शनिवार, अप्रैल 17, 2021

बाबू जी! अब आप अपने घर वापस चलिए न!!!

 

चौबे जी और उनके बेटे मुकेश का परिवार उनके साथ कटनी में रहता था। बेटा शहर की एक कंपनी मे मैनेजर था और चौबे जी रिटायर मास्साब। मुकेश अभी एक साल पहले ही मुंबई से वापस आया है, जहाँ वह एक मल्टी नेशनल में काम करता था।

कुछ साल पहले चौबे जी की पत्नी नहीं रहीं। चौबे जी अकेले रह गए थे। दमा के मरीज थे। कई बार बेटे से कहा कि बेटा, अब अकेले नहीं रहा जाता, क्या मैं तेरे पास मुंबई आ जाऊं? हर बार वही जबाब कि कंपनी का दिया छोटा सा फ्लैट है  और उसमें वो, उसकी पत्नी और दो बच्चे। हालांकि तीन बेड रूम और एक गेस्ट रूम भी है मगर उसमें से एक स्टडी और एक गेस्ट के लिए है, आप कहाँ रहेंगे?और फिर वहाँ आपके परिचित लोग हैं। यहाँ मुंबई में तो पड़ोसी भी नहीं किसी को पूछते, आप बोर हो जाएंगे।

कहते सुनते पाँच साल निकल गये थे किन्तु न कभी मुकेश उन्हें ले गया न कभी उसके फ्लैट में इतनी जगह बन पाई कि चौबे जी वहाँ जाकर रह पायें। इतने दिनों में मुकेश भी एक ही बार कटनी आया था, वो भी नगर निगम से कोई सत्यापन करवाना था। पत्नी और बच्चे तब भी नहीं आए थे। मुकेश का मानना था कि वो चूना भट्टी से उठते पलूशन से बीमार पड़ जाएंगे।

दो साल पहले मुकेश की नौकरी जाती रही। ७-८ महीने कोशिश की किन्तु कहीं कोई उम्मीद नजर न आई। हार कर सपरिवार वो कटनी चला आया। चौबे जी के पुराने परिचय के चलते एक अच्छी कंपनी में मैनेजर हो गया। बच्चे यहीं स्कूल में भर्ती हो गए। उसकी पत्नी और बच्चों की तबीयत भी ठीक रही। रिटायर्ड मास्साब चौबे जी का घर बहुत बड़ा तो नहीं था किंतु फिर भी तीन बेडरूम, ड्राइंग और डाइनिंग तो था ही। एक बेडरूम मुकेश और उसकी पत्नी ने ले लिया। एक एक दोनों बच्चों ने और चौबे जी का बिस्तर ड्राइंग रूम में लगा दिया गया। कुछ दिन तो सब ठीक चला किन्तु चौबे जी दमा के चलते रात भर खाँसते तो मुकेश की पत्नी को शिकायत रहती कि न तो खुद सोते हैँ न ही हमको सोने देते हैं। उसने कई बार मुकेश से अलग घर लेने के लिए कहा किन्तु अब न तो सेलरी इतनी ज्यादा थी और ७-८ महीने मुंबई की बेरोजगारी के बाद बचत ही। अतः मन मार कर साथ रहते रहे।

पत्नी की शिकायत बढ़ती रही। मुकेश सोचता रहता कि क्या किया जाए। एक दिन गुस्से में पत्नी ने कहा कि इतना भी क्या सोचने में लगे हैं? बाबू जी को ओल्ड एज होम में अच्छा सा कमरा दिलवा दीजिये। वहाँ इनकी उम्र के मित्र भी मिल जाएंग एवं मन भी लग जाएगा। फिर मेडिकल और भोजन की व्यवस्था भी अच्छी खासी है वहाँ। पेंशन से इतना पैसा तो आ ही जाता है कि ओल्ड एज होम का किराया भरने के बाद भी कुछ जेब खर्च बचा रहे। फिर हम तो हैं ही अगर कुछ और जरूरत हुई तो। बीच बीच में मिल आया करना।

मुकेश भी सोचता रहा कि कैसे कहे बाबू जी से। कोई तरीका नहीं सूझ रहा था। ऐसे में एकाएक महामारी ने देश में अपने पाँव पसारे। करोना का हाहाकार मच गया। बुजुर्गों पर तो उसका कहर ऐसा कि जिस घर में बुजुर्ग हों उस घर के बच्चे और जवानों को घर से न निकलने की सख्त हिदायत दे दी गई।

