शनिवार, नवंबर 24, 2018

काश! राजनीतिक जोड़ियाँ भी ईश्वर बना कर भेजता


कहते हैं जोड़ियाँ ऊपर से बन कर आती हैं. मान लेते हैं कि आती होंगी. मगर जोड़ियों के पहले इंसान पधारता है और वो धीरे धीरे इतनी तिकड़म बैठालना सीख गया है कि ईश्वर को तो ठेंगा दिखाये बैठा है और बदमाशी की इंतहा तो देखें कि दिखाता है ठेंगा और कहता है लाईक किया, थम्स अप. ईश्वर भी ठेंगे को लाईक मान कर फेसबुकिया हुए गिन गिन कर मुग्ध होता रहता होगा. खुद ही सोचें कि न ईश्वर बदला और न ही इंसानों को पूंछ लगने लगी तो फिर जोड़ियों के यह स्वरुप कैसे बदल गये कि कोर्ट तय करने लगा कि चलेगा, तुम भी जोड़ी ही हो, रह लो सुरेश और मुकेश साथ में. और तुम रीना और टीना, तुम भी जोड़ी ही कहलाओगी. इतने पर भी चैन न पड़ा तो शादी करके जोड़ी कहलाना भी जरुरी नहीं रहा, ऐसे ही रह लो साथ तो भी जोड़ी.
अब तो हालत ये हो लिए हैं कि चाईना अपना चांद बना रहा है. उधर अमेरीका जुटा है कि हम अपना खुद का आसमान बनायेंगे. पूरा शहर कृत्रिम आसमान से ढक देंगे और उसके भीतर का मौसम जैसा हम चाहें, वैसा. जैसे ही मौसम खराब हो, कृत्रिम आसमान से शहर को ढक दो और बेहतरीन सावन का मौसम लाकर झूला झूलो. वैसे इस बात का ज्यादा प्रचार प्रसार अभी हुआ नहीं है क्यूँकि अभी ऐसा कुछ बना नहीं है. वरना इस बार कम से कम दिल्ली तो यह कृत्रिम आसमान का जुमला ही जितवा दे. प्रदुषण मुक्त शहर कि धुँआ कृत्रिम आसमान में लगे एग्जॉस्ट से बाहर और अंदर सब हरा ही हरा.
खैर, कृत्रिम आसमान का सपना तो अभी नहीं दिखा पायेंगे क्यूँकि फोटो में ही सही, अभी उदाहरण दिखाने के लिए कहीं भी वो है नहीं. तो इस बार भी झूठ का आसमान ही तानेंगे, करना धरना तो कुछ है नहीं. करना होता तो आज रेल्वे ट्रैक पर खाली समय में प्राईवेट ट्रेन चल रही होती. सारे शहर स्मार्ट सूटेड बूटेड हो गये होते. पूरे देश की नहरों पर सोलर पैनल लगे होते, हर वस्तु डिजिटल होती है. हालांकि एक वस्तु तो वाकई स्मार्ट भी हो गई और वो है ईवीएम. 
बात चल रही थी जोड़ियों की और भटक कर कहाँ जा पहुँची? महत्वाकांक्षायें और आशायें इतना बढ़ गई हैं कि ऊपर से बनाई जोड़ी में अगर अटक भी जायें तो उससे निकलने के रास्ते भी इन इन्सानों ने कई बना लिये हैं. जैसे अपने यहाँ कानून बनाते समय उसमें एक लूपहोल जरुर छोड़ देते हैं ताकि सक्षम बच निकलें. उनका बड़ा से बड़ा लोन माफ करके उनको विदेशवास पर भेज दिया जाता है और किसान का छोटा से छोटा लोन उसे फंदे पर लटकने को मजबूर कर इहलोक की यात्रा पर भेज देता है.
आजकल माहौल देख कर तो वाकई ऐसा लगने लगा है कि शादियाँ कम हो रही हैं और तलाक ज्यादा. जिसे देखो वो ही तलाक की राह पर है. समझौता करने को कोई तैयार ही नहीं.
संबंधों के निर्वहन भी जरुरतों और सहूलियत की वजह से हो रहे हैं. शादियाँ और तलाक देखकर लग रहा है कि मानों राजनितिक दलों का गठबंधंन और जरुरत खत्म हो जाने पर या महात्वाकांक्षा पूरी न होने पर संबंध विच्छेद. कॉमन लॉ की तरह बाहरी समर्थन के गठबंधंन. कुल को आगे ले जाने के लिए नहीं मगर अपने लिए किए गये सेमसेक्स विवाह की तरह देश को आगे बढ़ाने की बजाय खुद के सत्ता सुख के लिए गठबंधंन.
कहने को तो यह भी कहते हैं कि नेता बनाये नहीं जाते, पैदा होते हैं. सही है मगर जो नेता पैदा होते हैं और सही की राजनीति में आते हैं वो उस स्व-व्यक्तित्व में अपनी तिकड़म से घूर्तता मिलाते हैं, संवेदनशीलता को मारते हैं और तब जाकर सत्ता सुख पाते हैं.
दोष किसे दें- ईश्वर को या इंसान को, जिसे ईश्वर ने बनाया.
हम तो यह भी नहीं प्रार्थना कर सकते कि काश! राजनीतिक जोड़ियाँ भी ईश्वर बना कर भेजता. ये धूर्त तो उसे बदल कर ईश्वर को ठेंगा दिखा देते हैं और जनता को भ्रमित करते हैं कि हमने ईश्वर के निर्णय को लाईक किया है.
-समीर लाल ’समीर’     

