसे आप कुछ दिनों में हर बस पर, चौराहे पर, संसद में, जेल में टंगा पायेंगे. बस मार्केटिंग का बंदा तलाशा जा रहा है, जब योग मार्केटिंग के बल पर विश्व स्तर पर बेच दिया गया तो हम तो मुफ्त दे रहे हैं:


"धार्मिक सहनशीलता और पौराणिक तटस्थता ही एक अति-सफल राजनीतिक जीवन की कुँजी है." -स्वामी समीरानन्द


सूचना: "जो भी राजनितज्ञ इस सूत्र से अभिभूत हो स्वामी समीरानन्द जी के श्रीचरणों के दर्शन को लालायित हों, कृप्या संपर्क करें."

अब देखो, जब कोई हमारे पैसे छीन कर भाग और हम एक आँख बंद किये दान मंत्र का जाप कर रहे थे तब क्या दिखा इस बाईं आँख से और सुनो इस धार्मिक सहनशील और पौराणिक तटस्थ आदमी को. :


मन ही मन में वो हँसता है,
पर आँख में आसूं रखता है
जिसको तुम नेता कहते हो
दिन रात तिजोरी भरता है.

पांच साल में दिखता है
हाथ जोड़ वो झुकता है
वोट तुम्हारा मिल जाये
वादों पर वादा करता है

उसका कोई ईमान नहीं
वादों का सम्मान नहीं
एक बार उसे जितवा देना
फिर तेरा कोई ध्यान नहीं.

बस भाई भतीजा वाद यहाँ
नहीं भ्रष्टाचार अपराध जहाँ
बैठे हैं छिप कर खद्दर में
गाँधी की इनको याद कहाँ.

इनका बस एक ही मकसद है
कुर्सी हथियाने की कसरत है
मंदिर मज्जिद अब तुम जानों
इनको तो पद की हसरत है.

-समीर लाल 'समीर'

नोट: इस आलेख में इस्तेमाल 'हम' और 'हमारा/हमारी' शब्द का अर्थ हम नहीं है, यह प्रतिकात्मक है. इस अवधारणा में विश्वास रखने वाले समस्त श्रृद्धालु इसे स्वयं का द्योतक मान सकते हैं. यह कोई नई बात नहीं है, अक्सर वैदिक ऋचाओ मे इस तरह के कुछ शब्दो का प्रतिकात्मक प्रयोग हुआ है.