मंगलवार, सितंबर 29, 2009

तारों का मकड़जाल!!

हम जब बड़े हो रहे थे तब हर गर्मी की छुट्टी, दीपावली-दशहरे की छुट्टी में ननिहाल या ददिहाल जाया करते थे. पूरे छुट्टी भर वहीं रहते.

नानी के घर गये तो सारे मामा-मामी, मौसी मौसा, उनके बच्चे, मम्मी के बुआ, मौसी, मामा-उनके बच्चे और जाने कितनी दूर दूर तक की रिश्तेदारी के सब लोग इक्कठा होते. वही हाल ददिहाल में चाचा चाची, बुआ और ऐसी भीड़ लगती कि मजा ही आ जाता.

फिर और भी कभी रिश्ते में शादी ब्याह पर ऐसा ही जमघट. ऐसा नहीं कि उस वक्त दोस्तों की दुनिया नहीं थी किन्तु रिश्तों की मान्यताएँ थीं, मिलना जुलना था. लोग एक दूसरे से पत्र व्यवहार बनाये रखते थे और जब भी ऐसे किसी शहर में जाना हो जहाँ कोई दूर का भी रिश्तेदार हो तो उन्हीं के साथ रुकना होता था.

यहाँ तक कि मुझे याद है मामी की बिटिया की सगी जेठानी का बेटा हमारे घर कई महिने रह कर एक परीक्षा देकर गया था.

कुछ माह पूर्व एक तस्वीर खींची थी अपने टीवी स्टैंड के पीछे तारों के मकड़जाल की. जाने कौन सा डीवीडी से निकल कर होम थियेटर के रिसीवर में फंसा है और वहाँ से टीवी मे, फिर केबल के रिसीवर के तार, सेटेलाईट रिसीवर के तार, एस विडियों के उलझे तार, रंग बिरंगे, काले, सफेद, मोटे पतले सब एक दूसरे के उपर नीचे से गुजरते प्लग पाईंट में जाकर एकलयता बनाते और दिशा पाते हुये. प्लग पाईंट से अलग अलग रिसीवर की तरफ बढ़कर सही इन्स्ट्रूमेन्ट तक जाना या इसका विपिरत मार्ग सही पहचान कराता है तार ही.

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ये एक दम उन रिश्तों की तरह है, जिनके तार इधर उधर से एक दूसरे से जुड़ते ननिहाल/ददिहाल में जाकर फंसे हुये थे. उसी तरह या तो ननिहाल/ददिहाल से शुरु करो और रिश्ते तक पहुँचो या रिश्ते से शुरु करो और ननिहाल/ ददिहाल तक पहुँचों.

दोस्त के घर शादी और रिश्तेदारी में शादी के बीच तय करने की जरुरत नहीं होती थी. चाचा की साली की शादी में जाना आवश्यक था बजाय कि दोस्त की बहन की.

परसों फिर टीवी के पीछे झांकता था. नया सारा तामझाम लग गया है. होम थियेटर के सारे कनेक्शन वायरलेस और भी जाने क्या क्या. दो तीन तार मुश्किल से. बाकी सब गायब मगर सब चल वैसे ही रहा है.

फिर अपने क्म्प्यूटर को भी याद किया. एक मॉनीटर जोडने को और एक पावर वाला, बस दो ही तार दिखे जबकि है सबकुछ. बिल्ट इन कैमरा, साऊंड बॉक्स, माईक..प्रिंटर, यू एस बी, हैड सेट-सब वायर लैस. बिना तार के. कहीं नहीं जुड़ते उनके तार. खुद सोचो और जहाँ मन आये, मन ही मन जुड़ा मानो. जैसे चाहो वैसे. जब घुमाना चाहो, घुमा दो, यहाँ से वहाँ.

वही तार तो उनकी सही जगह निर्धारित करता था. उनका दायरा स्थापित करता था. उन्हें एक जुड़ाव का अहसास देता था, उन्हें अन्य सामानों की भीड़ में गुम होने से रोकते हैं. कितनी बार तो इन्हीं तारों के सहारे वो गिर कर टूट जाने से बच जाते हैं-वही गायब!!

आजकल देख रहा हूँ रिश्ते भी कुछ ऐसे ही हो गये है. बस दो तीन तारों की तरह सिमटी हुई रिश्तों की दुनिया. खुद के भाई बहन और ज्यादा से ज्यादा चाचा, मामा, मौसा, बुआ के परिवार तक. यह भी कुछ पहले की ही बात कर दी. बाकी सब वायरलैस की तरह खुद के चुने हुए मित्रों की चुनी हुई दुनिया जिनमें कोई तार नहीं होते. बस, अहसासों का एक बेतार का जुड़ाव.