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर २५, २०१८

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शनिवार, नवंबर 17, 2018

काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती


कल शाम दफ्तर से लौट कर हेयर कटिंग करवाने चला गया. पहले से फोन पर एप से रिजर्वेशन करा लिया था तो तुरंत ही नम्बर आ गया. दिन भर दफ्तर की थकान, फिर लौटते वक्त ट्रेन में भी कुछ ज्यादा भीड़ और उस पर से बरफ भी गिर रही थी तो मोटा भारी जैकेट. जैकेट उतार कर जरा आराम मिला नाई की कुर्सी पर बैठते ही और नींद के झौके ने आ दबोचा.
इस बीच कब वो बाल काटने आई, उसने रिकार्ड से पिछली बार के कटिंग की पर्ची निकाल कर कब पढ़ा कि साईड में १ नम्बर और ऊपर २, वैसे ही काटना है क्या? और कब हमने हमेशा की तरह पूरे भरोसे के साथ मुंडी हिला कर हामी भर दी, पता ही न चला.
वैसे भी अब यहाँ इतने भारतीय हो गये हैं कि ये भी जान गये हैं कि एक सच्चा भारतीय हाँ कहने के लिए मुंडी ऊपर नीचे हिलाने के बदले साईड बाई साईड हिलाता है अन्यथा पहले यह पूछ लिया करते थे कि हाँ बोल रहे हो या ना? 
बाल काटने के बाद जब उसने गरम तौलिया माथे पर रख कर हल्की सी मसाज की तो जैसे पुनः स्फूर्ति लौटी. सामने शीशॆ पर नजर पड़ी तो एकाएक पहचान वाले को देखकर हैलो बोलने ही वाले थे कि समझ आया अरे, यह तो हम ही हैं. मगर हमारे बाल? सफाचट?  सफाचट मतलब कि एकदम छोटे छोटे. मरा हाथी भी तो सवा लाख टाईप.
एकदम से घबरा कर हमने उस लड़की से पूछा कि ये बाल इतने छोटे क्यूँ काट डाले? ये किस बात का बदला निकाल लिया. हमारे खिलाफ तो कोई #मीटू भी नहीं है फिर हमसे यह बर्ताव? इस पर उसने पिछली कटिंग की पर्ची दिखलाई और कहा कि मैने आपको यह पढ़कर सुनाई भी थी और आपने हाँ भी कहा था, तो काट दिये.
हमने कहा कि चलो हाँ तो भले ही नींद में कहा होगा या इतने सालों में आजतक ऐसा धोखा नहीं हुआ इस हेतु अति अविश्वास में कह दिया होगा मगर हमारी तो पिछली बार क्या कभी भी ऐसी हजामत नहीं बनी है जो आपने बना डाली. तो ये नम्बर कहाँ से आये हमारी पर्ची पर?
बड़ी हलचल मची. खोजबीन की गई तो पता चला कि किसी और की पर्ची प्रिंट हो गई थी और हजामत बन गई हमारी. मगर अब क्या हो सकता है? भले ही पर्ची गलत प्रिंट हुई हो मगर हामी तो हमने भी भरी थी. हमारा आलस्य, हमारी नींद, हमारा सजग न रहना, हमारे हाँ और ना के बीच कोई भेद न रहना और भी न जाने क्या क्या वजह हो सकती हैं जिस पर दोष डाला जा सकता है मगर भुगतना तो हमको ही है और वो भी तब तक, जब तक बाल फिर से एक निश्चित समय के बाद स्वतः उग नहीं आते.
