सोमवार, अगस्त 22, 2011

एडिनबर्ग नहीं एडनबरा, स्कॉटलैण्ड: एक ऐतिहासिक नगरी की सैर

पिछले दिनों एक पोस्ट लिखी...दूरियाँ जो घंटों में नापी गई...फिर एडिनबरा, स्कॉटलैण्ड की यात्रा का वृतांत राजस्थान पत्रिका के इंदौर संस्करण से 9 अगस्त, 2011 में प्रकाशित हुआ....मगर थे दोनों इसी आलेख के भाग...हर जगह पूरा छपना संभव नहीं होता..अतः टुकड़े टुकड़े दिये गये...पूरा और अधिक विस्तार से अब पढ़ें:

विचार बना कि जब यॉर्क, यू.के. तक आ ही गये हैं तो दो दिनों के लिए ऐतिहासिक नगरी एडनबर्ग, स्कॉटलैंड भी हो आया जाया. इच्छा जाहिर करने पर सबसे पहले यह बताया गया कि इस शहर को लिखते एडनबर्ग हैं मगर कहते एडनबरा है. मान गये और सीख लिया एडनबरा बोलना, ठीक वैसे ही जैसे बचपन से स्कूल में मास्साब सिखाते रहे कि कनाडा की राजधानी ओटावा और कनाडा पहुँच कर पता चला कि उसे आटवा बुलाते हैं. अच्छा है कि हमारा नाम लिखते भी समीर लाल हैं और बुलाते भी समीर लाल है, नहीं तो एक समझाईश का काम और सर पर आ टपकता. बताया गया कि यॉर्क से ४ घंटे दूर है.
दंग हूँ इस नये फैशन पर जिसमें दूरियाँ घंटों में नापी जाने लगी हैं. वैसे है १६१ मील याने लगभग २५९ किमी.
खैर,  कार में सवार हो एडनबरा पहुँच ही गये. ऑनलाईन बुक करते समय दो गेस्टहाऊस इस लिए रिजेक्ट कर दिये थे कि वो दूसरी मंजिल पर थे और तीस सीढ़ियाँ चढ़कर जाना (वहाँ गेस्टहाऊसेस घरों को बदल कर बनाये गये हैं अतः लिफ्ट नहीं होती) हमारी जैसी काया के संग अगर टाला जा सके तो ही बेहतर. जो गेस्ट हाऊस बुक किया था, वो था तो ग्राउन्ड फ्लोर से ही मगर उसमें बाहर से न हो कर अंदर से तीस सीढ़ियाँ चढ़कर दूसरे मंजिल पर कमरे थे. ग्राउन्ड फ्लोर पर रेस्त्रां और रिसेप्शन और प्रथम तल पर मालिक का घर. ले दे कर किसी तरफ हाँफते फुफकारते चढ़ ही गये तो शाम हो चली थी, अतः फिर उतरे नहीं कि अब कल सब घूमा जायेगा. खाना तो साथ था ही, वो ही पूड़ी, करेले की सब्जी और पुलाव. सच्चे भारतीय, फ्री की चाय कमरे में ही बना कर दो बार पी ली और भोजन कर के सो गये.
अर्थशास्त्र के पितामह कहे जाने वाले एडम स्मिथ का शहर, फोन के अविष्कारक ग्राहम बेल का शहर..सुबह नींद खुली तो मौसम कुछ ज्ञानी ज्ञानी सा होने का अहसास देता रहा. हवा का असर होगा. याद आई हरिद्वार की सुबह, अक्सर बहुत धार्मिकता का अहसास करा जाती थी.
खिड़की के बाहर दिखता ऊँचा टीलानुमा पहाड़ और उस पर ट्रेकिंग करते लोग. मुश्किल से ७ बजा होगा और कुछ लोग तो लगभग टीले की चोटी पर पहुँचने ही वाले थे. पता किया तो ज्ञात हुआ कि लगभग ३.३० घंटे लगते हैं ट्रेकिंग में मतलब जो टीले के उपर पहुँचने वाले हैं वो ३.३० बजे रात से लगे होंगे इस कार्य को अंजाम देने में. अब ये तो अपने अपने शौक और शरीर हैं, हमारा तो ऐसे शौकों और इनको पालने वाले प्राणियों को दूर से नमन. हमारी तरफ से दुआएँ है कि आप कभी भारत पधार कर माऊन्ट एवरेस्ट चढ़े, हमारा क्या ले लोगे. ट्रेकिंग का जायजा खिड़की से लेकर स्नान ध्यान से फुरसत हो नीचे रेस्त्रां में नाश्ता किया गया, कमरे के किराये में शामिल था सुबह का कान्टिनेन्टल नाश्ता, तो दबा कर के कर लिया ताकि लंच की जरुरत ही न पड़े (आपको पहले ही बता दिया था न कि सच्चा भारतीय हूँ)

गेस्ट हाऊस के सामने से ही बस चल रही थीं. पता करके डे पास ले लिया. अब जितनी बार दिन भर में मन करे, बस पकड़ो, बदलो और घूमो. बस ने एडनबरा के किले के नीचे वेवरली (Waverley) पुल पर लाकर उतार दिया. गजब का जमघट. लगातार आती जाती बसों का रेला. मात्र ५ लाख की आबादी वाला शहर, देखकर लगा मानो वो सारे ५ लाख तो इसी एरिया में घूम रहे हैं, घास पर जोड़ा बना बना कर लेटे, बैठे, आलिंगनबद्ध और तरह तरह की भाव भंगिमाओं मे सभी यहीं चले आयें है कि समीर लाल आ रहे हैं, एक झलक मिल जायेगी. पता चला कि जितनी आबादी है, उतने ही टूरिस्ट भी हर वक्त यहाँ इस शहर में मौजूद रहते हैं और इस शहर को विश्वपटल पर सैलानियों के बीच अपने उपन्यास से इतना प्रचलित करने वाला, जिनके १८१४ में लिखे एतिहासिक उपन्यास वेवरली के नाम पर इस पुल का नाम वेवरली रखा गया और उससे सटा हुआ एक बहुत बड़ा स्मारक और पार्क उन्हीं के नाम उनकी ऊँची मूर्ति के साथ बना हुआ है, सर वाल्टर स्कॉट. हालात यह कि उसके बाद उनके लिखे कई उपन्यास वेवरली सिरीज़ के नाम से जाने जाते रहे और उनके प्रचार के लिए हर उपन्यास पर लिखा जाता रहा कि ’बाई द ऑथर ऑफ वेवरली’. इस उपन्यास के चलते प्रिन्स रिजेन्ट जार्ज ने १८१५ में सर स्कॉट को अपने महल में भोज पर आमंत्रित किया क्यूँकि वो वेवरली के उपन्यासकार से मिलना चाहते थे. आज भी सारी टूरिस्ट बसों में गाईड भगवान का दर्जा देते हुए उनका नाम उदघोषित करते हैं कि टूरिस्ट के बीच इसे प्रचलित कर हमें रोजी रोटी मुहैया कराने वाला सर वाल्टर स्कॉट. मन में विचार आया कि उपन्यास का नाम वेवरली क्यूँ रखा तो पता चला कि जिस पैन से उन्होंने उपन्यास लिखी थी, वह स्कॉटलैण्ड की पैन बनाने वाली कम्पनी वेवरली के द्वारा निर्मित थी.

