रविवार, मई 30, 2010

हे प्रभु!! ये कैसी दुनिया तेरी!

कमर का दर्द, वैसे तो अब काहे की कमर, कमरा ही कहो, हाय!! बैठने नहीं देता और ये छपास पीड़ा, लिखूँ और छापूँ, लेटने नहीं देती. कैसी मोह माया है ये प्रभु!! मैं गरीब इन दो दर्दों की द्वन्द के बीच जूझता अधलेटा सा - दोनों के साथ थोड़ा थोड़ा न्याय और थोड़ा थोड़ा अन्याय करने में व्यस्त. वैसे तो थोड़ा थोड़ा न्याय और थोड़ा थोड़ा अन्याय करते रहना ही सफल जीवन का सूत्र है मगर दर्द!!!

छपास पीड़ा पत्नी के समान लगातार साथ बनी रहती है और यह कमर का दर्द, मानो महबूबा की याद, लौट लौट आती है, लौट लौट जाती है. महबूबा तो महबूबा होती है, समय समय पर बदल भी जाती है.

पिछले बरस इसी सीजन में महबूबा थी एसीडीटी और अब की बार है यह कमर दर्द. उसी महबूबा की याद के समान कमर दर्द किसी को दिखता भी नहीं. चोट लगी हो, प्लास्टर बँधा हो, आँख सूज आई हो तो लोगों को दिखता है, साहनुभूति मिलती है. मगर कमर दर्द, पत्नी सोचे कि काम न करना पड़े इसलिए डले हैं और ऑफिस वाले सोंचे कि ऑफिस न आना पड़े, इसलिए डले हैं, और मित्र तो खैर आलसी मान कर ही चलते हैं.

छपास पीड़ा के चलते लिखने बैठ जाओ तो पत्नी की सोच और मजबूत हो. देखो, कम्प्यूटर के लिए उठने बैठने में कोई दर्द नहीं और वैसे पड़े हैं करहाते हुए. मुआ कम्प्यूटर न हुआ, दवा हो गई कि सामने बैठ जाओ और दर्द गायब. क्या जबाब दिया जाये इसका? कोई जबाब हो भी नहीं सकता सिवाय इसके कि नजर बचा कर कम्पयूटर का इस्तेमाल किया जाये. अभी भी बाजार के निकली है तो मौका निकाल कर बैठे हैं. हालांकि कमर में दर्द है मगर कहते हैं न कि बड़ा दर्द छोटे दर्द को भुलवा देता है सो लिख रहे हैं.

आप सोच सकते हैं कि मैं कमर दर्द से परेशान हूँ तो पत्नी बाजार कैसे निकल गई? सोचने पर कैसी रोक? पत्नी मेरी है, मैं नहीं सोच रहा मगर आप नाहक सोच सोच कर परेशान हैं मगर क्या करें, हम भारतीय. यही तो हमारी पहचान है. लेकिन ये कमर दर्द तो अब इतनी इतनी सी बात पर हो उठता है कि अगर इसके पीछे वो बाजार जाना छोड़ दे तो कहो, बाजार का रास्ता ही भूल जाये और छपास पीड़ा, इसके लिए रुके तो यह तो वैसा ही हो गया कि साहब को बीपी रहता है, इसलिए बाजार नहीं जा रहे. यह तो इन बिल्ट बीमारी है, इसमें रुकना कैसा?

वैसे तो बाजार वो आदतन भी चली जाती है बिना किसी काम के भी जैसे हमारा कमर दर्द चला आता है लेकिन आज खास प्रयोजन से निकली है इसलिए निश्चिंत हूँ कि दो घंटे के पहले तो आने वाली नहीं, तब तक लिख लिखा कर छाप डालूँगा और मूँह ढक कर सो जाऊँगा. बीमारी में बीमार न लगे, तो क्या खाक लगे गालिब!!

बाजार जाने का खास प्रयोजन ऐसे बना कि आज सुबह मुझे कमर दर्द में जरा आराम था तो नीचे चला आया टहलने. पत्नी पीछे बैक यार्ड में कुछ क्यारियाँ सजाने में जुटी थी. हम भी पीछे निकल गये. कल ही नई पत्थर वाली सीढ़ी बनाई थी.

उसी से उतरते पैर संभाल नहीं पाये और भदभदा कर घास में गिर पड़े. दो कुलाटी खाई. कल्पना कर के मुस्करा रहे हैं न आप? शरीर तो ऐसा हो गया है कि अगर समतल सड़क पर भी बैलेन्स जमा कर न चलें तो गिर पड़ें फिर वो तो सीढ़ी थी. गिरे, पैर मुड़ा सो अलग और कमर दर्द को तो मानो ब्याह का सुस्वागतम का बोर्ड दिख गया हो, नाचते गाते बैण्ड लिए फिर चला आया. किसी तरह उठ कर वापस चले आये बिस्तर पर.

लेटे ही थे कि पत्नी तैयार होती नजर आई. जिज्ञासावश जानना चाहा कि कहाँ चली? कहने लगी, अच्छा हुआ आप गिर पड़े कम से कम चैक हो गया. मुझे पहले ही संदेह था कि सीढी में पत्थर छोटे लग गये हैं. अब जाकर बड़े ले आती हूँ वरना कोई गेस्ट न गिर जाये पार्टी वगैरह में.