थोड़ी देर दुखी होने के बाद तय किया कि मायूसी की चादर उतारी जाये और इसमें भी कुछ खुश होने का कारण खोजा जाये. यूँ भी तकलीफ जब हद से गुजर जाये तो आंसू हंसी में तब्दील हो जाते हैं. बस कुछ ऐसी ही सोच लिए विचार कर मुस्कराये कि अब कम से कम कुछ दिन तक सुबह कंघी करने की झंझट से मुक्ति मिलेगी और उससे भी बड़ी मुक्ति उस ग्लानी से मिलेगी जो कंघी से लिपट कर आये कभी न लौटने वाले बालों को देखकर होती थी कि हाय!! अब के बिछड़े तो शायद फिर कभी ख्वाबों में मिलें. फिर अब ठंक का मौसम आ गया है, टोपी उतारो तो सब बाल बिखरे छितरे, उससे भी छुटकारा मिला..बाल हों तो बिखरें. टोपी भी उदास होगी कि अब किसे छेडूँ? अब कौन मुझ पर #मीटू लगायेगा? कल को हालात ऐसे ही रहे तो लड़के लड़कियों से ऐसी दूरी बनायेंगे कि लड़कियाँ भी सोचेंगी कि अब किस पर #मीटू लगायें. घिघियायेंगी लड़को के सामने कि बात तो करो हमसे..कसम #मीटू की ..कभी जो #मीटू का नाम भी लिया तो.
खैर, तेल, जैल, शेम्पू आदि के पैसे भी तो बचेंगे ही कुछ समय के लिए. मगर बड़ी बात तो यह है कि एक आध साल में वैसे भी समस्त बालों का ओम नमः स्वाहा तो होना ही है तो एकाएक झटका लगने की बजाय ये उसी का एक रिहर्सल मान लेते हैं. सही रिहर्सल रहे तो मंच पर सही में उतरते वक्त कम नरवसनेस रहती है. यह हम कवियों से बेहतर कौन जानता है. 
चलो, हमारी तो जो गत हुई सो हुई, आप अपनी देखो. चुनाव सामने हैं. कुछ सीख ले सको तो ले लो हमारी हालत से. अभी वो आयेंगे आपके पास कि प्रभु!! आपको पिछले चुनाव में हमने यह पर्ची सुनाई थी कि आपका विकास होगा, अच्छे दिन आवेंगे, आपके खाते में १५ लाख हम पहुँचावेंगे, हम आपकी गरीबी मिटावेंगे, आपकी पूजा पाठ के लिए हम राम मंदिर यहीं बनायेंगे आदि आदि. और तुम पिछले पांच साल से भागते दौड़ते हमारी तरह नींद और आलस्य की चादर ओढ़े कहीं बिना सजग हुए मुंड़ी न हिला बैठना वरना इनके जीतते ही जब ये अपने गुरुर और पॉवर की गरमी का असर तुमको ऐसा दिखायेंगे तो स्फूर्ति की बजाय करेंट लगेगा. फिर तुम्हारे हाथ बच रहेगा अगले पाँच साल तक मुंड़ी हिलाते रहना. फिर उसमें से खोजने को खुश होने के साधन भी न बचेंगे क्यूंकि एक ही बहाने से आखिर कितनी बार खुश हो सकते हो.
काठ की हांडी बार बार थोड़े न चढ़ती है.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार नवम्बर १८,२०१८ में:

