रविवार, अगस्त 19, 2007

क्या आप मल्लन चाचा को जानते हैं??


भटक गई है जो हवा, उनको दिखाने रास्ते
जल रहा बनकर दिया मैं, रोशनी के वास्ते.


एक बड़े शायर का शेर है. नाम है समीर लाल और तख़ल्लुस 'समीर' लिखते हैं. क्या बलिदान की भावना है शायर की. जानता है कि जब भी हवा सही राह पर आ गई, सबसे पहले वही बूझेगा मगर जज़बा है. सलाम करती हूँ शायर को. यह तो हो गई उड़न तश्तरी की बात. अब हमारी सुनो.

आज पढ़ता था भाई फुरसतिया जी को. स्वतंत्रता की ६०वीं वर्षगांठ पर झूठी आजादी के विषय में सेंटिया रहे थे . कहते हैं 'यह मत पूछो कि देश तुम्हारे लिये क्या कर सकता है बल्कि यह देखो तुम देश के लिये क्या कर सकते हो'.

फिर कलाम साहब के वचन सुनाने लगे कि क्या आपके पास देश के लिये पन्द्रह मिनट हैं? पढ़कर एक बंदे का ख्याल आ गया. उनकी तो पूरी पूँजी ही समय है और जी भर कर है. मगर देश के लिये नहीं, बकबकाने के लिये.

चलिये उनसे परिचय करवाता हूँ, नाम है मल्लन चाचा:




मल्लन चाचा ने जीवन भर कुछ नहीं किया. पिता जी तीन मकान बनवा कर मर गये. दो मकान किराये पर चलते थे और एक में मल्लन चाचा खुद रहते थे. किराये की आमदनी से ठीक ठाक गुजर बसर हो जाती है.

मल्लन चाचा को बात करने का बहुत शौक है और हर बात के लिये वो सामने वाले को ही दोषी मानते हैं. यह उनका स्वभाव था कि कभी किसी बात पर खुश नहीं होना और मीन मेख निकाल कर सामने वाले पर मढ़ देना.




मल्लन चाचा से मिलने उनके घर पहुँचा तो वहीं अहाते में लूंगी लपेटे पेड़ के नीचे चबूतरे पर पालथी मारे बैठे थे.





‘पाय लागूँ, चाचा’

‘खुश रह बचुआ. जरा वो सामने आले से बटुआ तो उठा ले और वहीं चूना भी रखा है. थोड़ा तम्बाखू मल दे.’

मैं तम्बाखू मलता उनके पास ही में बैठ जाता हूँ.

‘का बात है, बचुआ. बहुत दिन बाद दिखे.’

‘चाचा, वो तबियत खराब थी न इसी से.’

‘वो तो होना ही थी. न कसरत, न सैर सपाटा. तो का होगा. यहिये न!!’

‘नहीं चाचा, बस जुकाम पकड़ लिये था.’

‘काहे गरम कपड़ा नहीं पहनते.’

‘चाचा, इतनी गरमी में? वो तो जरा ठंडा गरम हो गया था बस.’

‘तब काहे इतनी शराब पीते हो?’

‘कहाँ चाचा, हम शराब नहीं पीते.’

‘तो फिर कौन ठंडा चीज पिया जा रहा है? बीयर..हा हा!! शहरी का नाती नाही तो! खैर, जाये दो. इ बताओ कि क्या समाचार है शहर का.’

‘चाचा, देश बहुत तरक्की कर रहा है. ढेरन विकास हो रहा है. GDP बहुते बढ़ गया है और मुद्रा स्फिती की दर भी एकदम्मे नियंत्रण में है. विदेशी मुद्रा का भंडार भी लबालब है.’

‘बचुआ, इ सब चोचलेबाजी हमसे न बतियाया करो. हम सब समझते हैं. ई GDP को तो तुम मानो घी, रोटी पर मलने के लिये और मुद्रा स्फिती नियंत्रण को जानो दाल का तड़का. अब रह गये विदेशी मुद्रा भंडार तो वो हैं सलाद और ये तुम्हारे मॉल और कॉल सेन्टरवे सब हइन केक और पेस्ट्री. जब रोटिये, दाल का जुगाड़ नहीं तो इनका का करीं. यह सब तो उनकी सुभीता के लिये हैं जिनके पास रोटी, दाल पहलवें से है. हमार तुहार के लिये नाही. समझे बचुआ.’

‘चाचा, हम तो जो सुनें है वो बताये दिये. बाकि हम तो कुछ किये नहीं हैं. हम पर काहे बिगड़ रहे हैं.’

‘तुम तो यूँ भी किसी कारज के हो नहीं, हें हें हे…’

‘अच्छा, अब चलता हूँ,चाचा. पाय लागी.’

‘ठीक है बचुआ. फिर आना.’

मैं उठता हूँ. चबूतरे के नीचे की जमीन ऊबड़ खाबड़ है पाँव डगमगा जाता है.

‘का बचुआ. जरा संभल कर. कुछ वजन कम करो. बेडौल हुये जा रहे हो. अपना ही वजन तक तो संभल नहीं रहा.’

मैं भी ‘जी’ कह कर चल पड़ता हूँ.

सोचता हूँ कि अगर वो चबूतरे के नीचे दो तसला भी बालू पुरवा दें तो जमीन समतल हो जाये. मगर उन्हें दोष तो दूसरे में ही दिखता है कि तुम वजन कम करो.

अरे चाचा, खुद भी तो कुछ करो कि बस दूसरे की गल्ती देखते रहोगे और हर बात के लिये सबको कोसते रहोगे. फलाना रोटी वालों के लिये है. फलाना हमारे लिये कुछ नहीं करता.

आज हर गली, मोहल्ले में न जाने कितने ही मल्लन चाचा हैं. क्या आप मिले हैं मल्लन चाचा से?

ऐसे में हम विकास की बात करें भी तो कैसे? Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, अगस्त 16, 2007

हज़ारों ख्वाईशें ऐसी,कि हर ख्वाईश पे दम निकले

आज तो कुछ लिखने का मन ही नहीं है. रात हो गई है.अँधेरा घिर आया है. मैं घर के पिछवाड़े में निकल कर लॉन में बैठ जाता हूँ. शीतल मनोहारी हवा मद्धम मद्धम बह रही है. बिल्कुल सन्नाटा. अड़ोस पड़ोस सब सो गया है, ऐसा जान पड़ता है.



मैं आकाश में देखते हुये वहीं लॉन पर लेट जाता हूँ. विस्तृत आकाश. बिल्कुल साफ मौसम. एक कोने में खड़ा चाँद. ऐसा लगता मुझे बेमकसद ताकते देखकर मुस्करा रहा है. पूरा आसमान टिमटिमाते तारों से भरा अदभूत नजर आ रहा है. मानो किसी बड़े से ताल में दोने में तैरते असंख्य दीपक. मेरे मन में हरकी पौड़ी, हरिद्वार की याद सहसा जीवंत हो जाती है. गंगा में तैरते असंख्य प्रज्वलित दीप. यह याद भी क्या चीज है, शिद्दत से याद करो तो सब नजारा जैसे एकदम जीवित हो जाता है. मुझे हवा में घी और अगरबत्ती की मिली जुली खूशबू आने लगती है और कान में घंटों और घड़ियालों के संग बजती गंगा आरती साफ सुनाई देने लगती है:

ओम जय गंगा माता......

मैं डूब जाता हूँ. एकाएक एक कार की आवाज से तंद्रा भंग होती है. शायद पड़ोसी देर से लौटा है आज. मैं भी हरिद्वार से वापस कनाड़ा की लॉन में लौट आता हूँ.



फिर एक टक आकाश में दृष्टि विचरण. बचपन में जब छत पर सोया करते थे तब दादी उत्तर में ध्रुव तारा और फिर सप्तऋषि मंडल दिखाया करती थी और उनकी कहानी न जाने कितनी बार सुनाती थीं. मैं आज फिर उसी ध्रुव तारे को खोजने लगता हूँ और फिर वो सप्तऋषि मंडल दिखाई देता है. दादी की कहानी याद आती है कि कहाँ चंद्रशिला शिखर के नीचे, तुंगनाथ स्थित है. निकटवर्ती स्थलों से सर्वोच्च स्थल पर अवस्थित होने के कारण इसे तुंगनाथ कहा जाता है. केदारखंड पुराण में इसे तुंगोच्च शिखर कहा गया है. यहाँ पूर्वकाल में तारागणों यानि सप्तऋषि ने उच्च पद की प्राप्ति हेतु घोर तप किया था. सप्तऋषियों के तप से प्रफुल्लित हो भगवान शिव ने उन्हें आकाश गंगा में स्थान प्रदान करवाया था. बचपन फिर जीवित हो उठता है.

वापस लौटता हूँ आज में तो इस अथाह आकाश गंगा को देख यूँ ही टिटहरी चिड़िया की याद आ जाती है. सुनते हैं वो आकाश की ओर पैर उठा कर सोती है. सोचती है कि अगर आकाश गिरा तो पैर पर उठा लेगी और खुद बच जायेगी. अनायास ही अनजाने में मेरे पैर आकाश की तरफ उठ जाते हैं. तब ख्याल आता है टिटहरी की इस हरकत को लोग उसकी मुर्खता से जोड़ते हैं और मेरे चेहरे पर अपनी मुर्खतापूर्ण हरकत के लिये मुस्कान फैल जाती है और मैं पैर सीधे कर अपने आपको विद्वान अहसासने लगता हूँ. स्वयं को विद्वान अहसासने का भी एक विचित्र आनन्द है, जो इस पल मैं महसूस कर रहा हूँ. इस आनन्द को शब्दों में बाँधना शायद संभव नहीं.

तब तक अचानक ही एक तारा टूट कर गिरता है बड़ी तेजी से. दादी कहा करती थी कि जब तारा टूटे तो उसके बुझने के पहले जो भी वर मांग लो, वो पूरा हो जाता है. जाने क्या मान्यता रही होगी या शायद अंधविश्वास रहा होगा मगर मेरी दादी ने कहा था तो आज भी मेरा मन इस पर विश्वास करने का होता है. कारण मैं नहीं जानता. कभी कोशिश भी नहीं की जानने की.

मैं एकाएक सोचने लगता हूँ क्या मांगू?
हज़ारों ख्वाईशें ऐसी,कि हर ख्वाईश पे दम निकले,.......

मैं सोचता ही रह जाता हूँ और तारा बूझ जाता है.

सोचता हूँ कि हमारी कितनी सारी चाहतें हैं कि अक्सर ईश्वर कुछ पूरा करने का मौका भी प्रदत्त करता है मगर हम ही नहीं तय कर पाते कि कौन सी चाहत पूरी कर लें. हर वक्त बस एक उहापोह. शायद सभी के साथ ऐसा होता हो और फिर कोसते हैं अपनी किस्मत को कि हमारी तो कोई इच्छा ही नहीं पूरी हो पाती.
क्या हम कभी भी तुरंत तय कर पायेंगे, तारे के टूटने और बूझने के अंतराल में कि खुश रहने के लिये हम आखिर चाहते क्या हैं या यूँ ही हर आये मौके गंवाते रहेंगे?

असीमित चाह और सीमित समय और संसाधन. काश, हम सामन्जस्य बैठा पाते तो कितना खुशनुमा होता यह मानव जीवन.

मैं अनिर्णय की अवस्था में लॉन से उठकर घर के भीतर आ जाता हूँ.

टीप : 'गुरुदेव, इस 'हज़ारों ख्वाईशें ऐसी,कि हर ख्वाईश पे दम निकले ' का हल क्या है? यह प्रश्न एक भक्त पूछ रहा है.
हल बताने के लिये स्वामी समीरानन्द जल्द ही प्रवचन देंगे, तब तक आते रहिये और पढ़ते रहिये.
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सोमवार, अगस्त 13, 2007

गाँव पुकारता है...



ऐसा नहीं है कि सिर्फ गाँव में रहने वालों को शहर अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं.

मुझे लगता है कि शहर में रहने वालों को गाँव पुकाराता है. थोड़ा अजीब सा लगता है यह विचार. मगर यह सत्य है.

हर बड़े शहर में ढाबेनुमा ग्रमीण परिवेश का अहसास कराते रेस्टॉरेन्ट खुल गये हैं और सारे शहरी गॉव का अहसास पाने वहाँ टूटे रहते हैं. वहाँ नकली लालटेन की रोशनी में, खटिया पर बैठकर पत्तल में खाना खाना स्टेटस सिंबॉल सा बन गया है. लोक नृत्य, मदारी का खेल आदि भी साथ साथ हो, क्या कहने.

यह सिर्फ भारत में नहीं. दुनिया में हर जगह है. कनाडा में भी यह रईसी की निशानी है कि आपके पास एक कॉटेज (कुटिया) शहर से कुछ दूर आबादी के बाहर तालाब के किनारे हो. जहाँ आप वीक एंड में जाकर समय बितायें. जिनके पास खुद के है वो रईस और जिनके पास खुद के नहीं, वो रईसी जताने या यूँ कहें गाँव अहसासने किराये पर लेकर हो आते हैं. मैं दूसरी श्रेणी वाला हूँ. कोशिश होती है कुछ मित्र साथ में हो. इसके दो-तीन फायदे हैं. एक तो खर्चा बँट जाता है. साथ साथ ग्रुप का मजा तो रहता ही है और सब एक दूसरे को जता पाते हैं कि उन्हें गाँव के माहौल से कितना लगाव है. अच्छा लगता है.

सर्दियों में तो बर्फ के कारण उतना संभव नहीं हो पाता मगर गर्मी में जरुर दो एक बार हो आते हैं.

ऐसी ही एक यात्रा पर मै मित्रों के साथ गया.

मुझे यूँ भी नदी, पहाड़, झरने, नौका विहार, बत्तख, पेड़ों के बीच शान्त वन में विचरण करना, सूर्योदय, सूर्यास्त, चाँद, तारे, फूल, कलियाँ बाई डिफॉल्ट पसंद आते है कवि होने के कारण. और वही माहौल वहाँ मिला. नौका विहार करके सब थक गये. शाम होने को थी. सभी ने तय किया कि कॉटेज में कुछ देर लेटा जाये फिर शाम को कैम्प फायर और पीने पिलाने नाचने नचाने और बार बेक्यू का सिलसिला चले. सब आराम करने निकल गये और मैं जंगल के बीच से बनी पगडंडी पर अकेला बढ़ चला.

प्रकृति की छटा देखते बनती थी. हर कदम फिजा की बदलती महक, तरह तरह के फूल, पत्ते, पेड़. बहती हवा. तरह तरह की चिड़ियां, छोटे छोटे जानवर. मैं न जाने किन विचारों में खोया बस चलता चला गया. न जाने कितनी दूर आ गया कॉटेज से. थकान घेरने लगी और प्रकृति के साथ चलने की उत्सुकता उसे पीछे ढकेलती रही. एकाएक जंगल के बीच बने एक मकान पर नजर पड़ी. बाहर बोर्ड लगा था जिसका माईने था, यहाँ घोड़े किराये पर मिलते हैं. बोर्ड देखते ही थकान ने आ घेरा. कदम मानो उठने का नाम ही न ले रहे हों. यही होता है सुविधा की उपलब्धता के साथ.

मैं उस घर के अहाते में प्रवेश कर गया. एक आदमी बगीचे को सजाते मिलता है जिसका नाम रेन्डी है. वो मालिक है इस मकान का या यूँ कहें सेठ है. देखता हूँ उसके पास एक घोड़ा है. उसकी गर्भवती पत्नी घोड़ी और एक छोटा बेटा घोड़ा भी है. छोटा बेटा अभी वजन ढोने लायक नहीं हुआ है, अतः अम्मा के इर्द गिर्द दिन भर धमा चौकड़ी मचाता रहता है. ले देकर काम करने अभी सिर्फ यही घोड़ा है.

वापस कॉटेज तक जाने की बात तय होती हैं. घोड़े पर जीन वगैरह बाँधी जाती है.

आह्ह!!

यह आह मेरी नहीं है. यह उस घोड़े की कराह है जिस पर चढ़ कर मैं बैठ गया हूँ. घोड़े ने मूँह खोल कर कुछ नहीं कहा, मगर मेरे संवेदनशील भावुक दिल ने सुन लिया. मेरे भीतर दया उमड़ती है किन्तु आलस्य और थकान के घने बादल मेरे करुणामयी हृदय पर आच्छादित होकर उसे ढांक देते हैं. घोड़ा भी अपनी क्षमता से अधिक वजन उठाये, बिना किसी खिलाफत के भाव के सर झुकाये, चल पड़ता है. मुझे अहसास हुआ उसकी वेदना उसकी पारिवारिक जिम्मेदारियों के समक्ष मूँह नहीं उठा पाई.

मुझे लगता है कि वो सोचता होगा, अगर वो भी काम करने से मना कर दे तो सेठ उसे निकाल देगा. वो तो उसके किसी काम का रहेगा नहीं. फिर गर्भवती बीबी और छोटे बच्चे को लेकर कहाँ जायेगा? भूखो मरने की नौबत आ जायेगी. हर तरफ बेरोजगारी फैली है. नई नौकरी और आसरा तो मिलने से रहा. फिर सारा जीवन तो जंगल के कच्चे रास्तों पर चला है. ग्रमीण परिवेश में रहा. शहर तो उसे नहीं सुहायेगा और न ही उसे वहाँ रहने और चलने का सुहूर है. जवानी में चला जाता तो ठीक था, अब तो नई बातें सीखना भी मुश्किल है. सुना तो है शहर में नौकरियाँ हैं. मगर उसे उनसे क्या? वो तो किसी को जानता भी नहीं वहाँ. कहाँ जायेगा? यहाँ थोड़ा ज्यादा मेहनत सही, थोड़ी कम सुविधायें ही सही, मगर है तो अपनी जगह. खुली खुली ताजा आबो हवा. प्रदुषण से दूर. ताजगी का अहसास. गाँव के सारे घोड़े एक दूसरे को जानते हैं. एक दूसरे को देखकर सुख दुख कह लेते हैं. सुना है शहर में ऐसा प्रचलन नहीं है. अपने अपने में रहो. वो तो नहीं रह सकता ऐसे घुटन भरे माहौल में.