किसी अमरीकन विश्वविद्यालय में शोध हुआ है कि अब बिजली के तारों को अलविदा करना होगा. सब तरंगों के माध्यम से होगा-ठीक उन अहसासों जैसा. बिजली घर के भीतर तक भी वैसे ही आयेगी.

सोच रहा हूँ, कल को ये एक दो बचे तार भी बिदा हो जायेंगे फिर तो क्या भाई बहन और क्या माँ बाप. सब रिश्ते उतने ही, जितने रखने की इच्छा हो. कोई तार का बंधन नहीं.

होगे तुम मेरे माता पिता मगर मैं तुमसे संबंध नहीं रखना चाहता. पत्नी भी है मगर मैं विवाह करके एक नये तार को जोड़ना नहीं चाहता अतः बिना विवाह के ही साथ रह रहा हूँ. बच्चा सेरोगेट मदर से करवा लिया है ताकि मेरे साथी का शेप न बिगड़े. फिर कैसा तार उस बच्चे से भी. उसकी अपनी दुनिया होगी. बड़े होने तक मदद कर पाये तो कर देंगे वरना उन्हें भी फॉस्टर पेरेंटस ही संभाले. मेरी आजादी में कोई तारों की उलझन नहीं होना चाहिये.

मैं कल को वाली बात ही क्यूँ कर रहा हूँ, यह सब तो लगभग होने ही लगा है और फिर बच्चों की बात तो जबरदस्ती ही करने लगा, जब समलैंगिक साथी होगा तो बच्चों की और उस तार की बात ही क्यूँ करना.

लेकिन आज होती हुई घटनाओं और बदलाव के लिए यह कहना कि शायद कल को ऐसा होने लगे वाली बात इसलिए निकल पड़ी होगी मेरे मूँह से क्यूँकि मैं अब भी पुराने ख्यालों में ही जी रहा हूँ, खूब सारे तारों के बीच उलझता सुलझता खुशी खुशी जिए जा रहा हूँ. मुझे यूँ ही उलझे रहना अच्छा लगता है मगर मेरे अकेले के चाहने से होगा क्या? तार का एक सिरा जुड़ा हो और दूसरा टूटा, तब ऐसे तार का क्या महत्व? तुम प्रगतिशील हो-जमाने के साथ साथ बदलने वाले और मैं थमा-स्थिर. तुम्हारी नजर में, बेचारा मैं.

कुछ बेतरतीबी
से
बिखरे
उलझे हुए
रिश्तों के तार

और

उनकी
गिरफ्त के बीच
मैं...

मुझे ये कैद
पसंद है..
मैं रिहाई का
तलबगार नहीं...

मुझ पर रहम करो..
मुझे आजाद मत करो!!!

-समीर लाल 'समीर'

रविवार, सितंबर 27, 2009

मिल गई तसल्ली!!

एक माईक्रो पोस्ट!!

ब्लॉगवाणी बंद!!

यह कोई छोटी घटना नहीं.

इतिहास आज के दिन को हिन्दी के नेट पर प्रारंभिक प्रचार और प्रसार में जबरदस्त धक्के के रुप में दर्ज करेगा.

सामान्यतः हर सोमवार की सुबह मैं एक पोस्ट लगाता हूँ. आज इन क्षणों में अपना अफसोस, दुख और ब्लॉगवाणी को इस अंजाम तक लाने वालों के प्रति अपना विरोध दर्ज करते हुए अपनी पोस्ट रोकता हूँ.

आशा है, उन विरोधी ताकतों और निर्माण प्रक्रिया के विंध्वसकों को तसल्ली मिली होगी.

सीख:

समाज सेवा की हमारे समाज में कद्र नहीं, शोषण के हम आदी हैं.

एक त्रिवेणीनुमा:

वो समाज की सेवा करता है..

गैरों के हित की बात करता है…

…..

कहते हैं तूफान आने को है!!

 

एक निवेदन: मैथली जी, एक बार पुनर्विचार करें.

 

हालांकि क्षमायोग्य कृत्य नहीं है हमारा,

फिर भी संग में नाम दर्ज होगा तुम्हारा.

सादर

समीर लाल ’समीर’

गुरुवार, सितंबर 24, 2009

खामोश रहना मुझे पसंद है.

याद है जबलपुर से दिल्ली जाया करता था. यदि कोई साथ में नहीं है तो मैं टी सी से निवेदन करके अपनी एसी में अन्दर की बर्थ, जिसके लिए हर साईड बर्थ वाला इच्छुक होता है, साईड बर्थ वाले से बदल कर पर्दा खींच कर बैठ जाया करता था.