अब बताईये, हम तो हम न हुए, टेस्टर हो गये और उपर से सुनने मिला कि अच्छा हुआ गिर पड़े, कम से कम चैक हो गया? पत्नी न हुई वो वाली गुजराती हो गई जो गलती से कुऎँ में गिर जाये तो निकलने का इन्तजाम बाद में देखेगी, पहले स्नान कर लेगी कि अब गिर तो गये ही हैं, पहले स्नान कर लें.

अब यह लिख कर जब सोऊँगा तो हीटिंग पैड रख लूँगा शायद सोते में दर्द न बढ़े!! दर्द बताया न महबूबा की याद सा है, सोते में ज्यादा बढ़ जाता है.

अस्पताल जाने का मन नहीं है, वहाँ पिछली बार धोखा लग गया था. इसी दर्द के चलते गये थे अस्पताल. डॉक्टर ने कहा कि दो दिन भरती रहना पड़ेगा. रुम अलॉट हो गया. डॉक्टर देख दाख कर दवाई दे कर चला गया. कह गया कि अब नर्स के हवाले. पत्नी को भी घर भेज दिये कि अब नर्स देख लेगी.

थोड़ी देर में एक काला (आम इन्सानों की तरह ही अपनी खोट मुझे भी नजर नहीं आती-मगर सामने वाली की खोट पर फट से नजर चली जाती है) बड़ा ऊँचा पूरा आदमी सामने आकर दाँत चियारे खड़ा हो गया. मैने पूछा, कहो भाई, कैसे आना हुआ? कहने लगा मैं आपकी नर्स हूँ.

बताओ, बीमार आदमी के साथ ऐसी चीटिंग और चुहल!! भला अच्छा लगता है क्या? हमारे भारत में तो नर्स लड़कियाँ होती हैं. नर्स का नाम सुनते ही जो आकृति मानस पर छा जाती है, उसमें पुरुष का कैसा स्थान? ये कैसी नर्स? पूरी परिभाषा ही बदल कर रख दी. एन फॉर नर्स पढ़ाते थे स्कूल में जब तो कितनी बेहतरीन सफेद स्कर्ट में फोटो रहती थी और एक ये हैं मानो एन फॉर नालायक!! बीमार आदमी को हैप्पी की बजाय सैड कर दिया. उसी को पाप लगेगा, हमें क्या!!

खैर, जमाना बदला है, पहले पत्नी के नाम पर भी कहाँ पुरुष सुने थे, अब तो जहाँ देखो वहीं सरकारी मान्यता प्राप्त पति पत्नी-दोनों पुरुष या दोनों महिलाएँ. ये कैसा बदलाव आया है तेरी दुनिया में प्रभु!!! वो दिन दूर नहीं जब आप अपनी पत्नी के रुप में किसी सुन्दर कन्या का स्वप्न सजाये बैठे होंगे और माँ बाप आपकी शादी किसी लड़के से सेम सेक्स मेरिज अधिनियम के तहत तय कर आयें.

लोग ’गे कपल’ से मिलें तो पूछें कि भाई साहब आपकी अरेंजड मेरिज थी या लव? आप सोच रहे होंगे कि ’ऐसा भी भला कभी हो सकता है.’ ठीक सोचा, हमारे जमाने में, बहुत पुरानी बात नहीं है फोटो देख लो हमारी, कोई हमसे कहता कि एक लड़का एक लड़के से शादी करेगा तो हम भी यही कहते कि ’ऐसा भी भला कभी हो सकता है.’ लेकिन होने लगा न!!

पूरा मूड सत्यनाश हो गया अस्पताल में भरती होने का. कमर दर्द भी खुद ही ऊड़न छू हो गया और हम अगले दिन ही घर चले आये.

अब ऐसी धोखाधड़ी की जगह कौन खुद से चल कर जाना चाहेगा, इसलिए इस बार घर पर ही आराम करते हैं. 

बुधवार, मई 26, 2010

दाल, भात और भाटे पालक की भाजी!!!

”अम्मा, खाना लगा दे”
”क्या हुआ, आज जल्दी जायेगा क्या स्कूल?”
”हाँ अम्मा, वो क्लास के पहिले सुदेश की गणित किताब से कुछ प्रश्न उतारने है. उसके पास अंग्रेजी स्कूल की किताब भी है न.”

अम्मा जल्दी जल्दी भाप छोड़ते भात, अधपकी छितरी राहर की दाल और लगभग पक गई भाटे पालक की भाजी थाली में डाल कर दे देती है और उस पर से आधा चम्मच देशी घी. स्कूल जायेगा, दिन भर पढेगा तो घी से ताकत बनी रहेगी. अम्मा घर पर मलाई से बनाती है अनिल के लिए देशी घी.

अनिल जल्दी अल्दी फूँक फूँक कर खाने लगता है. पूरा खाना बिना खाये ही दिवाल घड़ी पर नजर पड़ती है और वो खाना छोड़ कर भागता है. अम्मा कहती है, अन्न का अपमान नहीं करते बेटा. खाना आराम से खाते हैं. मगर अनिल को तो स्कूल जाने की जल्दी है सो भागता है.

