शनिवार, अक्तूबर 09, 2021

सिद्धांतवादी होना सरल नहीं है.

 

सुबह सुबह संदीप का फोन आया. कल रात उसके पिता जी को दिल का दौरा पड़ा है. अभी हालात नियंत्रण में है और दोपहर १२.३० बजे उन्हें बम्बई ले जा रहे हैं. वैसे तो सब इन्तजाम हो गया है मगर यदि २० हजार अलग से खाली हों तो ले आना. क्या पता कितने की जरुरत पड़ जाये? निश्चिंतता हो जायेगी. मैने हामी भर दी और कह दिया कि बस पहुँचता हूँ.

स्टेशन घर से आधे घंटे की दूरी पर है, फिर भी आदात के अनुसार मार्जिन रख कर सवा ग्यारह बजे ही स्कूटर लेकर निकल पड़ा.

चौक पार करने के बाद रेल्वे फाटक आता है. वहाँ गेट बंद मिला. छोटी लाइन की कोई ट्रेन गुजरने वाली है. शायद चार पाँच मिनट बाकी हो आने में. मगर लोग निर्बाध गेट के नीचे से अपने स्कूटर, साईकिल तिरछा करके झुककर निकले जा रहे थे. मानो कोई चार पाँच मिनट भी नहीं रुकना चाहता. फिर गेट बंद करने का तात्पर्य क्या है. अजब लोग हैं. जब घर से निकलते हैं तो कुछ समय तो अलग से क्यूँ नहीं रखते इस तरह की बातों के लिये. क्या पा जायेंगे कहीं पाँच मिनट पहले पहुँच कर?

कुछ तो सिद्धांत होने चाहिये.कुछ तो नियमों का पालन करना चाहिये.

इसी तरह के सिद्धांतवादी विचारों में खोया, मैं स्कूटर के हैंडल पर एक हाथ में अपनी ठुड्डी टिकाये मन ही मन अपने को जल्द निकल पड़ने की शाबाशी दे रहा था. अक्सर होता है ऐसा कि अपना सामान्य कार्य भी दूसरों की बेवकूफियों की वजह से प्रशंसनीय हो जाता है.

बाजू में आकर एक कार खड़ी हो गई. मैने कनखियों से देखा तो किसी संभ्रांत परिवार की कोई कन्या गाड़ी का स्टेरिंग थामे बैठी थी. उसके सन गॉगेल उसके तरतीब से झड़े रेशमी बालों पर आराम से बैठे थे मेरी ही तरह, निश्चिंत. मगर कन्या के चेहरे पर गेट बंद होने की खीझ स्पष्ट दिखाई दे रही थी. बार बार घड़ी की तरफ नजर डालती और फिर खीझाते हुए गेट की तरफ, पटरी पर जहाँ तक नजर जा सके, नजर दौड़ा लेती.

उसके चेहरे को देखकर मैं दावे से कह सकता हूँ कि अगर वो स्कूटर पर होती तो पक्का स्कूटर झुका कर निकल जाती. वो मात्र कार की मजबूरीवश रुकी थी और बाकी स्कूटर, साईकिल वालों को निकलता देख खीज रही थी. उसका सिद्धांतवादी होना मात्र मजबूरीवश है वरना तो कब का निकल गई होती. यह ठीक वैसे ही जैसे कितने ईमानदार सिर्फ इसलिये ईमानदार हैं कि कभी बेईमानी का सही मौका नहीं मिला.

 

इस बीच ट्रेन की सीटी दूर से सुनाई पड़ी. उसका चेहरा कुछ तनाव मुक्त सा होता दिखाई पड़ा. ट्रेन नजदीक ही होगी.

गेट के दोनों ओर भरपूर भीड़ इकट्ठा हो गई.

कुछ ही पलों में ट्रेन आ गई. एक एक कर डब्बे पार होने लगे. लाल हरे नीले पीले कपड़े पहने यात्रियों से भरी रेल. धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी.

उसकी कार ऑन हो गई. मैने भी बैठे बैठे ही स्कूटर में किक मारा और चलने को तैयार हो गया.

एकाएक आधी पार होने के बाद ट्रेन रुक गई. पाँच सात मिनट तक तो कुछ पता चला नहीं, फिर पता चला कि इंजन में कुछ खराबी हुई है. जल्द ही चल देगी.

स्कूटर बंद. कार बंद.खीज के भाव कन्या के चेहरे पर वापस पूर्ववत.

समय तो जैसे उड़ने लगा. देखते देखते ३० मिनट निकल गये. अब तो झुक कर भी नहीं जाया जा सकता था. एक तो ठसाठस भीड़ और उस पर से बीच में खड़ी ट्रेन. इन्तजार के सिवाय और कोई रास्ता नहीं. पीछॆ मुड़ना भी वाहनों की भीड़ से पटी सड़क पर संभव नहीं.

जिस खीज के भाव का अब तक मैं कन्या के चेहरे पर अध्ययन करके प्रसन्न हो रहा था, वही अब मेरे चेहरे पर आसन्न थे.

क्या सोच रहा होगा संदीप? खैर, अभी भी थोड़ा समय है, पहुँच कर समझा दूँगा.

४०-४५ मिनट बाद ट्रेन बढ़ी. गेट खुला. दोनों तरफ से टूट पड़ी भीड़ से ट्रेफिक जाम. किसी तरह उल्टी तरफ से निकलते हुए जैसे ही मैं स्टेशन पहुँचा, ट्रेन सामने से जा रही थी. आखिरी डिब्बा दिखा बस!!

मैं सोचने लगा कि इससे बेहतर तो मैं गेट के नीचे से ही निकल पड़ता. आखिर, जब मजबूरी में फँसा तब उल्टी ट्रेफिक में घुस कर निकला ही. कौन सा ऐसा तीर मार लिया सिद्धांतों को लाद कर. विषम परिस्थितियों में भी सिद्धांतों का पालन करता तो कोई बात होती. सामान्य समय में तो कोई भी कर सकता है. सिद्धांतवादी होना सरल नहीं है.

बाद में पता चला कि संदीप के पिता जी नहीं रहे. बम्बई में ही उन्होंने दम तोड़ दिया. उनके बड़े भाई का परिवार वहीं रहता था तो अंतिम संस्कार भी वहीं कर दिया गया. संदीप ने मुझसे फिर कभी बात नहीं की. मुझे बतलाने का मौका भी नहीं दिया कि क्या हुआ था.

काश, मैं उस वक्त अपने सिद्धांतों को दर किनार कर गेट से नीचे से भीड़ का हिस्सा बन निकल गया होता, तो संदीप आज भी मेरा दोस्त होता.

समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार ऑक्टोबर 10, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/63652133

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रविवार, अक्तूबर 03, 2021

आप व्यंग्यकार हैं- इसमें व्यंग्य कहाँ है?

 



दफ्तर से घर लौट रहा हूँ. स्टेशन पर ट्रेन से उतरता हूँ. गाड़ी करीब ५ मिनट की पैदल दूरी पर खुले आसमान के नीचे पार्क की हुई है. थोड़ी दूर पार्क करके इस ५ मिनट के पैदल चलने से एक मानसिक संतोष मिलता है कि ऐसे तो पैदल चलना नहीं हो पाता, दिन भर भी तो दफ्तर में अपनी सीट में धंसे बैठे ही रहते हैं, कम से कम इसी बहाने चल लें. नहीं से हाँ भला. सेहत के लिये अच्छा होगा. दिल के एक कोने में खुद को हँसी भी आती है कि भला ५ मिनट सुबह और ५ मिनट शाम पैदल चलने से इस काया पर क्या असर होने वाला है मगर खुद को साबित करने के लिये उस हँसी को उसी कोने में दमित कर देता हूँ, जहाँ से वो उठी थी. सब मन का ही खेला है. अच्छा लगता है.

