गुरुवार, मार्च 19, 2009

चितरंजन अस्पताल का कमरा नं. ४११: एक बुजुर्ग की डायरी-२

(आज उसी बुजुर्ग की डायरी का एक और पन्ना, जिसे आपने पहले पढ़ा था: पीले पन्नों में दर्ज हरे हर्फ शीर्षक के तहत (अगर न भी वो पन्ना पढ़ा हो तो भी यह पूरा है मगर उसे पढ़ने के बाद इसे देखने में ज्यादा जुड़ा महसूस करेंगे, बस्स!! )

एक अंदाज बस है कि शायद रात के तीन बजे के आस पास का समय होगा. नींद एकाएक सामने की सड़क से जाते ट्रक के हॉर्न से टूटी है.

पलंग से लगी खिड़की से लेटे लेटे बाहर झांकता हूँ आकाश में. आज कुछ भूरा सा रंग लिए है न जाने क्यूँ. बाहर क्या पता कि कैसा मौसम होगा-शायद महिने के अनुसार गरम ही हो. मगर कमरे में ए सी चल रहा है बिना किसी आवाज के शीतल वातावरण निर्मित करता.

विज्ञान की प्रगति के साथ प्रकृति से साथ छूटा. आप अपना वातावरण खुद निर्मित करने में सक्षम हुए. गरमी में सर्द या सर्दी में गर्म. मानव को एक अहंकार का भाव मिला. कमरे में रुम फेशनर की खुशबू से फूलों सी महक भरी है जबकि अस्पताल के ठीक नीचे बहता नाला जाने कितना बजबजा रहा होगा किन्तु मुझे उससे क्या लेना देना. मैं आत्म मुग्ध, अपने निर्मित वातावरण में.

अक्सर ही पाया गया कि अपने अनुरुप गढ़ा गया वातावरण, कहीं न कहीं शायद अहंकार की वजह से, वो नैसर्गिक सुख देने से वंचित हो जाता है जो हम अपने समय में सुविधाओं के आभाव में प्रकृति से जुड़ कर पाते थे. अब न गर्मी में छत पर खुले में सोने वाले और पड़ोसियों से छत से गपियाने वाले दिन रहे और न ही सर्दी में अँगीठी की आँच सेकते कमरे में रजाई में गुमड़ियाने के दिन जब मटर की गर्मागरम घुघरी हरी मिर्च और लहसून की चटनी के साथ अपनी अमिट छाप छोड़ जाती थी.

चितरंजन अस्पतालकमरा नं.४११

मैं चितरंजन अस्पताल में भरती हूँ कमरा नम्बर ४११. सीने में तीन दिन पहले दर्द उठा था शायद गैस की वजह से. दिन भर दबाये रहा मगर जैसा कि इस दर्द की शक्शियत है, रात को असहनीय हो उठा और बेटे को आवाज देनी ही पड़ी. आज बाजू में केयर टेकर के बिस्तर पर इस प्राईवेट एक्ज्यूकिटिव सूट के शानदार कमरे में बड़ा बेटा सोया है मेरी केयर करने को. बड़ी कम्पनी में अधिकारी है तो उसके पिता इससे कम सुविधा वाले कमरे में कैसे भरती रह सकते हैं.

सुबह ८ बजे बड़ी बहू नौकर के साथ आ जायेगी मेरे लिए चाय और नाश्ता लेकर. तब बड़ा बेटा घर चला जायेगा और नहा धो कर दफ्तर जायेगा. इस बीच छोटा बेटा ९.३० बजे यहाँ चला आयेगा ताकि बड़ी बहू घर जा सके. वो ११ बजे तक यहीं रहेगा. सूप वगैरह वो ही लायेगा. फिर ११ बजे छोटी बहू आ जायेगी और मेरे पास ही रहेगी २ बजे तक, जब बड़ी बहू वापस आयेगी लंच लेकर ताकि छोटी बहू घर जाकर छोटी और बड़ी बहू के स्कूल से लौटते बच्चों की टेक केयर करे.

अब ६ बजे छोटा बेटा दफ्तर से आकर मेरे पास रहेगा, बड़ी बहू घर जायेगी. वो मुझसे बात करेगा. डॉक्टरर्स से बात करेगा. आते रिश्तेदारों से सिर्फ और सिर्फ मेरी ही बात होगी. सब मेरे ही आसपास केन्द्रित रहेंगे. फिर छोटी बहू आकर रात का खाना खिलायेगी, मेरे तो हाथ में आई वी लगा है, खुद से खा ही नहीं सकता. तब थोड़ी देर में बड़ा बेटा आ जायेगा और वो रात भर रहेगा. यही दिनचर्या है जबसे यहाँ भरती हुआ हूँ.

अपनों का और अपने बेटों का इतना सानिध्य और अपनपा-इतनी मेरे और सिर्फ मेरे विषय में बातचीत और सब कुछ मुझ पर ही केन्द्रित देखे तो ५ बरस बीत गये, जब पत्नि मरी थी. क्या पता मैं ही मर गया था शायद. दोनों बेटे, दोनों बहूऐं सब मेरे साथ ही एक ही घर में रहते हैं मगर यहाँ मेरे ही कमरे में-मुझसे बात करते और मेरे ही लिए. यही बस अलग सी बात है यहाँ जो मुझे इतनी खुशी दिए जा रही है अपनी बीमारी की.

