बुधवार, दिसंबर 17, 2008

ऐसे बनी गज़ल कि मेरे होश उड़ गये!!!

बात थी आतंकवाद की. देश सन्न था. विचारसुन्नता की वो परम स्थिति जिस तक पहुँचने की कोशिश में हजारों विचार आ घेरते हैं न जाने कहाँ कहाँ से. जिन्हें भी मेडीटेशन का तनिक भी अनुभव है वो जानेंगे कि जब विचार शुन्यता की कोशिश करो तो अनायास ही कितने विचार आ घेरते हैं.

हजारों विचार. सीमित शब्दकोष फिर भी भरपूर उबाल. तो शुरु हुई रचना प्रक्रिया लेखन की. ढली एक गज़लनुमा कविता. अगर पूरी बहर में निकले तो गज़ल वरना गीत तो है ही. आदतानुसार मँहगे शब्दों से भयवश दूरी अतः हल्के फुल्के शब्द, गहरे भाव. .

From समीर अपनी बात कहते


वो देखो कौन बैठा, किस्मतों को बांचता है
उसे कैसे बतायें, उसका घर भी कांच का है.

नहीं यूँ देखकर मचलो, चमक ये चांद तारों सी
जरा सा तुम संभलना, शोला इक ये आंच का है.

वो मेरा रहनुमा था, उसको मैने अपना जाना था,
बचा दी शह तो बेशक, शक मगर अब मात का है.

पता है ऐब कितने हैं, हमारी ही सियासत में
मगर कब कौन अपना ही गिरेबां झांकता है.

यूँ सहमा सा खड़ा था, कौन डरके सामने मेरे
जरा सा गौर से देखा, तो चेहरा आपका है.

चलो कुछ फैसला लेलें, अमन की फिर बहाली का
वो मेरे साथ न आये, जो डर से कांपता है.

थमाई डोर जिसको थी, अमन की और हिफाजत की
उसी को देखिये, वो देश को यूँ बांटता है.

दिखे है आसमां इक सा, इधर से उस किनारे तक
न जाने किस तरह वो अपनी सरहद नापता है.

कफ़न है आसुओं का और शहीदों की मज़ारें है
बचे है फूल कितने अब, बागबां ये आंकता है.

-समीर लाल ’समीर’


जब यह सब टाइप करने बैठे तो साथ ही पीछे से अपने मित्र बवाल लगे अपनी आदतानुसार ताका झांकी करने. हमने पूछा भी कि भई ,क्या बात है, कुछ बात जंची भी या नहीं. जाने किस किस मूड में तो रहता है वो भी. लगता है उस समय अमीर खुसरो या मीर तकी ’मीर’ मोड में रहा होगा और उर्दु का जानकार तो है ही एक बेहतरीन गायक और गज़लकार होने के साथ साथ. कैसे पचा ले इतनी सरलता से. इसीलिये मैं उन महिलाओं से हमेशा कहता हूँ जिनके पतियों को खाना बनाना नहीं आता कि तनिक भी दुखी न हो बल्कि तुम तो बड़ी सुखी हो. कम से कम पतिदेव ये तो नहीं कहते कि फलाना मसाला कम है या ठीक से भूना नहीं. जो परोस दो वो ही बेहतरीन.

बस, बवाल ने भी निकाली अपनी उर्दु की तरकश, गज़ल ज्ञान का तलवार और लगे गाते हुए नये नये अंदाज में पैंतरें आजमाने और जुट गये विकास कार्य में. तब जो गज़ल निकल कर आई और उन्होंने गाई, भाई वाह. आप भी पढ़ें और बतायें कि क्या विचार बनता है इस पर:

From बवाल की बात



वो जो बेदार बैठा, क़िस्मतों को बाँचता हैगा
उसे टुक ये बता दे, उसका घर भी काँच का हैगा

