सोमवार, सितंबर 21, 2015

सम्मानित साहित्यकार्स!!

एकाएक सन २००५ के आस पास हिन्दी में ब्लॉग लिखने वाले अवतरित हुए.. और फिर तो सिलसिला चल पड़ा..रचनाओं के रचित होने का...लोगों को प्रोत्साहित करने का लिखने के लिए..आप भी लिखो. बोल लेते हो तो लिख भी लोगे. जैसे फिल्म देख कर घर लौटने पर फिल्म की कहानी सुनाते हो न..वैसे ही लिख कर सुनाओ. बस इतना सा निवेदन किया था और लोग उसे बड़ी गंभीरता से ले गये और टूट पड़े लिखने लिखाने में.
और इन रचनाओं को पढ़ने वाले भी वो ही होते थे जो लिखने वाले होते थे. पढ़ना मात्र मजबूरी होती थी कि पढ़ कर कुछ कमेंट कर दें तारीफ में तो बंदा भी हमें आकर पढ़ेगा और कमेंट करेगा. इस प्रक्रिया को उस वक्त कहा जाता था कि तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी पीठ खुजाऊँ.
अब इस लिखने पढ़ने की होड़ में, हम दूसरे लिखने वाले से बेहतर कैसे दिखें? कैसे साबित करें कि हम तुमसे बेहतर रच रहे हैं. तब लोगों ने अपने ब्लॉग पर छपी कहानियों और कविताओं के अखबार में प्रकाशित हो जाने की खबरों को जोर शोर से उछालना शुरु किया.
अखबार वालों की भी पौ बारह हो निकली. हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आये. न पैसा देना और न पूछना..जो पसंद आया..कट पेस्ट किया और अखबार में छाप दिया. मेहताना मांगना तो दूर..छपा ब्लॉगर उस अखबार की तस्वीर छाप छाप कर फूला न समाता कि हम तो बड़े साहित्यकार हो लिए..अखबार वाले छापने लगे.
ऐसे में जो अखबार में नहीं छप पाते वो ऐसी सूचनाओं की पोस्टों के कमेंट में आकर आपत्ति उठाते कि अखबार वाले चोर हैं ..बिना पूछे छाप देते हैं. आप उन पर मुकदमा करिये और अपना मेहताना माँगिये. छ्पा बंदा भी जानता था कि ये अगला मात्र खीज उतार रहा है, अतः इतना सा बस जबाब देता कि आप ठीक कह रहे हैं. देखते हैं.
धीरे धीरे समय के साथ साथ जब ब्लॉगरों का यह गुमान उन्हें भ्रमित कर यह विश्वास दिलाने लगा कि वो साहित्यकार हो गये हैं और आने वाले युग के वो ही प्रेमचन्द हैं और वो ही निराला. तब तो मानो जलजला सा ही आ गया. अब की बार खुद को बेहतर साहित्यकार प्रूव करने के लिए पुरुस्कारों और सम्मानों का दौर चला..और ऐसा चला कि अब तक चला आ रहा है.
जितने साहित्यकारों को ब्लॉग जन्म देता गया, उससे कई गुना ज्यादा सम्मान और पुरुस्कार जगह जगह जन्म लेते चले गये. नये नये पुरुस्कारों के नाम पता चलने लगे. नये नये शहरों के नाम पता चले जहाँ ये सम्मान समारोह आयोजित होते रहे. कमाल ये था कि अधिकतर सम्मान ऐसे थे जो पहली बार सुने गये और फिर कभी आगे सुनाई भी नहीं दिये मानों जैसे सिर्फ इन्हीं के लिए ऊगे थे और इन्हीं का सम्मान करके डूब गये.