आई वी से टपकती बूँद बूँद ग्लुकोज की मिठास में पूरे वातावरण में अहसास रहा हूँ. जुँबा पर कोई स्वाद नहीं, बस अहसास, ठीक ग्लुकोज की मिठास सा.

कितना ही अच्छा लग रहा है मुझे कि मैं बीमार हुआ. लेकिन जाहिर भी तो नहीं कर सकता यह बात.

मेरी अशक्त्ता नें मुझे डरपोक बना दिया है शायद. हर वक्त डर रहता है कि मेरी कोई बात से मेरा ही कोई बच्चा नाराज न हो जाये. सामने हैं, दिखते रहते हैं तो एक मानसिक संबल रहता है. भले ही उनके पास मेरे लिए समय न हो.

डॉक्टर का कहना है कि जल्दी ही डिस्चार्ज कर देंगे.

है भगवन, मैं ठीक होकर अपने ही बनाये उस घर लौटना नहीं चाहता- मैं उस भरे पूरे घर के अपने एकाकी जीवन में, जहाँ होने को ये सब हैं पर मेरे पास कोई नहीं, लौटना नहीं चाहता. बस, वहाँ मैं और मेरे ही घर में मेरे कमरे तक सीमित मैं. मुझे तो तू अपने साथ यहीं से ले चल.

मैं अपने साथ अपनों की वो मधुर स्मृतियाँ ले जाना चाहता हूँ जो पिछले तीन दिनों में मैने सहेजी हैं मानो कि पत्नि के जाने के बाद के ५ बरस मैनें इन तीन दिनों के इन्तजार में ही जिए हों.

मगर भगवन, तू जल्दी कर, मैं अब भी चाहता हूँ कि मेरे बच्चे, समाज में अपनी पोजिशन बनाये रखने के लिए, अपनी इस नियमित कठिन अस्पताल आने जाने की जिम्मेदारियों से जल्दी मुक्त हो अपनी उन्मुक्त जिंदगी बितायें.

हे प्रभु, तुम सुन रहे हो न!!! बड़ा बेटा अभी बाजू के बिस्तर में गहरी नींद में है. चल, मुझे चुपचाप ले चल!!!!

(नोट: पिछली बार कुछ लोगों को लगा कि मैं अपनी डायरी का पन्ना दे रहा हूँ. एक स्पष्टीकरण देना चाहूँगा कि यह मेरी डायरी नहीं बल्कि अपने आस पास महसूस कर मैं एक बुजुर्ग को जीने का प्रयास कर रहा हूँ इन पन्नो के माध्यम से ताकि उन्हें मैं और आप बेहतर समझ सकें और उन्हें यथोचित मान सम्मान और समय देने का प्रयास करें.)

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चलो, अब मामला भारी सा हो लिया है तो एक नई रचना सुनो और खुश हो लो. डायरी उनकी, दर्द उनका..हमें क्या, हम ऐसे ही तो जीने के आदी हैं. तो फिर रचना हमारी-मुस्कान आपकी -की दरकार के साथ.


चुनाव का माहौल है तो उससे प्रभावित पहले कुछ शेर फिर कुछ चुलबुले भी, मूड ठीक करने को:


झूट की बैसाखियों पे, जिन्दगी कट जायेगी
मूँग दलते छातियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

तू दगा करता उन्हीं से, जो भी तेरा साथ दे
वार करते साथियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

सज गया संपर्क से तू, कितने ही सम्मान से
कागजी इन हाथियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

यूँ जमीं कब्जे में करके, दे गया तू मशविरा,
घर बसा लो नालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

है अगर बीबी खफा तो फिक्र की क्या बात है
कर भरोसा सालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

कब गुजर संभव किसी की, इस कविता पाठ से,
मिल रही इन तालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

गाड़ देना मुझको ताकि अबके मैं हीरा बनूँ,
सज के उनकी बालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

-समीर लाल ’समीर’


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सूचना:


१. कल १० दिनों के कलकत्ता और सिक्किम के प्रवास पर जा रहा हूँ. कलकत्ता में शिव भाई दौड़ा भागी में लगे सब इन्तजाम कर रहे हैं और मीत भाई से भी मुलाकात तय है. वापसी ३१ मार्च की है.


२. १८ मार्च की संजय तिवारी ’संजू’ के संदेशा द्वारा प्रस्तुत श्री विजय शंकर चतुर्वेदी जी (आजाद लब) के सम्मान में आयोजित रात्रि भोज की रिपोर्ट में यह बात हमारे संजय साहब आराम से दबा गये कि मैने जबलपुर के सभी ब्लॉगर्स को न्यौता देने की जिम्मेदारी उन पर रख छोड़ी थी.