मचलना मत, चमक ये देखकर के, चाँद तारों की
सम्भलना पर, सम्भलना शो'ला ठंडी आँच का हैगा

फ़ित्नापरवर हैं सब रहबर, हमारी इस सियासत के
मगर अब कौन ख़ुद का भी गरेबाँ, झाँकता हैगा

वो मेरा रहनुमा था, उसको मैंने अपना जाना था
बचा दी शह तो बेशक, शक मगर अब मात का हैगा

थमाई डोर जिसको थी अमन की, और हिफ़ाज़त की
उसी को देखिये, वो मुल्क को यूँ काटता हैगा

दीखे है आसमाँ यकसा, इधर से उस किनारे तक
न जाने किस तरह वो मेरी सरहद, नापता हैगा

वो दरकारे-जनाज़ा थी, जो चिलमन आपकी सरकी
वगरना आपका हमसे ही कितना, वास्ता हैगा ?

कफ़न हैं आँसुओं के और मज़ारें, हैं शहीदों की
बचेंगे फूल कितने बाग़बाँ ये, भाँपता हैगा

जो गै़रत की वजह से, चश्मे-पुरनम सामने आया
ज़रा सा गौ़र फ़रमाया तो चेहरा, आपका हैगा

हाँ डटकर फैसला करलें अमन की, ख़ुश बहाली का
वो मेरे साथ न आए जो डर से, काँपता हैगा

बवाल इस बात पर है के ये क़ीमत, 'लाल' की कम है
तो तय करके बता दें, वो हमें क्या, आँकता हैगा


शब्दार्थ :-

बेदार= सचेत, हैगा= है, फ़ित्नापरवर= षड्यंत्रकारी,
दरकारे-जनाज़ा = शवयात्रा में शामिल हो जाने की चाह
चिलमन = परदा, गै़रत = स्वाभिमान
लाल = रत्न

बुधवार, दिसंबर 10, 2008

पल-छिन वो सुहाने वाले !!


अब न वो ताज रहा, औ न उसके चाहने वाले !
सहम के आते हैं, इस मुल्क में, वो जो हैं, आने वाले !!

हमें तो याद हैं अब भी, इसके दिन जो पुराने वाले !
लो बुला लाते हैं फिर से, पल-छिन वो सुहाने वाले !!


जी हाँ, मैं उसी ताज की बात कर रहा हूँ जो मेरी प्रथम पाँच सितारा होटल की यात्रा का साक्षी रहा. अभी हालात जो भी हों..पाँच सितारा होटल में कदम रखने का अभियान यहीं से शुरु हुआ था. आज उसी को याद करते हुए यह संस्मरण:


Picture Taj Hotel, Mumbai



पहली बार किसी फाईव स्टार होटल में घुसने का मौका था एक दोस्त के साथ.

तय हुआ था कि एक एक कॉफी पी जायेगी. एक कोई वहाँ बिल और १०% टिप देगा. बाहर आकर आधा आधा कर लेंगे. इसी बहाने फाईव स्टार घूम लेंगे,

छात्र जीवन था. बम्बई में पढ़ रहे थे. एक जिज्ञासा थी कि अंदर से कैसा रहता होगा फाईव स्टार. छोटे शहर के मध्यम वर्गीय परिवार से आये हर बालक के दिल में उस जमाने में ऐसी जिज्ञासायें कुलबुलाया करती थीं.

बम्बई से जब घर जाया करते थे तो वहाँ रह रहे मित्रों के सामने अमिताभ बच्चन वगैरह के नामों को इग्नोर करना बड़ा संतुष्टी देता था जैसे उनसे बम्बई में रोज मिलते हों और उनका कोई आकर्षण हममें शेष नहीं बचा है. यथार्थ ये था कि एक बार दर्शन तक नहीं हो पाये थे तब तक.