पूरे सत्रह घंटे का सफर ५ से ६ घंटे सोने के सिवाय या तो किताब पढ़ते या खिड़की से बाहर झांकते बिना एक भी शब्द बोले गुजार दिया करता था.

लोग मुझे हरदम बातूनी ही समझते रहे हैं आज भी. लेकिन मेरी पसंद चुप रहना ही है. मुझे कितने भी लम्बे समय तक चुप रहने, अकेले बैठे रहने में बोरियत का अहसास नहीं होता.

शायद सभी के साथ ऐसा हो कि जैसे वो जाने जाते हैं, या जैसे वो माने जाते हैं या जैसे वो दिखते हैं या जैसे वो व्यवहार करते हैं दरअसल वो और उनकी पसंद उससे जुदा होती है.

वैसे भी मेरा मानना है कि चुप रहकर या मौन रहकर बहुत सी समस्याओं को हल अपने आप ही स्वतः हो जाता है. बात तो तब बढ़ती है, जब दोनों पक्ष बोलते हैं. एक यदि चुप ही रह जाये या बहुत कम बोले तो बात बढ़ने की गुजांईश जरा कम ही होती है. मौन की भी अपनी आवाज होती है जो बोलने वाले तक आपके भाव पहुँचा देती है.

अक्सर चुप रह जाने वाले व्यक्ति को कायर भी समझ लिया जाता है लेकिन उससे फर्क क्या पड़ता है. ऐसा समझना भी एक ललकार जैसा ही है. हाँ, अगर ऐसा लगे कि बिना बोले शायद आप की चुप्पी की फायदा उठाकर बात समाप्त होने के बजाय बढ़ाई जा रही है और मौन घातक सिद्ध हो सकता है, तो फिर जुबान तो साथ है ही, जरुर बोल देना पसंद करता हूँ लेकिन उतना ही, जितना जरुरी है.

वैसे अक्सर ही मैने अपने आसपास मेरी खामोशी से परेशान होते लोगों को देखा है. खीझ भी उठते हैं लोग मुझ पर कि कुछ तो बोलो.

मूड स्विंग हर मानव के साथ होता है. कभी खुश तो कभी दुखी. कभी प्रफुल्लित तो कभी उदास. कारण कुछ खास नहीं होते-बस यूँ ही.

कभी बेवजह बोल देने का मन भी हो आता है, कभी मजाक करने का भी, कभी ठिठोली भी. कोशिश होती है कि किसी का अपमान न हो. जब मजाक करता हूँ तो मजाक सहने का माददा भी रखता हूँ. लेकिन वो जो बेसिक नेचर है, वो नहीं बदलता और लौट लौट कर उसी पर आ जाता हूँ.

क्या आपके साथ भी ऐसा ही होता है?

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एक गज़ल कहने का मन हो आया है:

मरने वाले से पूछो तुम जहर की खामोशी
कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी

खुद ही देख लेना तुम क्‍या ये गुल खिलाती है
कह रही बहुत कुछ है ये लहर की खामोशी

कहना भी तर्रनुम में जो ग़जल लिख चले हो
जान लोगे तुम खुद ही इस बहर की खामोशी

हादसा हुआ और हम हो गये हैं गूंगे से
पर जुबान खोलेगी अब शहर की खामोशी

दी है ये खबर किसने लोग लड़ रहे हैं सब
यूं न बदज़ुबां होगी उस कहर की खा़मोशी

-समीर लाल ’समीर’


जरुरी नोट:

दो दिनों के लिए एक ऐसे स्थान पर आ गया हूँ, जहाँ इन्टरनेट की डायल अप की सुविधा अपनी गति से चल रही है. अधिकतर तो बैठी ही है मौन. पुराने समय का भारत याद आ रहा है जब १९९९ में छोड़ा था. उस वक्त डायल अप लगा कर हर पन्ने के खुलने के लिए वैसे ही इन्तजार करना पड़ता था जैसा नेताओं के चुनाव घोषणा पत्र में किये गये वायदा वाले पन्नों के खुलने का इन्तजार करना होता है. खुल गये तो वाह वाह, नहीं खुले तो हमें तो मालूम ही था.

शनिवार को घर से स्थितियाँ यथावत हो जायेंगी. पोस्ट तो शेड्यूल्ड है तो हो ही जायेगी. कमेंट भी टॆलिफोन से एप्रूव हो जायेंगे समय बे समय. दूसरे चिट्ठे पढ़ने की कोशिश करता हूँ. देखें, कितना सफल हो पाते हैं.

रविवार, सितंबर 20, 2009

मुझे वो याद आते हैं..

