भटक गई है जो हवा, उनको दिखाने रास्ते
जल रहा बनकर दिया मैं, रोशनी के वास्ते.
एक बड़े शायर का शेर है. नाम है समीर लाल और तख़ल्लुस 'समीर' लिखते हैं. क्या बलिदान की भावना है शायर की. जानता है कि जब भी हवा सही राह पर आ गई, सबसे पहले वही बूझेगा मगर जज़बा है. सलाम करती हूँ शायर को. यह तो हो गई उड़न तश्तरी की बात. अब हमारी सुनो.
आज पढ़ता था भाई फुरसतिया जी को. स्वतंत्रता की ६०वीं वर्षगांठ पर झूठी आजादी के विषय में सेंटिया रहे थे . कहते हैं 'यह मत पूछो कि देश तुम्हारे लिये क्या कर सकता है बल्कि यह देखो तुम देश के लिये क्या कर सकते हो'.
फिर कलाम साहब के वचन सुनाने लगे कि क्या आपके पास देश के लिये पन्द्रह मिनट हैं? पढ़कर एक बंदे का ख्याल आ गया. उनकी तो पूरी पूँजी ही समय है और जी भर कर है. मगर देश के लिये नहीं, बकबकाने के लिये.
चलिये उनसे परिचय करवाता हूँ, नाम है मल्लन चाचा:
मल्लन चाचा ने जीवन भर कुछ नहीं किया. पिता जी तीन मकान बनवा कर मर गये. दो मकान किराये पर चलते थे और एक में मल्लन चाचा खुद रहते थे. किराये की आमदनी से ठीक ठाक गुजर बसर हो जाती है.
मल्लन चाचा को बात करने का बहुत शौक है और हर बात के लिये वो सामने वाले को ही दोषी मानते हैं. यह उनका स्वभाव था कि कभी किसी बात पर खुश नहीं होना और मीन मेख निकाल कर सामने वाले पर मढ़ देना.
मल्लन चाचा से मिलने उनके घर पहुँचा तो वहीं अहाते में लूंगी लपेटे पेड़ के नीचे चबूतरे पर पालथी मारे बैठे थे.
‘पाय लागूँ, चाचा’
‘खुश रह बचुआ. जरा वो सामने आले से बटुआ तो उठा ले और वहीं चूना भी रखा है. थोड़ा तम्बाखू मल दे.’
मैं तम्बाखू मलता उनके पास ही में बैठ जाता हूँ.
‘का बात है, बचुआ. बहुत दिन बाद दिखे.’
‘चाचा, वो तबियत खराब थी न इसी से.’
‘वो तो होना ही थी. न कसरत, न सैर सपाटा. तो का होगा. यहिये न!!’
‘नहीं चाचा, बस जुकाम पकड़ लिये था.’
‘काहे गरम कपड़ा नहीं पहनते.’
‘चाचा, इतनी गरमी में? वो तो जरा ठंडा गरम हो गया था बस.’
‘तब काहे इतनी शराब पीते हो?’
‘कहाँ चाचा, हम शराब नहीं पीते.’
‘तो फिर कौन ठंडा चीज पिया जा रहा है? बीयर..हा हा!! शहरी का नाती नाही तो! खैर, जाये दो. इ बताओ कि क्या समाचार है शहर का.’
‘चाचा, देश बहुत तरक्की कर रहा है. ढेरन विकास हो रहा है. GDP बहुते बढ़ गया है और मुद्रा स्फिती की दर भी एकदम्मे नियंत्रण में है. विदेशी मुद्रा का भंडार भी लबालब है.’
‘बचुआ, इ सब चोचलेबाजी हमसे न बतियाया करो. हम सब समझते हैं. ई GDP को तो तुम मानो घी, रोटी पर मलने के लिये और मुद्रा स्फिती नियंत्रण को जानो दाल का तड़का. अब रह गये विदेशी मुद्रा भंडार तो वो हैं सलाद और ये तुम्हारे मॉल और कॉल सेन्टरवे सब हइन केक और पेस्ट्री. जब रोटिये, दाल का जुगाड़ नहीं तो इनका का करीं. यह सब तो उनकी सुभीता के लिये हैं जिनके पास रोटी, दाल पहलवें से है. हमार तुहार के लिये नाही. समझे बचुआ.’
‘चाचा, हम तो जो सुनें है वो बताये दिये. बाकि हम तो कुछ किये नहीं हैं. हम पर काहे बिगड़ रहे हैं.’
‘तुम तो यूँ भी किसी कारज के हो नहीं, हें हें हे…’
‘अच्छा, अब चलता हूँ,चाचा. पाय लागी.’
‘ठीक है बचुआ. फिर आना.’
मैं उठता हूँ. चबूतरे के नीचे की जमीन ऊबड़ खाबड़ है पाँव डगमगा जाता है.
‘का बचुआ. जरा संभल कर. कुछ वजन कम करो. बेडौल हुये जा रहे हो. अपना ही वजन तक तो संभल नहीं रहा.’
मैं भी ‘जी’ कह कर चल पड़ता हूँ.
सोचता हूँ कि अगर वो चबूतरे के नीचे दो तसला भी बालू पुरवा दें तो जमीन समतल हो जाये. मगर उन्हें दोष तो दूसरे में ही दिखता है कि तुम वजन कम करो.
अरे चाचा, खुद भी तो कुछ करो कि बस दूसरे की गल्ती देखते रहोगे और हर बात के लिये सबको कोसते रहोगे. फलाना रोटी वालों के लिये है. फलाना हमारे लिये कुछ नहीं करता.
आज हर गली, मोहल्ले में न जाने कितने ही मल्लन चाचा हैं. क्या आप मिले हैं मल्लन चाचा से?
ऐसे में हम विकास की बात करें भी तो कैसे?