कभी सोचता हूँ कि काश!! देश की तो छोड़ो, मोहल्ले में भी अपने साथ ऐसा हो जाये और पुल की जगह पुलिया का ही नामकरण हो ले तो उसका नाम पड़ेगा ’देख लूँ तो चलूँ’ , हा हा!! नाम तो बुरा नहीं है और हो भी तो क्या, हमारा तो पहला उपन्यास यही है.  वैसे वेवरली को आधार माना जाये तो मेरा उपन्यास तो पैन से लिखा ही नहीं गया, सीधे डेल कम्प्यूटर की बोर्ड से निकला तो उसका नाम पड़ता ’डेल’ और फिर सोचो, पुलिया का नाम ’डेल पुलिया’ कैसा लगता भला? और रही भोज आमंत्रण की बात, तो वो तो हमें ही इस काम को अंजाम तक पहुँचाने के लिए न जाने कितने लोगों को देना पड़ेगा.

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सर वाल्टर स्कॉट के दर्शन कर के भीड़ भाड़ से कटते बचते चल पड़े किले की ओर. सामने ही दिख रहा था. सामने लेकिन उपर..पता चला कि २०० तो सीढ़ियाँ चढ़नी है और फिर पहाड़ के बीच से चढ़ाईदार सड़कों पर करीब ३ किलोमीटर चल कर. रास्ता सुनते सुनते ही गला सूख आया. विकल्प पता किये गये और एक टूरिस्ट पैकेज खरीद कर उसकी खुली छत वाली बस में सवार हो लिए. बड़ा आराम मिला और जानकारी तो इतनी सारी गाईड ने दी कि सब घुलमिल गई. हर बिल्डिंग का एक इतिहास, हर सड़क से लेकर पत्थर, नाले,  पेड़, पौधे, पक्षी तक ऐतिहासिक. नेता के सारे साथी नेता. संगत की बात है. बस ने घुमाते फिराते रॉयल कैसल के मिख्य द्वार पर उतारा. थोड़ा ही चलना पड़ा मगर वो भी काफी था. किले की दीवार से बाद में झाँक कर वो जगह भी देखी, जहाँ से हम पैदल आने वाले थे. कलेजा मूँह में आ गया कि अगर पैदल उपर आने का निर्णय ले लिया होता तो शायद आधे रास्ते से ही बिल्कुल उपर निकल गये होते. सलाह है कि टूरिस्ट बस के पैसे खर्च करो, मजे से घूमो. जानकारी भी गाईड से मिलेगी, घूमेंगे भी ज्यादा और आराम भी रहेगा. कोई खास मंहगा भी नहीं है. कहीं भी उतरो, घूमो और आने वाली अगली टूरिस्ट बस पकड़ो. सुबह जो पास लिया था वो सिटी बस का होता है सिर्फ शहर घूमने को. टूरिस्ट स्पॉट की बस अलग होती है.

वैसे एडनबरा अपने सालाना ४ सप्ताह के उत्सव के लिए विख्यात है जो अगस्त के पहले सप्ताह से शुरु होता है. उस समय सैलानियों का हुजूम उमड़ पड़ता है. उमड़ा तो खैर हर वक्त रहता है, उस वक्त शायद और ज्यादा हो जाता हो. सालाना उत्सव कई सरकारी और गैर सरकारी उत्सवों को मिलाकर आयोजित किया जाता है जिसमें विशाल पर्फोर्मिंग आर्ट उत्सव, बुक फेस्टीवल, अंतर्राष्ट्रीय उत्सव, मिलेटरी टेटू उत्सव आदि शामिल रहते हैं. स्कॉटलैण्ड की पारम्परिक वेशभूषा में बैगपाईपर बजाते हुए खड़े लोग और उनके साथ सैलानी अपनी तस्वीर खिंचवाते हर जगह दिख जायेंगे.

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किले के द्वार पर ही मिलेटरी टेटू उत्सव के लिए स्टेडियम की तैयारी चल रही थी. किले ऊँचाई पर बने होने के सिवाय कोई खास आकर्षित नहीं करता. जिसने भी भारत में राजस्थान, मैसूर, आगरा आदि के किले देखें हैं, उनके लिए यह किला खिलौना ही नजर आयेगा. इंगलैण्ड, स्कॉटलैण्ड आदि में तो खैर जो हो रॉयल ही होगा. खाना तक तो रॉयल डिनर करके खाते हैं, तो रॉयल के नाम पर इस किले को देखना और उस पर से वो रॉयल बेन्केट हॉल, जिसमें रॉयल डिनर आयोजित किये जाते थे, वो किसी वाय एम सी ए के डिनर हाल से ज्यादा न निकला. नाम है, तो घूमे, इतिहास सुना, किले के अंदर चैपल भी देखी जिसमें पहले रानी साहिबा रहती थी. आजकल आप उसे बुक करके उसमें अपनी शादी करवा सकते हैं. फायदा ये है कि एक तो रॉयल चैपल में ब्याहे जाने की प्रमाणपत्र मिलेगा और गेस्ट लिस्ट छोटी सी रहेगी क्यूँकि उसमें कुल जमा २० मेहमानों की ही जगह है तो उससे ज्यादा क्या बुलवा लोगे.