थोड़ी गल्ति मेरी थी कि सब कुछ तय शाम ५ बजे पाया गया और संजय तक सूचना पहुँचते ५.३० बज गया और सब ७.३० बजे एकत्रित हो लिए जिन को भी वो सूचित कर पाये. बहुतों तक इस सूचना के न पहुँच पाने का मुझे दुख है. आगे फिर किसी दिन जल्द ही कनाडा वापस लौटने के पहले. :)

रविवार, मार्च 15, 2009

बिल्लु की जगह बिल्ली भी चलता..

हमारे मोहल्ले का गरीब नाई. पुरानी स्टाईल वाला. बस, एक टूटी कुरसी, पुराना आईना और टूटे फूटे औजार. क्या चलेगी उसकी दुकान ऐसे दिखावे के बाजार में जहाँ प्रोडक्ट से ज्यादा शो पानी बिकता है. तो नहीं चलती थी.

एकाएक हमारे गाँव में बॉलीवुड सुपर स्टार शूटिंग करने आ जाता है और लोगों में पता नहीं कहाँ से हवा फैल जाती है कि ये नाई उसका बचपन का दोस्त है.

लोग समझते नहीं हैं, हमारे गाँव में तो अमरीका से बुश भी आ जाये, तो उसके साथ के बचपन के पढ़े पाँच सात तो पान की दुकान पर गपियाते मिल जायेंगे. मूँह चलाने में कोई पैसे थोड़ी ही न लगते हैं.

बस, फिर क्या!! आज की दुनिया में लोग तो वक्त के दोस्त होते हैं आपके थोड़े न!! आपका वक्त अच्छा, तो आपके दोस्त वरना नहीं पहचानते. इसी हल्ले में उसकी दुकान चल निकलती है. नाई की पूछ परख बढ़ जाती है. सब उसे जरिया बना कर सुपर स्टार से मिलना चाहते हैं.

अरे, जो खुद ही नहीं सुप स्टार से मिल पा रहा वो क्या किसी को मिलायेगा. इत्ती सी बात बहुत समय निकल जाने के बाद लोगों को समझ आती है और फिर जैसा मैने कहा, लोग वक्त के दोस्त होते हैं. सब उसे दुत्कार देते हैं और वो फिर से पुराना वाला नऊआ.

गांव के एक स्कूल में शूटिंग के आखिरी दिन सुपर स्टार स्कूल के बच्चों के लिए रखे गये कार्यक्रम में किसी तरह समय निकाल कर पाँच मिनट के लिए आता है और फिर ऐसा रह जाता है जैसे जाना ही न हो. अपनी जीवनी सुनाता है और अपने बचपन के दोस्त नऊए का जिक्र कर बैठता है.

फिर क्या, सब उसे लेकर नऊए के यहाँ आ जाते हैं. सब घर के बाहर और सुपर स्टार अंदर. गला मिलन और एक मिनट में बचपन की याद, बात और फिर सुपर स्टार का उसे ऑफर कि तू पुराने गाँव में जाकर बस जा, तो कभी हम पुराने दिन फिर से जी लेंगे और सुपर स्टार रवाना वापस बम्बई.

अब बताओ, पुराने गाँव में धरा क्या है? कुछ होता तो क्या नाई यहाँ आता? न पैसा न कौड़ी, कुछ भी प्रामिस नहीं किया और कह गये, जाकर बस जाओ-कहाँ बस जाये? बस स्टैंड पर कि कुछ मकान दुकान खरीद के दोगे? कहानी खत्म!!

ये हम सोच सोच कर कहानी नहीं बनायें हैं. ये है बिल्लू बार्बर फिल्म की कहानी. नाम फिल्म का यह भी हो सकता था ’मैं किंग खान’ या ’शाहरुख’ या ’क्या देखने आये हो, कुछ काम नहीं है क्या’ या ’अगली फिल्म में मुझे ले ले, ठाकुर!!’ .......कुछ भी. सब इसी तरह फिट होते. फिल्म का नाम ’बिल्लू बार्बर’ मगर फोकस पूरे समय बस शाहरुख खान के प्रमोशन पर.

अगर शाहरुख कोई नया आया कलाकार होता और फिल्म में जरा सी काट छांट करके बिल्लू सिल्लू अलग कर दें, तो भी २ घंटे का शाहरुख प्रोमो बच रह जायेगा जिस सीडी को किसी भी प्रोड्यूसर के पास भेज अगली फिल्म में काम मिलने का इन्तजार किया जा सकता है.

मगर हम तो फिल्म प्रोड्यूस करते नहीं और आप भी कहाँ फिल्में बनाते हैं, अतः आपके और हमारे काम की नहीं.

बिल्लु के बदले: बिल्ली

शाहरुख का होम प्रोड्क्शन है. वो क्लेम कर सकते हैं कि यह फिल्म मेरे प्रमोशन के लिए नहीं बल्कि मित्रता की मिसाल, बाल सखाओं का प्यार, त्याग और बलिदान जैसी बातें बताने के लिए बनाई है तो आप पायेंगे कि पूरे तीन घंटे की फिल्म में ये मित्र आमने सामने मात्र दो मिनट के लिए हैं एक सिंगल प्रेम में. अगर फिल्म की जस्ट समाप्ति पूर्व वो फ्रेम न होता और इन्हें आपस में बताया न जाता तो कहो, ये दोनों जान भी न पाते कि फिल्म में किसके साथ काम किये हैं.