यही सोचते वो चला जा रहा होगा और मैं उसकी पीठ पर बैठा अपने गंतव्य के आने का इन्तजार कर रहा हूँ. सामने उसकी लगाम थामें खुशी खुशी रेन्डी कोई गीत गाते चल रहा है. लम्बी दूरी है.आज ठीक ठाक कमाई हुई है, लौट कर बीयर पियेगा.

क्या पता घोड़ा वही सोच रहा था कि नहीं जैसा मैने सोचा कि वो सोच रहा होगा या यह मेरा मानवाधारित अनुभव सोच रहा था. Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, अगस्त 10, 2007

ये देश है वीर जवानों का...




स्वतंत्रता संग्राम की १५० वीं और स्वतंत्रता प्राप्ति की ६० वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में हर तरह उत्सव भरा माहौल है. सरकारी विभागों में भी खुशी मनाने की तैयारी है. बच्चे परेड, नृत्य और गीत की तैयारी कर रहे हैं. स्कूलों में एक बालूशाही, एक समोसा, एक लड्डू और एक केला के पैकेट तैयार होने की तैयारी में हैं, जो बच्चों को स्कूल की परेड में आने के लिये ललचायेंगे.

नेता सारे भाषणबाजी के लिये तैयारी में जुटे हैं. लेखक धड़ाधड़ लेख लिखे चले जा रहे हैं और कवि कवितायें. जगह जगह कवि सम्मेलनों का आयोजन भी किया जा रहा है. सफेद खद्दर के कुर्ते पायजामे की बहार आई है. गाँधी जी की तस्वीर से झाड़ पोंछ कर धूल हटा दी गई है और तिरंगा कलफमय फहरने को तैयार है. विभिन्न प्रदेशों के विकास को दर्शाती प्रदर्शनी के ट्रक परेड शुरु होने की बाट जोह रहे हैं. फूल पौधों से अलग हो नेता जी के गले और गाँधी जी की तस्वीर पर चढ़ने को बेताब हैं.

पुलिस महकमा मुस्तैदी से अपने बिल्ले और बक्कल ब्रासो से चमका रहा है एवं एन सी सी के बालक अपनी यूनिफार्म पर आरारोट चढ़ाये बैठे हैं. स्टेडियम और अन्य झंडा स्थलों के करीब सफाई लगभग पूरी हो चुकी है. चुना और गेरु पुतने को तैयार बैठे हैं. गमले लगाकर हरियाली का माहौल बनाया जा रहा है.

अति जागरुक एवं घाग नेताओं के शहीदों के नाम पर बहाये जाने वाले दो बूँद आँसू आँख की पाईप लाईन की यात्रा लगभग पूर्ण कर चुके हैं और वो काला चश्मा उतार कर आँसू पोंछने के लिये उसे पहनने की तैयारी में हैं. इस हेतु एक जोड़ी रुमाल जेब में रख लिया गया है. पुरुस्कार और मैडल मय प्रशस्ति पत्र अपने जुगाडू साथियों के हाथ में जाने को तड़पड़ा रहे हैं. सब जुगाड़ सेट हो चुका है.

शिल्पा शेट्टी का भी देश पर अतुल्य अहसान राजीव गाँधी पुरुस्कार देकर उतारा जा रहा है. इस तरह से हमने अपने सठियाने का प्रमाण पत्र भी तैयार कर लिया है.

'ये देश है वीर जवानों का
अलबेलों का मस्तानों का'


और

'जो शहीद हुये हैं उनकी,
जरा करो कुर्बानी'


के सी डी हिट सेल रिकार्ड कर रहे हैं. दुकानदार खुश हैं. बच्चे पिकनिकनुमा उत्सव मनाने के लिये तैयार हैं. बस उत्सव ही उत्सव. बहुत खुशनुमा महौल हो उठा है.

ऐसे में हमें भी न्यौता आता है कि इन ६० वर्षों की उपलब्धियों पर एक बड़ी सी कविता रच लाईये और आकर कवि सम्मेलन में सुनाईये. अब हमारी हालत देखिये:


आजादी की वर्षगाँठ पर
६० वर्षों की उपलब्धियाँ गिनाते
कविता लिख कर बुलाया है
अथक प्रयासों के बाद भी
यह कवि सिर्फ
एक क्षणिका लिख पाया है.

वो पूछते हैं-
बस इतनी सी?
कवि हृदय कब चुप रहा
उसने बस इतना सा कहा-
अजी, महा काव्य रच कर लाते
अगर आप
भ्रष्टाचारी, बेरोजगारी,
घोटालों और गरीबी के
विस्तार से ब्यौरे मंगवाते.

-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अगस्त 08, 2007

और फिर रात गुजर गई

old

'जागे हो अभी तक, संजू के बाबू' लेटे लेटे कांति पूछ रही है.

'हूँ, नींद नहीं आ रही. तुम भी तो जागी हो?' अंधेरे में ही बिस्तर पर करवट बदलते शिवदत्त जी बोले.

'हाँ, नींद नहीं आ रही. पता नहीं क्यूँ. दिन में भी नहीं सोई थी, तब पर भी.'

'कोशिश करो, आ जायेगी नींद. वरना सुबह उठने में देरी होयेगी.'

'अब करना भी क्या है जल्दी उठकर. कहीं जाना आना भी तो नहीं रहता.'

''फिर भी, देर तक सोते रहने से तबियत खराब होती है.'

फिर कुछ देर चुप्पी. सन्नाटा अपने पाँव पसारे है.

'क्यों जी, सो गये क्या?'

'नहीं'

'अभी अमरीका में क्या बजा होगा?'

'अभी घड़ी कितना बजा रही है?'

'यहाँ तो १ बजा है रात का.'

'हाँ, तो वहाँ दोपहर का १ बजा होगा.समय १२ घंटे पीछे कर लिया करो.'

'अच्छा, संजू दफ्तर में होगा अभी तो'

'हाँ, बहु साक्षी भी दफ्तर गई होगी.'

'ह्म्म!! पिछली बार फोन पर कह रहा था कि क्रिस को किसी आया के पास छोड़ कर जाते हैं.'

'हाँ, बहुत दिन हुये, संजू का फोन नहीं आया.'

'शायद व्यस्त होगा. अमरीका में सब लोग बहुत व्यस्त रहते हैं, ऐसा सुना है.'

'देखिये न, चार साल बीत गये संजू को देखे. पिछली बार भी आया था तो भी सिर्फ हफ्ते भर के लिये. हड़बड़ी में शादी की. न कोई नाते रिश्तेदार आ पाये, न दोस्त अहबाब और साक्षी को लेकर चला गया था.'

'कहते हैं अमरीका में ज्यादा छुट्टी नहीं मिलती. फिर आने जाने में भी कितना समय लगता है और कितने पैसे.'

'हाँ, सो तो है. तीन बरस पहले किसी तरह मौका निकाल कर बहु को यूरोप घूमा लाया था. फिर दो बरस पहले तो क्रिस ही हो गये.उसी में व्यस्त हो गये होंगे दोनों. पता नहीं कैसा दिखता होगा. उसे तो हिन्दी भी नहीं आती. कैसे बात कर पायेगा हमसे जब आयेगा तो.'

'संजू तो होगा ही न साथ. वो ही बता देगा कि क्रिस क्या बोल रहा है.'

दोनों अंधेरे में मुस्करा देते हैं.

'पिछली बार कब आया था उसका फोन?'

'दो महिने पहले आया था.कह रहा था कि १०-१५ दिन में फिर करेगा. और फिर कहने लगा कि अपना ख्याल रखियेगा, बहुत चिन्ता होती है. कहीं जा रहा था तो कार में से फोन कर रहा था. बहुत जल्दी में था.'

'हाँ, बेचारा अपने भरसक तो ख्याल रखता है.'

'आज फोन उठा कर देखा था, चालू तो है.'

'हाँ, शायद लगाने का समय न मिल पा रहा हो.'

'कल जरा शर्मा जी के यहाँ से फोन करवा कर देखियेगा कि घंटी तो ठीक है कि नहीं.'

'ठीक है, कल शर्मा जी साथ ही जाऊँगा पेंशन लेने. तभी कहूँगा उनसे कि फोन करके टेस्ट करवा दें.'

'कह रहा था फोन पर पिछली बार कि कोई बड़ा काम किया है कम्पनी में. तब सालाना जलसे में सबसे अच्छे कर्मचारी का पुरुस्कार मिला है. जलसे में उनके कम्पनी के सबसे बड़े साहब अपने हाथ से इनाम दिये हैं और एक हफ्ते कहीं समुन्द्र के किनारे होटल में पूरे परिवार के साथ घूमने भी भेज रहे हैं.'

'हाँ, वहाँ सब कहे होंगे कि शिव दत्त जी का बेटा बड़ा नाम किये है. तुम्हारा नाम भी हुआ होगा अमरीका में.'

'हूँ, अब बेटवा ही नाम करेगा न! हम तो हो गये बुढ़ पुरनिया. जरा चार कदम चले शाम को, तो अब तक घुटना पिरा रहा है. हें हें.' वो अंधेरे में ही हँस देते हैं.

कांति भी हँसती है फिर कहती है,' कल कड़वा तेल गरम करके घुटना में लगा दूँगी, आराम लग जायेगा. और आप जरा चना और एकाध गुड़ की भेली रोज खा लिया करिये. हड्डी को ताकत मिलती है.'

'ठीक है' फिर कुछ देर चुप्पी.

'इस साल भी तो नहीं आ पायेगा. दफ्तर की इनाम वाली छुट्टी के वहीं से क्रिस को लेकर पहली बार दो हफ्ते को कहीं जाने वाले हैं.'

'हाँ, शायद आस्ट्रेलिया बता रहा था क्रिस की मौसी के घर. कह रहे थे कि आधे रस्ते तो पहुंच ही जायेंगे तो साथ ही वो भी निपटा देंगे. शायद थोड़ी किफायत हो जायेगी.'

'देखो, शायद अगले बरस भारत आये.'

'तब उसके आने के पहले ही घर की सफेदी करवा लेंगे, इस साल भी रहने ही देते हैं.'

'हूँ'

'काफी समय हो गया. अब कोशिश करो शायद नींद आ जाये.'

'हाँ, तुम भी सो जाओ.'

सुबह का सूरज निकलने की तैयारी कर रहा है. आज एक रात फिर गुजर गई.

न जाने कितने घरों में यही कहानी कल रात अलग अलग नामों से दोहराई गई होगी और न जाने कब तक दोहराई जाती रहेगी. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अगस्त 05, 2007

एक थी रुक्मणी माई

कनाडा में ट्रेन में ऑफिस जाते आते वक्त आमूमन रोज वही कोच, वही सीट और वही आमने सामने के सहयात्री. मेरे सामने की सीट पर दो लड़कियाँ बैठती हैं. बहुत बातूनी. दोनों के घर नजदीक ही हैं शायद. अक्सर उनकी बातचीत पर अनजाने में ही कान चले जाते हैं.

इतने दिनों से रोज आते जाते ऐसा लगने लगा है कि न जाने कितने दिनों से मैं उन्हें जानता हूँ. वो भूरे बाल वाली का नाम स्टेफनी है और दूसरी वाली सेन्ड्रा. वो मेरा नाम नहीं जानती. मैं जानता हूँ क्योंकि मैने उन्हें एक दूसरे से बात करते सुना है. मैं चुप रहता हूँ, किसी से ट्रेन में ज्यादा बात नहीं करता.

उम्र का अंदाज लगाना मेरे लिये वैसा ही दुश्कर कार्य है जैसा कि किसी तथाकथित जमीनी नेता की अघोषित संपत्ति का अनुमान लगाना आपके लिये. फिर भी जैसे आप कुछ तथ्यों के आधार पर, कुछ उसकी जीवन शैली के आधार पर और कुछ अपनी क्षमता के अनुरुप जोड़ घटा कर उसकी अघोषित संपत्ति का खाँका खींच कर अंदाज लगा ही लेते हैं, वैसे ही आधार पर दोनों ३० से ३५ वर्ष के बीच की उम्र की लगती हैं.

अक्सर इसी यात्रा के दौरान खाली बैठे कहानी और कविताओं का प्लाट तैयार करता हूँ. कोशिश होती है कि मस्तिष्क में उस स्थल को जिऊँ. उस घटना क्रम में लौट चलूँ, जिस पर लिखना है.

भारत के एक गाँव का दृष्य जीने का प्रयास करता हूँ. कच्ची सड़कों पर धूल उड़ाती बस, नंगे पैर खेलते बच्चे, सर पर गगरी रखे पनघट से लौटती पल्ले से सर ढ़ांपे लजाती स्त्रियाँ, खेत में हल चलाते पसीने में सारोबार किसान, तालाब में नहाती भैंसे, गर्मी की धूप में पेड़ की छांव में अलसाते मजदूर, चौपाल पर बैठे न जाने किस सोच और परेशानी में डूबे बीड़ी पीते बुजुर्ग, गोबर की महक, कच्ची झोपड़ियों में जलती ढिबरियाँ, शाम को पेड़ के किनारे गोल बना कर लोकगीत गाते ग्रमीण- सब बिम्ब की तरह उभरते हैं, बनते हैं, मिटते हैं.

ट्रेन अपनी रफ्तार से भागी जा रही है. शीशे के बाहर नज़र पड़ती है. हजारों कारें अपनी धुन में हाईवे पर दौड़ रही हैं. हाईवे के उस पार मॉल में रोशनी में चमचमाती दुकानें, नये नये फैशन में सजे स्त्री पुरुष. ट्रेन के भीतर परफ्यूम से दमकते ऑफिस जाने के लिये सजे संवरे हुये लोग, एक दूसरे से सटे लिपटे बेपरवाह युगल, आधुनिक लिबास में कॉलेजे जाती लगभग अर्ध नग्न स्वछंद युवतियाँ, एयर कंडीशनिंग में खिले स्फूर्त चेहरे, ट्रेन में बजता कोई पाश्चयात संगीत की धुन और सामने खिलखिलाती अपनी बात में मशगुल स्टेफनी और सेन्ड्रा.

सेन्ड्रा स्टेफनी को बता रही है कि कैसे हाई स्कूल के बाद वो इन्डेपेन्डेन्ट हो गई और अलग अपार्टमेन्ट लेकर रहने लगी. तब से एक कॉल सेन्टर में नौकरी करती रही. आगे पढ़ नहीं पाई पैसों की कमी के चलते. बस लोन लेकर कुछ पार्ट टाईम कोर्स किये. पिता जी के पास बहुत पैसा है मगर वो हाई स्कूल के बाद बच्चों को इन्डिपेन्डेन्ट हो जाने वाली सभ्यता में विश्वास रखते हैं. खुद भी वो हाई स्कूल के बाद से दादा जी से अलग हो गये थे. सेन्ड्रा के अलग हो जाने के बाद उसके माँ बाप में भी साल भर के भीतर ही सेपरेशन हो गया था.

मैं आँख बन्द कर लेता हूँ. फिर से लौटता हूँ गाँव की तरफ. बहुत मुश्किल से और तमाम कोशिशों के बाद कुछ धुंधले धुंधले बिम्ब उभर पाते हैं.

आज मन है रुक्मणी माई की दारुण कथा लिखूँ. वही रुक्मणी माई जो मेरे दोस्त कैलाश की अम्मा है. कैलाश हमारे शहर का कलेक्टर था. अक्सर अपनी अम्मा के किस्से सुनाया करता था कि कैसे उसकी दो वर्ष छोटी बहन के जन्म के साथ ही पिता जी की मृत्यु हो गई. गाँव के कच्चे मकान में वो, उसकी बहन और रुक्मणी माई रह गई. छोटी से एक जमीन का टुकड़ा था उनके पास. बताता था, कैसे रुक्मणी माई ने दूसरों के खेतों में मजूरी कर कर के उन्हें पाला पोसा, पढ़ाया लिखाया और कैलाश को कलेक्टर बनाया. वो जब पढ़ ही रहा था तभी उस जमीन के टुकड़े को बेच कर बहन की शादी भी अच्छे घर में कर दी. उसके कलेक्टर बनने के कुछ समय बाद रुक्मणी माई गुजर गई. वो उनके आभावों और कष्टों के दिनों के ढ़ेरों किस्से सुनाता. मैं याद करने की कोशिश कर रहा हूँ.

सामने सेन्ड्रा स्टेफनी को बता रही है कि कल नये किराये के घर मूव में किया है शाम को. माँ अपने बॉय फ्रेन्ड के साथ आई थी सामान शिफ्ट कराने. फिर इस अहसान के बदले वो अपनी माँ और उनके बॉय फ्रेन्ड को डिनर कराने रेस्टारेन्ट में ले गई थी. अब सामान तो शिफ्ट हो गया है. अनपैक करके जमाना है. कुछ अलमारियाँ और लाईटें भी लगनी है. पिता जी से हेल्प माँगी है. उनकी वाईफ की तबियत ठीक नहीं है, इसलिये अगले हफ्ते आ पायेंगे. उनके लिये भी कुछ गिफ्ट खरीदना होगी. वो बहुत रिच आदमी हैं, कोई मंहगी गिफ्ट खरीदना होगी. अकाउन्ट में तो पैसे बचे नहीं है, क्रेडिट कार्ड पर कुछ लिमिट बची है, उसे ही इस्तेमाल करके खरीदूँगी. आखिर हेल्प करने जो आ रहे हैं. मैं उनकी बात न चाहते हुये भी सुन रहा हूँ.

रुक्मणी माई के किस्से याद करने की कोशिश कर रहा हूँ. बिम्ब नहीं खींच रहे. कथा सूत्र याद ही नहीं आ रहे. थोड़ा असहज होने लगता हूँ.

सामने सेन्ड्रा और स्टेफनी किसी बात पर हँस रही हैं.

स्टेशन आने वाला है. अब दफ्तर से लौटते समय कोशिश करुँगा रुक्मणी माई के आभाव और कष्टकारी दिनों की कहानी याद करने की. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, अगस्त 02, 2007

अनुगूँज: हिन्दुस्तान अमरीका बन जाये तो कैसा होगा!!

अनुगूँज 24: हिन्दुस्तान अमरीका बन जाए तो कैसा होगा - पाँच बातें





अगर भारत अमरीका हो जाये तब तो क्या कहने? ऐसी ऐसी उठा पटक मचेगी, कम से कम शुरु के दिनों में, कि लोग दाँतों तले ऊंगलियाँ दबा लेंगे. बड़ी बड़ी विचित्र सी तस्वीरें उभर रहीं है यह सोचते ही.