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वहाँ से थक कर निकले, तो सामने ही स्कॉच टेस्टिंग का सेंटर था. एक दो छोटे छोटे शॉट टेस्ट किये और एक बोतल खरीद भी ली. स्कॉच के लिए स्कॉटलैण्ड यूँ भी विख्यात है और इसके स्कॉच टेस्टिंग सेन्टर सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं. फिर बस पकड़ी और जो सारा शहर घुमाते, बताते, रॉयल पैलेस, म्यूजियम, लायब्रेरी, यूनिवर्सिटी, जानवरों का बाजार, अर्थशास्त्री एडम स्मिथ के नाम का हॉल, शरलॉक होम्स वाले सर आर्थर कोनन डोयल के बारे में बताते, बाजार होते हुए शाम तक वापस ले आई वेवरली पुल पर. बाजू में ही बेस्ट होटल ऑफ द वर्ल्ड ’द बलमोरल है. यूँ तो सस्ते से सस्ता कमरा भी वहाँ पर ३५० यूरो का है मगर देखने के क्या पैसे. देखना जरुर चाहिये. ठहरे तो गेस्ट हाऊस में हैं ही, सोना ही तो है. कोई लोरी तो सुनाने से रहा ’द बलमोरल’ में.

एक खासियत और हम भारतीयों की, जिस दूसरे देश के शहर में जायेंगे, खाने के लिए भारतीय रेस्त्रां तलाशने लगते हैं. भले ही भारत में इटालियन पिज़्ज़ा, बर्गर, चाईनीज़, ग्रीक खाने भागें मगर देश से निकलते ही भारतीय रेस्त्रां की तलाश शुरु. सो हमने भी खोज लिया ’ताजमहल रेस्त्रां’. भारतीय खाना खाकर लौट आये गेस्ट हाऊस, वो सुबह वाले पास से बस पकड़ कर.

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अगली सुबह पुनः वही कान्टिनेन्टल स्टाईल फ्री का नाश्ते भरपेट किया और चैक आऊट कर निकल पड़े अपनी कार से कुछ बाजार करने और उसके बाद रॉयल यॉच (The Royal Yacht) देखते हुए, जो अब एडनबरा के समुन्द्र में खड़ा है किन्तु कभी महारानी का जल निवास हुआ करता था. उसके आस पास बहुत सुन्दर मॉल भी है लेकिन बाजार चूँकि पहले ही कर चुके थे, अतः उसमें जाकर समय गंवाने का कोई फायदा नहीं था. यूँ भी यूरोप में खरीददारी कुछ जरुरत से ज्यादा ही मंहगी है.

शाम घिरने से पहले निकल पड़े यॉर्क के लिए वापस लेकिन इस बार समुन्द्र के किनारे किनारे चलने वाले मार्ग से. सुन्दर प्राकृतिक सौदर्य निहारते, फोटो खींचते खिंचाते !!!

बुधवार, अगस्त 17, 2011

मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए..

शाम को थके हारे लौटे और ईमेल खोला.

पहला ईमेल लॉटरी वाला था ५ मिलियन की फिर खुल गई. यह जानते हुए भी कि यह झूठ है, अच्छा लगता है. इन नेताओं के चलते झूठ बातों से अच्छा लगने का सिलसिला हर भारतीयों के खून में रच बस गया है. दशकों से झूठ बोल बोल कर बहला रहे हैं और हम सब आदतन बहल रहे हैं. कभी पंच वर्षीय योजना से बहल कर खुश हो लेते हैं तो कभी भारत विकास की राह पर है, सुन कर तो कभी १५ अगस्त से भ्रष्ट्राचार की समाप्ति की बात सुन कर, तो कभी कुछ और. रोज देखता हूँ अपने ईमेल में ऐसे कई ईमेल. कोई कोकाकोला से, तो कोई याहू से ५ मिलियन जितवा कर प्रसन्न किये हुए हैं. हर बार डिलिट करने के पहले नमन करता हूँ और फिर डिलिट. डिलिट करने का कतई दुख नहीं होता, मालूम है कल दूसरे तीन आयेंगे जितवाने. सोचता हूँ इस बाबत आये ईमेलों को दफ्तर से प्रिन्ट कर कर के ला ला कर रखा होता तो अब तक ५०० रुपये तो रद्दी बेचने के मिल ही गये होते.

इनको मिटाता हूँ और फिर उसके आगे की श्रृंखला में किसी की दर्द भरी ईमेल देख आँख नम हो जाती है. यह भी नित होता है. मैं फलाने राष्ट्र के फलाने सुपर डुपर की इकलौती संतान हूँ. सत्ता पलट में मेरे पिता जी को राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चला कर मार डाला गया है. उनके खाते में १८ मिलियन यू एस डॉलर रखे हैं जो मैं आपको स्थांतरित करवाना चाहती हूँ. इस मदद की एवज में आधा आप रख लेना और आधा मुझे दे देना. आपके बारे में पता चला कि आप बहुत भले आदमी हैं और लोगों की मदद करते हैं. मेरी भी करिये, यह अनाथ यह एहसान कभी नहीं भूलेगी. पहले तो सोचता हूँ कि एकदम सरासर झूठ बोल रही है चोट्टी कहिंकी. फिर लगता है कि सरासर तो नहीं, बेचारी ने जब इतना सच सच लिखा है कि आप बहुत भले आदमी हैं और लोगों की मदद करते हैं. तो शायद बाकी बातें भी सच हों. कौन जाने, दुखियारी किस हाल में हो?