जब कार पास में खड़ी करता था, तब मन को समझाता था कि चलो, इसी बहाने शरीर को आराम मिलेगा. सुबह सोचता कि दिन भर तो खटना ही है और शाम सोचता कि दिन भर खट कर आ रहे हैं. अच्छा है पास में पार्क की. व्यक्ति हर हालत में अपना किया सार्थक साबित कर ही लेता है. अच्छा लगता है.

आज जब स्टेशन पर उतरा तो एकाएक बारिश शुरु हो गई. वहीं वेटिंग एरिया में रुक कर बारिश रुकने की प्रतिक्षा करने लगा. छाता आज लेकर नहीं निकला था और इस बारिश का देखिये. रोज छाता लेकर निकलता हूँ, तब महारानी गायब रहती हैं. आज एक दिन लेकर नहीं निकला तो कैसी बेशरमी से झमाझम बरस रही हैं. मानो मुँह चिढा रही हो.

कोई बच्चा तो हूँ नहीं कि बारिश की इस अल्हड़ता पर खुश हो लूँ. स्वीकार कर लूँ उसका नेह निमंत्रण. लगूँ भीगने. नाचूँ दोनों हाथ फेलाकर. माँ कितना भी चिल्लाये, अनसुना कर दूँ कि तबीयत खराब हो जायेगी. barishबस बरसात में उभर आए छोटी छोटी छ्पोरों के पानी में छपाक छपाक करुँ , आज पास खड़ी लड़कियों को छींटों से भिगाऊं और कागज की नाँव बना कर बहाने लगूँ. मैंढ़क पकड़ कर शीशी में रख लूँ. लिजलिजे से केंचुऐं पकड़ लूँ , वो पहाड़ के नीचे वाले बड़े नाले में से आलपिन से गोला बना कर मछली अटकाने के लिये.

हम्म!! ये सब तो बच्चे करते हैं. मैं तो बड़ा हूँ. पानी रुक जाने पर ही पोखरे बचाते हुए धीरे धीरे संभल कर कार तक जाऊँगा. कल फिर से तो दफ्तर जाना है. वो दफ्तर वाले थोड़ी न समझेंगे कि बारिश देखकर मैं बच्चा बन गया और लगा था भीगने. न, मैं नहीं भीगने वाला.

बहुत गुस्सा आ रहा है बारिश पर, बादलों पर, मौसम पर. क्यूँ मुझे बच्चा बनाने पर तुले हैं. वैसे मन के एक कोने में यह भी लग रहा है कि फिर से बच्चा बन जाने में मजा तो बहुत आयेगा. मगर अब कहाँ संभव यह सब. इसलिये यह विचार त्याग कर सोचने लगता हूँ कि कैसे जान लेते हैं ये कि आज मैं छतरी नहीं लाया. दिन भर बरस लेते, कम से कम मेरे आने के समय तो ५ मिनट चैन से रह लेते. मगर इन्हें इतनी समझ हो, तब न! मैं भी किन मूर्खों को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ.

फिर अपनी खीझ उतार कर चुपचाप बारिश रुकने का इन्तजार कर रही भीड़ का हिस्सा बन जाता हूँ. यूँ भी तो ज्यादा जिंदगी भीड़ का हिस्सा बने ही तो गुजर रही है सबकी. जब आप आप नहीं होते बस एक भीड़ होते हैं. तब आप अपने मन की नहीं करते जो भी करते हैं या तटस्थ भीड़ शामिल रहते हैं, वो ही तो भीड़ की मानसिकता कहलाती है. उस वक्त तो सब जायज लगता है.

अपनी गलती कौन मानता है कि छाता लेकर निकलते तो इन्तजार न करना पड़ता. मुझे तो सारी गलती बारिश, बादल और मौसम की ही लगती है. अच्छा लग रहा है अपनी खीझ उतार कर.

बस, इसी अच्छा लगने की तलाश में हर जतन जारी है. टूटी और जर्जर सड़क का जुड़ा हिस्सा देखना आज पॉजिटिव थिंकिंग का बड़ा अध्याय है.

पता नहीं क्यूँ, कार में बैठते ही मैथिली की यह कजरी झूम झूम के गाने का मन करने लगा, सीट पर बैठे बैठे थोड़ा सा नाच भी लेता हूँ, कोई देख नहीं रहा. अच्छा लग रहा है:

बदरा उमरी घुमरी घन गरजे

बूँदिया बरिसन लागे न.....

किसी ने पूछा ये क्या लिखा है आपने- आप व्यंग्यकार हैं- इसमें व्यंग्य कहाँ है? अच्छा लगने की तलाश ही तो पूरा व्यंग्य है- जिसमें देश डूबा है और मानवता अपना अंश तलाश रही है.

इससे ज्यादा तो मुझे लिखना ही नहीं आता.

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के सोमवार ऑक्टोबर 04, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/63519786


शनिवार, सितंबर 25, 2021

क्या इंतजाम करके गए बिरजू दद्दा

 


किसान है बिरजू..तो तय है परेशान तो होगा ही..मरी हुई फसलें और उनके चलते सर पर चढ़े बैंक के लोन का बोझ..उसे पता है उसके साथी किसान आंदोलनरत हैं कि शायद कल हालात कुछ बेहतर हों मगर उसके लिए भी तो कल तक जीने के साधन होना चाहिए जो बिरजू के पास अब कहाँ हैं.. वो तो आज कैसे गुजारे, यही नहीं समझ पा रहा है.

वो अक्सर सोचता कि उसके साथी जो पिछले साल भर से आंदोलन पर बैठे हैं, उनका घर कैसे चल रहा होगा? चल तो रहा ही है मगर वो खुद एक साल आंदोलन तो क्या, एक दिन घर भी नहीं बैठ सकता. फिर उसे संसद में बैठे गरीबों के नेताओं का ख्याल आया. तब जाकर उसे तसल्ली हुई कि आंदोलन पर किसानों के नेता बैठे हैं. न कभी गरीबी दूर हुई और न कभी किसानों कि समस्या दूर होने वाली है.  

उसकी परेशानी भी ऐसी वैसी नहीं है..उस सीमा तक की है कि बिरजू जान गया था अब आत्म हत्या के सिवाय कोई विकल्प बाकी नहीं बचा है.

वो सुबह सुबह उठा, पत्नी और बच्चों को सोते में ही देखकर मन के भीतर भीतर माफी माँगते हुए अहाते में लगे पेड़ पर रस्सी से फंदा बना कर लटक गया..आज वो मुक्त हो जाना चाहता था हर दायित्व से और हर उस कर्ज के बोझ से..जिसके नीचे दबा वो जिन्दा तो था पर साँस न ले पाने को मजबूर.. मगर किस्मत जब साथ न हो तो मौत भी धोखा दे जाती है. पेड़ की टहनी कमजोर थी...जामुन के पेड़ में भला ताकत ही कितनी होती है कि उसका वजन ले पाती..कर्ज में डूबा था मगर था तो मेहनती किसान ही. टहनी टूट गई और वो धड़ाम से गिरा जमीन पर..

कहते हैं गिरना हमेशा एक सीख देकर जाता है..तो भला वो कैसे अछूता रह जाता...

वो जान गया है कि सदियाँ बीत जायेंगी मगर हालात नहीं बदलेंगे..किसान आज भी भले कहलाता अन्नदाता है मगर परिस्थितियाँ यूँ हैं कि आत्म हत्या को मजबूर है..ये कल भी यूं ही था और कल भी यूं ही रहेगा..

एकाएक वो उठा और घर में बचे सारे पैसे लेकर निकल पड़ा बस पकड़ कर शहर की तरफ...

शाम जब देर से लौटा तो उसके पास सागौन के पेड़ के बीज थे..

कल वो अहाते से जामुन का पेड़ उखाड़ फेकेगा...और बोयेगा सागौन का बीज..

वो जानता है कि वो बीज अगले ५० साल बाद में जाकर परिपक्व मजबूत पेड़ बनेगा सागौन का..