बरामदे से साईकिल निकाल कर, जब तक अम्मा बाहर आये, अनिल आवाज लगा कर निकल जाता है. गली से सड़क पर आकर कोने में ही शर्मा जी की कोठी है जिनकी फैक्टरी में अनिल के पिता जी काम करते हैं. शर्मा जी की कोठी के बाहर एक साथ तीन कारें खड़ी होती हैं. एक शर्मा जी की, एक उनकी पत्नी की और एक शुभि की सफेद वाली दो दरवाजे की. शुभि उसी से स्कूल जाती है.

अनिल के सरकारी स्कूल से पिछली सड़क पर शुभि का कान्वेन्ट स्कूल है तीन मंजिला लाल रंग का.

अनिल को जल्दी स्कूल पहुँचना है, वो तेजी से साईकिल के पैडल मारता है. आज जाने क्यूँ एड़ी में दर्द भी है.

अनिल कक्षा में बैठा है. मास्साब भौतिकी के चुम्बकत्व के सिद्धांत वाला अध्याय पढ़ा रहे हैं अनिल बैन्च पर बैठा अपने खपड़ैल की छत वाले क्लास रुम की खिड़की से बाहर पीछे के वाले स्कूल की ओर ताक रहा है. ढेरों लड़कियाँ उस स्कूल में पढ़ती है. नीला ट्यूनिक और सफेद कमीज पहने. परियों जैसी लगती सब अनिल को उजली उजली सी. सबके बैठने की अलग अलग कुर्सी. दूर से कुछ साफ तो दिखता नहीं, बस बैठा कल्पना करता रहता कि शुभि ही होगी जो खिड़की से दिखाई दे रही है.

एक बार शार्मा जी के दरबान के लड़के से पूछा था तो उसने बताया था कि शुभि भी उसी कक्षा में है जिसमें अनिल पढ़ता है.

दिन में लंच की छुट्टी में अनिल भी दोस्तों के साथ धूल में सतोलिया खेल रहा है. गेंद पीछे झाड़ियों में जाती है. अनिल दौड़कर गेंद उठाने जाता है. उस स्कूल का बड़ी ऊँची ऊँची जालियों का बाड़ा है. बाड़े के उस पार कुछ लड़कियाँ बेड मिंटन खेल रही हैं. कुछ हरी हरी दूब में गोला बना कर गप्प करती खाना खा रही हैं. अनिल ने झाड़ियों के बीच से छुप कर देखा, उसे शुभि दिखाई पड़ी अपनी सहेलियों के साथ बैठे खाना खाते. शुभि खाने में सैण्डविच खाती है.

अनिल लौटकर आ जाता है. अब उसका खेलनें का मन नहीं. क्लास रुम में आकर अपना खाने का डिब्बा निकाल लेता है. अम्मा ने चाव से दो रोटी के साथ आम का अचार रखा है. उसे जाने क्यूँ आज खाना खाने का मन नहीं है. डिब्बा बन्द करके बस्ते में रख देता है. उसे प्यास लगी है. पानी की टंकी तक जाता है. पीछे स्कूल पर फिर नजर जाती है. एक लड़की वाटर बोटल से पानी पी रही है. अनिल टंकी से हाथ धो कर लौट आता है.

शाम को साईकिल से घर लौट रहा है. शुभि की कार शर्मा जी के घर के बाहर खड़ी है जबकि उसका स्कूल अनिल के स्कूल के १५ मिनट बाद छूटता है लेकिन वो हमेशा घर पहले पहुँच जाती है चाहे अनिल कितनी भी तेज साईकिल चला कर लौटे.

रात होने लगी है. अम्मा ने आंगन में खटिया लगा दी है. अनिल खटिया पर जाकर लेट जाता है. अम्मा सर पर तेल मल रही है, और वो चाँद को देख रहा है. वही उसका खिलौना है जिससे वो बचपन से खेलता आया है.

अनिल इन्जिनियर बन गया है. बाबू जी तो उसकी इन्जिरिंग की पढ़ाई खत्म होते ही चल बसे थे और फिर छः महिने में अम्मा भी. अनिल को एक अच्छा ऑफर मिला और वो अमरीका आकर बस गया है. बीबी और दो बच्चों का परिवार है.

दरवाजे पर तीन गाड़ियाँ हैं. एक खुद की सफेद कार दो दरवाजे वाली, एक पत्नी की और एक वैन, जब परिवार के साथ कहीं लम्बा जाना होता है तब के लिए.

ऑफिस जाने को तैयार होता है.

पत्नी ने ब्रेकफास्ट के लिए सेण्डविच लगा दिये हैं और एक सैण्डविच और फ्रूट लंच के लिए पैक कर दिया है. साथ में मिनरल वाटर की ठंडी बोतल.

आज अनिल को सेण्डविच के बदले वो भाप छोड़ते भात, अधपकी राहर की दाल और लगभग पक गई भाटे पालक की भाजी थोड़ा सा घी डाल कर खाने का मन है.

वो पत्नी से कहता है. पत्नी हँस देती है. ”नो भात, नो घी. मोटा होना है क्या?”

कह रही है ”जल्दी निकलो और ये सैण्डविच भी साथ लेते जाओ, ड्राईव करते हुए खा लेना वरना ऑफिस को देर हो जायेगी.”

फिर छेड़ते हुए हंसती है ’ ”हर समय बस खाने में ही मन लगा रहता है मोटूराम का!!”

बेटा पूछ रहा है ”डैडी ये भाटे पालक क्या होता है?”

आज जाने क्यूँ अम्मा की याद आ रही है उसे.

उसकी आँखें नम हैं.

aadhasach1

-समीर लाल ’समीर’

रविवार, मई 23, 2010

यशस्वी ब्लॉगर भवः !!

आज दिल्ली में ब्लॉगर मीट हो चुकी है. तरह तरह के विचार रखे गये. ऐसे वक्त में किसी भी और विचार से ज्यादा जरुरी यह विचार हो जा रहा है कि जब लोग इस बारे में कल अखबार में पढ़ेंगे तो ब्लॉग खोलना चाहेंगे.

इसी बात को मद्देनजर मैने यह बताता चलूँ कि आजकल जमाना बदल गया है और ब्लॉगिंग करने के लिए किन वस्तुओं की आवश्यक्ता है. अगर आप नीचे लिखी सामग्री एकत्रित कर लेते हैं तो बस फिर देर किस बात की.  आगाज किजिये सफल ब्लॉगिंग के सफर लिए और फिर हम तो बैठे ही हैं प्रथम स्वागत टिप्पणी आरती में कट पेस्ट कर सजाये. आईये तो सही:

monkey

ब्लॉगिंग के लिए अति आवश्यक सामग्री:

  • एक लैपटॉप/ डेस्कटॉप
  • एक कैमरा
  • इंटरनेट कनेक्शन
  • एक मुख्य ब्लॉग अपने नाम का
  • तीन ब्लॉग छ्द्म नामों से
  • ५ बेनामी रजिस्ट्रेशन टिप्पणी के लिए
  • एक हैलमेट
  • एक नेलकटर: वरना सर खुजाते खुद की खोपड़ी जख्मी हो सकती है.
  • एक किताब: २४ दिन में बेसिक भोजपुरी लिखना सीखें.
  • एक गुरु
  • चार चेला
  • गाली-कोश
  • भविष्य के लिए रिवाल्वर का लाईसेन्स: (तब तक अनऑफिसियली तमंचा रखे रहिये)
  • एक वकील
  • दो पत्रकार मित्र
  • कोर्ट से अग्रिम जमानत
  • एक बोतल स्कॉच: गाली पड़े तो गम मिटाने के लिए वरना कभी भी जश्न मनाने के लिए. जश्न मनाने के बहुत मौके आयेंगे जैसे ५० वीं पोस्ट, १०० वीं पोस्ट, १००० हिट्स, १०० फालोवर, एक साल पूरा होना और भी जाने क्या क्या.

अब तो कन्टेन्ट की समस्या से भी जूझने की जरुरत नहीं. किसी की भी कविता उठाओ और कर डालो पैरोडी. बहुत हिट चल रही है. एक मैने भी तो की है बतौर आपके लिए एक्जाम्पल:

पं. माखनलाल चतुर्वेदी से क्षमायाचना समेत:

ब्लॉगर की अभिलाषा

चाह नहीं मैं ब्लॉगर बन के
लेख ठेलता जाऊँ
चाह नहीं सम्मानित होकर
माला से लादा जाऊँ
चाह नहीं साहित्यजगत में
हे प्रभु, खूब सराहा जाऊँ
चाह नहीं मैं कविता लिखकर
कविवर श्रेष्ट कहलाऊँ
मुझे पढ़ लेना ओ साथी
देना तुम टिप्प्णी और पसंद एक
उँची बने पसंद ब्लॉगवाणी पे
जिसे देख आयें ब्लॉगर वीर अनेक.

-समीर लाल ’समीर’

बुधवार, मई 19, 2010

बहता दरिया है शब्दों का!!

जबलपुर प्रवास में शायद ही कोई ऐसा सप्ताह गुजरता हो जब हमारी और बवाल की अकेले महफिल न जमें. फिर लगभग हर दूसरे तीसरे दिन कहीं न कहीं महफिल जमीं रहती, कभी लोक गीतों की, कभी गज़लो की तो कभी कव्वालियों की तो कभी कविताओं की, उसमें तो खैर बवाल और संजय तिवारी ’संजू’ साथ होते ही.

लाल-बवाल बैठक हो और कोई नई गज़ल, नया गीत न उपजे हमारी कलम से और उसमें बवाल का पुट और फिर गीतों को सुर ताल में ढालना न हो बवाल के द्वारा तो फिर कैसी महफिल.

इसीलिए जब भी भारत जाता हूँ और जबलपुर कितने भी दिन रह जाऊँ, कम ही लगता है. अगर कोई दीगर जरुरी काम न हो और रात घिरे तो यह मान ही लिजिये कि कहीं महफिल जमी है.

उन्हीं महफिलों के दौर में यह गीत उपजा था. बवाल ने इसे अपने स्वर में गाया भी बहुत जबरदस्त था लेकिन वो आलसी इतना कि आज तक रिकार्डिंग ही नहीं मुहैया करा पाया.

शुरु से साथ रहा, छोटा है तो मूँह लगा होना तो स्वभाविक है, इसलिए कुछ कह भी नहीं पाते सिवाय आलस्य त्यागने के लिए लताड़ने के सिवाय. जब लताड़ो, उनका क्या: हँस दिये और कहने लगे, जय हो, महाराज!!

आज सोचा कि अब कब तक गायन का इन्तजार किया जाये, जब आयेगा तब फिर से. रीठेल पर कोई रोक तो है नहीं, फिर लगा देंगे. रोक तो किसी बात पर नहीं है, अभी कोई उठ खड़ा हो और इसकी पैरोडी गाने लगे, तब भी कैसी रोक.

आज टहलते हुए राह में..

बहता दरिया है शब्दों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो!
जब गीत कमल खिल जाएँ तब,
तुम भँवरों की मस्ती ले लो!!

टूटे-फूटे थे शब्द वहाँ,
फिर भी वो गीत रचा लाया!
कोई बहरों वाली बात न थी,
फिर भी वो ग़ज़ल सजा लाया!!

परिहासों की उस बस्ती का,
संजीदा हुक्म बजा लाया!!!
उसने सीखा खाकर ठोकर,
तुम सीख यहाँ यूँही ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!

ये मज़हब-वज़हब की बातें,
आपस के रिश्ते तोड़ रहीं!
और सहन-शक्तियाँ भी अब तो,
दुनिया भर से मुँह मोड़ रहीं!!

धर्मों के झूठे गुरुओं की,
तक़रीरें हृदय झंझोड़ रहीं!!!
या दाम चुका कर लो नफ़रत,
या दिल की प्रीत युँही ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!
आदर्शों और बलिदानों की,
उसको तो रस्म निभानी है!
हाँ मातृ-मूमि पर न्यौछावर,
होने की वही जवानी है!!

हृदयों को जिसने है जीता,
उसकी ही कोकिल बानी हैं !!!
दिन रोकर काटो या हँसकर,
जो चाहो रीत, यहीं ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!


(इस गीत को जब मैने लिखा था, तभी चार जगह तो बवाल नें कैची चला ही दी थी गाते गाते..अब जब सच में गा कर रिकार्ड करेगा तो जाने क्या निकल कर आये. :))

रविवार, मई 16, 2010

मैं कृष्ण होना चाहता हूँ!!

कोशिश करता हूँ कि जब बारिश होने लगे तब घर के बाहर न निकलूँ. छाते पर बहुत भरोसा बचपन से नहीं रहा, खास तौर पर जब बारिश के साथ तेज हवाएँ भी चलती हों. शायद कोई अनुभव ही रहा होगा जो घर कर बैठा है.

भीगने से तो उतना डर नहीं लगता जितना कीचड़ की छ्प छ्प में पतलून गंदी होने से.

सर भीगा, बदन भीगा तो सूख जायेगा कुछ देर में मगर पतलून पर लगा कीचट तो सूख कर भी दाग छोड़ जाता है.

हमेशा मन चाहा हो नहीं पाता. एक मन की चाहत ही तो है कि सफेद पतलून से लगाव है और कोई रंग भाता नहीं.

इतने जतन पर भी जाने कब, कौन, क्या सोचकर छेद कर गया और इस बारिश में मेरी छत चूने लगी. लगा कि जैसे छत है ही नहीं. सीधे बरसता आसमान और नीचे भीगता मैं.

पूरे घर में पानी पानी और लोगों के पैर में लग लग कर आया कीचड़. हर तरफ बस कीचड़ ही कीचड़. भीगा भी और लाख न चाहते हुए चलना भी पड़ा, ऐसे में पतलून गंदी होना ही थी, कितना बचाता सो हुई.

बारिश थम गई. घर सूखा, बदन सूखा.

सीलन तो जाते जाते ही जायेगी, बदबू बाकी है और पतलून पर लगे कीचड़ के दाग, मुए छूटते ही नहीं.

सफेद पतलून जब तक संभल जाये, तब ही तक वरना गंदगी सबसे पहले उसी पर दिखती भी है और अपने निशान हमेशा के लिए छोड़ जाती है.

और सफेद पतलून पहनने की ऐसी ललक – क्या कहें कि जाती नहीं.

krishna

मैं कृष्ण होना चाहता हूँ!!!

जो दिखा वो मैं नहीं हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
है मुझे बस आस इतनी
कुछ और होना चाहता हूँ.

जिन्दगी चलती रही है
ख्वाब सी पलती रही है
सब मिला मुझको यहाँ पर
कुछ कमी खलती रही है.

थक गया हूँ ए जिन्दगी
कुछ देर सोना चाहता हूँ.
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

आराम कर लूँ दो पहर
मैं चल पड़ूँ फिर उस डगर
मंजिल मुझे दिलवाये जो
करवा सके पूरा सफर..

राह में बन छांव चल दे
वो वृक्ष होना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

न बने जब बात प्यारे
टूट कर बिखरे नजारे
मैं चलूँगा हमसफर बन
छोड़ दे जब साथ सारे

जो प्रीत का अहसास दे
वो हाथ होना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

कब किसी का साथ दूँगा
सत्य बातों में, गलत में
मांगने की छूट उसको
जो दिखे पहली झलक में

जब युद्ध हो कुरुक्षेत्र का
मैं कृष्ण होना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

आत्मशुद्धि के लिए अब
कुछ देर रोना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

-समीर लाल ’समीर’

गुरुवार, मई 13, 2010

मेरा लेखन कचरा है!!

slcar

दो दिन हो गये सारा घटनाक्रम देखते. ढ़ेर प्रशंसक/ चहेते/मित्र सामने आये माननीय ज्ञानदत्त जी की पोस्ट  पर मेरे विषय में टिप्पणी देखकर. जान पाया सबका प्यार. अभिभूत हुआ, लोगों को इस पर नाराजगी भी हुई कि मैं क्यूँ असभ्यता से किये गये विरोध के बावजूद भी अभिभूत हुआ. अनूप जी ने खुल कर पोस्ट के माध्यम से जाहिर किया और किसी ने उस पर टिप्पणी के माध्यम से.

प्रशंसकों का प्यार, भद्र और अभद्र दोनों, अभिभूत करता ही है, भले ही आप अभद्र और असभ्य तरीके से जाहिर समर्थन को उचित न करार दें. मैं भी इसे उचित नहीं मानता किन्तु स्नेह ही तो है जो वो भड़क उठे. मेरी नजर में ,अब भी, ऐसी बात उठाना ही औचित्यहीन है, जो लोगों को भड़काये. क्या जरुरत है?

जिस तरह से असभ्य भाषा में किया गया विरोध या समर्थन गलत है, उसी तरह से ऐसा औचित्यहीन प्रश्न जो इस बात को भड़काये. बात दोनों ओर से ही दूसरे तरीके से कही जा सकती थी. गुस्से में इंसान आपा खो देता है, यह जग जाहिर है.

आज तक मैने, जब भी ब्लॉग जगत की बात आई या मेरे लेखन पर बात आई, हमेशा ही खुल कर कहा है कि अनूप जी ही मुझे गद्य लेखन में लाये. उनसे मैने सीखा, उनका मैं प्रशंसक हूँ और सीख रहा हूँ, फिर तुलना कैसी.

अनूप जी लाख तारीफ करें, मैं हमेशा ही उनके लेखन से सीखने का तत्पर रहा और यह बात वो भी अच्छी तरह जानते हैं. शायद मानते भी हैं.

उनकी मुझसे मौज लेने की प्रवृति भी हमेशा से रही. मुझे कभी नहीं खला. मैने भी उनसे खूब मौज ली. जब बुरा लगा कि जो बात व्यक्तिगत तौर पर उनसे की, उन्होंने जग जाहिर की, उनको बताया और उन्होंने उसे वापस लिया. अपने आलेख को सुधारा.

आज भी उन्होंने अपने आलेख में जाहिर किया कि मैने अपने कमेन्टस में कहा है मैं कठिन समय से गुजर रहा हूँ.जबकि ऐसा मैने कहीं नहीं कहा. मैने बस अपने चाहने वालो से इतना कहा कि जैसा आपने समझा, वैसा आपने लिखा. आपने मुझे संबल दिया, मैं अभिभूत हुआ इस स्नेह के लिए और फिर मैने विवाद से दूर रहते हुए हिन्दी की सेवा की अपील की. एक शाब्द बदल देने मात्र से बात बदल जाती है, इसका ज्ञान तो अनूप जी को है ही, इसमें मैं क्या कहूँ.

उद्देश्य मात्र इतना था कि बात जो बढ़ चुकी है वो शांत हो जाये और लोग पुनः पूर्ववत पहले की तरह सक्रियता से हिन्दी के प्रचार प्रसार में जुट जायें.

मैं कभी अभद्र और असभ्य भाषा का न समर्थक रहा हूँ और न ही इस्तेमाल करता हूँ. समर्थकों के गुस्से में आये बयानों में भी आशा ही कर सकता हूँ कि भाषा की मर्यादा का पालन हो, निवेदन कर सकता हूँ, उससे उपर मेरे वश में क्या है.

मेरे ज्ञान जी से भी मधुर संबंध हैं, मैं उनका सम्मान करता हूँ और मुझे कोई शिकायत नहीं. उन्होंने मेरे लेखन के विषय में जैसा समझा, वैसा लिखा.  सबको सब का लेखन पसंद आये, यह जरुरी नहीं. उन्हें मेरा लेखन नहीं पसंद, वो स्वतंत्र हैं यह कहने के लिए कि मेरा लेखन कचरा है. मैं उन्हें भी नहीं रोक सकता और न ही रोकने की कोई वजह है.

बस, अफसोस इतना है कि नित ईमेल पर बात होने के बावजूद भी और उनकी प्रशंसा की टिप्पणी लगभग हर आलेख पर प्राप्त करते हुए भी इतना बड़ा सत्य वो दिल में छिपाये बैठे रहे और मुझे न जाहिर कर, इसे खुले मंच पर जाहिर किया. सोचता हूँ, क्या सच मानूँ-उनकी प्रशंसा में प्राप्त नित नई टिप्पणी या एक बार जग जाहिर नापसंद का आलेख.

मेरा वश मेरे व्यवहार, मेरे लेखन और मेरे विवेक पर है. कोशिश होती है उसमें भूल न हो.

मित्रों और शुभचिन्तकों ने रोका कि आपकी टिप्पणी विवाद पर ठीक नहीं लग रही. मैने बिना एक क्षण गंवाये रोक दी. इससे ज्यादा मुझसे क्या आशा है, मुझे बताये मैं करने को तैयार हूँ.

निवेदन बस इतना है कि मैं नहीं जानता कि आप कोई भड़काऊ बयान जारी करे अनजाने में भी, तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी और किस भाषा में आयेगी.  किन्तु जहाँ भी मुझे लगेगा कि भले ही अभद्र भाषा में, मुझे स्नेह जाहिर किया है, मैं आभार तो व्यक्त करुँगा, भले ही मैं उसकी भाषा का समर्थन न करुँ.

अपने चाहने वालों से और समर्थकों से बस एक निवेदन है कि अब बहुत हुआ. अव्वल तो भाषा का संयम बनाये रखें और दूसरा, किसी के कहने या समझने से अपनी सोच मत बदलें. आप सब समझदार है, संयम से काम लें.

कृपया इस विवाद को विराम दें और आगे हिन्दी की सेवा में तत्पर रहें.

कुछ रात के अंधेरों से अक्रांत
भयभीत
दुबक कर सो जाते हैं

और

कुछ उसी रात के
सितारों की रोशनी में
जीवन की राह खोज लेते हैं.

-यह दुनिया भी कितनी अजीब है.

-अनेक शुभकामनाएँ एवं साधुवाद!!

बुधवार, मई 12, 2010

अंधड़....

storm
 

जब भी सोचता हूँ मैं
कुछ पल पा जाऊँ
चैन के
और सो सकूँ एक रात
बिना किसी विचार के
बिना किसी इन्तजार के...
अपने में सिमटा मैं...


तब   जाने कैसे
हवा का एक झोंका
जान लेता है
मेरे इरादों को
और आ जाता है
बन कर
अंधड़
मेरी सोच के घोंसले को
उजाड़ने के लिये
और
बिखर कर रह जाता हूँ मैं.

मेरे हमसफ़र
मेरे सहयात्री
करते हैं कोशिशें
ओट देकर मुझे..
हवा की चाल को
कर सकें नाकामयाब

पर
शातिर हवा
फिर नये अण्दाज़ में
आ जाती है
अपने अंधड़ पर
मुखौटा लगाये
पुरबाई का


और तब
वे जो मेरा साथ देने को हुए थे
तत्पर
गंवाने लगते हैं
अपने अपने घोंसले
ताकते हैं मेरी ओर
मैं उठ कर लड़ूँ
हवा से..


नहीं
नहीं
मेरा काम है घोंसला बनाना
और
हवा का उजाड़ना

और फिर हम
अपने अपने काम में जुट जाते हैं
नई लगन के साथ!!!

-समीर लाल ’समीर’

रविवार, मई 09, 2010

बुक्का फूटा..बुक्क!!!

हमारे पास आँखे हैं तो देखने की सुविधा है. मगर हम बस दूसरों को देख सकते हैं.

काश!! अपनी आँखों से हर वक्त खुद को भी देख पाते.

दर्पण इज़ाद कर लिया है लेकिन दर्पण कब हमेशा साथ रहता है?

दिन में एक या दो बार दर्पण देखते हैं वो भी मात्र खुद को निहारते ही हैं.

खुद के भीतर झांकने का तो खैर समय ही नहीं लेकिन कब दर्पण में देख कर भी अपने को पहचानने की कोशिश की?

शायद यही तरीका होगा जिन्दा रहने का वरना खुद की सही पहचान के बाद तो खुद के साथ रहना भी मुश्किल हो जाये.

infla

वो सामने बैठा

आकाश में ताकता

मूँह में हवा भरता

फिर गाल पर हाथों से

दोनों तरफ एक साथ

तमाचा मारता

और हवा निकलती

आवाज आती....

बुक्क!!

मैं उसे देखता रहता

सोचता

वो क्या कर रहा है?

बेवकूफ!!

वो हर

बुक्क!!!

के बाद मुझे देखता, मुस्कराता

मैं मुस्कराता जबाब में

वो सोचता

ये क्या देख

मुस्करा रहा है?

बेवकूफ!!!

और फिर

आकाश ताकते

मूँह में हवा भरता.....

तमाचा मारता

और

आवाज आती

बुक्क!!

-समीर लाल ’समीर’

 

नोट: कल दिन में एकाएक कुछ वजहों से मॉट्रियल जाना पड़ा. १२ बजे दिन में निकले और ५१० किमी की यात्रा तय कर ४.३० बजे पहुँचे. जरा थकान की वजह से रात कहीं जाना नहीं हुआ और आज सुबह काम खत्म कर ३ बजे वापसी पर रवाना हुए तो ८ बजे रात घर आकर लगे. यही वजह हुई कि न तो कोई ब्लॉग पढ़ना हुआ और न कमेंट करना. अब इत्मिनान से बैठे हैं तो कुछ पोस्ट किया जाये और फिर दो दिन का बचा ब्लॉग पठन शुरु किया जाये.

बुधवार, मई 05, 2010

४०० वीं पोस्ट और एक गज़ल

आज सुबह किसी कार्यवश ओकविल (मेरे घर से करीब १०० किमी) जाना हुआ. जिस दफ्तर में काम था, उसके समने ही मेन रोड थी, जिस पर साईड वाक बनने का कार्य जोर शोर से चल रहा था. पूरी मिट्टी के जो ढेर लगाये गये थे, उन्हें  बड़ी बड़ी मशीनों से लेवल किया जा रहा था.

दफ्तर से जब काम पूरा करके निकला, तो उस दफ्तर का मालिक भी साथ था. यूँ ही चर्चा में मैने जानना चाहा कि जब यह वाक वे पूरा बन रहा है, तो यह पहाड़ जैसी मिट्टी बीच में क्यूँ छोड़कर दोनों तरफ का काम चालू है, एक लाईन से क्यूँ नहीं करते यह लोग. बेवजह बीच में काम छोड़ कर, गाड़ी दूसरी तरफ ले जाते हैं बार बार, और आगे काम जारी रखते हैं.

तब उसने मुझे थोड़ा पास ले जाकर वो मिट्टी का ढेर दिखाया, जो बीच में लगभग १०० मीटर की जगह घेरा हुआ था. उस पर एक "गूस" महारानी बड़े ठसके से विराजमान थी. बताया गया कि एक रात उसने वहाँ अंड़े दे दिये हैं तो अब जब तक बच्चे नहीं हो जाते, सरकार उतना हिस्सा नहीं छुएगी और बच्चा हो जाने के बाद जब वो चली जायेगी, तब ही उस हिस्से को बनाया जायेगा.

अभी मेन रोड़ की तरफ एक प्लास्टिक की जाली भी लगा दी गई है कि भूल से वो सड़क पर न चली जाये और किसी तेज रफ्तार गाड़ी की चपेट में आ जाये. निर्माण कर्मचारी भी उसे रोज खाने के लिए पॉपकार्न और चिप्स डाल देते हैं ताकि भोजन की तलाश में उसे भटकना न पड़े.

क्या हम कभी ऐसी कल्पना सरकार की तरफ से अपने देश में कर पायेंगे या फिर सिर्फ कागज पर गिनती लगाते रहेंगे कि अब १४११ बाघ बचें हैं?

नीचे चित्र में ये दो गीस (goose (plural: geese)) कल मेरे घर के सामने घास में टहलने आये. पड़ोस में एक छोटा सा तालाब हैं, वहीं रहते हैं. सोचा, आपसे भी मिलवा दूँ.

goose

खैर, यह है मेरी ४०० वीं पोस्ट. बहुत रोचक और दिलचस्प सफर रहा इन ४०० पोस्टों का. टिप्पणी के माध्यम से अब तक लगभग ३५०० लोगों का, अवागमन में लगभग १६४००० लोगों ने और फीडस स्बासक्राईब करने में लगभग ५७० लोगों नें अपना स्नेह और प्रोत्साहन दर्ज किया.

उम्मीद करता हूँ कि आप सबका स्नेह यूँ ही मिलता रहेगा और यह सफर यूँ ही खुशनुमा बना रहेगा.

पिछली बार जो गज़ल साधना की आवाज में आपको सुनवाई थी, उसमें जैसा मैने कहा था तीन शेर किसी और के थे और तीन मेरे. अब फिर से वही गज़ल मगर इस बार इसमें सारे शेर मेरे ही हैं और आवाज साधना की. इस चौथे शतक के मौके पर लुत्फ उठाईये.

11

जाने क्या बात है जो तुमसे बदल जाती है
जिन्दगी मौत के साये से निकल जाती है

नब्ज को छू के वो खुशहाल हुए जाते है
सांस तो रेत है हाथों से फिसल जाती है

देख तो आज के मौसम का नजारा क्या है
ये तबियत भी हमारी तो मचल जाती है

मुझको तो चाँद दिखे या कि तुम्हारी सूरत
दिल की हस्ती मेरी दोनों से बहल जाती है

कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा
वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है.

जब भी होता है दीदार तेरा साहिल पर
डूबी कश्ति मेरी किस्मत की संभल जाती है.

बात करने का सलीका जो सिखाया हमको
बात ही बात में नई बात निकल जाती है.

दास्तां प्यार की तुमको ही सुनाई है ’समीर’
दर्द के देश में यह बन के गज़ल जाती है.

-समीर लाल ’समीर’

 

यहाँ क्लिक करके सुनिये:

रविवार, मई 02, 2010

मजदूर दिवस के मजबूर

मजदूर दिवस पर भाषण देने दिल्ली से नेता जी गांव आये.
मजदूरों के वर्तमान हालात और उसके सुधार एवं मजदूरों के उत्थान के लिए सरकार की भावी योजनाओं पर खुल कर बोले और वापस चले गये.
नन्दु और उसके दो भाई, जिन्होंने तीन दिन रात लग कर सभा स्थल पर मंच का निर्माण किया था, अपनी पेमेन्ट के लिए न जाने कब से भटक रहे हैं.

 

Moon

१.

चाँद
को
देखकर

कवि
को
याद आती है
अपनी महबूबा

और

मजदूर
को
रोटी!!!

hammer

२.

थकान से चूर बदन
कांपते हुए हाथ
माथे से बहती पसीने की धार
और उसने फिर से किया
भारी भरकम हथोड़े से
छैनी पर प्रहार....
बार बार

छन्न्न्न्न्न्न!
छान्न्न्नन्न
छंन्न्न्न

एक पल के लिए
जैसे ही यह लय टूटी

उसे सुनाई दी
घर में इन्तजार करते
बेटे की आवाज

बापू!! रोटी!!!!!!!!

भूल कर अपनी थकान
वो फिर तैयार हुआ
अगला प्रहार
करने के लिए
क्यूँकि
असमर्थ था वह
इस आवाहन को
नकारने में …

-समीर लाल ’समीर’-