हैप्पी एंडिंग हुई-ऐसा पत्नी ने मुस्करा कर थियेटर के बाहर निकलते हुए बताया. जबरदस्ती दिल्ली की ट्रिप में दिल्ली ६ जैसी फिल्म दिखाने के बावजूद भी (नेक इन्सान एक गल्ति करके संभल जाता है मगर वो!!) दूसरी फिल्म दिखाने ले आई थी तो भला उसके पास चारा भी क्या था सिवाय मुस्कराने के.

हम भारतियों की यही विशेषता है कि जब कुछ समझ न आये, कोई गल्ति हो जाये, बेवकूफ बन जाओ या कोई रास्ता समझ न आये तो बिना लॉजिक दाँत चियार के मुस्कराने लगो. मामला अपने आप सलट जाता है.

खैर, पूरी फिल्म में एक करेक्टर थे जो याद रह गये- कविराज माननीय राजपाल यादव जी. ये छुटकू महाराज हमें यूँ भी पसंद हैं और इसमें तो कवि बने हैं.

मोहल्ले में बताया कि फिल्म तो ऐं वें टाईप थी, बस कवि चूँकि हमारे हम शौक निकले इसलिये ठीक लगे तो बात लोगों को ठनक गई.

सब पीछे लग लिए कि मोहल्ले में 'मोहल्ला स्थापना रजत जयंति समारोह' के कार्यक्रम में फागुन गीत भी गाया जायेगा, आप जरा फड़कता हुआ गीत लिख दिजिये- जरा लोकगीत की तर्ज पर रहे, यह ध्यान रखियेगा. मोहल्ले में तो ईमेज से ही इन्सान की पहचान होती है फड़कता लिखें तो फड़कती ईमेज बने, सो उसे मेन्टन करने के चक्कर में हम लिखे और दे दिये. अब इसकी धुन बनेगी और कोई महिला मंडल की सदस्या ’मोहल्ला स्थापना रजत जयंति समारोह” में इसे गायेंगी मगर तब तक आप पढ़ लो. राज पाल यादव के गीत ’बिल्लू भयंकर’ से बेहतर ही सा लग रहा है:


चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

रंग लगा दो,
गुलाल लगा दो,
गालों पे मेरे
लाल लगा दो..
भर भर पिचकारी से मार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

सासु लगावें
ससुर जी लगावें,
नन्दों के संग में
देवर जी लगावें..
साजन का करुँ इन्तजार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

गुझिया भी खाई
सलोनी भी खाई
चटनी लगा कर
कचौड़ी भी खाई..
भांग का छाया है खुमार..
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

हिन्दु लगावें
मुस्लमां लगावें,
मजहब सभी
इक रंग लगावें..
मुझको है इंसां से प्यार..
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

-समीर लाल ’समीर’

गुरुवार, मार्च 12, 2009

होली पर यह हालत हो ली!!!

देखिये, क्या क्या न बनें हम भी सनम, आपकी खातिर: हा हा!!! जिसका जैसे मन आया, होली पर रंगता चला गया और हम रंगाते चले गये. मजा बहुत इस ब्लॉगरी होली में इस साल.


ताऊ के दर पर:


ताऊ: जय हो!


साहित्य शिल्पी पर योगेश समदर्शी की नजर:


योगेश भाई: वाह!!


मित्र द्वारा ईमेल पर भी लटका दिये गये:


अब तो: ब्लॉग बना लो!


मास्साब पंकज सुबीर के मुशायरे में:


मास्साब: क्या खूब सजाया!!



मास्साब के मुशायरे में नाम मिला समीरा लल्ली कनाडा वाली उड़ने वाली तश्तरी और फिर हमने जो गज़ल पढ़ी, जिसका मिसरा दिया गया था: तुम्हारे शहर के गंदे, वो नाले याद आते हैं - वो तो सुनते जाईये (हालांकि आप में से बहुत से लोगों ने तो मुशायरे में ही सुन ली होगी.)



तुम्हारे शहर के गंदे, वो नाले याद आते हैं
नहाते नंगे बच्चों के रिसाले याद आते हैं

था ऐसा ही तो इक नाला, तुम्हारे घर के आगे भी
हमें उसके ही किस्से अब, वो वाले याद आते हैं

तुम्हें छेड़ा था हमने बस ज़रा सा ही तो, नाले पर
पिटे फिर जिनके हाथों से वो साले याद आते हैं

तुम्हारा घर था बाज़ू से, नज़र दीवार से आता
हमें उस पर लगे, मकड़ी के जाले याद आते हैं.

हाँ छिप कर पेड़ के पीछे, नज़र रखते थे हम तुम पर
तुम्हारे गाल गुलगुल्ले, गुलाले याद आते हैं.