मगर वो यह भी जानता है कि अगले ५० साल बाद भी हालात न बदलेंगे और उसकी आने वाली पीढियाँ भी उसी की तरह अन्नदाता कहलाती हुई किसी पेड़ से लटक कर आत्म हत्या करने को अभिशप्त होंगी..

बस अब वो यह नहीं चाहता कि उसकी आने वाली पीढ़ियाँ भी उसी की तरह कम से कम आत्म हत्या कर इस जीवन से मुक्त हो जाने में धोखा न खायें..

बाकी तो हर तरफ धोखा खाना किसान होने के कारण उसकी नियति है ही..

आज वो खुश है कि चन्द दशकों में उसके अहाते में सागौन का एक मजबूत पेड़ खड़ा होगा सीना ताने..

वो तो न होगा तब उस पेड़ को देखने के लिए..मगर उसकी आने वाली नस्लें जब पेड़ पर से लटक कर आत्म हत्या करेंगी तो उसे जरूर याद करेंगी कि क्या इंतजाम करके गये हैं बिरजू दद्दा..

-समीर लाल ’समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार सितंब 26, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/63350620


रविवार, सितंबर 05, 2021

अनुभव की बहुत कीमत होती है

 


पहली बार किसी फाईव स्टार होटल में घुसने का मौका था एक दोस्त के साथ.

तय हुआ था कि एक एक कॉफी पी जायेगी. एक कोई वहाँ बिल और १०% टिप देगा. बाहर आकर आधा आधा कर लेंगे. इसी बहाने फाईव स्टार घूम लेंगे.

छात्र जीवन था. बम्बई में पढ़ रहे थे. एक जिज्ञासा थी कि अंदर से कैसा रहता होगा फाईव स्टार. छोटे शहर के मध्यम वर्गीय परिवार से आये हर बालक के दिल में उस जमाने में ऐसी जिज्ञासायें कुलबुलाया करती थीं.

बम्बई से जब घर जाया करते थे तो वहाँ रह रहे मित्रों के सामने अमिताभ बच्चन वगैरह के नामों को इग्नोर करना बड़ा संतुष्टी देता था जैसे उनसे बम्बई में रोज मिलते हों और उनका कोई आकर्षण हममें शेष नहीं बचा है. यथार्थ ये था कि एक बार दर्शन तक नहीं हो पाये थे तब तक.

खैर बात फाईव स्टार की हो रही थी. होटल तय हुआ ताज. दोपहर से ही दो बार दाढ़ी खींची. सच कहता हूँ डबल शेव या तो उस दिन किया या अपनी शादी के दिन.. बस!!! सोचिये, दिलो दिमाग के लिए कितना बड़ा दिन रहा होगा.

अपनी सबसे बेहतरीन वाली सिल्क की गहरी नीली कमीज, जो अमिताभ नें मिस्टर नटवर लाल में पहनी थी, वो प्रेस करवाई. साथ में सफेद बेलबॉटम ३४ बॉटम वाला. जवानी का यही बहुत बड़ा पंगा है कि आदमी यह नहीं सोचता कि उस पर क्या फबता है. खुद का रंग रुप कैसा है. वो यह देखता है कि फैशन में क्या है. जब तक यह अच्छा बुरा समझने की समझ आती है, तब तक इसका असर होने की उमर जा चुकी होती है. दोनों तरफ लूजर.

४५ साल तक सिगरेट पीते रहे और फिर छोड़ कर ज्ञान बांटने लगे कि सिगरेट पीना अच्छा नहीं. मगर उससे होना क्या है, जितनी बैण्ड लंग्स की बजनी थी, बज चुकी. अब तो दुर्गति की गति को विराम देने वाली ही बात शेष है.

खैर, शाम हुई. हाई हील के चकाचक पॉलिश किये हुए जूते पहनें हम चले फाईव स्टार-द ताज!!!

चर्चगेट तक लोकल में गये और फिर वहाँ से टेक्सी में. ४-५ मिनट में पहूँच गये. दरबान नें दरवाजा खोला. ऐसा उतरे मानो घंटा भर के बैठे टेक्सी में चले आ रहे हैं. दरबान के सलाम को कोई जबाब नहीं. बड़े लोगों की यही स्टाईल होती है, हमें मालूम था.

सीधे हाथ हिलाते फुल कान्फिडेन्स दिखाने के चक्कर में संपूर्ण मूर्ख नजर आते (आज समझ आता है) लॉबी में. और सोफे पर बैठ लिए. मन में एक आशा भी थी कि शायद कोई फिल्म स्टार दिख जायें. नजर दौड़ाई चारों तरफ. लगा मानो सब हमें ही घूर रहे हैं. यह हमारे भीतर की हीन भावना देख रही थी शायद. मित्र नें वहीं से बैठे बैठे रेस्टॉरेन्ट का बोर्ड भांपा और हम दोनों चल दिये रेस्टॉरेन्ट की तरफ.

अन्दर मद्धम रोशनी, हल्का मधुर इन्सट्रूमेन्टल संगीत और हम दोनों एक टेबल छेक कर बैठ गये. मैने सोचा यहाँ तक आ ही गये हैं तो बाथरुम भी हो ही लें. बोर्ड भी दिख गया था, दोस्त को बोल कर चला गया.

अंदर जाते ही एक भद्र पुरुष सूटेड बूटेड मिल गये. नमस्ते हुई और हम आग्रही स्वभाव के, कह बैठे पहले आप हो लिजिये. वो कहने लगे नहीं सर, आप!! बाद में समझ आया कि वो तो वहाँ अटेडेन्ट था हमारी सेवा के लिए. हम खामखाँ ही फारमेल्टी में पड़ लिए. बाद में वो कितना हँसा होगा, सोचता हूँ तो आज भी शर्म से लाल टाईप स्थितियों में आ जाता हूँ.

वापस रेस्टॉरेन्ट में आये, तब तक हमारे मित्र, जरा स्मार्ट टाईप थे उस जमाने में, कॉफी का आर्डर दे चुके थे.

कॉफी आई तो आम ठेलों की तरह हमारा हाथ स्वतः ही वेटर की तरफ बढ़ गया आदतानुसार कप लेने के लिए और वो उसके लिए शायद तैयार न रहा होगा तो कॉफी का कप गिर गया हमारे सफेद बेलबॉटम पर. वो बेचारा घबरा गया. सॉरी सॉरी करने लगा. जल्दी से गीला टॉवेल ला कर पौंछा और दूसरी कॉफी ले आया. हम तो घबरा ही गये कि एक तो पैर जल गया, बेलबॉटम अलग नाश गया और उस पर से दो कॉफी के पैसे. मन ही मन जोड़ लिए. सोचे कि टिप नहीं देंगे और पैदल ही चर्चगेट चले जायेंगे तो हिसाब बराबर हो जायेगा. अबकी बारी उसे टेबल पर कप रख लेने दिये, तब उसे उठाये.

बाद में उसने फिर सॉरी कहा और बताया कि कॉफी इज ऑन द हाऊस. यानि बिल जीरो. आह!! मन में उस वेटर के प्रति श्रृद्धाभाव उमड़ पड़े. कोई और जगह होती तो पैर छू लेते मगर फाईव स्टार. टिप देने का सवाल नहीं था क्यूँकि नुकसान हुआ था सो अलग मगर जीरो का १०% भी तो जीरो ही हुआ. तब क्या दें?

चले आये रुम पर गुड नाईट करके उसे, दरबान को और टैक्सी वाले को. कॉफी का दाग तो खैर वाशिंग पाउडर निरमा के आगे क्या टिकता. ५० पैसे के पैकेट में बैलबॉटम फिर झकाझक सफेद.

फिर तो कईयों को फाईव स्टार घुमवाये. एक्सपिरियंस्ड होने के कारण हॉस्टल में हमारे जैसे शहरों और परिवेष से आये लोग अपना अनुभव बटोरने के लिए हमारा बिल पे करते चले गये.

अनुभव की बहुत कीमत होती है, हमने तभी जान लिया था.

