बुधवार, अगस्त 08, 2012

वो हमसफर था....

मेरे हमसफर मेरा साथ दे, मैं बहुत दिनों से उदास हूँ..

मेरे गीत को कोई साज दे, मैं बहुत दिनों से उदास हूँ

मुझे हाल तिरा जो दे सके मुझे उस खबर की तलाश है

मेरी बात का तू ही जबाब दे, मैं बहुत दिनों से उदास हूँ...

 

- तो उस रोज जबाब आ ही गया....और चल पड़े हम- “सेन फ्रान्सिस्को की धुँध के आगोश से निकल..प्रशान्त महासागर से उठते उन ठंडी हवाओं के झोकों को जेहन में समेटे...पहाड़ों की चढ़ाई और ढलान के मस्त कर देने वाले आलम से निकल जो मानो चुपके से समझाईश देता था रोज साथ चलते चलते- जिन्दगी के उतार और चढ़ाव को खुशी खुशी झेल नित नई सीख लेने को –शुरु में उस चढ़ान से कोफ्त भी होता- थकान भी होती और सांस भी फूलती मगर इस तसल्ली के साथ कि चलो, अभी चढ़ान है तो क्या- शाम लौटते में ढलान होगी...तो चेहरा मुस्करा उठता...काश, जिन्दगी को भी ऐसे ही मुस्कराते जिये चले जाते हम- सिखा दिया सेन फ्रान्सिस्को ने यह फलसफा यूँ”,

2012-08-06 08.51.35

- चल दिये हम अपने घर टोरंटो वापस......पता ही नहीं चला कि कब चार महिने यूँ ही गुजर गये- खैर पता तो तब भी न चला था जब जिन्दगी के इतने बरस भी यूँ ही उतार चढ़ाव झेलते गुजरे मगर कोशिश तो फिर भी रही इस सीख सी..मुस्कराते हुए गुजर जाने की.

- तो अलविदा सेन फेन्सिस्को!! अलविदा बे एरिया- अलविदा ओ पहाड़...अलविदा समुन्द्र...अलविदा वो धुँध कि जिसके साये में खोया खोया फिरता था मैं जाने कहाँ कहाँ.. बुनते हुए कुछ चमकीले ख्वाब.. इस शहर की वादियों में..

- एक अजब सा शहर... बेहद अमीरी और बेहद गरीबी के बीच सामन्जस्य बैठाता..एक तरफ बेपनाह दिमाग (फर्टाईल ब्रेन) कि सिलिकोन वैली के नाम से विश्व विख्यात..वहीं शहर के बीचों बीच अमेरीका की क्राईम केपिटल ओकलैण्ड..अपराधों का गढ़..अपराधियों की जन्नत....एक तरफ फैशन के जबरदस्त हस्ताक्षर तो दूसरी तरफ ड्रग्स और एड्स की मार...सब एक साथ खुली आँख देखता.... ये शहर जो परिशां फिर भी न था..याद तो आओगे तुम ओ सेन फ्रान्सिस्को..और याद रहेंगे सदा वो साथी..जो करीब हुए यहाँ....कहीं दफ्तर में .. तो कहीं मुशायरों में.. तो कभी परिवार के साथ तो कभी दोस्तों में यूँ ही...

- तब कहता हूँ किसी शायर की बात मौके पर....

 

बिछड़ते वक्त उन आँखों में थी हमारी गज़ल

गज़ल भी वो जो किसी को कभी सुनाई न थी..

कि धूप छांव का आलम रहा

जुदाई न थी

वो हमसफर था....

-समीर लाल ’समीर’

52 टिप्‍पणियां:

  1. बिछड़ते वक्त उन आँखों में थी हमारी गज़ल गज़ल भी वो जो किसी को कभी सुनाई न थी............वापसी मुबारक .........ज़िन्दगी में यह ही उतर चढ़ाव ज़िन्दगी को और भी जीने लायक बनाने की वजह देते हैं ....

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  2. आपका घर आना...और यूँ ग़ज़लों के संग गुनगुनाना..हमें सुनाना....
    सभी भला लगा...