नशा नज़रों का तुम्हारा, उतारा बाप ने सारा
हमें रम का मज़ा देते, दो प्याले याद आते हैं

मिटा दी हर रुकावट हमने, अपने बीच की सारी
लगाये बाप ने तुम पर जो ताले, याद आते हैं

अँगूठी तुमको पीतल की, टिका कर उसने भरमाया
जो तुमने हमको लौटाए, वो बाले याद आते हैं

चली क्या चाल तुमने भी, जो कर ली गै़र संग शादी
हमें गुज़रे ज़माने के, घोटाले याद आते हैं.

जिगर को लाल करने को, गुलाल दिल पे था डाला
चलाए नज़रों से तुमने, वो भाले याद आते हैं

अँधेरी रात थी वो घुप्प और बिजली नदारत थी
’समीर’ भागे थे जिन रस्तों से, काले याद आते हैं

--समीर लाल ’समीर’

रविवार, मार्च 08, 2009

आओ, तुम्हें होली खिलवायें..

होली आन पड़ी है.

रंगों का त्यौहार है सो रंग लगाये जायेंगे. मस्ती का मौसम है तो मस्त हो जायेंगे. इस दिन तो ऐसा लगता है कि मानो पीने वालों को ओपन लायसेंस जारी हो गया हो कि भाई, खूब पिओ और जो दिल में आये, सो करो. पुलिस के डंडो की गिनती करना पाप है.

पुलिस मुस्तैद है, क़ानून की रक्षा कर रही है. एक बच्चे के जन्म दिन की पार्टी से लौट रहे थे. पी कर गाड़ी चलाने का इल्ज़ाम लगा दिया गया. होली के समय तो आप दूध पीकर भी गाड़ी चलाइए इल्ज़ाम सेम लगेगा. आप कहेंगे दूध है भाई वो कहेंगे पिया तो है ना, बस बात ख़त्म.

१०० रुपये ढीले गए तो पीना जायज़ ठहराया गया और यह भी बताया गया के शराब पीना तो सरकारी काम है भाई. क्या करें हम घर आये तो यह पोस्ट आटोमैटिक लिख गई भाई और जब लिख गई तो पोस्ट तो करै का पड़ी ना दादू.

१०० रुपये में तीन पैग ..पार्टी में तो फ़्री के थे, बुरे नहीं लगे. आगे से चार पिया करेंगे. सस्ता पड़ेगा. अर्थशास्त्र की तो यही सलाह है.

सबको होली मुबारक!!

सब होली के रंग में डूबे ..क्या शिवजी और क्या फ़ुरसतिया..अरुण पंगेबाज भंग से टन्न है. सफ़ाई पेश करने में जुटे हैं. अब देखो क्या होता है, उन्हें यूँ भी होलिका दहन की आग में प्रहलाद उछालने में ज़्यादा मज़ा आता है रंग खेलने के बनिस्बत. जितना मैं उन्हें जान पाया हूँ, उस आधार पर मैथली जी तो मुझसे एग्री करेंगे ही.

होली पर हमारे शहर का माहौल हमेशा एक अलग रंग में रंगा होता था. लुक़्मान क़व्वाल ज़िंदा थे. शहर उमड़ पड़ता था मोदी बाड़े में होलिका दहन की रात उनकी क़व्वाली सुनने अपनी बोतलों और कबाबी चटखारों के साथ.

अब लुक़्मान तो रहे नहीं, मगर होली फिर भी हर साल आती है और उनकी याद को ज़िन्दा रखे हैं हमारे बवाल भाई, उनके शागिर्द और वसीयतदार. अब तो वही हमारे बीच होते हैं .............. और लुक़्मान चचा की याद ये गाकर दिलाते हैं कि----

कुछ ऐसी तसव्वुर की महफ़िल सजाएँ,
जहाँ हों वहीं से उन्हें खेंच लाएँ


...शायद दो तीन दिन में उनके साथ होली मिलन का कार्यक्रम रखूँ, जो अभी रुपरेखा ले रहा है और आप सब को पेश करुँ उनकी बेहतरीन क़व्वालियों की रिपोर्ट बाक़ायदा सुरा के साथ(मुझे ऐसा लिखने में कोई गुरेज़ नहीं, मुझे पसंद है तो है) जैसा पिछले साल सुनाया था. :) पूना से आज जबलपुर आते ही होंगे और आते ही हमसे ना मिलें तो इत्ते की बात.

खैर, जब सब लिख ही रहे हैं तो होली पर हम क्यूँ न लिखें. क़लम कमज़ोर ही सही, मगर अब है तो ग़लती से हमारे हाथ में. और ना हम बन्दर ना हमारी क़लम उस्तरा.

इसलिये सुनिये यह आल्हानुमा रचना और हो हो करें या हीं हीं..जो भी कीजिएगा, होली की मस्ती में काऊंट होगी, समझे कि नाही .