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार सितम्बर 5, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/62932596

 

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शनिवार, अगस्त 21, 2021

जब जबाब न सूझे, तो खिसक लो!!

 

जब जबाब न सूझे, तो खिसक लो!!

मैने देखा है जो चुप रहता है और सीधा होता है, उसका फायदा सब लोग उठाते हैं. अब जरा सी आत्मा, बेचारा चूहा, क्या हालत कर डाली है सबने उसकी. कहाँ तो गजब का मान सम्मान था. गणेश जी तक उस पर बैठ कर सवारी करते थे. हर समय लड्डू के पास बैठा कर रखते थे कि जितना खाना है खाओ. उसके नाम लेकर शेर लिखे जाते थे: मूषक वाहन गजानना बुद्धिविनायक गजानना।.. और एक आज का समय आया है. अब गणेश जी भी यात्रा पर कम ही निकलते हैं और जब कभी कहीं जाना भी हो, तो ऐसा माहौल है कि बिना बुलेट प्रूफ गाड़ी में निकल ही नहीं सकते. चूहा वहाँ से भी बरखास्त! बस पुरानी फोटूओं में उनके साथ दिख जाता है.

सिर्फ पूजा का सामान बन गया है. वैसे भी आज के जमाने में, जो भी कभी बड़े काम का रहा हो या बड़े नाम का रहा हो, जब किसी काम का नहीं रह जाता तो उसे पूजनीय घोषित कर सलाहकार मंडल में किनारे बैठा देने का रिवाज है. इस तरह का प्रयोग राजनीति में तो खूब होता है.

अखबार पढ़ता हूँ कि मेडिकल साईंस में बड़ी रिसर्च चल रही है. परिक्षण सफल रहा. चूहे पर किया गया. चूहा बच गया. जिस तरह उसका व्यवहार होना चाहिये था, वैसा ही हुआ परिक्षण के बाद. वो स्वस्थ है इसलिये अब उसको मार दिया जायेगा. उसकी अब उपयोगिता नहीं रही क्योंकि उसके शरीर में उस दवा की गुणधर्मिता आ गई है. अब उन परिणामों के आधार पर मरते हुए तुम, फिर से सेहतमंद होकर जी सकोगे. अगले परिक्षण के लिये दूसरे नये चूहे पकड़ कर लाये जायेंगे. न तो रोग खत्म हुये जा रहे हैं और न ही शोध. चूहों पर परिक्षण और उनको मारा जाना जारी रहेगा.

लेकिन जो चुप रहता है, उसे कमजोर न समझो. वो जब बोलता है न!! तब जबाब देना भारी हो जाता है. चुप रहने वाला विचारक होता है और विचारक के तर्कों का तो तुम्हारे पास यूँ भी जबाब नहीं होता.

तो सुनो, बताओ!! आज चूहा पूछता है कि "आखिर उसकी ही ऐसी क्या खता है जो उसे तुम अपने परिक्षण का साधन बनाये हो और फिर मार देते हो? क्या तुम्हें और कोई नहीं मिलता?"

तुम्हारे पास कुछ देर तक बहस करने की शक्ति तो हमेशा रही है जिसके आधार पर तुम अपना गलत सही सब सिद्ध करने की कोशिश करते हो. तुम उस चूहे को भी जबाब देने लगते हो, अपने बड़े बड़े सुने हुये तर्कों के साथ:

क्यूँ न करें तुम पर परिक्षण? क्यूँ न मारे तुमको? तुम और हो किस काम के?

तुम जिस गोदाम में घुस जाओ, वहाँ का सारा अनाज खा जाओ. पूरे देश को खोखला कर डाल रहे हो. तुम्हारे पास कोई काम नहीं, सिवाय नुकसान करने के और अपनी जमात बढ़ाने के. बिना सोचे समझे बच्चे पैदा करते जाते हो. हर तरफ बस गन्दगी फैलाते हो. जहाँ से गुजर जाओ, पूरा माहौल खराब कर दो. बदबू ही बदबू. तुम्हें पकड़ने के लिये लोग पिंजड़ा लगाते है, तुम बच निकलते हो. जो भी जाल बिछा लो, तुम्हें उसे कुतर कर बच निकलने के सब गुर मालूम हैं. अरे, तुम खुद बच कर निकल लो तब भी ठीक. तुम तो जिस पर अपनी उदार नजर रख दो, उसे तक जाल कुतर कर छुड़ा ले जाते हो. तुम बस चेहरे से भोले लगते हो, अंदर से कुछ और ही हो. बिल्ली तक को चकमा देकर निकल जाना तुम्हारे बायें हाथ का खेल है. तुम तो पूरे समाज के लिये घातक हो. दफ्तर की जरुरी जरुरी फाईलें तक कुतर डालते हो. न जाने कितने साक्ष्य मिटा डाले इस तरह तुमने, कुछ पता भी है.कई बार तो लगने लगता है कि तुम भ्रष्ट नौकरशाहों और क्रिमनल्स के लिये कमीशन पर काम करते हो. अरे, हमने तो यह तक देखा है कि जब माड लगा तिरंगा झंडा गणतंत्र दिवस पर फहरने के बाद स्वतंत्रता दिवस के लिये लपेट कर रखा गया, तब तुम उसे तक कुतर गये. राष्ट्र के सम्मान का जरा भी ख्याल नहीं. तुम देशद्रोही हो. तुम महामारी फैलाते हो. (शायद यह प्लेग की बात की है)!!!

चूहा तुम्हारी हर बात को गौर से सुन रहा है चुपचाप. जो चुप रहते हैं न! वो बहुत समझ कर और गौर से सुनते हैं. लो, अब वो चूहा कह रहा है:

वही तो!! फिर हम को ही क्यूँ. नेताओं को क्यूँ नहीं पकड़ते. उन पर क्यूँ नहीं करते यही परिक्षण और सफल होने के बाद उन्हें क्यूँ नहीं मार देते. तुमने जितने भी कारण गिनाये हैं, बताओ तो जरा, उनमें से कौन सा इन नेताओं में नहीं है? अरे! हम जो महामारी फैलाते हैं न प्लेग की. वो तो एक गाँव या ज्यादा ज्यादा एक शहर में सीमित होकर रह जाती है. और ये तुम्हारे नेता!! ये जो महामारी फैला रहे हैं-भ्रष्टाचार की, संप्रदायिकता की, धर्म के नाम पर बँटवारे की-वो तो पूरे राष्ट्र को संक्रमित कर रही है. कोई भी इस संक्रमण की चपेट से नहीं बच पा रहा है. न तो इसका कोई इलाज है, न दवा!!

हर गली कूचे से लेकर, ब्लॉक से शहर तक, प्रदेश से राष्ट्रीय स्तर तक हर जगह ये बहुतायत में हैं. पकड़ो न इन्हें!!! करो न परिक्षण!! मारो न इन्हें. हम लिख कर दे सकते हैं कि हमारी प्रजाति तो खत्म हो सकती है, मगर ये तुम्हें अपनी उपलब्धता की कमी का एहसास कभी न होने देंगे. हम छोटे से प्राणी, कितना अन्न खा जायेंगे, कितना बिगाड़ कर लेंगे.

अब तुम्हारे पास जबाब नहीं है. बहस तो शुरु कर ली, पूरा ज्ञान एक ही बारी में उलट कर रख दिया और अब खिसकने का रास्ता देख रहे हो!! खिसको..खिसको!! यही तुम्हारी फितरत है. जब जबाब न सूझे, तो खिसक लो!!

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अगस्त 22, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/62618353

 


मंगलवार, अगस्त 17, 2021

मोटापे को साजिशन बदनाम किया जा रहा है!!

 

अजीब दो गले लोग हैं. एक तरफ तो कहते हैं, प्रगति होना चाहिये- चहुंमुखी प्रगति एवं सर्वांगीण विकास. इंडिया उदय और न जाने क्या क्या नारे. अब जब विकास की राह पर हम इसका अक्षरशः पालन करने लगे तो कहते हैं कि मोटापा हानिकारक है. यार, हम क्या करें. हम तो मानो फँस कर रह गये. सुनो तो बुरे बनो, न सुनो तो बुरे. इससे अच्छा तो हम नेता होते तो ही ठीक था. सुन कर भी हर बात अनसुनी कर देते. देख कर अनदेखा कर देते.