१. सबसे बड़ा अंतर जो सूरदासी आँखें भी देख सकेंगी कि जो आज किसी काम के नहीं, वो एकाएक सबसे जरुरी हो जायेंगे और जो आज अपनी पोजिशन की शेखी में ईठलाये घूमते हैं, उनकी पूछ शून्य याने कि काया पलट और इसका उच्चतम उदाहरण होगा कि राष्ट्रपति और राज्यपालों की तूती बोलेगी और प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों का तो आप समझ ही गये. कहो, घर वाले भगा दें कि नाक कटवा दी, निक्कमे. दिन भर खाली घर में बैठा रहता है. मैडम मैडम करने की आदत से बाज आ जा. अभी भी समय है, कहीं नौकरी तलाश ले.

मुझे लगता है कि हमारा राष्ट्रपति भी तो मैचिंग ही होता. लालू जी कैसे रहेंगे? और करना भी क्या है. कुछ उल-जलुल काम. कुछ बम पटाखे फोड़ने वाले आदेश और बाकी समय किसी कन्ट्री साईड में छुट्टी पर. आधे से ज्यादा कार्यकाल तो छुट्टी छुट्टी में ही बीत जायेगा.

हमारे राष्ट्रपति २४ घंटे टीवी पर जनता से माफी मांग रहे होंगे क्योंकि अमरीका में जब थोड़ा लम्बी बिजली चली जाती है तो राष्ट्रपति टीवी पर जनता को हुई परेशानी के लिये माफी मांगते हैं. याद है जब अगस्त १४, २००३ को नार्थ अमरीका में पावर फेलूयर हो गया था.

२. कश्मीर का टंटा तो एकदम ही खत्म हो जाता. मुशर्रफ घुटना टिकाये आते और हमारे राष्ट्रपति जी को जन्म दिन के तोहफे में कश्मीर दे जाते. उपर से निवेदन करते कि मालिक, कृपा बनाये रखना. हम लोग भी याचक भाव देखकर कुछ लोन वोन माफ कर देते और कुछ मिसाईलें पकडा देते कि जाओ, खेलो. अब बदमाशी मत करना. अभी हम व्यस्त हैं अपने यहाँ आ रही बाढ़ों के नामकरण में-कटरीना, रीता और न जाने क्या क्या.

३.बिन लादेन का दुश्मन भारत हो जायेगा. बिन लादेन पलायन करके सुदूर देश अमरीका में छिप जायेगा. काहे से की वो अपने सबसे कट्टर दुश्मन से कम से कम सात समन्दर पार रहने का आदी है. भारत की सेनायें कनाडा में जगह जगह छितराई समय समय पर बेमतलब बम पटाखा फोड़ फोड़ कर खुश होती रहेंगी कि लादेन पकड़ में आने वाला है. जैसा कि अभी सुनते हैं, वो छिपा पाकिस्तान में है और अमरीकी फौजें उसे खोजती हैं अफगानिस्तान में.

इसी कड़ी में एक और घटना होगी कि लादेन लाख कोशिश कर लें, उसके जवान बिना स्टाईल बदले शहीद नहीं हो पायेंगे. वो हवाई जहाज हाई जैक करके बिल्डींग में घूसने की तैयारी करेंगे तो अव्वल तो उतनी ऊँची बिल्डींग मिलेगी ही नहीं, जिसमें हवाई जहाज घूस जाये. और गर मिल भी जाये, तो सुबह सुबह ९-१० बजे दफ्तर में होगा कौन? गिरा लो बिल्डींग. कोई मरा ही नहीं.
कई बार तो मुझे लगता है कि बिल्डींग में हवाई जहाज घुसे, उसके पहले ही हवाई जहाज की इत्ती तेज आवाज से ही बिल्डींग गिर जायेगी और हवाई जहाज उड़ते हुये दूसरी तरफ निकल जायेगा. लो फिर हवाई जहाज का भी कोई नहीं मरा. मैंने देखा है, चर्नी रोड़ मुम्बई में लोकल लाईन के बाजू की जवान बिल्डींग ट्रेनों के आवाजाही से उठे कंपन को नहीं झेल पायी थी और एक रात १:४० की लास्ट लोकल को गुड़ नाईट करते खुद धडधडा कर गुड बाय हो गई थी.शायद १९८३-८४ की बात है.

४. आज सद्दाम हुसैन जिन्दा होते भले ही जेल में होते. उन्हें फाँसी की सजा सुनाई जाती. वो राष्ट्रपति से गुहार लगाते. फाँसी रोक दी जाती. और फिर उनका गुनाह तो अफजल टाईप भी नहीं. वो तो अपने घर के अंदर ही हुडदंग मचाये थे. पक्का माफ हो जाती फाँसी. अब तो उसकी किस्मत ही खराब कही जा सकती है कि भारत के अमरीका होने के पहले ही वो टांग दिये गये. फिर भी हमारी फोजें इराक में मुश्तैदी से तैनात रह कर शांति स्थापित कर रही होती. कई सैनिकों के ट्रान्सफर आर्डर आते कि अब आपका ट्रान्सफर इराक से कुवैत हो गया है. भारत फौंजो के खर्च के नाम पर आराम से कुवैत और इराक का तेल लूट रहा होता.

५. विचार उठता है कि तब शाहरुख खान एड्स उन्मुलन के लिये अमरीका आते और एनजिलिना जोली को मंच पर चुम्बन ही चुम्बन जड़ देते. सी एन एन टाईप न्यूज चैनल ढ़ोल पीट पीट कर बार बार चुम्बन प्रकरण पूरे अमरीका में दिखा रहे होते. लोग हाय हाय करते रह जाते और शाहरुख वापस भारत में ऑस्कर अवार्ड लेने और ऑस्कर अवार्ड का इस बार संचालन करेंगे आपके अपने करन जौहर.

ऐसे में जाने क्या क्या हो जाये,
अगर भारत ही अमरीका हो जाये
हम भी आज लाईन में लगे होते
काश! भारत का वीसा मिल जाये.

गंभीर नोट: यह रचना विषय के आधार पर उड़न तश्तरी की एक काल्पनिक उडान मात्र है. इसके माध्यम से किसी पद या व्यक्ति की गरिमा को कोई ठेस पहुँचाने इरादा नहीं है फिर भी यदि किसी को ठेस पहुँची हो तो अमरीकन स्टाईल दाँत चियारे हमारी सॉरी. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अगस्त 01, 2007

ग़ुरबत की ठंडी छाँव में

रविवार की वो सुबहें रह रह कर याद आ ही जाती हैं. तब मैं भारत में रहा करता था.

गुलाबी ठंड का मौसम. अलसाया सूरज धीरे धीरे जाग रहा है. शनिवार की रात की खुमारी लिये मैं बाहर दलान में सुबह का अखबार, चाय की गर्मागरम प्याली के साथ पलटना शुरु करता हूँ. दलान में तखत पर गाँव तकिया से टिक कर बैठ ठंड की सुबह धूप खाना मुझे बहुत भाता है. अखबार में कुछ भी खास नहीं. बस यूँ ही रोजमर्रा के समाचार. पढ़ते पढ़ते में वहीं लेट जाता हूँ. सूरज भी तब तक पूरा जाग गया है. अखबार से मुँह ढ़ककर लेटे लेटे कब आँख लग गई, पता ही नहीं चला.

आँख खुली बीड़ी के धुँये के भभके से. देखा, पैताने रामजस नाई उकडूं मारे बैठे बीड़ी पी रहे हैं. देखते ही बीड़ी बुझा दी और दांत निकालते हुये दो ठो पान आगे बढ़ाकर-जय राम जी की, साहेब. यह उसका हर रविवार का काम था. मेरे पास आते वक्त चौक से शिवराज की दुकान से मेरे लिये दो पान लगवा कर लाना. साथ ही खुद के लिये भी एक पान लगवा लेता था.सारे पान मेरे खाते में.

रामजस को देखते ही हफ्ते भर की थकान हाथ गोड़ में उतर आती और मेरे पान दबाते ही शुरु होता उसका मालिश का सिलसिला. मैं लेटा रहता. रामजस कड़वे तेल से हाथ गोड़ पीठ रगड़ रगड़ कर मालिश करता और पूरे मुहल्ले के हफ्ते भर के खुफिया किस्से सुनाता. मैं हाँ हूँ करता रहता. उसके पास ऐसे अनगिनत खुफिया किस्से होते थे जिन पर सहजता से विश्वास करना जरा कठिन ही होता था. मगर जब वो उजागर होते और सच निकलते, तो उस पर विश्वास सा होने लगता.

एक बार कहने लगा, साहेब, वे तिवारी जी हैं न बैंक वाले. उनकी बड़की बिटिया के लछ्छन ठीक नहीं है. वो जल्दिये भाग जायेगी.

दो हफ्ते बाद किसी ने बताया कि तिवारी जी की लड़की भाग गई. अब मैं तो यह भी नहीं कह सकता था कि मुझे तो पहले से मालूम था. रामजस अगले इतवार को फिर हाजिर हुआ. चेहरे पर विजयी मुस्कान धारण किये, का कहे थे साहेब, भाग गई तिबारी जी की बिटिया. मैं हां हूं करके पड़े पड़े देह रगड़वाता रहता. वो कहता जाता, मैं सुनता रहता. मौहल्ले की खुफिया खबरों का कभी न खत्म होने वाला भंडार लिये फिरता था साथ में.

आज सोचता हूँ तो लगता है कि यहाँ की मसाज थेरेपी क्लिनिक में वो मजा कहां.

एक घंटे से ज्यादा मालिश करने के बाद कहता, साहेब, अब बैठ जाईये. फिर वो १५ मिनट चंपी करता. तब तक भीतर रसोई से कुकर की सीटी की आवाज आती और साथ लाती बेहतरीन पकते खाने की खुशबु. भूख जाग उठती. रामजस जाने की तैयारी करता और बाल्टी में बम्बे से गरम पानी भरकर बाथरुम में रख आता मेरे नहाने के लिये.

अपनी मजूरी लेने के बाद भी वो हाथ जोड़े सामने ही खड़ा रहता. मैं पूछता, अब का है? वो दाँत चियारे कहता; साहेब, दिबाली का इनाम. मै उससे कहता; अरे, अभी दो महिना ही हुआ है दिवाली गुजरी है, तब तो दिये थे. तुम्हारी यही बात अच्छी नहीं लगती. शरम नहीं आती हमेशा दिबाली का ईनाम, दिबाली का ईनाम करते हो.

वो फिर से दाँत चियार देता और नमस्ते करके चला जाता. मैं नहाने चला जाता.

उसका दिबाली ईनाम माँगना साल के ५२ रविवारों में से ५१ रविवार खाली जाता बस दिवाली वाला रविवार छोड़कर जब मैं वाकई उसे नये कपडे और मिठाई देता.

बाकी ५१ रविवार वो दाँत चियारे कहता; साहेब, दिबाली का इनाम.मैं कह्ता;तुम्हारी यही बात अच्छी नहीं लगती. शरम नहीं आती हमेशा दिबाली का ईनाम, दिबाली का ईनाम करते हो.

वो फिर से दाँत चियार देता मानो पूछ रहा हो; चलो हम तो आभाव में है किसी आशा में मांग लेते हैं मगर आपको बार बार मना करते शरम नहीं आती क्या?

पता नहीं क्यूँ, यह संस्मरण लिखते हुये शायर कैफ़ी आज़मी की एक गजल के दो शेर अनायास ही याद आ गया:

वो भी सराहने लगे अरबाबे-फ़न के बाद
दादे-सुख़न मिली मुझे तर्के-वतन के बाद

ग़ुरबत की ठंडी छाँव में याद आई उसकी धूप
क़द्रे-वतन हुई हमें तर्के-वतन के बाद

*अरबाब= मित्रों, दादे-सुख़न= कविता की प्रशंसा, ग़ुरबत= परदेस, तर्के-वतन=वतन छोड़ना, Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 29, 2007

अहमक या असहमत

इस जागरुकता के दौर में, कोई भी बात ऐसी नहीं होती जिसकी तीन फाँक न हो जायें-सहमत, असहमत और उदासीन यानि तटस्थ. इस तृतीय तटस्थ श्रेणी से हमें कुछ लेना देना नहीं, इनका हिसाब तो समय करेगा, दिनकर जी ने बता दिया है:

"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।"

फिर जो सहमत हैं, उनसे क्या शिकायत? कोई नहीं, वो तो हमारे साथ हैं ही. तो इनकी भी क्या बात करें. इन्हें तो बस साथ निभाने का साधुवाद दिया जा सकता. तनिक आभार टाईप.

रह गये असहमत.




असहमत बस असहमत नहीं होते हैं. इनके भी कई प्रकार होते हैं.

एक असहमत होते है अपनी विद्वता के कारण. उनका ज्ञान उन्हें आपसे सहमत होने से रोकता है. मगर ज्ञान के साथ अगर उनमें नम्रता भी हो, तो वो आप को गलत न बता कर बस अपनी बात रख देते हैं. अक्सर बात की समाप्ति इस तरह कर देते है कि यह मेरी सोच है, हो सकता है मैं गलत हूँ. मगर अपनी सोच तो बता ही जाते हैं.

इनसे कोई क्या आपत्ति करेगा. यह तो खुद ही मान रहे हैं कि हो सकता है मैं गलत हूँ. जबकि बात अर्जित ज्ञान पर आधारित है जिसकी गलत होने की संभावना भी कम है.

इसी प्रकार के असहमतों मे जिनको अपने ज्ञान पर दंभ होता है और नम्रता का बैरियर आड़े नहीं आता. वो कहते हैं कि आप गलत हैं. फलाने किताब के मुताबिक, फलानी धारा के तहत मैं कहना चाहता हूँ कि सही बात यह है. फिर अपनी ज्ञान गंगा बहाना शुरु. यह भी अक्सर सही ही होते हैं. बस, नम्रता के सुरक्षा कवच के बाहर. अति उत्साही और अति आत्म विश्वासी किस्म के ज्ञानी. इनसे बहस कुछ दूर तक की जा सकती है क्योंकि इनके पास नम्रता का कवच नहीं है मगर ज्ञान रुपी बाण इनको अच्छी सुरक्षा दे देता है.

एक असहमत ऐसे होते हैं कि आपकी हर कही बात में सिर्फ वो हिस्सा खोजते हैं जिनसे वो मानसिक और अपने संस्कारों के तहत असहमत हो सकें. इससे उन्हें अच्छा लगता है. बात बढ़ती है. वो कुछ देर बातचीत करते हैं. बात को कई भागों में बंटवा देते हैं. मुख्य मुद्दा परे हो जाता है, विवाद बाकी रह जाता है. वो थोड़ी देर तक असहमत रह कर विवाद करवा कर, गुट गठित कर अलग हो जाते हैं. इनसे थोड़ा बचना चाहिये.

अब होने को तो और भी बहुत से असहमतों के प्रकार होते है, जैसे भावनात्मक असहमत, बहुमत प्रिय असहमत यानि देखा कि बहुमत असहमती जता रहा है तो यह भी असहमत हो गये. इनका खुद का कोई स्टेंड नहीं होता. भीड़ के साथ आते हैं और उन्हीं के साथ छट जाते हैं. इनसे निश्चिंत रहें.

कुछ एक ऐसे भी देखे गये हैं जिन्हें आपके लिखे या कहे से कुछ लेना देना नहीं. उनका अपना भी कोई नज़रिया नहीं. बस नकारात्मक लिखने या कहने की आदत है तो बिना पढ़े या सुनें ही कह जाते हैं कि यह आपकी सोच हो सकती है, मेरी सोच भिन्न है. बस, इससे ज्यादा न यह कहते हैं. न ही इनकी कोई सोच है. यह किसी तरह का नुकसान नहीं पहुँचाते और न ही आपने पलट कर क्या पूछा, उससे इन्हें कोई सारोकार है. यह तो अब गये तो अगली बार ही आयेंगे, नई घटना में. यह भड़काने नहीं आये होते.

भड़काने वाले बमचक असहमत होते हैं जो बिना अपना कोई मत रखे आपके कहे को ललकारते हैं कि आप ऐसा नहीं कह सकते. आप अपने ख्याल लोगों पर लाद रहे हैं, इसके परिणाम आपको भुगतना होंगे आदि आदि. भड़काने के बाद अगर आग ठीक से लग गई. दो गुट बनकर झगड़ने लगे. तो बीच बीच में यह ऐसे ही बयान जारी करते रहेंगे कि अभी भी वक्त है, सुधर जाओ. माफी मांगो. अपना कहा वापस लो, वरना ठीक नहीं होगा आदि. फिर यह नया ठिया तलाशते है, नई आग लगाने के लिये. धीरे धीरे लोग इन्हें पहचान जाते हैं और तवज्जो के आभाव में यह तड़पते नजर आते हैं. बस, इतना ही धन्य है कि इनका अपना कोई मत नहीं होता. अपनी कोई राय नहीं आपकी बात पर कि अगर वो गलत है तो सही क्या है. इसका जिम्मा यह झगड़ने वालों पर डाले रहते हैं. इनकी परिकल्पना आप कुछ कुछ चियर गर्लस टाईप से कर सकते हैं.

अव्वल दर्जे के असहमत वो होते हैं जिन्हें अगर आप अहमक के नाम से भी पुकारें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.

इनका काम बस असहमत होना है. आप जो भी कह कर देख लें, यह असहमत हो जायेंगे. इन्हें विवाद करने से आत्म संतुष्टी मिलती है. मानो विवाद विवाद नहीं, कब्जियत के निराकरण की दवा हो.सब झगड़ते रहें, गाली गलौज करें, टी आर पी यानि हिटस बढ़ती रहें, लोग इन्हें जानने लगें, बस इनका काम हो गया. तभी यह इत्मिनान से सो पाते हैं. इन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि आप सही कह रहें हैं या गलत. बस इन्हें यह मालूम चलना चाहिये कि आप कुछ कह रहे हैं और यह असहमत हो जायेंगे. आप जो भी कह लें, आप उनसे सहमत हो लें, वह फिर भी वो आपसे असहमत हो जायेंगे.

