रविवार, फ़रवरी 10, 2019

धरना खत्म करने की खबर से पता चला कि वे धरने पर थे


धरना! धरना!! धरना!! आजकल जहाँ सुनो, बस यही सुनाई दे रहा है.
वैसे तो नित नये नये धरने कभी जंतर मंतर पर, कभी रामलीला मैदान पर, तो कभी राजघाट पर और कोई जगह न मिले तो कलेक्ट्रेट के सामने, होते ही रहते हैं. आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, किसान आदि धरने पर बैठ भी जायें तो भी न तो मीडिया दिखाता है और न नेता देखता है. धरने भी चर्चा में तभी आते हैं, जब कोई दमदार पूरे दमखम के साथ धरने पर बैठता है और मीडिया उसे चीख चीख कर दिखाता हौ.
जहाँ धरने पर दमदार के बैठने से दम आ जाता है, वहीं बार बार धरने पर बैठने या यूँ कहा जाये कि धरने का लती हो जाने पर दमदार का दम ही कम हो जाता है. फिर न कोई उनको पूछता है और न उनके धरने को नोटिस में लिया जाता है. इनकी हालत काठ की हांडी जैसी है जो बार बार चूल्हे पर नहीं चढ़ाई जा सकती. जैसे कि कभी रामलीला मैदान में लोकपाल के लिए धरने पर बैठकर पूरे देश को हिला कर रख देने वाले आजकल कब अपने गाँव में धरने पर बैठते हैं, क्यूँ बैठते हैं, कब उठ जाते हैं, क्यूँ उठ जाते हैं, कोई नहीं जानता. अब तो हालत ये है कि कई बार तो उनके धरना खत्म करने की खबर से पता चलता है कि वे धरने पर बैठे हुए थे.
हाल ही में कलकत्ता का एक धरना बड़े जोर शोर के साथ ऐसी चर्चा में आया कि मीडिया की तो जैसे चल निकली. छप्पर फाड़ टीआरपी बटोरी.
दरअसल इस धरने की खासियत यह थी कि इस धरने में जो धरने गया था, उसे उसी ने धर लिया जिसे वो धरने गया था. जिसने धरा उस पर जिसका वरदहस्त था, वह धरने वाले के धरे जाते ही धरने पर बैठ गया. धरने पर बैठा इसलिए ताकि धरने आये व्यक्ति पर जिसका वरदहस्त है, उसे संदेश दिया जा सके कि अगर आगे सी किसी को हमारे आदमियों को धरने के लिए भेजोगे तो उसे भी धर लिया जायेगा. फिर मत कहना कि हमें बताया नहीं था. बताने का सबसे बेहतरीन साधन धरना ही है एक दमदार के लिए. बाकि तो मीडिया देश भर को चीख चीख खबर पहुँचा ही देगा, इनके चीखने का तो हाल ये है कई बार जन्मजात बहरे को भी इनकी चीख पुकार सुनकर यह मुगालता हो जाता है कि उसको सुनाई देने लगा.
बताया गया कि जो धरने गया था वो भी गया नहीं था. उसे भी जिसका वरदहस्त उसके सर पर था, के द्वारा भेजा गया था.
धरने पर बैठकर इतना तो तय हो गया कि एक की चली सियासी चाल को दूसरे ने धरने पर बैठ कर नाकामयाब कर दिया. मगर इस तरह की सियासी चालें देश के लिए स्वस्थ परंपरा नहीं है. माना कई दशकों से इस तरह की चूहा बिल्ली का खेल चल रहा है, किन्तु कहीं तो आकर इसे रोकना होगा.जल्द ही कोई और सत्ता हथिया लेगा फिर वही बदले का भाव लिए यही दांव इन पर खेलेगा.
मीडिया फिर मजे लूटेगा. फिर चीखेगा, चिल्लायेगा. डीबेट करायेगा. जैसे ही मामला संभलेगा सब कुछ पूर्ववत हो जायेगा. चुनाव भी निपट लेंगे, फिर साढ़े चार साल शांति और चुनाव के आते ही यही खेल शुरु. जनता सब समझती है. अब ये चालें वोट खींचने के बदले वोट को दूर ले जाती हैं. एक बदलाव तो देख ही लिया कि धरने के लिए गया व्यक्ति खुद ही धर लिया गया वो भी उसके द्वारा जिसे वो धरने गया था.
खैर, अब अगले धरने तक के लिए शांति. चुनाव सामने हैं, अभी तो बहुत धरने होंगे.
मिलते हैं एक ब्रेक के बाद, एक अगला धरना लेकर.
-समीर लाल ’समीर’   

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में सोमवार फरवरी १०, २०१९ को:     

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1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (11-02-2019) को "खेतों ने परिधान बसन्ती पहना है" (चर्चा अंक-3244) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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बसन्त पंचमी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'