अब तो हमारे अड़ोसी पड़ोसी भी हमको मोटा कहने में नहीं सकुचाते. ये नहीं जानते हैं, कि कभी हमें बचपन में इनके ही माँ बाप अपनी गोद में लेकर हमारे गाल नोचते थे. मोटे हम तब भी थे. मगर तब सब हमें हैल्दी बेबी, क्यूट, गबदू बाबा और न जाने क्या क्या कह कह कर प्यार करते थे, आज उनकी ही औलाद इतना बदल गई है. मोटा कहते हैं. जमाने की हवा के साथ बह गये हैं सब. जब भी किसी मोटे की बात चलती है, तब कहते हैं, इनसे ज्यादा मोटा है कि कम. मानो कि हम हम नहीं, मोटापे के मानक हो गये..

वैसे इन्हीं लोगों को जब जरुरत पड़ती है, तो इन्हें ही हम महान नजर आने लगते हैं. उस दिन भाई जी और भाभी जी का ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं था, तो हमें ही ट्रेन में सीट घेरने के लिए भेजा था. हम अकेले ही दो सीट घेर लिये थे. फिर यह लोग आए और बड़े आराम से यात्रा करते निकल गये और चलते चलते हमें हिदायत दे गये कि वजन कुछ कम करो. अरे, अगर उनके जैसा वजन होता तो दो लोग लगते उन दोनों के लिये सीट घेरने के लिये और फिर भी शायद कोई वजनदार आकर धमका कर खाली करा लेता. एक तो इनका काम अकेले दम करो और फिर नसीहत बोनस में सुनों. अजब बात है.

इन्हें मोटा होने के फायदों का अंदाज नहीं है. अज्ञानी हैं!! मूर्खता की जिंदा नुमाईश! अरे, मोटा आदमी हंसमुख होता है. वो गुस्सा नहीं होता. आप ही बतायें, कौन बुढ़ा होना चाहता है इस जग में? मोटा आदमी बुढ्ढा नहीं होता (अगर शुरु से परफेक्ट मोटा हो तो बुढापे के पहले ही नमस्ते हो जाती है न!!) वो बदमाश नहीं होता. बदमाशों को पिटने का अहसास होते ही भागना पड़ता है और मोटा आदमी तो भाग ही नहीं सकता, इसलिये कभी बदमाशी में पड़ता ही नहीं.

नादान हैं सब, मुझे उनसे क्या!! मैं तो देश की समृद्धि और उन्नति का चलता फिरता विज्ञापन हूँ और मुझे इस पर नाज है.

दुबला पतला सिकुड़ा सा आदमी, न सिर्फ अपनी बदनामी करता है बल्कि देश की भी. मैने ऐसे लोगों की पीठ पीछे लोगों को बात करते सुना है. कहते हैं, न जाने कहाँ से भूखे नंगे चले आते हैं. मुझसे से मेरी पीठ पीछे भी कोई ऐसा कहे, यह बरदाश्त नहीं. हम तो मोटे ही ठीक हैं. अरे, अपना नहीं तो कम से कम अपने देश की इज्जत का तो ख्याल रखा करो.

जिस तरह से महानगरों के कुछ क्षेत्रों में प्लाई ओवर, मॉल, कॉल सेंटर आदि की जगमगाहट को राष्ट्र का विकास का नाम देकर भ्रमित किया जाता है. ठीक उसी तरह दूसरों को मोटापे से ताकतवर होने का भ्रम होता है, भले अंदुरीनी स्थितियाँ, राष्ट्र की तरह ही, कितनी भी जर्जर क्यूँ न हो. भ्रम में ही सही, एक बार को सामने वाला डरता तो है. दुबलों से तो भूलवश भी आदमी नहीं डरता और बिना डराये कौन सा काम हो पाता है.

मुझे मोटापे से कोई शिकायत नहीं है, मगर मोटापे को साजिशन बदनाम होता देखता हूँ तो दिल में एक टीस सी उठ जाती है. वही हाल विकास का है. साजिश कि चपेट में कितना बदनाम हुआ जा रहा है बेचारा!!

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के मंगलवार  अगस्त 17, 2021 के अंक में:


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रविवार, अगस्त 08, 2021

जिन्दगी जिस ढर्रे पर चलती थी, वैसे ही चल रही है

किसी का मर जाना उतना कष्टकारी नहीं होता जितना की उस मर जाने वाले के पीछे उसी घर में छूट जाना.

जितने मूँह, उतने प्रश्न, उतने जबाब और उतनी मानसिक प्रताड़ना.

सुबह सुबह देखा कि बाबू जी, जो हमेशा ६ बजे उठ कर टहलने निकल लेते है, आज ८ बज गये और अभी तक उठे ही नहीं. नौकरानी चाय बना कर उनके कमरे में देने गई तो पाया कि बाबू जी शान्त हो गये हैं. इससे आप यह मत समझने लगियेगा कि पहले बड़े अशान्त थे और भयंकर हल्ला मचाया करते थे. यह मात्र तुरंत मृत्यु को प्राप्त लोगों का सम्मानपूर्ण संबोधन है कि बाबू जी शांत हो गये और अधिक सम्मान करने का मन हो तो कह लिजिये कि बाबू जी ठंड़े हो गये.

बाबू जी मर गये, गुजर गये, नहीं रहे, मृत्यु को प्राप्त हुये, स्वर्ग सिधार गये, वैकुण्ठ लोक को प्रस्थान कर गये आदि जरा ठहर कर और संभल जाने के बाद के संबोधन हैं.

बाबू जी शांत हो गये और अब आप बचे हैं तो आप बोलिये. रिश्तेदारों को फोन कर कर के. आप बताओगे तो वो प्रश्न भी करेंगे. जिज्ञासु भारतीय हैं अतः सुन कर मात्र शोक प्रकट करने से तो रहे.

जैसे ही आप बताओगे वैसे ही वो पूछेंगे- अरे!! कब गुजरे? कैसे? अभी पिछले हफ्ते ही तो बात हुई थी... तबीयत खराब थी क्या?

तब आप खुलासा करोगे कि नहीं, तबीयत तो ठीक ही थी. कल रात सबके साथ खाना खाया. टी वी देखा. हाँ, थोड़ा गैस की शिकायत थी इधर कुछ दिनों से तो सोने के पहले अजवाईन फांक लेते थे, बस!! और आज सुबह देखा तो बस...(सुबुक सुबुक..)!!

वो पूछेंगे- डॉक्टर को नहीं दिखाया था क्या?

अब आप सोचोगे कि क्या दिखाते कि गैस की समस्या है? वो भी तब जब कि एक फक्की अजवाईन खाकर इत्मिनान से बंदा सोता आ रहा है महिनों से.

आप को चुप देख वो आगे बोलेंगे कि तुम लोगों को बुजुर्गों के प्रति लापरवाही नहीं बरतना चाहिये. उन्होंने कह दिया कि गैस है और तुमने मान लिया? हद है!! हार्ट अटैक के हर पेशेंट को यहीं लगता है कि गैस है. तुम से ऐसी नासमझी की उम्मीद न थी. बताओ, बाबूजी असमय गुजर गये बस तुम्हारी एक लापरवाही से. खैर, अभी टिकिट बुक कराते है और कल तक पहुँचेंगे. इन्तजार करना.

ये लो- ये तो एक प्रकार से उनकी मौत की जिम्मेदारी आप पर मढ दी गई और आप सोच रहे हो कि  असमय मौत- बाबू जी की- ९२ वर्ष की अवस्था में? तो समय पर कब होती- आपके जाने के बाद?