    सादर
    अनु

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  3. घरवापसी के खुशनुमा अहसास की बधाई हो!

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  4. बेहद सुन्दर "मेरे हमसफ़र..". सेन फ्रान्सिस्को से बापसी पर आपका अभिनन्दन. सफल यात्रा के लिए बधाईयाँ.

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  5. बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...सच में धूप छाँव तो हमेशा हमसफ़र के जैसे साथ चलते हैं आप स्वदेश में हों या परदेश में हाँ धूप छाव के साथ यादें भी जोड़ देती हूँ |

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  6. टोरंटो पहुँच आपका लेखन पुनः पूरी अँगड़ाई लेगा, हमें बस यही खुशी है। पिछले ४ माह के अनुभवों को संस्मरण रूप में प्रस्तुत करें।

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  7. कई बार हम किसी से बिछड़कर भी नहीं बिछुड़ते,उसकी याद हमारे दिल में घर कर लेती है !

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  8. तो पहुँच गये आप अपने घर- बधाई !
    यह अनुभूति-प्रवण संस्मरण, आपके इस प्रवास की सुन्दर भेंट, यहाँ रहने का एक अलग ही अनुभव प्रस्तुत कर रहा है.
    यह निश्चित है कि इस विलक्षण शहर को आप कभी भूलेंगे नहीं.

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  9. घर वापसी से आपके लेखन की सक्रियता से हमें और बहुत कुछ पढने को मिलेगा ...यही आशा है....

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  10. चार महीने में, जगह कोई भी हो, वहां अपन-अपना सा तो लगने ही लगता है.

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  11. आपका टोरंटो वापस आना -- यूँ लगा जैसे हम ही घर वापस आ गए .
    स्वागत है आपका -- आपके ही घर में . :)

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  12. Aapka lekhan miss kar rahe the...wapasee to hamare liye laabhdayak hai!

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  13. घर वापसी मुबारक ... हर नया साथ, नया शहर नया एहसास कुछ न कुछ तो सिखाता ही है ... यही शायद जीने की वजह है ...

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  14. समीर जी,
    घर वापसी के लिये शुभकामनएं.

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  15. आपकी वापसी पर बधाई

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  16. बहुत अच्छी गजल सर जी..
    शुभकामनाये...
    :-)

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  17. वो हमसफ़र था, मगर उससे ह्मनवाई न थी,
    की धुप-छाँव का आलम रहा, जुदाई न थी.....
    सुन्दर पोस्ट है समीर जी...ये ग़ज़ल मुझे भी बहुत पसंद है.

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  18. समय तो व्‍यतीत होने के लिए है ..

    बस हमारे पास रह जाते है अनुभव ..
    बधाई और शुभकामनाएं !!

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  19. अभी घर वापसी का इंतज़ार है गुरु
    बेहतरीन पोस्ट

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  20. घर वापसी पर स्वागत। मुझे भी सेन्फ्राँसिस्को की सुन्दर वादियों की याद दिला दी।

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  21. घर वापसी
    मतलब अपना बंगला सबसे न्यारा

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  22. "जिन्दगी के उतार और चढ़ाव को खुशी खुशी झेल नित नई सीख लेने को –शुरु में उस चढ़ान से कोफ्त भी होता- थकान भी होती और सांस भी फूलती मगर इस तसल्ली के साथ कि चलो, अभी चढ़ान है तो क्या- शाम लौटते में ढलान होगी...तो चेहरा मुस्करा उठता...काश, जिन्दगी को भी ऐसे ही मुस्कराते जिये चले जाते हम.."
    ~काश !:)
    ~सादर !!!

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  23. आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं,
    ज़िन्दगी इतनी मुख़्तसर भी नहीं...

    ज़ख्म दीखते नहीं अभी लेकिन,
    ठन्डे होंगे तो दर्द निकलेगा,
    तैश उतरेगा वक़्त का जब भी,
    चेहरा अन्दर से ज़र्द निकलेगा...