खैर बात फाईव स्टार की हो रही थी. होटल तय हुआ ताज. दोपहर से ही दो बार दाढ़ी खींची. सच कहता हूँ डबल शेव या तो उस दिन किया या अपनी शादी के दिन.. बस!!! सोचिये, दिलो दिमाग के लिए कितना बड़ा दिन रहा होगा.

अपनी सबसे बेहतरीन वाली सिल्क की गहरी नीली कमीज, जो अमिताभ नें मिस्टर नटवर लाल में पहनी थी, वो प्रेस करवाई. साथ में सफेद बेलबॉटम ३४ बॉटम वाला. जवानी का यही बहुत बड़ा पंगा है कि आदमी यह नहीं सोचता कि उस पर क्या फबता है. खुद का रंग रुप कैसा है. वो यह देखता है कि फैशन में क्या है. जब तक यह अच्छा बुरा समझने की समझ आती है, तब तक इसका असर होने की उमर जा चुकी होती है. दोनों तरफ लूजर.

४५ साल तक सिगरेट पीते रहे और फिर छोड़ कर ज्ञान बांटने लगे कि सिगरेट पीना अच्छा नहीं. मगर उससे होना क्या है, जितनी बैण्ड लंग्स की बजनी थी, बज चुकी. अब तो दुर्गति की गति को विराम देने वाली ही बात शेष है.

खैर, शाम हुई. हाई हील के चकाचक पॉलिश किये हुए जूते पहनें हम चले फाईव स्टार-द ताज!!!

चर्चगेट तक लोकल में गये और फिर वहाँ से टेक्सी में. ४-५ मिनट में पहूँच गये. दरबान नें दरवाजा खोला. ऐसा उतरे मानो घंटा भर के बैठे टेक्सी में चले आ रहे हैं. दरबान के सलाम को कोई जबाब नहीं. बड़े लोगों की यही स्टाईल होती है, हमें मालूम था.

सीधे हाथ हिलाते फुल कान्फिडेन्स दिखाने के चक्कर में संपूर्ण मूर्ख नजर आते (आज समझ आता है) लॉबी में. और सोफे पर बैठ लिए. मन में एक आशा भी थी कि शायद कोई फिल्म स्टार दिख जायें. नजर दौड़ाई चारों तरफ. लगा मानो सब हमें ही घूर रहे हैं. यह हमारे भीतर की हीन भावना देख रही थी शायद. मित्र नें वहीं से बैठे बैठे रेस्टॉरेन्ट का बोर्ड भांपा और हम दोनों चल दिये रेस्टॉरेन्ट की तरफ.

अन्दर मद्धम रोशनी, हल्का मधुर इन्सट्रूमेन्टल संगीत और हम दोनों एक टेबल छेक कर बैठ गये. मैने सोचा यहाँ तक आ ही गये हैं तो बाथरुम भी हो ही लें. बोर्ड भी दिख गया था, दोस्त को बोल कर चला गया.

अंदर जाते ही एक भद्र पुरुष सूटेड बूटेड मिल गये. नमस्ते हुई और हम आग्रही स्वभाव के, कह बैठे पहले आप हो लिजिये. वो कहने लगे नहीं सर, आप!! बाद में समझ आया कि वो तो वहाँ अटेडेन्ट था हमारी सेवा के लिए. हम खामखाँ ही फारमेल्टी में पड़ लिए. बाद में वो कितना हँसा होगा, सोचता हूँ तो आज भी शर्म से लाल टाईप स्थितियों में आ जाता हूँ.

वापस रेस्टॉरेन्ट में आये, तब तक हमारे मित्र, जरा स्मार्ट टाईप थे उस जमाने में, कॉफी का आर्डर दे चुके थे.