नम आँखें पोंछ सोचता हूँ कि चलो, रात में एक दो पैग पीने के बाद, जब भावुकता चरम पर होगी तब विचार करके जबाब देंगे जैसा कि अक्सर देखा है कि नितीगत निर्णय सरकार देर रात ही लेती है और फिर चल पड़ा अगली ईमेल पर, वो किसी बैंक अधिकारी की है जिनके पास एक खाते में २० मिलियन यू एस डॉलर हैं, जिस खाते का असली मालिक एक हवाई दुर्घटना में मारा गया है और खाते पर उसका कोई वारिस नहीं है. ये अधिकारी मेरे डिटेल्स, मेरे खाते का विवरण, शपथपत्र मँगवा कर उसे खाते में नथ्थी कर देंगे और फिर २० मिलियन ये मेरे खाते में डलवा कर मेरी इस घोर मेहनत के लिए आधी रकम याने १० मिलियन मुझे दे देंगे और आधी खुद लेंगे. इस कार्य के लिए मुझे चुनने का कारण मेरी विश्वश्नियता और शराफत बताया गया है. यहाँ भी लगा कि बंदा यह वाली विश्वश्नियता और शराफत की बात तो सही ही कह रहा है. खुद की कमीज के छेद भला आज तक किसी को दिखे हैं क्या जो मुझे दिखें.

तीसरा ईमेल भी ऐसा ही, फिर २० मिलियन मगर इस बार किसी की इन्श्योरेन्स का पैसा. फिर कोई नामित नहीं.

ओह!! अब समझ आया कि सभी आधा आधा बाँट रहे हैं. ये तो अपने खद्दरधारियों जैसे निकले. चेहरे अलग अलग, स्टेटमेन्ट अलग अलग और कर्म सबके एक. शायद भ्रमित हो गये हों कि ये बंदा कनाडा में रहता है तो केनेडियन होगा गोरा वाला, शायद जानते न हों कि मैं भारत से हूँ. सब समझता हूँ ऐसी चालबाजियों को. दरअसल, बचपन से सीखते समझते हालात तो ऐसे हुए हैं कि अब सिर्फ चालबाजियाँ ही समझता हूँ. आदत भी ऐसी पड़ गई है कि कोई सच में कुछ सच सच बताये तो उसमें भी चालबाजी खोजने लगता हूँ. अतः अनुभव के आधार पर इन तीनों को भी डिलिट कर देता हूँ. मालूम है कि कल फिर तीन दुख के मारे, वक्त के सताये मुझे १० -१० मिलियन देने आकर खड़े हो जायेंगे. कोई कमी थोड़ी है हमारी भलमनसाहत,  विश्वश्नियता और शराफत पर विश्वास रखने वालों की. भारत से भले कोई न करे मगर हमारा ऐसा स्तुति गान करने वाले, इंग्लैण्ड, हाँगकाँग, नाईजिरिया, सूडान और भी जाने कहाँ कहाँ फैले हैं, कई देशों के नाम तो उनसे मिली ईमेल से ही पहली बार सुनकर नक्शे में खोजता रहता हूँ. धन तो खैर हाथ का मैल है आना जाना लगा रहेगा मगर सामान्य ज्ञान और भूगोल ज्ञान में हुआ इजाफा काबिले तारीफ रहा इन ईमेलों के माध्यम से. इनका साधुवाद इस हेतु.

फिर इनसे निपट अगले तीन ईमेल देखता हूँ. लिखती है कि आपकी तस्वीर नेट पर देखी. यू लुक हैण्डसम. स्टेटमेन्ट में सच्चाई है अतः आगे पढ़ता हूँ. लिखा है कि मुझसे दोस्ती करोगे? मैं बहुत अकेली हूँ और आपसे फन के लिए दोस्ती करना चाहती हूँ. अपनी और तस्वीरें फलाना ईमेल पर भेजो फिर मैं भी तुमको अपनी वैसी वाली तस्वीरों का वेब लिंक भेजूँगी. ओके बाय, अब स्कूल जा रही हूँ, लौट कर ईमेल चैक करुँगी.

अब बताओं, उम्र के इस पड़ाव पर पोता खिलायें कि इनको तस्वीर भेज कर इनकी वैसी वाली तस्वीरें मंगा कर इनके साथ फन के लिए दोस्ती करें. ठीक है जी कि कवि हृदय है, कोमल होता है. आपके एकाकीपन की व्यथा देख भावुक भी हुए मगर कुछ तो ख्याल करो. हमारा नहीं तो कम से कम हमारे पोते का ही कर लो. कुछ साल ठहर जाओ फिर उसे ईमेल कर देना, वो भेज देगा अपनी तस्वीरें. उसकी उम्र के हिसाब से उसे सुहायेगी भी.

क्या करते सो भारी मन से इन्हें भी डिलिट किया और यह क्या? आज एक ईमेल चाईनिज में लिखा आया है. हो सकता है कोरियन में हो या जपानी में हो मगर हम हिन्दी के सैनिकों के लिए तो उस दिशा की सारी गोली बोली एक सी हैं कम से कम दिखने में तो. अगर सच में भाषा जान भी जायें कि कौन सी है तो पढ़ सकने से तो रहे. पुलिस वालों का सा हाल है कि जिस भी हत्यारे को न पकड़ पाओ, आतंकवादी घोषित कर दो. फुरसत! अब पड़ोसी देश सफाई देता रहे कि हमारे यहाँ का नहीं है.

chinese

तो खैर मैं उसे चायनीज़ में लिखा मान कर चल रहा हूँ. डिलिट करने की इच्छा होते हुए डर रहा हूँ या यूँ कहें कि संकोच कर रहा हूँ कि कहीं चाईना में कोई सम्मान समारोह में सम्मानित करने के लिए तो नहीं बुलाया गया है और मैं डिलिट करके बैठ जाऊँ. बाद में पछताने के सिवाय क्या हाथ लगेगा? हो सकता है हिन्दी के प्रचार प्रसार का हमारा जज्बा देखकर वो चाईनीज़ के प्रसार प्रसार के लिए मुझे प्रेरणा पुँज मानते हों और बुलाकर सम्मान करना चाहते हों, कौन जाने!!! वैसे भी सम्मान समारोह में, मुद्दा आपका काम नहीं, मुद्दा उनके द्वारा सम्मान देने का है. दृढ़ इच्छा शाक्ति सम्मान के प्रायोजकों की मायने रखती है, फिर एक बार उन्होंने यह तय मान लिया कि आपका सम्मान करना है तो सम्मानित करने की कोई न कोई वजह तो हर व्यक्ति में निकाली जा सकती है.