मुकेश की नौकरी ऐसी थी कि उसे तो दफ्तर जाना ही था। न जाने क्यूं उसे इस आपदा में अवसर नजर आया। उसने तुरंत बाबूजी से कहा कि आप घर में सेफ नहीं हैं। मुझे आपकी बहुत चिंता हो रही है। मैं दफ्तर जाता हूं। बच्चे बाहर खेलते हैं। न जाने कब कौन करोना साथ ले आए और आपकी तबीयत पर बन आए। मैंने पास के ओल्ड एज होम में बात कर ली है। उन्होंने बुजुर्गों की कोविड से रक्षा की विशेष व्यवस्था की है। आप कुछ दिन वहाँ रह लें और जैसे ही माहौल ठीक हो जाएगा, हम आपको वापस ले आएंगे। चौबे जी का मन तो न था और वो सब समझ भी रहे थे मगर क्या करते। हाँ कह दिया।

अगले दिन जब मुकेश उन्हें वहाँ पहुंचाने गया तो पास वाला ओल्ड एज होम शहर से कई सौ किमी दूर इंदौर में था। मुकेश उन्हें वहाँ छोड़ कर उसी रात कार से वापस लौट गया। चौबे जी धीरे धीरे वहाँ रहने की आदत डालने लगे। घर के ड्राइंग रूम के एकाकीपन से बेहतर धीरे धीरे यहाँ का माहौल अच्छा लगने लगा। कुछ हम उम्र हम व्यथा से गुजरते साथी बन गए। बीच बीच में मुकेश को फोन करते तो पता चलता कि हालत बहुत खराब हैं, आप वहीं रहें।

साल बीत गया। वैक्सीन आ गई। ओल्ड ऐज होम वालों को प्राथमिकता की श्रेणी में रखा गया था अतः चौबे जी को वैक्सीन लग गई। उन्होंने फोन पर मुकेश को बताया कि अब टीका लग गया है। अब मुझे कुछ नहीं होगा, मुझे वापस घर ले चलो। मुकेश ने कहा कि अभी संभव नहीं है। जब तक घर में सबको नहीं लग जाता, तब तक आप वहीं रहिये। वैसे भी आपको वहाँ तकलीफ क्या है? आराम से रहिये। यहाँ धूल धक्कड़ में आकर क्या करिएगा। बात सुनकर चौबे जी को थोड़ा धक्का तो लगा और यह भी समझ में आ गया कि अब बाकी का जीवन भी यहीं बिताना होगा।

एकाएक सरकार का आदेश आया कि जो लोग अपने बुजुर्ग माता पिता के साथ रहते हैं, उन्हें भी प्राथमिकता की  श्रेणी में रख कर वैक्सीन लगाया जाएगा। यह खबर टीवी पर चौबे जी ने ओल्ड ऐज होम में और मुकेश और उसकी पत्नी ने अपने घर पर सुनी।

उस शाम मुकेश और उसकी पत्नी का फोन बाबू जी के पास पहुंचा। अब तो आपको वैक्सीन लग गई है, अब आप वहाँ ओल्ड ऐज होम में क्या कर रहे हैं? अब आप अपने घर वापस आ जाइये। हम आपको कल लेने

आ रहे हैं।

चौबे जी मुस्कराये और बोले- रहने दो बच्चों। अब यही मेरा घर है और यही मेरा परिवार, मैं यहाँ बहुत खुश हूँ।

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल 18, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/59852255

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रविवार, अप्रैल 11, 2021

धंधा जो न करवाये सो कम

 

सर्दी की सुबह।  घूप सेकने आराम से बरामदे में बैठा हुआ अखबार पलट रहा था गरमागरम चाय की चुस्कियों के साथ।

भाई साहब, जरा अपने स्वास्थय का ध्यान रखिये।  इतने मोटे होते जा रहे हैं। ऐसे में किसी दिन कोई अनहोनी न घट जाये, आप मर भी सकते हैं।  ये बात हमसे तिवारी जी कह रहे हैं।

भला कैसे बर्दाश्त करें इस बात को।  हमने भी पलट वार किया कि भई तिवारी जी, आप दुबले पतले हैं तो क्या आप अमर हो लिये, कभी मरियेगा नहीं।  खबरदार जो इस तरह की उल्टी सीधी बात हमसे की तो और वो भी सुबह सुबह।

मैने उन्हें समझाया कि जब मिलो तो पहले नमस्ते बंदगी किया करो।  हाल चाल पूछो, यह क्या नई आदत पाल ली कि मिलते ही मरने की बात कहने लगते हो।

तिवारी जी इतने ढीठ कि जरा भी विचलित नहीं हुए।  बस मुस्कराते रहे और कुर्सी खींच कर बैठ गये और कहने लगे कि चाय तो पिलवाईये।

खैर, पत्नी उनके लिए चाय लेकर आई।  नमस्कार चमत्कार हुआ और पत्नी भी वहीं बैठ गई।

अब तिवारी जी उनसे बातचीत करने लगे कि भाभी जी, आप कोई नौकरी करती हैं क्या?