samman
यूँ भी अगर ध्यान से सोचिये तो सम्मानित होने की प्रक्रिया में दो लोगों का ही तो काम है – एक वो जो सम्मान दे रहा हो और दूसरा वो जो सम्मान ले रहा हो. इसके बाद जितने भी लोग हों सब बोनस ही तो है. लेकिन जब ये सम्मानित साहित्यकार सम्मान पत्र हाथ में पकड़े अपनी सेल्फी फेसबुक पर चढ़ाते हैं यो कभी कभी चंचल मन शक में पड़ जाता है कि कहीं इस बार सम्मानित करने वाला और सम्मानित होने वाला बंदा एक ही तो नहीं. इसलिए निवेदन बस इतना सा है कि जब कभी सम्मानित हों तो कम से सम्मान देने वाले और लेने वाले का सम्मान आदान प्रदान करते समय का फोटो लगायें. यूँ भी वो है कौन- कौन चैक करने आ रहा है?
इस बीच फेसबुक ने दस्तक दी और ब्लॉगजगत के तथाकथित साहित्यकार अपने कहानी किस्से और कविताओं का बस्ता बॉधे फेसबुक पर चले आये. हालात वही कि नित नये सम्मान..नित नये ईनाम..
अगर कायदे से गिना जाये तो उन्होंने जितने पन्नों के आलेख और कविता न लिखे होंगे ..उससे कहीं ज्यादा पन्नें सम्मान और पुरुस्कारों की सूचना देने और बखान करने में लिख डाले. रोज एक नया स्टेटस.एक नया ईमेल..मसौदा कुछ यूँ..
मित्रों, आपको बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि मुझे फलाना संस्था ने इस वर्ष का ’साहित्य मणि’ मेरी रचना ’मुस्करा भी दो’ के लिए देना तय किया है. इस हेतु चिरई डौंगरी में महा आयोजन १८ दिसम्बर को शाम ७ बजे किया जायेगा..आप सादर आमंत्रित हैं’ अपना आशीर्वाद दें..याने बधाई देने वाला कमेंट करो मेरी स्टेटस पर.
सोचो तो इस आमंत्रण के आधार पर आयें कहाँ..न तो ये पता है कि चिरई डौंगरी कहाँ है..न ये पता कि अगर किसी तरह चिरई डौंगरी ढ़ूँढ कर पहुँच भी गये तो किस जगह आना है?
ये पुरुस्कार और सम्मान मिलने की सूचना ईमेल, गुगल प्लस, ट्विटर, व्हाटस अप, एस एम एस, फेस बुक, ब्लॉग, कमेंट..हर संभव रुट से भेजी जाती है. उनका बस चले तो वो आपके घर आकर बता जाये. जैसे बता रहे हों कि भाई साहब, नार्वे आईये. आपके आशीर्वाद से मुझे नोबल पुरुस्कार से सम्मानित किया जा रहा है...
अब तो ऐसी ईमेल या स्टेटस देखो जिसमें शुरुआत में लिखा हो कि आपको बताते हुए... देख कर ही घबराहट हो जाती है कि बंदे का फिर कहीं सम्मान हो गया या होने वाला है...लेकिन हद तो तब हो जाती है जब कर्जा उतार कमेंट में उसे बधाई दे डालते हैं कि ऐसा शुभ दिन बार बार आये..बिना ये सोचे कि आपको बताते हुए में..अपने पिता की मृत्यु की समाचार भी तो दे रहा हो सकता है..
समीर लाल ’समीर’