बहुत संभव है कि शायद मुझे बुला कर सम्मान में चाईना रत्न या चाईना का साहित्य भूषण देना चाहते हों. हो सकता है कि चाईना रत्न बिना जुगाड़ के सच में सराहनीय कार्य करने के लिए दिया जाता हो या चाईना साहित्य भूषण वाकई साहित्यिक प्रतिभा को आधार मान कर देते हों. भारतीय होने की वजह से यह किचिंत आश्चर्यजनक बात लग सकती है किन्तु हर देश के अपने अपने रिवाज और नितियाँ होती हैं. हो सकता है चाईना में ऐसा होता हो.

और जब बात सम्मान की है तो यूँ भी हिन्दी वालों को सम्मान के सिवाय और उम्मीद भी कौन बात की रहती है. नगद या बुकर प्राईज़ तो मिलने से रहा!! जो भी नगद राशि सम्मान प्रशस्ति पत्र के साथ नथ्थी कर दो, सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं. वरना तो शाल और नारियल में भी हर्षित रहते हैं.

समारोहों के नाम पर सम्मान समारोह ही एक ऐसा समारोह है जिसमें जब भी किसी ने बुलाया है, आज तक चीटिंग नहीं हुई. हमेशा सम्मानित किये गये. भले ही हड़बड़ी में पचास सम्मानितों की भीड़ में भागते दौड़ते सम्मानित हो गये हों -भूलवश किसी और का सम्मान पत्र हाथ में थामें मंच से उतरे हों मगर सम्मानित हुए जरुर. इसलिए इसे तो किसी से पढ़वा कर, समझ कर ही डिलिट करेंगे. आपमें से कोई चायनीज़ जानता हो तो मदद करो इस दुखियारे की. कहीं सम्मान से वंचित न रह जाऊँ. हो सकता है चाईना रत्न ही हो.

जब इसे छोड़ बाकी ईमेल डिलिट कर रहा हूँ तब ऐसे में..मैं पल दो पल का शायर हूँ - गीत की पंक्तियाँ नया रुप धर कान में गुँजने लगती हैं:

कल और आएंगे नगदी की थैली तुमको देने वाले,
मुझसे बेहतर ऑफर वाले, मुझसे बेहतर कहने वाले ।
कल कोई मुझ को डिलिट करे, क्यों कोई मुझ को याद करे
मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक़्त अपना बरबाद करे॥

-समीर लाल ’समीर’

बुधवार, अगस्त 10, 2011

डायरी के पीले पड़ चुके कुछ आवारा उखड़ते पन्ने

-१-
मैं बार बार वापस आने को उठता हूँ क्यूँकि मुझे पता है तुम रोक लोगी मुझे...मेरा हाथ थाम कर बिना कुछ कहे उन नम आँखों से मुझे ताकते...तुम्हारी आँखों से बात करने की अदा...और वो नाजुक छुअन का अहसास...बार बार वापस आने के लिए उठने का मन करता है.....

-२-
आज ढलती शाम फिर तुम कुछ उदास, बुझी बुझी सी छत पर मुझसे मिलने आई..आज फिर दूर बगीचे से उस काले और नारंगी डैने वाली चिड़िया ने एक मधुर गीत गुनगुनाया...शायद वो जान गई थी कि तुम कुछ उदास हो...मैं और तुम आसमान में न जाने क्या ताकते उस चिड़िया का गीत सुनते रहे...फिर तुमने मेरी तरफ देखा मेरी नजरों में अपनी नजरें डाल कर...और मुस्करा उठी...खो गये हम एक दूसरे की आँखों में. चिड़िया शायद तब निश्चिंत होकर सो गई...रात ने अपनी पहली अंगड़ाई ली है अभी...चाँद उल्लास में आसमान पर सितारे टांक रहा है हौले हौले...कि तुम्हारे मुस्कराने का उत्सव जो मनाना है अभी.....

-३-
वो मुझसे कहती है कि " तुम पान खाना छोड़ क्यूँ नहीं देते...जानते हो मैं जबाब नहीं दे पाती, जब अम्मा पूछती हैं मेरे ओठों की लाली का सबब.."
मैं सोच में हूँ कि अपने गुलाबी गालों और चमकीली आँखों के लिए क्या जबाब देती होगी वो अम्मा को?

और कुछ पन्ने उसके जाने के बाद:

-४-
कुछ सँवार कर लिखने की आदत ऐसी रही कि हमेशा ही दो कलम लिए घूमता रहा..एक लाल और एक काली...नीली रोशनाई आँख में चुभन देती थी सो कभी न भाई. वर्तमान लिखता तो काली स्याही की कलम से और अतीत की चुभन को लाल स्याही से उकेरता....तन्हा रातों में गुजरता उन पन्नों से ...शब्द शब्द चींटिंयों से रेंगते नज़र आते हैं..काली और लाल चीटियों की कतारें..रेंगती मेरे शरीर पर ..काली एक सिहरन पैदा करती और लाल अपने डंक गड़ाती-काटती..एक खामोश चीख उठती ..जाग जाता हूँ मैं..खिड़की से आती ठंड़ी हवा की छुअन..राहत देती है पसीने से भीगे बैचेन तन को और सोचता हूँ मैं कि आज के लिखे काले हर्फ भी अगर कल लिखूँ तो लाल हो जायेंगे...चुभन है कि मुई जाती नहीं इस जिन्दगी से..बेवजह काले हर्फों को सजाकर खुश हुआ जाता हूँ मैं..न जाने क्या सोचकर बिखरा देता हूँ काली स्याही की दवात डायरी के एक कोरे पन्ने पर...यही तो है मेरी डायरी के उस काले पन्ने का सबब और मेरी लाल कलम की कहानी...तुम आ जाओ तो फिर लिखूँ एक ऐसी नई कहानी-आसमानी रोशनाई से...कि भरमा के चाँद उतर आयेगा पाने पर मेरे...  