पत्नी से ना में जबाब पाकर उनकी मुद्रा एकदम चिन्तित बुजुर्ग की सी हो गई और वह कह उठे कि भाभी जी, कहना तो नहीं चाहिये मगर यदि कल को भाई साहब को कुछ हो जाये तो आपका क्या होगा? कैसे गुजर बसर होगी?

मेरा तो गुस्सा मानो सातवें आसमान पर कि सुबह सुबह यह क्या मनहूसियत फैला कर बैठ गये तिवारी जी।  मगर घर आये मेहमान को कोई कितना कुछ कह सकता है भला और यदि गहराई में उतर कर सोचा जाये तो ऐसा हो भी सकता है किसी के भी साथ, कभी भी।

मौत के नाम पर वैसे भी दार्शनिक विचार मन में आने लगते हैं इसलिए मैने संयत स्वर में कहा कि जो उपर वाले की मरजी होगी सो होगा।  उसकी छत्र छाया में दुनिया पल रही है तो इनका क्या है? आपकी पत्नी भी तो नौकरी नहीं करती, कल को आपको ही कुछ हो जाये तो उनका क्या होगा? इस प्रश्न से मैने अपनी कुटिल सोच का परिचय दिया।

तिवारी जी तो मानो इसी बात को सुनना चाह रहे हों।  बस एक चमक आ गई उनके चेहरे पर।  कहने लगे भाई साहब, हमने पूरा बंदोबस्त कर रखा है।  मान लिजिये यदि कल को हमें कुछ हो जाता है तो जिस आर्थिक स्थिति में हमारी पत्नी आज है, उससे बेहतर स्थिति में हो जायेगी।  इतनी बेहतरीन बीमा पॉलिसी ली है कि मेरे मरते ही ५ करोड़ रुपये पत्नी के हाथ में होंगे।

बस, इतना सुनते ही अब तिवारी जी को बोलने की जरुरत न रही और हमारी पत्नी हमारे पीछे पड़ गईं कि आप भी बीमा कराईये अपना और मानो तिवारी जी तो आये ही उसी लिये थे।  तुरंत झोले से फार्म निकाल कर भरने लग गये।  दोनों की तत्परता और अधीरता देख जरा घबराहट भी होने लगी कि कहीं शाम तक निपट ही न जाने वाले हों और इन दोनों को मालूम चल गया हो इसलिए हड़बड़ी मचाये हैं।

सारी कार्यवाही पूरी करके चैक आदि लेकर जब चलने को हुए तो तिवारी जी ने पहली बार कायदे की बात की कि ईश्वर आपको लम्बी उम्र दे।  काश, ऐसी नौबत न आये कि भाभी जी को बीमा का भुगतान लेना पड़े।

सोचता हूँ धंधा जो न करवाये सो कम।  बीमा एजेन्ट अगर मौत का डर न दिखाये तो भला फिर खाये क्या?

बीमा एजेन्ट का तो मैं मात्र इसलिए भी साधुवाद कहता हूँ कि वो अपने धंधे को लाभदायी सिद्ध करने के लिए आपको कम से कम मार तो नहीं डालता। वरना तो एक धंधेबाज वो कौम भी है जो जिस तंत्र से जीत कर जाते  हैं, जीतते ही उन्हें वही लोकतंत्र खतरे में नजर आने लगता है। देश सांप्रदायिक ताकतों में बंटता नजर आने लगता है। फिर अपनी बात सिद्ध करने के लिए वो लोकतंत्र को न सिर्फ खतरे में डाल देते हैं बल्कि सांप्रदायिकता और धर्म के नाम का ऐसा तांडव करवाते हैं कि आमजन दांतों तले उंगली दबाए सोचने को मजबूर हो जाता है कि साहेब ने कितना सही कहा था।

-समीर लाल ‘समीर’     

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल 11, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/59715369

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शनिवार, अप्रैल 03, 2021

हे गंगा पुत्र, अपने उदगम का तो ध्यान धरो!!

 


सब आदत की ही तो बात होती. कोई भी आदत शुरु में शौक या मजबूरी से एन्ट्री लेती है पर बाद में लत बन जाती है. अच्छी या बुरी दोनों ही बातें अगर लत बन जायें और फिर न उपलब्ध हों तो फिर तकलीफदायी हो चलती हैं. इन्सान छटपटाने लगता है. कुछ भी कर गुजरने को आतुर हो जाता है.

