रविवार, नवंबर 03, 2019

आगे देश कौन चलायेगा यही चिंता सताती है?



१२ वीं के परिणाम घोषित हुए. लड़कियों ने फिर बाजी मारी. ये अखबार की हेड लाईन्स बता रही थी. जिस बच्ची ने टॉप किया था उसे ५०० में से ४९६ अंक मिले हैं यानि सारे विषय मिला कर मात्र ४ अंक कटे, बस! ये कैसा रिजल्ट है?
हमारे समय में जब हम १० वीं या १२ वीं की परीक्षा दिया करते थे तो मुझे आज भी याद है कि हर पेपर में ५ से १० नम्बर तक का तो आऊट ऑफ सिलेबस ही आ जाता था तो उतने तो हर विषय में घटा कर ही नम्बर मिलना शुरु होते थे. यहाँ आऊट ऑफ सिलेबस का अर्थ यह नहीं है कि किताब में वो खण्ड था ही नहीं. बल्कि वो तो बकायदा था मगर मास्साब बता देते थे इसे छोड़ दो, ये नहीं आयेगा. पहले भी कभी नहीं आया और हम लोगों की मास्साब में, कम से कम ऐसी बातों के लिए अटूट आस्था थी मगर अपनी किस्मत ऐसी कि हर बार ५ - १० नम्बर के प्रश्न उसी में से आ जाते. तो बस हम घर आकर बताते थे कि आज फिर आऊट ऑफ सिलेबस १० नम्बर का आ गया. घर वाले भी निश्चिंत रहते थे कि कोई बात नहीं ९० का तो कर आये न!! एक भारतीय इस मामले में बड़ा संतोषी जीव होता था.
तब आगे का खुलासा होता कि ५ नम्बर का रिपीट आ गया. सो वो भी नहीं कर पाये और पेपर इत्ता लंबा था कि समय ही कम पड़ गया तो आखिरी सवाल आधा ही हल कर पाये, अब देखो शायद कॉपी जांचने वाले स्टेप्स के नम्बर दे दें तो दे दें वरना तो उसके भी नम्बर गये. अब आप सोच रहे होंगे कि ये ’रिपीट आ गया’ क्या होता है?
दरअसल हमारे समय में विद्यार्थी चार प्रकार के होते थे..एक तो वो जो ’बहुत अच्छे’ होते थे, वो थारो (Thorough) (विस्तार से)घोटूं टाईप स्टडी किया करते थे याने सिर्फ आऊट ऑफ सिलेबस छोड़ कर बाकी सब कुछ पढ़ लेते थे. ये बच्चे अक्सर प्रथम श्रेणी में पास होते थे मगर इनके भी ७० से ८५ प्रतिशत तक ही आते थे. काफी कुछ तो आऊट ऑफ सिलेबस की भेंट चढ़ जाता था और बाकी का, बच्चा है तो गल्तियाँ तो करेगा ही, के नाम पर.
दूसरे वो जो ’कम अच्छे’ होते थे वो सिलेक्टिव स्टडी करते थे यानि छाँट बीन कर, जैसे इस श्रेणी वाले आऊट ऑफ सिलेबस के साथ साथ जो पिछले साल आ गया है वो हिस्सा भी छोड़ देते थे क्यूँकि वो ही चीज कोई बार बार थोड़ी न पूछेगा जबकि इतना कुछ पूछने को बाकी है, वाले सिद्धांत के मद्दे नजर. तो जो पिछले साल पूछा हुआ पढ़ने से छोड़ कर जाते थे, उसमे से अगर कुछ वापस पूछ लिया जाये तो उसे ’रिपीट आ गया’ कहा जाता था. उस जमाने के लोगों को ’रिपीट आ गया’ इस तरह समझाना नहीं पड़ता था, वो सब समझते थे. ये बच्चे गुड सेकेन्ड क्लास से लगा कर शुरुवाती प्रथम श्रेणी के बीच टहलते पाये जाते थे. गुड सेकेन्ड क्लास का मतलब ५५ से लिकर ५९.९% तक होता था. ६० से प्रथम श्रेणी शुरु हो जाती थी.
तीसरी और चौथी श्रेणी वाले विद्यार्थी धार्मिक प्रवृति के बालक होते थे जिनका की पुस्तकों, सिलेबस, मास्साब आदि से बढ़कर ऊपर वाले में भरोसा होता था कि अगर हनुमान जी की कृपा हो गई तो कोई माई का लाल पास होने से नहीं रोक सकता. इस श्रेणी के विद्यार्थी परीक्षा देने आने से पहले मंदिर में माथा टेक कर और तिलक लगा कर और दही शक्कर खाकर परीक्षा देने आया करते थे और उत्तर पुस्तिका में सबसे ऊपर ’ॐ श्री गणेशाय नम:” लिखने के बाद प्रश्न पत्र को माथे से छुआ कर पढ़ना शुरु करते थे. ये धार्मिक बालक १० प्रश्नों का गैस पेपर याने कि ’क्या आ सकता है’ और अमरमाला कुँजी जो हर विषय के लिए अलग अलग बिका करती थी और उसमें संभावित २० प्रश्न जिसे वो श्यूर शाट बताते थे और जिस कुँजी में उनके जबाब भी होते थे, को थाम कर परीक्षा के एक रात पहले की तैयारी और भगवान के आशीर्वाद को आधार बना परीक्षा देकर सेकेण्ड क्लास से पीछे की तरफ से चलते हुए थर्ड क्लास और ग्रेस मार्क से साथ पास श्रेणी के साथ साथ सप्लिमेन्ट्री और फेल की श्रेणियों में शुमार रहते थे. यह सब इस बात पर निर्भर किया करता था कि गैस पेपर और साल्व्ड गाईड से कित्ता फंसा? ये ’फंसा’ भी तब की ही भाषा थी जिसका अर्थ होता था कि जो गैस पेपर मिला था उसमें से कौन कौन से प्रश्न आये. नकलचियों का शुमार भी इसी भीड में होता था. मगर देखा यह जाता था और है कि अंततः यही देश चलाते हैं
कुछ उस जमाने के हम, इस जमाने के नौनिहालों को ९९.२% लाता देखकर आवाक न रह जायें तो क्या करें!! आगे देश कौन चलायेगा यही चिंता सताती है?
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर ३, २०१९ में प्रकाशित:

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