-५-
कैसे भूलूँ तुम्हारा मेरे सीने पर कान लगा कर घंटो मेरी धड़कने सुनना...कुछ पूछता तो तुम होठों पर ऊँगली रखकर धीरे से चुप रहने का इशारा करती और आँखें बंद किये ही मुस्करा देती...बाद में कहतीं कि कितनी सुन्दर धुन है तुम्हारी धड़कनों की...जी ही नहीं भरता सुनने से...मैं कहता कि मेरी धड़कन कहाँ जो मेरी सीने में धड़कती है..ये तो तुम्हारी अमानत है और मुस्करा देता..तुम शरमा जाती..गाल खिल उठते सुर्ख लाल गुलाब के मानिंद..

-६-
याद करो उस रोज बगिया में ऐसे ही क्षणों में एक भौरें ने तुम्हें गाल पर डंक मार दिया था..और तुम..दर्द की तड़प में ऐसा झपटी उसपर कि बेचारा जान गवाँ बैठा...शायद तुम्हारे गाल को गुलाब समझने की भूल...वो तो मैं अक्सर ही करता हूँ..बस यह कि भौंरा नहीं हूँ..वरना....बस!! तुमने मेरे होठों पर हाथ रख दिया और तुम्हारी आँखों से वो आँसू..कहती कि कभी ऐसी बात जुबां पर मत लाना.....

-७-
रेत पर लेटे बदलते मौसम में तुम अपनी नजरों से उन भागते बादलों संग न जाने कितनी देर खेला करती. फिर एकाएक तुमने मुझे दिखाया था वह विचित्र आकृति वाला बादल- कछुआ बादल कह कर तुम हंस पड़ी थी और न जाने क्या सोच संजीदा हो उठी..कहा था तुमने कि काश!! हमारी जिन्दगी भी कछुआ बादल हो जाये. वक्त है कि थमता नहीं..और बदल जाता है मौसम शनैः शनैः...तुम भी पास नही...दिखता है मुझे भी अब अक्सर एक बादल- आठ पांव वाला..क्या कहूँ उसे-ऑक्टोपस बादल..एक जकड़न का अहसास होता है मुझे और कोशिश कहीं दूर भाग जाने की...

-८-
तरसती रात की खामोशी घेरकर आगोश में तुमको करेगी जिस वक्त मजबूर इतना कि तुम बेबस और निढाल हो, कर बैठो आत्म समर्पण..और भूल जाओ मुझे.... याद रखना ठीक उस वक्त कोई दीवाना फना होगा झुलसते सूरज की तपिश में सात समुन्दर पार यहाँ...

diary pages

वक्त की गुल्लक में
यादों के कुछ हसीन लम्हें
जमा किये थे तुम्हारे साथ के..
आज बरसों बाद जब
तुम मिलने आने को हो
तब उसमें से
एक मुस्कान निकाल लाया हूँ..
तुम्हारी अमानत..
तुम पर खर्च करने को..
न जाने फिर इस जनम में,
मुलाकात हो न हो!!!

-समीर लाल ’समीर’

गुरुवार, अगस्त 04, 2011

दूरियाँ जो नापी गईं घंटो में....पिछले दिनों...

यॉर्क यू के की यात्रा के दौरान ऐतिहासिक नगरी एडनबर्ग, स्कॉटलैंड जाने का मन हो आया. जब बेटे से इच्छा जाहिर की तो सबसे पहले यह बताया गया कि इस शहर को लिखते एडनबर्ग हैं मगर कहते एडनबरा है. मान गये और सीख लिया एडनबरा बोलना, ठीक वैसे ही जैसे बचपन से स्कूल में मास्साब सिखाते रहे कि कनाडा की राजधानी ओटावा और कनाडा पहुँच कर पता चला कि उसे आटवा बुलाते हैं. अच्छा है कि हमारा नाम लिखते भी समीर लाल हैं और बुलाते भी समीर लाल है, नहीं तो एक समझाईश का काम और सर पर आ टपकता. बताया गया कि यॉर्क से ४ घंटे दूर है.

दंग हूँ इस नये फैशन पर जिसमें दूरियाँ घंटों में नापी जाने लगी हैं. कोई आश्चर्य की न होगा अगर अपने इसी जीवन में कभी सुन जाऊँ कि जबलपुर से भोपाल ६०० लीटर दूर है या भोपाल से इन्दौर की दूरी २० टन है. पूरा अमेरीका, कनाडा आज घंटो में दूरियाँ बताते नहीं थक रहा. टोरंटो से मान्ट्रियाल ५.३० घंटे की ड्राईव, टोरंटो से आटवा ४ घंटे की ड्राईव, वेन्कूअर ५ घंटे की फ्लाईट. हद है भई, सोचो जरा, ट्रेफिक मिल जाये, गाड़ी खराब हो जाये- तब? जरा हमारे जबलपुर में कह कर तो देखो कि जबलपुर से कटनी १ घंटे की ड्राईव है क्यूँकि ९० किमी है..तो लोग हंसते हंसते पागल हो जायेंगे..और बतायेंगे आपको पागल.अरे एक घंटे तो ड्राईवर को चाय पान पी कर चलने की तैयारी के लिए लग जायें आखिर बाहर गाँव जाना है, कोई मजाक तो नहीं है. फिर पेट्रोल डलाना...गाड़ी पे कपड़ा मारना..सारा काम निपटाते, गढ्ढे कुदाते, साईकिल और गाय बचाते, रिक्शे से टकराते जबलपुर शहर भी अगर दो घंटे में पार कर लें तो उपलब्धि ही जानिये. जबलपुर से भोपाल मात्र ३१२ किमी और आज तक मैं कभी भी ड्राईव करके ९ घंटे से कम में नहीं पहुँच पाया और वो भी इतना थका हुआ कि ८ घंटे जब तक सो न लूँ, किसी से एक लाईन बात कर सकने की हालत में नहीं आ सकता.