किसी ड्रग के आदी, शराब के लती, सिगरेटबाज और यहाँ तक कि शतरंजी को अपने व्यसन की उपलब्धता के आभाव में तड़पते तो सभी ने देखा ही होगा. शायद शुरु में चार दोस्तों के बीच फैशन में या स्टेटस बघारने को एक पैग स्कॉच ले ली होगी. नशे की किक में मजा आया होगा. फिर कभी कभार और, फिर महीने में एक बार, फिर हफ्ते में, फिर एक दिन छोड़ एक दिन और फिर रोज पीने लग गये होंगे. बस, लग गई लत. अब एक दिन न मिले, तो बिस्तर में उलटते पलटते नजर आयें. नींद न पड़े. बेबात बीबी बच्चों पर बरसने लगें.

तब देखा कि फेसबुक कुछ देर को क्या बैठा, लगे लोग ट्विटर पर ट्विटियाने,व्हाटसएप भर गया - हाय, फेसबुक नहीं चल रहा. क्या आपका भी नहीं चल रहा? जबकि फेसबुक की साईट साफ साफ लिख कर बता रही थी कि मेन्टेनेन्स चल रहा है, अभी आते हैं. मगर लतियों को चैन कहाँ? वो तो लगे यहाँ वहाँ भड़भड़ाहट मचाने. यहाँ तक कि जब कुछ ही देर में फेसबुक चालू हुआ तो फिर हल्ला मचा और कम से कम १०० ट्विट और व्हाटसएप अपडेट मिले कि हुर्रे, चालू हो गया!! अच्छा है यहाँ चीयर बालाओं का चलन नहीं है वरना तो क्या नाच होता कि देखने वाले देखते ही रह जाते.

लम्बे समय तक कोई आदत रहे तो लत बन जाने पर क्या हालत होती है, उसका जो जायजा आज मिला उसे देख कर एकाएक परेशान हो उठा. सोचने लगा कि भारत का क्या होगा?

सुनते हैं कि साहब किसी भी तरह हार मानने को तैयार नहीं. लगे हैं कि न खाऊँगा न खाने दूंगा. भ्रष्ट्राचार बंद हो ही जाना चाहिये. उनकी इस हठ से और आज के अनुभव से मुझे डर लगने लगा है. न सिर्फ भ्रष्ट्राचारियों से बल्कि उनसे भी जो इतने सालों तक भ्रष्ट्राचार झेलने के आदी हो गये हैं.

यूँ भी पूरे भारत में मात्र दो पार्टियाँ ही हैं जिन्हें मिलाकार भारत को भारत कहा जाता है. एक जो भ्रष्ट्राचार करते हैं और एक वो जो भ्रष्ट्राचार झेलते हैं.

एकाएक चुनाव के नतीजे आते ही भ्रष्ट्राचार बंद हो जायेगा तो इन दोनों पार्टियों की क्या हालत होगी, ये भी तो सोचो. पूरे देश में हर तरफ अफरा तफरी मच जायेगी. हाहाकार का माहौल होगा. आदमी स्टेशन पहुँचेगा, बिना रिश्वत दिये रिजर्वेशन मिल जाने पर भी ट्रेन में चढ़ने की हिम्मत न जुटा पायेगा कि जरुर कुछ घपला है. ऐसे भला रिजर्वेशन मिलता है क्या कहीं? ट्रेन का कन्फर्म टिकिट लिए वो बौखलाया सा बस में बैठ जायेगा और भी इसी तरह की कितनी विकट स्थितियाँ निर्मित हो जायेंगी-सोच सोच कर माथे की नसें फटी जा रही हैं.

साहब, मान जाओ, प्लीज़. कुछ तो सीख लो आज के इस फेसबुक भीषण कांड से. क्या अच्छा लगेगा जब सब कहेंगे कि पूरा देश जो तांडव कर रहा है, उसके जिम्मेदार आप हैं? नाहक इतना बड़ा इल्जाम क्यूँ अपने माथे लगवाना चाहते हैं?

मान जाइये न प्लीज़!!! चलने दो जैसा चल रहा है? कुछ घंटों के लिए मेनटेनेन्स टाईप भ्रष्ट्राचार रुकवाना हो तो पूर्व सूचना देकर रुकवा लो, दोनों पार्टियाँ झेल लेंगी किसी तरह,आपकी भी बात रह जायेगी- मगर इसे पूरे से खात्मे की जिद न ही करो तो ठीक.

विकास का वादा भी तो आपका ही है- फिर भ्रष्ट्राचार के विकास में आप क्यूँ बाधक बन रहे हैं?

सदियाँ बीती – विकास ही तो भ्रष्ट्राचार की गंगोत्री रहा है.  

हे गंगा पुत्र, अपने उदगम (गंगोत्री) का तो ध्यान धरो.

समीर लाल ’समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल 4, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/59540993


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