जब कनाडा आया था तो यहाँ के नियमों के हिसाब से कार चलाना पुनः सीखना पड़ा.

सारे नियम जुदा भारत से. सड़क के उल्टी तरफ गाड़ी चलाना, स्टेयरिंग उल्टी तरफ, कोई क्लच नहीं-बस, ब्रेक और एक्सिलेटर. ऑटो गियर. एक बार लगा दिया और बस, फिर एक्सिलेटर और ब्रेक पर ध्यान दो.

तेज रफ्तार और हर थोड़ी देर में बेक मिरर में देखना कि पीछे से चला आ रहा बंदा कितनी दूर है या क्या एक्शन ले रहा है. जिसे आप पीछे छोड़ आये, उसका भी ध्यान रखो. पीछे छूटा और रात गई, बात गई वाली बात नहीं चलती.

काश, मेरी जिन्दगी में भी ऐसा नियम बना होता बैक व्यू मिरर में लगातार देखते रहने का. पलट कर देखता हूँ तो आगे ठोकर खा कर गिरने का खतरा बन जाता है. बैक व्यू मिरर का सिस्टम है नहीं. बस, जो गुजर गया वो गुजर गया. याद में बसा लो. कभी याद करके आंसू बहा लो, कभी मुस्करा लो मगर देखने का जोखिम मत लो पलट कर.

कितने लम्हें हैं जिन्हें देखने का मन करता है. फिर से जी लेने का मन करता है मगर हाय!! ये जीवन. ऐसी सुविधा ही नहीं देता.

आंसू बहता हूँ, लोग हँसते हैं. हँसता हूँ लोग इर्ष्या करते हैं. अजब दुनिया है.

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बस, वन वे ट्रेफिक है हर तरफ. जिधर निकल पड़ो वो तुम्हारी इच्छा है. बस, वापसी की चाह मत रखना.

क्या पीछे छूटे भी मुझे नहीं देख पाते. क्या उनके मन में वही सवाल नहीं उठते. फिर वो ही क्यूँ नहीं आगे आ कर मेरा गुजरा सावन लौटा जाते. उन्हें कौन रोकता है आगे बढ़ने से. अपनी स्पीड बढ़ाने से.

मगर मैं ही कब अपनी स्पीड बढ़ा कर किसी को कुछ लौटा पाया जो कोई मेरे लिए यह काम करेगा. मैं भी तो बस उसी के लिए परेशान हूँ जो मैने खोया है. दूसरे की चिन्ता मैने कब कब की जो मेरी कोई करेगा.

पर अपनी कमीज में कब किसे दाग नज़र आये हैं. बस, यूँ ही जिन्दगी दौड़ी जा रही है और मैं आज का सीन ख्त्म कर पैक अप मोड में आ गया हूँ. नहा लूं तो सो जाऊँ.

कल उठ कर फिर वन वे ट्रेफिक का हिस्सा बन जाऊँगा खुशी खुशी.

ये सब बातें तो तब परेशान करती है, जब आप दिन की पूरी यात्रा कर आराम करने निकलते हैं..फिर. फिर क्या-एक दिन गाड़ी रुक जायेगी. फिर न हम होंगे और न हमारी सोच. यात्रा पूरी हो जाएगी.

तब कोई और यही सोच रहा होगा.

मुझे वो याद आते है
जिन्हें हम याद न आए..

सुनते हैं उस पार कुहरा छाया है.

-समीर लाल ’समीर’

बुधवार, सितंबर 16, 2009

परेशान हो जाता हूँ मैं..

पिछले दिनों फुरसतिया जी परेशान दिखे. पूछने पर पता चला कि शौकिया परेशान है और वो ऐसे बहुत सारे लोगों को जानते हैं जिन्हें परेशान रहने का शौक है और ऐसा शौक कि आदत कहें तो बेहतर.

किन्तु हमेशा ऐसा नहीं होता. बहुत से प्रसन्न चित्त लोग इठलाते मिल जायेंगे जो गर्व से कहते हैं कि यार हमें परेशान रहना पसंद नहीं. हम तो परेशानी में भी मस्त रहते हैं. उनसे मेरा कहना है कि मित्र वक्त से डरो. कब कौन परेशानी चली आयेगी बिन बुलाए, जान भी न पाओगे.

इन्हें देखिये, ऐसे ही ये भाई साहब प्रसन्न चित्त ऑफिस से घर कार में चले आ रहे थे. अमरीका में रहने वाले भारतीय हैं, अतः कार में हिन्दी गाना बज रहा था.( इस बार भारत गया था, अधिकतर भारत में रहने वाले अभिजात्य भारतियों की गाड़ी में अंग्रेजी गाने बजते दिखे और उसे भी बड़ी बात, वो साथ में गुनगुना भी रहे थे).