बड़े सबेरे फ़ुरसतिया जी, हमरे घर पे आ धमकायें
क्यूँ तुम घर पर ही बैठे हो, चलो साथ होली खिलवायें

हम बचने की बात सोचते, वो अँखियन रह रह मिचकायें
और कहें कि भांग पिला कर, सब को जमकर रंग लगायें

ज्ञानदत्त उठ घर से भागे, कहते भंग पचा ना पायें
फ़ुरसतिया तब दौड़े पीछे, टंगड़ी मार दिये गिरवायें

देखें जो भईया को गिरते, शिव बाबू यह सह न पायें
छोड़ के गुझिया वाला ठेला, पिचकारी लै दौड़े आयें

फ़ुरसतिया जी जान बचा कर, छुप बैठें गलियन में जायें
देख तमाशा भीड़ भाड़ कुछ, ब्लॉगर टंकी पर चढ़ जायें

कुछ तो ढ़ूंढ़ रहे हैं उनको, कुश काफ़ी पीकर भरमायें
होली है भई बुरा ना मानें, दिनेशराय जी ये समझायें

सभी मान गये कुश की बतियां, शास्त्री स्नेह सहित मुस्कायें
नीरज बोलें ग़ज़ल सुना कर, मौसम को कुछ बदलें आयें

इन बातों पर कुछ तो बोलें और कुछ चुपै-चुप्पे जायें,
बाकी बचे खड़े सहमे से, सज्जनतावश हैं शरमायें

देख बदलते हवा के रुख़ को, लेडी ब्लॉगर बाहर आयें
स्लोली स्लोली रंग उड़ायें, मौजें ले लेकर मुस्कायें

अरुण अरोरा फिर गुस्से में, सीना ताने सामने आयें
हिम्मत है तो उनको रंग लें, सीधों को ना यहाँ सतायें

भांग पिला लें रंग लगा लें, जब हम अपनी पर आ जायें
नीले-पीले-लाल-गुलाबी, दुनिया भर को हम रंग जायें

कीचड़-गोबर-ग्रीस है संग में, मथुरा की होली खिलवायें
कुर्ता अपना फाड़ फाड़ कर, फ़ोटो हर एंगल खिंचवायें

अरविंद जी इतना सुनकर, कूद सामने मंच पे आयें
नर-नारी विज्ञान की फ़ोटो, सबको तुरत-फ़ुरत भिजवायें

नारी शक्ति जाग रही पर, ताऊ भैंस बने पगुरायें
राज भाटिया लाल बुझक्कड़, बूझ बूझ कर मगज फिरायें

सबको होली बहुत मुबारक, सब मिलकर के पर्व मनायें
प्राण साब हैं साथ में सबके, जो चाहें जी वो लिख जायें

अर्श पटापट ग़ज़लें लिख-कर, छोटी बड़ी बहर समझाएँ
पर्दा-पीछे खड़े सुबीरा, रंग भरी पट्टी पढ़वायें

संजय-पंकज नाच रहे हैं, आर्या जी मेकअप करवायें
क्या केने क्या केने भाया, झूम झूम आलोक भी गायें

अमर डाक्टर खटिया तोड़ें, मौदगिल दाढ़ी ख़ूब खुजायें
भूतनाथ भये आज तो सबरे, होली का मतलब समझायें

मीत-अजीत भी कहते कुछ कुछ, मगर किसी को सुन्नै नायें
मसिजीवी फिर भाँग मसक कर, नीलम नोट पैड संग आयें.

पूजा मैडम डिग्री टाँगे, साथ पल्लवी को ले आयें
रचना जी सब ताड़ रही हैं, नारी को कुछ कह न पायें

रंजू जी भी खड़ी मंच से, प्रीतम दी की कथा सुनायें
पारुल जी गाती मुस्का कर, मीत गीत गंभीर सुनायें

अनिल पुसदकर लोट रहे हैं, पानी पानी वो चिल्लायें,
तिलक की होली हम न खेंले, पाणी बेंगाणी ले आयें

पीडी टांग तुड़ा कर बैठे, सबको अपनी व्यथा बतायें,
आदि की जब बाजे ताली, देख देख सब मन हर्षाये

जज मनीष बैठे कुर्सी पर, गीतों की पयदान बतायें
जाट मुसाफिर के किस्से भी, ठिठक ठिठक सब सुनते जायें

रंग में डूबे ब्लॉगर सारे, क्या मालूम कब क्या कर जायें
इतने सारे लोग जमा हैं, डर है मंच टूट नै जायें

जिसको जो भाये सुन ले, कोई ढपली कोई शंख बजायें
ब्लॉगीवुड की कवरिज करने, टीवी संग अखबार भी आयें

राकेश गीतकार के संग-संग लगे दिगम्बर गाना गायें
भंग चढ़ा कर कविता करने, दुबई तलक भी पहुँचें जायें

चिट्ठाजगत-ब्लॉगवाणी और नारद को कैसे बिसरायें,
जिसमें दर्ज हजारों ब्लॉगर, सब होली के रंग रंगायें.