    कहने वालों का कुछ नहीं जाता,
    सहने वाले कमाल करते हैं,
    कौन ढूंढें जवाब दर्दों के,
    लोग तो बस सवाल करते हैं...

    कल जो आयेगा जाने क्या होगा,
    बीत जाएँ जो कल नहीं आते,
    वक़्त की शाख तोड़ने वालों,
    तूरी शाखों पर फल नहीं आते...

    कच्ची मिट्टी है दिल भी इंसान भी,
    देखने ही में सख्त लगता है,
    आंसू पोंछें के आंसू के निशाँ,
    खुश्क होने में वक़्त लगता है...


    जय हिंद...

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  24. बेनामी8/10/2012 11:08:00 am

    sanjeev@3mik.com is correct email.

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  25. अपने घर को छोड़ना और फ़िर अपने घर आना...
    एक कड़वा अनुभव- एक मीठा अनुभव...
    वो हमसफ़र - मेरे घर का यादों में मेरे साथ चलते जाना...
    एक कड़वा अनुभव- एक मीठा अनुभव...

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  26. अलविदा...कहने का समय नहीं है...दोस्त...ये गया वक्त नहीं है जो दुबारा ना मिल सके...जब चाहेंगे आप फिर उन वादियों में पहुँच सकते हैं...वेलकम बैक...

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  27. अपना घर अपना ही होता है ..
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  28. जिन्दगी ठहरती कब है?
    सफर यूँ ही चला करता है.
    कुछ मिल कर बिछुड़ जाते हें
    और कुछ बिछुड़ भी यादों में ठहर जाते हें.
    वैसे घर तो वह जगह है,
    जहाँ कहीं से आओ पनाह मिल जाती है.
    फिर फुरसत में गुजरी बातें याद आती हें.
    --

    जवाब देंहटाएं
  29. Zindagi ke kitne hi fasane yunhi kuchh uljhe, kuchh suljhe, kuchh to kuchh batate aur kuchh kuchh sikhate.. Yahi to hain jinke sahare jiya jaata hai..

    जवाब देंहटाएं
  30. जिंदगी का सफर यूं ही कटता रहता है सालों का पता नही चलता फिर 4 महीने तो यूँ ही फुर्र हो गये होंगे । मिलने की खुशी है तो जुदाी का गम भी है ।

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  31. Home coming!
    बढ़िया बढ़िया! :)

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  32. चढ़ने का कष्ट उतरने के एहसास से मिट जाता है। उतरना पक्का हो तो यह एहसास हो ही जाता है। जहाँ उतरने का कोई ठिकाना ना हो बस चढ़ते ही चले जाना हो, मंजिल का पता न हो, वो मुसाफिर क्या करे?

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  33. मेरे हमसफ़र साथ दे क्या ही खूबसूरत पंक्तियाँ हैं सात में साफसुथरा आलेख भी ,शुक्रिया

    जवाब देंहटाएं
  34. मेरे हमसफ़र साथ दे क्या ही खूबसूरत पंक्तियाँ हैं सात में साफसुथरा आलेख भी ,शुक्रिया

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  35. ...और हां, आपकी इस विशद यात्राओं के बारे में विस्‍तार से जानने की आतुरता तो रहेगी ही।

    ............
    डायन का तिलिस्‍म!
    हर अदा पर निसार हो जाएँ...

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  36. लखनऊ सम्मेलन में आपसे मिलने का सुयोग नहीं बन पाया। ज़रूर अपरिहार्य कारण रहे होंगे।

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  37. सैन-फ्रैंसिस्को हो कि टोरंटो -सबसे ख़ूबसूरत है वर्तमान।। जो अवचेतन मन से जीकर भी दुनिया की ख़ूबसूरती देखता-दिखाता है,उसका चेतन मन स्वर्ग भी उतार सकता है धरा पर!

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  38. लखनऊ सम्मान मुबारक !ब्लोगर धर्म मुबारक !
    बुधवार, 29 अगस्त 2012
    मिलिए डॉ .क्रैनबरी से
    मिलिए डॉ .क्रैनबरी से

    जवाब देंहटाएं
  39. लखनऊ सम्मान मुबारक !ब्लोगर धर्म मुबारक !इत्तेफाक है समीर लाल जी ,सैन -फ्रांसिस्को ,टोरोंटो दोनों ही बारहा देखें हैं पहले में जन समुदाय दिखलाई दिया था मुम्बई के सी लिंक सा "गोल्डन गेट ब्रिज ", यहाँ मिशिगन के कैंटन के बरक्स ,वो जनसंकुलता मुंबई की याद दिला गई ,शहर के बीचों बीच से गुज़रती लोकल और टोरोंटो उसकी तो विशालता का ज़वाब ही नहीं ,फैलाव ही फैलाव हर तरफ और वो मेट्रो का शांत सफर ,हर डब्बे में गार्ड कंडक्टर देखता हुआ सब चढ़ गए भाई सुरक्षित ,दिल्ली मेट्रो की तरह यहाँ रोशनियों की चकाचौंध नहीं थी बस ज़रुरत भर की ट्यूब लाइटें थीं .हम एक गरीब देश हैं जहां शायद चकाचौंध ही आकर्षित करती है आम आदमी को जिसकी जेब में हमेशा कोंग्रेस का हाथ पड़ा रहता है .कभी नरेगा ,कभी मरेगा .पटरानी सब करती धरती है इस रिमोटिया सरकार का .आपका संस्मरण पढ़ मैं भी रौ में बहता कुछ लिख ही गया यह आपकी रचनात्मकता का ही प्रताप है .खरबूजे को देख के खरबूजा रंग बदलता है .इति केंटन के प्रणाम !
    ब्लोगर सम्मान मुबारक !
    बुधवार, 29 अगस्त 2012
    मिलिए डॉ .क्रैनबरी से
    मिलिए डॉ .क्रैनबरी से

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  40. लखनऊ सम्मान मुबारक !ब्लोगर धर्म मुबारक !इत्तेफाक है समीर लाल जी ,सैन -फ्रांसिस्को ,टोरोंटो दोनों ही बारहा देखें हैं पहले में जन समुदाय दिखलाई दिया था मुम्बई के सी लिंक सा "गोल्डन गेट ब्रिज ", यहाँ मिशिगन के कैंटन के बरक्स ,वो जनसंकुलता मुंबई की याद दिला गई ,शहर के बीचों बीच से गुज़रती लोकल और टोरोंटो उसकी तो विशालता का ज़वाब ही नहीं ,फैलाव ही फैलाव हर तरफ और वो मेट्रो का शांत सफर ,हर डब्बे में गार्ड कंडक्टर देखता हुआ सब चढ़ गए भाई सुरक्षित ,दिल्ली मेट्रो की तरह यहाँ रोशनियों की चकाचौंध नहीं थी बस ज़रुरत भर की ट्यूब लाइटें थीं .हम एक गरीब देश हैं जहां शायद चकाचौंध ही आकर्षित करती है आम आदमी को जिसकी जेब में हमेशा कोंग्रेस का हाथ पड़ा रहता है .कभी नरेगा ,कभी मरेगा .पटरानी सब करती धरती है इस रिमोटिया सरकार का .आपका संस्मरण पढ़ मैं भी रौ में बहता कुछ लिख ही गया यह आपकी रचनात्मकता का ही प्रताप है .खरबूजे को देख के खरबूजा रंग बदलता है .इति केंटन के प्रणाम !
    ब्लोगर सम्मान मुबारक !
    बुधवार, 29 अगस्त 2012
    मिलिए डॉ .क्रैनबरी से
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  41. वह गज़ल घर आने के बाद जरूर सुन ली होगी किसीने ।
    सैन फ्रांसिस्को का आपका सुहाना सफर खत्म हुआ पर घर वापसी की खुशी भी तो है ।

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  42. बहुत सुंदर.... कुछ ही दिन से आपके ब्लॉग का फॉलोअर बना हूं...। बहुत ही उम्दा लिखते हैं आप...

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आपकी टिप्पणी से हमें लिखने का हौसला मिलता है. बहुत आभार.