सुनसान रास्ता, विचार चल रहा था, घर जा कर बीयर पी जायेगी, लज़ीज खाना खाया जायेगा, इत्मिनान से बच्चों के साथ खेलेंगे और पत्नी से बात करते करते सो जायेंगे.

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एकाएक एक लड़की अपनी खराब हो गई कार से निकल कर लिफ्ट मांगने लगी. इसमें क्या परेशानी है, रास्ते में उतार देंगे, तो बैठा लिया. लड़की गर्भवति थी तो कहने लगी, अस्पताल तक छोड़ दिजिये. अस्पताल घर से दूसरी दिशा में. थोड़ी परेशानी होगी मगर किसी गर्भवति कन्या को मना कैसे करें. तो हाँ कर दिया.

रास्ते में, शायद हल्की फुल्की परेशानी की वजह से, स्पीड ब्रेकर पर कार कूद गई. अब कन्या को पेट में दर्द होने लगा. परेशानी बढ़ी. हाथ पकड़ा कर अस्पताल के अन्दर ले गये.

टेस्ट हुए. पता चला कि तुरंत डिलेवरी करनी होगी. फार्म भरा जाने लगा. गर्भवति से उस बच्चे के पिता के बारे में पूछा गया. जाने क्या सुना उसने. कह दिया ये हैं और बेहोश हो गई. लो, भाई साहब तो सकपका गये. बड़ी परेशानी लद गई. बहुत समझाया डॉक्टरों को कि मैं तो बस इन्हें लिफ्ट देकर लाया हूँ. मगर माने कौन?

आखिर में तय पाया गया कि मेडीकल टेस्ट कर लो. डी एन ए कर लो और अगर मेरा निकला तो मान लूँगा.

टेस्ट हुए. भाई साहब परेशान रेजल्ट आने के इन्तजार में बाहर वेटिंग रुम में यहाँ से वहाँ टहलते रहे.

घंटे भर में रेजल्ट आया. डॉक्टर ने बुलवाया. बधाई दी कि आप सच कह रहे थे कि बच्चा आपका नहीं है. अब आप परेशान न हों और घर जायें. आपके रेजल्ट में हमने पाया है कि आपमें जन्म जात वो सेल्स ही नहीं बनते जिससे बच्चे पैदा होते हैं.

अब तो भाई साहब की परेशानी का चरम देखिये-तब फिर वो दो बच्चे किसके हैं जिनसे घर जाकर वो खेलने वाला था?

तो परेशानी का तो ऐसा है कि वही वजह किसी की परेशानी का निवारण कर सकती है तो किसी को और ज्यादा परेशान कर सकती है. गोया परेशानी न हो वाईन हो. दो पैग गुड और ज्यादा....!!

चलते चलते आदतन एक क्षणिका इस मौके पर भी :

देख कर

दुनिया की हालत

अक्सर

परेशान हो जाता हूँ मैं!!!

नाहक

ही

बदनाम हो जाता हूँ मैं!!

-समीर लाल ’समीर’

(हाल में सुने एक चुटकुले के आधार पर तैयार आलेख)
(चित्र साभार: गुगल)

रविवार, सितंबर 13, 2009

सपनों की दुनिया

बुजुर्ग बताते थे कि सपनों का आधार आपके दिमाग के कोने में पड़े वो विचार होते हैं जिन्हें आप पूरा होता देखना चाहते हैं किन्तु जागृत अवस्था में कुछ कर नहीं पाते. कह नहीं पाते और मूक दर्शक बने उन्हें अपने आसपास होता देखते रहते हैं. ऐसे विचार सपनों में आकर आपको झकझोरते हैं, जगाते हैं.


एक कविता, बिना किसी भूमिका के, प्रस्तुत करना चाह रहा था, इत्मिनान से पढ़ें और शायद कहीं आपको छुए/ झकझोरे, तो दाद दिजियेगा.

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जानता हूँ

सबके सपनों की
एक खास दुनिया होती है..
मेरी भी है.

और मैं
नींद के आगोश में आते ही
अक्सर
वहाँ पहुँच जाता हूँ..
अपनी  उसी दुनिया में

जहाँ दूर दूर तक फैला
एक मरुस्थल है..
जिसके बीच से
एक गंगा बहती है...

गंगा,
जो शंकर  की जटाओं से
नहीं निकली..
वो है
एक उस  क्न्या के 
आँसूओं की धार
जो जन्मीं ही नहीं..

सांस लेने के पहले
उसे मार दिया गया..
भ्रूण में ही..