52 टिप्‍पणियां:

  1. टीपने का धर्म है पोस्ट पढ़ने के बाद तो टीप रहे हैं।
    साहित्यकारर्स - शब्द नया सा है, अंग्रेजी पना आ जाता है, अच्छा लगा।
    साहित्यकारर्स के पहले को शब्द सम्मानित हमें अब असम्मानित ही लगता है।

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  2. बेबाक विश्लेषण, कहीं आप इसलिए सम्मानितों का अपमान तो नहीं कर रहे कि खुद कभी सम्मानित नहीं हुए और भड़ास निकाल रहे :-)
    साहित्यकार्स में एक र आपने और लगा रखा है -वह क्यों भला?

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  3. @ aevind mishra हम तो खुद ही इत्ती बार सम्मानित हो लिए हैं कि अब तो बताते शरम सी आती है माननीय :) ये सिलसिला हमसे ही तो शुरु हुआ था तरकश कमल थामे :)

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  4. हर जगह यही कहानी है तो ब्लागिंग में आकर अलग कैसे हो जायेगी । सम्मान की भी दुकान है हैसियत है तो खरीद लीजिये क्या बुरा है :)

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  5. ऐसे विचार तो उठा करते हैं कई बार..

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  6. सही सम्मान भी इस धक्क्मधुक्की में पीस गया, होकर भी नहीं होने का गम भी साथ चलता है

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  7. इतना साफ़ साफ़ लिख डाला आपने ,कुछ छोड़ा ही नहीं ।
    मजे की बात ये होगी कि सम्मानित हुए लोग भी आकर सहमति।में सर हिला जायँगे और फिर जाकर अगले पुरस्कार की फोटो फेसबुक पर लग देंगे :)

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  8. सम्‍मान की तो खेती होने लगी, एक बीज बोओ और हजार पैदा होते हैं। आनन्‍ददायक विश्‍लेषण।

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  9. पुरस्‍कारों के ऊपर पुरस्‍कार देने वाले की फ़ोटो और जि‍से दि‍या जा रहा है उसकी फ़ोटो छापने का रि‍वाज़ चल नि‍कला सो अलग :)

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  10. खरी खरी सुना रहे हैं आप। कुछ लोगों को बुरा भी लगेगा।

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  11. खरी खरी सुना रहे हैं आप। कुछ लोगों को बुरा भी लगेगा।

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  12. खरी खरी सुना रहे हैं आप। कुछ लोगों को बुरा भी लगेगा।

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  13. साहित्यकार्रस ब्लॉगर्स को लपेट दिया ............ :-)
    कटुसत्य पचाना मुश्किल तो होगा साहित्यकार्रस के लिये

    प्रणाम स्वीकार करें

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  14. बहुत सही लिखा है ... चिरई डोंगरी के शौकीनों ने ही हिंदी ब्लागजगत का बांटाझार कर दिया है ...

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  15. ''कहीं इस बार सम्मानित करने वाला और सम्मानित होने वाला बंदा एक ही तो नहीं.''.......
    मस्त-मस्त ..बहुत ही ज़बरदस्त लिखा है...आनंद आ गया ! :)

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  16. वाह! ऐसा बिंदास लिखने का हुनर आप ही के पास है। यह कहानी 2008 से देखते आने का अनुभव मुझे भी है। बिल्कुल सच्ची बात है। अधिकांश चेहरे मस्तिष्क में उभर आये।

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  17. वाह! ऐसा बिंदास लिखने का हुनर आप ही के पास है। यह कहानी 2008 से देखते आने का अनुभव मुझे भी है। बिल्कुल सच्ची बात है। अधिकांश चेहरे मस्तिष्क में उभर आये।

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  18. ब्लॉगिंग के बदलते आयामों पर खरी पोस्ट। सम्मानों से परे ब्लॉगिंग का कर्म और क्रम यूँ ही जारी रहे। बधाइयाँ।

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  19. अपन तो न तीन में न तेरह में - पढ़ कर हँसी आ रही है बस !

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  20. सम्मान के सम्मानित होने होने का और सम्मानित के सम्मान का द्वन्द सदैव से है..... ये अनवरत प्रक्रिया है... किन्तु सृजन और सम्मान दोनों जारी है और रहना चाहिए....बाकी विश्लेषण तो चलता रहेगा


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  21. सौ फीसदी सही आकलन एवं विश्लेषण ! हद तो तब हो जाती है जब सम्मानित होने की दौड़ में शामिल होने के लिये कुछ रचनाओं की प्रविष्टियाँ रचनाकारों से माँगी जाती हैं और प्रति रचना हज़ार रुपये की फीस भी माँगी जाती है ! यदि रचना चयनित हो गयी तो शायद कुछ वापिस मिल जाए ! वरना इस एकत्रित धनराशि से सम्मान समारोह तो बिना हींग फिटकरी लगे ही भलीभाँति संपन्न हो जाता है सम्मान के लोभ में फंसे उन रचनाकारों की कीमत पर जो अपनी रचनाओं के साथ हज़ारों रुपये की भेंट पहले ही चढ़ा चुके होते हैं !