कॉफी आई तो आम ठेलों की तरह हमारा हाथ स्वतः ही वेटर की तरफ बढ़ गया आदतानुसार कप लेने के लिए और वो उसके लिए शायद तैयार न रहा होगा तो कॉफी का कप गिर गया हमारे सफेद बेलबॉटम पर. वो बेचारा घबरा गया. सॉरी सॉरी करने लगा. जल्दी से गीला टॉवेल ला कर पौंछा और दूसरी कॉफी ले आया. हम तो घबरा ही गये कि एक तो पैर जल गया, बेलबॉटम अलग नाश गया और उस पर से दो कॉफी के पैसे. मन ही मन जोड़ लिए. सोचे कि टिप नहीं देंगे और पैदल ही चर्चगेट चले जायेंगे तो हिसाब बराबर हो जायेगा. अबकी बारी उसे टेबल पर कप रख लेने दिये, तब उसे उठाये.

बाद में उसने फिर सॉरी कहा और बताया कि कॉफी इज ऑन द हाऊस. यानि बिल जीरो. आह!! मन में उस वेटर के प्रति श्रृद्धाभाव उमड़ पड़े. कोई और जगह होती तो पैर छू लेते मगर फाईव स्टार. टिप देने का सवाल नहीं था क्यूँकि नुकसान हुआ था सो अलग मगर जीरो का १०% भी तो जीरो ही हुआ. तब क्या दें?

चले आये रुम पर गुड नाईट करके उसे, दरबान को और टैक्सी वाले को. कॉफी का दाग तो खैर वाशिंग पाउडर निरमा के आगे क्या टिकता. ५० पैसे के पैकेट में बैलबॉटम फिर झकाझक सफेद.

फिर तो कईयों को फाईव स्टार घुमवाये. एक्सपिरियंस्ड होने के कारण हॉस्टल में हमारे जैसे शहरों और परिवेष से आये लोग अपना अनुभव बटोरने के लिए हमारा बिल पे करते चले गये.

अनुभव की बहुत कीमत होती है, हमने तभी जान लिया था.

रविवार, दिसंबर 07, 2008

आओ तुम्हें सट्टा खिलवायें!!

भाई जी, आपका ठिया तो सबसे बड़े बाजार में है. पता चला है, होल सेल में डील करते हो. कुछ हमें भी बताओ भाई, सुना है दिवाली सेल लगी है आपके बाजार में.

हमने कहा कि दिवाली कहो या दिवाला. सेल तो लगी है ६०% से ७०% की भारी छूट चल रही है. एस एम एस से विज्ञापन भी किया जा रहा है. स्लोगन भेजा जा रहा है, आपको भी मिल गया लगता है..आपके जमाने में बाप के जमाने के भाव. और जाने क्या क्या विज्ञापन किये गये हैं.

मुझे सेठ दीनानाथ की आढत याद आ गई. दिन भर मंडी के बीचों बीच अपनी दुकान पर तख्त पर बिछे सफेद गद्दे पर आधे लेटे रहते थे. बंडा और प्रदर्शनकारी धोती पहने. भई, जब प्रदर्शनकारी नेता हो सकता है तो धोती क्यूँ नहीं. जो भी प्रदर्शन करे, वो प्रदर्शनकारी, ऐसी मेरी मान्यता है. मेरी नजर में तो मल्लिका शेहरावत और राखी सावंत के डिज़ानर परिधान को भी प्रदर्शनकारी श्रेणी में ही रखता हूँ. खैर, सेठ के मूँह में हर समय पान. सामने मुनीम अपने हिसाब किताब में व्यस्त. बस, होलसेल का व्यापार था उनका भी, इसीलिए याद हो आई.

उनके ठीक विपरीत हम. न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज, टोरंटो स्टॉक एक्सचेंज, नेसडेक और शिकागो कमॉडेटी एक्सचेंज पर डील तो करते हैं मगर कुर्सी पर सीधे बैठे सामने कम्प्यूटर लगाये. न आसपास घूमते बजारिया सांड और न ही पास बैठा मुनीम. मुनीम, चपरासी से लेकर सब कुछ खुद. माल की खरीदी बिक्री सब कम्प्यूटर पर. अगर अपने आप को ट्रेडर न बतायें तो कोई कम्प्यूटर ऑपरेटर ही समझे.