शायद इसीलिये
गंगा के होते हुए भी
वो धरती
मरुस्थल है..

न कोई हरीयाली
न कोई पशु न पक्षी

बस,
रेतीले टीलों के बीच
कुछ गहरी खाईयाँ हैं

और

उन्हीं खाईयों में से
एक से निकलने का
प्रयास करता मैं..

रेत में अपनी
पकड़ बनाता
बार बार
फिसल जाता हूँ...

जाने कब नींद टूटती है...
उस दूनिया से निकल
इस अजब सी दुनिया में
आ जाता हूँ मैं..

प्रयास अब भी वही जारी है...
एक ठोस धरातल तक पहुँचने का!!

-समीर लाल ’समीर’

बुधवार, सितंबर 09, 2009

पीढ़ी दर पीढ़ी का सिलसिला

ये पीढ़ी दर पीढ़ी का सिलसिला रहा है कि अगली पीढ़ी को देख पिछली पीढ़ी सर धुनती है कि जाने क्या दिन आने वाले हैं? कौन सी दिशा में चल पड़े है सब?

लेकिन सदियों से जहाँ यह सर धुनने का सिलसिला चल रहा है, वहीं विकास का भी. कितने अविष्कार तो चमत्कार से लगते हैं.

evolution

सोचता हूँ पहली बार अगर मैने केलक्यूलेटर ईज़ाद किया होता, तो घर में कितनी लत भंजन हुई होती कि खुद से कुछ जोड़ नहीं पाते. गणित का अभ्यास शुन्य और निकले हैं कि मशीन जोड़ देगी.

मानो. मशीन बता भी दे कि १३ सत्ते क्या होता है, जानोगे कैसे कि सही बताया है..जब खुद ही १३ का पहाडा याद नहीं? चलो, सब किनारे रखो और पढ़ाई करो. दो तीन तमाचे तो पड़ ही जाते.

लेकिन आज बिना १३ और १९ का पहाड़ा कंठस्थ किए बच्चों का काम चल ही रहा है. जो मशीन कहती है, सच मान ही रहे हैं.

समय बदलता है, सोच बदलती है. खुद की सोच तक बदल जाती है.

जब मैं छोटा था तो पिता जी के दफ्तर वाला रामभजन चपरासी बनना चाहता था. क्या झकाझक सफेद कमीज और सफेद फुलपेन्ट पहनता था. चमेली का खुशबूदार तेल लगाकर फुग्गे वाले बाल काढ़ता था और बेहतरीन सलीके से जर्दे वाला खुशबूदार पान मूँह में. चमकती एटलस साईकिल पर आता था. जाने कब जिन्दगी के मोड़ पर सोच बदल गई, मैं जान भी नहीं पाया और मैं रामभजन चपरासी बनने से वंचित रह गया.

कभी मानवता का महत्व था, कभी रिश्तों का तो कभी पैसों और रुआब का.

हमारे समय तक कहा जाता था कि उतने ही पैर पसारो, जितनी लम्बी चादर हो. याने जितना पैसा हो, उसी हिसाब से खर्च करो. आज समय बदला है. अब कहते हैं उतना ही खर्च करना, जितने की ई एम आई भर पाओ.

तब व्यक्ति कैश खत्म होने पर खर्चा रोक लेता था. आज क्रेडिट कार्ड फुल होने पर रोकना पड़ता है.

ऐसे ही किसी बदलती पीढ़ी की माँ की चिट्ठी, गज़लनुमा बेटे के नाम (कभी कुछ, कभी कुछ बदलती वक्त के साथ):

बेटा...........

बदला बहुत जमाना बेटा
घर की लाज बचाना बेटा.

नर नारी सब एक बराबर
बीबी लड़की लाना बेटा.

होटल मंहगे बहुत हुए हैं
खाना घर पर खाना बेटा.

देर लगे गर घर आने में,
मिस्ड कॉल भिजवाना बेटा.

मिलता कर्जा, लेना उतना
जितना तुम भर पाना बेटा.

क्या पाओगे पढ़ लिख कर तुम
नेता तुम बन जाना बेटा.

खेल कूद में नाम कमा कर
फिल्में भी अजमाना बेटा.

बूढ़े अम्मा बाबा से भी
मिलने को तुम आना बेटा.

पोता कितना बड़ा हुआ है
फोटो तो भिजवाना बेटा.

बच्चे तेरे इंग्लिश बोलें
हिन्दी भी सिखलाना बेटा.

कुछ सालों में तुम बच्चों को
यही मेल भिजवाना बेटा.

-समीर लाल ’समीर’

रविवार, सितंबर 06, 2009

यूँ जवानी लौट के आई...