जितने ब्लॉगर जबलपूर में, उतने किसी सहर में नायें
सबको प्यारे दुनिया भर में, भारत का परचम लहरायें

मिश्रा-मुकुल, डुबे संग शैली, रंगों से आकाश सजायें
पंकज स्वामी ‘गुलुश’- गार्गी, भगवत कथा कहो पढ़ जायें

साज़-प्रेम फ़र्रुख़ाबादी, किसलय से भंगिया घुँट्वायें
विवेक रंजन बिजली का बिल, संजय के घर पर भिजवायें

कृष्णानंन्दं चलते चलते, बात हमारी सुनते जायें
होली में सब बैर भुला दें, प्रेम के रंग में रंग सब जायें

उड़नतश्तरी पर सब बैठें, सुनकर आल्हा घर को जायें
सीमा में जब हों बवाल तो, सब Regards वैसे ही पायें


सभी को होली महापर्व की बहुत बहुत बधाई एवं मुबारक़बाद !!! और हाँ !!! सबको जबरन साधूवाद भी. हा हा. :)

चलते चलते :-

ब्लॉगर बिग बच्चन के पूज्य पिताजी
डॉ. हरिवंशराय ‘बच्चन’ की अमरकृति मधुशाला से ---

एक बरस में एक बार ही, जगती होली की ज्वाला
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला
दुनिया वालों किन्तु किसी दिन, आ मदिरालय में देखो
दिन को होली रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला

(धुरेड़ी के दिन याने ११/३/२००९ को हमें बवाल के संग लाल एण्ड बवाल पर आप सब ज़रूर मिलिएगा, तब तक के लिए ...........जय रंग.......हुड़दंग)

रविवार, मार्च 01, 2009

आओ, ब्लॉग सालगिरह का केक तो खाते जाओ!!

आज देखते देखते इस ब्लॉगजगत में तीन साल पूरे हो गये. बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ पाया. नये मित्र बनें, मिले और बात हुई. अब तो यह एक शौक के बदले जीवन शैली सी हो गई है. आप सबका असीम स्नेह प्राप्त हुआ. लिखने का हौसला मिलता रहा. गुरुगण सिखाते रहे. बेहतरीन सफर चला और आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि आपका स्नेह ऐसे ही प्राप्त होता रहेगा और यह खुशनुमा सफर यूँ ही चलता रहेगा.

इस सालगिरह के मौके पर आप सब के लिए केक:

ये रहा: केक


वैसे तो तीन साल की उम्र कुछ खास तो नहीं होती है किन्तु उम्र से न सही, दूसरों के अनुभवों से तो सीखा ही जा सकता है. यूँ भी एक उम्र के बाद व्यक्ति उम्र के साथ साथ जिम्मेदारियों से बड़ा होना शुरु होता है. जैसे कि माँ बाप का साया हटना, बच्चों, भाईयों, बहनों की जिम्मेदारी व्यक्ति को खुद ब खुद बड़ा एवं जिम्मेदार बना देती है.

अमिताभ के ब्लॉग पर पढ़ता था कि:

दूसरों की गलतियों से सीखें। आप इतने दिन नहीं जी सकते कि आप खुद इतनी गलतियां कर सके।

बात जचीं. बचपन में और बड़े होने पर भी बाल सुलभ हरकतें और बाल मन अच्छे लगते हैं किन्तु एक उम्र के बात भी वही रट कि मैं तो अभी बच्चा हूँ, मैं तो अभी बच्चा हूँ और उज्जडता जारी, जरा अच्छा सा नहीं लगता और सहज तो कतई नहीं. बस, इन तीन सालों में सही उम्र के सही लोग, बड़ी उम्र के बड़े, बड़े होकर भी उज्जड बच्चे बने आदि सभी से मिलने का मौका मिला. सभी से अनुभव लिए और सभी से सीखने का मौका मिला, उनका आभार दर्ज करना चाहता हूँ.
आजकल पोस्ट भी अनियमित है और टिप्पणी तो न के बराबर ही कर पा रहे हैं. कल ही दिल्ली से बहुरानी को लंदन के लिए रवाना करके लौटे. अब शायद कुछ समय मिले. दिल्ली में फिल्म भी देखी, उसी के बारे में सुन लें:


दाँये और बाँये दोनो तरफ दिल वालों की दिल्ली

दो रोज पहले पत्नी और बहू की जिद पर दिल्ली में दिल्ली ६ देखी. ये छूट दोनों को ही जबलपुर के बाहर है कि हमें साथ फिल्म ले जा पायें.

फिल्म में बताया गया दिल्ली दिल वालों की-जिसके दोनों तरफ दिल है-दाँये भी और बाँये भी. याने हृदयाधात की डबल गुँजाईश. जाहिर सी बात है कि जहाँ दिल होगा, वहीं धड़केगा और वहीं हृदयाघात भी होगा.

मरना तो खैर सबको एक दिन है ही. चाहो तो गैस विकार मान कर हृदयाधात को नजर अंदाज कर दो, और बिना उचित कारण के असमय सिधार गये-कहलाओ या फिर उचित बॉयपास वगैरह कराकर सब की सहानभूति पाते सादा एवं उच्च जीवन गुजार दो सिर्फ इस विचार में कि इसमें सादे के सिवाय उच्च क्या है? ढ़ूँढ़ते रह जाओगे.