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शनिवार, नवंबर 10, 2018

सेल्फी खींच कर डीपी बनाओ कि हम जाग गये हैं अब



जबसे इन्टरनेट और व्हाटसएप की दुनिया आबाद हुई है मानो दुनिया ही बदल गई है. जो जैसा दिखता है वो वैसा होता नहीं है. या यूँ कहें जो जैसा होता है वैसा दिखता नहीं है.
अपवादों को छोड़ दें तो आभासी दुनिया में सेल्फी ने सेल्फ कॉन्फिडेन्स बूस्टर का काम किया है. जीरो सेल्फी में हीरो नजर आता है. फिल्टर लगा कर जब सेल्फी खींच कर लगाई तो बहुत सारे काम्पलिमेन्ट तो हमें ही मिल गये कि कनाडा जाकर रंग साफ हो गया है जबकि असलियत तो ये हैं कि जो काम सैकड़ों फेयर एण्ड लवली क्रीम हमारी जवानी में न कर पाई, वो काम एक फिल्टर ने सेल्फी पर कर डाला. काश!! हमारी जवानी में भी सेल्फी का दौर होता. कई बार मन यही सोच कर रुआंसा सा हो जाता है. फिर मन को खुद की सेल्फी दिखा कर खुश कर लेते हैं.
मेरे एक मित्र जो अपने घर से चार कदम नुक्कड़ पर पान खाने भी कार से जाते हैं और लौट कर कुछ और काम करने के पूर्व आराम करते हैं. कौन जाने कार में चढ़ने उतरने से थके या पान खाने में जबड़े हिलाने से मगर थके जरुर. वो आये दिन अपनी सेल्फी हाफ पैण्ट और टीशर्ट पहन कर पसीना पसीना पोज में चढ़ाते हैं कि फीलिंग हैप्पी- फुल मैराथन. मुझे पूरा विश्वास है कि मैराथन भी उन्होंने उसी कार में बैठ कर पूरी की होगी मगर सेल्फी खिंचवाने के लिए उतरने चढ़ने में पसीना पसीना हो गये होंगे.
मैराथन जहाँ एक ओर आयोजकों की मोटी कमाई का जरिया बना हुआ है वहीं दूसरी ओर दौड़ने वालों से ज्यादा सेल्फीबाजों का महोत्सव बन गया है. उस रोज उनके घर फोन लगाया तो नौकर से पता लगा कि साहब और मेमसाहब दोनों फोटोग्राफर को लेकर मैराथन में गये हैं सेल्फी खिंचवाने. नौकरों का यही हाल है घर का भेदी लंका ढाहे. नौकरों के चक्कर में बहुतेरे साहब लंबा नपाये हैं फिर चाहे वो सीबीआई या आरबीआई के सरकारी नौकर ही क्यूँ न हों. तो इतना सा खुलासा अगर इस नौकर ने कर भी दिया तो ठीक है.
हम तो खैर उस देश के वासी है जिसका विकास ही सेल्फी की जकड़ में है. जिसका विकास एम्बेस्डर स्वयं सेल्फी पीर है. कैमरे पर चौकीदारी करने वाला कमरे के पीछे भागीदारी में जुटा है. कैमरे पर सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाला कैमरे के पीछे मितरों के विकास में लगा है.
मैराथन से याद आया आजकल शुभकामनाओं का मैराथन उत्सव चल रहा है. जैसे मैराथन में कोई दौड़ता है, कोई चलता है, कोई सिर्फ आता है मगर सेल्फी सभी खिंचाते हैं और डीपी बनाकर चढ़ाते हैं. वैसे ही उत्सवधर्मी देश में शुभकामनायें देने का ऐसा प्रचलन चल पड़ा है कि अगर कोई पैमाना हो इसे नापने का तो दिल्ली के प्रदुषण से ज्यादा घातक सिद्ध होगा.