परसाई जी का एक उदाहरण इस तरह के लोगों के वार्तालाप का पेश करता हूँ:

वो कहता है कि , 'भ्रष्टाचार बहुत फैला है'.

मैं कहता हूं, 'हाँ, बहुत फैला है.'

वो कहता है, 'लोग हो हल्ला बहुत मचाते हैं. इतना भ्रष्टाचार नहीं है. यहां तो सब सियार हैं. एक ने कहा भ्रष्टाचार! तो सब कोरस में चिल्लाने लगे भ्रष्टाचार.'

मैं कहता हूँ,'मुझे भी लगता है, लोग भ्रष्टाचार का हल्ला ज्यादा उड़ाते हैं.'

वो कहता है कि, 'मगर बिना कारण लोग हल्ला नहीं मचाएंगे जी? होगा तभी तो हल्ला करते हैं. लोग पागल थोड़े ही हैं.'

मैने कहा, 'हां, सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट तो हैं.'

वो कहते है कि, 'सरकारी कर्मचारी को क्यों दोष देते हो? उन्हें तो हम-तुम ही भ्रष्ट करते हैं.'

मैं बोल उठा, 'हां, जनता खुद घूस देती है तो वे लेते हैं.'

वो उखड़ पड़े, 'जनता क्या जबरदस्ती उनके गले में नोट ठूंसती है? वो भ्रष्ट न हों तो जनता क्यों दे?'


याने कि किसी तरह बस सहमत ही नहीं होना है.

यह असहमतों की जमात एकाएक बहुत तेजी से पनप रही है. सब देख रहे हैं. इनसे सावधान और सतर्क रहने की जरुरत है. इन्हें रोकने का एक मात्र साधन यह नहीं है कि इनसे सहमत हो जायें क्योंकि यह पलट जायेंगे. तब कैसे उन्हें रोका जाये?

मुझे लगता है कि इन अहमक दर्जे के असहमतों के लिये उन्हें अनदेखा करना ही इलाज है. वो कभी सहमत तो हो ही नहीं सकते. विवाद उनका शौक है और गाली गलौज उनका खुली बातचीत का नजरिया-प्रगतिशीलता.

मित्रों, आज इनसे सतर्क रहने की आवश्यक्ता है.

यह समाज के विकास में रोड़ा हैं. इनसे बचें तो विकास की बात करें.

इन्हें नजर अंदाज कर दें तो यह अपनी मौत खुद मर जाते है, तो चलो, नजर अंदाज करें न!!

हरी ओह्म!!!!

मिले नहीं जब शब्द तुम्हारे, कैसे गीत सजाऊँ मैं
तुम्हीं नहीं जब पास हमारे, कैसी गज़ल सुनाऊँ मैं
यूँ तो नादानों से कहना, कुछ भी अब बेमानी होगा
आग लगी है इस दुनिया में, कैसे चुप रह जाऊँ मैं.
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बुधवार, जुलाई 25, 2007

आम नहीं आये...

कुछ आर्थिक तंगियाँ और उस पर से बड़ा परिवार, जो कि उसकी जिम्मेदारी था. हरदम खोया खोया रहता. मगर फिर भी एक उमंग थी.

बाप बचपन में ही गुजर गये. अब तो धुँधली सी यादें हैं.

वो अपनी कहानी बताने लगा:

बाबू जी साईकिल से दफ्तर से आते. बैठक में ही रहते. वहीं दीवान पर सोया करते थे. बैठक का दरवाजा सड़क पर खुलता था. हर सडक से गुजरने वाला राहगीर जैसे उन्हें जानता. सब उन्हें राम राम कहते जाते. वो वहीं दीवान के पास अपनी टेबल कुर्सी पर पट्टीदार जाँधिया और बनियान पहने कवितायें लिखा करते थे. वो बड़े डाकघर में बाबू थे.

देर शाम रामदीन काका, बेग साहेब, अली चचा, तिवारी मास्साब और न जाने कितने यार दोस्त आ बैठते बैठक में. फिर चलता कविता का दौर. माँ चाय बनाकर देती, हम लोग बैठक में पहुँचा आते थे. कभी कभी नुक्कड़ से अनोखेराम के समोसे भी आते. हम चारों भाई बहन बहुत खुश होते. हमारे लिये भी समोसे मंगाये जाते.

एक छोटा भाई और दो छोटी बहनें. सब हंसी खुशी चल रहा था. हम इस छोटे से कस्बेनुमा शहर में बहुत खुश थे. एक रात पिता जी के सीने में दर्द उठा. डॉक्टर चाचा तुरंत भागते आये. कुछ इन्जेक्शन भी दिये. पिता जी आराम से सो गये. मगर फिर कभी न उठे. बहुत भीड़ जमा हुई थी उनकी शवयात्रा में. फिर उस भीड़ से छंट कर रह गये, मैं, माता जी, और दो छोटी बहनें और एक सबसे छोटा भाई. मैं दर्जा चार में था उस वक्त.

उस साल अली चाचा के आँगन में लगे आम के पेड में आम नहीं आये थे. हम बस इन्तजार करते रहे.

थोडे से फंड के पैसे, कुछ साहित्य संस्थानों के अनुदान में प्राप्त एक मुश्त रकम, और एक छोटी से पेंशन. बस काट कटौती में जिन्दगी चलने लगी. माँ, माँ कम और बाप ज्यादा हो गईं. हर वक्त हमें जीवन में तरक्की की सलाह, हमारी हर जरुरतों में घर और बाहर दोनों जिम्मेदारी. उम्र से पहले ही बूढ़ी हो गई और मैं तो खैर अपना बचपन खो ही चुका था. माँ की चिन्ता होती थी बस जाहिर नहीं करता था. ऐसा लगता है माँ समझती थी. जब ग्याहरवीं का बोर्ड का परीक्षा फल आया तो मैनें प्रथम श्रेणी प्राप्त की. माँ को बताया. मानो उसके सारे सपने पूरे हो गये. अगली सुबह वो नहीं रही. उसका मरने के बाद का चेहरा याद है. बिल्कुल निश्चिंत जैसे कि कह रही हो, तुम हो न!! अब मैं, मेरी दो छोटी बहनें और सबसे छोटा भाई.

उस साल भी अली चाचा के आँगन में लगे आम के पेड में आम नहीं आये थे. हम बस इन्तजार करते रहे.

अली चाचा ने सिफारिश करके मुझे पिता जी अनुकम्पा नियुक्ति वाली फाईल के हवाले से पोस्ट ऑफिस में छंटनी विभाग में नियुक्त करवा दिया.

समय बीतता गया. दोनों बहनें शादी लायक हो गईं. कोशिश मशक्त कर कर्ज तले दब दोनों को समाज में अच्छा ब्याह दिया. दोनों खुशी खुशी अपने घर चली गईं. फिर कभी नहीं लौटी. उनका परिवार समाज में हैसियत रखता था. छोटे लोगों से मिलना जुलना उन्हें पसंद नहीं था. फिर भी वो खुश था कि बहनें अच्छॆ घरों में ब्याह गई.

कर्ज बढ़ गया था. छोटे भाई को इंजिनियर बनाने का सपना था. दाखिला भी करवा दिया था. वो उसमें अपना भविष्य देखता था. इस साल फायनल इयर था. उसकी तन्ख्वाह में घर का किराया से लेकर कर्ज की किश्तों तक का फैलाव नहीं था. किसी तरह मान मन्नुअत के यहाँ तक आ गया था. बस एक साल की बात ही तो और है. फिर तो भाई इन्जिनियर बन जायेगा और वो ठाठ से जियेगा. उसने सोच रखा है कि वो तब नौकरी छोड़ देगा. छोटा कमायेगा और वो पिता जी अधुरी किताब पूरी करेगा.

इन्जिनियरिंग खत्म कर छोटे भाई ने आगे पढ़ने के लिये अमेरीका जाने की पेशकश की. इसने उसे समझाया भी कि बेटा, कुछ दिन नौकरी कर ले फिर कमा कर चले जाना. मगर उसके सब दोस्त तो अभी जा रहे हैं. न चाहते हुये भी इसने कुछ पोस्ट ऑफिस सेविग्स अकाउन्टस में कुछ घोटाले कर ही डाले और उसे अमेरीका जाने का इन्तजाम कर दिया. वह सोचता था कि अमेरीका से पैसे भेज देगा तब सब अकाउन्टस में वापस डाल दूंगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा.

भाई अमेरीका चला गया.

ऐसी बातें कब छिपी हैं. विभागीय तहकीकात हुई. घर पर छापा पड़ा. नौकरी से हाथ धो बैठा. जेल जाने की नौबत आ गई.

अखबारों में उछल कर खबर छपी. छोटे भाई के दोस्तों ने छोटे भाई को अमेरीका फोन कर दिया.

उसका फोन आया था: सामने वाले पी सी ओ में "भईया, आपने यह सब क्या किया, मुझे तो अपने आपको आपका छोटा भाई कहते हुये शर्म आ रही है. आज से आप मेरे लिये मर गये. मैं अब कभी उस शहर नहीं लौटूँगा. आपने मुझे इस लायक नहीं छोड़ा कि मैं लोगों में मुँह दिखा पाऊँ" और उसने फोन काट दिया था.

उस पर केस चल रहा था. तीन माह जेल में रहने के बाद जमानत हो चुकी है. अली चाचा के सर्वेंट क्वाटर में रहता है. दिन भर उनके लिये बाजार जाने से ले बच्चों को स्कूल पहुँचाने आदि में व्यस्त रहता है. चाची दोनों टाईम बचा खाना खिला देती है. दिन कट जाता है. बस, रात में नींद नहीं आती, पता नहीं क्यूँ?

पिता की अधुरी किताब आज भी अधुरी है.

इस साल भी अली चाचा के आँगन में लगे आम के पेड में आम नहीं आये. उसे इन्तजार भी नहीं. उसे अब आम पसंद नहीं आते. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 22, 2007

इश्क का टमटम

वाह, क्या मौसम हुआ है.

इश्क के टमटम में मास्टर, मास्टरानी जैसे लोग तक घोड़े टपटपाते चले जा रहे हैं.कोई इश्क के कार्टून बना रहा है तो एक मास्साब तो इश्क के पार्ट टू में खड़े सब्र का फल सेब बता रहे हैं. अगर पता होता कि आदम हव्वा की पुराणिक कथा को एक पुराणिक मास्टर से ऐसा आघात होगा तो इसे पुराणिक कथा की जगह पहले ही ऐतिहासिक कथा का दर्जा दे देते. मगर तब क्या पता था?

ज्ञानी इसी सेब पर टिप्प्णी रुपी ज्ञान बाँट रहे हैं कि अभी उम्र ही क्या है? ४० की उम्र कोई ज्यादा नहीं होती तो कोई फुरसत में कह रहा है कि ज्ञानी जी की सलाह् पर अमल करके लौटती पोस्ट् से पुष्टि की सूचना दें. फुरसत में हैं मगर अब नई मेहनत कौन करे? इस विचार से प्रेम के विषय में अपनी पुरातनकालिन टिप्स पकडा गये. कहते हैं कि प्रेम गली अति सांकरी मतलब हमारे लिये तो बेकार. संकरी गली में हमारा क्या काम, कहीं अटक ही न जायें. इनको क्या? बात करना है बस. गली में घुसना के पहले अपनी साईज तो हमें देखना है.

वैसे तो हम इश्क-मुश्क पर कुछ लिखते नहीं. मगर युवा मन है, आसपास के माहौल से डगमग हो ही जाता है. पुरानी बाते भी ख्याल आ जाती हैं. किसी जमाने में हम भी इश्क के पीर हुआ करते थे. एक एक बार में सात सात, आठ आठ इश्क गाथायें चला करती थी. लोग कहते हैं कि इश्क छिपाये नहीं छिपता. झूठ बोलते हैं. हमारे तो बताने पर भी छिपा रह गया. जिनसे इश्क किया करते थे, उन्हें तक नहीं मालूम. रत्ती भर खबर नहीं. सारे दोस्तों को खबर मगर जिनसे इश्क कर रहे हैं. जिनके नाम उदास बैठे हैं, जिन पर कविता रच रहे हैं. उसे कोई खबर नहीं.सात हों कि आठ मगर एक को भी नहीं. सब घट एक समान. सब पर एक समान नजर. सबसे एक सा इश्क यानि भरपूर. किसी को कोई खबर नहीं.

ऐसे सम दृष्टा इंसान आजकल मिलते कहाँ हैं? कई बार तो लगता है कि एकाध म्यूजियम बना दें और उसमें सज कर बैठ जायें ताकि आप लोग ऐसे इंसान के दर्शन से वंचित ही न चले जायें. सुभीता के लिये वैसे फोटू साईड पैनल में लगा दिया है मगर फोटो और साक्षात के अंतर को न दूर कर पाने के लिये फिलहाल खेद के सिवाय और क्या व्यक्त करुँ? आपकी ललक शांत करने के लिये अपनी दर्शन न दे पाने की मजबूरी देख आँख छलक सी आई है.

मगर, एक जैसे दिन तो धूरे के भी नहीं रहते. सुख दुख आनी जानी. हमने भी भीषण प्रेक्टीस की. क्म्यूनिकेशन स्किल में लालाजी इन्सट्यूट से डिप्लोमा किया. ढ़ेर सारे प्रेम साहित्य पढ़े. ढ़ेरों कवियों की विविध प्रेम कवितायें पढ़ी व सुनी.

इस विषय में महारत हासिल करने के लिये हमने कितनी मेहनत की, इस बात का अंदाजा आप इस बात से आसानी से लगा सकते हैं कि अगर उसका आधा समय भी हम योग अभ्यास को देते तो आज आप आस्था चैनल से लेकर लंदन तक बाबा समीर देव को देख रहे होते. हमारे कहने पर नाक से मंडी के सांड की तरह फुफकारते हुये सांस छोड़ रहे होते और कहते की प्रणायाम कर रहे हैं. अगर फिर भी अंदाज नहीं हो पा रहा है तो ऐसा समझ लें कि अगर इसका चौथाई समय भी आत्मा परमात्मा से बात चीत सीखने में लगा देते तो आज आप हमें महामहिम कह रहे होते. फिर भी नहीं समझे तो एकदम सरल भाषा में ऐसे समझो कि इसका एक बटा दस भाग भी दलितों को मूर्ख बनाने में लगाते तो अभी भारत के सबसे बड़े राज्य के मुख्य मंत्री होते हालांकि रंग रुप और साईज में अभी भी टक्कर दे सकते हैं.

अब जब इतनी आस्था और श्रृद्धा के साथ पूर्णलगनित अथक मेहनत की थी तो परिणाम मिला. वो भी ऐसा कि हम मल्टी टास्कर से सिंगल पति की स्टेटस में आ गये और आज वो हमारी पत्नी के रुप में सुचारु रुप से हमें संचालित कर रही हैं. कोई गम नहीं कि बाबा समीर देव नहीं बन पाये. इसका भी गम नहीं कि आप हमें महामहिम नहीं कह पाये. मगर यह एक बटा दस समय तो कभी भी निकाल लेंगे. शायद कभी आप मुख्य मंत्री के रुप में हमारा स्वागत कर भाव विभोरित हो पायें. प्रयास करने से प्रयास की परिकल्पना ज्यादा सुखद लग रही है अभी तो.

इसी इश्क पर लिखने के चक्कर में निम्न रचनायें तैयार हो गई हैं. पहला वाला एक नया सा प्रयोग है और दूसरा आपके लिये उसी का दूसरा रुप:

प्रयोग १:

वो भी क्या दिन थे,जब इश्क किया करते थे,
उसी बात पे जीते थे, उसी बात पे मरते थे

दुनिया ने कहा पागल, दीवानों सी हालात थी
उसी चाह पे रोते थे, उसी चाह पे हँसते थे.

देखें न अगर उसको, एक टीस से उठती थी
उसी आह में सोते थे,उसी आह में जगते थे.

हँसने में भी उसके , पायल सी खनकती थी
उसी राग में गाते थे, उसी राग में लिखते थे.

भीनी सी महक उसकी, दर उसका बताती थी
उसी राह पे रुकते थे, उसी राह पे चलते थे.

--समीर लाल 'समीर'


प्रयोग २:


वो भी क्या दिन थे,जब इश्क किया करते थे
चाहत की दुनिया में, हम साथ जिया करते थे।

दुनिया ने कहा पगला, लगता है दीवाना सा
हम जाने किस जुनूं में बस हँस दिया करते थे।

देखे न अगर उसको, एक टीस से उठती थी
रिसते हुये जख्मों को, खुद ही सिया करते थे।

हँसने में भी तो उसके, जो फूल बिखरते थे
तह में किताबों की, हम रख लिया करते थे।

भीनी सी महक उसकी, जो उसका पता देती
वो लिख के लिफाफे पे, भेज़ा किया करते थे।

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, जुलाई 19, 2007

सपना एक निराला है

इधर महफिल, शायर फैमिली, ई कविता, हिन्द कविता और अन्य मंचों से जुडे सभी मित्रों के ईमेल लगातार मिल रहे हैं कि मात्र कवित्त क्यूँ नही करते? क्यूँ डरते हो एक विधा को अपनाने में? अब क्या बतायें उन्हें. चाहते हैं कि कविता भी जस्टिफाई हो और गद्य भी. बस कोशिश जारी रहती है कि दोनों के बीच सामंजस्य बना कर चल पाये और दो नावों के सवार की तरह डूबे नहीं. तो आज कविता पेश है.

मगर वादा है कि अगर ध्यान से पढ़ा जाये और तो गद्य प्रशंसकों को भी यह निराश न करेगी. एक संदेश है इसमे सही दिशा का और क्या सपना मेरा है इस समाज से. थोड़ा गौर फरमायें और बतायें कि मैं सफल रहा कि नहीं-अपनी बात कहने में. :)

बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि बकोल वस्ल:

अपने अंदर ही सिमट जाऊँ तो ठीक
मैं हर इक रिश्ते से कट जाऊँ तो ठीक.

थोड़ा थोड़ा चाहते हैं सब मुझे
मैं कई टुकड़ॊं में बँट जाऊं तो ठीक.

तुम ने कब वादे निभाये 'वस्ल' से
मैं भी वादों से पलट जाऊँ तो ठीक.