खैर, यह सब छोड़ो. नसीब और सेहत अपनी अपनी. देखे हैं लोग जो बिन पान खाये मुख कैंसर से मरे और वो भी जो पान खाते खाते शान से शहनाई बजाते गये. दो दिल हैं तो हैं. जैसी लिखी होगी वैसी ही होगी-मान लो न!! ९९ फिसदी हिन्दुस्तान इसे मानता है.

फिल्म देखी, अंसल प्लाजा के ग्रेटर नोयडा स्थित बिग सिनेमा में. बिग याने इतना बिग कि क्या बतायें. नया बना है तो कोई था ही नहीं और जितना खाली, उतना बिग. हर तरफ जगह, जगह ही जगह.

देखते देखते फिल्म चालू हो गई..ढ़ाँय ढ़ाँय...न जाने क्या क्या..छत पर टायलेट..एक छत से दूसरी छत मिली हुई..जलेबी..रामलीला..पतंगबाजी, जवान सपने, इन्डियन आईडियल, दो भाईयों का बँटा घर फिर भी दीवार मे छेद से जुड़ा घर . हैण्ड पम्प से पानी भर टायलेट जाता अभिषेक फोन पर अटका हुआ, गाय बछड़े को जन्म देती हुई और उससे जुड़ी हमारी अंधविश्वासी धार्मिक आस्था, पाँच साल से सूखी तुलसी फिर एकाएक हरी भरी होती, कबूतर बाजी, गैंदा फूल ससुराल और फिर वही, जलेबी अछूत लड़की जिसे हर किसी में छूने की ललक. जाने क्या क्या.

न सिर न पैर और उस पर से थाना इंचार्ज दुबे जी (मानसून वेडिंग फेम)-एक मात्र ऐसा करेक्टर जो वाकई में हो सकता है.

विदेश-देश-सीन पर लादे हुए सीन तो ऐसे लादे कि न्यू यार्क में चाँदनी चौक दिखवाये दिये. पता नहीं कहाँ रामलीला हो रही थी कि सारे लोग चंद लोगों को पहचान रहे थे और उसी में ईद भी हो ली. जामा मज्जिद भी सज ली. संप्रदायिक झगड़े भी हो लिये. पुराने जमाने के हिन्दु मुस्लिम विवाह की वजह से देश त्यागा युगल और उसका घर लौटता बालक अभिषेक, सब कुछ की पैकेज डील और पैकेट खाली. गिफ्ट हैम्पर के बड़े बक्स टाइप. आखिर तक समझ ही नहीं आया कि आखिर दिखा क्या रहे हैं?

एक किरदार था जिसका नाम था गोबर. बिल्कुल नॉन रसूकदार एक आम आदमी सा.. रसूकदारों/ रईसों का मनोरंजन का साधन और जीवन यापन की जुगत में पगला सा बना जीवन काटता.

खैर, पूरी फिल्म में जिसने घुमाया वो था काला बन्दर. आखिर तक नहीं पकड़ाया. अगर अभिषेक नाटक में काला बंदर न बन कर पकड़ाता तो नोयडा के आरूषि केस टाईप लटक कर रह लेता काला बंदर और हम आदतानुसार भूल जाते उसे. जय हो अभिषेक तुम्हारी. तुम आरुषि केस के समय कहाँ थे? सुना है उस केस जो उगलवानी केपसूल थी नारको टेस्ट वाली डॉ मालिनी, वो बरखास्त हो गई है सबूतों से छेड़छाड़ करने के आरोप में अरे, उसी पर तो यह जिम्मा था कि सबूत उगलवाये और वो ही बरखास्त.

ये ही तो है:काला बंदर

खैर, काला बन्दर - अंत तक एनोनिमस रहा..और अब भी है. आगे भी रहेगा. उसका अस्तित्व शास्वत है झूठ की तरह हरदम सत्य पर विजय पाता. बस, समय समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज करता रहता है. कभी किसी ने समझा मुसलमान है. कभी किसी ने हिन्दु माना. सब आपस में लड़ते रहे और वो अफवाहों को दोनों तरफ से जन्म देता रहा, लोगों को लड़वाता रहा और पकड़ में आया गरीब-फेन्सी ड्रेस टाईप सजा अभिषेक. काला बन्दर था या हमारा नेता?

या कहीं वो हमारे ब्लॉगजगत के अनाम टिप्पणिकार तो नहीं?? उनका भी तो यही काम है और वो जब फेवर में बोले तो मन ही मन हम खुश और विरोध में जाये तो धमकी कि हिम्मत है तो खुल कर सामने आओ. आ भी जायेगा तो क्या कर लोगे मात्र मॉडरेशन की तलवार चलाने के?

अरे जलेबी, गोबर को अपने सर के बाल तो काट कर दे-अभी स्वाहा करते हैं इन अनाम महारज को!! जय हो..ओ..के....!!!!

(ऐसे ही एक स्वामी जी स्वाहा करने वाले थे काले बंदर को फिल्म में-गोबर से काले बंदर का बाल मंगवा कर जिसे जलेबी ने अपने सर से काट कर गोबर को दे दिये थे)