Picture Stock Trader


मित्र कहने लगे कि हाँ, विज्ञापन तो मिला. इसीलिये फोन किये हैं. भाई, बहुत घाटा लग गया. आप तो वो माल बताओ जिसको १०० टका ऊपर ही जाना हो, बस, वो ही लेंगे और एक बार लॉस पूरे हुए तो जीवन में स्टॉक एक्सचेंज की दिशा में सर रख कर सोयेंगे तक नहीं. खेलने की तो छोड़ो.

हमने उनको पहले भी समझाया था और फिर समझाया कि भाई, हम तो बस आप जो बोलो, वो खरीद देंगे और जो बोलो, वो बेच देंगे. हमारे लिए तो हर माल बराबर, हमें तो दोनों हालात में कमीशन बस लेना है. चाहे बेचो तब और खरीदो तो. जिस दिन हमें या इन बाजार एनालिस्टों को ये मालूम चलने लग जाये कि ये वाला तो पक्का ऊपर ही जायेगा तो क्या पागल कुत्ता काटे है जो सुबह से शाम तक कम्प्यूटर लिये लोगों के लिए खरीदी बेची कर रहे हैं. घर द्वार बेच कर सब लगा दें और एक ही बार में वारा न्यारा करके हरिद्वार में आश्रम खोलकर साधु न बन जाये और जीवन भर एय्याशी करें. ये सब बाजार एनालिस्ट मूँह देखी बात करते हैं आज जो दिखा वो कह दिया, कल जो दिखा तो बदल गये.

हम में और नारियल बेचने वाले किराना व्यापारी में बस यही फरक है. दोनों को माल बेचने से मतलब है मगर हर आने वाले को वो नारियल देते वक्त एक को हिलाकर कान में न जाने क्या सुनता है. फिर उसे किनारे रख दूसरा उठाकर बजाता है और कहता है कि हाँ, ये ठीक है. इसे ले जाईये और आप टांगे चले आते हैं जबकि ऐसे ही हिला हिला कर शाम तक वो सारे नारियल बेच लेता है और आप भी खुश, वो भी खुश. हमारे यहाँ ऐसा हिलाने का सिस्टम नहीं हैं. निवेशक को बाजार खुद हिला लेता है इसलिये हमें हिलाने की जरुरत नहीं.

जिस दिन आप इस दिशा में सर रख कर सोना बंद कर दोगे, उस दिन से हम क्या घास छिलेंगे. ऐसा अशुभ न कहो एन धंधे के समय भाई.

अजी, आप तो अंतिम दमड़ी तक खेलो. जब पूरा बर्बाद हो जाओ, तब मजबूरी में बंद हो ही जायेगा, इसमें प्रण कैसा करना. हमें भी तब तक १० दूसरे मूर्ख मिल जायेंगे जो रातों रात लखपति बनना चाहते, हम उनसे अपना काम चला लेंगे. कसम खाते हैं आपको याद भी न करेंगे.

तो बोलो, क्या आर्डर लिखूँ...सब माल चोखे हैं.
ऐसा मौका कहाँ बार बार आता है जब ६०% से ७०% तक छूट चले और आपके जमाने में बाप के जमाने के भाव पर माल मिलें.

जल्दी..फटाफट आर्डर बोलो. टाईम न खोटी करो.

नोट: यूँ भी अगर हम तुम्हें अपना खास मान कर बाजार से दूर रहने की सलाह दें तो तुम मानोगे थोड़ी न बल्कि किसी और ट्रेडर के यहाँ जाकर खेलोगे. फिर हम ही अपनी कमाई क्यूँ छोड़ें. ये बाजार ही अजीब है कि जब तक खुद न हार लो सब जीते हुए ही नजर आते हैं.