अब मुझे सुनिये:

सपना एक निराला है

अगर हमारे रचित काव्य से, तुमको कुछ आराम मिलेगा
यकीं जानिये इस लेखन को, तब ही कुछ आयाम मिलेगा.
भटकों को जो राह दिखाये, ऐसी इक जब डगर बनेगी
दुर्गति की इस तेज गति को, तब जाकर विराम मिलेगा.

इसी पाठ की अलख जगाने, हमने यह लिख डाला है
पूर्ण सुरक्षित हो हर इक जन, सपना एक निराला है.

भूख, गरीबी और बीमारी, कैसे सबको पकड़ रही है
हाथ पकड़ कर बेईमानी का, चोर-बजारी अकड़ रही है.
इन सब से जो मुक्त कराये, ऐसी जब कुछ हवा बहेगी
छुड़ा सकेगी भुजपाशों से, जिसमें जनता जकड़ रही है.

इसी आस के भाव जगा कर, गीत नया लिख डाला है
पूर्ण प्रफुल्लित हो हर इक जन, सपना एक निराला है.

शिक्षित और साक्षर होने में, जो है भेद बता जाती हो
नैतिकता का सबक सिखा कर, जो इंसान बना पाती हो
भेदभाव मिट जाये जिससे, ऐसी एक किताब बनेगी
मानवता की क्या परिभाषा, ये सबको सिखला जाती हो.

ऐसी सुन्दर कृति सजाने, यह छंद नया लिख डाला है
पूर्ण सुशिक्षित हो हर इक जन, सपना एक निराला है.

मेहनत करने से जो भागे, उनका बिल्कुल नाम नहीं है
डर कर जिनको जनता पूजे , वो कोई भगवान नहीं है
कर्म धर्म है सिखला दे जो, ऐसी अब कुछ बात बनेगी
जात पात में भेद कराना, इन्सानों का काम नहीं है.

धर्म के अंतर्भाव दिखाता, इक मुक्तक लिख डाला है
पूर्ण सु्संस्कृत हो हर इक जन, सपना एक निराला है.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 15, 2007

क्या साधुवाद का युग होता है?

हिंदी ब्‍लॉगिंग का साधुवाद युग अब बीत गया। समीरजी तो हो गए बेरोजगार :)

मसिजीवी के उपरोक्त आलेख में मैने पढ़ते वक्त कोशिश पूरी की कि स्माईली को ही सत्य मानूँ. प्रयास यह भी किया कि सबसे पहले टिप्पणी करके यह भी बता दूँ कि मुझे बुरा नहीं लगा. उद्देश्य मात्र यह था कि मेरे चाहने वाले एवं जानने वाले, जिसमें मसिजीवी स्वयं भी हैं, कहीं इस कथ्य को शाब्दिक अर्थों मे न ले लें. मैं आदतानुसार परोक्षरुप से आहत भी नहीं हुआ किन्तु हतप्रद जरुर था. पुनः, इसे पढ़ा. कुछ ही देर बाद छपी भाई फुरसतिया जी की ब्लॉगर मीट भी पढ़ी और उसमें उल्लेखित इस तथ्य पर उनकी विचारधारा भी. हमेशा की तरह उनका मेरे उपर अडिग विश्वास और असीम प्रेम देखकर मन भर आया. कम्प्यूटर बंद कर दिया.

पिछले २४ घंटो में कई बार पुनः कम्प्यूटर चालू करने के लिये अनायास ही हाथ बढ़ाया. मन नहीं माना, ध्यान बँटा लिया.टीवी देखा, मित्रों से फोन पर बातचीत की, परिवार के साथ समय दिया. मगर यह दूरी लगातार खलती रही. लगा कि मैं अपनी ही दुनिया से दूर क्यूँ हो रहा हूँ.

थोड़ा संवेदनशील हूँ फिर भी जल्दी बुरा नहीं मानता. आदतानुसार परोक्षरुप से जल्दी आहत भी नहीं, फिर भी हतप्रद तो हो ही सकता हूँ. ऐसी स्थितियों में मैं अक्सर त्वरित प्रतिक्रिया से बचने की कोशिश करता हूँ. अगर मुझे हतप्रद कर देने या झंकझोर देने वाले विमर्श या विवाद का विषय बिन्दु मैं स्वयं न हूँ, तब तो मैं शायद किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया भी न व्यक्त करुँ और कोशिश कर इस तरह के विमर्श या विवाद को शीघ्रातिशीघ्र मानस पटल से मिटा दूँ.

जबसे पढ़ा एक भी टिप्पणी करने का मन नहीं बना पाया. खैर, मन तो बन ही जायेगा. संस्कार तो छूटते नहीं. शायद कुछ समय लगे, मन काबू में आ जाये, फिर करेंगे टिप्पणियाँ खूब जी भर के.

रुका नहीं गया. मानस को मनाया और फिर अपनी दुनिया में आया. फिर मित्र मसीजीवी को पढ़ा. फिर भाई फुरसतिया जी को पढ़ा. सब टिप्पणियां पढ़ीं. मित्रों का प्रेम देखा. सभी की टिप्पणियों ने पुनः एक विश्वास दिया. अच्छा लगा पढ़ सुनकर सब कुछ.

ऐसा नहीं है कि चिट्ठों में होते विवाद मुझे उद्वेलित नहीं करते या फिर मैं उनके विरोध में कुछ कहने में सक्षम नहीं या एकदम ही विवेकशून्य हूँ. मगर मुझे व्यक्तिगत तौर पर विवाद पसंद नहीं वो भी कम से कम ऐसे तो कतई नहीं, जिनकी परिणिती मात्र कटुता हो, वह भले ही विचारों की हो या व्यक्तिगत.

मैं दोनों को ही उचित नहीं मानता. एक ही छत के नीचे पले बढ़े, एक ही आदर्शों का पाठ पढ़ते बड़े हुए दो भाईयों तक के विचार अलग अलग होते हैं. तब यहाँ तो सब अलग अलग घरों, अलग अलग परिस्थितियों, अलग अलग संस्कारों से आये लोग हैं. कैसे हो सकते हैं सबके एक से विचार? आप अपने विचार रखिये, वो अपने. दोनों मे जो जो जिसको अच्छा, वो वो उनको स्वीकारें वरना स्वयं के विचार तो हैं ही. कोई भी तो विचार शून्य नहीं. सभी विवेकवान हैं. फिर अपने विचार मनवाने के लिये विवाद कैसा और किस हद तक? सार्थक विमर्श की भी एक सीमा रेखा होती है. सबको आपस में सामन्जस्य बनाना होगा तभी विकास का एक सशक्त और सुहावनी राह बनेगी.

जैसा कि मैने अपनी पिछली पोस्ट में स्पष्ट किया था कि मेरी अपनी निर्धारित सीमा रेखायें हैं. प्रतीक के तौर पर मैंने अपनी कार की रफ्तार दर्ज की थी. मुझे वही अच्छा लगता है और मैं वही करता हूँ जो मुझे अच्छा लगता है, कम से कम ऐसी जगह जहाँ मुझ पर कोई जोर जबदस्ती नहीं है (नौकरी में ऐसा हमेशा नहीं कर पाते) मगर फिर भी मैं अपनी मनमानी करने में किसी मर्यादा का उल्घंन नहीं करता. मैं हर वक्त इस बात का भी ख्याल रखने का प्रयास करता हूँ कि मेरी इस स्वतंत्र अभिव्यक्ति से कोई आहत न हो. आज और आने वाले कल, दोनों ही वक्त में, न तो मुझे अपने लिखे पर शर्मिंदगी महसूस हो और न ही किसी अन्य पढ़ने वाले को. अगर यही हल्का लेखन कहलाता है तो मैं इसी में खुश हूँ और मुझे इस पर गर्व है. और मुझे स्वयं को तथाकथित विचारोत्तेजक भारी भरकम साहित्यिक लेखन की ओर ले जाने का कोई आकर्षण नहीं है. शायद वक्त, निरंतर पठन कुछ साहित्यिक वजनी शब्दों का भंडार दे जिन्हें में सहज भाव से उपयोग कर पाऊँ मगर उद्देश्य मेरा फिर भी न बदले, बस यही इश्वर से प्रार्थना करता हूँ.


हम हँसते और हँसाते हैं
गम के आँसूं पी जाते हैं
ढ़ेरों जख्मी राह में देखे
मरहम सा रख आते हैं.


नये आये लोगों का अभिनन्दन करना, किसी को अच्छे कार्यों के लिये प्रोत्साहित करना, किसी के अभिवादन के जबाब में अभिवादन करना, किसी के दुख में शामिल होना, किसी के खुशी मे खुश होना, लगातर प्रोत्साहन देना, शाबाशी, धन्यवाद, आभार आदि शिष्टाचारों का कोई युग नहीं होता. यह हर युग में होते हैं और यही साधुवादिता कहलाती है. यह ठीक वैसे ही है जैसे गाली बकना, निर्थक बहस करना, मारना पीटना, लूटपाट करना, आतंक फैलाना आदि शैतानियत के प्रतीक हैं और इनके भी कोई युग नहीं होते.

जिस दिन समाज से शिष्टाचार समाप्त हो जायेगा, उस दिन मुझे इस बेरोजगारी के साथ साथ बेजानी भी मंजूर होगी-खुशी खुशी. बिना आहत हुये, बिना हतप्रद हुये, बिना बुरा लगे और बिना किसी प्रतिक्रिया के.

तब तक के लिये-मैं ऐसा ही हूँ. आप मेरे मित्र हैं और आपकी मित्रता को मैं साधुवाद करता हूँ.

चलिये, आज आपको स्व.रमानाथ अवस्थी जी की मेरी पसंदीदा रचना सुनाता हूं जो कभी फुरसतिया जी ने सुनाई थी:

मैं सदा बरसने वाला मेघ बनूँ
तुम कभी न बुझने वाली प्यास बनो।
संभव है बिना बुलाए तुम तक आऊँ
हो सकता है कुछ कहे बिना फिर जाऊँ

यों तो मैं सबको बहला ही लेता हूँ
लेकिन अपना परिचय कम ही देता हूँ।
मैं बनूँ तुम्हारे मन की सुन्दरता
तुम कभी न थकने वाली साँस बनो।

तुम मुझे उठाओ अगर कहीं गिर जाऊँ
कुछ कहो न जब मैं गीतों से घिर जाऊँ
तुम मुझे जगह दो नयनों में या मन में
पर जैसे भी हो पास रहो जीवन में ।

मैं अमृत बाँटने वाला मेघ बनूँ
तुम मुझे उठाने को आकाश बनो ।
हो जहाँ स्वरों का अंत वहाँ मैं गाऊँ
हो जहाँ प्यार ही प्यार वहाँ बस जाऊँ

मैं खिलूँ वहाँ पर जहाँ मरण मुरझाये
मैं चलूँ वहाँ पर जहाँ जगत रुक जाये।
मैं जग में जीने का सामान बनूँ
तुम जीने वालों का इतिहास बनो।
-स्व.रमानाथ अवस्थी




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गुरुवार, जुलाई 12, 2007

मैं ही थोड़ा सा सिमट जाऊँ



कार अपनी गति से भाग रही है. माईलोमीटर पर नजर जाती है. १२० किमी प्रति घंटा. ठीक ही तो है. मैं आगे हूँ. रियर मिरर में देखता हूँ. वो पीली कार बहुत देर से मेरे पीछे पीछे चली आ रही है. दूरी उतनी ही बनी है. शायद वो भी १२० किमी प्रति घंटे पर ही चल रही है. मैं आगे हूँ, वो पीछे है. शायद वो जीतने की कोशिश ही नहीं कर रहा. अगर वो अपनी रफ्तार १२५ किमी प्रति घंटा कर ले, तो तुरंत जीत जायेगा. मगर उसे नहीं जीतना. वो खुश है अपनी स्थितियों से. मुझसे हार रहा है, यह मेरी सोच है शायद. उसके पीछे आ रही सफेद कार से वो जीत रहा है, यह उसकी सोच होगी. ऐसे मैं सोचता हूँ. पता नहीं, वो क्या सोचता होगा?

अभी तो घर आने में बहुत समय है. अभी मैं जहाँ हूँ, हमेशा वहाँ से घर उतनी ही दूर रहता है रोज. कभी पास नहीं होता. कभी दूर नहीं होता. मैं भी रोज एक ही रफ्तार से गाड़ी चलाता हूँ. आदत ही नहीं कि रफ्तार बदलूँ. क्या जरुरत है? सब ठीक तो चल रहा है. कभी किसी से जीत जाता हूँ. हारने वाले को पता ही नहीं चलता कि मैने उसे हरा दिया है. वो शायद अपने पीछे वाली कार वाले को हराने के जश्न में मगन होगा. ऐसा मैं सोचता हूँ. पता नहीं वो क्या सोचता होगा?

रोज अमूमन यंत्रवत यही होता है. मैं तो खेल में हूँ. यह मेरी दिनचर्या का हिस्सा है. रोज किसी से हारता हूँ, उस पर मैं ध्यान नहीं देता. मैं उसका बुरा नहीं मानता. मैं चाहूँ तो रफ्तार बढ़ाकर १२५ किमी प्रति घंटा कर लूँ. मैं जिससे हार रहा हूँ, उससे जीत जाऊँगा. मगर क्या, सच में जीतूँगा? तब मैं किसी और से हारुँगा. या फिर अगर मेरे आगे वाला भी उस समय मेरे जैसा ही सोचने लगे तो वो अपनी रफ्तार बढ़ा कर १३० किमी प्रति घंटा कर देगा. कोई अंत नहीं ऐसी सोच का और फायदा भी क्या? हासिल क्या होगा सिवाय अफरा तफरी के. फिर मैं अपना शांत स्वभाव क्यूँ बदलूँ? क्यूँ करुँ उसकी परवाह? क्यूँ मचलूँ? मुझे १२० किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलना अच्छा लगता है. मैं सुरक्षित महसूस करता हूँ. कार मेरे नियंत्रण में रहती है. मुझे मेरी स्वतः होती जीत पसंद है. मैं संतुष्ट हो जाता हूँ. रोज किसी से जीत जाता हूँ वो मुझे अच्छा लगता है.

अब मैने हाईवे छोड़ दिया है. घर ८०० मीटर की दूरी पर है. हमेशा यहाँ से घर इतनी ही दूर रहता है रोज. कभी पास नहीं होता. कभी दूर नहीं होता. आज मैं पीली कार वाले से जीता हूँ. वो हारा है. क्या वो दुखी होगा? शायद नहीं, वो भी तो सफेद कार से जीता होगा, जो उसके पीछे आ रही थी. वो भी अपनी जीत से खुश होगा. ऐसी दुनिया मुझे अच्छी लगती है. सब जीत रहे हैं. सब खुश हैं. ऐसा मैं सोचता हूँ. पता नहीं, वो पीली कार वाला क्या सोच रहा होगा?

कल तारीख बदलेगी. दौड़ फिर होगी. फिर नया लेकिन ऐसा ही खेल होगा. फिर सब जीतेंगे. शायद प्रतिभागी कुछ बदल जायें मगर खेल तो यही रहेगा.

क्या यह मेरी आभासी दुनिया कहलायेगी और वह आभासी जीत? लेकिन मैं तो सच में जीता हूँ, उस पीली कार वाले से.

आप क्या सोच रहे हैं?

अपने मामा जी प्रशान्त 'वस्ल', जिनका लिखा सा रे गा मा का टाईटिल सांग पूरे भारत की जुबान पर है, की गजल के दो शेर सुनाता हूँ मेरी पसंद में:

अपने अंदर ही सिमट जाऊँ तो ठीक
मैं हर इक रिश्ते से कट जाऊँ तो ठीक.

मेरी चादर बढ़ सके मुमकिन नहीं
मैं ही थोड़ा सा सिमट जाऊँ तो ठीक. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 08, 2007

गुणों की खान-मोटों के नाम

"जीवन में सकारात्मक सोच का स्थान बहुत अहम है. अगर आप सकारात्मक सोच नहीं रखते तो यकीन जानिये आप जल्द डिप्रेशन का शिकार हो जायेंगे और यह एक प्रकार का धीमा जहर है जिससे आप मर भी सकते हैं." जब एक महाज्ञानी के यह शब्द सुने तो हम एकदम सतर्क हो गये-एकदम सकारात्मक सोचधारक. अब हम अपने मोटापे के प्रति भी अपनी समस्त पूर्व धारणाओं को तिलांजली दे सकारात्मक सोच रखने लगे हैं.

मोटापे की प्रवृति दुबलापे से बिल्कुल भिन्न होती है. दुबला व्यक्ति यदि कोई प्रयास न भी करे तो वो दुबला ही बना रहता है एवं और दुबला नहीं हो जाता. मगर अगर मोटा व्यक्ति कोई प्रयास न करे तो उसका मोटापा दिन दूना रात चौगुना बढ़ता ही जाता है. इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिये. इसे स्वीकारने में आपको कोई परेशानी भी नहीं होगी क्योंकि ऐसी बातें स्वीकार कर लेना आपकी फितरत में है जैसे कि आपने भ्रष्टाचार, अराजकता, जातिवाद को कितनी आसानी से स्वीकारा ही हुआ है, तभी तो निष्क्रियता के परिणाम स्वरुप मोटापे के तरह यह दिन रात अपनी बढ़त बनाये हुये है.




मेहनत तो हो नहीं पायेगी, तब दुबले होने से रहे फिर काहे चिन्ता करना. स्वीकार करो इसे खुले मन से, स्वागत करो इसका. नहीं भी करोगे तो भी यह तो बढ़ता ही जाना है. तो फायदे देखकर ही खुश हो लो बाकि कार्य तो यह खुद कर लेगा. मुझे वैसे भी मोटे व्यक्ति पतले दुबले व्यक्तियों से ज्यादा गुणी नजर आते हैं, देखें न कितनी खासियतें होती हैं इनमें. मानों कि गुणों की खान.


जैसा मैने देखा है कि मोटे लोग आम तौर पर हमेशा हँसते मुस्कराते रहते हैं जबकि दुबले पता नहीं क्यूँ गंभीर से दिखते हैं. हो सकता है मोटों का अवचेतन मन अपने आप पर, अपनी हालत देख, हँसी न रोक पाता हो और मुस्कराता हो, मगर जो भी हो हँसते, मुस्काराते ही मिलते हैं मोटे. अर्थात वे हँसमुख होते हैं.

फिर उन्हें देखने वाला भी तो हँस ही देता है. इतने टेंशन की जिन्दगी में कोई किसी के चेहरे पर हँसी बिखेर जाये तो इससे बड़ा साधुवादी कार्य क्या हो सकता है. वैसे किसी दुबले को कह कर देखिये कि भाई, हँसाओ. वो तरह तरह के चुटकुले सुनायेगा, हास्य कविता पढ़ेगा, फूहड़ सी मुख मुद्रा बनायेगा तब भी कोई गारंटी नहीं कि हँसी आ ही जाये, लॉफ्टर चैलेंज देखकर देख लो जबकि किसी मोटे से कह कर देखो. बस जरा सा हिल डुल दे. एक दो नाच के लटके झटके लगा दे, पूरा माहौल हास्यमय हो जायेगा. अर्थात वे मनोरंजक होते हैं.

अच्छा, आप किसी मोटे को मोटा कह कर भाग जाईये. वो सह जायेगा. आपको कुछ नहीं कहेगा. जो भी वजह हो, चाहे उसे पता हो कि वो पीछा नहीं कर पायेगा या थक जायेगा, मगर वो कहेगा कुछ नहीं. अर्थात वे सहनशील होते हैं.

पतलों को मैने देखा है कि चेहरा मोहरा कैसा भी हो जब भी घर से निकलेंगे, पूरा सज धज कर कि शायद सुन्दर दिखने लगें. मोटा व्यक्ति बिना सजेधजे, जिस हाल में है, वैसे ही निकल पड़ता है. वो जानता है कि वो हर हाल में भद्दा ही दिखेगा. वो यथार्थ को समझता है. तो वो स्थितियों से समझौता कर लेता है. अर्थात वे न सिर्फ यथार्थवादी होते हैं बल्कि समझौतावदी भी होते हैं.

मोटे व्यक्ति वैसे भी घूमने फिरने और खेल कूद से पहरेज करते है तो अधिकतर बैठा रहते है. अब बैठे बैठे क्या करे तो किताब पढ़ते है, कम्प्यूटर पर पढ़ते है तब ज्ञानार्जन कर ही लेते है. अर्थात वे ज्ञानी होते हैं.

जब मोटा व्यक्ति अन्य लोगों के साथ कभी पैदल कहीं निकल जाता है तो जगह जगह रुक कर भिखारियों और दुखियों का हाल पूछता है (भले ही इसकी वजह उसकी थकान हो और इस बहाने बिना शर्म के थोड़ा आराम मिल जाता है-क्योंकि मोटा व्यक्ति थोड़ा शर्मीला होता है) और उन्हें भीख में कुछ पैसे भी देता है.अर्थात वो दानी होता है.

आपको शायद ही पता हो मगर मोटा व्यक्ति पराई स्त्रियों पर खराब नजर नहीं रखता. जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि वो यथार्थवादी होता है तो यह भली भाँति जानता है कि चाहे जैसी भी खराब नजर रखे, कुछ फायदा नहीं. कोई स्त्री उसे पूछने वाली नहीं. अतः अपने समझौतावादी स्वभाव के तहत विकल्प के आभाव मे, वो हमेशा अच्छी नजर रखता है अर्थात वो चरित्रवान होता है. साथ ही उनकी पत्नी भी इस सत्य से परिचित होती हैं कि उनके पति पर कोई भी डोरे नहीं डालेगा अर्थात वो एक सुरक्षित पति होते हैं.

वैसे कभी कोई दुबला ट्रेन में या बस यात्रा में सीट पर बैठा हो तो उसे कोई भी खिसका कर जगह ले लेता है कि खिसकना जरा भईया मगर मोटों के साथ यह समस्या नहीं होती. वो तो पडोसी की भी आधी सीट घेरे होता है अर्थात वो विराजमान होता है.

मोटा व्यक्ति कभी विवादों और लफड़े में नहीं पड़ता. (शायद वो जानता है कि कहीं बात बढ़ गई तो भाग भी न पायेंगे. पिटने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचेगा) अर्थात वो विवादों में तटस्थ और स्वभाव से शांतिप्रिय होता है.

मैने तो यह भी देखा है कि मोटे व्यक्ति के पास पैंट शर्ट तक नये नये खूब ज्यादा होते हैं. अभी अभी सिलवाया और दो बार पहना नहीं कि मोटापा तो मंहगाई की गति से बढ़ता गया और कपडे आम जनता की जेब की तरह छोटे. अब फैंक तो सकते नहीं कि शायद कल को दुबले हो ही जाये तो पहनेंगे. (अर्थात मोटा व्यक्ति आशावादी होता है) अभी नया ही तो है. तो धर देते हैं. फिर न कभी दुबले हुये, न कभी मंहगाई कम हुई और न कभी उनका इस्तेमाल तो नये नये कपडे जमा होते रहे. गिनती बढ़ती गई जो कि दुबले के नसीब मे कहाँ. उसकी तो पैन्ट शर्ट फट ही जाये तभी छूटे. अर्थात वे (इस मामले में) समृद्ध होते हैं.

मोटा जब कहीं ज्यादा खाना खाता है तो उसे उसकी सेहतानुरुप माना जाता है और कोई बुरा नहीं मानता बल्कि लोग कहते पाये गये हैं कि भाई साहब, क्या भूखे ही उठने का इरादा है वरना कोई दुबला उतना खाये तो लोग कहने लगते हैं कि न जाने कितने दिन का भूखा है या आगे लगता है खाना नहीं मिलेगा. अर्थात वे सम्मानित होते हैं.

अब चूँकि मोटा व्यक्ति ज्यादा कहीं आता जाता नहीं और अक्सर घर पर ही सोफे में बैठा होता है तो बच्चों पर लगातार नजर बनीं रहती है अर्थात वो एक अच्छा अभिभावक होता है.

कभी स्कूटर या सायकिल से गिर जाओ तो दुबले की तो हड्डी गई ही समझो मगर मोटे की चरबी से होते हुए हड्डी तक झटका पहुँचने के लिये जोर का झटका चाहिये इसलिये अक्सर हड्डी बच जाती है अर्थात वो दुर्घटनाप्रूफ होता है.

अनेकों गुणों की खान का क्या क्या बखान करुँ मगर अगर कोई दुबला मर जाये तो कारण खोजना पड़ता है कि क्यूँ मरा..शायद शुगर बढ़ गई होगी, हार्ट फेल हो गया होगा मगर मोटा मरे तो बस एक कारण सबके मुँह से कि मोटापा ले डूबा. अर्थात उसका कारण बिल्कुल साफ और पारदर्शी होता है. नो कन्फ्यूजन. बस एक कारण और मात्र एक: मोटापा.

काश, मेरे देश के विकास की गति भी मोटी हो जाये बिना किसी प्रतिरोध के. सब सकारत्मक सोच रखें और फिर देखिये कैसी दिन दूनी रात चौगुनी विकास की दर बढ़ती है. मगर यह भ्रष्टाचार, अराजकता, गुंडागिरी की ट्रेड मिल तो हटाओ!! जरुर मोटी हो जायेगी. आमीन!!!


(यह विलम्बित आलेख शिष्य गिरिराज के विशेष अनुरोध पर प्रेषित किया जा रहा है) Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जुलाई 04, 2007

मरघट से....राजू भाई

राजू भाई यूँ तो कवि थे और इसी वजह से माईक के शौकीन. क्या मजाल कि माईक थामने का कोई भी मौका उनके हाथ से निकल जाये. साथ ही वो समाज सेवा जैसा एक बेहद जरुरी कार्य किया करते थे.पूरे मोहल्ले में बल्कि आजू बाजू के अन्य मोहल्ले में भी कोई मर जाये और राजू भईया को खबर पहुँच बस जाये, कि वो हाजिर. सबसे आगे आगे. जान पहचान मृत व्यक्ति या उसके परिवार से कतई आवश्यक नहीं. आवश्यक है राजू भाई तक खबर पहुँचना और वो आपको हाजिर दिखेंगे.

कवि की हैसियत से भी उनका यही हाल था. कवि सम्मेलन का न्यौता उतना आवश्यक नहीं जितना उन्हें यह पता लगना कि फलां जगह कवि सम्मेलन है. फिर तो वो मेनेजमेन्ट एकस्पर्ट थे. आपको निश्चित मंच से कविता पढ़ते नजर आयेंगे और आयोजक उनके आगे पीछे, न बुलाने के लिये क्षमायाचना की मुस्कराहट चेहरे पर चिपकाये हुये. खैर, यह उनकी शक्सियत ही थी और उनका मैनेज करने का अंदाज.

हाँ, तो बात चल रही थी हर शव यात्रा में राजू भाई की शिरकत होती थी. वही धुला हुआ सफेद कुर्ता पैजामा, आँखों पर काला चश्मा, हाथ में पान पराग और तुलसी का ड्ब्बा. चेहरे से सबसे ज्यादा गमगीन. सुबह से जुटे हर इन्तजाम में. पूरे प्रोजेक्ट मैनेजर की तरह. खुद एक काम नहीं करना और दिखे ऐसा कि सब भार उन्हीं के कंधों पर आ गिरा है. आप उन्हें देखते ही पायेंगे, 'पप्पू बेटा, सुन वो बांस आ गये क्या. जरा यहाँ ले आओ. छोटू सुन, जरा वो रस्सी ले आ. मुन्ना, उधर से बाँधना शुरु कर. रामू, जा ३ किलो घी खरीद ला. भईया से पैसे ले ले और आ कर हिसाब देना. लौट कर हिसाब खुद लेते और पैसे अपनी जेब में. खुद कुछ नहीं करना, बस हल्ला गुल्ला और पैसे वापस लेना. सुबह से सारा सामान अलग अलग लोग ला रहे हैं. कभी भईया से पैसे ले लो कभी चाचा से और लौटकर हिसाब ये लें.अब मरे जिये में उनसे तो कोई हिसाब मांगने से रहा. और न ही ओरिजनल पैसे उन्होंने लिये थे परिवार वालों से, तो अगर कभी शक जाकर कोई बुरा भी मान गया तो छोटू, मुन्ना लोग बदनाम हों. राजू भाई का क्या. यही तो होता है सही प्रोजेक्ट मैनेजर-सब वाह वाही हमारी बाकि गल्तियाँ टीम मेम्बरर्स की. काम एक नहीं आता और न करना है और सबसे ज्यादा व्यस्त.

कुछ खास जानकार बताते हैं कि उनकी आजिविका का साधन भी यही था. एक बार एक मय्यत में मैने छिप कर गिने थे, लगभग २५०० से ३००० हिसाब वापस लेते लेते अंदर गये थे. तभी मैं समझा एक एक सामान के लिये यह लोगों को क्यूँ दौड़ाते हैं, इकट्ठे काहे नहीं मंगा लेते.

कवि सम्मेलन तो शायद इसी ब्लैक को व्हाईट करने का तरीका रहा होगा. जैसे सरकारी अधिकारियों और दो नम्बर की आय वालों के पास कृषि भूमि. कवि सम्मेलन का मंच उनके लिये साहित्य भूमि न हो कृषि भूमि ही थी. जो उनकी इस दो नम्बर की आय को एक नम्बर का जामा पहनाने का कार्य बड़ी मुस्तैदी से करती. चलिये, जाने दिजिये, इस पचड़े में क्या पड़ना.

तो राजू भाई,शुरु से अंत तक हाजिर रहते और जब सारे कर्मकांड हो जाते तो जो मरघट में आखिर में आत्मा की शांति के लिये भाषण दिया जाता है, वो भी राजू भाई तुरंत पेड के चबूतरे वाले मंच पर चढ़कर शुरु हो जाते. अब सुबह से साथ साथ रहते इतना तो जान ही जाते कि कौन मरा है, क्या नाम था, क्या उम्र रही होगी. परिवार में कौन कौन पीछे छूट गया आदि आदि भाषण के आवश्यक तत्व. हर उम्र के लिये एक सधा हुआ भाषण और आप जानकर आश्चर्य करेंगे उनकी काव्य प्रतिभा पर कि ऐसे में भी वो एकाध मुक्तक तो झिलवा ही देते. मैं उनकी भाषण कला से बहुत प्रभावित रहता और एक बार रिकार्ड करके नोट किया. आप सब की सुविधा के लिये पेश कर रहा हूँ. क्या मालूम किस जगह जरुरत पड़ जाये पढ़ने की, अन्य वक्त्ताओं के आभाव में. काम ही आयेगा, तो सुनिये मोहल्ले के बुजुर्ग के मरने पर उन्होंने जो भाषण पढ़ा वो हूबहू यहाँ पेश किया जा रहा है. ज्ञात रहे कि राजू भाई इनसे पहले कभी नहीं मिले और यकिन मानिये, वहाँ उपस्थित सभी लोगों को मृत व्यक्ति के पुत्र से भी ज्यादा करीब और गमगीन राजू भाई ही लगे.

भाषण:





श्रद्धेय रामेश्वर प्रसाद जी जिन्हें हम प्यार से बाबू जी बुलाया करते थे, आज हमारे बीच नहीं रहे. कल तक जो वाणी हमें जीवन की राह दिखाती थी, आज हमेशा के लिये चुप हो गई.

बाबू जी को अब याद करता हूँ तो याद आता है वो मुस्कराता हुआ चेहरा, जो हर दुख और विपत्ति के क्षणों में सदैव एक अजब सा विश्वास जगाता था. जब भी मैं इस जीवन की आपा धापी की धूप में झुलसते हुये परेशान हो जाता था, बाबू जी के पास जाकर उनके श्री चरणों में बैठ जाया करता था. वो एक वट वृक्ष थे, जिसकी छाया की शीतलता में कुछ पल विश्राम करके मैं एक नई शक्ति और उर्जा का अनुभव करता था. जब भी मैं बाबू जी के घर के सामने से निकलता, वो मुस्कराते रहते. उनकी मुस्कान से दैविक उर्जा मिलती थी. (यहाँ राजू भाई क गला भर आता, थोड़ी खरखराहट भरी आवाज हो जाती)

बाबू जी एक व्यक्ति नहीं, एक युग थे. बाबू जी जाने से एक युग की समाप्ति हुई है. उनके जाने से हमारे जीवन में एक अपूर्णिय क्षति हुई है. बाबू जी के बताये आदर्श मात्र कथन नहीं, एक जीवन शैली है. अगर हम अपने जीवन में उस शैली का थोड़ा भी मिश्रण कर पाये तो यही बाबू जी की आत्मा को सच्ची श्रृद्धांजली होगी. (यहाँ पर वो थोड़ा रुककर जेब से रुमाल निकालते, चश्मा हटाते और आँसू पोछते से नजर आते) (फिर खंखारते और उनका कवि हृदय जाग उठता-मौका मिला है तो कैसे छोड़ते)

आज इस अवसर पर मेरी लिखे एक मुक्तक की चार पंक्तियाँ सुनाना चाहता हूँ जो बाबू जी बहुत पसंद किया करते थे:


आसमां अमृत गिराता, आज अपनी आँख से
पुष्प खुद गिर समर्पित, आज अपनी शाख से
आप सा व्यक्तित्व नहीं, कोई भी दूजा है यहाँ
आपका आना हुआ था, इस धरा के भाग* से

* भाग=भाग्य

और अंत में वो दो पंक्तियाँ जो बाबू जी हमेशा गुनगुनाया करते थे और जो इस जीवन का दर्शन कहती हैं:


जिन्दगी मानिंद बुलबुल शाख की,
दो पल बैठी, चहचहाई और उड चली.


मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि बाबू जी की आत्मा को शान्ति दे और उनके परिवार को इस गहन दुख को वहन करने की शक्ति प्रदान करे.

कल बाबू जी घर ३ बजे से शांति पाठ है. अब हम सब दो मिनट बाबू जी आत्मा की शांति के लिये मौन रख कर यहाँ से विदा लेंगे.

दो मिनट बाद-राजू भाई खँखारे-फिर कहे- ओम शांति..बाकि सबने कहा--शांति शांति.


अंत मे एक बात और, आखिरी दम भाषण और शव जलाने के जस्ट पहले जब सब शांति से इन्हें देख रहे हों, तैयारी चल रही हो, तब ये जरुर किसी को दौड़ाते थे कि जा बेटा, एक अगर बत्ती का पूड़ा खरीद ला. लड़का बोलता, पैसे तो सबके सामने अपनी जेब से २० का नोट निकाल कर देते और फिर थोड़ी दूर जाने पर वापस आवाज देते कि यह और पैसे ले जा और पानी की एक बोतल भी लेते आना चाचाजी के लिये और पुनः १० का नोट. उनको यह रुपये देते मृतक का पूरा परिवार भी देखता और उपस्थित लोग भी.

सारा काम खत्म होने पर जब मृतक के परिवार वाले इनसे पूछते कि भाई साहब, आपके भी सुबह से काफी पैसे खर्च हो गये होंगे, कृप्या बता देते तो हम दे दें. बस फिर क्या, राजू भाई आंसू से रो देते कि बाबू जी के जाते ही क्या मैं इतना पराया हो गया कि १०००- ५०० भी न खर्च कर सकूँ उन पर?

हम तो सकपका ही गये कि कुल ३० रुपये खर्च करके अहसान १०००-५०० का और वो भी २५००-३००० अंदर करने के बाद. पूरा परिवार कृत्यज्ञता से इनकी ओर ताक रहा होता. आज की दुनिया में भला ऐसा आदमी कहाँ मिलता है जो पराया होकर भी अपनों से ज्यादा अपना है.

तो ऐसे थे हमारे कवि महोदय, ओजस्वी वक्ता, मैनेजमेंट गुरु, प्रोजेक्ट मैनेजर, शिक्षा-बी.ए. (हिन्दी)(यह भी विवादित है), बेरोजगार और इतने व्यस्त कि रोजगार खोजने तक का समय नहीं- इन्तजाम अली श्री श्री राजू भाई. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 01, 2007

हे स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार!!



गुगल चैट पर लाल बत्ती जला कर बैठे हैं. कुछ जरुरी काम निपटाना है साथ ही किसी से कुछ जरुरी बात करनी है तो इन्तजार भी है उनके गुगल चैट पर आने का. इसी लिये व्यस्त का बोर्ड टांग दिया है.


एकाएक सामने से मैसेज आता है, 'क्या भाई साहब, बिजी हैं?' .


अब क्या कहें? जब लाल बत्ती और उसके नीचे लिखा 'व्यस्त' कुछ नहीं कह पाया तो हमारी क्या औकात. कैसे मना करते?

कहना पड़ा, 'नहीं, कोई खास नहीं, बतायें.'

अभी लिख कर एन्टर मारा ही था, तो वहाँ तो मैसेज पहले से ही तैयार था, 'इसे देखा.' और साथ में अपनी नई ब्लॉग पोस्ट का लिंक. अभी कुछ सोचे समझें, एक स्माईली :).

कह दिये, 'अभी देखते हैं'

३ मिनट भी नहीं बीते, अभी लिंक खुलने की तैयारी में है. एक और मैसेज, 'कैसा लगा?'.

अब क्या बतायें कि कैसा लगा? पहले दिखे तो. खैर, पोस्ट खुल खुला गई. बी एस एन एल की महा कृपा का परिणाम. (खैर खुलना तो था ही जैसा की नाम से उजागर है कि बी एस एन एल-बहुत समय नहीं लगेगा-उसने अपना वादा निभा दिया) अब इतने दिन से आँख फोड़ फोड़ कर और ब्लॉगिंग में टिपियाते इतना तो अनुभव प्राप्त हो ही गया कि सरसरिया के पहचान जायें कि कविता है कि कहानी. व्यंग्य है कि यात्रा संस्मरण. विवाद होगा या नहीं. अरे, यही अनुभव तो है जो फट से टिप्पणी कर लेते हैं. और बता दूँ, यह ज्ञान बांटना संभव भी नहीं. बस, इतना बताये दे रहे हैं कि करत करत अभ्यास ते वाली कहावत याद रखो और यह भी कि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं. आपको भी यह ज्ञान अनुभव से प्राप्त हो जायेगा. यह ठीक वैसा ही है जैसे कि अपने नेता घाघपंती सिखा नहीं सकते बस अनुभव की बात है, जिसका जितना लंबा अनुभव वो उतना बड़ा घाघ.

खैर, जल्दी से सरसरिया दिये. देखा कविता है और वो भी प्रेम गीत टाईप, कह दिये कि 'बड़ी अनूठी कविता कही है. शब्द चित्र बहुत पसंद आया. दिल की गहराई से भाव उकेरे हैं, खास कर यह लाईन और चार लाईन उसी में से कट पेस्ट कर दी' .

वे बोले, 'यह वहीं टिप्पणी में कहिये.'.

लो, कर लो बात, तुम कह रहे हो चैट में. सामने बैठे टाईप में ही हो. सामने के सामने तारीफ कर रहे हैं. तारीफ और दाद चाहिये कि टिप्पणियों की संख्या? समझ नहीं आ पाया.

अब वो तो टिप्पणी का कह कर गायब हो गये. कहीं और कटिया फंसा रहे होंगे. एक जन से उनका काम थोड़ी चलेगा और हम लगे हैं, उनके ब्लॉग पर टिप्पणी करने में. टाईप करो. वो रंग बिरंगे टेढ़े मेढ़े अक्षर भरो वेरिफिकेशन वाले. अपना नाम, पासवर्ड और झुंझलाहट में अक्षर गलत भरा गये तो फिर भरो. खैर, एक लोभ सा रहता है कि कल को हम भी कुछ लिखेंगे तो बंदा अहसान चुकायेगा. बस शायद इसी लिये बुजुर्ग कह गये हैं कि लालच अच्छी बात नहीं. मगर समझ आये जब न!! वो तो बुढ़ापे में हम भी अपने नाती पोतों को समझायेंगे, ब्लॉगिंग अच्छी बात नहीं-कौन मानेगा. हम ही कहाँ मान रहे हैं.

सब फुरसत पाकर ईमेल चेक करने बैठे तो उन्हीं का ईमेल चैट के पहले का आया हुआ था. यहाँ देखिये मेरी नई रचना और लिंक एवं अंत में स्माईली. नाश हो इन स्माईली बनाने वालों का. कोई सी भी हरकत कर लो और स्माईली के पैकिंग रैपर में लपेट कर थमा दो. अरे, पैकेजिंग का जमाना है. अब जो बुरा माने वो बेवकूफ, उसे अन्तर्जाल के तरीके नहीं मालूम. तब यह बेवकूफी कैसे जाहिर होने दें तो स्माईली लगी बात का बुरा नहीं मानते.

यहाँ से छूटे तो नारद पर पहुँचे, वहाँ भी सबसे उपर वो ही चमक रहे हैं उसी पोस्ट के साथ. भईये, नारद का काम ही यही है. थोड़ा तो धीरज धरो. हम तो खुद ही बिना नारद की पूजा अर्चना के खाना नहीं खाते, नहाते नहीं, सोते नहीं, जागते नहीं...देख ही लेंगे. बस कुछ मिनटों का फरक पड़ सकता है. हम नारद के थ्रू आयेंगे, तब भी टिपियायेंगे और शायद वाकई पढ़कर बेहतरीन टिप्पणी कर जायें कभी कभी पढ़कर भी तो करते हैं टिप्पणी :)) न विश्वास हो तो मसीजिवी से पूछ लो, उन्होंने अभी रिसेन्टली देखा था एक जगह. :)

नारद पर नहीं भी आते हो तो हिन्दी ब्लॉग भी देखते हैं, चिट्ठा चर्चा भी पढ़ते हैं और अब तो चिट्ठाजगत डॉट इन भी. बहुत अच्छा या बहुत बूरा लिखोगे तो सारथी पर भी दिख सकते हो.कहीं न कहीं तो तुम दिख ही जाओगे और तुम्हारे जैसा मुखर व्यक्तित्व नहीं दिखेगा तो फिर कौन दिखेगा??

तो हे स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार, तुम्हारी पोस्ट का अस्तित्व कोई लोकशाही में उपस्थित ईमानदारी सा तो है नहीं, जो लाख ढूंढने पर भी न मिले. वो तो बेईमानी की तरह सर्वव्यापी एवं स्व-उजागर है, जिसे चाह कर भी अनदेखा नहीं किया जा सकता और उससे हाथ मिलाये बिना इस जगत में तो गुजारा संभव भी नहीं. हमें भी गुजारा करना है, जरुर हाथ मिलायेंगे.जरुर टिपियायेंगे फिर काहे अधीर हुये जा रहे हो. तनिक ठहरो, हम चाहें भी तो बचकर नहीं जा सकते. बस निवेदन और विनती है कि भईया, जरा सा धैर्य रख लो. कुछ हमारी भी जरुरते हैं-खाना खाते हैं, नहाते हैं, सोते हैं-थोड़ा तो स्पेस दे दो फिर नौकरी भी करनी है. वैसे, फिर भी चाहो, तो दरवाजा तो हमेशा खुला है, खटखटा देना भले ही व्यस्त का बोर्ड लगा हो, लाल बत्ती जल रही हो: हम तो हाजिर हैं ही, लालची जो हैं. लाल बत्ती, बोर्ड आदि तुम्हारे लिये नहीं हैं वो आम जन के लिये हैं और तुम आम तो हो नहीं, तुम तो हो-स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार. नमन करता हूँ तुम्हें!!! स्विकारो.

धीरे धीरे बस समझा रहे, धीरज धर लो भाई
खुद अपने को आजतक, बात समझ न आई
ललचाये से टिपिया रहे, हम तो हैं दिन रात
टिप्पणी की बस चाह में,आह निकल न पाई.

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बुधवार, जून 27, 2007

चलो, हम भी सीख ही गये

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
यह मेरा पॉड कास्टिंग का पहला प्रयास है. सब सुनाये चले जा रहे थे और हम बैठे देखे जा रहे थे कि कैसे करते हैं पॉडकास्ट. भला हो मित्रों का, जैसे ही हमने दोहे वाली पोस्ट में अपनी असमर्थता व्यक्त की वैसे ही सब भागे भागे भीगे भीगे (उस दिन दिल्ली में बारिश हो रही थी :)) टिप्पणी में बता गये, ऐसा कर लो, वैसा कर लो. बैंगाणी बंधुओं ने तो गुजरात से पूरी ईमेल करके विधी भेज दी और खुद करके दे देने की पेशकश भी की जबकि प्लेयर लोड होते समय हरे रंग का हो जाता है, भगवा नहीं और उस पर से हमारे ब्लॉग का हेडर भी हरा. फिर भी सब किया प्रेमवश. सबका प्रेम देखकर मन खुशी से भर आया. बस खुशी से आंसू टपकने की फिराक में ही थे कि मास्साब ई-पंडित श्रीश महाराज आ पधारे. वो तो हमेशा ही कमाल लिखते हैं (जब भी लिखते हैं :)) और हमारी तकलीफ जानकर, बिना हमारे व्यक्तिगत निवेदन के, दो तीन रातें काली कर पूरी की पूरी स्टेप बाई स्टेप क्लास लगाई और फिर आकर क्लास अटेंड करने का निमंत्रण भी दे गये. ऐसे होती है मित्रों की मदद और ऐसा होता है चिट्ठाकारों का आपसी प्रेम. अरे, कुछ सीखो कि बस हर बात में तलवार खिंचना जरुरी है? :) खैर जाने दो, गाना सुनो.

इस गीत को लिखा मैने है और संगीत दिया है केलिफोर्निया स्थित "साज़मंत्रा" ने. आवाज दी है श्री अंशुमान चन्द्रा ने. यह गीत एक प्रवासी की वेदना दर्शाता है.














खोया मुसाफिर

बहुत खुश हूँ फिर भी न जाने क्यूँ
ऑखों में एक नमीं सी लगे
मेरी हसरतों के महल के नीचे
खिसकती जमीं सी लगे

सब कुछ तो पा लिया मैने
फिर भी एक कमी सी लगे
मेरे दिल के आइने पर
यादों की कुछ धूल जमीं सी लगे

जिंदा हूँ यह एहसास तो है फिर भी
अपनी धडकन कुछ थमीं सी लगे
खुद से नाराज होता हूँ जब भी
जिंदगी मुझे अजनबी सी लगे

कुछ चिराग जलाने होंगे दिन मे
सूरज की रोशनी अब कुछ कम सी लगे
चलो उस पार चलते हैं
जहॉ की हवा कुछ अपनी सी लगे.

--समीर लाल 'समीर'


यहाँ डाउनलोड करें.

जरा बताईये तो सफल रहा या कुछ बदलाव की जरुरत है? Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 24, 2007

दो दिन की बात: आशीष के साथ

पता चला कि खाली पिली और अंतरीक्ष वाले आशीष श्रीवास्तव कनाडा आ रहे हैं. हम अधीर हो उठे, मालूम किया तो खबर आई कि मान्ट्रियल पहुँच चुके है और स्थापित होने का प्रयास कर रहे हैं. हमने फोन किया और कह दिया कि हम मदद के लिये एक ईमेल की दूरी पर हैं और औपचारिकतावश कह दिया कि हमारे पास भी आओ. यहाँ से २५० किमी नियाग्रा है, वो घूम जाओ और टोरंटो भी देख लो. हम फोन पर बात कर रहे थे और पत्नी आँख दिखा रही थी कि किस मेहमान को बुलाये ले रहे हो. एक तो ब्लॉग से वैसे ही परेशान और उस पर से ब्लॉगर मेहमान. हमने फोन होल्ड करा कर इन्हें समझाया कि भई, औपचारिकतावश कह रहे हैं. कोई आयेगा थोड़ी इतने पैसे लगाकर हमसे मिलने. ६०० किमी मायने रखता है, कौन आता है.अब कह तो दिया और आशीष से बात आगे शुरु हुई. लगने लगा कि वो तो तैयार ही बैठे हैं. जब आप खाली हों, हम आ जायेंगे. हमने भी सोचा कि मुसीबत जितनी जल्दी आये और टले, उतना अच्छा तो सप्ताहंत में ही बुलवा लिया और वो भी तैयार हो गये.

टिकिट बुक करवा ली और हमें खबर कर दी कि शुक्रवार को रात में ११.४५ बजे आ रहे हैं. आकर साथ खाना खायेंगे. लो, अब कर लो बात...मेहमान आधी रात में और आकर खाना खायेंगे, बतियायेगे और तब सोयेंगे. हमने भी अपना बार वार साफ सुफ कर लिया कि बंदा थका आयेगा तो पहले एक दो पेग की चुस्की लगायेंगे, बात होगी, कविता भी टिका ही देंगे और फिर देखी जायेगी. ११.४५ पर हम स्टेशन पर थे. गाड़ी पार्किंग में खड़ी कर ही रहे थे तब तक महानुभाव चले आ रहे थे कुकड़ते हुये ठंड में. हमारे लिये गर्मी २० डिग्री और उनकी कुल्फी जमीं जा रही थी जबकि ७००० रुपये का लेदर जैकेट पहने थे (उन्होंने ही बताया:)) और हम हॉफ शर्ट में पसीना बहा रहे थे. पता चला कि १०.४५ से स्टेशन पर इंतजार कर रहे हैं और उन्हें याद भी नहीं कि उन्होंने हमें ११.४५ लिखा था. हमने कहा तो फोन कर देते. तो ये न तो फोन नम्बर साथ लाये थे और न ही मेरा पता...वाह!! हमें लगा कि हम खामखाँ अपने बेटों को लापरवाह समझते रहे. उस खास वक्त की टिक के साथ मेरे मन में मेरा अपने बेटों के लिये सम्मान एकाएक बढ़ गया. बेटों की गैर जिम्मेदाराना हरकतें एकदम से नगण्य सी हो गई.

खैर, लाद लूद कर घर लाये. पता चला कि पीते ही नहीं. तब हमें लगा कि यह बंदा जब इत्मीनान से पूरे होशो हवास में बैठा रहेगा तो हमारी कविता तो सुनने से रहा और यह खाना खाने बैठ गये.बात चली...फिर सो गये.

अगले दिन नियाग्रा गये. सारी दोपहर वहीं गुजारी गई.

आशीष नियाग्रा फॉल्स को अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश में:






हमने सोचा, चलो हम भी लगे हाथ एक पोज दे दें. आशीष नया कैमरामैन है इसलिये थोडी डार्क आ गई है हमारी फोटो :) :





और उसके अगले दिन टोरंटो घूमा गया. फोटू वगैरह खींचे गये. चिठ्ठों के बारे में बात हुई, चिट्ठाकारी के बारे में बात हुई. लगभग हर चिट्ठाकर और चिट्ठा कवर किया गया. घर परिवार की बात हुई. आशीष की हमारे पिता जी लंबी लंबी चर्चायें हुई. बहुत मजा आया. इस बीच एक ऑनलाईन कवि सम्मेलन भी था तो उसके बहाने कवितायें भी झिलवा दीं. मजबूरीवश वो कह गये हैं कि अच्छी लगीं.

आशीष सी एन टॉवर के प्रवेश द्वार पर






कुछ फुरसत के क्षण:





एक मजेदार तथ्य: आशीष के घर का नाम पप्पू है, उसके छोटे भाई का नाम पिन्टू और बहन-महिमा. क्या संजोग है...हमारे बडे भाई पप्पू हैं, हम पिन्टू और हमारी बहन का नाम महिमा. क्या कभी कोई सोच सकता है.

दो दिन रुककर आशीष चला गया और घर सूना सूना सा हो गया. अब हम हुये रवि रतलामी के दोस्त तो पूरे समय यही जांचते परखते रहे कि बालक कैसा है? अब जाकर बड़ा संतोष हुआ कि लड़का हीरा है हीरा....रवि रतलामी जी को हीरा दामाद पाने के लिये पुनः बहुत मुबारकबाद...बस यही तो थी हमारी और आशीष की भेंट....उम्मीद करता हूँ कि वो अगली बार और हमारे पास आये अपने प्रवास के दौरान. पुनः बहुत मजा आयेगा. अब पत्नी आँख नहीं दिखा रही. वो भी तुम्हें निमंत्रण भेज रहीं है.

बाकी की दास्तान आशीष सुनायेंगे. आज तो भारत वापस भी पहुँच गये होंगे. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, जून 21, 2007

कहत समीरानन्द स्वामी जी...

आज स्वामी समीरानन्द द्वारा जनहित में २३ दोहे जारी किये जा रहे हैं एक सुक्ति गान के रुप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं. नीचे प्लेयर पर क्लिक करके आप हमारी पत्नी साधना जी की आवाज में कुछ दोहे सुन भी सकते हैं. बहुत मशक्कत के बाद उनकी आवाज मिल पाई. फुरसतिया जी और राकेश भाई के निवेदन से लेकर हमारे जुड़े हाथ उनको किसी तरह तैयार कर पाये. अब तारीफ वारिफ हो जाये तो आगे और कोशिश की जयेगी.

सुनने के लिये यहाँ क्लिक करें.

कहे समीरानन्द जी, सुन लो चतुर सुजान
जो गाये यह स्तुति , हो उसका कल्याण.

गुरुवर हमको दीजिये, अब कुछ ऐसा ज्ञान
हिन्दु-मुस्लिम न बनें, बन जायें इन्सान.

वाणी ऐसी बोलिये, हर एक कर्ण सुहाये
मिलिये ऐसे प्रेम से, मन से मन मिल जाये.

मतभेदों की बात पर, बस उतना लड़िये आप
लाठी भी साबूत रहे, और मारा जाये साँप.

पीने जब भी बैठिये, बस इतना रखिये ध्यान
सब साथी हों होश में और न ही बिगड़े शाम.

नेता जी से पूछिये, जब भी हो कुछ बात
देश तुम्हारा भी यही, क्यूँ करते आघात.

पुस्तक ऐसी बाँचिये, जिससे मिलता ज्ञान
कितना भी हो पढ़ चुके, नया हमेशा जान.

लेखन लेखन सब करें, लिखे नहीं है कोय
जब लिखने की बात हो,गाली गुफ्ता होय.

उल्टी सीधी लेखनी, एक दिन का है नाम
बदनामी बस पाओगे, नहीं मिले सम्मान.

शंख बजाने जाईये, मन्दिर में श्रीमान
यह गीतों का मंच है, बंसी देती तान.

कविता में लिख डालिये, अपने मन के भाव
जो खुद को अच्छा लगे, जग के भर दे घाव.

समीरा इस संसार का, बड़ा ही अद्भूत ढंग
वैसी ही दुनिया दिखी, जैसा चश्में का रंग.

नदियों से कुछ सिखिये, इनकी राह अनेक
सागर में जब जा मिलें, हो जाती सब एक.

ऐसा कुत्ता पालिये, जो भौंके औ गुर्राये
न काटे मेहमान को, चोर न बचने पाये.

दान धरम के नाम पर, लाखों दिये लुटवाये
क्षमादान वो दान है, जो महादान कहलाये.

गल्ती से भी सीख लो, आखिर हो इन्सान
जो गल्ती को मान लें, उनका हो सम्मान.

कौन मिला है आपसे और कितना लेंगे जान
जो कुछ भी हो लिख रहे, उसी से है पहचान

सब साथी हैं आपके, कोई न तुमसे दूर
अपनापन दिखालाईये, प्यार मिले भरपूर.

जरा सा झुक कर देखिये, सुंदर सब संसार
तन करके जो चल रहे, मिलती ठोकर चार.

मौन कभी रख लिजिये, थोड़ा कम अभिमान
जितना ज्यादा सुन सको, उतना आता ज्ञान.

बुरा कभी मत सोचिये, न करिये ऐसा काम
दिल दुखता हो गैर का, किसी का हो अपमान.

साधु संत औ’ महात्मा, सब गाते हैं दिन रात
सुक्ति समीरानन्द की , जय हो उनकी नाथ.

जो स्वामी जी कह रहे, नहीं आज की बात
जीवन का यह सार है, हरदम रखना साथ.

--जोर से बोलो-जय स्वामी समीरानन्द की


यहाँ डाउनलोड करें.

कोई भक्त पॉड कास्टिंग में मदद कर दे, तो भगवान उसका भला करे. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जून 18, 2007

सुनो नारद, अब हम बोल रहे हैं!!

अभी थोड़ी देर पहले ही कुछ चिट्ठे पढ़ रहा था. अधिकतर पर नारद विवाद वाली गहमा गहमी थी. कुछ मेरी ही तरह के लोग कहते मिल जायेंगे कि हम ऐसे चिट्ठों पर जाते ही नहीं, उन्हें पढ़ते ही नहीं. मैं उनके संयम को नमन करता हूँ और साफ शब्दों में कहना चाहता हूँ कि मैं एक आम इंसान हूँ, भारत में पला, बढ़ा-वो ही संस्कार हैं. झगड़ा देखकर आनन्द लुटने के लोभ को एक आम भारतीय की ही तरह संवरित नहीं कर पाता हूँ. बहुत मेहनती हूँ और इसीलिये अपने अथक प्रयासों से इसमें शामिल होने से अपने को रोक पाता हूँ. थक जाता हूँ अपने आपको रोकते रोकते और सो जाता हूँ और इसीलिये युद्धकाल में जरा कम ही पोस्ट ले आ पाता हूँ. इस हेतु क्षमा का प्राथी भी हूँ और इस गहन थकान के लिये दया का भी. मगर यह मेरा निजी मामला है, इसलिये चल जा रहा है.

जब चिट्ठे पढ़ें तो हमारे जैसे टिप्पणीपीर टिप्पणियाँ न पढ़ें, यह कैसे संभव है? टिप्पणियाँ पढ़ता हूँ तो पाता हूँ कि जैसे इन सदी के महानायकों ने अपना गृहकार्य पूरा नहीं किया, बस बोलना है इसलिये बोल गये और अपनी बात को वजन देने के लिये कोई पुराने का प्रकरण का उद्धरण दे गये जैसे मोदी विवाद, गुजरात विवाद, हिन्दु-मुस्लिम बहस, मुहल्ला विवाद, अमरीका-समरीका विवाद (जिसमें सागर पुनः टंकी पर चढ़े थे), बैंगाणी बंधु विवाद, नेपकीन प्रकरण आदि आदि.जब देखता हूँ तो लगता है कि अलग अलग लोगों ने, या उन्हीं लोगों ने अलग अलग जगह उसी विवाद को अलग अलग नाम से पुकारा जिससे मुझ जैसे अल्प ज्ञानियों (यह अज्ञानी को सुसंस्कृत भाषा में कहा जाता है-और भाषा का महत्व तो अब सबको ज्ञात है ही) को समझने में बड़ी असुविधा होती है. गल्ती लिखने वालों की भी नहीं है, अब जब कभी यहाँ हुये विवादों को कोई नाम ही नहीं दिया गया तो जिसके जो मन आया वो उसे उस नाम से पुकार गया. सब का भला हो जो अपनी समझ से कुछ तो बता ही जाते हैं वरना अगर कोई लिख देता कि वो उस विवाद में नारद और आप कहाँ थे जो अब चले आये? हम तो समझ ही न पाते कि वो उस क्या और अब क्या? उस का कोई रिफरेंस नहीं और अब जिस पोस्ट पर कहा उसका अभी के विवाद से कुछ लेना देना नहीं, वो तो नारद की तकनिकी समस्या को इंगीत करती पोस्ट है.

खैर, इस बात को मैने क्यूँ उठाया और यहाँ लाकर क्यूँ रोक दिया, इस पर एक बहुत ज्ञानवर्धक जानकारी देकर फिर शुरु होते हैं.

क्या आपने कभी गौर किया है कि अटलांटिक में और पेसेफिक में जो समुन्द्री तूफान आते हैं, उनके नाम जैसे रीता, कटरीना, बिल आदि कैसे रखे जाते हैं. कौन इनको नाम देता है और कैसे देता है. दरअसल, १९५३ के पहले तक इन्हें इनके लेटिट्यूड और लोन्गीटयूड से जाना जाता था, कोई नाम नहीं. मगर इससे एक आम आदमी को समझने और इस विषय में बात करने में असहूलियत होती थी. तब १९५३ में राष्ट्रीय मौसम विभाग के समुन्द्री मौसम वैज्ञानिकों ने इनके नामकरण की प्रथा शुरु की.शुरु में जैसा की पानी के जहाज को मादा श्रेणी में रखा गया है, इन तूफानों का नामकरण भी महिलाओं के नाम से ही हुआ. इसका और एक पुख्ता कारण रहा होगा कि इन तूफानों के मूड का कुछ पता नहीं- अभी चुप बैठे हैं, एकाएक भड़के तो ऐसा कि सब तहस नहस. क्या पता कब कौन सी बात और किसकी बुरी लग जाये.

अटलांटिक महासागर के तूफानों के लिये ६ लिस्टें बनाई गईं. हर साल के लिये एक-जैसे जैसे तूफान आते गये, नाम अलग होते गये. जैसे अगर रीता २००४ की लिस्ट में है और ७ वें नम्बर पर है तो २००४ में आया ७वां तूफान रीता कहलायेगा. उसके जाने के बाद अब रीता नाम का तूफान इसके सातवें साल में ही आ सकता है, क्यूँकि अगले ६ सालों की लिस्ट तैयार है. जो ६ साल बाद फिर से शुरु होती है. हर लिस्ट में २१ नाम है. ऐसा ही कुछ पैसेफिक में आये तूफानों के लिये भी इंतजाम है. अब मान लिजिये कि एक साल २१ से ज्यादा तूफान आ गये तब क्या होगा? आम धारणा के अनुरुप क्या अगले साल की लिस्ट इस्तेमाल कर लेंगे? नहीं!! इस साल की लिस्ट इस साल के लिये और अगली अगले साल के लिये. तब ऐसे में तय पाया गया कि इस दशा में नेशनल हेरिकेन सेन्टर ग्रीक गणनावली का इस्तेमाल करते हुये उन्हे अल्फा, बीटा, गामा आदि आदि नामों से पुकारेगा.

कुछ रोचक तथ्य इस विषय में और भी है जैसे १९७९ में नारी स्वतंत्रता टाईप आंदोलनकारियों के आगे धुटने टेकते हुये इसमें पुरुष नाम भी शामिल किये गये..एक महिला फिर एक पुरुष, फिर एक महिला फिर एक पुरुष. चलो, पुनः महिलाओं की जीत हुई बहुत नमन महिला शक्ति को.

दूसरा यह कि जब कोई तूफान अत्याधिक कोहराम मचा देता है और बहुत लोग मारे जाते हैं तो उसे रिटायर कर दिया जाता है यानि वो भविष्य में फिर कभी नहीं आयेगा. जैसे कि कटरीना जिसने न्यू ऑरलिन्स में ऐसा मंजर दिखाया कि उसके लिये ऐसा अप्रिय मगर जरुरी निर्णय लेना पड़ा और उसे सेवानिवृत कर दिया गया. इस बात पर कोई विवाद की सुनवाई नहीं होगी. आप इसे तानाशाही मानें तो या लोकतांत्रिक मानें तो. वो रिटायर हो गया और अब नहीं आ सकता, बस्स!! चाहे लाख हल्ला मचा कर देख लो!! :)

और इन तूफानों को नाम देने के पहले उन्हें उष्णकटिबंधीय दबाव के कारण उठे हुये तूफान होना जरुरी है, तभी उन्हें नाम दिया जा सकता है.

तब अपनी बात आगे बढ़ाता हूँ कि क्यूँ न हम भी अपने चिट्ठाजगत में उठे विवादों को एक स्तर पर पहुँच जाने के बाद नाम देना शुरु कर दें. सब को सुविधा हो जायेगी. लोग उस नाम का लेबल अपनी पोस्ट में लगा लेंगे. सर्च भी आसान हो जायेगी. टिप्पणी में रेफर करना भी सरल. अभी टाईप के विवाद को रिटायर भी कर देंगे...सब साफ सुथरा, निर्मल और सरल. गैर तानाशाही, लोकतांत्रिक.

मैं प्रस्तावित करता हूँ कि फिल्म हिरोईनों के नाम पर इनका नामकरण किया जाये. सुन रहे हो, नारद!!!

रेखा नाम दे दें क्या इस नये वाले को-रिटायर करने की सुभीता को देखते हुये. :)

आप सबके विचार आमंत्रित हैं. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, जून 15, 2007

ऑनलाईन कवि सम्मेलन-१६ जून, २००७

ई कविता और 'हिन्दी सीखो' के संयोजन एवं जनप्रिय कवि श्री अशोक चक्रधर जी के मार्ग दर्शन में काव्य गोष्ठी को नया आयाम देने का अनूठा प्रयास:

ऑनलाईन कवि सम्मेलन

"दूर रह कर भी पास होने का अहसास"

दिनाँक: १६ जून, २००७ शनिवार को भारतीय समयानुसार सायं ७:३० बजे और न्यूयार्क में सुबह १० बजे (EST)



आप सब अधिक से अधिक संख्या में ऑनलाईन होकर श्री अशोक चक्रधर एवं अन्य कवियों की रचनाओं का आनन्द उठायें.

इसी अवसर पर १३ जुलाई से १५ जुलाई, २००७ तक न्यूयार्क, अमेरीका में आयोजित होने वाले

के विषय में भी विशेष जानकारी दी जायेगी.

सम्मेलन की आयोजन समिति के सदस्य आप के प्रश्नों के ज़वाब के लिये उपलब्ध होंगे

इस अनूठे कार्यक्रम में भाग लेने के लिये यहाँ क्लिक करें.

अन्य जानकारी के लिये आप मुझे या ekavita1@yahoo.com पर संपर्क कर सकते हैं. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जून 11, 2007

वैसे तो मुझको पसंद नहीं

मित्रों, यह कोई कविता नहीं और न ही स्पष्टीकरण है.बस एक मजबूर का मजबूरियों का बखान है.
मजबूरी में आदमी कितना विवश हो जाता है. जो कार्य उसे नहीं पसंद, वो तक करना पड़ता है.जिस मूड़ में लिखी गई है, उसी मूड में पढ़िये और आनन्द उठाईये. इस मजबूरी में अन्तिम छंद चिट्ठाकारी को समर्पित है.





जब चाँद गगन में होता है
या तारे नभ में छाते हैं
जब मौसम की घुमड़ाई से
बादल भी पसरे जाते हैं
जब मौसम ठंडा होता है
या मुझको गर्मी लगती है
जब बारिश की ठंडी बूंदें
कुछ गीली गीली लगती हैं
तब ऐसे में बेबस होकर
मैं किसी तरह जी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब मिलन कोई अनोखा हो
या प्यार में मुझको धोखा हो
जब सन्नाटे का राज यहाँ
और कुत्ता कोई भौंका हो
जब साथ सखा कुछ मिल जायें
या एकाकी मन घबराये
जब उत्सव कोई मनता हो
या मातम कहीं भी छा जाये
तब ऐसे में मैं द्रवित हुआ
रो रो कर सिसिकी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब शोर गुल से सर फटता
या काटे समय नहीं कटता
जब मेरी कविता को सुनकर
खूब दाद उठाता हो श्रोता
जब भाव निकल कर आते हैं
और गीतों में ढल जाते हैं
जब उनकी धुन में बजने से
ये साज सभी घबराते हैं
तब ऐसे में मैं शरमा कर
बस होठों को सी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब पंछी सारे सोते हैं
या उल्लू बाग में रोते हैं
जब फूलों की खूशबू वाले
ये हवा के झोंके होते हैं
जब बिजली गुल हो जाती है
और नींद नहीं आ पाती है
जब दूर देश की कुछ यादें
इस दिल में घर कर जाती हैं
तब ऐसे में मैं क्या करता
रख लम्बी चुप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.



चिट्ठाकारी विशेष:

जब ढेरों टिप्पणी मिलती हैं
या मुश्किल उनकी गिनती है
जब कोई कहे अब मत लिखना
बस आपसे इतनी विनती है
जब माहौल कहीं गरमाता हो
या कोई मिलने आता हो
जब ब्लॉगर मीट में कोई हमें
ईमेल भेज बुलवाता हो.
तब ऐसे में मैं खुश होकर
बस प्यार की झप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.


--समीर लाल 'समीर'

चित्र साभार: गुगल महाराज Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जून 04, 2007

इक टूटा सा संदेश

एक मेरा प्रिय मित्र कहता है कि आजकल हास्य कुछ ज्यादा हो रहा है तो दूसरा कहता है कि चलो अच्छा है लेख छोटा लिखा. यह साईज पसंद आई, न ज्यादा लम्बा न ज्यादा छोटा. अन्य कहता है कि बड़ी जल्दी खत्म हो गया. सबको पढ़ कर इत्मिनान से आपको पढ़ने आये और आप तो शुरु हुये और खत्म हो गये. जैसे मुन्ना भाई के हॉस्टल का कमरा. अब आप बताओ, क्या करें. हास्य न लिखें कि छोटा न लिखें कि लंबा न लिखें, चिट्ठों पर न लिखें. हम तो अटक से गये हैं. हमें तो साजिश नजर आ रही है कि लोग लिखवाना ही बंद करवाना चाह रहे हैं. जो करो, उसमें मीन मेख. न ये करो न वो करो. क्या लालू समझे हो कि भूसा खायें और डकारे भी न!!

अरे हमारा भी तो कुछ मन करेगा सो करेंगे. तुम कुछ सोचो. अभी समझ नहीं पाये हो हमें. हम बहुत जबरी आईटम है-आईटम गर्ल नहीं राखी सावंत टाईप. मगर जब अपनी पर उतर आयें तो उससे से भी जमकर ठूमका लगाते हैं. लो अब रोना लेकर आये हैं...मन खुश हो जायेगा तुम्हारा कि बहुत हास्य हो गया. बहुत लम्बा हो गया. चलो सब से निजात...अब पढ़ो इसे..झेलो....टिपियाना जरुर...वरना हम बुरा मानते हैं और फिर और जम कर झिलायेंगे...हाईकु लिख मारेंगे ५१ कम से कम...बंद थोड़े करेंगे लिखना...... हा हा

बुरा मानने के चक्कर में कूछ न लिखें तो लगता है कि सबसे दूर होते जा रहे हैं. तब सोचा यही लिख दें कि कुछ नहीं लिख रहे हैं. सब तो हमारी तरह सत्यवादी होते नहीं. अगर हो जायें तो आधे से ज्यादा नेता यही कहते नजर आयें कि कुछ नहीं कर रहे हैं मगर देश चलता जा रहा है.

खैर, उतना भी निकम्मापन अभी हाबी नहीं हुआ है, तो सारी टूटी कवितायें आपकी सेवा में ऊडेल देता हूँ. शायद पूरी न लगें मगर अपने संदेश पूरे दे देंगी, यह मेरा आपसे वादा है. अगर संदेश मिले तो टिपपणी करके सूचित करना :)


लाचारी

रोटी के लिए
बच्चे की जिद
और वो बेबस लाचार माँ
उसे मारती है.

वो जानती है
भूख का दर्द
मार के दर्द में
कहीं खो जायेगा.

कुछ देर को ही सही
बच्चा रोते रोते
सो जायेगा.




पलायन


गाँव की कच्ची सड़कों पर
स्वच्छंद घूमता रामू!!
तेज रफ्तार भागती
कार की चपेट में आ
अपना एक पांव गवां कर
शहर की सड़कों पर चलना
सीख गया है....

फिर सोचता है
शहर की किस बात पर
गाँव का हर बालक आज
रीझ गया है.




महत्वाकांक्षा

सीमित डोर से बंधी पतंग
सामने असीमित आसमान
मुंडेर पर चढ़
कुछ तो ऊँची हुई उड़ान...

इस चाहत का अंजाम
बैसाखियों पर
लटकता बचपन
और
चेहरे पर बेबस मुस्कान!!




दहेज

मिट्टी के तेल की लाईन में
खड़े लोगों को देख
वो डर जाती है....

दहेज की वेदी पर बलि चढ़ी
उसे अपनी बड़ी बहन
बहुत याद आती है!!



शुद्ध

गाँव के खाने से
बहुत घबराता हूँ...

शहर में रहता हूँ, न!
विशुद्ध नहीं पचा पाता हूँ!!



आरक्षण

ऊँचे अंक लाने के बाद भी
वो प्रतिक्षा सूची में
खड़ा है....

आरक्षण का तमाचा
सीधा उसके गाल पर
पड़ा है....



इंसान

इंसान
अब रोशनी से
घबराता है....

रोशनी में
चेहरा जो साफ
नजर आता है....



कवितायें

देख कर हालत जहां की
संवेदनायें सब
सो गई हैं

और मेरे दिल से उठती
कवितायें अब
खो गई हैं.


--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links