समयकाल, जगह, गाड़ी की रफ्तार, भीड़, सड़कों की हालत, ट्रेफिक..इन सब को परे रखते हुए इतने विश्वास के साथ ये लोग २ घंटे/४ घंटे बोलते हैं कि दाँतो तले ऊँगली दबा लेने को जी चाहता है. ये निराले, इनके काम निराले, इनके व्यक्तव्य निराले.

कोई इनको समझाये कि आज जब ४५ पार के ८०% लोग मधुमेह से जूझ रहे हैं, तब आपकी गाड़ी में ५ सवारों में से, जिसमें माँ बाप भी शामिल हों, कम से कम एक की तो मधुमेह की बनती ही है- जस्ट फॉर बेलेन्स बनाये रखने के लिए. अब कोई मधुमेह पीड़ित आपकी गाड़ी में हो तो हर एक घंटे बाद वाशरुम खोजिये. भारत तो है नहीं कि हाई वे पर सड़क के किनारे रोकी और ठंडी हवा में निवृत हो लिए. एक बार वाशरुम मतलब १५ मिनट तो मान ही लो क्यूँकि यह ऐसी छूत की बीमारी है कि जिसे जाना है वो तो जायेगा ही, उसको देखा देखी बाकी लोग भी लगे हाथ हो ही लेते हैं. गणित अगर ठीक ठाक हो तो ४ घंटे में चार बार तो यहीं कार्यक्रम होता रहे मतलब ५ घंटे की ड्राईव तो अपने आप हो गई.

उस पर अगर हमारे जैसे भारतीय रथ यात्रा पर निकले हों तो क्या कहने. हर थोड़ी दूर पर कभी नदी के किनारे, कभी स्कॉटलैण्ड आपका स्वागत करता है, के बोर्ड से सट कर, फिर उसकी तरफ ऊँगली से ईशारा करते हुए, फिर पत्नी के साथ वही दोनों पोज़, फिर पत्नी का अकेले में उसमें से एक पोज़, कभी पीले सरसों के खेत के सामने, कि यहीं डी डी एल जे की शूटिंग की होगी तो कभी किन्हीं गोरों को कहीं फोटो खिंचवाता देखकर, कि जरुर कोई इम्पोर्टेन्ट जगह होगी, चूक न जाये, तो खुद भी खड़े हो कर फोटो खिंचवाते ऐसे चलेंगे जैसे एक एक फोटो भारत जाकर मित्रों को चमकाने के लिए खिंचवा रहे हों. माना कि भारतीय होने के कारण रेस्त्रां जाकर खाने का समय बचा लोगे और घर से लाई पूड़ी और आलू की सब्जी पूंगी बना बना कर कार चलाते हुए ही खा लोगे मगर कितना?  गारंटी से ४ घंटे की बताई यात्रा को ७ घंटे की यात्रा तो मान ही लो.

वैसे भी जल्दी किस बात की है...कल के काम के लिए आज निकल पड़ना तो बचपन से करते आये हैं, भले ही ट्रेन से जाना हो. क्या पता कल लेट हो जाये तब..और यूँ भी आज यहाँ खाली ही तो हैं, निकल पड़ो. भारतीय रेल का रिकार्ड तो ज्ञात है ही.

drive

इस दौरान ऐसे ही बदलाव तो देश में भी देख रहा हूँ फिर भी न जाने क्यूँ दंग हुआ जाता हूँ. आजकल देश में भ्रष्ट्राचार के नापने के मानक किस तरह बदल लिये हैं..फलाने ने कितना काला धन कमा लिया- कम से कम एक बटा दस कलमाड़ी तो दबा ही लिया होगा. उसके यहाँ छापा पड़ा- २ प्रतिशत पवार निकला. वो राजा के ३ परसेन्ट से कम नहीं है किसी भी हालत में...जब ऐसी बातें होने लगे तो इस घंटे की दूरी को स्वीकार करने में भी क्या बुराई है.

आश्चर्य में मत पड़ना यदि कभी कोई आपको मेरा वज़न लीटर में बताये या कहे कि फलानी जगह तक पहुँचने में ४ दर्जन पेट्रोल लगेगा. भारत में दो नम्बरी बाजार में तो रुपयों के मानक को बदलते आप देख ही चुके हैं- १००० रुपये याने १ गाँधी, १ लाख रुपये याने एक पेटी और १ करोड़ याने १ खोखा.

हाँ, इसके चलते मन मान गया मगर यात्रा में एक और बात कौंधी कि हम भारतीय जब देश के बाहर हो तो एक बात के लिए यह खासियत और दिखा जाते हैं कि जब किसी दूसरे देश के शहर में जायेंगे, तो खाने के लिए सबसे पहले भारतीय रेस्त्रां तलाशने लगते हैं. भले ही भारत में इटालियन पिज़्ज़ा, बर्गर, चाईनीज़, ग्रीक खाने के पीछे भागें और मित्रों के बीच अपना स्टेन्डर्ड जमाये जायें मगर देश के बाहर निकलते ही भारतीय रेस्त्रां की तलाश शुरु. सो हमने भी एडनबरा में खोज लिया ’ताजमहल रेस्त्रां’. आर्डर में पीली दाल तड़का और नानवेज में कड़ाही चिकन का ऑर्डर कर दिया वरना काहे के भारतीय... भारतीय खाना खाकर लौट आये गेस्ट हाऊस.

सुबह ११ बजे चैक आऊट करके वापस यॉर्क के लिए जिस दिन निकलना था तो चूँकि ब्रेकफास्ट कमरे के किराये में शामिल था, इसलिये पहले दिन की ही तरह इतना सारा खा लिया कि लंच की जरुरत ही न पड़े और चले आये यॉर्क तक मुस्कराते बिना भूख लगे. भारतीय होना काम ही आता है आड़े वक्त पर वरना रास्ते में कहाँ खोजते भारतीय रेस्त्रां और मिल भी जाता तो बेवजह खरचा तो था ही.

घर से दूर
जब निकल
जाता हूँ मैं...
न जाने क्यूँ
कितना सारा
तब बदल
जाता हूँ मैं..

-समीर लाल ’समीर’

सोमवार, अगस्त 01, 2011

तुम धड़कन पढ़ना जानती हो....