दो माह पुरानी बात जरुर है मगर समायिक है तो कह दे रहे हैं.

एक शाम नहाने के बाद शीशे में चेहरा निहार रहा था. एकाएक चेहरे पर माहौल देख एकदम से शरमा गये. एक पिम्पल निकल आया था.

पत्नी कहती है कि आज जरा ए शर्ट पहन कर चलो, इसमें बहुत यंग दिखते हो आप.

कभी कहती है कि ऐसे बाल मत झाड़ो, एकदम बुढ्ढे से दिखते हो.

अब उम्र की इस पड़ाव में जहाँ जवानी की आवाजाही कपड़े और बाल की स्टाइल निर्धारित करती हो, एक पिम्पल निकल आना एक आलोकिक एवं अद्भुत घटना ही कहलाई.

पत्नी बाजार गई थी. तुरंत मोबाइल खटखटाया गया. पत्नी को बताया कि ’खुशखबरी सुनो,  जवानी लौट आई है’

बाजार से तो क्या ज्यादा बात करती. सोचा होगा कि आज अकेले शाम को घर में छूट गये हैं सो रोक टोक तो है नहीं, ज्यादा पी गये होंगे और मदहोशी में समझ नहीं पा रहे कि क्या बात कर रहे हैं. हाँ हूँ करके फोन रख दिया कि आते हैं, फिर बात करेंगे.

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जब लौट कर आईं तो भी हमारा चहकना जारी ही था मगर वो तो आते ही:’ अगर एक पिम्पल से जवानी लौटती होती, तो जितने दुनिया भर के लम्बे लोग हैं, सब अमिताभ बच्चन होते.’

यही आदत इसकी हमें पसंद नहीं है. ये कैसी बात हुई ऐसे खुशी के मौके पर. चुपचाप मूँह बनाकर सो गये.

सुबह उठे तो चहेरे पर दसियों दाने और हाथ और पीठ पर भी. तुरंत घबरा कर पत्नी को उठाया. वो तो उठते ही मुस्कराहट के साथ बोलीं: ’लगता है जवानी फूट पड़ी है.’

जब हमने अपनी तकलीफ बताई कि सहन नहीं हो रहा तब शायद रहम खाकर बोली: ’चलो, हमारे साथ और तुरंत डॉक्टर को दिखाओ, कोई एलर्जी लगती है.’

गये डॉक्टर के पास मूँह लटकाये. दो इन्जेक्शन लगे और शाम तक, हमारे हिसाब से आई जवानी, वापस लौट गई.

अरे, वो तो मेहमान का भी ठीक से स्वागत न करो, मान सम्मान न दो तो लौटना तो तय है ही. मगर ये बात पत्नी को कौन समझाये?

ये भी कोई बात है क्या कहने की कि एक लम्बाई अकेले से अमिताभ बच्चन नहीं बना जाता जैसे अकेले पिम्पल निकल आने भर से जवानी नहीं आती. और भी कई गुण साथ में चाहिये जैसे अदाकारी, सुन्दरता, आवाज में कशिश आदि सब मिलकर एक अमिताभ तैयार होता है.

मगर हमारी जैसी ही सोच के कई लोग अपने ब्लॉग लेखन जगत में भी हैं. एक फ्री का ब्लॉग हाथ लग गया और देवनागरी में टंकण सीख गये, तो लगे साहित्यकार समझने.

साहित्यकार हमारी पत्नी की तरह सोच वाले, वो क्यूँ मानने लगे आपको साहित्यकार.

किन्तु मेरा सोचना यह है कि साहित्यकारों को मेरी पत्नी की तरह इतना तल्ख व्यवहार नहीं करना चाहिये. मैं तो पत्नी से भी कहना चाहता था कि लक्षण दृष्टिगत हुए हैं तो आजमाने में क्या हर्ज है. क्या पता, सच में जवानी लौट आई हो.

वैसे ही साहित्यकारों से भी निवेदन है कि कोई भी बात सिरे से ना खारिज करें. एक बार आजमा कर, पढ़कर तो देखें. शायद वाकई कोई साहित्य रच रहा हो. बाकी बचों को डॉक्टरी परामर्श को भेज देना या अपने हाल पर छोड़ देना. बिना इलाज मर जायेंगे और क्या. मगर जिस में सच में लक्षण उजागर हो जायें, उसे तो मान्यता दे दो.

समझाईश दोनों तरफ के लिए है कि एक पिम्पल से जवानी लौट आई है, ये न समझो और जवानी लौट ही नहीं सकती, ये मान्यता भी मत बनाओ. आजमा कर तो देखो.