अब खास रिश्तेदारों का इन्तजार अतः अंतिम संस्कार कल. आज ड्राईंगरुम का सारा सामान बाहर और बीच ड्राईंगरुम में बड़े से टीन के डब्बे में बरफ के उपर लेटा सफेद चादर में लिपटा बाबू जी का पार्थिव शरीर और उनके सर के पास जलती ढेर सारी अगरबत्ती और बड़ा सा दीपक जिसके बाजू में रखी घी की शीशी- जिससे समय समय पर दीपक में घी की नियमित स्पलाई ताकि वो बुझे न!! दीपक का बुझ जाना बुरा शगुन माना जाता था भले ही बाबू जी बुझ गये हों. अब और कौन सा बुरा शगुन!!

अब आप एक किनारे जमीन पर बैठने की बिना प्रेक्टिस के बैठे हुए- आसन बदलते, घुटना दबाते, मूँह उतारे कभी फोन पर- तो कभी आने जाने वाले मित्रों, मौहल्ला वासियों और रिश्तेदारों के प्रश्न सुनते जबाब देने में लगे रहते हैं, जैसे आप आप नहीं कोई पूछताछ काउन्टर हो!!

वे आये -बाजू में बैठे और पूछने लगे एकदम आश्चर्य से- ये क्या सुन रहे हैं? मैने तो अभी अभी सुना कि बाबू जी नहीं रहे? विश्वास ही सा नहीं हो रहा.

आप सोच रहे हो कि इसमें सुनना या सुनाना क्या? वो सामने तो लेटे हैं बरफ पर. कोई गरमी से परेशान होकर तो सफेद चादर ओढ़कर बरफ पर तो लेट नहीं गये होंगे. ठीक ही सुना है तुमने कि बाबू जी नहीं रहे और जहाँ तक विश्वास न होने की बात है तो हम क्या कहें? सामने ही हैं- हिला डुला कर तसल्ली कर लो कि सच में गुजर गये हैं कि नहीं तो विश्वास स्वतः चला आयेगा.

दूसरे आये और लगे कि अरे!! क्या बात कर रहे हो – कल शाम को ही तो नमस्ते बंदगी हुई थी... यहीं बरामदे में बैठे थे...

अरे भई, मरे तो किसी समय कल रात में हैं, कल शाम को थोड़े... और मरने के पहले बरामदे में बैठना मना है क्या?

फिर अगले- भईया, कितना बड़ा संकट आन पड़ा है आप पर!! अब आप धीरज से काम लो..आप टूट जाओगे तो परिवार को कौन संभालेगा. उनका कच्चा परिवार है..सब्र से काम लो भईया...हम आपके साथ हैं.

हद है..कच्चा परिवार? बाबू जी का? हम थोड़े न गुजर गये हैं भई..कच्चा तो अब हमारा भी न कहलायेगा..फिर बाबू जी का परिवार कच्चा???..अरे, पक कर पिलपिला सा हो गया है महाराज और तुमको अभी कच्चा ही नजर आ रहा है.

यूँ ही जुमलों का सिलसिला चलता जाता है समाज में.

कल अंतिम संस्कार में भी वैसा ही कुछ भाषणों में होगा कि बाबू जी बरगद का साया थे. बाबू जी के जाने से एक युग की समाप्ति हुई. बाबू जी का जाना हमारे समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति है आदि आदि.

और फिर परसों से वही ढर्रा जिन्दगी का......एक नये बाबू जी की किसी और के होंगे जो गुजरेंगे..बातें और जुमले ये ही..

यह सब सामाजिक वार्तालाप है और हम सब आदी हैं इसके.

इस देश के पालनहार भी हमारी आदतों से वाकिफ हैं. वो भी जानते हैं कि काम आते हैं वही जुमले, वही वादे और फिर उन्हीं वादों से मुकर जाना- किसी को कोई अन्तर नहीं पड़ता. हर बार बदलते हैं बस गुजरे हुए बाबू जी!!

बाकी सब वैसा का वैसा...एक नये बाबू जी के गुजर जाने के इन्तजार में..

जिन्दगी जिस ढर्रे पर चलती थी, वैसे ही चल रही है और आगे भी चलती रहेगी.

बाकी तो जब तक ये समाज है तब तक यह सब चलता रहेगा...हम तो सिर्फ बता रहे थे...

-समीर लाल ’समीर’

 

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अगस्त 8, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/62332901

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

ये कैसा रिजल्ट है भाई?

 

१२ वीं के परिणाम घोषित हो गये. लड़कियों ने फिर बाजी मार ली – ये अखबार की हेड लाईन्स बता रही हैं. जिस बच्ची ने टॉप किया है उसे ५०० में से ४९६ अंक मिले हैं यानि सारे विषय मिला कर मात्र ४ अंक कटे.  बस! 4 नंबर कटे? ये कैसा रिजल्ट है भाई?

हमारे समय में जब हम १० वीं या १२ वीं की परीक्षा दिया करते थे तो मुझे आज भी याद है कि हर पेपर में ५ से १० नम्बर तक का तो आऊट ऑफ सिलेबस ही आ जाता था. अतः उतने तो हर विषय में घटा कर ही नम्बर मिलना शुरु होते थे. यहाँ आऊट ऑफ सिलेबस का अर्थ यह नहीं है कि किताब में वो खण्ड था ही नहीं. वो तो बकायदा किताब में था मगर मास्साब बता देते थे इसे छोड़ दो, ये नहीं आयेगा. क्या पता मास्साब को ही न आता हो। कौन जाने? वो कहते कि पहले भी कभी नहीं आया, तो अब क्या आएगा? हम लोगों की भी मास्साब में, कम से कम ऐसी बातों के लिए तो अटूट आस्था थी.  मगर अपनी किस्मत ऐसी कि हर बार ५ - १० नम्बर के प्रश्न उसी में से आ जाया करते थे. तब ऐसे में हम घर आकर बताते थे कि आज फिर आऊट ऑफ सिलेबस १० नम्बर का आ गया. घर वाले भी निश्चिंत रहते थे कि कोई बात नहीं ९० का तो कर आये हो न!!

तब आगे का खुलासा होता कि ५ नम्बर का रिपीट आ गया था, सो वो भी नहीं कर पाये. फिर आगे बात बढ़ती कि पेपर इत्ता लंबा था अतः समय ही कम पड़ गया. आखिरी वाला सवाल आधा ही हल कर पाये अब देखो शायद कॉपी जांचने वाले मास्साब अगर स्टेप्स के नम्बर दे दें तो दे दें वरना तो उसके भी नम्बर गये. अब आप सोच रहे होंगे कि ये ’रिपीट आ गया’ क्या होता है?

दरअसल हमारे समय में विद्यार्थी चार प्रकार के होते थे. एक तो वो जो ’बहुत अच्छे’ होते थे, वो थारो (Thorough) (विस्तार से)घोटूं टाईप स्टडी किया करते थे याने सिर्फ आऊट ऑफ सिलेबस को छोड़ कर बाकी सब कुछ पढ़ लेते थे. ये बच्चे अक्सर प्रथम श्रेणी में पास होते थे मगर इनके भी ७० से ८५ प्रतिशत तक ही नंबर आते थे. काफी कुछ तो आऊट ऑफ सिलेबस की भेंट चढ़ जाता था और बाकी का, बच्चा है तो गल्तियाँ तो करेगा ही, के नाम पर.

दूसरे वो जो ’कम अच्छे’ होते थे, वो सिलेक्टिव स्टडी करते थे. सिलेक्टिव यानि छाँट बीन कर, जैसे इस श्रेणी वाले आऊट ऑफ सिलेबस के साथ साथ जो पिछले साल आ गया है वो हिस्सा भी छोड़ देते थे. इनका मानना था की कोई वो ही चीज कोई बार बार थोड़ी न पूछेगा जबकि इतना कुछ पूछने को बाकी है. इसे यह प्रचुरता का सिद्धांत बताया करते थे जिसमें अनेकों की आस्था थी. अतः जो पिछले साल पूछा हुआ पढ़ने से छोड़ कर जाते थे, उसमे से अगर कुछ वापस पूछ लिया जाये तो उसे ’रिपीट आ गया’ कहा जाता था. उस जमाने के लोगों को ’रिपीट आ गया’ इस तरह समझाना नहीं पड़ता था, वो सब समझते थे. ये बच्चे गुड सेकेन्ड क्लास से लगा कर शुरुवाती प्रथम श्रेणी के बीच टहलते पाये जाते थे. गुड सेकेन्ड क्लास का मतलब ५५ से लेकर ५९.९ प्रतिशत तक होता था. ६० प्रतिशत से प्रथम श्रेणी शुरु हो जाती थी.

तीसरे और चौथे प्रकार वाले विद्यार्थी धार्मिक प्रवृति के बालक होते थे. उनका कोर्स की पुस्तकों, सिलेबस, मास्साब आदि से बढ़कर ऊपर वाले में भरोसा होता था. वे मानते थे कि अगर हनुमान जी की कृपा हो गई तो कोई माई का लाल पास होने से नहीं रोक सकता. इस श्रेणी के विद्यार्थी परीक्षा देने आने से पहले मंदिर में माथा टेक कर, तिलक लगा कर और दही शक्कर खाकर परीक्षा देने आया करते थे.  वे उत्तर पुस्तिका में सबसे ऊपर ’ॐ श्री गणेशाय नम:” लिखने के बाद प्रश्न पत्र को माथे से छुआ कर पढ़ना शुरु करते थे. ये धार्मिक बालक या तो १० प्रश्नों का गैस पेपर याने कि ’क्या आ सकता है’ और उनके सजेस्टेड आन्सर पढ़कर आते थे या फिर अमरमाला कुँजी. अमरमाला कुँजी जो हर विषय के लिए अलग अलग बिका करती थी। उसमें संभावित २० प्रश्न जिसे वो श्यूर शाट बताते थे और उनके जबाब होते थे, को थाम कर परीक्षा के एक रात पहले की तैयारी और भगवान के आशीर्वाद को आधार बना परीक्षा देते थे. ये बालक सेकेण्ड क्लास से पीछे की तरफ चलते हुए थर्ड क्लास या ग्रेस मार्क्स से साथ पास होते। इनमें से जिन पर हनुमान जी की पूर्ण कृपा न हो पाती, वो या तो सप्लिमेन्ट्री पा जाते या फिर फेल होकर पुनः उसी कक्षा की शोभा बढ़ाते. इन तीसरे और चौथे प्रकार वालों का भाग्य इस बात पर निर्भर किया करता था कि गैस पेपर और कुंजी में से कित्ता फंसा? ये ’फंसा’ भी तब की ही भाषा थी जिसका अर्थ होता था कि जो गैस पेपर मिला था उसमें से कितने प्रश्न आये. नकलचियों का शुमार भी इसी भीड में होता था.

अब उस जमाने के हम, इस जमाने के नौनिहालों को ९९.२% लाता देखकर आवाक न रह जायें तो क्या करें!!

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अगस्त 1, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/62172306

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 चित्र साभार; गूगल 



शनिवार, जुलाई 24, 2021

जीवन में सफलता का अद्भुत रहस्य

 


तिवारी जी पान की दुकान की तरफ सर झुकाए चले आ रहे थे। हाथ में एक किताब थामे थे। किसी से कोई बात चीत नहीं। न जाने मन ही मन क्या सोच रहे थे। चेहरे की गंभीरता को देख कर अनुमान लगाया जा सकता था कि निश्चित ही किसी बड़ी योजना की उधेड़बुन में लगे हैं।

अभी सुबह का सात भी ठीक से नहीं बजा था। पान की दुकान अभी खोलने की तैयारी में चौरसिया जी लगे थे। तिवारी जी बेंच पर बैठ गए। नमस्ते बंदगी के बाद तिवारी जी अखबार में खो गए और किताब कंधे पर टंगे झोले में रख दी गई। बीच में बीच तिवारी जी झोलें में झांक लेते मानो किताब से पूछ रहे हों कि तुम ठीक से और आराम से तो हो न? कुछ चाय वगैरह तो नहीं पिओगी? ये तिवारी जी का नया सा स्वभाव था। पूर्व में कभी इतना चुप और इस तरह से बार बार झोले में झांकते उनको कभी नहीं देखा था।

याद आता है एक समय में तिवारी जी ने बिल्ली पाली थी। पाली तो क्या थी, न जाने कहां से आकर पल गई थी। सब उसे भगा देते थे और तिवारी जी ने भगाया नहीं तो उनकी होकर रह गई। तिवारी जी अकेले प्राणी – घर पर न खाना बनना और न चाय। सो दूध होने का सवाल ही नहीं, अतः बिल्ली के रह जाने से कोई नुकसान की भी संभावना नहीं थी। तिवारी जी स्वयं कभी मंदिर, कभी मित्र तो कभी रिश्तेदारी में खा पी कर मस्त रहते और चाय नाश्ता चौराहे पर कोई न कोई करा देता या कभी कदा मजबूरीवश खुद खरीद कर भी खा पी लेते थे। पिता जी कुछ दुकान मकान बनवा कर गुजरे थे अतः किराये से नित शाम की दारू और चखने का इंतजाम भी हो ही जाता था। तिवारी जी इसे बुजुर्गों का आशीष मान कर पूर्ण श्रद्धा से दारू ग्रहण करते। इसीलिए वो अक्सर पीकर भावुक हो जाते। नम आंखों से अपने बुजुर्गों को याद करते हुए कहते कि पहले के लोग कितने भविष्यदृष्टा हुआ करते थे। अब नई नस्लों में वो बात नहीं रही। बिल्ली भी मालिक का अनुसरण करते हुए अड़ोस पड़ोस में कहीं न कहीं दूध पर हाथ साफ कर ही लेती। ऐसा लगता था जैसे तिवारी जी और बिल्ली दोनों का यह मानना था कि ऊपर वाले ने जन्म दिया है तो भोजन पानी की व्यवस्था करना भी उसी की जिम्मेदारी है। कभी पड़ोसी बिल्ली की शिकायत करते भी तो तिवारी जी अव्वल तो यह कहते कि हमने उसे घर जैसी बड़ी चीज दे रखी है और तुम्हें उसको एक पाव दूध पिलाने तक में परेशानी है? तुममे कुछ मानवता बची भी है या नहीं? और अगर दान दक्षिणा से इतना परहेज है तो अपना घर बंद रखा करो। ये किसी और के घर खा पी आयेगी। प्रभु ने उसे धरती पर भेजा है तो उसके भोजन की व्यवस्था भी वो ही करता है। तुम नहीं तो किसी और का दरवाजा खुला छुड़वा देगा मगर अपने जीवों को भूखा नहीं रहने देगा। तिवारी जी तब उसे अपनी गोद में उठाये चौक आया करते थे और कोई कुत्ता उसे न झपट ले अतः उसे अपने झोले में डाल कर अखबार पढ़ने और बातचीत करने में मगन रहते। तब भी उनको बिल्ली के लिए झोले में बार बार झांकते कभी नहीं देखा था। बाद में वो बिल्ली मर गई थी मगर झोला कंधे पर बना रहा। अब बिल्ली की जगह किताब ने ले ली है मगर साथ ही तिवारी जी के व्यवहार में यह परिवर्तन भी आ गया है।

तब तक उनके मुंह लगे चेला घंसू भी चौक पर पधार चुके थे। आज उसने ठान ली थी कि वो तिवारी जी से किताब का रहस्य जानकर ही रहेगा। पहले तो तिवारी जी यह कर टालते रहे कि तुम नहीं समझोगे। मगर जब वो नहीं माना तो तिवारी जी को बताना पड़ा।

तिवारी जी ने बताया कि उन्हें व्हाटसएप से एक गहन ज्ञान की बात पता चली है कि यदि जीवन को सफल बनाना है तो किताब से दोस्ती करो। बस! तब से तिवारी जी एक बढ़िया किताब बाजार से खरीद लाए हैं। उसे एक अच्छे दोस्त की तरह साथ रखते हैं। दोस्ती और प्रगाढ़ हो जाए इस हेतु भले ही उसे झोले में रखे हों मगर कुछ कुछ समय में उसका ख्याल रखते रहते हैं। उनका विश्वास है कि जल्द ही यह दोस्ती यारी में बदल जाएगी और वे सफल हो जायेंगे।

कौन सी किताब है? पूछने पर उन्होंने बताया कि कौन सी तो नहीं पता किन्तु दुकान वाले ने बताया था कि अंग्रेजी की एक बेहतरीन किताब है। दोस्त बना ही रहे हैं तो हिन्दी की किताब को क्यूं दोस्त बनाना? वो तो खुद ही सफल नहीं हो पाती, मुझे क्या सफल बनाएगी?

अंग्रेजी किताब से दोस्ती निश्चित ही सफल बनाएगी – भले ही पढ़ न पायें उसको। मैसेज में भी तो साफ साफ लिखा था – सफल होने के लिए किताब से दोस्ती करो। पढ़ने के लिए तो कहीं न लिखा था।

व्हाटसएप का ज्ञान है- कोई मजाक थोड़े ही है।

-समीर लाल ‘समीर’

 भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई 25, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/62022813

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शनिवार, जुलाई 17, 2021

आशीर्वादी जुमलों का एक सीमित संसार

 मानसिक रूप से तिवारी जी उम्र के उस पड़ाव में आ गए हैं जहाँ मात्र आशीर्वाद देने के सिवाय और कोई काम नहीं रहता। दरअसल उम्र से तो वह लगभग अभी 60 के आस पास ही पहुँच रहे होंगे। नेता होते तो युवा और ऊर्जावान कहलाते और अभिनेता होते तो किसी फिल्म में नई आई अभिनेत्री के साथ नाच रहे होते, मगर तिवारी जी ने उम्र का वो पड़ाव जल्दी इसलिए प्राप्त कर लिया क्यूंकि उनके पास वैसे भी कोई काम नहीं रहता है। काम न रहने को उन्होंने उम्र के पड़ाव से जोड़ दिया। यह उनके मानसिक उत्कर्ष का प्रमाणपत्र है।

अब वे अपने से बड़े उम्र की महिलाओं एवं पुरुषों को भी बेटा बेटी बच्चा आदि से संबोधित करने लगे हैं। पड़ोस में रहने वाली 70 वर्षीय महिला सुशीला ने जब नमस्ते किया तो बोले ‘अरे सुशीला बिटिया – खूब खुश रहो। बड़ा सुखद लगा सुनकर कि तुम अभी से इत्ती कम उम्र में ही नानी बन गई। प्रभु का बहुत आशीर्वाद है। अब नाती पोतों के साथ खूब खेलो। जुग जुग जिओ।’ अब सुशीला भी ठहरी महिला। कोई किसी भी उम्र में महिलाओं के इतने उच्चतम सम्मान ‘इत्ती कम उम्र’ से नवाज़ दे तो उसके लिए तो वह पद्म श्री से भी बड़ा सम्मान कहलाया। वो भी इसी सम्मान से लहालहोट हो तिवारी जी के चरण स्पर्श कर गई। तिवारी जी थोड़ा पीछे हटे और कहने लगे ‘अरे नहीं नहीं, हमारे यहां बच्चियों से पैर नहीं छुलवाते।‘ लेकिन तब तक सुशीला पैर छू चुकी थी, अतः सर पर हाथ धर कर पुनः आशीर्वाद देते हुए ‘सदा सुहागन रहो’ कहने जा ही रहे थे कि एकाएक याद आ गया कि सुशीला के पति को गुजरे तो सात साल हो गए हैं। अतः सदा के साथ खुश रहो लगा कर आशीर्वाद रफू कर दिया। रटे रटाए वन लाईनर वाले आशीर्वाद भी सतर्कता की दरकार रखते हैं। सही कहा गया है ‘सतर्कता हटी और दुर्घटना घटी’। अभी अभी तिवारी जी की फजीहत होते होते बच ही गई। 

आशीर्वादों का भी अपना एक वाक्य कोष होता है। सारे बुजुर्ग उसी में से उठा उठा कर आशीष दिया करते हैं। भाषा से भी यह अछूते हैं। लगभग सभी भाषाओं में आशीर्वाद का अंदाज और अर्थ एक सा ही होता है। चुनावी जुमलों की तरह ही आशीर्वादी जुमलों का एक सीमित संसार है मगर लुटाया दोनों को ही हाथ खोल कर जाया जाता है।

आशीर्वाद पाने वाला भी जानता है कि जेब खस्ता हाल में है। मंहगाई ऐसी कि निहायत जरूरत तक के सारे सामान नहीं जुटा पा रहे हैं। पेट्रोल भरवाने जाओ तो गैलन तो सोचना भी पाप हो गया है बल्कि लीटर की जगह मिली लीटर चलन में आने को तैयार हो रहा है। इस दौर में जब घर से मंहगाई और दुश्वारियों से जूझने निकलो और पान की दुकान पर बैठे तिवारी जी मुस्कराते हुए आशीर्वाद देने मे जुटे मिलें ‘खूब खुश रहो। दिनोंदिन ऐसे ही तरक्की करते रहो।‘ तब सिर्फ भीतर भीतर कोफ्त खाने के और क्या हो सकता है। बुजुर्ग की उम्र का लिहाज ऐसा कि कुछ कह भी नहीं सकते। बुजुर्ग भी अपनी उम्र का पावर जानता है। नेता भी तो अपने पावर के चलते जुमले पर जुमले उठाए रहते हैं और आम जानता भी सब कुछ जानते समझते भी सिवाय कुढ़ कर रह जाने के क्या कर सकती है।

घंसू, जिससे विगत में तिवारी जी का शराब पीने से लेकर गाली गलौज तक का करीबी नाता रहा, उसे भी आजकल वह ‘बेटा, सदा खुश रहो- ऐसे ही खूब तरक्की करते रहो ’ का आशीर्वाद देते हुए न थकते हैं। घंसू भी आश्चर्य चकित सा तिवारी जी का मुंह ताक रहा है। जब उम्र के पाँच दशक से ज्यादा समय में आजतक कुछ भी कर ही नहीं पाया और यह बात तिवारी जी भी जानते हैं तो ये ‘ऐसे ही तरक्की करते रहो’ में किस तरक्की का जिक्र कर रहे हैं?

अभी घंसू इस विषय में सोच ही रहा था की उसे याद आया कि कुछ साल पहले जब एक मंच से नेता जी का भाषण हो रहा था। नेता जी ने कहा था  ‘आप और आपका धर्म संकट में हैं। मैं जीतते ही आपको संकट से उबारूँगा।‘ तब भी जिन्हें वह संकट में बता रहे थे, उन लोगों को खुद ही नहीं पता था कि वो और उनका धर्म संकट में हैं। वो भी तो यही सोच रहे थे कि नेता जी किस संकट से उबारेंगे, जब कोई संकट है ही नहीं। तब उस वक्त के युवा और ऊर्जावान तिवारी जी ने ही बताया था कि इसे जुमला कहते हैं। चुनाव में काम आता है। याद कर लो और जब चुनाव लड़ोगे तो काम आएगा। तब तुम भी यही बोलना।‘

बस, घंसू भी अब तिवारी जी की बात ‘ऐसे ही खूब तरक्की करते रहो’ का भावार्थ समझ गया। यह बुजुर्गों का एक आशीर्वादी जुमला है। याद कर लो और जब बुजुर्ग हो जाओगे तो काम आएगा।

ऐसा ही पुश्त दर पुश्त ये सिलसिला चलता आया है और ऐसे ही आगे भी चलता

रहेगा।

-समीर लाल ‘समीर’  

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई 18, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/61871028

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