एक एक बंदा एक एक बंदे को एवरेज चार से छः बार बधाई और शुभकामनायें चिपका रहा है फिर भी और चिपकाने को भूखा है, मानो ससुराल में जमाई जी का स्वागत हो रहा है. एक पूड़ी ओर. जमाई बाबू खा खाकर बेहोश होने की कागार पर हाथ से प्लेट ढांके हैं मगर सासु माँ साईड से जगह देखकर एक पूड़ी और सरका ही गईं. भ्रष्टाचारी नेताओं की भूख को पछाड़ने का माददा अगर किसी में है तो वो शुभकामनाओं के प्रदानकर्ताओं में है.
स्टीकर, कॉपी पेस्ट, टेक्सट, जीआईएफ, जेपीजी, विडिओ, पीडीएफ, यूट्यूब और भी न जाने क्या क्या है इस शुभकामनाओं के मैराथन में..मगर हर का सार..बधाई और शुभकामनायें. हालत ये हो गये हैं कि मरनी करनी में भी बधाई और शुभकामनायें देने से न चूक रहे हैं ये लोग.
आपके पिता जी दुखद निधन पर सादर नमन. ॐ शांति. गोवर्धन पूजा की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें. ईश्वर आप पर ऐसी ही कृपा सालों साल बरसाये, यही कामना.
दूसरा कह रहा है, रात के ग्यारह बज गये हैं. १० बजे के बाद से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियाँ उड़ रही हैं दिल्ली में. अभी तक कर्ण भेदी पटाखों की आवाज थम नहीं रही. दुखद एवं शर्मनाक. दीपावली के इस पर्व पर आप सभी को बधाई एवं हार्दिक शुभकामनायें. धूम धड़ाके के साथ मनायें.     
इन आभासी दुनिया के शुभकामनाकर्ताओं ने मार्केट पर ऐसा कब्जा कर लिया है कि अब आप किसी के घर सच में जाकर शुभकामना दें तो अगला सोचता है कि मिठाई खाने भुख्ख्ड़ चले आये वरना शुभकामना तो व्हाटसएप पर भी दे सकते थे.
लोगों की परवाह किये बगैर जो जितनी शुभकामना बरसा रहा है वो उतनी पा रहा है, फिर भले ही अंदर अंदर लोग उससे चाहे परेशान ही क्यूँ न हों. कौन देखने जा रहा है कि क्या वो सच में आपको शुभकामना दे रहा है कि भरमा रहा है. यह बात हमारे सेल्फी पीर और उनकी टीम भली भाँति जानती है और इसी तरह विकास की सेल्फी चिपका चिपका कर झूठ सेल्फी ही सही, वोट तो ले ही जायेगी आपका.
फिर आप जैसे आज शुभकामना संदेश डिलिट करने में परेशान हो, तब विकास की तस्वीरें डिलिट करते रहना, वो तो पाँच साल को पुनः स्थापित हो ही जायेंगे.
सोते रहना है कि जागना है अब, आप तय करो और एक सेल्फी खींच कर डीपी बनाओ कि हम जाग गये हैं अब.   
समीर लाल ’समीर’  
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर ११, २०१८
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शनिवार, नवंबर 03, 2018

पब्लिक सर्वे, प्रीपोल सर्वे और अब चायनीज़ सर्वे


एक चायनीज़ सर्वे के मुताबिक २०१९ लोकसभा चुनाव में राहुल जी सबसे लोकप्रिय नेता के रुप में उभर कर आ रहे हैं और उनका प्रधान मंत्री बनना तय है. ८७% का रुझान है. जनता मन बना चुकी है. बहुत बड़े बदलाव के संकेत हैं. तिवारी जी पान की दुकान पर बैठे घंसु को बता रहे हैं.
आंतरिक सर्वे, पब्लिक सर्वे, प्रीपोल सर्वे और भी न जाने कितने तरह के सर्वे सुने हैं मगर चायनीज़ सर्वे? यह कौन सा सर्वे होता है? घंसु समझने की कोशिश कर रहा है.
हाँ, चायनीज़ सर्वे. यह वैसा ही है जैसा सारा चायनीज़ माल. क्वालिटी की कोई गारन्टी नहीं मगर चमक दमक में सबसे तेज. तिवारी जी ने समझाया.
सो तो अपने देशी सर्वे की भी क्या गारंटी होती है? सबके अपने अपने सर्वे वाले हैं, वो ही सर्वे करते हैं, वो ही किनका सर्वे करना है, उनको चुनते हैं और वो ही परिणाम घोषित करते हैं, वो ही कमाते हैं, वो ही प्रसाद पाते हैं. हमारे पास तो आज तक कोई सर्वे वाला पूछने नहीं आया कि किसको वोट डालोगे? तो आखिर किससे पूछ कर गये सर्वे वाले? हमारे तो पहचान में भी कोई नहीं कहता कि उनसे किसी ने पूछा? शायद चुपके से सुन कर चले जाते हों सर्वे वाले, कौन जाने!! घंसु सोच रहा है.
वैसे तो अब टेक्नालॉजी का जमाना है. अलेक्सा, गुगल, सीरी आदि सब घरों और फोनों में घुसे हैं. आप क्या सोच रहे हैं, क्या सर्च कर रहे हैं, क्या बात कर रहे हैं, सब कलेक्ट हो रहा है. एलेक्सा सुनती है कि बंदा राम राम करता रहता है, तो बीजेपी को वोट नोट कर लेती हो, क्या पता? दिन भर में एक भी बार राम नहीं, तो कांग्रेस का. नारंगी कुर्ता खरीद लाये तो दुकान का बिल देख कर बीजेपी वरना कांग्रेस. विचारणीय तो है ही. सर्वे ही तो है गलत निकल जाये तो निकल जाये.
वैसे कभी कभी सर्वे मुझे देशी कट्टा जैसा लगता है. बस, चमकाने के काम आता है, चलाने के नहीं. चला दिया तो कोई भरोसा नहीं, उल्टा ही चल जाये या कहो, चले ही न.
घंसु को अभी भी चैन नहीं पड़ रहा था चायनीज़ के नाम से. बोला कि देश हमारा, चुनाव हमारा, चुनाव हमारे नेताओं का, चुनने वाले हमारे लोग, फिर इसमें चाईना का क्या रोल? मजाक है क्या कोई?
तिवारी जी उखड़ पड़े कि तुम सर्वे पर तो बहुत कूद रहे हो कि चायनीज़ क्यूँ? तब काहे चुप बैठे थे जब महापुरुष भी हमारे देश का, सम्मान देने वाले भी हमारे देश के, जमीन भी हमारे देश की, टेक्सपेयर भी हमारे देश का जिनके पैसे से उस महापुरुष की मूर्ति बनवाई, एकता भी हमारे देश की(स्टेच्यू ऑफ यूनिटी) तो फिर उसे बनाने वाला चाईना क्यूँ? तब काहे नहीं कूद कूद कर पूछे कि ऐसा कैसे हो गये? वो मेक इन इन्डिया वाला शेर कहाँ गुम हो गया, उस नारे का क्या हुआ? वो भी जुमला ही था या हमारे यहाँ लोहार और मूर्तिकार नहीं बच रहे अब? हो सकता है जीएसटी की भेंट चढ़ गये हों सब.
तिवारी जी को उखड़ता देखकर घंसु ने पैतरा बदला और कहने लगा कि आपने वो नारा तो सुना ही होगा ’हिन्दी चीनी भाई भाई’, बहुत पहले हकीकत फिल्म में भी दिखाया था. तो क्या फरक पड़ता है इस भाई के घर बना या उस भाई के घर. एक ही बात तो हुई न!!
अब तुम मेरा मूँह मत खुलवाओ घंसु! एक तो यह नारा ही गलत है. हिन्दी भाषा है, चीन की बोली को भी आमतौर पर चीनी भाषा बोलते हैं, तब भाई कैसे? भाषा स्त्रीलिंग हैं. बहन बहन हो सकती हैं और बहने हैं तो अलग अलग घर गई और अलग अलग घर की हो गईं. यही मान्यता है.
तिवारी जी आप समझ नहीं रहे. असल में चीन में रहने वाले लोगों को चीनी कहते हैं न इसलिए इसका तात्पर्य लोगों से है. घंसु बता रहे हैं.
तो हिन्दुस्तान में रहने वाले कब से हिन्दी कहलाने लगे. उनको हिन्दु कहने की कवायद भी अभी पिछले ४ सालों का ही सियासती खेला है, वरना तो हिन्दु, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी और जो भी हिन्दुस्तान में रहता है, हिन्दुस्तानी ही कहलाता है. यूँ भी जबसे हिन्दी चीनी भाई भाई का नारा दिया गया था तब से हमेशा धोखा ही हुआ है उनसे.
वैसे तो ३००० हजार करोड़ की मूर्ति का तो छोड़ो, ३ करोड़ का ठेका भी मिलना हो तो सगा भाई ही भाई को धोखा देकर हथिया ले. ऐसा ही होता आया है. फिर हिन्दी चीनी वाले भाई भाई की तो बात ही न करो.
अपवाद तो खैर हर जगह होते हैं.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर ४, २०१८

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