अक्सर अकेले में डायरी के पीले पड़ गये सफहों से गुजरने का भी मन कर आता है. गांव के पीले सूखे खेत में अक्सर ही घूमता रहा  हूँ मैं. नंगे पैर. चलने में करीचियों की चुभन और  दर्द का मीठा सा अहसास. आदत में शुमार बातों की कोई खास वजह नहीं होती, बस यूँ ही...वो गीत सुनते:

यूँ ही दिल ने चाहा था, रोना रुलाना...
तेरी याद तो बन गई एक बहाना...

रुकता है सफहों को पलटने का सिलसिला-ठीक उस कोरे पन्ने पर आकर, जो किसी भी भरे पन्ने से भी ज्यादा भरा सा लगता है..अलिखित इबारतों की एक लड़ी शरीर पर रेंगती लाल डंक वाली चीटियों की सिहरन लिए..पन्ने के .बीचों-बीच एक हल्की सफेदी थामे गोलाकार निशान...याद आता है वो लम्हा, जब कैद कर लिया था इस पन्ने ने, तुम्हारी आंसू की उस बूँद को- जो टपकी थी उस वक्त  जब मेरी डायरी पर झुकी तुम मुझसे नजरे चुराती कह रही थी..अलविदा. अब शायद अगले जनम में मुलाकात हो. कहा था तुमने  कि हम वादा करें कि अब कभी नहीं मिलेंगे इस जनम में..... याद है? 
उस रात एक तारा टूटा था छत पर उत्तर की दिशा में, और हम निहारते रहे थे उसे ओझल.होने तक .बिना कुछ मांगे. अपने हिस्से के आगे कुछ भी छीन लेना तुम्हें कब पसंद था भला. सो छूट गये वो दो हाथ भी थमने के पहले...ढहा सपनो का ताजमहल बनने के पहले...बस्स!! इतना ही!! 

शायद, शब्दों  ने जो गुंजाईश दी, बस उन्हीं बैसाखियों पर टंगे निकल पड़ा मै , निपट अकेला तन्हाईयों के जंगल में..कहाँ रह पाई तुम भी अपने आपको अपने वादे पर अटल....रोज तो चली आती हो याद बनके मेरे सपने में...नींद से जागने का मन नहीं होता..... दुनिया सोने नहीं देती. मैं जाग  नहीं पाता तो लोग अक्सर ही दीवाना नाम दिये जाते हैं..मुझे बुरा नहीं लगता ये नाम भी.

कभी तो मन करता है  कि लिखूँ उसी पन्ने पर एक कविता...तुम्हारे तुम होने की या तुम्हारे गुम होने की.....

शिव कुमार बटालवी याद आने लगते हैं:

एक कुड़ी जेदा नाम मोहब्बत...
गुम है...गुम है...गुम्म है!!!!.......

girl

वो तुम्हारी बातों की वसीयत..जिसे थामें चला आया हूँ, उन बैसाखियों पर टंगा इतनी दूर, उम्र के इस पड़ाव पर..जहाँ से अब बस धुँधलका ही नज़र आता है..आगे भी और मुड़ कर देखूँ तो पीछे भी - यादों की गहरी वादियों में.. रोक देती है मुझे- भरे पन्ने को फिर से भरने को. चाहूँ तो भर दूँ...एक नया जाम....पर खुमार...उन यादों का..उस रात से चढ़ा,,,.रोक देता है. तब ऐसे में टपका देता हूँ एक बूँद और अपने आँसू की उस पन्ने के कोने पर...और इन्तजार करता हूँ कि कब वो मिल जाये उस निशान से, जिसे छोड़ गई थी तुम और कैद कर लिया था मेरी डायरी के  कोरे पन्ने ने.

कभी तो मिलन होगा...हमारा न सही..इन बूँदों का ही सही. एक तसल्ली काफी है..मधुर मिलन की...बैसाखियों को किनारे रख- चिर निद्रा में सुकून से लीन होने के पहले!! लब पर मुस्कान लिए...
एक विचार उठता है फिर उसी कोने से..कहता है- पगले, हर कविता लिखी जाये ये जरुरी तो नहीं...भाव यूँ भी अपना सफर तय करना जानते है..उनकी अपनी तरंगे हैं. छोड़ मोह कि- कुछ लिख डाल और बहने दे उन भावों को..उनके अपने प्रवाह में..हट जा किनारे और देख साक्षी भाव से उन्हें प्रवाहित होता..एक महा मिलन का उत्साह लिए..सागर में जा समाहित होने की उमंग....छल रहित....छल छल कल कल की धुन बजाता....जोड़ कान उस धुन से...नाच कि एक उत्सव है आज!! एक महोत्सव..महा मिलन की आस का....सावन में झूलती गोरी की मद मस्त पैंगें...और वो सखियों के संग नाचते हुए उठती कज़री की धुन!!

बदरा....गरज बरस तू आज.....

झकझोरते ख्यालात ...थमीं सी कलम....एक और बूँद उस आँसू की-- जो प्रवाहित कर गई सारे भाव बिना लिखे तुम्हारे पढ़ने को...बांच लोगी तुम...मुझे पता है...सुन तो सब लेते है लेकिन तुम धड़कन पढ़ना जानती हो!!! एक अनजान मोड़ पर थमी कहानी...जिसका कोई सारांश नहीं..इन्तजार करती है तुम्हारी उन नीली पनीली आँखों से तकती नज़रों का..

मिलोगी जब
इस बार
घूमेंगे हम
हरियाली के आगोश में
हाथ मे हाथ थामें
भीगेंगे उस
दूध झरने के
नीचे 
और थक कर चूर
बैठ किसी भरे पेड़ के नीचे
तने से पीठ टिकाये मैं
और मुझ से टिकी तुम...
बँद आँख
सपनों की दुनिया का 
वो पूरा चाँद देखते .....
मत करना उम्मीद मुझसे कि
कुछ गुनगुनाऊँगा मैं...
याद है तुमने कहा था उस रात 
मुझसे दूर जाते
कितना बेसुरा हूँ मैं...
-मैं फिर तुम्हें खोना नहीं चाहता...

-समीर लाल ’समीर’