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  22. ईश्वर, सभी साहित्याकार्र्स को इस सम्मान प्रक्रिया की विवेचना पढ़कर सदमा न लग जाय, ऐसी शक्ति प्रदान करे. वैसे पढ़कर तो मज़ा आ गया.

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  23. बे-बाक बात,समीर जी
    सोचना होगा बस्ता कब बांधा जाय?

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  24. हाहाहा.... क्या करें..कहां जायें..बस लोट पोट हुए जा रहे हैं हम तो... एक नम्बर की पोस्ट है भाईजी..लेकिन अपन बच गये :( आज तक कोई ने सम्मान न किया :( मने लिखने वाले माने ही न गये अपन तो :) सो सुकून में हैं.
    "इस बीच फेसबुक ने दस्तक दी और ब्लॉगजगत के तथाकथित साहित्यकार अपने कहानी किस्से और कविताओं का बस्ता बॉधे फेसबुक पर चले आये. हालात वही कि नित नये सम्मान..नित नये ईनाम"
    बहुत ज़ोरदार... तमाम चेहरे सम्मान लेते-देते दिखाई दे रहे...

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  25. एक ही सांस में सम्मानित साहित्यकार्स की अच्छे से खिचाई कर दी, ये भी नहीं सोचा यदि यह पोस्ट पढ़ ली तो उनके दिलों पर क्या गुजरेगी.. ...लिहाज़ा लेखनी किसी की भी हो बस चलते रहनी चाहिए ...चलते रहनी चाहिए ..... कम से कम हमारी हिंदी का प्रचार-प्रसार तो होगा....

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  26. खरे सोने सा सच है । सटीक रचना ।

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  27. खरे सोने सा सच है । सटीक रचना ।

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  28. खरे सोने सा सच । सटीक रचना ।

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  29. खरे सोने सा सच । सटीक रचना ।

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  30. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन रामधारी सिंह 'दिनकर' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  31. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन रामधारी सिंह 'दिनकर' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  32. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन रामधारी सिंह 'दिनकर' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  33. ब्लॉग एक गाँव सा हुआ करता था,
    चौपाल लगा करती थी। ताऊ हुआ करते थे।
    कुछ कुछ लापतागंज के जैसा।

    फेसबुक तो इसके सामने विज्ञापन और आत्म विज्ञापन की शहरी दुनिया लगती है।

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  34. गज़ब ... पुराने अवतार में लौटने की तैयारी है लगता है ...
    जल्दी से लौट आओ भैया दुनिया तो ब्लॉग ही है ...

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  35. कई पुराने पुराने ब्लॉग के धुरंधर आज दिखाई दिए हैं इस पोस्ट की टिप्पणियों में ...

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  36. Your artical is very fine .i most like. thanks

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  37. बहुत ही वाजिब कहा उस्ताद जी,
    बहुत दिनों के बाद व्हत्सेप्प से उक्ताए सो ब्लौगियाए।

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  38. great collection..inspiring as previous collection!

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  39. सही विश्लेषण। ब्लॉगिंग गंभीर लेखन के करीब है। व्हाट्सऐप और फेसबुक में शोर और अशांति अधिक है।

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  40. आपका लेख बहुत ही जबरजस्त है .... आप सबसे अलग लिखते हो यहाँ आकर बहुत अच्छा लगा ..

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  41. आपका यह लेख पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि वाकई में लेखन को कहां तक ले जाया जा सकता है आपका लिखने का अंदाज वाकई काबिले तारीफ है

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  42. लिखना भी एक पाक कला है, आपका लेख, पढ़ा बड़ी प्रसन्नता हुई है |

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  43. आपने बहुत ही अच्छा लेख लिखा है ऐसा लेख लिखने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद Gud morning

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