चमत्कार होते हैं, इस बात पर विश्वास रखो.

मूड चेन्जर पंक्तियाँ:

यूँ

तन्हा

गुमसुम

बैठा

सोचता हूँ मैं....

कि

क्यूँ

कुछ

सोचता नहीं...

 

-समीर लाल ’समीर’

बुधवार, सितंबर 02, 2009

पहाड़ नदी-नदी पहाड़!!! ऑस्टिन यात्रा

१४ अगस्त से १८ अगस्त तक ऑस्टिन, टेक्सस की यात्रा चली.

ऑस्टिन, टेक्सस में साडू भाई रहते हैं (साधना की बहन और उनके पतिदेव). साडू भाई अच्छे पहचाने कवि हैं. संगत तो जमनी ही थी, उनके भाई भी बलिया, भारत से तशरीफ लाये हुए थे. वह भी कवि.

अह्हा!! आनन्दम आनन्दम!! की स्थिति थी हमारी. बेहतरीन महफिल जमीं.

कविताऐं तो चोर ले गया था मगर हमारा कम्प्यूटर तो हमारे पास ही था, उसी में देख देख कर पढ़े और खूब पढ़े. लगातार दो रातों को महफिल जमीं. तीनों ही तत्पर थे सुनाने को. एक दूसरे से आग्रह करें कि कुछ सुनाईये. सब समझ रहे थे कि एक सुनेंगे और पाँच सुनायेंगे मगर माहौल की बात थी, तो सुनी सुनाई गई.

ब्लॉगर टाईप माहौल बन गया. लिखने वाले भी ब्लॉगर, पढ़ने वाले भी ब्लॉगर, सुनने वाले भी ब्लॉगर. बहुत बढ़िया रहा. फिर उनके भाई साहब अपने बेटे के घर रहने चले गये और हमने ऑस्टिन घूमा. बरसाना धाम के सिवाय तो कुछ खास है नहीं वहाँ.

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बरसाना धाम, ऑस्टिन

साडू भाई का घर पहाड़ के उपर बना है. वहाँ से पहाड़, नदी सब नजर आता है. सब क्या, बस वही वही नजर आता है. इस खिड़की से देखो तो पहाड़ नदी. उस खिड़की से देखो तो पहाड़ नदी.कार से निकलो तो पहाड़ नदी. पैदल टहलो तो पहाड़ नदी. वो बार बार दिखायें और हम बार बार देखें.

दृष्य लुभावने थे मगर वही पुराने मंचीय कवि वाला हाल. माना कि कविता बहुत अच्छी लिखते हो, पढ़ते हो और फेमस भी हो मगर चार दशक से वही वही-हर बार वही कवितायें.. इस मंच से तो वही, उस मंच से तो वही, टी वी तो वहीं और अब तो ब्लॉग पर भी, फिर वही. कितनी बार वाह वाह करें भई. पका डाला पहाड़, नदी ने. मन फिल्मी स्टाईल में गाना गाने लगा-

ओ ओ ऊ ऊ..
पहाड़ और नदिया के किनारे
हम फिरते मारे मारे
कोई तो आ रे आ रे आ रे
मेरी जान बचा रे बचा रे!!!!
ओ ओ ऊ ऊ..
पहाड़ और नदिया के किनारे
ओ ओ ऊ ऊ..बह्हू बह्हू!! 

अगर कभी मौका लगे तो शरद जोशी का वो ’चक्रवर्ती गीतों का अर्थशास्त्र’ वाला व्यंग्य जरुर पढ़ना-जिसमें निरंजन जी सुनाते हैं-’ओ मेरी सोनचिरैया!!’

मेजोरटी से कहोगे तो हम ही मेहनत करके टाईप करके पढ़वा देंगे.

सोचा था कि ऐसे दृष्य देख देख कर कविता वगैरह लिखेंगे वहीं कई सारी. मगर देख देख कर हालत ऐसी हुई कि दिमाग ही बंद हो गया. खुद के नाम को लिखने की नौबत आ जाती तो भी कहो पहाड़ सिंग लिख डालते- ऐसा छा गये पहाड़ दिलो दिमाग पर.

अब हम झेले हैं तो आप भी देखो कुछ फोटो पहाड़, नदी की. जानता हूँ आप कहोगे कितना मनोरम, कितना सुन्दर. अरे, पहले दिन हम भी यही कहते न थकते थे मगर कभी हलवाई से पूछना मिठाई खाने के लिए.

 

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वैसे खातिर तवज्जो और मेहमानदारी जम के हुई ऑस्टिन में, उसका तो आनन्द ही अलग रहा. तो चलो अब सुनो हमारे साडू भाई की कविता: